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गुरुवार, 26 नवंबर 2015

समुद्र की गहराइयों में जीवन की पड़ताल

शर्मिला पाल
क्या समुद्र मछलियों से भरा है? क्या केकड़ों की आबादी मछलियों पर भारी पड़ती है? क्या समुद्र में रहस्यमयी जल परियां भी रहती हैं ? न जाने ऐसे कितने सवाल हैं जो अब तक समुद्री जीव जगत को लेकर हमारे ज़ेहन में उठते रहे हैं। जल्द ही इन तमाम सवालों का अंत होने वाला है क्योंकि जैव प्रजातियों की गणना करने वाले वैज्ञानिकों ने समुद्री जीवों की गिनती और उनका वर्गीकरण लगभग पूरा कर लिया है। कोई बड़ी अड़चन न हुई तो 2020 के पहले ही वैज्ञानिक यह बताने की स्थिति में होंगे कि समुद्र में कुल कितने जीव और कुल कितनी प्रजातियां हैं। लगभग 95 प्रतिशत प्रजातियों की गणना का काम पूरा हो चुका है और बहुत से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। मसलन समुद्री जीवों में मछलियों की संख्या तो बहुत कम है, जबकि दो सदी पहले तक समझा जाता था कि समुद्र मछलियों से ही भरा है। वास्तव में समुद्र में सबसे ज़्यादा प्रजातियां तो केकड़ों, झींगों, क्रे फिश यानी चिंगट और श्रिंप की पाई जाती हैं जो कुल समुद्री जीव-प्रजातियों का 19 फीसदी हैं। मछलियां तो महज 12 फीसदी ही हैं। वैज्ञानिकों ने यह दावा दस साल से ज़्यादा वक्त लगाकर दुनिया के 25 प्रमुख सागरों में रहने वाले जीवों को गिनने के बाद किया है। समुद्री जीव प्रजातियों को गिनने का यह भगीरथ प्रयास लगभग उतनी ही बड़ी परियोजना के ज़रिए संपन्न हुआ है जितनी बड़ी परियोजना के ज़रिए गॉड पार्टिकल को ढूंढा गया था। इस कार्यक्रम में अस्सी देश शामिल हुए। इन देशों के 2700 से ज़्यादा वैज्ञानिक दिन रात जुटे और इस कार्यक्रम पर अब तक करीब 70 करोड़ अमरीकी डॉलर खर्च हो चुके हैं। इस विशाल प्रोजेक्ट के ज़रिए समुद्री जीवन के बारे में ऐसी-ऐसी दिलचस्प जानकारियां सामने आई हैं जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। इस परियोजना के बाद ही यह सच सामने आया कि दुनिया समुद्री जीव जगत के बारे में कितना कम जानती है। इस अभियान के बाद ही पता चला कि वे समुद्री जीव, जिन्हें हम बहुत पसंद करते हैं या जानते हैं या कहें कि जिनकी चर्चा सर्वाधिक होती है (मसलन व्हेल, सी लायन, सील, सी बर्ड, कछुए और दरियाई घोड़ा आदि) की तादाद समुद्र में ज़्यादा नहीं है। ये तो कुल समुद्री जीवों का महज़ एक फीसदी हैं। इस गणना से एक और हैरत की बात पता चली है कि सभी समुद्री जीव यायावर नहीं होते। स्थलीय जीवों की तरह ही तमाम समुद्री जीव भी अपने एक इलाके में सीमित रहते हैं। यह तो नहीं कह सकते कि वे घर या घोंसला बनाकर रहते हैं, लेकिन इन्हें भी अपने इलाके, उसके पर्यावरण से मोह होता है। समुद्री जीवन की गणना की इस परियोजना के प्रमुख न्यूज़ीलैंड के मार्क कॉस्टेलो के मुताबिक ये प्रजातियां बहुत घरेलू किस्म की हैं। ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, अंटार्कटिका और दक्षिण अफ्रीका के वे इलाके, जो अलग-थलग पड़े हैं इन घरेलू प्रजातियों के सबसे पसंदीदा इलाके हैं। एक और दिलचस्प जानकारी यह सामने आई है कि आम तौर पर जितने बड़े प्राणी होते हैं उनकी विविधता उतनी ही कम होती है। इस मामले में मछलियां तुलनात्मक रूप से बड़े आकार की प्राणी हैं इसलिए उनकी प्रजातियों की संख्या छोटे-छोटे जीवों की तुलना में बहुत कम है। मसलन क्रम्पटन या क्रस्ट मोलस्क पर्यावरण समुद्र की गहराइयों में जीवन की पड़ताल शर्मिला पाल 2 दिसंबर से पूर्व प्रकाशित न करें समुद्री जीव जगत - 1 रुाोत विविधता के मामले में मछलियों से  हीं आगे हैं। न्यूज़ीलैंड और अंटार्कटिका में मिलने वाली प्रजातियों में आधी ऐसी हैं जो दुनिया में और कहीं नहीं मिलतीं। समुद्री जीवों में सबसे सामाजिक प्राणी शायद वाइपरफिश है जो दुनिया के एक चौथाई समुद्रों में पाई जाती है और समुद्री जीवों के लिहाज़ से दुनिया के सबसे बढ़िया सागर ऑस्ट्रेलिया, जापान और चीन के हैं। यहां सबसे ज़्यादा जैव विविधता पाई जाती है। यह भी इसी अध्ययन गणना परियोजना से पता चला है। इन तीनों समुद्री क्षेत्रों में बीस हज़ार से ज़्यादा प्रजातियां हैं। जब यह गणना अंतिम रूप से पूरी हो जाएगी (इसी साल के अंत तक) तब अनुमान है कि हमें दो लाख तीस हज़ार समुद्री जीवों के बारे में विस्तार से पता होगा। डॉ. कॉस्टेलो के मुताबिक वैसे प्रजातियों की संख्या तो दस लाख से ज़्यादा है। इस परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों के मुताबिक दस साल मेहनत करने के बाद हम आज समुद्री जीवन के बारे में पहले से दस गुना ज़्यादा जानते हैं। यह सेंसस हमें समुद्री जीवन की बेहतर समझ देता है कि कौन- कौन-सी प्रजातिवास्तव में कहां रह रही है। इसके आधार पर समुद्री जीवन का प्रबंधन और संरक्षण बेहतर तरीके से किया जा सकता है।( स्रोत फीचर्स)

सोमवार, 28 मई 2012

लुप्त होते गिद्धों को बचाने की एक कोशिश

त्तर प्रदेश में इटावा से लगे चम्बल सेंचुरी क्षेत्र में देश से लगभग विलुप्त हो चुके गिद्ध की ¨कग प्रजाति पाए जाने के बाद अब वन्य जीव विशेषज्ञ तथा राज्य का वन विभाग राज्य से लगी नेपाल की सीमा के तराई इलाके में गिद्ध संरक्षण क्षेत्र बनाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
पर्यावरण प्रेमियों के लिए यह सूचना किसी खुश खबरी से कम नहीं है कि लगभग विलुप्त हो चुकी ¨कग वल्चर प्रजाति को बहुत अरसे बाद चंम्बल सेंचुरी क्षेत्र में देखा गया। इससे यह उम्मीद जग गई है कि गिद्धों के संरक्षण के लिए चल रहे प्रयास कहीं न कहीं कामयाब हो रहे हैं। गिद्धों की नौं प्रजातियों में तीन पर गहरा संकट मंडराया हुआ  है। लांग बिल्ड वल्चर ‘’ बाइट बैक्ड वल्चर और ¨कग वल्चर देखने को पर्यावरणविद तरस गए थे। एक दशक से स्थिति ज्यादा ही खराब होती जा रही थी।
उत्तर प्रदेश वन विभाग और वन्य प्राणि विशेषज्ञ संयुक्त रूप से गिद्ध संरक्षित क्षेत्न बनाने पर काम कर रहे हैं। वन विभाग‘’बम्बई प्राकृतिक इतिहास सोसायटी और कतíनयाघाट फाउंडेशन गिद्ध संरक्षित क्षेत्न बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं। योजना में अफ्रीका की तरह गिद्ध प्रजनन केन्द्र तथा उनके खाने के लिए गिद्ध रेस्टोरेंट खोलने पर भी विचार किया जा रहा  है। अस्सी के दशक के अंत तक देश में करीब आठ करोड