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शनिवार, 20 सितंबर 2025

धान नहीं ड्रग के कटोरा बनगे छत्तीसगढ़

 सुनो भाई उधो

-परमानंद वर्मा

अनदेखना मन के आंखी फूटय पट-पट ले, मर जाय, खप जाए, नांव बुता जाय ओकर मन के, जउन छत्तीसगढ़ ला देख नइ सकत हें। जेन बाहिर, आन परदेश ले आथे तउन मन देखते साठ कहिथे- अहा छत्तीसगढ़ कतेक सुंदर बने हे चुक-चुक ले पुतरी बरोबर, काजर आजे सोलह बछर के मुचमुचावत परी, बामी मछरी सही बिछलत, रेंगत दीखते, इही पाके सब जिहां पाबे तिहां गोठियावत रहिथे- भइया 'छत्तीसगढिय़ा सबले बढिय़ा। 

'काहत लागय धान के कटोरा छत्तीसगढ़ तउन अब ओ धान तो एक कोती होगे, नंदागे, अब ओ 'ड्रग के कटोरा होगे हे। कोन गांव, कोन शहर, गली-गली मं 'ड्रग के फसल अइसे लहलहावत हे, जइसे कभू खेत मं सावन-भादो के महीना मं दिखथे नजर भर जथे, अइसे लगथे जइसे देखते राह, पोटार ले, दूनो बांह मं कबिया के जइसे कोनो परेमिका ला ओकर परेमी पोटारथे।

छत्तीसगढ़ मं 'ड्रग क्वीन के चारो मुड़ा शोर उड़त हे। उड़ही कइसे नहीं, छत्तीसगढ़ के भुइंया अइसन वइसन नइहे। इहां के माटी सोना, हीरा, पन्ना के छोड़े का खनिज नइ उगलत हे। तेमा अभी नवा फसल आय हे 'ड्रग, अभी ये कारोबार ल क्वीन मन संभाले हे। इहां राजा, महराज, नवाब, जमींदार, मालगुजार जइसन बड़े-बड़े परतापी मन राज करे हे, माता कौशल्या के जन्मभूमि हे, राजा, रानी, राजकुमारी काहय ओ मन ला आज समे के संगे-संग ओकर मन के नांव बदलगे, अब नवा नांव धराय हे 'क्वीन। 

छत्तीसगढ़ मं षोड़सी, बीस, पच्चीस साल के हंसमुख चंचल नयना अउ गुलबदन के 'क्वीन जेने कोती पाबे तेने कोती देख ले। का गांव, का शहर, का महानगर, गली-गली मं अइसे दीख जही, मिल जही, जइसे पुष्प वाटिका, अशोक वाटिका मं किसम-किसम के फूल दीख जथे। काबर ककरो मन नइ मोहाही, आंखी पटपटाही, अइसन बड़े फजर खिले गुलाब, अउ ताजा कमल के गदराय फूल के रूप, रंग ला देखके?

जइसे छत्तीसगढ़ धान वइसने इहां के 'ड्रग अउ क्वीन। देश-विदेश मं शोर हे, आवत हे, जात हे। छत्तीसगढिय़ा मन भोकवा, धर ले रिहिन हे धान भर ला, अउ दूसर बर गतर नइ चलत रिहिस हे। जानही तब ना करहीं। एके ठन डौकी के पाछू जीवन गुजार देवय। आज देख जमाना कतेक बदलगे हे। एके ठन साग-सब्जी ला कतेक दिन ले खाबे, असकटा नइ जाबे। सुवाद बदले खातिर नवा-नवा साग बदले ले परथे अउ देख फेर ओकर मजा। अइसने कस धान के फसल लेवत-लेवत उबकाई आय ले धरिस तब नवा फसल 'ड्रग के लेना शुरू होइस। ये फसल पहिली मॉल, होटल, रिसॉर्ट, क्लब, फार्म हाउस, अउ गांव, शहर, महानगर मं लेना शुरू करिन। 

नवा फसल ला पहिली नमूना के बतौर गुपचुप ढंग ले लेना शुरू होइस। महंगा बीज हे तब एकर  लागत घला वइसने महंगा होवत गीस। फेर जब फसल दनदना के होइस तब भाव घला वइसने तगड़ा मिलना शुरू होइस। अब तो धान के फसल लेबर किसान भुलावत हे, अउ बड़े-बड़े उद्योगपति, नेता, मंतरी, नौकरशाह, राजा, महाराजा, नवाब, जमींदार, मालगुजार मन तक एला लेना शुरू कर दे हे। बताथे- एकर सुवाद गजबेच सुंदर हे। 

फेर बताथे- ये फसल ले खातिर लाइसेंस नइ ले हें तेकर सेती पुलिस अइसन धंधा करइया मन के पाछू परगे हे। अब पुलिस ला तो जानत हौं, सुंघियावत रहिथे- कहां कोन गलत करत हे? ये 'ड्रग के धंधा तो कबके चलत हे कतको लखपति अउ करोड़पति बनगे हे। का पुलिस नइ जानत होही के ये माल कहां ले आवत हे, अउ कोन-कोन, कहां-कहां करत हे? एक झन छोकरी सपड़ मं आगे, तभे का ओकर आंखी खुलिस होही? अइसे तो हो नइ सकय? पुलिस ओ छोकरी के नांव 'क्वीन धर दे हे। ओहर सब झन के नांव बकर देहे। जेमा बड़े-बड़े राजनेता, उद्योगपति, नौकरशाह, विश्वविद्यालय, कॉलेज के शिक्षक, विद्यार्थी मन हे। का पुलिस हा ओकर मन के नांव उजागर कर सकत हे? काबर नइ करत हे, करना चाही, का के डर हे? सबके इज्जत के सवाल हे, है ना? नांव टिपा हे तेकर मन के तो नींद हराम होगे हे। शराब, सुंदरी, सट्टा-जुआ के फेर मं जउन परही तेकर मन के तो अइसने गति होथे।

जाती बिराती

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माते रहिबे माते रहिबे माते रहिबे गा,

तंय हर माते रिहिबे गा अलबेला मोर 

गांजा कली ला पीके माते रहिबे।

हा हा माते रहिहो रे अलबेली मोर,

गांजा कली ला पीके माते रहिहो।।


आमा ला टोरे खाहुंच कहिके रे,खाहुंच कहिके ,

मोला दग़ा दिये जोड़ी आहुंच कहिके रे , आहुंच कहिके।।

-परमानंद वर्मा

सोमवार, 20 जनवरी 2025

सुनो भाई उधो:कोंदा छत्तीसगढ़

जिस प्रकार बिना मुंह के व्यक्ति को गूंगा, मूक कहा जाता है। शरीर के सारे अवयव होते हुए भी पशुवत हो जाता है, उसी तरह कोई राज्य बिना भाषा के मूकवत जानवर की तरह ही होता है। बोलने से उसकी पहिचान जाति, धर्म, वैभव, संस्कृति, योग्यता व्यक्तित्व सब कुछ पता चलता है। छत्तीसगढ़ का जन्म तो हो गया है लेकिन यह गूंगे संतान की तरह है। भाषा के लिए बड़े-बड़े डॉक्टरों के पास एम्स में इलाज के लिए दाखिल किया गया है। कम से कम इनका मुंह तो खुले। इसी संदर्भ में पढ़िये यह छत्तीसगढ़ी आलेख...। 

बात सुजानिक असन सब बड़े-बड़े बोलथे। सांगा म नइ समाही। फेर जब ओ केहे के बात पूरा करे के बारी आथे तहां ले दांत ल निपोर देथे, एती-ओती झांके ले धर लेथे। लपरहा मन अइसने होथे। उपास न खाधाष के फरहार बर लबर-लबर कहिथे तउन अइसने मन होथे। 

बाते-बाते मं, थूक मं बरा नइ चूरे। ओकर बर पछीना ओगारे बर परथे। जांगर टोरे ले परथे। तब कहूं कोनो काम जाके सिध परथे। जइसे छत्तीसगढ़ राज हासिल करे के खातिर का-का उदिम नइ करिन। सिद्धो मं माल-पुआ अइसने नइ मिलगे छत्तीसगढ़िया मन ला? सब जुर मिल के आंदोलन करिन। सीधा अंगुरी मं घी नइ निकलय। जब थक-हारगे तब अपन आंदोलन ला थोकिन अइसे बल देवत गिन जेमा दिल्ली सरकार के आंखी उघरिस, तब कहूं जाके अटल सरकार हा आंखी-कान रमजत नवा छत्तीसगढ़ राज के घोसना करिस। 

सियान मन कहिथे, सिद्धो मं लइका नइ होवय, बारा कुआं मं बांस डारबे तब कहूं जाके घर मं किलकारी गूंजथे। हमर पुरखा अउ सियान मन ओ उदिम करिन तब आज ओकरे मन के पुन्न-परताप अउ आशिरवाद के परिणाम हे के, हमन  छत्तीसगढ़ राज मं खुशी-खुशी जीयत हन अउ सांस लेवत हन। 

छत्तीसगढ़ राज तो बनगे, मिलगे, सिरिफ राजभर मिले हे। राज ला कोन पोगरा लिन, कोन राज करत हे, कोन मलई खात हे, कुरसी टोरत हे? ओकर मन बर तो 'सोने मा सुहागा कस दिन आगे, चांदी ही चांदी हे। आम अउ मूल छत्तीसगढ़िया ला का मिलिस, ठेंगवा? जउन जिनिस मन मिलना रिहिस तउन तो सपना होगे हे, नोहर होगे। 

कोनो भी राज के पहिचान होथे, ओकर भासा। सरकार हा भुलवारे खातिर राजभाषा  आयोग तो बड़ चालाकी से बना दिस जइसे रोवत लइका मन ला चुप कराय खातिर बतासा धरा देथे। ओला पाके लइका मन चुप होके खेले-कूदे, नाचे-गाये ले धर लेथे। राजनीतिक खिलाड़ी मन जानथे, शतरंज के गोंटी, वजीर, ऊंट, हाथी, अउ पियादा ला कइसे अउ कब कोन मउका मं चले जाथे, खेले जाथे। राज ला देके भुलवार देहें, अब छत्तीसगढ़ी भासा ला दरजा दे के बारी आय हे तब कनमटक नइ देवत हें। काबर आंखी-कान लोरमाय हे। जब मराठी, गुजराती, पंजाबी, कन्नड़, उड़ीसा, तेलुगू भासा मन महारानी असन राज करत हे तब छत्तीसगढ़ी ला काबर सीता असन काबर वनवास देके जंगल-जंगल राम-लखन संग भटकावत हे। 

कुरसी टोरइया मन रायजादा बनके राज करत हे, तब अपन छत्तीसगढ़ी भासा महतारी हा काबर लंका मं रावन सही अशोक वाटिका मं धारोधार आंसू रोवत हे। कोन अइसे बेटा हे जउन अपन महतारी ला रोवत, कलपत देख सकहीं? ओ मन बेर्रा (वर्णसंकर) होही जउन अइसन हालत मं महतारी ला देखत होही। बड़े-बड़े समारोह मं कॉलेज, विश्वविद्यालय मं छत्तीसगढ़ी मं बोल के रोटी टोरइया, मिठलबरा असन बोलइया, भासन करइया, बोलइया, लिखइया, पढ़इया शहर ले लेके गांव-गांव, गली-गली मिल जाही। अइसे पढ़ही-लिखही भीम, अरजुन सही महायोद्धा अउ बली उहिच मन हे अउ भासा बर लड़े खातिर महाभारत छेड़ दिही फेर केहेंव नहीं शुरू मं के बात के बड़े सुजाकिन असन गला फाड़-फाड़ के बोलही, सांगा मं नइ समाही, गोला, बम, बारुद फेल खा जही फेर मउका मं दांत ला निपोर देथे। 

'पर भरोसा तीन परोसा, खवइया मन हमरे आगू मं उपजे, पले, बाढ़े हे अउ हमी मन ला बड़ गियानिक बरोबर उपदेश झाड़थे, जना-मन हमन कांही नइ जानन, भोकवा, अढ़हा अउ अंगूठा छाप हन। बोली, भासा, कला, संस्कृति परब, तीज-तिहार के दुरगति हे, मान हे, सम्मान होवत हमरे अपने राज मं तउन ये सब अंधरा मन ला नइ दिखय। बड़े-बड़े उपाधि, पद, पदवी, अउ मान के मुकुट पहिन के किंजरे भर ले नइ होवय। असली बेटा हौ छत्तीसगढ़ के तो राज पाये खातिर जइसे सब जुरमिल के आंदोलन करेव वइसने अपना भाषा खातिर घला चलव, उठव। सेती-मेती मं नइ देवय सरकार हा। भले ओहर काहत हे छत्तीसगढ़ राज हम बनाय हन, अब संवारबो घला फेर हमला अब पहिली छत्तीसगढ़ी भासा चाही, ओला देवौ।

-परमानंद वर्मा

सोमवार, 15 जुलाई 2024

'आंखी झन देखा, तंय मोर का कर लेबे ' ?

सुनो भाई उधो

परमानंद वर्मा

अरे गरमी, तू अपनी इतनी गरमी, अहंकार, आतंक और अभिमान मत दिखा। पारा चालीस, पैंतालिस और पचास तक बढ़ा लेने की धमकी देकर धरती  वासियों को न डरा-धमका! तू जानता नहीं, एक पल में तुझे दबोच न लूं, पानी  न पिला दूं तो मेरा भी नाम बदली नहीं? एक आदेश पर मेरे सारे गण और सैनिक हवा, आंधी, तूफान, बिजली और बादल,पानी एक साथ टूट पड़ेंगे, 'बम बर्डिंग ' कर देंगे जैसे अभी-अभी रूस ने यूक्रेन, इजराइल ने हमास और ईरान पर किया है। क्या हाल हुआ है इनका। इतिहास और पुराणों के पन्ने पलटकर देख लीजिए- अहंकारी सदैव धूल धूसरित हुए हैं। इसलिए ये गरमी अपनी सीमा में रहना सीख, आतंक छोड़ दे। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख...

देखत हौ एकर चाल ल, गरमी ल आतंक ल चालीस, चवालिस ले ऊपर भागत हे एकर पारा ह, कोन जनी पचास तक ले जाके भु'ज डरही, लेस डरही चिंगरी मछरी कस, ककरो परान नइ बाचही तइसे लागत हे? मउका मिलगे हे, मिल जथे तब कोनो ल छानही मं चढ़के होरा नइ भुंजना चाही। फेर अप्पत मन ल कोन समझावया। पद, पइसा, सत्ता, सुंदरी कस रूप कहूं एक घौं पा लेथे तहां ले अंधरा होय बरोबर कोनो ला कांही नइ समझंय तइसे लागथे। बस एक झन महीच हौं कहिथे। 

उधो के मइन्ता आज बड़े बिहनिया ले कोन जनी कइसे हे ते गड़बड़ागे हे। न कोनो एक पाव ओ का कहिथे नहीं सलफी, धन महुआ के उतारे दारू मारे हे, के भांग, अफीम, गांजा अउ हेरोइन दबाय हे। तब फेर अइसे का कारन हे के बिना नशा पानी के घला माते बरोबर ओकर हाथ-गोड़ डोलत हे, गोठियावत बतावत हे। अइसे तो नहीं के कोनो टेडग़ी या फेर घोड़ा करायत के अभेड़ा मं परगे होही? बात के जहर घला जबर होथे, सहे नइ जाय अउ का ले का नइ कर डरय? कोनो फांसी लगा लेथे, तब कोनो रेल मं मर-कट जाथे, जहर खाके अपन जीवन ला होम देथे। 

भाठा खार ले आमा टोर के आवत राहय माधो तेकर नजर गसतिहा खार मं गुमसुम थोथना उतारे सांप सूघे असन कलेचुप लरघियाय बइठे  उधो ऊपर परगे। ओला कहिथे- अरे भाई उधो, ये दे आम ले जा घर अउ बहू ला कहिबे बने नूनचरा चटनी बना डरही अउ गुराम घला बना लेही। बने खाहौ सुरपुट-सुरपुट। 

भाड़ मं जाय तोर नूनचरा आम के चटनी अउ गुराम, तुंही मन खाव चटनी अउ गुराम, बड़काहा मनखे मन के बहुत चोचला, नाज नखरा होथे? मोला नइ चाही तोर आमा। उधो के खखुवाय कस बोली ल सुनके माधो हड़बड़ागे अउ सोचथे- अइसे का होगे एला, एहर तो कभू अइसन बानी के बोलइया नोहय?

माधो सोचथे- जा, जरूर 'घर मं दूनो परानी के बीच मं कुछु बात ल लेके कहा-सुनी होगे होही, तेकर रंज ल मोर ऊपर उतारत हे ?

कोंवर लेवना कस बोली मं सुलहारत माधो कहिथे- उधो भइया, का बात हे संगवारी मोर, गोइसन बिच्छी के डंक मारे सही कुछू बोल दीस का अउ ओतके ओकरे बात ल धर के बगिया गेस। आज तोला पहिली बार देखथौं कइसे तोर चेहरा तमतमाय असन दीखत हे, आगी बरे सही। 

उधो मुंह खोलिस अउ किहिस- बात ल सही पकड़े भाई बइद हस ना। नाड़ी ल टमड़ के जइसे बइद मन शरीर के रोग ल जान जथे तइसे तहूं मोर बात ल, चेहरा के हाव-भाव ल देख के रोग ल जान डरे। 

माधो पूछथे- त हां, का बात हे तउन ल बता। कोनो मोर संगवारी अउ अइसन सुंदर सखा के मन मं  पथरा फेंके हे के समुंदर के लहरा असन चारो मुंड़ा बियाकुल नागिन बरोबर भटकत हे?

