बुधवार, 28 नवंबर 2012

अदृश्य रहस्यमयी गाँव टेंवारी


ब्लॉ.ललित शर्मा, शनिवार, 24 नवम्बर 2012

धरती पर गाँव-नगर, राजधानियाँ उजड़ी, फिर बसी, पर कुछ जगह ऐसी हैं जो एक बार उजड़ी, फिर बस न सकी। कभी राजाओं के साम्राज्य विस्तार की लड़ाई तो कभी प्राकृतिक आपदा, कभी दैवीय प्रकोप से लोग बेघर हुए। बसी हुयी घर गृहस्थी और पुरखों के बनाये घरों को अचानक छोड़ कर जाना त्रासदी ही है। बंजारों की नियति है कि वे अपना स्थान बदलते रहते हैं, पर किसानों का गाँव छोड़ कर जाना त्रासदीपूर्ण होता है, एक बार उजड़ने पर कोई गाँव बिरले ही आबाद होता है। गरियाबंद जिले का केडी आमा (अब रमनपुर )गाँव 150 वर्षों के बाद 3 साल पहले पुन: आबाद हुआ। यदा कदा उजड़े गांव मिलते हैं, यात्रा के दौरान। ऐसा ही एक गाँव मुझे गरियाबंद जिले में फिंगेश्वर तहसील से 7 किलो मीटर की दूरी पर चंदली पहाड़ी के नीचे मिला।

गूगल बाबा की नजर से
सूखा नदी के किनारे चंदली पहाड़ी की गोद में 20.56,08.00" उत्तर एवं 82.06,40.20" पूर्व अक्षांश-देशांश पर बसा था टेंवारी गाँव। यह आदिवासी गाँव कभी आबाद था, जीवन की चहल-पहल यहाँ दिखाई देती थी। अपने पालतू पशुओं के साथ ग्राम वासी गुजर-बसर करते थे। दक्षिण में चंदली पहाड़ी और पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती सूखा नदी आगे चल कर महानदी में मिल जाती है। इस सुरम्य वातावरण के बीच टेंवारी आज वीरान-सुनसान है। इस गाँव के विषय में मिली जानकारी के अनुसार इसे रहस्यमयी कहने में कोई संदेह नहीं है। उजड़े हुए घरों के खंडहर आज भी अपने उजड़ने की कहानी स्वयं बयान करते हैं। ईमली के घने वृक्ष इसे और भी रहस्यमयी बनाते हैं। ईमली के वृक्षों के बीच साँपों बड़ी-बड़ी बांबियाँ  दिखाई देती हैं। परसदा और सोरिद ग्राम के जानकार कहते हैं कि गाँव उजड़ने के बाद से लेकर आज तक वहां कोई भी रहने की हिम्मत नहीं कर पाया।

रमई पाट के पुजारी प्रेम सिंह ध्रुव

ग्राम सोरिद खुर्द से सूखा नदी पार करने के बाद इस वीरान गाँव में अब एक मंदिर आश्रम स्थित है। रमई पाट के पुजारी प्रेम सिंह ध्रुव कहते हैं- जब हम जंगल के रास्ते से गुजरते थे तो एक साल के वृक्ष की आड़ में विशाल शिवलिंग दिखाई देता था। जो पत्तों एवं घास की आड़ छिपा था। ग्रामीण कहते थे कि उधर जाने से देवता प्रकोपित हो जाते हैं इसलिए उस स्थान पर ठहरना हानिप्रद है। इसके बाद मंगल दास नामक साधू आए, उनके लिए हमने पर्णकुटी तैयार की। पहली रात को ही हमे भयावह नजारा देखने मिल गया। हम दोनों एक चटाई पर सोये थे, बरसाती रात में शेर आ गया और झोंपड़ी को पंजे से खोलने लगा। हम साँस रोके पड़े रहे और भगवान से जान बचाने की प्रार्थना करते रहे। छत की तरफ निगाह गयी तो वहां बहुत बड़ा काला नाग सांप लटक कर जीभ लपलपा रहा था। हमारी जान हलक तक आ गयी थी, भगवान से अनुनय-विनय करने पर दोनों चले गए। मैं झोंपड़ी से निकल कर शिवलिंग के सामने दंडवत हो गया। उस दिन के पश्चात इस तरह की घटना नहीं हुयी।