गिद्ध पाए जाते थे जिनकी संख्या घटकर अब चार हजार रह गई है। गिद्धों के नहीं होने के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। मृत पशुओं के सड़ते शवों की दरुगध से वातावरण प्रदूषित होने लगा  है। गिद्ध संरक्षित क्षेत्र सैंकडों किलोमीटर में फैला होगा। इसमें उत्तराखंड के जिम कार्बेट पार्क के कुछ हिस्से को भी शामिल किया गया  है। इसके अलावा यह लखीमपुरखीरी के दुधवा और कतíनयाघाट के अलावा राज्य से लगे नेपाल के तराई इलाके तक फैला होगा।
गिद्धों के संरक्षण के लिए हरियाणा’ बिहार और पश्चिम बंगाल में पहल हुई तो माना गया कि चंम्बल सेंचुरी क्षेत्र में कुछ गिद्ध भटककर आ गए हैं। पर्यावरण के मित्र कहे जाने वाले गिद्ध को प्राकृतिक सफाई कर्मी भी माना जाता है, क्योंकि यह खेतों और सडकों पर पड़े आवारा जानवरों के शवों को अपना निवाला बनाता हैं, जिससे पर्यावरण संतुलित होता है। वैसे तो गिद्ध पूरी दुनिया में पाए जाते हैं, परन्तु कभी भारत के अलावा नेपाल और पाकिस्तान में इनकी संख्या काफी थी। पर्यावरणीय ²ष्टि से चितांजनक बात यह है कि इन देशों में इनकी संख्या में 99 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आ गई है। गिद्धों के अस्तित्व पर मंडराने खतरे को देखने के बावजूद केन्द्र और राज्य सरकारें इसे समझ भी नहीं पाती, यदि सन् 2000 में वर्ल्ड कंजर्वेशन यूनियन ‘डब्ल्यू सी यू’ ने सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट नहीं कराया होता। इसके बाद ही गिद्ध को 2002 में वन्य जीव अधिनियम के तहत तत्कालीन प्रघान मंत्नी अटल बिहारी वाजपेई ने संरक्षित करने के उद्देश्य से अनुसूची एक में स्थान दिया। गिद्धों को संरक्षित करने के लिए हरियाणा सरकार के पर्यावरण मंत्नालय ने राज्य के ¨पजौर में पहला वल्चर कंजर्वेशन केन्द्र खोला। इस पहल को पश्चिम बंगाल सरकार ने जारी रखा और बक्सा में एक और केन्द्र स्थापित किया। प्रख्यात पक्षी विशेषज्ञ डॉ. सालिम अली ने कहा था कि गिद्ध मानवों के लिए ईश्वर की अदभुत देन है। यही कारण है कि पर्यावरण और पारिस्थतिकी की रक्षा के लिए समाज को गिद्धों की जरूरत महसूस होंने लगी है। गिद्ध लोगों को कई तरह की जानलेवा बीमारियों से महफूज रखते हैं। जानकारों के मुताबिक गिद्ध की नौ में आठ प्रजातियां उत्तर प्रदेश में पाई जाती हैं। कभी इनकी उड़ान पूरे उत्तर प्रदेश में फैली थी और इनकी संख्या असीमित थी लेकिन प्रतिकूल वातावरण ‘पेडों के कटान’ समाप्त होते खंडहर‘’ ग्लोबल वाìमग और कंक्रीट के जंगलों में तब्दील होते शहरों ने इनके प्रजनन पर भी प्रभाव डाला है, जिसके चलते इनकी संख्या बहुत कम हो गई। कुछ प्रजातियां अभी भी बुंदेलखंड‘’ उरई‘’झांसी और ललितपुर के तराई वाले इलाकों में पाई जाती हैं। गिद्धों की संख्या में तेजी से वृद्धि न होने का एक कारण यह है कि मादा गिद्ध एक साल में केवल एक ही अंडा देती है। अपना घोंसला बनाने के लिए यह विशालकाय पक्षी ऐसे पेड का इस्तेमाल करता है जिसमें पत्ता बिल्कुल नहीं हो।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

देश की नदियों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा!