तोला का बतावौं माधो- यहा का अतियाचार हे, सुरुज नरायन के, ओला मउका मिले हे ते आगी बरसावत हे। पारा चालीस, पैंतालिस ल छुअत पचास ले छुए ले धर ले हे। अइसने तपही कोनो? जेन ल देखबे तउन पद, परतिष्ठा, धन, सत्ता, रूप अउ विद्या  ल पाके कोनो जीव ल तपही? अइसन अहंकार, घमंड नइ करना चाही। अरे इहां अतेक बड़े-बड़े परतापी राजा, महाराजा, सेना, सुंदरी, विद्वान, धनपति होय हे, सबके गरब माटी मं मिलगे हे। 

उधो बतावत कहिथे- मैं तोर अतका पढ़े-लिखे अउ कढ़े नइहौं माधो भइया फेर जतका संत समागम करे हौं, गुरु गुसाई अउ ददा-दाई, बबा के मुंह ले जइसन सुने हौं ओला बतावत हौं। कहां गय हिरण्यकश्यप के अहंकार जउन भगवान ले बढ़के समझत रिहिसे अउ जब नरसिंह अवतार रूप धरे भगवान के अभेड़ा मं परिस तब कइसे दांत ल निपोर दीस। कांही ले झन मरौं के वरदान पाके शेर बरोबर गरजत रिहिसे। कंस जउन अपन बाप उग्रेसन ला बंदी बनाके  कारागार मं धांध दे रिहिसे, बहिनी देवकी, दमाद वसुदेव के घला लिहाज नइ रखिस। ओकर लइका मन ल मार डरिस। फेर एक झन भांचा बाचगे कृष्ण तउन हे मतुर के राज दरबार मं कचार दीस, ओकर परान पखेरू उडग़े। रावन के का हाल-बेहाल होइस, ये कथा ल सब जानत हौ। 

तैं कहना का चाहत हस उधो, तेला साफ-साफ बता, तब ओहर 'अहंकार पुराण' के कथा ला लमियावत बताथे- अब तोला जादा बताय-सुनाय के का मतलब हे। माधो, देश दुनिया के चरित्तर ल तो तैं जानत हस, का होवत हे, का होवइया हे। पूरा छल-कपट बेइमानी, झूठ, धोखाधड़ी, मुंह मं राम-बगल मं छुरी कस हाल हे? जेती देखबे तेती पाखंड अउ पापाचार के खेती लहलहावत हे। जउन कभू मंदिर, मसजिद, गिरिजाघर, गुरुद्वारा के डेहरी मं नइ चढ़े होही, पांव नइ धरे होही तेकर मन के वेशभूषा बदलगे हे, संझा-बिहिनियां धुनी रमाय रामनाम के गटरमाला जपत हे पोथी पुरान पढ़थे। अइसे लगथे- कलजुग नहीं सतजुग मं हम सब जीयत हन। फेर अतेक अनीति, दुख के पहाड़ काबर बरसत हे, सब कोती हाहाकार काबर हे?

सुरुज नरायन घला राम नाम के माला जपे ले धर ले हे माधो, एकर भक्ति तो अउ नइ देखे जात हे। कहां तीस-पैंतीस के पारा मं एहर भजन-गीत गावय, तेकर तमूरा के ताल चालीस-पैंतालिस ले ऊपर चलत हे। 

एकर भक्ति के गरमी ल तो देख माधो, एक घौं मं बादर एला घपट के दबोच लेथे ते एकर हक्का-बक्का बंद हो जथे। चारो मुड़ा अंधियार छा जाथे। अतेक अहंकारी सुरुज नरायन तेकर चाल बादल के आघू मं घुसड़ जथे। मोला न कोनो टेडग़ी डसे हे, न घोड़ा करायत। ये अहंकारी मन के चाल ल देखथौं तब मगज छरिया जथे।

परमानंद वर्मा

रविवार, 3 मार्च 2024

सुनो भाई उधो ....सपना सरकस के

 सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो, जब सर्कस के पिंजरे से शेर निकल कर भाग जाए तब क्या हालत होती होगी दर्शकों की, शहर वालों की? ऐसा ही हो रहा है आज। देहली सर्कस एण्ड  कंपनी का एक खूंखार चीता रिंग मास्टर के हंटर से चमक कर सुरक्षा घेरे से बाहर आ गया है। फिर क्या था अपने आक्रामक तेवर का प्रदर्शन करते हुए बड़े-बड़ों को ऐसे लहूलुहान कर रहा है जिसकी किसी को कल्पना नहीं थी। उस चीते को सभी प्यार से 'ईडी' कहकर पुकारते हैं। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख-

- अरे भागव रे, भागव, जी परान बचाना हे तब ए तीर ले भागव।

 - काबर भागबो जी ए तीर ले, का होगे हे तेमा भागबो?

- नइ भागव तब जाव मरव रे सारे हो, तुंहर मन के रई आगे हे तेला कोनो नइ बचा सकय?

- अरे का बात होगे हे तेला बताबे ते बस कुकुर मांस खाय बरोबर बड़बड़ावत रहिबे? 

-नइ मानव न मोर बात ल, सारी दुनिया जानगे हे, देशभर के अउ गांव भर के मनखे जानगे हे फेर तुंहर असन मूर्ख मनखे मैं कहूं नइ देखे हौं, अतेक अंधरा, अतेक अड़ानी होके नइ रहना चाही?

- अरे परलोखिहा सारे नइ तो हो जइसे रावन, कंस, दुरजोधन, दुशासन अऊ बड़े-बड़े राक्षस मन के नांव ल सुन के रिसि-मुनि, गियानी अउ आम आदमी कांपय तइसने कस अभू होवत हे। 

ये मेहतरु जकहा-बकहा के मुंह ले अइसन बात सुन के दइहान मं सकलाय राहय तउन मन कहिथे, तुंहर मन के समझ मं आथे गा, एकर बात हा? 

परसादी कहिथे- कोन जनी बुजा हा का कहिथे, का बकथे ते कुछु समझ नइ परय? 

समारु, चिंता, रामनाथ, गोविंद, ईश्वर अउ कन्हैया घला परसादी के बात के समरथन करत कहिथे- कोन जनी ओहर का देख परे हे, सुन डरे हे ते झझके असन बड़बड़ावत हे। 

उही तीर सरपंच जगमोहन रिहिसे तउन कहिथे- राहौ तो गा राहौ,एकदम से हड़बावौ झन। उहू लइका, हा कुछु देखे, सुने, पढ़े होही, कोनो मेर तभे अइसन झझखे हे, डरे हे, तभे तो काहत हे भागव... भागव...। ओला तीर के बला लौ अउ पूछव का बात हे बेटा, काबर, का जिनिस हे तेला देखके तैं झझक गे स?

सरपंच जगमोहन ओ लइका ल तीर मं बलइस, ओकर बर पानी मंगइस। एक गिलास पानी ल गटागट ओहर पीगे। 

सरपंच पूछथे- हां, बता बेटा, का बात हे, काबर सब झन ल भागव... भागव... भागव... काहत हस?

ये बेटा के नांव हे मेहतरु, बने हट्टा-कट्टा, नौजवान हे कोनो जोजवा-भोकवा नइहे। ओहर सरपंच ल बताथे- का बतावौं मालिक, रात के एक ठन भयंकर सपना देख परे हौं।

- का सपना रे, सरपंच हा पूछथे। अब ओ तीर सुनइया मन के मजमा लग जथे अउ सब कान देके ओकर बात ल सुने ले धर लिन जइसे कोनो रहस्य-रोमांच के बात सुनावत हे?

- हां, त बता बेटा मेहतरु का अइसे भयंकर सपना देख डरे के अतेक हड़बड़ागे हस?

- हड़बड़ाय के लइक सपना रिहिस हे, तैं नइ पतियाबे, गउकिन काहत हौं गा, ओ भयंकर सपना ल देखत-देखत डर के मारे मूत (पेशाब) घला कर डरेंव। 

सुनत राहय तउन चंगू-मंगू मन जोर से खिलखिला के हांस भरथे, कठल जथे। कोनो-कोनो कहिथे- ये सारे मेहतरु हा लबारी मारत हे, चुतिया बनावत हे, नइ देखे हे अइसन कोनो सपना, एकर बात मं कोनो झन आहौ। लफंगा हे, झूठ-मूठ के बात बनावत, बेंझावत हे। 

सरपंच कहिथे- राहौ तो गा, थोकन चुप तो राहौ। का काहत हे एहर तउन ल सुन तो लौ?

-हां त बता बेटा मेहतरु, का देखे भयंकर सपना मं?

 -मेहतरु- अरे बाप रे, का बतावौं मालिक, दिल्ली मं सरकस होवत हे तिहां के रिंग मास्टर के हंटर खाके चीता अतेक बौखला गे, सब पंडाल मन ल टोरटार के ऐती-ओती जिहां पावत हे जात हे राड़ छड़ावत हे। सब जी परान दे के एती-ओती भागत हे।

रामनाथ पूछथे- तोर ये सपना सही हे के अइसन डेर्रावत हस?

मेहतरु बताथे- मोला का लेना-देना हे भइया ककरो से। बिहनिया मोर नींद खुलिस तब देखथौं, ओ चीता नोहय, ओ ईडी हे। आईटी, सीबीआई पुलिस घला हे ओकर संग मं। जेन मोटहा आसामी हे, जनता के धन ल लूट-लूट के खाय हे, भोभस मं भरे हे तेकर इहां घुसर-घुसर के छापा मारत हे। कोनो नेता, कोनेा मंतरी, कोनो उद्योगपति, व्यापारी, कलाकार एक ला नइ छोड़त हे। 

मैंहर देखे हौं- गिंधोल कस मोटाय ओ बेईमान, गरकट्टा, दोगला, पाखंडी मन ल अइसन ठठावत हे, धुर्रा छड़ावत हे के ओकर मन के हौसडा बंद होगे हे। सब ल जेल मं धांधत हे। एक नइ सुनत हे ककरो। एक झन नइ बता सकत हे के अतेक रुपिया, सोना-चांदी, जमीन-जायदाद, महल-अटारी, घोड़ा-गाड़ी कहां ले अउ कइसे अतेक जल्दी बटोर डरे हे?

ओहर बताथे- मैं सपना मं देखेंव, रिंग मास्टर जब ओला निरदेस देवत रिहिसे तब कनमटक नइ देवत रिहिसे फेर जब एक हंटर परिस ना तब हां जी मेरे आका काहत पंडाल (ऑफिस) ले बाहिर निकलिन अउ फाइल खोल-खोल के देखिन तब बड़े-बड़े भुंडा के नांव दिखिस। बिहानभर तड़ातड़ छापा कार्रवाई शुरू होगे। 

सरपंच ल बतावत कहिथे साल भर ले ऊपर होगे हे मालिक, तुमन कइसे नइ जानन, सुने हन कहिथौ- बड़े-बड़े सरकार कांपत हे, सरकस के चीता के नांव ल सुन के। सांड बरोबर खुल्ला ढिलाय हे जिहे पावत हे तिहे ल थुथरत हे दोरदिर ले ओइलाय हे। अतेक अखबार, टीवी चैनल मं फोटो सहित ओ सबो जिनिस ल देखावत हे जउन पकड़ावत जात हे।

सरपचं कहिथे- वाह बेटा मेहतरु, तब ये आय तोर सपना सरकस के। इही ला देख के तैं डर्रागेस रे?

- डर्राय के लइक बात हे मालिक। 

दूसर दिन ओकर गांव मं विधायक अउ मंतरी रहिथे तेकर घर ईडी के छापा परगे। पांच किलो सोना, कीमती जेवर, फर्जी लेनदेन, जमीन जायदाद के जांच शुरू होगे। एक झन नेता के घर मं करोड़ों के नगदी मिलिस। 

सब केहे ले धरलिन, मेहतरु किहिस तउन बात सहिच निकलगे। इही पाके ओहर चेतावत रिहिसे- भागव... भागव... भागव... फेर ओकर बात ऊपर कोनो धियान नइ देवत रिहिन हे। बइहा, पगला काहत रिहिन हे। वाजिब मं सपना घला कभू-कभू सच हो जथे भइया...।

परमानंद वर्मा

रविवार, 25 फ़रवरी 2024

तोला का भइगे लेडग़ी..?

 'सुनो भाई उधो'

समाज में अनेक तरह की विसंगतियां, बुराइयां होती है जिसको लेकर आपस में कहा-सुनी हो जाया करती है। दो के झगड़े में तीसरे को नफा अथवा नुकसान तो उठाना ही पड़ता है, इसलिए समझदारी इसी में होती है कि कोई भी इस तरह के मामलो में न पड़ें। लेकिन कुछ मामले ऐसे होते हैं जो भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं, और उससे बच पाना असंभव होता है। इसी तरह के मामले से संबंधित एक प्रेम कहानी है। प्रेमी-प्रेमिका किसी बात को लेकर झगड़ पड़ते हैं और उसका खामियाजा प्रेमिका की बेटी को उठाना पड़ता है। पढिय़े छत्तीसगढ़ी कहानी- ''तोला का भइगे लेडग़ी..?"

तैं काकर भभकी मं आगेस, अइसने कोनो करही, खाय बर देहस तउन थारी ल कोनो नंगाही, झटक के लेगही? का होगे तोला आज, अइसन तो नइ करत रेहे?

सतनारायन अकबका जथे, अंजनी के अइसन चाल ल देखके। ओहर कहिथे- तीन-चार दिन ले ताड़त हौं, तोला कइसे का बात होगे हे ते थोकन अनमने ढंग ले राहत हस। न पहिली जइसे हांस के, परेम के बोली-बात करत हस, सांप-डेडू, बिच्छी तो नइ काट दे हे। 

अंजनी न चिट करत हे न पोट, सतनारायण कुकुर असन अपने अपन हांव-हांव करत भूकत हे। पहिली तो देख, खाना दीस, तहां ले बाहिर पार, खोर दुआरी मं चल दीस अउ परोसिन संग लपर-लिपिर मारे ल धर लीस। पानी घला नइ दीस। जबकि खाना दे के पहिली हमर इहां रिवाज हे पानी पिढ़वा लगाथें। 

परोसिन करा ले कोन जनी का पाठ पढ़के अइस ते ओला पढ़ा दे गिस, आते साठ खाना खाय बर शुरू करत रेहेंव तउन थारी ल उठा के लेगे। 

सतनारायन हड़बड़ागे। ओकर कांही समझ नइ आवत हे कि माजरा का हे? ओहर कहिथे- अंजनी! 

ओहर टेडगा बानी मं कहिथे- झन काह मोला अंजनी, मरगे तोर बर ये अंजनी हा। नइ करत हौं तोला प्यार, हमर-तोर पिंयार  के नाटक इही तीर ले खतम। 

गंज करा धोवन के बरतन मं हाथ-मुंह धोके सतनारायन ओकर तीर मं आथे अउ कहिथे- अंजनी, तोर घर मैं बरपेली नइ आय हौं, ते बलाय रेहे, अमुक तारीख-तिथि, घड़ी मं आबे, मोर गोसइयां बिलासपुर गे हे। बने हांसबो, गोठियाबो, छेहेल्ला मारबो। अब जब तोर बलाय ऊपर ले आगेंव तब तोला का शनिच्चर धर लीस, बही-भुतही कस होगेस?

हां... हां... मैं बही-भूतही होगे हौं, शनिच्चर मोर ऊपर खपलागे हे, बस अतकेच ना, ते अउ कुछु केहे बर बांचे हे? 

सतनारायण ल वाजिब मं कुछु बात समझे नइ परत हे के आखिर एला हो कागे?

ओकर तीर मं जाके ओले पोटारे कस करथे तब घोड़ी हा जइसे घोड़ा ल छटारा मार के अपन तीर ले भगा देथे वइसने कस खेल अंजनी जब करिस तब सतनारायन सुकुरदुम होगे। एकर पहिली तो कभू अइसन नइ होय रिहिस हे? बने रासलीला में मगन हो जावत रिहिस हे दुनो झन। 

अंजनी अउ सतनारायन के बीच तो तीस-पैंतीस बछर ले ये परेम अउ रासलीला चलत आवत हे फेर कोनो अइसे आज तक नइ जान सके हे के ये दूनो झन के बीच मं कोनो खो-खो, फुगड़ी के खेल चलत आवत हे। दूनो झन लोग-लइका वाले हे, उमर खसल के अ्धिया गे हे फेर ओ खेल नइ छूटे हे। 

पहिली चिट्ठी-पतरी अउ फोन के जमाना रिहिसे, उही मं अपन गोठ-बात, मिलना-जुलना, होटल जाना, फिलिम देखा सब हो जात रिहिसे। जब ले इंटरनेट आय हे, मोबाइल आय हे तउन तो अउ सब सुविधा ल परोस दीस। रायपुर मं बइठे हे अउ लंदन, अमरीका, मुंबई, कोलकाता बात कर लेथे, फोटो समेत हांस-गोठिया लेथे आनी-बानी के। जइसन चरित्तर नहीं तइसन ये इंटरनेट अउ मोबाइल हा देखावत सुनावत हे। धुर्रा छोड़ावत हे। 

ओ दिन के घटना, सतनारायन ल बने नइ लगिस, जोरदार ठेस लगिस ओकर दिल मं, अंतस के पीरा ला उही जानही। तीस-पैंतीस साल के पिंयार का ला कहिथे?ओ दिन, ओ बात, ओ हंसी, ओ रात कइसे कोनो भुला जही?