टानेश्वर नाथ महादेव

आश्रम में पहुचने पर भगत सुकालू राम ध्रुव से भेंट होती है, शिव मंदिर आश्रम खपरैल की छत का बना है, सामने ही एक कुंवा है। कच्ची मिटटी की दीवारों पर सुन्दर देवाकृतियाँ बनी हैं। शिव मंदिर की दक्षिण दिशा में सूखा नदी है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि यह शिवलिंग प्राचीन एवं मान्य है। इसे टानेश्वर नाथ महादेव कहा जाता है, यह एकमुखी शिवलिंग तिरछा है। कहते हैं कि फिंगेश्वर के मालगुजार इसे ले जाना चाहते थे, खोदने पर शिवलिंग कि गहराई की थाह नहीं मिली। तब उसने ट्रेक्टर से बांध कर इसे खिंचवाया। तब भी शिवलिंग अपने स्थान से टस से मस नहीं हुआ। थक हार इसे यहीं छोड़ दिया गया। तब से यह शिवलिंग टेढ़ा ही है। मंगल दास बाबा की समाधी हो गयी। वे ही यहाँ रात्रि निवास करते थे, उसके बाद से आज तक यहाँ रात्रि को कोई रुकता नहीं है। अगर कोई धोखे से रुक जाता है तो स्थानीय देवी-देवता उसे विभिन्न रूपों में आकर परेशान करते हैं, डराते हैं। सुकालू भगत भी शाम होते ही अपने गाँव धुडसा चला जाता है।

सुकालू भगत

बाबा मंगल दास के पट्ट शिष्य परसदा निवासी भूतपूर्व सरपंच जगतपाल इस गाँव के उजड़ने का बताते हैं कि टेंवारी गाँव में इतने सारे देवी देवता इकट्ठे हो गए हैं कि त्यौहार के अवसर पर एक कांवर भर के उनके नाम के दिए जलाने पड़ते हैं। किसी देवता की भूलवश अवहेलना होने पर उसके उत्पात गाँव में प्रारंभ हो जाते थे। महिलाओं के मासिक धर्म के समय की अपवित्रता के दौरान अगर कोई महिला घर से बाहर निकल जाती थी तो ग्रामवासियों को दैवीय प्रकोप झेलना पड़ता था। बीमारी हो जाना, रात को जानवरों का बाड़ा स्वयमेव खुल जाना, मवेशियों को शेर, बुंदिया द्वारा उठा ले जाना, अकस्मात किसी की मृत्यु हो जाना इत्यादि दैवीय प्रकोपों को निरंतर झेलना पड़ता था। इससे बचने के लिए मासिक धर्म के दौरान पुरुष, महिलाओं के स्नान के लिए स्वयं पानी भर के लाते थे। सावधानी बरतने के बाद भी चूक हो ही जाती थी। तब फिर से दैवीय प्रताड़ना का सिलसिला प्रारंभ हो जाता था।

घरों के अवशेष

एक समय ऐसा आया की सभी ग्रामवासियों ने यहाँ से उठकर अन्य स्थान पर निवास करने का निर्णय किया।  भागवत जगत "भुमिल" कहते हैं कि सोरिद मेरी जन्म भूमि है, लगभग सन 1934 में टेंवारी के ग्राम वासी सोरिद खुर्द, नांगझर एवं फिन्गेश्वरी  में विस्थापित हुए, 1920 के राजस्व अभिलेखों में इस गाँव का उल्लेख मिलता है। अदृश्य शक्तियों के उत्पात इस वीरान गाँव में तहलका मचाते हैं। यहाँ के शक्तिशाली देवता बरदे बाबा हैं, इनका स्थान चंदली पहाड़ी पर है। जगतपाल कहते हैं कि यदि इस पहाड़ी पर कोई भटक जाता है तो बरदे बाबा उसे भूखा नहीं मरने देते। उसे जंगल में ही चावल, पानी और पकाने का साधन मिल जाता है। यहाँ के समस्त देवी देवताओं की जानकारी तो नहीं मिलती पर मरलिन-भटनिन, कोडिया देव, कमार-कमारिन, कोटवार, धोबनिन, गन्धर्व, गंगवा, शीतला, मौली, पूर्व दिशा में सोनई-रुपई जानकारी में हैं तथा नायक-नयकिन यहाँ के मालिक देवी-देवता हैं।