डॉ. महेश परिमल
अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हुए आतंकवादी हमले में जितने लोग मारे गए, उतने इंसान तो रोज गंदा पानी पीने से मर जाते हैं। हमारे देश में 20 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो अशुद्ध पानी पीते हैं। पानी के लिए झगड़े, फसाद होते रहे हैं, पर अब जल्द ही युद्ध भी होने लगेंगे। इस क्षेत्र में दबे पाँव बहुराष्ट्रीय कंपनियों आ रही हैं, जिससे हालात और भी खराब होने वाले हैं। सरकार इस दिशा में इन्हीं विदेशी कंपनियों के अधीन होती जा रही है। इस कार्य में विश्व बैंक की अहम भूमिका है।
कुछ समय पहले ही जर्मनी की राजधानी बोन में पानी की समस्या को लेकर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में 130 देशों के करीब 3 हजार उपस्थित थे। इस समेलन में चौंकाने वाली जानकारी यह दी गई कि 21 वीं सदी में जिस तरह से टैंकर और पाइप लाइनों से क्रूड आयल का वितरण किया जा रहा है, ठीक उसी तरह पानी का भी वितरण किया जाएगा। बहुत ही जल्द पानी के लिए युद्ध होंगे। विश्व में 1.30 अरब लोग ऐसे हैं, जिन्हें पीने का साफ पानी नहीं मिल रहा है। अशुद्ध पानी से विश्व में रोज 6 हजार मौतें हो रहीं हैं। हालात ऐसे ही रहे, तो पूरे विश्व में पानी सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाएगा। हमारी पृथ्वी में जितना पानी है, उसका 97 प्रतिशत समुद्र के खारे पानी के रूप में है। केवल 3 प्रतिशत पानी ही मीठा और पीने लायक है। इसमें से 25 प्रतिशत हिमनदियों में बर्फ के रूप में जमा हुआ है। इस तरह से कुल5 प्रतिशत पानी ही हमारे लिए उपलब्ध है। इसमें से भी अधिकांश भाग अमेरिका और केनेडा की सीमाओं पर स्थित बड़े-बड़े तालाबों में है। शेष विश्व में बढ़ती जनसंया, शहरीकरण, औद्योगीकरण और प्रदूषण के कारण पानी के ज्ञात स्रोतों में लगातार कमी आ रही है। देश के कई राज्यों में पानी के लिए दंगे होना शुरू हो गए हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार एशिया में प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष 3 हजार घनफीट जितना पानी ही लोगों को मिल पाएगा। इसमें भी भारत की आवश्यकता औसतन 2,500 घनमीटर ही है।
उत्तर प्रदेश में यह परंपरा है कि कन्या द्वारा जब कुएँ की पूजा की जाती है, तभी लग्न विधि पूर्ण मानी जाती है। अब तो कुओं की संया लगातार घट रही है, इसलिए गाँवों में कुएँ के बदले टैंकर की ही पूजा करवाकर लग्नविधि पूर्ण कर ली जाती है। लोगों ने समय की जरुरत को समझा और ऐसा करना शुरू किया। पर पानी की बचत करनी चाहिए, इस तरह का संदेश देने के लिए कोई परंपरा अभी तक शुरू नहीं हो पाई है, यदि शुरू हो भी गई हो, तो उसे अमल में नहीं लाया गया है। जब तक हमें पानी सहजता से मिल रहा है, तब तक हम इसकी अहमियत नहीं समझ पाएँगे। हमारे देश में पानी की समस्या दिनों-दिन गंभीर रूप लेती जा रही है। देश में कुल 20 करोड़ ऐसे लोग हैं, जिन्हें पीने के लिए शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है। पेयजल के जितने भी स्रोत हैं, उसमें से 80 प्रतिशत स्रोत उद्योगों द्वारा छोड़ा गया रसायनयुक्त गंदा पानी मिल जाने के कारण प्रदूषित हो गए हैं। इसके बावजूद किसानों को यह सलाह दी जाती है कि वे ऐसी फसलों का उत्पादन करें, जिसका दाम अधिक मिलता हो। किसानों को राजनैतिक दलों द्वारा वोट की खातिर मुत में बिजली दी जाती है, जिससे वे अपने बोरवेल में पंप लगाकर दिन-रात पानी निकालते रहते हैं। इससे भूगर्भ का जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। इससे हजारों कुएँ नाकारा हो जाते हैं। पानी की कमी के कारण भारत का कृषि उत्पादन भी लगातार घट रहा है। यही  कारण है कि हम अब बनाज का आयात करने लगे हैं।
