सच केवल सच लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सच केवल सच लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

गहरी नदी का बहाव शांत होता है

Indeed Deeper Rivers Flow in

Majestic Silence! 

करीब 30 वर्ष के अन्तराल के बाद होटल की लाबी मे मेरे एक पुराने मित्र के साथ मुलाकात हुई।  हमेशा से अति साधरण, शांत, शिष्ट, भद्र व विनयी वह मित्र अभी भी देखने मे ठीक वैसा ही दिख रहा था। उसका व्यवहार व आचरण पहले जैसा ही साधारण था। आपसी औपचारिक कुशलक्षेम पूछने के उपरांत मैने प्रस्ताव दिया की मै उसे घर तक अपने गाड़ी मे छोड़ सकता हूं।

असल मे घर छोड़ने के बहाने मेरा आग्रह अपनी मर्सिडीज गाड़ी को उसे दिखाने हेतु ज्यादा था।पर उसने धन्यवाद कहकर कहा कि वह अपनी ही गाड़ी से घर जायेगा। पार्किंग लाट मे कुछ देर साथ चलने के बाद वह अपनी एक साधारण गाड़ी से लौट गया।

अगले हप्ते मैने उसे अपने घर डिनर पर आमंत्रित किया। वह अपने परिवार के साथ मेरे घर आया। एक बहोत ही आडम्बरहीन मर्यादित परिवार, पर मुझे लगा एक खुशहाल परिवार है।

मेरे मन के किसी कोने मे यह उत्कंठा थी कि डिनर के बहाने मै उसे अपने इतनी सुन्दर और आभिजात्यपूर्ण कीमती व बहुत आरामदेह,  मँहगी और सुंदर विलास की वस्तुओं से भरा हुआ, कीमती साज सज्जा से सुसज्जित घर को दिखा सकूं।

एक दूसरे से वार्तालाप मे बीच बीच में मैं यह भी समझाने की कोशिश करता रहा कि आफिस के काम से प्राय: मुझे कितने ही विदेशों मे आना जाना पड़ता है। इशारों इशारों मे यह भी उसे समझाता रहा कि वह चाहे तो किसी बिजनेस को ज्वायन कर सकता है क्योंकि न जाने कितने धनी लोगों के बीच मेरा उठना बैठना रहता है और उनसे मेरा व्यक्तिगत सम्पर्क भी है। इस सिलसिले में  किसी बड़े बिजनेस लोन की व्यवस्था करवाना मेरे लिए एक साधारण सी बात है। लेकिन इन सब बातों मे उसने कोई आग्रह या रुचि नहीं दिखाई।

विदेशों मे भ्रमण के दौरान विभिन्न दर्शनीय स्थलों, अजायबघरों आदि के एल्बम उसे दिखाते हुये मै उसे जताना चाह रहा था कि हमारा जीवन कितना आकर्षक व मनमोहक है। इतना ही नहीं, आनेवाले दिनों मे शहर मे होने वाले आर्टगैलरी प्रदर्शनी की सूचना उसे देकर जैसे मै उसे बताना चाह रहा था कि मेरे पास केवल सुन्दर व कीमती मकान और गाड़ी ही नही है, हमारे पास एक सुन्दर कलाकृतियों को 

समझने वाली शिल्पकारी रुचि भी है। एल्बम की सभी फोटो को उसने ध्यान से देखा और प्रशंसा भी किया और लगा कि हमारी उपलब्धियों व सफल जीवन से वह खुश हो रहा था।

फिर उसने कहा इन सबको देखने के साथ साथ कभी कभी पुराने यार दोस्तों, अपने उम्रदराज शिक्षकों, अपने आत्मजनों को भी देखा करो और यदि न देख पाओ तो कम से कम उनकी खबर लिया करो।

मुझे लगा हमारे व्यवसायिक वार्तालाप को उसने बहोत ज्यादा महत्व नहीं दिया। तब मैने बचपन की बातें करना शुरू किया। पूछा हमारे पुराने उम्रदराज शिक्षक और मित्र कैसे हैं, वगैरह वगैरह। यह सुनकर थोड़ा हृदय आद्र भी हुआ कि कुछ शिक्षक और पुराने दोस्त अब इस दुनिया मे नही रहे।

