सोमवार, 25 सितंबर 2023

मया मइके के संग तीजा पोरा

-परमानंद वर्मा

छत्तीसगढ़ का एक महान पर्व है तीज पोरा। बेटी, बहन, बहुएं औऱ माताओं को मातृ शक्ति के रूप में पूजन किया जाता है। साल में एक बार ससुराल से मायका आती हैं, लायी जाती हैं और यथायोग्य राशि, कपड़े, जेवर आदि भेंट कर आदरपूर्वक सम्मान किया जाता है। किसी कारणवश नहीं आ पातीं हैं तब मायके न आने के गम में सिसकती रहती हैं। एक कहावत भी है मइके के कुकुर नोहर। इसी संदर्भ में पढ़िए यह छत्तीसगढ़ी आलेख।

बियारी करके सुखराम गुड़ी मेर सकलाय राहय तेन संगवारी मन करा जाके बइठ जथे। इहां गांव भर के गोठ  बात ल लेके देश अउ परदेश भर के राजनीति, खेती-बाड़ी, घर-परिवार, बहू-बेटी के ऊपर चरचा होथे। कोनो तमाखू, गांजा मलत रहिथे तब कोनो चोंगी-बीड़ी के चस्का ले के जुगाड़ मं लगे रहिथे। 
सुखराम ला देखते साठ खेलावन दाऊ कहिथे- कस रे सुखराम, तैं कइसे लरघीयाय असन कोंटा मं सपटे हस, का गोसइन संग लड़ झगड़ के आय हस?
- 'नहीं दाऊ, वइसन बात नइहे गा, आज थोकन खेत मं जादा काम होगे रिहिसे। बियासी निंदई-कोड़ई अउ कोपर घला चलत रिहिसे न, बुता थोकन जादा होगे रिहिसे तेकर सेती थकासी लागत हे।
सुखराम के ये बात ल सुनके खेलावन दाऊ कहिथे- अरे थकासी लागत हे काहत हस, शरीर हा रसरसाय असन लागत होही तब एकाध अद्धी मार ले नइ रहिते रे? 
- अरे काकर नांव लेथस गौंटिया, ओ दिन अइसने ले परे रेहेंव तब तोर बहू हा नंगत ले भड़के रिहिसे अउ केहे रिहिसे अब कभू अइसन पीबे पियाबे तब ठीक नइ बनही ?
सुखराम के बात ल सुनके गौंटिया ओला चुलकावत कहिथे- तब अपन गोसइन ला अतेक डर्राथस रे। घर के मालिक तैंहर हस ते तोर गोसइन?
- कइसे करबे गौंटिया, बड़ तेज हे तोर बहू हा। कुछु एती-तेती करबे, उलटा-सुलटा कर परबे, ककरो कभू मुंह तो आय लपर-लिपिर गोठिया परेंव अउ ओहर कहूं सुन डरिस के फलाना के बेटी, बहू, बहिनी अउ गोसइन संग तोर गोसइया गोठियावत-बतावत रिहिस हे कहिके, तहां ले तो ओ दिन घर मं रंगझाझर मात जथे, मोर बुढ़ना ल झर्रा देथे, तीन पुरखा ल पानी पिया देथे। ते पायके नहीं गोंटिया ओहर जभे कहूं कोनो गांव या मइके जाय रहिथे तभे हरहिंछा, मेछराथव्  गोठियाथौं, बताथौं।
- हत रे कहां के डरपोकना नइतो, अइसने गोसइन ल कोनो डर्राही रे। गोंटिया ओला सीख देथे- छांद के रखना चाही ओकर मन के हाथ, गोड़ अउ मुंह ला..। जादा एती-ओती लपर-लिपिर, तीन-पांच करिस, मुंह फुलइस अउ शेर बने के कोशिश करिस तब देकर दू-चार राहपट। तैं ओला बिहा के लाय हस, ओ तोला नइ लाय हे, समझे। जादा हुसियारी करिस अउ मुंह चलाय के कोशिश करिस तब देखा दे ओकर मइके के रस्दा। एक घौं मं सोझ हो जाहय। 
खेलावन गौंटिया के बात ल सुनके सुखराम कहिथे, बात तो तैं सोलह आना सही काहत हस मालिक, फेर मैंहर तोर सही नइहौं ना, मैं तो ओकर बोली ल सुनके ओतके मं कुकुर ल देखथे साठ बिलई असन सपट जथौं। ऊंच भाखा मं जउन दिन बोल परिहौं न तब ओ दिन मोर का हालत करही तउन ला मैं जानत हौं। 
गोंटिया हांसथे अउ समझावत कहिथे- डर्राय के कोनो बात नइहे सुखराम। एक काम कर, ये दे मैं रखें हौं अद्धी, दूनो झन चल आधा-आधा मार लेथन। अउ घर मं जाबे न तब कुछु मत करबे, चुपचाप खटिया मं ढलंग जाबे। कुछु कइही, करही न तब एती ओती करके टरका देबे। 
सुखराम झांसा मं आगे गौंटिया के, आधा-आधा मारिन तहां ले सुखराम बइठ नइ सकिस, अउ घर आगे। 
- अई, आज कइसन जल्दी आगेस छितकी के कका, बइठक आज जल्दी उसलगे का? सुखराम अपन गोसइन रामकली के बात ल सुनिस तहां ले सकपकागे, अउ सोचे लगिस, ये कहूं जान डरही, ढरका के आय हे दारू ल कइके तहां ले मोर बारा ल बजा डरही भगवान। अब येला का जवाब देवौं, देवौं ते नइ देवौं?
अई कइसे कांही नइ बोलत हौ छितकी के कका? गोसइन तीर मेर आ जथे अउ सुखराम के धुकधुकी बाढ़ जथे। 
रामकली कहिथे- ये हो, सुनव ना, एक ठन बात हे, मान जतेव ते बने रहितिस। 
सुखराम सोचथे- मउका बढ़िया हे, कइसे ओहर बघनीन ले आज सरु गऊ बने ले जाथे, का बात हे, जरूर कोनो राज हे? अब दारू के नशा थोकन चढ़त हे तब लहसाय बरोबर ओहर पूछथे- का बात हे मोर परान पियारी रामकली?