का मन होइस ते सतनारायण के मन उचटगे अउ अंजनी ल ये काहत, तोर दर, तोर दिल अउ तोर घर ले मैं सदा दिन ले निकलके जाथौं, कभू मोर सुरता झन करबे, समझबे- कोनो आवारा, बदमाश, राहू-केतू जीवन मं आय रिहिसे तेकर ले मुक्ति पागेंव। 

सात-आठ महीना गुजरे ऊपर ले ससुराल ले अंजनी के बेटी मइके आय रहिथे तब अपन दाई ल पूछथे- सतनारायन कका के का हालचाल हे, पंदरही होगे मोला आये, एको दिन नजर नइ आइस, कहूं बाहिर गे हे का?

सतनारायन के नांव ल सुनिस तहां ले अंजनी के आंखी डहर ले आंसू झरे ले धर लेथे। बेटी पूछथे- का होगे दाई कका ला, गुजरगे का?

का बतावय अंजनी अपन बेटी ल सतनारायन के बारे मं के ओला का होगे? बताथे- कुछु नइ होय हे बेटी!

तब काबर नइ आवत हे, ओला आरो नइ करे हस का, के सतरूपा आय हे?

अंजनी अब चुप अउ खामोश, बक्का नइ फूटत हे के का काहय अउ नइ काहय?

सतरूपा कहिथे- नहीं दाई आज जाहूं ओकर घर अउ ओला बला के लाहूं, चल कका तोला दाई बलाय हे।

अंजनी समझाथे- नहीं सतरूपा, झन जाबे ओकर घर। 

-काबर, सतरूपा पूछथे?

अंजनी कुछु नइ बोलय, तब सतरूपा समझ जथे जरूर दाई अउ कका के बीच मं कांही बात ल लेके रंगझाझर माते होही, अनबन होगे होही?

सतरूप लम्बा सांस लेवत कहिथे- वाह कका, सतनारायन। तोर गोदी मं खेलेव, बढ़ेंव, तोर पिंयार-दुलार पायेंव, अब कोन हमला बाम्बे के मिठाई अउ बनारस के पेड़ा लान के खवाही?

परमानंद वर्मा

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2023

बाऊजी की थाली

 


बाऊजी के लिये खाने की थाली लगाना आसान काम नहीं था।

उनकी थाली लगाने का मतलब था-थाली को विभिन्न पकवानों से इस तरह सजाना मानो ये खाने के लिए नहीं बल्कि किसी प्रदर्शनी में दिखाने के लिए रखी जानी हो।

सब्ज़ी,रोटी,दाल सब चीज़ व्यवस्थित तरीके से रखी जाती।

घर मे एक ही किनारे वाली थाली थी और वो थाली बाऊजी की थी।खाने की हर सामग्री की अपनी एक जगह थी बाऊजी की थाली में।

मजाल है कोई चीज़ इधर से उधर रख दी जाये।

दो रोटी, उसके एक तरफ दाल, फिर कोई भी सब्ज़ी, थोड़े से चावल और उसके साथ कोई भी मीठी चीज़।

मीठे के बिना बाऊजी का खाना पूरा नहीं होता था।

पहले घर में कुछ ना कुछ मीठा बना ही रहता था और यदि न हो तो शक्कर , घी बूरा मलाई कुछ भी हो लेकिन मीठा बाऊजी की थाली की सबसे अहम चीज थी और दूसरी अहम चीज़ थी पापड़। पापड़ का स्थान रोटी के ठीक बगल में होता था जो कि लंबे समय तक नहीं बदला।

बस घर के बने पापड़ की जगह बाजार के पापड़ ने ले ली थी। अचार का बाऊजी को शौक नहीं था।

हाँ, कभी कभार धनिया पुदीने की चटनी जरूर ले लिया करते थे। दही बाबूजी को पसंद नहीं थी लेकिन रायता तो उनकी जान थी फिर चाहे वह बूंदी का हो या घीया का और रायता थाली में पापड़ के ठीक साथ विराजमान रहता था।

मणि को तो शुरु शुरु में बहुत दिक्कतें आई।काफी समय तक तो नई बहू को यह जिम्मेदारी दी ही नही गई लेकिन फिर जब-जब सासू माँ बीमार रहती थी या घर पर नहीं होती थी तो बाऊजी को खाना खिलाने की जिम्मेदारी मणि पर आ जाती।

खाना बनाने में तो मणि ने महारथ हासिल कर रखी थी लेकिन बाऊजी के लिए खाने की थाली लगाने में उसके पसीने छूटने लगते।कभी कुछ भूल जाती तो कभी कुछ और कभी-कभी तो हड़बड़ाहट में कुछ न कुछ गिरा ही देती। एक बार तो थाली लगाकर जैसे तैसे बाऊजी के सामने रखी।

बाऊजी कुछ सेकंड थाली को देखते रहे फिर समझ गए कि आज उनकी धर्मपत्नी घर पर नहीं है। फिर चुपचाप खाना खाकर चले गए।

"माँ जी, यह कैसी आदत डाल रखी है आपने बाऊजी को। इतना समय खाना बनाने में नहीं लगता है जितना समय उनकी थाली लगाने में लगता है" उस दिन झल्ला सी गई थी मणि।

"मैं क्यूँ आदत डालूंगी मैं तो खुद इतने साल से इनकी इस आदत को झेल रही हूँ।" सासू माँ ने मुस्कुराकर जवाब दिया।

"तो बाऊजी हमेशा से ऐसे थे?"

"हाँ, बचपन से ही। सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे। माँ के लाडले थे।

  खाना सही से नहीं खाते थे तो मेरी सास थाली में अलग अलग तरह के पकवान रखकर लाती थी कि कुछ तो खा ही लेंगे और फिर धीरे-धीरे तेरे बाऊजी को ऐसी ही आदत पड़ गई।उसके बाद मैं आई।

पहले पहल मुझे भी बहुत परेशानी हुई।

थाली में कुछ भी उल्टा-पुल्टा होता था तो तुम्हारे बाऊजी गुस्सा हो जाया करते थे। वैसे स्वभाव के बहुत नरम थे लेकिन शायद खुद ही अपनी इस आदत से मजबूर थे।

अव्यवस्थित थाली उन्हें बर्दाश्त नहीं होती थी। शुरू-शुरू का डर मेरी भी आदत में ही बदल गया और बाद में तो कुछ सोचना ही नहीं पड़ता था।

हाथों को हर चीज अपनी जगह पर रखने की आदत पड़ गई थी।

मणि भी अपनी सासू माँ की तरह धीरे-धीरे आदी हो गई। अपने पूरे जीवन काल में बाऊजी ने कभी किसी चीज की अधिक चाह नहीं की थी। संतोषी स्वभाव के थे लेकिन भोजन के मामले में समझौता नहीं करते थे।

बहुत अधिक खुराक नहीं थी।

 थाली में प्रत्येक चीज़ थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ही होती थी। मणि तो कई बार  हँसकर बोल दिया करती थी कि बाऊजी को खाने में क्वांटिटी(quantity) नहीं वैरायटी(variety) चाहिए।बचपन में बेटे के प्रति लाड दिखाती माँ से लेकर बुढ़ापे में अपनी जिम्मेदारी निभाती बहु तक के सफर ने थाली के अस्तित्व को बरकरार रखा।

समय बीतता गया। अब मणि खुद सास बन चुकी थी। सासू माँ का देहांत हो गया था।बाऊजी भी काफी बूढ़े हो चले थे। ज्यादा खा-पी भी नहीं पाते थे।

समय के साथ थाली की वस्तुएं व आकार दोनों ही घटते गए। अपने अंतिम दिनों में अक्सर बाऊजी भाव विह्वल होकर मणि के सिर पर हाथ रख कर बोल पड़ते कि अब मेरी आत्मा तृप्त हो चुकी है।

बाऊजी का स्वर्गवास हुए पाँच साल हो गए थे।

आज भी श्राद्ध पक्ष की अमावस्या पर उनके लिए थाली लगाई जाती जिसमें पहले की तरह सभी चीजें व्यवस्थित तरीके से होती हैं। बाऊजी की आत्मा का तो पता नहीं लेकिन मणि का मन जरूर तृप्त हो जाया करता है।

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हमसे आगे हम -- 

टीचर ने सीटी बजाई और स्कूल के मैदान पर 50 छोटे छोटे बालक-बालिकाएँ दौड़ पड़े।

सबका एक लक्ष्य। मैदान के छोर पर पहुँचकर पुनः वापस लौट आना।

प्रथम तीन को पुरस्कार। इन तीन में से कम से कम एक स्थान प्राप्त करने की सारी भागदौड़।

सभी बच्चों के मम्मी-पापा भी उपस्थित थे तो, उत्साह जरा ज्यादा ही था।

मैदान के छोर पर पहुँचकर बच्चे जब वापसी के लिए दौड़े तो पालकों में " और तेज...और तेज... " का तेज स्वर उठा। प्रथम तीन बच्चों ने आनंद से अपने अपने माता पिता की ओर हाथ लहराए।

चौथे और पाँचवे अधिक परेशान थे, कुछ के तो माता पिता भी नाराज दिख रहे थे।

उनके भी बाद वाले बच्चे, इनाम तो मिलना नहीं सोचकर, दौड़ना छोड़कर चलने भी लग गए थे।

शीघ्र ही दौड़ खत्म हुई और 5 नंबर पर आई वो छोटी सी बच्ची नाराज चेहरा लिए अपने पापा की ओर दौड़ गयी।

पापा ने आगे बढ़कर अपनी बेटी को गोद में उठा लिया और बोले : " वेल डन बच्चा, वेल डन....चलो चलकर कहीं, आइसक्रीम खाते हैं। कौनसी आइसक्रीम खाएगी हमारी बिटिया रानी ? "

" लेकिन पापा, मेरा नंबर कहाँ आया ? " बच्ची ने आश्चर्य से पूछा।

" आया है बेटा, पहला नंबर आया है तुम्हारा। "

" ऐंसे कैसे पापा, मेरा तो 5 वाँ नंबर आया ना ? " बच्ची बोली।

" अरे बेटा, तुम्हारे पीछे कितने बच्चे थे ? "

थोड़ा जोड़ घटाकर वो बोली : " 45 बच्चे। "

" इसका मतलब उन 45 बच्चों से आगे तुम पहली थीं, इसीलिए तुम्हें आइसक्रीम का ईनाम। "

" और मेरे आगे आए 4 बच्चे ? " परेशान सी बच्ची बोली।

" इस बार उनसे हमारा कॉम्पिटीशन नहीं था। "

" क्यों ? "

" क्योंकि उन्होंने अधिक तैयारी की हुई थी। अब हम भी फिर से बढ़िया प्रेक्टिस करेंगे। अगली बार तुम 48 में फर्स्ट आओगी और फिर उसके बाद 50 में प्रथम रहोगी। "

" ऐंसा हो सकता है पापा ? "

" हाँ बेटा, ऐंसा ही होता है। "

" तब तो अगली बार ही खूब तेज दौड़कर पहली आ जाउँगी। " बच्ची बड़े उत्साह से बोली।

" इतनी जल्दी क्यों बेटा ? पैरों को मजबूत होने दो, और हमें खुद से आगे निकलना है, दूसरों से नहीं। "

पापा का कहा बेटी को बहुत अच्छे से तो समझा नहीं लेकिन फिर भी वो बड़े विश्वास से बोली : " जैसा आप कहें, पापा। "

" अरे अब आइसक्रीम तो बताओ ? " पापा मुस्कुराते हुए बोले।

तब एक नए आनंद से भरी, 45 बच्चों में प्रथम के आत्मविश्वास से जगमग, पापा की गोद में शान से हँसती बेटी बोली : " मुझे बटरस्कॉच आइसक्रीम चाहिए। "

क्या अपने बच्चो के रिजल्ट के समय हम सभी माता पिता का व्यवहार कुछ ऐसा ही नही होना चाहिए ....विचार जरूर करे और सभी माता पिता तक जरुर पहुचाये।

रविवार, 10 सितंबर 2023

रविवार एक कहानी - पेंशन

" सुनो, आज चार तारीख हो गई,पेंशन लेने का समय आ गया है।बैंक जा रहा हूँ,आने में देर हो जाए तो परेशान मत होना।युवाओं को समय की कद्र कहाँ, छोटे-छोटे काम में भी घंटों लगा देते हैं।" पत्नी को कहकर रामनिवास जी बाहर जाने लगे तो पत्नी ने पीछे से कहा, " आपके इतने सारे विद्यार्थी हैं, उन्हीं में से किसी को क्यों नहीं कह देते?" 

 " ज़माना बदल गया है।पहले जैसे विद्यार्थी अब कहाँ जो अपने गुरु का मान करें।उन्हें तो मेरा नाम भी याद नहीं   होगा।" पत्नी को जवाब देकर वे बैंक चले गये।

 महीने का पहला सप्ताह होने के कारण बैंक में भीड़ थी।एक खाली कुर्सी देखकर वे बैठ गये और फार्म भरकर  कैशियर वाले डेस्क के सामने खड़े हो ही रहें थें कि एक स्टाफ़ ने उन्हें आदर-सहित कुरसी पर बैठा दिया और स्वयं फ़ार्म लेकर कैशियर के केबिन में चले गये।वे कुछ समझ पाते तब तक में बैंक का चपरासी उनके लिए चाय ले आया।उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि वे बिना चीनी के चाय पीते हैं।चपरासी बोला, " साहब ने बिना चीनी वाली का ही आर्डर दिया है।" कहकर उसने रामनिवास जी के हाथ में चाय की प्याली थमा दी।

 रामनिवास जी ने घड़ी देखी, दस बजकर पाँच मिनट हो रहें थे।सोचने लगे, चाय पिलाया है,लगता है दो घंटे से पहले मेरा काम न होगा।तभी एक बत्तीस वर्षीय सज्जन ने आकर उनके पैर छुए और विड्राॅ की गई राशि उनके हाथ पर रख दिया।इतनी जल्दी काम पूरा होते देख रामनिवास जी चकित रह गए।उन्होंने उन सज्जन को धन्यवाद देते हुए परिचय पूछा तो उन्होंने कहा, " सर, मैं इस बैंक का नया मैनेजर हूँ, एक सप्ताह पहले ही मैंने ज्वाॅइन किया है लेकिन उससे पहले मैं आपका विद्यार्थी हूँ।" 

 " विद्यार्थी! " रामनिवास जी ने आश्चर्य से पूछा।उन्होंने कहा, "जी सर, सन् 2004 में आप सहारनपुर के उच्च माध्यमिक विद्यालय में नौवीं कक्षा के विद्यार्थियों को गणित पढ़ाते थें।मैं भी उन्हीं में से एक था।गणित मुझे समझ नहीं आती थी।परीक्षा में पास होने के लिए मैंने नकल करना चाहा और पकड़ा गया।प्रिंसिपल सर मुझे रेस्टीकेट कर रहें थें तब आपने उनसे कहा था कि नासमझी में विद्यार्थी तो गलती करते ही हैं।हम शिक्षक हैं, हमारा काम उन्हें शिक्षा देने के साथ-साथ सही राह दिखाना भी है।संजीव की यह पहली गलती है,रेस्टीकेट कर देने से तो इसका पूरा साल बर्बाद हो जाएगा जो मेरे विचार से उचित नहीं है।आपने उनसे विनती की थी कि मुझे माफ़ी देकर अगली परीक्षा में बैठने दिया जाए।प्रिंसिपल सर ने आपकी बात मान ली थी,आपने अलग से मुझे ट्यूशन पढ़ाया और मैं परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होकर आज आपके सामने खड़ा हूँ।आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सर!" हाथ जोड़कर मैनेजर साहब ने अपने गुरु को धन्यवाद दिया और ससम्मान उन्हें बाहर तक छोड़ने भी गए।

घर लौटते वक्त रामनिवास जी सोचने लगे, ज़माना चाहे कितना भी बदल जाए, जीवन भले ही मशीनी हो जाए लेकिन विद्यार्थियों के दिलों में शिक्षक का सम्मान हमेशा रहेगा,यह आज बैंक मैनेजर संजीव ने दिखा दिया।

वाट्स एप से साभार

शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

बिन डोंगहार के डोंगा

 सुनो भाई उधो

परमानंद वर्मा

फिर मन गया बिना गोसइया के

 छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग का स्थापना दिवस ।आते हैं इस  मे प्रदेश भर से छत्तीसगढ़ी  साहित्यकार, लेखक, कवि, भाषाविद्, संस्कृति कर्मी। मुख्य अतिथि के उद्घाटन के बाद निर्धारित विषयों पर वक्ता अपने विचार रखते हैं, कवि गण अपनी कविताओं के पाठ करते हैं, लोक कलाकार संगीतमय प्रस्तुति से आगंतुकों को भाव-विभोर कर देते हैं, और अंत में भोजन प्रसादी पाकर अपने-अपने ठिकाने लौट जाते हैं। विगत पांच सालों से ऐसा ही चल रहा है। सचिव के भरोसे नैया आगे सरक रही है । हालाकि उन्होंने किसी को ऐसा आभास नहीं होने दिया कि अध्यक्ष नहीं है लेकिन सबको इस बात का मलाल है कि जब सभी आयोगों, मंडलों में अध्यक्षों व अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति प्रमुखता से की गई है तब छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग की उपेक्षा क्यों? इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख।