पर मेरी श्रीमती जी को ये सब बीते जमाने की वार्ता बहोत अच्छी नहीं लगी और वह कह बैठी केवल बचपन की यादों मे खोये रहने से आगे नहीं बढ़ा जा सकता, सभी का एक बचपन रहा है, यह कोई बड़ी बात नही है। मुझे यह सुनकर थोड़ा हिचक महसूस हुई। इसके बाद आगे बैठक जमी नही, वे दोनो चले गये।

कुछ हप्तों बाद मेरे मित्र का फोन आया, उसने अपने निवास स्थान का पता बताकर लंच पर हम दोनों को उसने आमंत्रित किया। मेरे श्रीमती जी ने इस पर रूचि नहीं दिखाई पर मेरे बहुत कहने पर जाने को राजी हुईं ।

मित्र के घर आकर देखा कि उसके घर मे ज्यादा कीमती सामान की चमक तो नहीं थी पर बहोत सलीके व सुन्दर ढंग से और करीने से घर सजा हुआ था। एकाएक मेरी नजर कोने मे रखे टेबल पर रखे एक सुन्दर गिफ्ट बाक्स पर गयी।यह गिफ्ट बाक्स उसी कम्पनी से आया हुआ लग रहा था जहां मै काम करता हूं। मैने कौतूहल वश मित्र से पूछा, यह तो मेरे कम्पनी का ही गिफ्ट है, क्या तुम मेरे कम्पनी के किसी से परिचित हो। उसने कहा डेविड ने भेजा है। मैने कहा कौन डेविड, तुम्हारा मतलब डेविड थाम्पसन से है क्या? उसने कहा हां वही। मै ने आश्चर्यचकित होकर कहा, वह तो मेरे कम्पनी का एम डी है। उससे तुम कैसे  और किस प्रकार परिचित हो। मेरे मन बहोत सारे प्रश्न एक साथ खड़े होने लगे।

जहां तक मुझे पता था, डेविड उस कम्पनी का 30 प्रतिशत मालिक है और बाकि 70 प्रतिशत का मालिक डेविड का कोई एक दोस्त है और कम्पनी के इतने बड़े भूखंड का मालिक भी वही दोस्त ही है। कुछ सेकेंड पहले मेरी कल्पना मे भी नही था कि  कुछ पलों मे मुझे इतने बड़े आश्चर्य का सामना करना होगा।

मन के जिस कोने से मैने उसे बार बार अपनी कीमती मर्सिडीज, कीमती मकान व साज सज्जा आदि दिखाकर अपने आभिजात्य के प्रदर्शन का प्रयास कर रहा था, मन के उसी कोने से कब उसे सर सर कहकर सम्बोधित करना शुरू किया, समझ नहीं पा रहा हूं। एक मन बोल रहा है मित्र को सर  नही कहना चाहिए और एक मन कह रहा है जो मेरे एम डी सर का दोस्त है, और जो कम्पनी के 70 प्रतिशत का मालिक होने के साथ साथ पूरे जमीन व सम्पत्ति का भी मालिक है उसे अब सर न कह कर और क्या कह कर सम्बोधित करें।


मुझे लगा मेरे दम्भ, अहंकार व आभिजात्य के गुब्बारे की  हवा  एक क्षण मे निकल कर सेव पिचका गई। किसी तरह लंच समाप्त कर घर लौट रहा हूं। गाड़ी मे हम दोनों चुपचाप बैठे है। मेरी श्रीमती जी मुझसे कहीं ज्यादा शांत व मौन दिख रहीं थी। मै स्पष्ट रूप से समझ पा रहा था कि इस समय उनके मन मे क्या चल रहा है।

हमारे मे  दम्भ, गरिमा व अहंकार की मात्रा जितना अधिक है, उतना ही उसके पास इन भावनाओं की कमी है जिससे हमे वेतन आदि मिल रहे हैं। उसका जीवनयापन कितना आडम्बर हीन, कितना विनम्र और कितना साधारण है।

किशोरावस्था मे गुरूजी के बताये ये शब्द अनायास ही बार बार याद आने लगे

"जो नदी जितनी ज्यादा गहरी होती है उसके बहने का शोर उतना ही कम होता है"।  

"Indeed Deeper Rivers Flow in

Majestic Silence"! 