देश को जब आजादी मिली, तब एक-एक गाँवों में पीने के पानी का कम से कम एक स्रोत तो ऐसा था ही, जिससे पूरे गाँव की पेयजल समस्या दूर हो जाती थी।  जहाँ पेयजल समस्या होती थी, सरकारी भाषा में इन गाँवों को ‘नो सोर्स विलेज’ कहा जाता है। सन् 1964 में ‘नो सोर्स विलेज’  की संया 750 थी, जो 1995 में बढ़कर 64 हजार से ऊपर पहुँच गई। इसका आशय यही हुआ कि आजादी के पहले जिन 64 हजार गाँवों के पास अपने पेयजल के स्रोत थे, वे सूख गए। या फिर औद्योगिकरण की भेंट चढ़ गए। बड़ी नदियों पर जब बाँध बनाए जाते हैं, तब नदी के किनारे रहने वालों के लिए मुश्किल हो जाती है, उन्हें पीने के लिए पानी नहीं मिल पाता। शहरों की नगर पालिकाएँ नदी के किनारे बहने वाले नालों में गटर का पानी डालने लगती है, इससे सैकड़ों गाँवों में पीने के पानी की समस्या उत्पन्न हो जाती है। उद्योग भी नदी के किनारे ही लगाए जाते हैं। इससे निकलने वाला प्रदूषणयुक्त पानी नदी के पानी को और भी प्रदूषित बनाता है। इस पानी को पीने वाले अनेक बीमारियों का शिकार होते हैं। पानी को इस तरह से प्रदूषित करने वाले उद्योगपतियों को आज तक किसी प्रकार की सजा नहीं हुई। नगर पालिकाएँ भी गटर के पानी को बिना शुद्ध किए नदियों में बहा देने के लिए आखिर क्यों छूट मिली हुई है। इस दिशा में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड खामोश है।
देश को जब आजादी मिली, तब देश की जल वितरण व्यवस्था पूरी तरह से प्रजा के हाथ में थी। हरेक गाँव की ग्राम पंचायत तालाबों एवं कुओं की देखभाल करती थी, ग्रामीण नदियों को प्रकृति का वरदान समझते थे, इसलिए उसे गंदा करने की सोचते भी नहीं थे। आजादी क्या मिली, सभी नदियों पर बाँध बनाने का काम शुरू हो गया। लोगों ने इसे विकास की दिशा में कदम माना, पर यह कदम अनियमितताओं के चलते तानाशाहीपूर्ण रवैए में बदल गया। नदियाँ प्रदूषित होती गई। अब इन नदियों को प्रदूषणमुक्त करने की योजना बनाई जा रही है। इसकी जवाबदारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दी जा रही है। देश की प्रजा का अरबों रुपए अब इन कंपनियों के पास चला जाएगा। कुछ सपन्न देशों में नदियों की देखभाल निजी कंपनियाँ कर रही हैं। विश्व की दस बड़ी कंपनियों में से चार कंपनियाँ तो पानी का ही व्यापार कर रही हैं। इन कंपनियों में जर्मनी की आरडब्ल्यूई, फ्रांस की विवाल्डो और स्वेज लियोन और अमेरिक की एनरॉन कापरेरेशन का समावेश होता है। एनरॉन तो अब दीवालिया हो चुकी है, पर इसके पहले उसने विभिन्न देशों में पानी का ही धंधा कर करीब 80 अरब डॉलर की कमाई कर चुकी है। माइक्रोसाप्ट कंपनी द्वारा जो वार्षिक बिक्री की जाती है, उससे चार गुना व्यापार एनरॉन कंपनी ही करती थी।