ईमली के पेड़ों के बीच अवशेष

जगतपाल कहते हैं कि जब मैं आश्रम में रुकता था तो तरह-तरह के सर्प दिखाई देते थे। दूध नाग, इच्छाधारी नागिन, लाल रंग का मणिधारी सर्प दिखाई देता था, वह अपनी मणि को उगल कर शिकार करता है, अगर मैं चाहता तो उसकी मणि को टोकनी से ढक भी सकता था पर किसी अनिष्ट की आशंका से यह काम नहीं किया। आश्रम में रात को सोनई-रुपई स्वयं चलकर आती हैं। मैंने कई बार देखा है। इस स्थान पर सिर्फ मंगल दास बाबा ही टिक सके, अन्य किसी के बस की बात नहीं थी। बाबा ने बताया था कि एक बार 12 लोगों ने मिल कर खुदाई करके सोनई-रुपई को निकल लिया था, पर ले जा नहीं सके। यहाँ कोई चोरी करने का प्रयास करता है उससे स्थानीय अदृश्य शक्तियां स्वयं निपट लेती है। कहते हैं कि इस पहाड़ी की मांद में सात खंड हैं, पहले खंड में टोकरी-झांपी, दुसरे खंड में नाग सर्प, तीसरे में बैल , चौथे में शेर, पांचवे में सफ़ेद हाथी, छठे में देव कन्या एवं सातवें में बरदे बाबा निवास करते हैं।

बाबा मंगल दास के पट्ट शिष्य परसदा निवासी भूतपूर्व सरपंच जगतपाल

टानेश्वर नाथ शिवजी के विषय में मान्यता है कि जब इसके पुजारी धरती पर जन्म लेते हैं तब यह (भुई फोर) धरती से ऊपर आकर प्रकाशित होते हैं, इनके पुजारी नहीं रहते तो ये फिर धरती में समाहित हो जाते हैं। साथ ही किंवदंती है कि टानेश्वर नाथ महादेव के दर्शन करने से सभी पाप एवं कल्मषों का शमन हो जाता है। टेंवारी गाँव उजड़े लगभग एक शताब्दी बीत गयी पर दूबारा किसी ने इस वीरान गाँव को आबाद करने की हिम्मत नहीं दिखाई। ईश्वर ही जाने अब टेंवारी कब आबाद होगा? शायद इसकी भी किस्मत केडी आमा गाँव जैसे जाग जाए।

सूखा नदी के किनारे यायावर

सोमवार, 26 नवंबर 2012

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

विश्वास का संकट

-मनोज कुमार
 भोपाल राजधानी तो है किन्तु महानगर नहीं बन पाया है. भोपाल के अपने ठाठ हैं और भोपाली कहलाने का गर्व भी अलग से तरह से होता है. इन दिनों भोपाल थोड़ा बहुत महानगर के रास्ते पर चलने की कोशिश कर रहा है. तांगों और रिक्शों की इस शहर से विदाई तो कभी की हो चुकी है. तेज रफ्तार से भागती गाड़ियां महानगर होने का अहसास कराती हैं. मेरे भोपाल में भी मॉल संस्कृति की धमक सुनायी देने लगी है. मैं भी इस नयी संस्कृति के गवाह होने का सु ा ले रहा हूं. एक बड़े भव्य मॉल में जाने का मौका मिला. सामने से उसकी चमक-दमक देखकर ही मेरे पसीने छूट गये. इस पसीने यह तो बता दिया कि मेरी लाख कोशिशों के बाद मैं अपने ठेठ देहातीपन से बाहर नहीं आ पाया हूं. खैर, मॉल के भीतर कदम रखने से पहले ही विश्वास के संकट से मेरा सामना हो गया. दरवाजे पर खड़े लोगों ने मशीन से मेरी तलाशी ले डाली, गोया मैं ग्राहक नहीं, आतंकवादी हूं,  झटपट वहां से निकला, आगे बढ़ा. विश्वास के संकट के साथ मैं हर दुकान के सामने से निकलता चला जा रहा था. डर लग रहा था कि फिर कोई रोक कर तलाशी न ले ले. हि मत कर मैं एकाध दुकान में गया तो पता चला कि दुकान में लगा कैमरा मेरी निगरानी कर रहा है. इस निगहबानी को देखकर एक बार फिर मैं अपने गांव पहुंच गया. गांव के बनिये की दुकान पर पहुंच कुछ अपनी सुनायी और कुछ उसकी सुनी. कुछ सौदा-सुलह किया और घर को लौट आये. कभी कोई सामान ज्यादा आ गया तो बनिया को लौटा आये और कभी ज्यादा पैसे दे आये तो वो मेरा हिसाब में बकाया लिख लिया. बरसों से बना विश्वास का रिश्ता.