गोसइन ल समझत देरी नइ लगिस के आज एहा दारू पीके आय हे, फेर उहू ल अपन काम सिध करवाना रिहिसे तहां ले ओकर तीर मं ओध के कहिथे- तीजा-पोरा आवत हे, मइके जाय के साध लागत हे। मोर बहिनी, संगी-सहेली मन आही, दाई हा घला रस्दा जोहत होही। ओला कहि परे रेहेंव एसो आहूं दाई, खतम आहूं। तब अरजी हे जान देना चार-आठ दिन बर। अतका काहत सुखराम के नाक, कान, गाल ल चूमा देये ले धर लेथे। 
मने मन अपन गोसइन ल गारी देवत कहिथे- आन पइत कइसे दारू के गंध ल पावय तहां ले कुकुर-बिलई असन गुर्राय ले धर लय, आज का मोर मुंह ले सेंट के सुगंध निकलत हे तब धरे-पोटारे कस करत हे। कइसे पासा पलटत हे। घुरुआ के दिन बहुरथे कहिथे तउन इही ल कहिथे। 
खेलावन दाऊ के बात सुरता आगे, बने गुरु मंत्र देये हस भइया। नशा मं तो रहिबे करे रेहेंव, केहेंव- कोनो जरूरत नइहे, मइके जाय के, भाड़ मं जाय तोर संगी-सहेली अउ दाई-काकी, तीजा-पोरा। खेत ल कोन देखही तोर बाप, तोर भाई-दाई। निंदई-कोड़ई परे हे, कोप्पर चलत हे, मैं अक्केला मरिहौं का? रांध के खाना कोन दिही?
अइसे दबकारिस सुखराम अपन गोसइन ल ते ओहर सकपकागे। अइसन टांठ भाखा मं कभू नइ बोले रिहिसे, ससुराल आय ऊपर ले पहिली बार आज जउन अइसन बगियाइस हे। जान तो डरे रिहिसे के दारू के नशा मं एहर बोलत हे अउ उतरही नशा तहं ले भीगी बिलई असन हो जही। कहूं एला रुतबा देखावत हौं, अपन ताव बतावत हौं तब दूर-चार गफ्फा देये मं कोनो देरी नइ करही। 
रामकली घला खिलाड़ी कोनो कम नइहे, अपन काम निकाले के तरकीब जानथे। सुखराम के हाथ-गोड़ ल मालिस करे असन, सुलहारे कस गुरतुर बोली मं बोलथे- जादा नहीं, दू-चार दिन बर जान देना छितकी के कका, जादा दिन नइ लगावौं। गऊकिन काहथौं, मैं जल्दी आ जाहौं। मैं जानथौं- मोर बिगन तैं रेहे नइ सकस, छटपटाथस रात भर। गोसइन हौं तोर, मरद के आदत-सुभाव ल नइ जानिहौं। 
सुखराम मने-मन गदकथे, अउ सोचथे ये डौकी-परानी के चाल ल तो देख, मइके जाना हे तब सरी खेल, दांव-पेंच खेलही। अउ बरज देथौं- नइ जाना हे तब कइसे थोथना फूल जही, कैकेयी बन जही, मोर खाना-पीना ल हराम कर दिही। 
कहिथे- वाह खेलावन दाऊ, टिरिक तो बढ़िया बताय भइया, इही ल कहिथे अइस न ऊंट पहाड़ के नीचे। बहुत अकड़त रिहिसे, महीच आंव काहय। मइके जा हौं... मइके जाहौं... कइके सुलहारत हे, बरजेंव नइ जाना तब कइसे लेवना कस बनगे ?
मोरो पारी आहे, केहेंव- का रखे हे मइके मं तेमा मइके... मइके... तीजा-पोरा... तीजा-पोरा के रटन धर ले हस? कोनो हे का तोर उहां लगवार तेमा मइके जाहौं काहत हस?
टेड़गा भाखा ल सुनिस तहां ले बोमफार के रोय ले धर लिस, अउ पांव तरी गिर के किहिस- मोला जतका मारना, पीटना हे मारपीट ले, फेर अतेक बड़े बद्दी झन लगा, मोर इज्जत मं कलंक झन लगा। जेकर नहीं तेकर कसम खवा ले तोर छोड़ ककरो संग करे होहूं ते। 
रतिहा के बेरा, गोसइन के रोवई ल सुनिस तहां ले आसपास के दूर-चार झन परोसिन मन आगे, का बात होगे ? बात बनाएंव, समझायेंव, केहेंव- तीजा-पोरा माने बर मइके जाहूं किहिस तब मैं मना करत केहेंव- खेती-किसानी के काम बगरे हे, बाद मं चल देबे। बस मोर माय-मइके ल तेहा छोड़ावत हस, अतके बात ल लेके एहर रोय-गाये ले धर लिस।
परोसिन मन किहिन- हमन समझेन कांही अउ कुछु दूसर बात, घटना तो नइ होगे, सोचके आ परेन भइया सुखराम, माफी देबे। 
सुखराम सोचथे- माय मइके के मया अड़बड़ होथे, अउ साल मं एके बार तो ये मउका मिलथे जेमा चारों डाहर के बेटी, बहिनी, सहेली जउन अपन-अपन ससुराल जाय रहिथे, मिलथे- जुलुथे। महूं तो जाहूं मोर बहिनी, दीदी ल लाय बर, नइ आही, तेकर बर लुगरा-कपड़ा धर के जाय ले परही। 
रामकली के दुख ल जानगेंव, समझगेंव, गजब मया पल-पलाय बरोबर रोवत रिहिसे तउन ल समझायेंव अउ केहेंव- जा रे मोर अनारकली मइके... छुट्टी देवत हौं, फेर झटकिन आबे, दिन्नी झन करबे। अतका काहत ओला पोटार लेंव। नशा तो चढ़े रिहिसे, ओकर चेहरा ल देखेंव तब बिहनिया तरिया मं खिले कमल फूल असन छतराय रिहिसे हे। गदकत रिहिसे। केहेंव- वाह रे मइके... वाह रे मया.. अउ वाह रे तीजा पोरा... तोर जादू...। 
जाती-बिराती-
काबर सुरता हर आ आ के 
हिरदय ल मोर निचोरत हे
कोन फूल फूले हे
कोन गंध मोहत हे
मुरझावत बिरवा ल
कोन ह उल्होवत हे। 
                         -  हरि ठाकुर