सीहोर वाले महाराज पंडित प्रदीप   मिश्रा ओ दिन गोढियारी म शिवपुराण के कथा बाचत रिहिसे तब ओ कथा ल सुने बर डोंगा(नाव) घला पहुंचे राहय। उही बेरा हाथ उठा के ओहर हर हर महादेव काहत महराज सो बिनती करत पूछ-थे, सब के दुख, करलेस ल टारत आवत हस महाराज, मोरो एक ठन जबर करलेस हे, टार देते ते बने होतिस।

महाराज ह पूछ-थे,का करलेस है दाई बता ना। डोंगा हाथ जोर के आँखि कोती ले आंसू ढारत गोहरा-थे, मोर गोंसिइया डोंगहार पांच साल होए ले जावत हे, कहां चल देहे। अतेक खोजत हौं, पता लगावत हौं फेर कांही सोर नई मिलत हे। तुंहर आसन महाराज मन करा बिचरवा घला डरे हौं फेर कुछु नई पता लगिस। कोनो कोनो बताईन, सीयम हाउस कोती जात देखे हन। अब भगवान जानय ओहर कहां हे।

डोंगा के सबो बात ल सुने के बाद सीहोर वाले महाराज ओला बताथे- एक उपाय बतावत हौं धियान देके सुन। कोनो मेर के शिव मंदिर म जाके रोज एक लोटा पानी, एक ठन बेल पत्ती अउ कनेर, धतूरा, गुलाब के फूल हो सकय ते शिवजी म अर्पन करना शुरू कर दे। एक न एक तोर गोसइया जरूर लहुट के घर आ जही। ये उपाय ल करके देख तो भला। अउ  हां श्री शिवाय नमस्तुभ्यम ये मन्त्र के जाप पांच घो जरूर करे करबे। अब दुनों हाथ ल उठा के बोल, हर हर महादेव। अइसने कस हाल छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के सध होवत हे। खोजत फिरत भटकत हे अपन गोसइया(अध्यक्ष) के फिराक मे ।

सोचथौं बिना किसान के खेती, बिना डॉक्टर के अस्पताल, बिना जज के कोर्ट, बिना परानी के गिरहस्थी, बिना डोंगहार के डोंगा (नाव), बिना पायलट के हवाई जहाज अउ बिन राजा के राज्य कइसे चलत होही, चलेच नइ सकय, अउ अइसने कतको अकन बात हे जेकर बिना अधूरा के अधूरा रहि जाथे. विधवा, रांड़ी-अनाथिन कस रोवत-धोवत जिनगी गुजर जथे। तइसने कस हाल छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के हे। पांच साल गुजरे ले जात हे, छत्तीसगढ़ के मुखिया कइसे आंखी-कान ला लोरमा दे हे ते  ये आयोग के अध्यक्ष के नियुक्ति नइ करिस। अउ सब मंडल, आयोग के अध्यक्ष, सचिव अउ पदाधिकारी मन  के नियुक्ति कर डरिस, फेर एती हीरक के नइ निहारिस। कतको सुख-सुविधा दे-दे, ददा (मुखिया) बिना घर सुन्ना लगथे, नइ सुंदरावय। लक्ष्मण मस्तुरिया, श्यामलाल चतुर्वेदी, दानेश्वर शर्मा अउ डॉ. विनय पाठक जइसे बड़े-बड़े गुनिक मन ये आयोग के अध्यक्ष बने रिहिन हे जेकर से ये आयोग के शोभा बढ़े रिहिसे। अइसे बात नइहे के कोनो अध्यक्ष पद के लइक नइहे, एक ले बढ़के एक सुजानिक चेहरा ये पद के काबिल हे। ओकर से छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के मान-शान मंं बरकत हो सकत रिहिसे। उपेक्षा के शिकार काबर होइस ये बात के सवाल सब साहित्यकार, कला, संस्कृति, भाषा, बोली के समझ रखइया मन उठाथे, उठावत हें। 'छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया' के नारा के ढिंढोरा पीटे भर ले छत्तीसगढ़िया के विकास नइ होना हे। विकास होही ओकर मातृभाषा ल पंदोली देके, ऊपर उठायले, प्राथमिक कक्षा ले पढ़ई शुरू करे ले। जइसने किसानी के रकम ल किसान ले बने दूसर कोनो जान नइ सकय, वइसने शिक्षा के विकास के रकम शिक्षा के विद्वान ले दूसर कोनो नइ जानय। राजा करा तो दुनिया भर के काम रहिथे, रात-दिन राज-काज मं बूड़े रहिथे। अइसन काम के नेत-घात जउन जानथे तेला सौंपना चाही। नहीं ते फेर बिन मांझी के डोंगा हवा के झोंका में कोन कोती के रसदा रेंग दिही, भगवाने मालिक हे। 

अभी ओ दिन 14 अगस्त के छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के स्थापना दिवस मनाये गिस, जेमा प्रदेश भर के साहित्यकार, कलाकार, संस्कृति कर्मी, कवि, विद्यार्थी मन सकलाय रिहिन हे। माई पहुना संस्कृति मंत्री अमरजीत भगत दीया बार के कार्यक्रम के उद्घाटन करिस, जेकर पगरइत रिहिन हे संसदीय सचिव कुंवरसिंह निषाद। ये मौका मं गीत-संगीत के प्रस्तुति राज गान के बाद होइस। ये बेरा मं फिल्म डायरेक्टर मनोज वर्मा अउ टीवी के उद्घोषक श्रीमती मधुलिका पाल अपन-अपन विचार रखिन। 

महंत सर्वेश्वर दास सभा भवन में आयोजित ये समारोह मं प्रदेशभर ले आये छत्तीसगढ़ी साहित्य प्रेमी के मन मं इही बात के जादा चरचा अउ दुख होवत रिहिसे के प्रदेश के मुखिया ये आयोग ल काबर अनदेखी करत हे, काबर अध्यक्ष नइ नियुक्त करत हे। कोनो खुसुर-फुसुर गोठियावय तब कोनो टांठ भाखा मं। फेर कोनो ये बात, ये मुद्दा ल लेके सोझ मुखिया मेर जाके हिम्मत नइ जुटा सकत रिहिन हे। 

कार्यक्रम के दूसर सत्र मं श्रीमती धनेश्वरी सोनी, टिकेश्वर सिंह, अरविन्द मिश्र, नवलदास मानिकपुरी, कपिलनाथ कश्यप, दुर्गाप्रसाद पारकर, अशोक पटेल आशु अउ हितेश कुमार के लिखे पुस्तक मन के मुख्य अतिथि संस्कृति मंत्री अमरजीत भगत अउ दूसर अ्तिथि मन के हाथों विमोचन होइस। ये पुस्तक मन के प्रकाशन राजभाषा आयोग करे हे। युहू मं एक ठन बड़े विडम्बना  ये हे के लेखक मन ल सिरिफ पुस्तक के 20-20 प्रति देके भुलवार दे हे। इही ये आयोग के योजना हे। मर-खप के लिखबे, गरीब, दीन-हीन साहित्यकार मन, ओमन ल मिलथे का... फुसका। कुछ तो  बीस पच्चीस  हजार देतीन ओकर मेहताना, जउन लिखत-पढ़त हे तेकर जुगाड़ करना चाही। हो सकत अउ ये लिखे हे तेकर ले बढ़िया कोनो पुस्तक, ग्रंथ, महाकाव्य लिख परही? अउ दूसर बाहिर के मन बर सरकार के खजाना खुले हे, हजारों, लाखों लुटा देवत हे अउ इहाके  बुद्धिजीवी, कलाकार, संस्कृति कर्मी मन बर फुसका परे हे। बस्तर, सरगुजा, बिलासपुर, रायगढ़, राजनांदगांव मं अइसन कतको बुद्धिजीवी कलाकार  भरे परे हे, पढ़े-लिखे नइहे फेर कला, संस्कृति, बोली भाखा मं शहरी क्षेत्र ले तो गंवई क्षेत्र मं जादा हे कोनो ओकर हियाब करइया नइ हे । ये बात के जानकारी संसदीय सचिव कुंवर सिंह निषाद के मारफत मिलिस। 

तीसर सत्र के चरचा गोष्ठी मं डॉ. परदेशी राम वर्मा, डॉ. सविता मिश्रा अउ सेवक राम बांधे  अपन-अपन विचार रखिन। एकर बाद कवि सम्मेलन मं प्रदेशभर ले आए कवि मन अपन-अपन कविता पाठ करिन, कार्यक्रम के समापन राजभाषा आयोग के अनुवादक सुषमा गौराहा के आभार प्रदर्शन  ले होइस।

जाती बिराती

बाग बगइचा दीखे ले हरियर 

हां...हां... दीखे ले हरियर,

मोर डोगहार नइ दीखत हे

बदे हां नरियर हां...हां...होरे।

रविवार, 6 अगस्त 2023

कोनो ल चांटी चाबत हे तब मैं का करौं?

कुछ लोगों की आदत होती है, चुपचाप नहीं बैठ सकते। हर क्षेत्र में इस तरह के लोग होते हैं। आड़े-तिरछे काम, बात, व्यवहार, आचरण करते रहते हैं जो पीड़ादायक होते हैं, असहनीय और अशोभनीय होते हैं। समाज, परिवार और देश की संस्कृति, सभ्यता, भाषा, बोली और धर्म के विरुद्ध होते हैं। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख-। 

आजकल बइठे-ठाले लोगन मन ल बरपेली चांटी चाबत हे, तब बिछियावत ओकर झार ले सुसुवात हे, कोनो-कोनो ल कांटा गड़त हे तब ओमन करलावत हे, कोनो ल बात के तीर लगत हे, तब जहर खाये कस मरत हे, छटपटावत हें, का करन कइसे करन? सब अपन-अपन ले अपने आप मरत हे। अपने खुद के बुने जाला मं जइसे मकड़ी फंस जथे अउ उबरे के कोनो चारा या जुगाड़ नइ दीखय तहां ले फंस के मर जथे, तइसने कस आज हाल मनखे मन के होवत जात हे। कोनो थिरथार, चुपचाप रेहे नइ सकत हे। एक-दूसर ल कोचकत रहिथें, हुदरत रहिथे। सहत ले सहिथे अउ जहां मुड़ी ले ऊपर पानी चढ़े ले धरथे, अकबकाय असन लगथे तहां ले उबरे बर, परान बचाय बर तो हाथ-गोड़ मारे ले परथे। आज समाज के वइसने कस हालत होगे हे। इही सब बात ल गुनत उधो गुड़ी चवरा  कोती जात रहिथे, तब बीच रस्दा मं माधो के मुख्तियार मिलगे। ओहर पूचथे- या उधो, कहां जाथस जी?

राम... राम... ददा, राम... राम..., अरे माधो करा जाथौं रे भई, थोकन काम हे। सियनहा अकन राहय मुख्तियार तउन ला राम रमउआ करे के बाद उधो, ओला बताथे। 

- कइसे कुछु काम हे गा, मुख्तियार उधो ल पूछथे ? 

- का, कामेच रइही, तब कोनो ककरो दुआरी मं जाही गा, अइसे बिन काम के नइ जा सकय? उधो

मुख्तियार ल अइसन लगिथे के उधो ओकर सवाल जउन करिस तेला रिस मानगे। ओहर कहिथे- अइसे बात नइहे उधो, तोर तो ओहर संगवारी हे, मितान हे गा अउ तैं तो ओकर भक्त घला हस। तैं तो कभू आ-जा सकथस। तोर बर तो सदा ओकर दरवाजा खुले हे। 

उधो कहिथे- जब सबो बात ल तैं जानत हस तब तिखारे के का जरूरत?

मुख्तियार चेथी ल खजुवावत अउ बात मं ओला अइसे लगथे के अरझगेंव, तब कोरमावत उधो ल कहिथे- अइसे बात नइहे, बात दरअसल ये हे के तोर चेहरा मं थोकन चिंता के लकीर देखत हौं तब पूछ परेंव।

अरे इही तो बात हे, इकरे समाधान करे खातिर तो माधो करा जात हौं। मुख्तियार ल उधो  ह जउन सोचत-विचारत आवत रिहिसे रस्दा भर तउन बात ल ओकर करा उछर (उगल) दिस। 

मुख्तियार कहिथे- ले चल, महूं जाथौं ओकरे करा। 

दूनो गोठियावत-बतावत माधो के दरबार मं हाजिर हो जथे। देखते साठ माधो ओला पूछथे- अरे उधो, तैं कहां  गे रेहे अतेक दिन ले, तोर अता-पता नइ चलत रिहिसे। 

अब तोला का बतावौं माधो, मैं तोरे असन ठेलहा तो नइहौं। मैं देश-दुनिया, ये गांव ले ओ गांव, ये शहर  ले ओ शहर, ये मंदिर ले ओ मसजिद, ये गियानी, ओ धियानी। सब जघा घूमत-फिरत रहिथौं। 

माधो पूछथे- तब सब जघा के हाल-चाल बने-बने हे न?

का बने-बने ल कहिथस माधो, मणिपुर बरत हे, जरत हे, पूरा सतियानास होगे हे परदेस हा, कानून बेवस्था सब छर्री-दर्री होगे हे, परदेश अउ केन्द्र सरकार दांत ल निपोर दे हे, पुलिस अउ सेना घला हथियार डार दे हे, कुकी अउ मैतेयी दू समुदाय के झगरा अतेक बाड़गे हे के कौरव-पांडव के लड़ई बरोबर महाभारत मचे हे। 

उधो के बात ल सुनके माधो के माथा चकरागे, का अतेक गदर मात गेहे मणिपुर मं? तब केन्द्र अउ राज्य सरकार का करत हे, योगी महराज जइसे बुलडोजर नइ चला देतिस? सब के होश ठिकाना आ जतिस?

उधो कहिथे- काला का कहिबे माधो- ओमन तो बने घर के घर के उझरइया हे, बने सरकार के तोड़फोड़ करके, गुना-भाग करके अपने पारटी के सरकार बनाय मं लगे हे। दूसर ल खात-पीयत नइ देख सकय तउन का अइसन समस्या ल देखही ?

अउ हां एक ठन बात हे मितान, बइठे-ठाले ए मन ल घलो कइसे चांटी चाबत रहिथे? उधो के बात ल सुनके माधो पूछथे- कइसे का बात होगे तेमा ?

अब तोला का बात ल बतावौं माधो- ओ दिन आसरम मं परवचन सुने ले जा परेंव। उहां दुवारी मं पोस्टर लगे हे तेमा लिखे हे के आसरम जउन परवचन सुने बर आवत हौ, तउन मन कपड़ा बने ढंग के पहिर के आय करौ। इशारा सीधा बेटी, बहू अउ गोसइन जवान बेटा मन ऊपर जादा रिहिसे। 

मोर कहना ये हे माधो के इही पहिनावा-ओढ़ावा के बात ल लेके कई घौं महिला मन हंगामा कर चुके हे, देश के कतको विद्यालय अउ स्कूल मं पढ़इया बेटी मन घला सड़क मं उतरगे हे। एक समुदाय विशेष मन तो धर्म के मुद्दा बनाके बवाल घला खड़ा कर दिन हे, अइसन गंभीर मुद्दा ऊपर हाथ नइ डारना चाही, नइते नागराज मन फुफकारबे करही, डसबे करही। 

देख उधो, तैं बतावत हस तउन सबो बात सही हे, माधो कहिथे- ये सब समस्या के समाधान शांति हे। बिन पानी छिड़के आगी बुतावय नहीं। ये देश के समस्या विकराल होगे हे। सब सुवारथी, लोभी, दंभी अउ अहंकारी होगे हे। पद प्रतिष्ठा अउ सत्ता कईसे मिलय इकरे सेती सब छटपटावत हे। कोनो ल चांटी चाबत हे, कोनो ल सांप डसत हे तब कोनो ल बात के तीर मारके अइसे घायल करत हे के ओहर पानी नइ मांग सकत हे। 

उधो पूछथे- तब अइसे मं कइसे होही माधो, का करे ले परही?

माधो कहिथे- कुछु करे ले नइ परय, बस चुपचाप देखते राह, आघू... आघू होवत हे का?

परमानंद वर्मा


रविवार, 28 मई 2023

मर जा... मर जा..., मत जा... मत जा...!

 सुनो भाई उधो\]

'मर जा... मर जा..., मत जा... मत जा... प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आजकल हरेक जनसभा में यह जुमला प्राय: उच्चारित करते रहते हैं। यह किसी चन्द्रास्वामी जैसे विख्यात तांत्रिकों, गुरुओं अथवा बाबाओं  से हासिल किया गया मंत्र-तंत्र है अथवा जनता को प्र्रभावित करने का कोई कोड वर्ड। इसके उच्चारण मात्र से ही विरोधी दलों के हौसले पस्त हो जाएंगे और जनता की तालियों की गडग़ड़ाहट से सत्तारुढ़ दल की सफलता उसकी झोली में होगी। इसी तरह का प्रयोग कभी अली बाबा चालीस चोर, राजाओं  व नवाबों खजानों को लूटने  में किया करते थे। बस 'खुल जा सिम-सिम, सिम-सिम, सिम-सिम उच्चारित करते थे। खजाने का दरवाजा खुल जाता था। एटीएम से नोटों की गड्डियां निकालने के लिए भी इसी तरह का ‘कोड वर्ड’ प्रयोग में लाया जाता है। यहाँ पेश है 'मर जा... मर जा..., मत जा... मत जा...  नामक छत्तीसगढ़ी आलेख।  

हमर देश के परधान मंतरी नरेन्द्र मोदी जिहां जाथे तिहां के आमसभा म जनता मन ला संबोधित करत एक ठन अलकरहा बात कहिथे माधो, मोला अच्छा नइ लगय। दुख लगथे। अतेक बड़े नेता अउ अइसन बात?