हमारे देश में पानी की तंगी होती है, लोग पानी के लिए तरसते हैं, उसमें भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का स्वार्थ है। देश के दिल्ली और मुबई जैसे महानगरों में जल वितरण व्यवस्था की जिमेदारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देने की पूरी तैयारी हो चुकी है। इन कंपनियों के एजेंट की भूमिका विश्व बैंक निभा रहा है। किसी भी शहर की युनिसिपलिटी अपनी जल योजना के लिए विश्व बैंक के पास कर्ज माँगने जाती है, तो विश्व बैंक की यही शर्त होती है कि इस योजना में जल वितरण व्यवस्था की जवाबदारी निजी कंपनियों को सौंपनी होगी। विश्व बैंक के अनुसार निजी कंपनी का आशय बहुराष्ट्रीय कंपनी ही होता है। इन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारे पर ही हमारे देश की जल नीति तैयार की जाती है। इस नीति के तहत धीरे-धीरे सिंचाई के लिए तमाम बाँधों और नदियों को भी इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंप दिया जाएगा। यह भी एक तरह की गुलामी ही होगी, क्योंकि एक बार यदि सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनी को पेयजल वितरण व्यवस्था की जिमेदारी दे दी गई, तो फिर पानी की गुणवत्ता और आपूर्ति की नियमितता पर सरकार को कोई अंकुश नहीं रहता। पानी का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों को अरबों रुपए की रिश्वत देकर यह ठेका प्राप्त करती हैं। पानी का व्यापार करने वाली इन कंपनियों पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लग चुके हैं। महानगरों की जल वितरण व्यवस्था को भी इन कंपनियों ने भ्रष्टाचार के सहारे ही अपने हाथ में लिया है।
महाराष्ट्र सरकार ने 2003 में एक आदेश के तहत अपनी नई जल नीति की घोषणा की थी। इस नीति के अनुसार सभी जल परियोजनाएँ निजी कंपनियों को देने का निर्णय लिया गया है। विधानसभा में इस विधेयक को पारित भी कर दिया गया। इस विधेयक के अनुसार महाराष्ट्र स्टेट वॉटर रेग्युलेटरी अथारिटी की रचना की गई, इसका कार्य नदियों के बेचे जाने वाले पानी का भाव तय करना है। इस तरह से पिछले 5 वर्षो से सरकार राज्य की नदियाँ बेचने के मामले में कानूनी रूप से कार्यवाही कर रही है। देर से ही सही, प्रजा को सरकार की इस चालाकी की जानकारी हो गई है। फिर भी वह लाचार है। यह तो तय है कि महाराष्ट्र की नदियों का निजीकरण करने की योजनाओं के पीछे विश्व बैंक और पानी का अरबों डॉलर का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों का ही हाथ है। विश्व बैंक ने 5 साल पहले महाराष्ट्र सरकार को पानी के क्षेत्र में सुधार के लिए 32.5 करोड़ डॉलर का कर्ज दिया था। कर्ज के साथ यह शर्त भी जुड़ी थी कि महाराष्ट्र सरकार अपनी अपनी नदियों और जल परियोजनाओं का निजीकरण और व्यापारीकरण करेगी। इस शर्त के बंधन में बँधकर सरकार ने नई जल नीति तैयार की। इस नीति के तहत पुणो और मुम्बई में जल वितरण योजनाएँ विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपने की तैयारी है। दूसरी ओर नदियों को बेचने की योजनाएँ शुरू हो गई हैं। जल योजना के तहत अभी इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने गंगा और जमुना जैसी पवित्र नदियों पर अपना कब्जा जमा लिया है। हमारी सरकार निजीकरण के लालच में बदहवाश हो गई है। अब जल वितरण व्यवस्था के तहत ये कंपनियाँ अधिक कमाई चक्कर में पानी की कीमत इतना अधिक बढ़ा देंगी कि गरीबों की जीना ही मुश्किल हो जाएगा। वह फिर गंदा पानी पीने लगेगा और बीमारी से मरेगा। क्योंकि ये कंपनियाँ नागरिकों को शुद्ध पानी देने की कोई गारंटी नहीं देती।
    डॉ. महेश परिमल