रविवार, 10 सितंबर 2023

रविवार एक कहानी - पेंशन

" सुनो, आज चार तारीख हो गई,पेंशन लेने का समय आ गया है।बैंक जा रहा हूँ,आने में देर हो जाए तो परेशान मत होना।युवाओं को समय की कद्र कहाँ, छोटे-छोटे काम में भी घंटों लगा देते हैं।" पत्नी को कहकर रामनिवास जी बाहर जाने लगे तो पत्नी ने पीछे से कहा, " आपके इतने सारे विद्यार्थी हैं, उन्हीं में से किसी को क्यों नहीं कह देते?" 

 " ज़माना बदल गया है।पहले जैसे विद्यार्थी अब कहाँ जो अपने गुरु का मान करें।उन्हें तो मेरा नाम भी याद नहीं   होगा।" पत्नी को जवाब देकर वे बैंक चले गये।

 महीने का पहला सप्ताह होने के कारण बैंक में भीड़ थी।एक खाली कुर्सी देखकर वे बैठ गये और फार्म भरकर  कैशियर वाले डेस्क के सामने खड़े हो ही रहें थें कि एक स्टाफ़ ने उन्हें आदर-सहित कुरसी पर बैठा दिया और स्वयं फ़ार्म लेकर कैशियर के केबिन में चले गये।वे कुछ समझ पाते तब तक में बैंक का चपरासी उनके लिए चाय ले आया।उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि वे बिना चीनी के चाय पीते हैं।चपरासी बोला, " साहब ने बिना चीनी वाली का ही आर्डर दिया है।" कहकर उसने रामनिवास जी के हाथ में चाय की प्याली थमा दी।

 रामनिवास जी ने घड़ी देखी, दस बजकर पाँच मिनट हो रहें थे।सोचने लगे, चाय पिलाया है,लगता है दो घंटे से पहले मेरा काम न होगा।तभी एक बत्तीस वर्षीय सज्जन ने आकर उनके पैर छुए और विड्राॅ की गई राशि उनके हाथ पर रख दिया।इतनी जल्दी काम पूरा होते देख रामनिवास जी चकित रह गए।उन्होंने उन सज्जन को धन्यवाद देते हुए परिचय पूछा तो उन्होंने कहा, " सर, मैं इस बैंक का नया मैनेजर हूँ, एक सप्ताह पहले ही मैंने ज्वाॅइन किया है लेकिन उससे पहले मैं आपका विद्यार्थी हूँ।" 

 " विद्यार्थी! " रामनिवास जी ने आश्चर्य से पूछा।उन्होंने कहा, "जी सर, सन् 2004 में आप सहारनपुर के उच्च माध्यमिक विद्यालय में नौवीं कक्षा के विद्यार्थियों को गणित पढ़ाते थें।मैं भी उन्हीं में से एक था।गणित मुझे समझ नहीं आती थी।परीक्षा में पास होने के लिए मैंने नकल करना चाहा और पकड़ा गया।प्रिंसिपल सर मुझे रेस्टीकेट कर रहें थें तब आपने उनसे कहा था कि नासमझी में विद्यार्थी तो गलती करते ही हैं।हम शिक्षक हैं, हमारा काम उन्हें शिक्षा देने के साथ-साथ सही राह दिखाना भी है।संजीव की यह पहली गलती है,रेस्टीकेट कर देने से तो इसका पूरा साल बर्बाद हो जाएगा जो मेरे विचार से उचित नहीं है।आपने उनसे विनती की थी कि मुझे माफ़ी देकर अगली परीक्षा में बैठने दिया जाए।प्रिंसिपल सर ने आपकी बात मान ली थी,आपने अलग से मुझे ट्यूशन पढ़ाया और मैं परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होकर आज आपके सामने खड़ा हूँ।आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सर!" हाथ जोड़कर मैनेजर साहब ने अपने गुरु को धन्यवाद दिया और ससम्मान उन्हें बाहर तक छोड़ने भी गए।