कितनी सत्यता है गुरूजी के इन शब्दों में। मैं, जो सुन्दर शिल्पकारी व नक्कासी किये हुए एक लोटे में रखा जल हूं, आज एक गहरी नदी देख कर लौट रहा हूं ।

(यह मूलरूप से एक अंग्रेजी कहानी का  भावानुवाद है)

शनिवार, 20 अगस्त 2016

रांची का पहाड़ी बाबा का मंदिर


पहाड़ी बाबा का मंदिर इस लिहाज से अनोखा है कि यहां धर्मध्वजा के साथ-साथ हर स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रध्वज फहराने की परंपरा है। यह बहुत रोचक विषय तो है ही साथ ही लोगों की जिज्ञासा का केंद्र भी है।

स्वतंत्रता और पूजा

यह मंदिर भक्तिभाव के संग राष्ट्रप्रेम का भी संदेश देता है तथा इससे यह सवाल उठता है कि क्या हमारा वतन भगवान के समान पूज्यनीय है? जी हां! अगर स्वतंत्रता ही नहीं होगी तब हमारा पूजा करने का हक भी छिन सकता है।

कहां है ये मंदिर?

रांची रेलवे स्टेशन से लगभग सात किलोमीटर दूर करीब 26 एकड़ में फैला और 350 फुट की ऊंचाई पर स्थित पहाड़ी बाबा मंदिर देश का शायद इकलौता ऐसा मंदिर है जहां धर्मध्वजा की जगह राष्ट्रध्वज फहराया जाता है।

इकलौता मंदिर?

संभवतः यह भारत वर्ष में अपनी तरह का इकलौता मंदिर है जहां स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रीय झंडा फहराया जाता है।

धर्मध्वजाओं का महत्व

आमतौर पर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च अपनी धर्मध्वजाएं फहराते हैं लेकिन पहाड़ी बाबा मंदिर पर हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रीय ध्वज शान से लहराया जाता है।

धर्मध्वज से ऊपर का दर्जा?

इस मंदिर में राष्ट्रीय ध्वज को धर्मध्वज से ऊपर का दर्जा देने की यह परंपरा 14 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि से ही शुरू हो गई थी।

राष्ट्रगान के साथ तिरंगा

देश की आजादी के बाद से ही प्रत्येक साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को मंदिर में सुबह की मुख्य पूजा के बाद राष्ट्रगान के साथ तिरंगा फहराया जाता रहा है।

वतन सबसे पहले

लोग आदरपूर्वक और उत्साह के साथ इसमें शामिल होते हैं। हालांकि किसी और मंदिर में ऐसी अनोखी परंपरा नहीं अपनाई जाती है। तथापि यह साफ़-साफ़ दर्शाता है कि हमारा वतन पूजनीय है।

पहाड़ी बाबा मंदिर

यूं तो पहाड़ी बाबा मंदिर की मनोहारी छटा भी इसे महत्वपूर्ण और श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का कारण बनाती है। आश्चर्यजनक रूप से सिर्फ इन दो राष्ट्रीय पर्वों के अवसर पर भारी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं।

हम सब एक हैं

जिन्हें भक्तिभाव से बहुत लेना-देना नहीं होता वे भी यहां आने से नहीं कतराते। हर धर्म के लोग इस प्रथा में भागीदर बन कर इसे आगे ले जा रहे हैं।

वृक्ष और ध्वज

पर्यावरण प्रेमियों के लिए भी यह मंदिर महत्वपूर्ण है क्योंकि पूरी पहाड़ी पर मंदिर परिसर के ईर्द-गिर्द विभिन्न प्रकार के हजार से अधिक वृक्ष हैं।

428 सीढ़ियां

मुख्य मंदिर के द्वार तक पहुंचने के लिए आपको 428 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर प्रांगण से रांची शहर का खूबसूरत नजारा भी दिखता है।

अनुपम सौंदर्य

साथ ही यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त का अनुपम सौंदर्य भी देखा जा सकता है। इसको देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।

ब्रिटिश हुकूमत के समय फांसी

पहाड़ी बाबा मंदिर का पुराना नाम टिरीबुरू था जो आगे चलकर ब्रिटिश हुकूमत के समय फांसी टुंगरी में परिवर्तित हो गया।

इतिहास का प्रकोप

फांसी टुंगरी के नामकरण के पीछे आजादी का इतिहास छिपा है। अंग्रेजों ने जब छोटा नागपुर क्षेत्र पर अधिकार स्थापित कर लिया था तो रांची में उन्होंने अपना संचालन केंद्र खोला।