फेर का बात होगे उधो, माधो ओला पूछत कहिथे- जब कभू मोर करा तैं आथस तब सादा-सरबदा विचार, भाव अउ हिरदय लेके नइ आवस। उटपुटांग अउ अलकरहा बात ल धर के आथस अउ हर्रस ले पथरा कचारे असन मोर आघू मं पटक देथस। हां, बता का बाते तउन ला?

माधो बताथे- परधान मंतरी हा कहिथे- ये देश के विरोधी दल वाले मन मोला, मोर सरकार के रीति-नीति, कामकाज ल पसंद नइ करयं। मोला सरकार ले बेदखल करे के नाना परकार के षड़यंत्र करथे अउ कहिथे- मोदी मर जा... मर जा... फेर तुंहर मन के आसिरवाद अउ पियार हा मोर ताकत हे अउ एकरे सेती तुमन कहिथौ- मोदी मत जा... मत जा... मत जा...  इही बात ल ओहर सभा मंच ले दू-तीन घौं दुहराथे। एला सुन के जनता खुश हो जथे अउ ओकर मन के ताली के गडग़ड़ाहट ले आकास गूंजे ले धर लेथे।  

उधो पूछथे- अब तहीं बता माधो, ओला अइसन मर जा... मर जा..., मत जा... मत जा... कहना चाही? 

माधो कहिथे- तोला का लगथे?

उधो बताथे- मोदी जरूर कोनो सिद्ध साधु-महात्मा करा ले संजीवनी बूटी कस ये तंत्र मंत्र 'मर जा... मर जा..., मत जा... मत जा... दक्षिणा मं पाय होही। उही ला जनसभा मं पाठ करे बरोबर पढ़थे। मोला तो दाल मं काला लगथे माधो। 

उधो के बात ल सुन के माधो हांस परथे तब ओहर कहिथे- ये हांसे के बात नइहे माधो, ये जतका बड़े पद मं रहिथे न तउन मन अइसने सिद्ध जोगी बबा अउ तांत्रिक मन ल पाल के रखथे। 

माधो ल बतावत उधो कहिथे हमर देश मं चंद्रास्वामी नांव के बहुत बड़े तांत्रिक होगे हे। पूर्व परधान मंतरी इंदिरा गांधी ल ओहर बड़े-बड़े मंत्र दे रिहिसे। तभे अतेक साल ले ओहर देश मं अकंटक राज करे रिहिसे। मोला तो भुस-भुस जाथे कहूं वइसने कस नरेन्द्र मोदी घला हा तो नइ कोनो तांत्रिक अउ सिद्ध बबा करा ले जादू के तंत्र मंत्र पागे होही?

माधो कहिथे- तैं बइहागे हस, तोर मन के भरम हे। वइसन कुछ नइहे मोदी हा। साफ-सुथरा नेता हे। ओकर सफलता देख के विराधी दल के नेता मन के आंखी फूटत हे। 

ओ दिन के बाद उधो लहुट के चल दिस अपन घर। चार-आठ दिन बाद फेर बीरबल कस विनोदी सुभाव के परिचय देवत राज दरबार कोती पहुंचथे। 

एक पचरंगा डोले डोल

दुई पंचरंगा डोले डोल

तीन पचरंगा डोले डोल

चार पचरंग डोले डोल। 

'ये का पचरंगा  डोले डोल, लगा देहत, ये हाथ मं का खंजेरी धरे बजावत किंजरत हस अउ चूंदी कइसे जटर-बटर साधु बैरागी कस बगरा डरे हस। कोनो देखही त पूछही, ये कहां के झुलपाहा आय हे, ये गली ओ खोर भटकत हे।

माधो, उधो ल पूछथे, तब ओहर बताथे, अब तोला का बताओं माधो- अब तोर ओ जमाना नइ रहिगे जब कदम तरी बइठ के बंसरी बजावस तब सब गोप-गुवालिन सब काम-बुता ल छोड़ के तोर करा पहुंच जाय। का जादू मंतर डारे रेहे तोर बंसुरी म, ओ बात आज तक मोर समझ मं नइ परिस?

तब ओला समझ के, जान के का करबे उधो, तैं तो साधु, जोगी, गियानी, तोला जादू-मंतर ले का लेना-देना?

उधो कहिथे- मोला लेड़हार झन माधो, महूं हा कुछु सीखना, जानना अउ समझना चाहत हौं। 

ओ चक्कर मं झन पर, ये माया के खेल हे, राजनीति, कूटनीति अउ धरम नीति के बात हे। तैं तो परम गियानी हस, तैं तो ये सबो बात जानत हस, फेर मोर करा पूछे के का जरूरत?

माधो के बात ल सुनके माधो कहिथे- अइसने तो कहि के नारद ल भुलवार दे रेहे, कतेक सुंदर सपना देखे रिहिसे। 

अच्छा... अच्छा... अब धीरे-धीरे तोर बात समझ मं आवत हे उधो के तोर मनसा का हे, काबर तैं खंजेरी धर के बजावत अउ गावत ये गली ले ओ गली गिंजरत हस ? 

अउ हां... माधो पूछथे- ये 'एक पंचरंगा डोले, डोल, दुई पंचरंगा डोले डोल कोन फिलिम के गाना हे। आजकल तोर छत्तीसगढ़ मं किसम-किसम नांव के फिलिम बनथे कइके सुने हौं। जइसे- जिमी कांदा, शुरू होगे परेम कहानी...

अउ हां... माधो फेर पूछथे- अरे ओ एक झन छत्तीसगढ़ी गायिका हे सीमा कौशिक, ओला तैं जानथस का?

वाह, ओला कइसे नइ जानिहौं, माधो, मोर खियाल से, सलाह हे के राज दरबार के गायिका बनाय मं कोनो हरजा नइहे। ओकर एके गाना अइसे हिट होगे के पूरा छत्तीसगढ़ ल कोन काहय मुंबई के बड़े-बड़े संगीतकार मन ओकर आवाज के दीवाना होगे। 

माधो पूछथे- अच्छा तब का सुर सम्राज्ञी लता मंगेश्कर, आशा भोसले, नूरजहां मन ले घला सुंदर आवाज हे?

उधो कहिथे- तैं एक घौं सुनबे न माधो तब बंसुरी ल एक कोती तिरिया देबे। ओकर सुर मं ओं जादू हे के जब ओहर गीत गाये ले धरथे तब शमा ल देख के जइसे परवाना मन झपाय परथे ओकर ऊपर वइसने छत्तीसगड़ के जतेक गीत-संगीत के रसिक परेमी हे  तउन मन छपाए परथे। 

अतेक जादू हे, ताकत हे। तब वइसने कस तहूं बनिहौं, कहिके सोचत हस का? उधो कहिथे- नहीं माधो, मोर चिंता फिकर दूसर हे। 

भला बताबे माधो- का गांव, का शहर, का देश, का राजनीति, कूटनीति, धरम नीति, आरथिक नीति सब जघा जादू मंतर चलत हे। 

फोरके बता न साफ-साफ का जादू मंतर चलत हे? माधो के सवाल ल सुनके उधो बताथे- तैं मोर बात लन नइ पतियाबे, फेर बात सोलह आना सही हे। हमर देश के परधान मंतरी ल कोनो सिद्ध महात्मा एक ठन मंत्र देहे अउ केहे के, ए मंत्र ल जनसभा होही तिंहा बोले करबे, पूरा जनता तोर पक्ष मं हो जही। ओ मंत्र का हे उधो , बता तो मोर मन अकुलावत हे ओला जाने बर? 

उधो बताथे- 'मर जा... मर जा..., मत जा... मत जा...

माधो खिलखिला के हांस परथे अउ कहिथे- ये कोनो मंत्र हे उधो, मही मिलेंव तोला एक झन मुरख बनाय बर?

ये मंत्र तोला  छोटे दीखत हे, फेर हे भारी ताकत हे एमा। जब सभा मं ए मंत्र ल पढ़थे तब ताली के गडग़ड़ाहट अइसे लगथे जैसे आकाश मं बिजली गरजत हे। वइसने कस ताकत मोर एक पचरंगा डोले-डोल कस मंत्र मं हे। अतके बेर सीबीआई अउ इ.डी. के पुलिस गाड़ी आथे तहां ले उधो अउ माधो ओ तिर ले दफा हो जथे।

-परमानंद वर्मा

रविवार, 23 अप्रैल 2023

सुनो भाई उधो .....तै ठाढे राह मै आवत हौ .......

परमानंद वर्मा

भारत देश की दुर्दशा पर भगवान श्रीकृष्ण और उद्धव के बीच एक रोचक संवाद  होता है। देश में अनीति , अन्याय, आतंक, अराजकता, भ्रष्टाचार, अत्याचार धर्म के आड़ में पाखंड, राजनीति से नीति गायब और राज (सत्ता) हथियाने के लिए धमाचौकड़ी, यही हाल अर्थ तंत्र और न्याय तंत्र में भी परिलक्षित हो रहा है। महंगाई में जनता पीस रही है। सर्वत्र त्राहि-त्राहि और हाहाकार मचा हुआ है। भगवान उद्धव से कह रहे हैं- उद्धव जब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है तभी मैं अवतार लेता हूं और वो समय आ गया है। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख। 

भगवान श्रीकृष्णचंद्र मथुरा मं राज दरबार मं बइठे हे। चेहरा मं उदासी के भाव, चिंता फिकर के रेखा मस्तक मं साफ झलकत राहय। कोनो कोती ले उधो (उद्धव) दरबार मं जब पहुंचथे तब महाराज हाथ जोर के जोहार करथे। आज भगवान के चेहरा, मस्तक मं ओ खुशी अउ मुस्कुराहट नइ दीखत रिहिसे जइसन कभू दीखय। 

उधो सोचथे का बात हे, मुरली मनोहर के   होंठ मुस्कुराहट  ल छोड़के कोनो बाग-बगीचा मं फूल के मकरंद कोती तो नइ चल देहे किंजरे बर? नहीं... नहीं... अतेक बड़े अपराध तो नइ कर सकय। मान लो भगवान ल मुरली के तान छोड़े के सुध आगे त बिना होंठ के कइसे तान छेड़ही। 

उधो सोचथे, जरूर कुछ न कुछ बात जरूर हे, एकर पता लगाय ले परही। अइसन उदासी, खामोशी अउ मुरझावत चेहरा मैं नइ देख सकौं। कहूं राधा, रुखमणि अउ सत्यभामा मिलगे अउ भगवान के कुशलक्षेम पूछ परिस तब ओमन ल मैं का बताहौं?

उधो सोचथे- बड़ा मुसीबत हे। मुड़ी ल खजुवावत, सोचत-विचारत रहिथे। का करौं, कहां जांव, काकर से ये बात के दरियाप करौं के भगवान आज उदास काबर हे? अइसे तो नहीं के कोनो पटरानी मन कुछु उल्टा-पुल्टा गोठिया परिस होही, जइसन बात नइ कहना चाही?

फेर सोचथे- नहीं, कोनो अइसन वइसन बात नइ केहे सकय भगवान से अउ मने मन कहिथे- अरे का भरोसा नारी परानी मन के छेरी असन मुंह तो चलत रहिथे। ये जीभ तो आय, कहूं फिसल गिस होही, द्रौपदी सही। का कहना रिहिसे अउ का कहि परिस, उठेंवा मारे असन कांही बोल परिस होही, जउन बात ल भगवान धर लिस होही। 

गोसइन मन के बात वइसने तो होथे। बने गोठियावत हन कहिके फेर तरी-तरी अइसे बिच्छी मारे असन बात के तीर चला देथे के ओ तीर वइसने छाती मां जाके चुभ जथे, जइसे महारानी कैकेयी के मारे बात के बान राजा दसरथ ल लग गे। उबर नइ सकिस बपरा गरीब राजा दसरथ। सहे नइ सकिस ओ तीर के दरद ला, अउ एक दिन तियाग दिस अपन तन ला। 

उधो के पांव न भगवान कोती आघू बढ़ सकत हे, न पाछू घुंच सकत हे। का करौं, का नइ करौं इही सोचत-विचारत माधो जेने-मेर के तेने मेर डोमी सांप जइसे मुढ़ी मार के एक तीर रुक रहिथे, वइसने हाल ओकर होगे राहय। भगवान से नजर तक नइ मिला सकत रिहिसे। ओहर देखही अउ पूछही तब का बताहौं, का गोठियाहौं, का जवाब देहौं, इही संसो धर खात रिहिसे। 


लीलाधारी भगवान श्री कृष्ण उहू तो बड़ा नटखट हे। देखत रिहिसे मन मं तमाशा, के उधो कइसे आघू बढ़त हे न पाछू घुंचत हे। बोलत-बतावत घला नइहे। मुक्का कठपुतली असन खड़े हे। उहू मने-मन सोचत हे, राह उधो तैं कतेक बेर ले अइसने मुक्का रहिबे?

भक्त वत्सल भगवान, ओकर मन के भाव ल जानगे के एकर मन मं का विचार चलत हे। सिंहासन ले उठ के ओकर तीर आथे, छाती लगाके पूछथे- हे सखा उधो, कहां, कोन सोच विचार मं खो गे रेहे। अइसन हाल तो मैं तोर पहिली बार देखे हौं।

भगवान मुरली मनोहर ल मुसकुरावत जब उधो ओला देखिस तब ओकर आंखी कोती ले परेम के आंसू बोहाय ले धर लिस। ओकर ये दशा ल देख के नंद नंदन पूछथे- का बात हे सखा?

उधो सब बात ल पलट देथे अउ उलट के पूछथे- भगवान तैं मोला पुछत हस मोर दशा? तैं अपन ल बता- तैं कइसे आज उदास, परेशान अउ बेचैन दीखत हस? तोर इही दशा ल देखके मैं सुकुरदुम होगेंव। सदा गुलाब, कमल फूल सही खिले अउ मुसकुरावत चेहरा संझाती के बेरा मुरझाय फूल असन कइसे दीखत हे?

उधो कहिथे- अइसे तो नहीं के भगवान ला गोकुल के अपन ब्रजभूमि के सुरता आगिस होही, नंद बाबा अउ जसोदा मइका के सुरता आगिस होही, गोप-गुवालिन मन के सुरता आगिस होही, गउ माता, जमुना के घाट अउ बचपन मं कदम के पेड़ तरी जउन खेलकूद, चुहउल, डंडा नाच, अउ दही लूट, मटकी फोर, माखन चोरी सब एक-एक करके सुरता आगिस होही। उहू सुरता आवत होही ये सबो झन ला मैं जल्दी मुथरा ले लहूट के आहूं केहे रेहेंव, अउ नइ गेंव। लबारी मार दिस, भुलवार दिस लइका मन सही, इही सब सोचत होही। इस सोच मं भगवान बुड़े रिहिस होही?

अंतरयामी भगवान उधो के मन के सबो बात जानगे। ओला राज दरबार मं लाके ओकर जउन आसन हे तेमा बइठारथे। तेकर बाद कहिथे तोर सबो बात सही हे, फेर आज जउन बात मैं सोचत रेहेंव ओ अलग हे। 

उधो पूछथे- ओ चिंता अउ फिकर के अइसे कोन से बात हे भगवान जउन तोला धर खाथे? थोरकिन ओ बात ल साफ-साफ बताते। 

सुन उधो- मोला भारी चिंता सतावत हे, मोर भारत देश के। उहां अधरम बाढ़गे हे। पापाचार, भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार अतेक बढ़गे हे अउ बढ़ते जात हे, दिन दूनी रात चौगुनी। जेकर हाथ मं राज सत्ता होय, धर्म सत्ता हे, अर्थ सत्ता, नियाव के सत्ता हे, ये चारों पाया देश, समाज अउ जनता के सुरक्षा के नींव होथे। ओ चारों पाया आज डगमगाय ले धर ले हे। एमन अतेक मनमानी करत हे- 'करही अनीति जाय नहीं बरनी कस। 

उधो ला कहिथे भगवान हा- तैं तो जानत हस, मोर काम ला। जब-जब होय धरम के हानि, बाढ़ही असुर अधम अभिमानी, तब-तब मैं का करथौं ?