इस मॉल संस्कृति में आपस में सुख-दुख सुनने सुनाने की बात तो दूर विश्वास का रिश्ते की कोई सूरत दिखायी ही नहीं देती है. दुकान में आने वाले की नीयत पर संदेह और काम करने वालों की निगहबानी. मुझे समझ में नहीं आया कि विकास का यह कैसा पैमाना है? विस्तार से विश्वास का संकट, सोचने में भी अजीब सा लगता है लेकिन आज का सच यही है कि अब गैरों पर तो क्या अपनों पर भी किसी को भरोसा नहीं रहा. तोल-मोल के जमाने में अब विश्वास भी तोल-मोल कर खरीदा और बेचा जा रहा है. इस मॉल ने हमारी संस्कृति को नष्ट कर दिया है. हमारे विश्वास की दीवार दरकने लगी है. विकास का यह चेहरा उन लोगों को भा रहा है जिन्हें खुद पर विश्वास नहीं रहा है. मां की बनायी गुझिया और पिता की डांट मेरे विश्वास होने के गवाह है. मुझे नहीं मालूम की मॉल में बिकने वाले पिज्जा और बर्गर में कभी मां ेि हाथों की बनी गुझिया की मिठास मिलती होगी. मुझे तो यह भी नहीं पता कि जो लोग अपनों पर विश्वास नहंीं कर रहे हैं, वे अपने ही रिश्तों में कितने ईमानदार होंगे लेकिन एक बात मुझे पता है कि इस विकास के विस्तार ने मुझे और मुझ जैसे जाने कितने लोगों को लालची और स्वार्थी बना दिया है. रिश्तों की गर्माहट मैं मॉल में बहने वाली एयरकंडीशन की ठंडी हवा में भूलता जा रहा हूं. कोयले में पकी मोटी रोटियां और उसके साथ प्याज और मिर्च का स्वाद अब मेरी जुबान को नहीं भाती हैं. अब मेरी जुबान पर बासी और लगभग बीमार कर देने वाले पिज्जा और बर्गर का स्वाद लग गया है. यह संकट स्वाद का नहीं है और न ही सेहत का. यह संकट है विश्वास का जो मैं अपनों से खोता चला जा रहा हूं और शायद स्वयं से भी विश्वास उठ जाने का समय आ गया है.
-मनोज कुमार

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

संवेदना का सम्मान

सुनील मिश्र
जनसत्ता 6 नवंबर, 2012: पता नहीं ऐसा क्या है कि खंडवा इलाके में आते-आते मन भारी होने लगता है। हालांकि साल में कम से कम एक बार यहां आना  ही होता है। हर वर्ष तेरह अक्तूबर को किशोर कुमार की पुण्यतिथि के दिन मध्यप्रदेश सरकार यहां किशोर कुमार सम्मान का अलंकरण समारोह आयोजित करती है, जिसमें निर्देशक, अभिनेता, पटकथाकार और गीतकार सम्मानित होते हैं। सिनेमा पर लिखने-पढ़ने का रुझान है और मेरे कम ही दोस्त यह जानते-मानते हैं कि इस पुरस्कार की परिकल्पना मेरी ही थी जो पंद्रह साल पहले साकार हुई थी। जाहिर है, इससे जुड़ कर किशोर कुमार खंडवे वाले के स्वर-व्यक्तित्व प्रभाव और ऊष्मा से कहीं न कहीं अपने भीतर एक ऊर्जा महसूस करता हूं।
1995-96 की बात रही होगी, जब मैं खंडवा आया था। तब खबर छपती थी कि समाधि खस्ताहाल है, उसके पत्थर तक लोग उखाड़ कर ले गए हैं। किशोर कुमार के बालसखा रमणीक भाई मेहता और फतेह मुहम्मद रंगरेज ने महान गायक का पुश्तैनी घर ऊपर-नीचे, एक-एक कमरा दिखाया था। अब रमणीक भाई अत्यंत वृद्ध हो चुके हैं और फतेह मुहम्मद दुनिया में नहीं हैं। किशोर कुमार ताजिंदगी इन स्वाभिमानी और निस्वार्थ मित्रों की कद्र करते रहे। आज समाधि तो बहुत संवर गई है, लेकिन पुश्तैनी घर की वे निशानियां भी नहीं दिखतीं जो तब थीं। मसलन, किशोर कुमार के पिता कुंजीलाल गांगुली और माता गौरा देवी की मढ़ी तस्वीर, वह पलंग जिस पर किशोर दा का जन्म हुआ, बरसों की बंद पड़ी घड़ी, 1986 के अप्रैल माह को दर्शाता कैलेंडर, पूजा की जगह, क्लिक थर्ड कैमरे से खींचे गए छोटे-छोटे फोटो, जिनमें गांगुली परिवार की छवि कैद थी, ईपी रेकॉर्ड आदि। यह घर अब आसपास तमाम दुकानों से घिर गया है।
पहले किशोर कुमार सम्मान समारोह भोपाल में आयोजित होता था। पर बाद में शहर के भावनात्मक आग्रह पर यह खंडवा में किया जाने लगा। जिन्हें सम्मान प्रदान किया जाता है, उनके साथ इंदौर से खंडवा सड़क मार्ग से आना और इंदौर तक लौटना अविस्मरणीय होता है। ऐसे मौके मुझे मिले और जावेद अख्तर, श्याम बेनेगल, यश चोपड़ा और इस बार सलीम खान साहब के साथ ये यात्राएं हुर्इं। इस बार पटकथा लेखन के लिए सलीम खान को राष्ट्रीय किशोर कुमार सम्मान प्रदान किया गया था। सलीम खान सत्तर के दशक में व्यावसायिक सिनेमा में लोकप्रियता के संवेदनशील तत्त्वों के साथ-साथ तब के समय और समाज की चुनौतियों के साथ युवा तेवर को सर्वाधिक गहराई से समझने वाले पटकथा और संवाद लेखक