घर लौटते वक्त रामनिवास जी सोचने लगे, ज़माना चाहे कितना भी बदल जाए, जीवन भले ही मशीनी हो जाए लेकिन विद्यार्थियों के दिलों में शिक्षक का सम्मान हमेशा रहेगा,यह आज बैंक मैनेजर संजीव ने दिखा दिया।

वाट्स एप से साभार

शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

बिन डोंगहार के डोंगा

 सुनो भाई उधो

परमानंद वर्मा

फिर मन गया बिना गोसइया के

 छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग का स्थापना दिवस ।आते हैं इस  मे प्रदेश भर से छत्तीसगढ़ी  साहित्यकार, लेखक, कवि, भाषाविद्, संस्कृति कर्मी। मुख्य अतिथि के उद्घाटन के बाद निर्धारित विषयों पर वक्ता अपने विचार रखते हैं, कवि गण अपनी कविताओं के पाठ करते हैं, लोक कलाकार संगीतमय प्रस्तुति से आगंतुकों को भाव-विभोर कर देते हैं, और अंत में भोजन प्रसादी पाकर अपने-अपने ठिकाने लौट जाते हैं। विगत पांच सालों से ऐसा ही चल रहा है। सचिव के भरोसे नैया आगे सरक रही है । हालाकि उन्होंने किसी को ऐसा आभास नहीं होने दिया कि अध्यक्ष नहीं है लेकिन सबको इस बात का मलाल है कि जब सभी आयोगों, मंडलों में अध्यक्षों व अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति प्रमुखता से की गई है तब छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग की उपेक्षा क्यों? इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख।

सीहोर वाले महाराज पंडित प्रदीप   मिश्रा ओ दिन गोढियारी म शिवपुराण के कथा बाचत रिहिसे तब ओ कथा ल सुने बर डोंगा(नाव) घला पहुंचे राहय। उही बेरा हाथ उठा के ओहर हर हर महादेव काहत महराज सो बिनती करत पूछ-थे, सब के दुख, करलेस ल टारत आवत हस महाराज, मोरो एक ठन जबर करलेस हे, टार देते ते बने होतिस।

महाराज ह पूछ-थे,का करलेस है दाई बता ना। डोंगा हाथ जोर के आँखि कोती ले आंसू ढारत गोहरा-थे, मोर गोंसिइया डोंगहार पांच साल होए ले जावत हे, कहां चल देहे। अतेक खोजत हौं, पता लगावत हौं फेर कांही सोर नई मिलत हे। तुंहर आसन महाराज मन करा बिचरवा घला डरे हौं फेर कुछु नई पता लगिस। कोनो कोनो बताईन, सीयम हाउस कोती जात देखे हन। अब भगवान जानय ओहर कहां हे।

डोंगा के सबो बात ल सुने के बाद सीहोर वाले महाराज ओला बताथे- एक उपाय बतावत हौं धियान देके सुन। कोनो मेर के शिव मंदिर म जाके रोज एक लोटा पानी, एक ठन बेल पत्ती अउ कनेर, धतूरा, गुलाब के फूल हो सकय ते शिवजी म अर्पन करना शुरू कर दे। एक न एक तोर गोसइया जरूर लहुट के घर आ जही। ये उपाय ल करके देख तो भला। अउ  हां श्री शिवाय नमस्तुभ्यम ये मन्त्र के जाप पांच घो जरूर करे करबे। अब दुनों हाथ ल उठा के बोल, हर हर महादेव। अइसने कस हाल छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के सध होवत हे। खोजत फिरत भटकत हे अपन गोसइया(अध्यक्ष) के फिराक मे ।

सोचथौं बिना किसान के खेती, बिना डॉक्टर के अस्पताल, बिना जज के कोर्ट, बिना परानी के गिरहस्थी, बिना डोंगहार के डोंगा (नाव), बिना पायलट के हवाई जहाज अउ बिन राजा के राज्य कइसे चलत होही, चलेच नइ सकय, अउ अइसने कतको अकन बात हे जेकर बिना अधूरा के अधूरा रहि जाथे. विधवा, रांड़ी-अनाथिन कस रोवत-धोवत जिनगी गुजर जथे। तइसने कस हाल छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के हे। पांच साल गुजरे ले जात हे, छत्तीसगढ़ के मुखिया कइसे आंखी-कान ला लोरमा दे हे ते  ये आयोग के अध्यक्ष के नियुक्ति नइ करिस। अउ सब मंडल, आयोग के अध्यक्ष, सचिव अउ पदाधिकारी मन  के नियुक्ति कर डरिस, फेर एती हीरक के नइ निहारिस। कतको सुख-सुविधा दे-दे, ददा (मुखिया) बिना घर सुन्ना लगथे, नइ सुंदरावय। लक्ष्मण मस्तुरिया, श्यामलाल चतुर्वेदी, दानेश्वर शर्मा अउ डॉ. विनय पाठक जइसे बड़े-बड़े गुनिक मन ये आयोग के अध्यक्ष बने रिहिन हे जेकर से ये आयोग के शोभा बढ़े रिहिसे। अइसे बात नइहे के कोनो अध्यक्ष पद के लइक नइहे, एक ले बढ़के एक सुजानिक चेहरा ये पद के काबिल हे। ओकर से छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के मान-शान मंं बरकत हो सकत रिहिसे। उपेक्षा के शिकार काबर होइस ये बात के सवाल सब साहित्यकार, कला, संस्कृति, भाषा, बोली के समझ रखइया मन उठाथे, उठावत हें। 'छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया' के नारा के ढिंढोरा पीटे भर ले छत्तीसगढ़िया के विकास नइ होना हे। विकास होही ओकर मातृभाषा ल पंदोली देके, ऊपर उठायले, प्राथमिक कक्षा ले पढ़ई शुरू करे ले। जइसने किसानी के रकम ल किसान ले बने दूसर कोनो जान नइ सकय, वइसने शिक्षा के विकास के रकम शिक्षा के विद्वान ले दूसर कोनो नइ जानय। राजा करा तो दुनिया भर के काम रहिथे, रात-दिन राज-काज मं बूड़े रहिथे। अइसन काम के नेत-घात जउन जानथे तेला सौंपना चाही। नहीं ते फेर बिन मांझी के डोंगा हवा के झोंका में कोन कोती के रसदा रेंग दिही, भगवाने मालिक हे। 