खुलेआम फांसी

जो लोग अंग्रेजी सरकार की नजरों में देशद्रोही, क्रांतिकारी या घातक होते थे, उन्हें राजधानी के शहीद चौक या फांसी टुंगरी पर खुलेआम फांसी दे दी जाती थी।

भक्तिभाव के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम

असल में मंदिर के साथ जुड़े ऐतिहासिक तथ्य लोगों में भक्तिभाव के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम के भाव को भी उद्वेलित करते हैं।

फांसी और स्वतंत्रता संग्राम

स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अनेक क्रांतिकारियों को अंग्रेज सरकार ने यहां फांसी पर चढ़ा दिया था।

शहादत का प्रतीक

ऐसे में यह शहीदों की शहादत का प्रतीक है। इनकी याद में राष्ट्रीय झंडा फहराकर उन्हें सम्मान प्रदान किया जाता है।

देश की आजादी

पहाड़ी बाबा मंदिर में एक शिलालेख लगा है जिस पर 14 अगस्त, 1947 को देश की आजादी संबंधी घोषणा भी अंकित है।

सपूतों का शहीद स्थल

पहाड़ी मंदिर के मुख्य पुजारियों में शामिल पंडित देवीदयाल मिश्र उर्फ देवी बाबा बताते हैं कि पहाड़ी मंदिर केवल आजादी के लिए लड़ने वाले सपूतों का शहीद स्थल भर नहीं है बल्कि इसका प्राचीन इतिहास भी महत्वपूर्ण है।

नागवंशियों का इतिहास

उनकी मानें तो छोटा नागपुर क्षेत्र के नागवंशियों का इतिहास भी यहीं से शुरू हुआ है। पहाड़ी पर जितने भी मंदिर हैं, उनमें नागराज का मंदिर सबसे प्राचीन है।

आदिवासी लोग और नागदेवता की पूजा

आदिवासी समुदाय प्रकृति पूजक रहा है। इस स्थल पर शुरू से ही आदिवासी लोग नागदेवता की पूजा करने आते रहे हैं।

पूजा और आदिवासियों की पुकार

आज भी प्रत्येक सोमवार को पाहन बाबा जो आदिवासियों के लिए पूजनीय होते हैं, मंदिर की प्रमुख पूजा संपन्न करने आते हैं।

प्रमुख धार्मिक केंद्र

सरकार अगर पहाड़ी मंदिर पर समुचित ध्यान दे तो यह न सिर्फ एक प्रमुख धार्मिक केंद्र के तौर पर विकसित होगा बल्कि राष्ट्रीय एकता की भी अनूठी मिसाल पेश करेगा।