रहे हैं। जावेद अख्तर के साथ मिल कर उन्होंने ‘हाथी मेरे साथी’, ‘सीता और गीता’, ‘अंदाज’, ‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘त्रिशूल’ ‘दोस्ताना’, ‘काला पत्थर’ और ‘शोले’ जैसी कई सफल फिल्में लिखीं। बाद में जावेद अख्तर से अलग होने के बाद भी वे फिल्में लिखते रहे। इस समय उनके बेटे सलमान खान हिंदी सिनेमा के सर्वाधिक लोकप्रिय सितारे हैं।
सलीम खान ने खंडवा में दाखिल होने से पहले ही यह इच्छा व्यक्त की कि वे किशोर कुमार की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित करने जाएंगे। समाधि-स्थल पर सुबह से संगीत चल रहा था। स्थानीय कलाकार किशोर कुमार के गाने गा रहे थे। समाधि फूलों से सजी थी। दीया जल रहा था। कुछ दोने रखे थे, जिनमें दूध-जलेबी दिखाई दे रही थी। किशोर दा को दूध-जलेबी बहुत पसंद थी। खंडवा में उनके मकान के पीछे लाला की दूध-जलेबी की दुकान आज भी मौजूद है। लाला तो अब रहे नहीं, उनके बेटे दुकान चला रहे हैं। दुकान में किशोर कुमार की बड़ी फोटो लगी हुई है। अपने जीवन के आखिरी दिनों में किशोर कुमार कहते थे- ‘दूध-जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जाएंगे।’ लेकिन उनका यह सपना अधूरा ही रहा। लाला की दुकान से दूध-जलेबी खाने वाला संवाद किशोर दा ने फिल्म ‘हाफ-टिकट’ में भी बोला था।
बहरहाल, सलीम साहब से काफी बातें हुर्इं। इधर सलमान की फिल्मों की पटकथा को एक तरह से परिष्कृत करने और परामर्श देने का काम भी करते हैं। उनका बहुत सारा समय पढ़ने में व्यतीत होता है। वे बहुत सामाजिक हैं, हर एक के सुख-दुख में उनकी उपस्थिति और उदारता बहुत मायने रखती है। जो भीतर हैं, वही व्यक्त भी करते हैं। दोपहर में घर आने वाला बिना खाना खाए लौट जाए, यह संभव नहीं। किशोर कुमार पुरस्कार के संदर्भ में उनका कहना था कि मेरे लिए यह बहुत मायने रखता है, क्योंकि जिनके नाम पर यह पुरस्कार है उस परिवार से मैं बहुत गहरे जुड़ा रहा हूं। दादा मुनि ने ‘दो भाई’ फिल्म के लिए मेरी पहली कहानी खरीदी थी और जमने के लिए मुझे जमीन दी थी।
अपने जीवन में मिले ‘फिल्म फेयर’ सहित तमाम पुरस्कारों को सिनेमा में नई पीढ़ी के अच्छे कामों से खुश होकर बांट देने वाले सलीम खान ने यह भी कहा कि इंदौर मेरा शहर है, जहां मैं पैदा हुआ, बचपन गुजारा। आज भी मेरे बड़े भाई और परिवार वहां हैं। खंडवा दादामुनि और किशोर कुमार का शहर। दरअसल, यह पट्टी भावुक और संवेदनशील लोगों की है, जिनका दिल नापने के लिए शायद इतना बड़ा फीता नहीं बना है!
सुनील मिश्र