अभी ओ दिन 14 अगस्त के छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के स्थापना दिवस मनाये गिस, जेमा प्रदेश भर के साहित्यकार, कलाकार, संस्कृति कर्मी, कवि, विद्यार्थी मन सकलाय रिहिन हे। माई पहुना संस्कृति मंत्री अमरजीत भगत दीया बार के कार्यक्रम के उद्घाटन करिस, जेकर पगरइत रिहिन हे संसदीय सचिव कुंवरसिंह निषाद। ये मौका मं गीत-संगीत के प्रस्तुति राज गान के बाद होइस। ये बेरा मं फिल्म डायरेक्टर मनोज वर्मा अउ टीवी के उद्घोषक श्रीमती मधुलिका पाल अपन-अपन विचार रखिन। 

महंत सर्वेश्वर दास सभा भवन में आयोजित ये समारोह मं प्रदेशभर ले आये छत्तीसगढ़ी साहित्य प्रेमी के मन मं इही बात के जादा चरचा अउ दुख होवत रिहिसे के प्रदेश के मुखिया ये आयोग ल काबर अनदेखी करत हे, काबर अध्यक्ष नइ नियुक्त करत हे। कोनो खुसुर-फुसुर गोठियावय तब कोनो टांठ भाखा मं। फेर कोनो ये बात, ये मुद्दा ल लेके सोझ मुखिया मेर जाके हिम्मत नइ जुटा सकत रिहिन हे। 

कार्यक्रम के दूसर सत्र मं श्रीमती धनेश्वरी सोनी, टिकेश्वर सिंह, अरविन्द मिश्र, नवलदास मानिकपुरी, कपिलनाथ कश्यप, दुर्गाप्रसाद पारकर, अशोक पटेल आशु अउ हितेश कुमार के लिखे पुस्तक मन के मुख्य अतिथि संस्कृति मंत्री अमरजीत भगत अउ दूसर अ्तिथि मन के हाथों विमोचन होइस। ये पुस्तक मन के प्रकाशन राजभाषा आयोग करे हे। युहू मं एक ठन बड़े विडम्बना  ये हे के लेखक मन ल सिरिफ पुस्तक के 20-20 प्रति देके भुलवार दे हे। इही ये आयोग के योजना हे। मर-खप के लिखबे, गरीब, दीन-हीन साहित्यकार मन, ओमन ल मिलथे का... फुसका। कुछ तो  बीस पच्चीस  हजार देतीन ओकर मेहताना, जउन लिखत-पढ़त हे तेकर जुगाड़ करना चाही। हो सकत अउ ये लिखे हे तेकर ले बढ़िया कोनो पुस्तक, ग्रंथ, महाकाव्य लिख परही? अउ दूसर बाहिर के मन बर सरकार के खजाना खुले हे, हजारों, लाखों लुटा देवत हे अउ इहाके  बुद्धिजीवी, कलाकार, संस्कृति कर्मी मन बर फुसका परे हे। बस्तर, सरगुजा, बिलासपुर, रायगढ़, राजनांदगांव मं अइसन कतको बुद्धिजीवी कलाकार  भरे परे हे, पढ़े-लिखे नइहे फेर कला, संस्कृति, बोली भाखा मं शहरी क्षेत्र ले तो गंवई क्षेत्र मं जादा हे कोनो ओकर हियाब करइया नइ हे । ये बात के जानकारी संसदीय सचिव कुंवर सिंह निषाद के मारफत मिलिस। 

तीसर सत्र के चरचा गोष्ठी मं डॉ. परदेशी राम वर्मा, डॉ. सविता मिश्रा अउ सेवक राम बांधे  अपन-अपन विचार रखिन। एकर बाद कवि सम्मेलन मं प्रदेशभर ले आए कवि मन अपन-अपन कविता पाठ करिन, कार्यक्रम के समापन राजभाषा आयोग के अनुवादक सुषमा गौराहा के आभार प्रदर्शन  ले होइस।

जाती बिराती

बाग बगइचा दीखे ले हरियर 

हां...हां... दीखे ले हरियर,

मोर डोगहार नइ दीखत हे

बदे हां नरियर हां...हां...होरे।

सामाजिक ठहराव का चित्रण छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह-तोर सुरता