भगवान कहिथे- उधो, मोर देश मं आज पाखंड होवत हे, धरम के नांव ले के, ओकर आड़ लेके सब अपन-अपन रोटी सेंकत हें। कोनो सत्ता मं आय के जुगाड़ करथे, तब कोनो करोड़पति, अरब-खरबपति बने के सपना देखत हे। नकली साधू-साध्वी के बाढ़ आगे हे मोर देश मं। कोनो ककरो बहू, बेटी, बहिनी अउ गोसइन ला सूर्पणखा काहत हे, तब कोनो शिखंडी। सब के जबान बेलगाम होगे हे, कैंची असन कच-कच चलत हे। मरयादा तार-तार होगे हे। धरम के रक्षक मन जब भक्षक होगे हे तब जनता ला कोन बचाही। सब त्राहि-त्राहि करत हे। 

उधो पूछथे- तब एकर का उपाय हे भगवान, भारत के बूड़त बेड़ा ला कोन बचाही, पार लगाही। चिंता मत कर उधो- मोर देश के अइसन दुरदशा नइ देख सकौं, बहुत जल्दी मैं अवतार लेवइया हौं, अउ पापी, दुराचारी, अधरमी, भ्रष्टाचारी मन के नाश करके धरम के इस्थापना करिहौं। सबके के दुख-पीरा ल हरिहौं। अउ हां, तै जा, ये बात के सब जघा ढिंढोरा पिटवा दे, तै ठाढे राह मै आवत है। सत्यमेव जयते, सत्यम् शिवम् सुंदरम् अउ अहिंसा परमो धर्म: के रखवार ये धरती मं जल्दी अवइया हे।

परमानंद वर्मा

मंगलवार, 21 मार्च 2023

टेढ़े-मेढ़े रास्ते



कांटा जब पैर में चुभता है तब दर्द तो होता ही है, बिछुआ जब डंक मारे अथवा सर्प डस जाय तब तन, बदन व्याकुल हो जाता है। अचेतावस्था की स्थिति भी आ जाती है और कभी-कभी तो ऐसे व्यक्ति की मौत भी हो जाती है। दवाइयां और डॉक्टर के प्रयास धरे के धरे रह जाते हैं। 

मनुष्य का जीवन भी सरल और सपाट होता है। युवावस्था तक निश्छल मन से समय गुजर जाता है। राग-द्वेष, न छलकपट, न काम और क्रोध की स्थिति। लेकिन इसके बाद ैजसे-जैसे जीवन उत्तरोत्तर पायदान तय करता है तब स्थिति और परिस्थिति वह सब सबक सिखाने लगता है जिससे वह लगभग अनभिज्ञ रहता है। समाज, देश, काल में घट रहे वारदात व वातावरण भी मन-मस्तिष्क पर प्रभाव डालने लगता है। जो बातें व ज्ञान विद्यालयों और महाविद्यालयों में नहीं मिलता वह सब धीरे-धीरे समाज, घर-परिवार के सदस्यों के व्यवहार सिखा देता है और यहीं से वह सीख-समझकर अपना आचरण व व्यवहार का निर्माण करता है। 

अब यदि परिवार का कोई सदस्य भ्रष्टाचारी है, कदाचरण करता है, मां अथवा बहनों का आचरण व व्यवहार ठीक नहीं है, तब इसका व्यवहार बेटे अथवा बेटियों पर क्या पड़ेगा ? समाज व देश में अनैतिक कार्य हो रहे हैं सत्ता के लिए राजनीतिकों द्वारा दूसरे दलों के प्रतिनिधियों की खरीददारी, तोडफ़ोड़, इसका भी प्रभाव शुद्ध व सात्विक जीवन जीने का सपना संजोये युवकों पर पड़े बिना नहीं रह सकता। यही हथकंडा तो आगे चलकर वह अपनाएगा। राजनैतिक शुचिता की जगह तोडफ़ोड़ कर सत्ता हथियाने की होड़ ने देश, समाज व काल को कलुषित करने पर आमादा कर दिया है। सत्ताधारी दल के सदस्यों को धन का लालच देकर या यों कहें उन्हें खरीदकर निर्वाचित सरकारों को गिराकर स्वयं सत्तासीन होने पर षडयंत्र, किसी के भी मन पर प्रभाव डाले बिना कैसे रह सकता है। सब कहते हैं यह गलत हो रहा है, घिनौना कार्य है, प्रजातंत्र के माथे पर धब्बा है, कलंक है लेकिन कौन सुनता है? यह भी एक तरह का राजनैतिक आतंकवाद है, सत्तासीन दल का। निर्वाचित सरकारों को गिराने का षडयंत्र एक तरह से पाप नहीं है तो और क्या है? 

इसी तरह की कुटिल और घिनौनी चालें औद्योगिक प्रतिष्ठानों में भी देखी जा सकती है कि किस तरह दूसरे उद्योग को कमजोर करने की प्रतिस्पर्धा और एकाधिकार प्राप्त करने की होड़ ने अर्थजगत में भी कोहराम मचाया हुआ है। इस गलाकाट स्पर्धा से देश व समाज को भी नुकसान होता है। आर्थिक आतंकवाद भी देश व समाज में अपनी गहरी जड़ें जमा चुका है। जिन उद्योगपतियों की सरकारों से मिलीभगत होती है, दोस्ती होती है उसका उद्योग, व्यवसाय चांदी काटने लगता है। दिन दूनी, रात चौगुनी मुनाफा कमाने लगता है और देखते ही देखते ऐसे उद्योगपति रातों-रात अरबपतियों की श्रेणी में आ जाते हैं। देश-विदेश में इनका औद्योगिक  प्रतिष्ठानों का जाल फैल हो जाता है। कैसे इनके पास इतना धन आ जाता है, हर कोई जानता है। इन लोगों के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं होती कि देखते ही देखते धन कुबेर बन जाए। बैकों का घोटाला सरकारी संसाधनों का दोहन करने वाले, बेनामी संपत्ति के मालिक बनने वाले ऐसे लोगों पर सरकार का वरदहस्त होता है। बिचौलिये और दलाली में इनके कारिंदों का ही हाथ होता है। 

आज स्थिति यह है कि सीधे रास्ते से कोई सफर नहीं कर सकता और करने की कोशिश करता है तो उसे डंडी मारकर गिरा दिया जाता है। कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जो साफ-सुथरा हो। हर क्षेत्र चाहे वह प्रशासनिक हो अथवा शैक्षणिक, न्यायिक व धार्मिक, वहां कदम रखते ही अव्यवस्था, अराजकता व पाखंड की बू आती है। काजल की कोठरी की तरह बन गया है पूरा देश-विदेश। इस दम घोटू परिवेश में आज का नौनिहाल जब कदम रखने को सोचता है तो उसे समझ में ही नहीं आता कि कौन सा रास्ता अख्तियार करे। जब घर-परिवार का ही परिवेश साफ-सुथरा नहीं है और उसकी नजर सब कुछ कलुषित दिखता है तब समाज व देश-विदेश के बारे में उनके मन पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह विचारणीय है। इस तरह के टेढ़े-मेढ़े रास्ते को देखकर आज की युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित नहीं होगी, उसके लिए जिम्मेदार कौन? सर्प जब रेंगता है तो सीधा ही टेढ़े-मेढ़े रेंगना उसे पसंद नहीं। क्या हम और हमारा समाज व सरकार सर्पों से भी गए गुजरे हो गए हैं? 

जिंदगी का सफर इतना आसान नहीं है कि राह चलते मंजिल मिल जाए। बड़ी-बड़ी बाधाएं, रुकावटें, पहाड़ सी समस्याएं, दुर्गम व टेढ़ी-मेढ़ी रास्ते से गुजरना पड़ता है। बड़े लोगों की तो बड़ी बातें होती है वे चौसर और शतरंज की बाजियां जानते हैं, उनकी बाधाओं को दूर करने के लिए अनेक मददगार सामने आ जाते हैं लेकिन जिन लोगों ने अभी-अभी अपना कैरियर बनाना शुरू किया है, उनके कोई गाड फादर नहीं होते, कोई मित्र और मददगार नहीं होते, ऐसे लोग उदास, निराश हो जाते हैं। अनेक क्षेत्रों से इस तरह की खबरें आती हैं। वे डिप्रेशन में चले जाते हैं। और तो औार अपने लोग ही धोखेबाज और ठग की भूमिका में आ जाते हैं। कैरियर बर्बाद होने की स्थिति आ जाती है तब दुखी मन में ऐसे लोगों को आत्महत्या जैसे घृणित कार्य के लिए विवश हो जाना पड़ता है। इतना सुंदर सुखमय जीवन जिसको जीना चाहिए, निर्माण करना चाहिए, वह नरक बन जाता है। यह सिलसिला जारी है, कब थमेगा, रुकेगा, बंद होगा किसी को नहीं पता ?

परमानंद वर्मा 

बुधवार, 15 मार्च 2023

रोना, कभी नहीं रोना

रोना, यह अच्छा गुण नहीं है लेकिन लोग रोते हैं? क्यों रोते हैं, किसके लिए रोते हैं, क्या मिलता है रोने से? क्या रोना  है, कहां तक उचित है? इतने ढेर सारे सवाल, एक साथ मानस पटल पर उभरना आश्चर्यजनक है और उतना ही मुश्किल है उसका उत्तर ढूंढ पाना, एकत्र कर पाना। 

जहां तक मुझे याद है, रोने से मैं कतराता था, बचने की कोशिश करता था। स्थिति, परिस्थितियां कभी-कभार ऐसी निर्मित हो जाया करती थी तब ऐसा लगता था, मन द्रवित हो गया है और अब तब रो पड़ूंगा लेकिन इससे बचने के लिए घर से बाहर निकल जाता था और ऐसी जगह पहुंच जाता था जहां लोगों की भीड़ हुआ करती थी। बच्चे अथवा साथी मैदान में केलकूद कर रहे होते थे और फिर क्या था, उन लोगों की टीम में शामिल होकर खेलने लग जाता था। इसका फायदा यह होता था, मनसा में आने वाला भावाभिव्यक्ति अथवा द्रवित होने वाले विचारों का शमन हो जाता था, और बच जाता था रोने से। मुझे याद पड़ता है, तीस-पैंतीस सालों में कभी रोया नहीं। रोने पर विजय प्राप्त कर लिया था। बचपन से गुरु दीक्षा ले लिया था, जिसका फायदा मिला, कुछ-कुछ साधना भी किया करता था जिसका लाभ मिल रहा था। 

लेकिन एक दिन ऐसा भूचाल आया कि सारा ज्ञान, साधना का कचूमर निकल गया। पूजा करके उठा ही था कि इसी दौरान गांव से सूचना आई कि पिताश्री नहीं रहे। इस सूचना से विचलित तो नहीं हुआ और तटस्थ भाव से सूचना देने आने वाले व्यक्ति के साथ गांव के लिए रवाना हुआ। साइकिल पर जा रहा था, पीछे बैठा था, साइकिल चालक से कोई बातचीत नहीं। लेकिन मन झकझोर रहा ता। कभी कहता रोना नहीं है, आने वालों को तो एक दिन जाना ही होता है, सभी लोग चले जाते हैं चाहे वह राजा हो, रंक हो, फकीर हो, अथवा आम आदमी। तुम्हें भी  एक दिन इस संसार से विदा लेना होगा। यह तो रंगशाला है, सब अ्भिनय करने वाले लोग होते हैं। पिताश्री का रोल खत्म हो गया और चला गया। तर्क-वितर्क, विचारों का उधेड़बुन, ऐसा लग रहा था जैसे संग्राम चल रहा हो। लेकिन इस संग्राम में आखिरकार मुझे पराजित होना पड़ा, मेरे आंखों से आंसू बच्चों की तरह नदियों के पानी की तरह झर-झर बहने लगे। घर पहुंचते तक यही स्थिति रही। मन ने कहा- देखो, पिताश्री की याद ने तुम्हें रूला दिया ना. 

हां, मैं पराजित हो गया और यह 'रोना ने विजय प्राप्त कर लिया। 

बातें चल रही है लोग राते क्यों हैं, उन्हें रोना नहीं चाहिए लेकिन कभी-कभी शिकारी भी ऐसे शिकार में फंस जाता है कि उसका संकट से उबरना मुश्किल हो जाता है। ऐसी ही एक बार की बात है, एक आश्रम में प्रवचन का कार्यक्रम शुरू होने वाला था। कथा वाचक मंच पर विराजमान हो चुके थे। उसका परिचय और कार्यक्रम का विवरण देने के लिए आश्रम के प्रभारी ने माइक संभाला। वे बड़े ज्ञानी और योगी महापुरुष थे। उनके बड़े भाई का हाल ही में निधन हुआ था। कार्यक्रम का विवरण देते वक्त दिवंगत भाई का उन्हें स्मरण हो आया। उनका गला रुंध गया। पंछे से आंखों से झर रहे आंसुओं को पोंछने लगे। सभा में सन्नाटा पसर गया। कुछ देर के लिए शांति का माहौल निर्मित हो गया। श्रोताओं के बीच मैं भी बैठा हुआ था। सोचने लगा, मन में तर्क-वितर्क उठने लगा- इतने ज्ञानी, योगी, तपस्वी, साधक और संसार को ज्ञान, योग का प्रसाद बांटने वाले महात्मा के आंखों में आंसू क्यों, भाईश्री की मौत पर इनके मन में शोक की साया क्यों? जब घर-बार छोड़कर ब्रम्हचर्य जीवन यापन करने वाले महात्मा की यह स्थिति है तब सामान्य आदमी और इनमें अंतर क्या है? इनकी साधना, ज्ञान, योग और तपस्या सब निष्फल है। इससे बेहतर तो आम इंसान ही है जो सुख-दुखों के बीच जीवन यापन करते हैं। सच मुच बड़ी अजीब है यह दुनिया । कभी किसी को हंसाती है तो रुलाने से बाज भी नहीं आती। इसी बीच एक फिल्मी गीत का स्मरण हो आया। गीत के बोल इस प्रकार हैं- 'रोना कभी नहीं रोना, चाहे टूट जाए तेरा खिलौना ।  हीरो अपने बच्चे को सीने में लेकर कहता है- 'जिंदगी में कभी रोना नहीं, भले ही खिलौना टूट जाए।  बच्चों को खिलौनों से कितना प्यार होता है, इसे कौन नहीं जानता? कदाचित जाने-अनजाने में वह टूट-फूट जाए तब वह कैसे नहीं रोयेगा। अर्थात जिस चीज से जिसका प्यार होता है, लगाव और संबंध होता है और यदि उससे विच्छेद हो जाए, अंत हो जाए तब शोक भला किसे नहीं होगा? यह संसार है, बच्चा जन्म लेता है तब खुशी होती है और मर जाता है पूरे घर में मातम छा जाता है। मां बच्चे के वियोग में छाती पीट-पीटकर रोती है। इसी तरह बच्चे भी खिलौना टूट जाने पर रोते हैं। माता-पिता उसे दूसरा खिलौना लाने का आश्वासन देते हैं तब कहीं वह चुप होता है। 

प्यार, लगाव, संबंध- यही तो माया है। इसी से तो सारा संसार चल रहा है। जकड़े हुए हैं सब। जब ज्ञानी, ध्यानी भी माया के च्ककर में फंस जाते हैं तब आम जन की बात जाने दीजिए। कोई चाहे कितना भी दावा करे कि वह मोह मुक्त है, तो यह असंभव है। बिरले ही लोग मिलेंगे। इसी प्रसंग में एक वाक्या का स्मरण सुनाते हुए एक साध्वी  का 'आप बीती बता रहा हूं। इस शहर में एक कार्यक्रम के दौरान श्रोताओं को उसने बताया कि एक बार उसके जीवन में अजीबो गरीब संकट आया। वह असमंजस में पड़ गई कि अब करे तो क्या करे। नष्टोमोहा की परीक्षा की घड़ी थी। उन्हें यह दीक्षा मिली थी कि जीवन में चाहे कैसी भी परिस्थिति आ जाए लेकिन आंखों से एक बूंद आंसू नहीं टपकना चाहिए। उसने बताया कि मां के निधन का समाचार आया तब वह स्तब्ध रह गई। दूसरे दिन घर पहुंचने का बुलावा था। सोचने लगी- क्या करूं, क्या न करूं। जाना तो था, रास्तेभर ट्रेन में सोचती-गुनती रही कि मां तो मां है, उसकी बेटी हूं, संतान हूं। उसकी कोख से जन्म लिया है तब उससे  जरूर लगाव और संबंध होना स्वाभाविक है। और इधर ज्ञान में आने के बाद वह सब संबंध विलुप्त सा हो गया और एक परमात्मा से सब संबंध जोड़ लिया। लेकिन मां की याद उसकी ममता और प्यार को कैसे विस्मृत किया जा सकता है? सोचने लगी- जब उसके मृत देह और चेहरे को देखूंगी तब क्या धैर्य का बांध टूट नहीं जाएगा, कैसे नहीं छलकेंगे आंसू? लेकिन उसे इस वक्त यह स्मरण हो रहा था कि बाबा ने कहा है- बेटी, मां मरे तो हलुवा खावो, बाप मरे तब हलुवा खाना। जब मां के मृत शरीर को देखा तब मन एकदम शांत हो गया। आंखें निहारती रही, ऐसा लग रहा था जैसे कुछ हुआ ही नहीं है। यहां नष्टोमोहा की डिग्री मिल गई, परीक्षा में सफल हो गया। सचमुच रोते तो बच्चे हैं जो अनजान और अज्ञानी की तरह होते हैं, वे नहीं जानते कि खिलौने को तो एक न एक दिन टूटना-फूटना ही है। इसी तरह यह मानव शरीर है, नश्वर देह है। इसको भी एक दिन इस संसार से विदा लेना है तब इसके लिए क्या रोना-धोना, सिर पिटना?