रविवार, 29 अप्रैल 2012

फिर निकला बोतल ने बोफोर्स का जिन्न

डॉ. महेश परिमल
बोफोर्स कांड हमारे देश के लिए एक बदनुमा दाग है। लेकिन इस दाग को धोने की कभी कोई ईमानदाराना कोशिश नहीं हुई। देखा जाए,तो बोफोर्स से बड़ा कांड तो उसे दबाने का है। राजीव गांधी सरकार की पूरी कोशिश रही कि इसमें धन किसने लिया है, उसका नाम कभी सामने न आने पाए। पूरी कवायद इस मामले को दबाने की ही रही है। इसीलिए यह मामला इतना संगीन था, पर इस देश की कई पीढ़ियाँ भी बोफोर्स के सही अपराधी का नाम नहीं जान पाएँगी। यह भारतीय राजनीति का ऐसा दु:स्वप्न है, जिसे दोबारा देखना किसी हादसे से कम नहीं होगा। राजनेताओं की ढिलाई किस हद तक हो सकती है, यह इस मामले से जाना जा सकता है। सत्ता के दलाल अपना खेल खेल जाते हैं और प्रजातंत्र सिसकता रहता है।
बोफोर्स कांड पहली बार 15 अप्रैल सन् 1987 में सामने आया था। मानो इस घटना की सिल्वर जुबली हुई हो, इस तरह से यह मामला एक बार फिर भारतीय राजनीति के परिद़श्य में छा गया है। इस बार इसका खुलासा स्वीडन के भूतपूर्व पुलिस प्रमुख स्टेन लिंडस्टार्म के एक साक्षात्कार से हुआ है। अपने साक्षात्कार में लिंडस्टार्म ने बताया है कि इटैलियन व्यापारी ओक्टोवियो क्वात्रोची की भूमिका पर पूरी तरह से परदा डालने के लिए उन पर भारत के बड़े नेताओं का दबाव था। उन्होंने दूसरी चौंकाने वाली बात यह कही कि इस मामले में राजीव गांधी के मित्र अमिताभ बच्चन के खिलाफ किसी भी तरह का सबूत न होने के बाद भी उन्हें फँसाने के लिए भी दबाव था। इस रहस्योद्घाटन से अमिताभ बच्चन को काफी राहत हुई है। उनके अनुसार दु:ख इस बात का है कि ऐसा उनके माता-पिता के रहते नहीं हो पाया। उन्हें निर्दोष साबित होने में 25 वर्ष लग गए। यहाँ सवाल यह उठता है कि अमिताभ को फँसाने और ओक्टोवियो क्वात्रोची को बचाने के लिए आखिर किस नेता ने दबाव बनाया था। इसका खुलासा क्यों नहीं हो पा रहा है? बोफोर्स कांड तो केवल 64 करोड़ रुपए का था, 2 जी स्पेक्ट्रम 1.75 लाख करोड़ के आगे यह राशि तो कुछ भी नहीं है। बोफोर्स कांड पिछले 25 वर्षो से देश की राजनीति में बार-बार सामने आता रहा है और हर बार गांधी परिवार को शर्मसार होना पड़ा है। इस कांड का मुख्य आरोपी कौन है, क्या भारतीय जनता कभी उसका नाम जान पाएगी? यह प्रश्न पिछले 25 सालों से देश को मथ रहा है।
मामले को दबाने की पूरी कोशिश हुई
15 अप्रैल 1987 को बोफोर्स कांड का धमाका स्वीडन रेडियो पर हुआ था। इस सौदे में 64 करोड़ रुपए की रिश्वत दी गई थी। तब राजीव गांधी सरकार हिल गई थी। इस रिश्वत को देने के लिए भारतीय राजनेताओं और दलालों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए इटली के व्यापारी ओक्टोवियो क्वात्रोची का उपयोग किया गया था। क्वात्रोची गांधी परिवार का काफी करीबी था। इस कांड में शंका की सूई सदैव राजीव गांधी पर ही जाकर टिकती थी। इसीलिए इसकी लीपापोती करने के लिए एक बड़ा ऑपरेशन किया गया। ऐसा ऑपरेशन भारतीय राजनीति में इसके पहले कभी नहीं देखा गया था। यह ऑपरेशन बोफोर्स से भी बड़ा कांड था। इसमें सीबीआई और आईबी का खूब इस्तेमाल भी किया गया। जब यह कांड बाहर आया, तब सीबीआई जैसी भारत की मुख्य जाँच एजेंसी को इस मामले की तह पर जाने के लिए कहा गया। सीबीआई के अधिकारी जाँच के बहाने यूरोप के अनेक देश घूम आए। उनका इरादा साफ था कि इसके सबूत को खोजने के बजाए उसे नष्ट कर दिया जाए। किसी भी रूप में यह मामला सामने न आए, इसकी पूरी कोशिश हुई। इसके लिए जो मशक्कत की गई, उसकी पटकथा राजीव गांधी ने लिखी थी। इसीलिए शक की सूई बार-बार राजीव गांधी पर आकर अटक जाती थी। इस कांड के चलते राजीव गांधी को सत्ता से दूर होना पड़ा था। उनके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने थे। राजीव गांधी ने जिस तरह से बोफोर्स कांड पर परदा डालने के लिए जाँच एजेंसियों का गलत इस्तेमाल किया था, छीक उसी तरह वी.पी. सिंह सरकार ने इस मामले में राजीव गांधी की भूमिका को पर्दाफाश करने के लिए इन संस्थाओं क दुरुपयोग किया। वी.पी. सिंह के सचिव भूरे लाल के अनुसार स्व. राजीव गांधी के आर्थिक व्यवहार की जाँच के लिए यूरोप की एक निजी जाँच एजेंसी की सेवाएँ ली गई थी। इस एजेंसी ने जो कुछ भी जानकारी हासिल की, उसे कुछ पत्रकारों को देकर राजीव गांधी की छवि को धूमिल करने पूरी कोशिश की गई। उस समय राजीवन गांधी विपक्ष के नेता थे। वी.पी. सिंह के तमाम प्रयासों केबाद भी बोफोर्स कांड का सत्य बाहर नहीं आ पाया।