- डुमन लाल ध्रुव

हिन्दी साहित्य में कहानी को एक आधार देने का काम कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने किया। मुंशी प्रेमचंद कहानी को जिस मुकाम पर लेकर आए, समय के साथ उसमें और कड़ियां जुड़ती गईं। प्रेमचंद के बाद जैनेंद्र, यशपाल, अज्ञेय आदि आए। प्रेमचंद की कहानी को सामान्यतः सामाजिक कहानी कहा गया। जैनेंद्र और अज्ञेय उसे मनोवैज्ञानिक धरातल पर लेकर गए। वहीं यशपाल ने कहानी को क्रांति के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया। कहानी में बुनियादी बदलाव आजादी के बाद आया। ठीक यही बदलाव छत्तीसगढ़ में कहानीकार श्री परमानंद वर्मा जी की छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह ’’तोर सुरता’’ में देखने को मिलती है। जहां ग्रामीण समाज अपनी पूरी विद्रूपता, असमानता और शोषण में अभिव्यक्त होता है। जीवन चरित्रों और घटित घटनाओं सहित नारी की वेदना, अकाल, नाचा-गम्मत की संवादों के कारण उपजे सामाजिक ठहराव का चित्रण है। दूसरी ओर नाटक के कलाकारों की चरित्र और संवाद बदलते रहते हैं जो असल जिंदगी की नाटक है। वैसे कलाकारों के जीवन में जटिलता हमेशा उभर कर सामने आती है। छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह ’’तोर सुरता” में नौ कहानियां हैं । ’’टोड़ा’’ कहानी में वृहत्तर समय की मौजूदगी दर्ज होती है। टोड़ा,पइरी,पुतरी अतीत का वैभव है। आज कठिन समय का दौर है। जालसाजी, मक्कारी, घपलेबाज, बदनियत, असामाजिक तत्वों का हावी होना, असुरक्षा और भय का माहौल तैयार करना, मेहनतकश व्यक्ति भूखा मर रहा है। हमारी प्रतिबद्धता और सोच से संवेदना का भले ही पुनर्जागरण हो सकता है। बदल रहे हैं लोग और बदल रहे हैं कर्तव्य-अकाल परे मं गांव मं सब के हालत खराब होगे हे।  गहना बेचागे त का होगे, समय सुकाल आही तहां ओ सबो अऊ लेवा जाही दुबारा ? फेर दाई, भउजी तोर अपन सबो गहना ल पहिने हे ओकर ला काबर नइ बेचिस भइया हा ? फूलचंद के मुंह ले अइसन दुकलहिन ओला समझाथे, ये तोर-मोर के भेद करना अच्छा नइ होवय बेटा, ये गुन तो मं कहां ले अइस ? जब मैं अइसन भेद नइ करौं अउ ना वो ददा कभी जानिस तब का शहर ले भेद नीति, सीख के आय हस ? गुरूजी मन अइसने शिक्षा देथे, अइसने पढ़ाथे ? फूलचंद के मुंह लाडू़ बोजाय असन चुप होगे। एकर आघू फेर एक अक्षर नइ बोल सकिस। फेर ओला रहि-रहि के गुस्सा आवत रिहिस हे। तब भउजी के भड़काय मं कइसे भइया उतरवा ले रिहिस हे ? अपन गोसइन के एक ठन जेवर बर ओला कतेक मया होगे अउ दाई के सबो जेवर ला उतरवा के बेच दिस तेकर बर थोरको ओकर जीव नइ कसकिस ? अपन सग दाई होतिस तब अइसने मांगतिस, बेचतिस का ? ओ अकाल ला देख ले अउ आज तक दाई के शरीर मं एको ठन जेवर नइ चढ़ सकिस। अब तो ददा के घलो इंतकाल होगे। जियत हे बपरी गरीबिन हा कइसना करके। फूलचंद कइथे - मैं काला दोष दौं अकाल ला, ददा अउ भइया ला के अपन ला जौन ओला पहली जइसन सिंगार नइ सकेंव। ओ टोड़ा .... ओ पइरी .... ओ पाटी .... ओ पुतरी ... ओ तितरी पहिने दाई के रूप के सुरता आथे तब आंखी मं आंसू भर जथे अउ रो परथे ...।

         नाच शैली के माध्यम से पारिवारिक-सामाजिक मानवीय मूल्यों को ’’तरिया मं रुपिया पर’’ की तर्ज पर कहानी को मजबूत करना चाहती है। नाचा की तरह कहानियां काल्पनिक हैं  पर किस्सागोई शैली में कथ्य-कल्पना की जो संगति बैठाई गई है वह पाठक वर्ग को और अधिक रोचक बना देती है। प्रयोजन भले ही बड़े हों पर कहानीकार श्री परमानंद वर्मा ने लोक शब्दों को तरासने में कभी कमी नहीं की है। तोला मोर गीत उपर भरोसा नइ हे ना, मोला तैं अतेक उज्बक अउ बइहा समथस, के चार दाई-माई, भाई-बहिनी अउ गौंटिया मालिक बन बइठे हें तेखर आगू मं मैं आंय बांय बर दुहूं ? इंहा मैं कोनो फाग अउ कविता गाये ले तो नई आय हौं ? ओ जौंन मन आंय हे तब सब झन मोर दाई-ददा अउ भाई बहिनी बरोबर हें। जहर अउ अमरित के अंतर ला जानत हौं संगी। अतेक पान अंधरा नई होगे हौं। फेर मोर बात तोर मगज मं नइ बइठत हे तौंन ला मैं का करौं ?