परमानंद वर्मा

सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

जभे जागव तभे सबेरा

परमानंद वर्मा

प्रतिबंध :  सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। लेकिन अचानक ऐसा वक्त आया कि तलवार उठाना ही पड़ गया। जनसंख्या विस्फोट और महंगाई ने सारी व्यवस्थाएं चौपट कर दी जिससे समाज भी अछूता नहीं रहा। जन्मदिन, विवाह, मृत्युभोज तथा इसी तरह के अन्य उत्सव व कार्यक्रमों में फिजूलखर्ची बढ़ रही थी। डीजे, डांस, तथा अनावश्यक कार्यक्रमों से फिजूलखर्ची की जाने लगी थी, शादियों में भी दिखावे के लिए पैसे पानी की तरह बहाए जा रहे थे। सम्पन्न वर्ग के लोगों पर पैसे की बर्बादी का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था लेकिन पीसे जा रहे थे सामान्य वर्ग के लोग। इसी को ध्यान में रखते हुए लगभग सभी समाज के प्रमुखों ने कुरीतियों पर प्रतिबंध लगाने का कठोर निर्णय लिया है। इसी संदर्भ में है यह छत्तीसगढ़ी आलेख।

जइसन कभू सोचे, समझे नइ जाने रहिबे तउनो बात उदुक ले अचानचकरित हो जथे तउन ला भला का केहे जाए? अइसन होथे अउ होय घला हे। तब सब माथा धर के बइठगे हे। बात अउ समस्या आथे मुड़ी ऊपर तब सरक जथे, तब ओ समे हाथ मं हाथ धरे बइठे म तो कोनो बात नइ बनय ? रस्दा चतवारे ले परथे, वइसने कस समस्या के निराकरन करे खातिर सियान मन कदम उठाय हें। बड़ नीक लगिसे। जइसे समे तइसे काम करे मं ही भलइ हे। 

अभी होय का हे, देश के सबो समाज जइसे जैन, कायस्थ, अग्रवाल, हिन्दू, मुस्लिम सबो मं मृत्यु भोज के बेवस्था चलत आवत रिहिसे। पहिली परिवार छोटे-छोटे राहत रिहिसे, सबो झन के आर्थिक स्थिति सजोर रिहिसे। धीरे-धीरे परिवार बढ़त गिस, सबो झन के आरर्थिक स्थिति जहां चरमराय लगिस तहां ले दांत ल निपोर दिन। जतका सामाजिक बेवस्था रिहिसे तउनो लखड़ावत गिस। खान-पान, लेना-देना, बात-बेवहार, सब गड़बड़ाए ल धर लिस। बहुत अकन सामाजिक बेवस्था अइसे रहिसे जउन गैरजरूरी  असन रिहिसे फेर पूर्वज मन चला दे हे, चलत आवत रिहिसे ते पायके संकोच बस कोनो कांही नइ बोल सकत रिहिन हे। कुछ कर नइ पावत रिहिन हे। 

फेर होथे का, जब पानी मुड़ ले ऊपर बाढ़े ले धर लेथे जीव उबूक-चुबुक होय ले धर लेथे, परान छूटे ले धर लेथे तब ओ बखत हाथ-पैर मारके कइसने करके परान बचाए ले परथे। अइसने कस हाल अभी देखे बर मिलिसे। कउवागे सब, केहे ल लगिन के  समाज मं जउन कुरीति हे ओकर ले किनारा करे बिन भलई नइहे। ते पाके छत्तीसगढ़ के कतको समाज मन सादगी अउ साफ-सुथरा ले सब कारज ल निपटाय के निरनय लिन, अइसन करे ले जउन ओमन आरर्थिक तंगी ले जूझत रिहिन हे, तेकर ले छुटकारा पाय ल लगिन। 

सबो समाज मं शादी, जन्मदिन, मरनी-हरनी अउ श्राद्ध जइसन कार्यक्रम मंं उछाहे-उछाह मं मनमाने खरचा कर डरय। फेर पाछू चलके भुगते ले उही मन ल परय। पीढ़ी दर पीढ़ी तो अइसन रीति-रिवाज चलत आवत हे। जरूरत ले जादा दिखावटी कार्यक्रम मं जेकर कोनो जरूरत नइ राहय, फेर शान-शौकत मं कोनो कमी झन होवय, सोच के मनमाने रुपया, पइसा फूंक डरय। श्राद्ध अउ मृत्युभोज मं घला वइसने फिजूलखर्ची। इही सब ला रोके खातिर समाज के मुखिया मन बइठक करके ओला छोड़े के  निरनय लिन। एमा जैन समाज मं अब शादी समारोह मं कोनो पार्टी नइ होही, कायस्थ समाज मृत्युभोज पर बंदिश लगइन, मुस्लिम समाज मं शादी मं डीजे नइ बाजही। वइसने अउ समाज मन घला आघू आवत हे।

परमानंद वर्मा

सोमवार, 21 नवंबर 2022

रोटी की परिभाषा

दो -चार बुजुर्ग दोस्त एक पार्क में बैठे हुऐ थे, वहाँ बातों -बातों में रोटी की बात निकल गई..

तभी एक दोस्त बोला - जानते हो की रोटी कितने प्रकार की होती है?

किसी ने मोटी, पतली तो किसी ने कुछ और हीं प्रकार की रोटी के बारे में बतलाया...

तब एक दोस्त ने कहा कि नहीं दोस्त...भावना और कर्म के आधार से रोटी चार प्रकार की होती है।"

पहली "सबसे स्वादिष्ट" रोटी "माँ की "ममता" और "वात्सल्य" से भरी हुई। जिससे पेट तो भर जाता है, पर मन कभी नहीं भरता।

एक दोस्त ने कहा, सोलह आने सच, पर शादी के बाद माँ की रोटी कम ही मिलती है।" 

उन्होंने आगे कहा  "हाँ, वही तो बात है।

 दूसरी रोटी पत्नी की होती है जिसमें अपनापन और "समर्पण" भाव होता है जिससे "पेट" और "मन" दोनों भर जाते हैं।"

क्या बात कही है यार ?" ऐसा तो हमने कभी सोचा ही नहीं। 

फिर तीसरी रोटी किस की होती है? " एक दोस्त ने सवाल किया।

"तीसरी रोटी बहू की होती है जिसमें "कर्तव्य" और "सेवा" का भाव होता है, जो स्वाद भी देती है और पेट भी भर देती है और वृद्धाश्रम की परेशानियों से भी बचाती है", 

थोड़ी देर के लिए वहाँ चुप्पी छा गई। 

"लेकिन ये चौथी रोटी कौन सी होती है ?" मौन तोड़ते हुए एक दोस्त ने पूछा- 

"चौथी रोटी नौकरानी की होती है। जिससे ना तो इंसान का "पेट" भरता है न ही "मन" तृप्त होता है और "स्वाद" की तो कोई गारंटी ही नहीं है", तो फिर हमें क्या करना चाहिये 

माँ की हमेशा पूजा करो, पत्नी को सबसे अच्छा दोस्त बना कर जीवन जियो, बहू को अपनी बेटी समझो और छोटी मोटी ग़लतियाँ नजरअंदाज कर दो, बहू खुश रहेगी तो बेटा भी आपका ध्यान रखेगा। 

यदि हालात चौथी रोटी तक ले ही आएँ, तो भगवान का शुक्र करो कि उसने हमें ज़िन्दा रखा हुआ है, अब स्वाद पर ध्यान मत दो केवल जीने के लिए बहुत कम खाओ, ताकि आराम से बुढ़ापा कट जाये, और सोचो कि वाकई, हम कितने खुशकिस्मत हैं.......

सोमवार, 17 अक्टूबर 2022

मंगनी मं नइ मिलय मया..!

प्रेम किसी से किया नहीं हो जाता है। यह वरदान है परमात्मा का, आशीर्वाद है, कृपा है। यह खूबसूरत  तौहफा व फूल हर किसी के सौभाग्य में नहीं लिखा होता। किसी-किसी को मिलता है। कोई-कोई तो जिंदगी भर तरसते और तड़पते रह जाते हैं प्यार को पाने के लिए। प्रेम भी अलग-अलग  तरह का होता है। किसी को संगीत, नृत्य, साहित्य, धन-वैभव, स्त्री, संपत्ति से प्यार होता है तो वहीं किसान को अपनी लहलहाते हुए फसल, मां को अपनी संतान,से होता है। पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका का भी आपस में प्यार होता है। मीराबाई का प्यार तो जगजाहिर है। इसके खातिर उसने अपना सब कुछ त्याग दिया l राजमहल, वैभव, सुख - सम्पदा को छोड़ प्रेम को वरण कर लिया l  कुछ इसी तरह के प्रेम प्रसंगों का ताना - बाना  बुना  गया है l इसी  पर आधारित है यह छत्तीसगढ़ी आलेख- 

'मंगनी मं नइ मिलय मया

परेम अमरित हे, सरग हे, सुख हे। ओ हे तब संसार हे, ओकर बिगन नरक हे समशान हे। मनखे ले, ले के पशु-पक्षी अउ जतका जीव-जन्तु हे, परेम ले ही उपजथे। शमा ला देखते साठ पतंगा अइसे  बइहा जथे, परेम मं ओकर पागल हो जथे के अपन जान तक  ल होम देथे, झपा जथे. जल मर के राख हो जथे, एला कहिथे परेम। 

अइसने पशु परेम मं आसक्त एक झन संगवारी के चार-पांच ठन गाय अउ भइस ल एक घौं ट्रक हा रौंद के मार डरिस। ओ पशु मन के शोक मं ओ संगवारी बीमार परगे, खटिया धर लिस, अउ एक दिन संसार ले चल बसिस। 

बेरला तहसील मं खर्रा नांव के गांव हे। उहां फूफा राहय, उहां एक घां जाना होइस। तब का देखथौं- ओहर जतका मवेशी रिहिसे तेकर संग गोठियावय, बात करय, अउ पूछय- कइसे राम जी हो, सब बने-बने हौ न? ओकर सेवा-जतन करय, पयरा-भूसा देवय, कोटना मं धोवन सिरा जाय राहय तब फुफू ऊपर खिसियावत काहय- रामजी मन पियास मर जाही, कोटना मं हउंला-दू-हउंला पानी डार दे करौ भाई। तुंहर दरी नइ सुधरय, तब मोला बता दे करौ। दू-तीन कांवर पानी तरिया ले लाके डार दे करिहौं। अउ कोनो मवेशी बीमार पर जाय तब डॉक्टर बला के ले आनय। ओहा काहय- ये रामजी हा कइसे आंखी-कान ला लोरमा दे हे डॉक्टर साहब, बने दवा-पानी देख के दे दे भई। अतेक परेम फूफा के मवेशी मन बर रीहिस हे। 

अइसने एक दिन का देखथौं, हमर पहाटिया घर दुधारू गाय अकस्मात मरगे। ओ परिवार बर मं रोना-धोना अइसे मच गे, जना-मना कोनो सदस्य के इंतकाल होगे। ओ दिन ओकर सोग मं चूल्हा नइ बरिस। लांघन-भूखन सुतगे सब। उदुप ले पहाटिया कइसे नइ आवत हे कइके पता लगाय खातिर जा परेंव, तब जउन बात सुनेव तेला जानके सोचेंव- एला कहिथे परेम। 

राजनांदगांव शहर के बात हे। एक झन रतिहा ओकर घर मं नाग देवता निकलगे। परिवार के सबो झन सकपगाके, डर्रागे, का हो गे भगवान। पठेरा मं जा के ओहर बइठगे राहय। ककरो अक्कल काम नइ करत राहय। आखिर मं ओला लाठी पीट-पीट के मार डरिन। नागिन खोज-खोज के परेशान होगे के आखिर ओकर नाग देवता कहां गय। घुरवा तीर मार के फेंक दे राहय। तेकर ऊपर नागिन के नजर परगे। मारे गुस्सा के ओहर बिफरगे। अपन गोसइया नागदेव के मौत के बदला लेके ठानिस। एक दिन उही घर मं पहुंचगे जिहां के मन ओला मारके घुरवा मं फेंक दे रिहिन हे। फेर का हे, ओ परिवार के दू-तीन सदस्य ल ठिकाना लगा दिस। बिहनिया ओ घर मं रोवा-राई मचगे। अड़ोसी-परोसी जाके देखथे तब अकबका जथे, सुकुरदुम हो जथे। कहिथे- अइसे कइसे होगे? सब किहिन, जानगे- जा नागिन हा बदला ले लिस। पिंयार तो पियार होथे। कोनो ला ककरो पिंयार मं भांजी नइ मारना चाही। 

एला तो सब जानत अउ समझथौ, भंवरा फूल के कतेक आशिक अउ दीवाना होथे। अइसे मनखे मन घला होथे, फेर एमन मतलबी अउ सुवारथी होथे। मतलब सध जथे तहां ले तिरिया जथे, पहिचाने ले नइ धरय। तैं कोन, मैं कोने केहे ले धर लेथे। फेर भंवरा मन अइसन नइ होवय। सच्चा आशिक अउ पिंयार होथे फूल बर ओकर मन मं। 

कमल के फूल तरिया मं खिले रहिथे, जइसे बेरा चढ़थे कहां-कहां ले पहुंच जथे आशिक आवारा मन सही भंवरा मन। ओकर रूप, रंग आउ पराग के सुगन्ध मं मोहा जथे। सब ले जादा नशा फूल के सौरभ मं होथे। ओकर चुम्बन लेवत-लेवत, रसपान करत अपन सब होश ल गंवा बइठथे। चुम्बन के नशा होथे वइसने, जउन एकर जानकार होहू तउन ला समझत मं कोनो दुविधा नइ होही। गांजा कली के नशा एकर आघू मं फेल हे। 

हां तब होथे का, बइहाय भंवरा ल अतको चेत-सुरता नइ राहय के चलव अब संझा के बेरा होवत हे  चले जाय घर। छोड़े के नांव नइ लेवय, जइसे सुहागरात के दिन जोड़ी-जांवर ला होथे। नशा तो नशा हे, चाहे कई सनो नशा होवय, फूलो हा ओला नइ कहितिस जा ना अब अपन घर। समे ककरो बर रुकै नहीं। कमल के पंखुड़ी मन संझा होते साठ भंवरा ला अपन चपेट मं ले लेथे। धंधा जथे ओकर घेरा मं अउ फडफ़ड़ा के अपन परान तियाग देथे।

परमानंद वर्मा

शनिवार, 1 अक्टूबर 2022

काछनदेवी देइस बस्तर दशहरा उत्सव मनाय के अनुमति

जिसका तन, मन और हृदय साफ, सुंदर, पवित्र और निर्मल है वहीं ही सुख, शांति, प्रेम, आनंद और संतोष जैसी सूक्ष्म संपत्तियों का वास होता है। यही तो दैवीय शक्तिया, सूक्ष्म धन और लक्ष्मी है और यह  परिसंपत्तियां विश्व में कहीं और नहीं छत्तीसगढ़ में भरी पड़ी हैं। छत्तीसगढ़ में वह भी केवल बस्तर में देखने को मिल सकता है। सीधे-सादे, सरल, आचार-विचार और सद्व्यवहार बरबस ही सबका मन मोह लेता है। प्राकृतिक सुंदरता और आकर्षण वह तो स्थूल चीज है। त्यौहार, पर्व, उत्सव ही उनकी जिंदगी है। बस्तर उसका जीवंत गवाह है। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख- बस्तर दशहरा मनाय के अनुमति दिस कच्छनदेवी |

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दुनिया मं कोन से अइसे मुलुक हे जिहां बारहों महीना, सरलग तीन सौ साठ दिन तिहार मनाय जाथे। अड़बड़ मुड़ ल खजुवायेंव, माथा ठोंकेव अउ कई किलो ठंडई तेल लगा-लगा के मालिस करेंव, करायेव, फेर मोर मगज मं कोनो मुलुक के चिरई ,सुरता बन के नइ बैइठिस कतको किताब,  पोथी पतरा अउ ग्रंथ के पन्ना उलट-पुलट डरेंव फेर कोनो जघा अइसे नइ मिलिस जिहां अइसन सरलग तिहार मनावत होही, परब मनावत हें। घूम-फिर के लहूट के आयेंव मैं अपन भारत देश, जिहां किसम-किसम के तिहार, परब, उत्सव मनावत रहिथे। सबले बड़े मनोरंजन के साधन हे ये तिहार, परब जेकर बर कोनो ल न माल जाय के लफड़ा हे अउ न कोनो टॉकीज। फोकट मं माई-पिल्ला गांवभर के, शहर के मन एक संग मना लेथे तिहार, अउ परब एकर ले जउन मनोरंजन, खुशी अउ आनंद मिलथे मन अउ तन ल तेकर कोनो गिनती नइ करे जा सकय। 

एक परकार ले हमर देश सुख, शांति, आनंद, परेम ले भरपूर हे, अकूत खजाना हे, अकूत सोना, चांदी, हीरा, पन्ना कस लबालब भरे हे। फेर राजनीतिक, धारमिक अउ आरथिक हलका ले चील कउंवा बने चीता, भालू, तेंदुआ मन ये खुशी, आनंद, परेम ला अपन सुवारथ खातिर बटोरे मं लगे हे, उकरे सेती सब बेवस्था छिन्न-भिन्न होगे हे। अपन मन खाथे गुदा-गुदा अउ फोकला-छिलका ल जनता मन बर अइसे फेंक देथे जइसे ओमन सब भिखारी हे। अपन मन बर महल, अटारी, कल-कारखाना सब तान लेथे, अउ जनता बर झोपड़ी देये बर घला ओकर मन के जीव कसकथे। 