छै महिना बीते के बाद एक दिन संझा कन तरिया मं जइसे कमल के फूल फूले रहिथे, तइसे कस चारों कोती दस, बीस, पचास अउ सौ रूपया के नोट उफले कोन्हों देख परिन, छिन मं बात बस्ती भर म ं बगरगे। लइका सियान सबो तरिया कोती दंउड़े लागिन। जेकर ले जतका बनिस ओतका नोट धर के घर लहुटिन। गोठियावत रिहिन के कोनों कोनों नोट आधा चिराय रिहिस हे, तब कोनों-कोनों निमगा साफ सुथरा रिहिसे। ये तो ओ सउत मन ला पीछू पता चलिस के ओ खुंसट मरद ह पेंशन और ग्रेच्युटी के सबो रूपया ल धर के तरिया मं जाके मरगे। चुचवावत ले रहिगे दुनो सउत। ये कथा ला ओ जोक्कड़ मन गम्मत के रूप मं गूंथे रहिथे। आखिरी मं पहिली वाला जोक्कड़ दूसर वाले ल पूछथे पता चलिस जी, के ये कोन कांड के कथा हे ? जा घर मं बने आंखी धो के रामायन ला पढ़बे, तहां ले तोला सब पता चल जाही। ये तरिया मं रूपिया फरे कांड के कथा हे बेटा।

           पुरुष प्रधान समाज में चमक-दमक और रसूखदार लोगों का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। सकारात्मक सोच को समाज में लाने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कुछ ’’खटकायेर’’ जैसे लोग भी मिलते हैं। आधी-अधूरी जानकारी के चलते सकारात्मक विचारों को ओझल कर देती है।

          दू एकड़ जमीन नहीं अउ ऐकर डींग ल देख कहां के गररेता बेइमानी करके चीज बटोरिस सब जेती के माल तेती रेंग दिस। हमर आगू मं दूसर के सउंज लगै तौने हमला पाठ पढ़ावत रहिसे। फेर ओ दिन के फैसला मं पंच सरपंच मन एकर जतका हेकड़ी रहिस हे तेकर बुढ़ना झर्रा दिन। आज तो ओकर बोलती बंद हो गेहे। ओकरे टूरा मन अब विही ल सोझ भाखा नइ दैं। जादा के अजलइत अउ जादा के सेखी घला कोनों काम के नोहय।

           फूलकुंवर और बाबूलाल छत्तीसगढ़ी कहानी ’’भरम के भूत’’ रचना संसार के लिए एक तरह की उपलब्धि है जो अरसे बाद महतारी बेटा की तरह मुलाकात होती है और अपनी रचनात्मकता को समेटती है। भरम के भूत को नापने का कोई यंत्र अभी तक विकसित नहीं हुआ है। सबके दायरे अलग अलग है। एक बाबूलाल है जो लज्जा के भय से जीवनलीला समाप्त कर जाते हैं वहीं फूलकुंवर अपनी गरीबी को स्त्री की तरह जीती है।

             बाबूलाल पांव तरी गिरे भौजी ल उठा के छाती मं लगा लेथे। देवर भौजी-दुनो लिपट के रोवथे जइसे जनम जनम के बिछड़े महतारी बेटा के आज मिलन होवथे। गंगा जमुना कस धार दुनो झन के आँखी ले बोहावत हे। लइका मन समझ नइ पावत हे। फुसुर-फुसुर गोठियावत हे। ये दाई ला का होगे आज बही जकही बन गेहे, कका ला तो देख कइसे लेड़गा बन गेहे। कोनो लइका के कांही हिम्मत नई होवत हे। ओकर मन के तीर म जाय के ? ओमन सोचथे कोनो आ जाही तब तो जंउहर हो जाय, का समझहीं ? थारको एमन ला लाज शरम नइहे, नाक-कान ला कटा डारे हे तइसे लागथे। फेर बाबूलाल फूलकंुवर एक दूसर ला पोटारे अभी अइसे रोवत हे जनामना जनम-जनम के प्रेमी हे। ओमन ला अतको सुध नइहे के हमन कोन हन, घर गोसइया आ जही तब का समझहीं ?

             समाज और समय किसी न किसी रूप में साहित्य के माध्यम से अपने को प्रतिबिंबित करते हुए चलता है। बदलते समय के साथ कहानी का स्वरूप भी बदलता रहा है। विभिन्न सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों का प्रभाव कहानी पर पड़ता रहा है। श्री परमानंद वर्मा अपनी छत्तीसगढ़ी कहानियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ी के कथा परिदृश्य को समृद्ध किया है। आंचलिक कहानियों के कारण ही ’’तोर सुरता’’ श्री परमानंद वर्मा जी को साहित्यिक परिदृश्य में एक अलग आयाम देती है।

      मरे बिहान हे बिसाहिन के। ओहर घर -परिवार अउ जतका सपना देखे रिहिस हे तौन सब टूट के चूर-चूर होगे। इही ला कहिथे चोरी अउ सीना जोरी।

             ’’गोदनावाली’’ कहानी में कहानीकार श्री परमानंद वर्मा की छत्तीसगढ़ी संस्कृति के प्रति सजग दृष्टि है। गोदना पुरखों की चिन्हा को पुख्ता कर रही है लेकिन आधुनिकता की दौड़ में महिलाओं की अंगों में उकेरे जाने वाली गोदना भी पीछे छुटते जा रहे हैं। वहीं टैटू समयानुसार मानवीयता की उपस्थिति को रेखांकित कर रही है। सभ्यता, संस्कृति और शुचिता की बदलती हुई परिभाषाओं के इस दौर में अपने समय को दर्ज करना गोदना के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण काम हो रहा है।

          देख बेटी ये संसार मं जेवर, गहना, पूंजी हे, रूपिया पइसा, जमीन-जायजाद हे। समय के संग-संग खिरावत चले जाथे, संग छोड़त चले जाथे, इहां तक परिवार, रिश्तेदार सब एक-एक करके एक दिन संग ला छोड़ देथे। फेर ये गोदना ऐसे जेवर हे जेला ना कोनो नंगा सकय, चोर चोरी कर सकय, न कोनो एकर बंटवारा कर सकय। मरत दम तक तोर शरीर के संग रइही। आदमी कहूं मरगे हे तभो कहंू ओकर नाव के या कोनो चिन्हारी गोदवाय रहिथे तब एहा संग रेहे के सुरता देवावत रहिथे। इही पायके माई लोगिन बर गोदना हा जरूरी हे बेटी। फेर आज समय बदलत जाथे तेकर संग गोदना घला नंदावत जात हे। अब का जानय आज-कल के नवा बेटी बहुरिया मन, नवा जमाना के नवा-नवा फैशन अउ सिंगार निकल गेहे, चमक-दमक मं सब मरे जाथे। गोदना के नांव सुन के घिनाथे, दुरिहा भागे ले धर लेथे।

            ’’घर मं कारगिल’’ रचना की पाठनीयता की शर्त को पूरी करती है। मध्यम वर्गीय परिवार की मनोदशा और परिस्थितियों का दुकलहिन प्रतिनिधित्व करती है। घर-गृहस्थी, जेठ- जेठानी के अवसाद को झेलती है लेकिन अंत में शहीद की पत्नी होने के नाते दुकलहिन की डूबती जिंदगी को सहारा मिलता है। यह सच है कि घटनाओं की सपाट-बयानी कहानी अभिव्यक्ति का द्वार खोलती है। किहिन धन के लालच मं आदमी आज कतेक गिरगे हे अंधरा होगे हे के रिश्ता, परिवार ल घलो कांही नई देख पावत हे। अरे दुकलहिन तो ओकर भाई बहू रिहिस हे। ओखर कोख ले बलिदानी बेटा के अंश अभिमन्यु पलत रिहिस हे तेला मारे के खातिर नीच काम करे बर उतरगे रिहिस हे। हत रे चंडाल जा तोर कभू भला नई होय, कुकुर कस मौत मरबे, कीरा परके मरबे।

         ’’बेटा तोर नोहय’’ कहानी में सुखवंतीन स्पष्ट कर देती है कि बेटा किसका है। कहानी के भाव क्या हैं और इसके माध्यम से वह क्या कहना चाहता है। कहानी का अंत संवेदना के स्तर पर पाठक को अपने साथ जोड़ लेता है। कहानी की मार्मिकता सुखवंतीन के लिए कही गई शब्द ’’बेटा तोर नोहय’’ विस्मित और स्तब्ध कर देती है और अंत में यही कहानी पात्र को साकार करती है।

           ये बेटा मोर हे सुखवंतीन लड़े रिहिस हे ओला अउ केहे रिहिस हे बेटा तोर कइसे हो सकत हे,बेटा मोर हे। नौ महीना ले मैं अपन ओदर मं राखे हौं, एक खोची जामन भर दे ला मटका भर के दही परोसी के हो जाही? सेठ तब सकपकागे रिहिस हे,कांही उत्तर नइ दे पाय रिहिस हे,तभो ले मन मं डर बने राहय के सेठ बीच मं कभू अड़ंगा मत डाल दै। फेर शिवपरसाद आज सुखवंतीन के सब संकट अउ दुख ला भगवान बरोबर हर लिस। बिहान भर सुरहुती के तिहार रिहिस हे। दूनो परानी तिहार के तइयारी मं जुटगे। संझौती होइस तहां ले घर मं दिया जलइन। चारों कोती जगमग-जगमग करे ले धर लिस।

          जीवन के हर कदम पर तुम्हारी याद आती है। कहानीकार श्री परमानंद वर्मा ’’तोर सुरता’’ में सहजता से अपनी बात पाठकों के समक्ष रखने में विश्वास करते हैं। जीवन में हुई प्रेम को कभी प्रतिशोध का हिस्सा बनाया और न ही जीवन में, समाज में छीनने की प्रवृत्ति बढ़ी। कहानीकार श्री परमानंद वर्मा ने पूरी सच्चाई के साथ आंखों में आंखें डाल कर सच बोलने की क्षमता जुटाते हैं ’’तोर सुरता’’ में-इही जिंदगी के नाटक हे। ये नाटक के कलाकार के चरित्र अउ संवाद बदलत रहिथे। हास-परिहास, करुणा अउ रौद्र रूप के आनंद दर्शक उठावत रहिथें। अउ आखिरी के नाटक खतम हो जाथे। वइसने कस ये नाटक के एक कलाकार महूं रहेंव।

   छत्तीसगढ़ी कहानी ’’तोर सुरता’’ की संरचना बहुत ही सीधी और सपाट बयानी है। संग्रह की सभी कहानियां सहज संवेदना के साथ पठनीय है। कहानी में संवेदना नवीनता का आगाज कराती है। शायद यही कारण कहानीकार श्री परमानंद वर्मा ’’तोर सुरता’’ के अधिक निकट हैं।

डुमन लाल ध्रुव

मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

पिन 493773