जनता के खुशी, आनंद, परेम ओकर परिवार हे, तिहार-परब हे, उही मं नाचत, गावत, कूदत अउ सेल्फी पीयत माते रहिथे। नइ चाही ओमन ल महल अटारी, कल-कारखाना, न कोन पद-परतिष्ठा, सबले बड़े संपत्ति, संतोष हे। दो रोटी के जुगाड़ हो जाय बस, ये पापी पेट ल का चाही? इही सुख हे, आनंद हे। परेम तो भगवान ओमन ल वरदान के रूप मं दे हे। फेर नीयतखोर मन इही मं डाका डार के जीना मुहाल कर दे हे। 

देखत हौं, कलम कइसे चलाकी चलत हे शकुनि बरोबर कोनो कोती के बात ला कोन कोती बहकाय के कच्चे बारा, पैय बारा कस चौसर के हाड़ा ला फेंकत हे। कलम के हाथ ल पकड़ेंव, कइसे बारहों महीना तिहार मनाय के बात उठाय रेहे अउ अब दुरजोधन, दुसासन के पक्ष ले असन चार सौ बीसी के चाल चलत हस  सीधा सही रस्दा मं आव संजय जइसे महाभारत के एक-एक बात धृतराष्ट्र ल बतावत गिस तइसने तैं जनता ला बता के ओ कोन देस हे जिहां बारहों महीना अउ तीन सौ साठ दिन तिहार, परब मनाय जाथे। 

जो चमकायेंव कलम (मीडिया) ल ते ओकर कान खड़ा होगे। सकपकागे अउ एती-ओती देख ले धर लिस। ककरो हाथ मं बिक के का तैं आमा ल अमली कहि देबे, कउंवा ल मिट्ठू (तोता) कहि देबे। होश गायब होगे, मोर ये बात ला सुनके। कभू-कभार शेर ला सवा शेर घला मिलथे। तब दांत ल निपोर देथे खिस्स ले बेंदरा बरोबर। 

माफी मांगत कलम (मीडिया) ह कहिथे- के बात अइसन हे... ओकर पूरा बात करे के पहिली ओला फेर दबकारेंव अउ कहेंव- माफी मोर से झन मांग, जनता करा मांग, जउन ल धोखा देवत अंधियारे मं रखके अपन सुवारथ साधथौ, सोचत होहू 'सइयां हे कोतवाल तब काकर ले का डरना?सत्ता ककरो बपौती नोहय, पांच साल मं कइसे काया पलट हो जथे तेला सब जानथौ। हां, त बता सही बात ल। 

जब घुड़की परिस ना, चाबुक ल हवा मं लहराय भर ले शेर, चीता जइसन खूंखार जंगली जानवर घला रस्दा मं आ जथे अउ फेर जइसे नचा ले ओला नाचे ले धर लेथे। वइसने कस हाल कलम (मीडिया) के घला होगे। ओहर बताथे- भइया, बारहों महीना मं तीन सौ साठ दिन जउन तिहार अउ परब मनाय जाथे ओ मुलुक हे भारत, भारत मं घला एक परदेस हे छत्तीसगढ़ नांव हे, ओ कहूं नहीं, उहू  छत्तीसगढ़ मं सरग ले बढ़ के सुख, शांति, परेम अउ संतोष मिलथे तउन जघा हे बस्तर। इहां मेनका, रंभा, नीलम परी मन संग इन्द्र जइसे देवता उतरके आथे अउ तिहार मनाथे। 

कलम सरलग बतावत कहिथे- अभी उहां बस्तर दशहरा मनाय के तइयारी शुरू होगे हे। ओ दिन उहां के राजा कमलचंद भंजदेव ला काछन अउ रैला देवी ह दशहरा परब मनाय खातिर अनुमति दिसे। अजब परम्परा हे, विधि विधान हे ये परब के। कलम बताइस अभी इतवार के काछनदेवी के पूजा होइस हे। आठ साल के नोनी (लड़की) नंदनी ऊपर काछनदेवी सवार होइस हे, बेल के कांटा के झूला बनाय रहिथे तेमा ओला सुताय  जाथे। जब ओ नोनी सुते रहिथे ततके बेर राज परिवार के सदस्य, दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी, प्रधान राज गुरु, मांझी मुखिया अउ कतको मनखे आथे। शोभायात्रा निकाले जाथे। इहां अइसन कतको अनगिनत तिहार अउ परब हे। एक दिन आरुग नइ जाय, कोनो तिहार, परब के अउ परब |

परमानंद वर्मा 

गुरुवार, 22 सितंबर 2022

पितर पाख मं कउंवा मन के कांव... कांव...

दुर्ग, भिलाई, राजनांदगांव, रायपुर, धमतरी, जगदलपुर सहित छत्तीसगढ़ के अधिकांश जगहों पर कौवों की पितृपक्ष में चांदी है। भरपेट आहार मिल रहा है। अभी तक यह शिकायत नहीं मिली है कि कोई कौआ अपचन का शिकार हुआ हो। स्वर्गवासी माता-पिता को उनकी संतानें भोग स्वरूप खीर-पूड़ी, पराठा, बालूशाही,जलेबी और रसगुल्ले तक परोस रहे हैं। धन्य है ऐसे पितृ भक्तों को जो वे जीवित थे तब तक उन्हें तरसाते रहे उन्हें  वृद्धाश्रम  तक का रास्ता दिखा दिया |अब वही लोग जब स्वर्ग वासी हो गए तब पितृ सेवा के रूप में तर्पण , श्राद्ध का दिखावा कर रहे हैं |इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख- पितर पाख म कउवा  मन के कांव... कांव..|

जीवन भर दाई-ददा ल नइ मानिन,न मान-गउन, सम्मान करिन, जइसे तइसे करके ओ बपरा मन जीवन गुजारिन। आखरी समे आइन तब आंखी लड़ेर दिन, अइसे संसार से बिदा ले लिन। कतको झन तो अइसे कुभारज बेटा निकलगे हे जउन बूढ़त काल मं दाई-ददा ल हटकार के घर ले निकाल दिन अउ वृद्धाश्रम मं ढकेल दिन। छोटे मन ल कोन कहे बड़े-बड़े करोड़पति बेटा मन घला धकिया के निकाल दे हे अपन दाई-ददा मन ला। वाह रे कुभारज बेटा हो, बहुत जस के काम करै हौ, अउ करथौ। तुंहरो तो एक दिन समे आही, तहू मन घला डोकरी-डोकरा होहू, हाथ गोड़ नइ चलही, आंखी कान जवाब दे दिही, लउठी टेक-टेक के चलिहौ, अउ एक दिन टें कर दे हौ, तुंहरो संतान मन जइसे तुमन करै हौ, करथौ, वइसने करही तब तुमन ल कइसे लागही?

ये बात, ये करा एकर सेती उठत हे वइसने कपूत संतान मन आज सपूत बेटा असन जब पितर पाख (पितृ पक्ष) चलत हे तब अपन पुरखा मन के सुरता करत, श्राद्ध तरपन करत हे। जउन अइसन बेटा मन के करतूत ल जानथे तउन मन आपस मं गोठियावत-बतावत कहिथे- देखत हस गा मंडल वहिदे रामनाथ ल, कइसे एक दिन बाते-बात मं बात बढग़े तब अपन बाप ला डंडे-डंडा बजेड़े रिहिस, कलहर-कलहर के मरगे ओ सियनहा एक दिन। आज बड़ा सपूत बनथे, श्राद्ध तरपन करत हे, अब अोला गया (तीर्थ स्थान)  लेगहू  काहत हे। 

तब दूसर सियनहा कहिथे- अरे काला का कहिबे भइया, ये कलजुग हे कलजुग, ये बेटा मन संतान नोहय, चंडाल हे गा, चंडाल। मोरो बेटा एक दिन अइसन जहर उगले असन बहू के बात मं आके अइसे उल्टा-पुल्टा सुना दिस ते मैं कट खाके रहिगेंव। उलट के जवाब देवत नइ बनिस, देतेंव, तब  ओकरे सही मोरो हाल होय रहितिस। इही  पाके देख रे आंखी सुन रे कान, कस कले चुप रहिगेंव। 

दूनो सियान के गोठ-बात चलत राहय, अपन-अपन बेटा मन के चारी-चुगली करत राहय, ततके बेर कते कोती ले टहलत खेदू महाजन आगे। ओकर मन तीर बइठके तम्बाकू रगड़े ले धर लिस। बने रमंज लिस तहां ले ओ सियनहा मन ल बनाय खैनी ल देथे। मुंह में दबा लिस तहां ले फेर शुरू होगे उही कथा। खेदू कहिथे- एक ठन अलकरहा खबर हे गा|तब वोमन पूछथे-कोनो घटना, दुरघटना होगे हे कोनो मर-सर गे हे ते कोनो कोती बाढ़ आगे हे? 

अरे वइसन खबर नइहे गा? तब का खबर हे भई, बने फोर के बता तब न जानबो। तब खेदू बताथे- अरे खबर हे के एक झन करोड़पति, उद्योगपति हे तेकर बेटा हा ओला हाथ धर के घर ले बाहिर निकाल दिस। 

- अतेक बड़े मनखे ला काबर निकाल दिस, काबर अइसन करिस होही ओहर, कुछु जबर बात होही?

अरे कोनो जबर बात नइहे ददा हो मोर, अपन गोसइन के बात ला मान के अइसन करे हे। पहि ली तो बेटा-बहू मन अड़बड़ सेवा करत रिहिन हे ओकर। इही बीच बहू अइसे पासा फेंकिस ते ससुर के नांव मं जतका संपत्ति रिहिसे तउन ला अपन नांव करवा लिस । जब दार गलगे, संपत्ति के मालिकाना हक ओकर मन के नांव आगे तेकर बिहान भर शकुनि चाल चल दिस। ओ सियान हा माथा धर के रोये ले धर लिस। आखिर म जीयत भर वृद्धाश्रम मं रिहिस। एक दिन मरगे तहां ले किरिया करम करिस। अब पितर-पाख मं ओला तरपन करत हे। 

अउ सुनव मजेदार बात- अब तो तरपन के आड़ मं कउंवा मन ला नेवता देथे। कहां-कहां के कउंवा सकला जथे ओकर बारी मं, बियारा मं, जिहां कउंआ दिखथे तिहां ओमन ला सोहारी, बरा, रसगुल्ला, बालूसाही बांटथे। ये बेटा के अइसन करनी ला देख के सब हांसथे ्उ कहिथे- देखत हव गा ये हेरौठा, चंडाल बेटा ला जीयत रिहिसे तब घर ले अइसे हटकार के निकाल दिस गोसइन के बात मान के जइसे घर के कचरा ला घुरवा मं फेके जाथे। आज उही ददा जब सरगवासी होगे तब ओकर नांव ले के, ओकर सुरता मं कउंवा मन ला खीर-पुड़ी खवावत हे। धन हे अइसन कलजुगी बेटा मन ला। 

खेदू कहिथे- कोन कहिथे के कउंवा मन ला खवाय-पियाय मं परलोकवासी आत्मा मन ला शांति मिलथे, ओमन परसाद पाथे। कतको झन कहिथे- बाम्हन भोज कराय ले  घला पितर मन के आत्मा आथे। कतेक अंधविश्वास के शिकार होगे हे मनखे? अरे जउन शरीर ला तियाग के आत्मा एक घौ निकल गे , ओ तो दूसर जघा जन्म घला ले लेथे। ओहर बच्चा ले जवान घला हो जाय रहिथे तउन का उहां ले कोनो बाम्हन के तन मं आही, भोग खाय बर? ये चाल हे ठगी करे के षडयंत्र हे। धारमिक भावना के शोसन हे। अशिक्षा अउ अज्ञानता के शिकार मनखे मन ल एकर ले उबरे ले परही। कउंवा के भोग लगाय ले पितर ला का मोक्ष मिलही। राम-राम कइसे मछरी कस जाल मं फंसे हे मनखे, अउ शिकारी जीभर के लूटत हे अउ काहत हे जब तक मूरख दुनिया मं जिंदा हे शिकारी मालामाल रइही।

परमानंद वर्मा 

शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

.और आंखें दगा दे गई

कभी रोता नहीं हूं, रोना अच्छा भी नहीं लगता। जब किसी को रोते हुए देखता हूं तब दुख होता है, तरस आता है उस पर। कभी-कभी मन में क्रोध जैसा भाव भी उत्पन्न होने लगता है। सोचता हूं कितने मूर्ख लोग हैं जो सुखमय काया को रो कर मन को मलीन और गमगीन कर बैठते हैं, चेहरा रोने से मुरझा जाता है। कुंभला जाता है जैसे तेज गरमी पड़ते ही फूल मुरझा जाते हैं।  रोते क्यों है, क्या कारण है? प्रियजनों के बिछुडने, पर परिजनों व सगे-संबंधियों का देह त्याग होने पर ,अपने ही लोगों द्वारा ऐसी कड़वी अथवा अप्रिय वचन सुनकर जिससे कभी कोई अपेक्षा नहीं होती, बोल देने पर सहन नहीं कर पाना और इसकी सजा आंख को भुगतनी पड़ती है। और निकल पड़ता है धारा-प्रवाह आंसू। बरसों की कमाई में आग लग जाने पर। लम्बी फेहरिस्त है रोने के कारणों का।  रोना जीवन की एक क्रिया है, इसका निवर्हन भी सामाजिक प्राणी करते हैं। लेकिन क्या इस क्रिया को रोक नहीं सकते। संसार में कौन ऐसा प्राणी है जो नहीं रोता है। सदा हंसमुख और प्रसन्नचित रहना यही उत्तम जीवन है। दुख व सुख से पार रहता है। ऐसा तो केवल संत, ज्ञानी, योगी और महापुरुष हो सकते हैं। इन लोगों के पास ऐसी कौन सी संजीवनी बूटी होती है जो इन्हें "वीप प्रूफ" बना देती है वह बूटी आम नागरिकों के लिए क्यों सुलभ नहीं है। क्या वह बूटी भी 'वीआईपी कोटे के लिए ही सुरक्षित रखी जाती है?

लेकिन कहीं-कहीं यह बूटी कारगर साबित नहीं हुई है। उदाहरण के तौर पर एक आश्रम के संत, स्वामी को रोते हुए देखा। ज्ञानी, योगी, पुरुष थे लेकिन जब अपने भाई के निधन का समाचार सुना तो छलक पड़े आंखों से आंसू। राजा  जनक को ही ले लीजिए- आत्मज्ञानी पुरुष को, विदेहराज के नाम से जाने जाते थे लेकिन मिथिलापुरी में विवाह के बाद जानकी जी की विदाई हो रही थी तब आपा खो बैठे, उसका आत्मज्ञान धरा का धरा रह गया, वह भी रो पड़े। स्वयं श्रीरामचंद्र भी जब पंचवटी से जानकी जी का अपहरण हुआ तब उसकी क्या स्थिति थी। पेड़, पौधों, पशु-पक्षियों से बिलखते हुए पूछते रहे कि हे खग, मृग हे मधुकर श्रेणी- तुम देखी सीता मृगनयनी, यह उनकी दशा हो गई थी। कैकेयी ने ऐसी क्या बात छेड़ी कि  राजा दशरथ के सामने तो उनकी सिट्टी-पिट्टी बंद हो गई। पछाड़ खाकर गिर पड़े जमीन पर। बातें जितनी मीठी नहीं होती उससे ज्यादा कड़वी होती है। जिनके सिर पर पत्थर बरसता है, वे ही इस पीड़ा व दर्द को जानते हैं। तब ऐसे वीत रागी पुरुष, महापुरुष कौन हैं जो रोने-गाने, दुख-सुख से परे हैं। अर्जुन ने जब कुरुक्षेत्र में ज्ञान बघारा तब भगवान श्रीकृष्ण उससे मुस्कुराते हुए कहते हैं- वाह अर्जुन, तू तो बड़ा ज्ञानी निकला- प्रज्ञा वादांससि भाषते जैसी बातें कर रहे हो | जब ज्ञानी, ज्ञान की परीक्षा में अनुतीर्ण हो जाता है तब भक्ति के द्वार पर गिर पड़ता है। फिर रोते, बिलखते और गुनगुनाते हुए जिंदगी भर वह अपने इष्ट के सामने भजन गाने लगता है- प्रभु आया शरण तुम्हारे। अनुतीर्ण विद्यार्थी की कोई कीमत नहीं होती। उसे रोजगार और नौकरी भी नहीं मिलती ,भटकते रहता है दर-दर मजदूरों अथवा भिखारियों की तरह। उनकी नियति होती है। 

रोना मुझे भी बिल्कुल पसंद नहीं। उसने झुकाने की कोशिश की, आत्मसमर्पण करने के लिए विवश किया, प्रताडि़त किया, तरह-तरह के हथकंडे अपनाए लेकिन जब असफल रहा तब एक दिन बाप को मुझसे छीन लिया। वह मेरी परीक्षा की घड़ी थी, हृदय में हलचल हुई। मन थर्राने लगा। सोचा क्या करूं, क्या न करूं। इसी बीच आँख ने मुझे धोखा दे दिया। मेरी जीवन भर की कमाई में बट्टा लगा दिया। इसका पश्चाताप है मुझे |

परमानंद वर्मा