स्टेन ने ही दिए थे चित्रा को कागजात
बोफोर्स के बारे में जो कुछ हम जानते हैं, उसमें हिंदू अखबार की पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यम की महत्वपूर्ण भूमिका है। 1987 में जब यह कांड बाहर आया, तब वे जिनेवा में पदस्थ थीं। उस समय स्वीडन के पुलिस प्रमुख स्टेन लिंडस्टार्म थे। उन्हीं ने चित्रा को बोफोर्स के गुप्त कागजात सौंपे थे। भारत में जब इस कांड ने तहलका मचाया, तब प्रजा के विरोध के चलते जाँच के लिए संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया गया। इसकी रिपोर्ट दो वर्ष बाद आई। आश्चर्य की बात यह है कि 1987 के अगस्त में यह मामला बाहर आया, लेकिन सीबीआई ने 1989 तक इसकी एफआरआई नहीं लिखी थी। मतलब यही कि जब तक राजीव गांधी प्रधानमंत्री रहे, तब तक इसी एफआरआई ही नहीं लिखी गई। 1989 में जब लोकसभा के चुनाव हुए, तब कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला, तब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। उसके बाद जनवरी 1990 में इस मामले की एफआईआर सीबीआई ने लिखी। 1991 की मई में राजीव गांधी की हत्या हो गई। लोकसभा चुनाव हुए और नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने, तब बोफोर्स मामले की जाँच सीबीआई ने ढीली कर दी। आश्चर्य की बात यह है कि उस समय ओक्टोवियो क्वात्रोची भारत में ही था। वह तो जुलाई 1993 में भारत से चला गया। सीबीआई की वर्षो की मेहनत से यह सामने आया कि स्वीस सरकार ने 1997 में अपने बैंक के गुप्त खातों की जानकारी दी। जिसमें बोफोर्स कांड की रिश्वत जमा होने की जानकारी दी गई। स
क्वात्रोची निर्दोष साबित
ीबीआई ने 1997 के अंत में बोफोर्स मामले में जो चार्ज शीट फाइल की, उसमें स्व. राजीव गांधी के अलावा ओक्टोवियो क्वात्रोची, बोफोर्स कंपनी के भूतपूर्व प्रमुख मार्टिन आर्डबो, बोफोर्स के भारत के एजेंट विन चड्ढा, तत्कालीन रक्षा सचिव एस. के. भटनागर आदि का नाम थ। जब यह आरोप पत्र फाइल किए गए, तब क्वात्रोची मलेशिया में था। उसकी धरपकड़ के लिए सन् 2000 में भारत सरकार द्वारा मलेशिया सरकार को पत्र भी लिखा गया था। इस समय सत्ता पर एनडीए सरकार थी। तब प्रधानमंत्री थे अटल बिहारी वाजपेयी। किन्हीं कारणवश सरकार ने बोफोर्स कांड की जाँच को धीमा करने का आदेश दिया गया। इसका लाभ क्वात्रोची ने भरपूर उठाया। मलेशिया सरकार ने उसे जमानत पर रिहा कर दिया। 2001 में विन चड्ढा और भटनागर का निधन हो गया। 2004 में दिल्ली हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि बोफोर्स कांड में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की भूमिका के कोई सबूत नहीं मिले हैं। इस मामले का आरोपी ओक्टोवियो क्वात्रोची ही था। इस पर सीबीआई के अनुरोध के चलते ओक्टोवियो क्वात्रोची की गिरफ्तारी के लिए इंटरपोल ने रेड कार्नर नोटिस जारी किया था। इस नोटिस के अनुसार अर्जेटिना की पुलिस ने 2007 में क्वात्रोची की धरपकड़ की थी, उस समय उसे भारत लाकर उस पर मुकदमा चलाया जा सकता था, पर ऐसा नहीं हो पाया। पर भारत सरकार ने अर्जेटीना सरकार को आवश्यक कागजात नहीं दिए, इसलिए क्वात्रोची एक बार फिर छूट गया। मार्च 2011 में सीबीआई ने क्वात्रोची को सारे आरोपों से मुक्त कर निर्दोष साबित कर दिया। आज की तारीख में भारत में क्वात्रोची के खिलाफ कोई मामला नहीं है। अब वह इज्जत के साथ भारत आ सकता है। इस मामले में अब तक के परिश्रम से यही बाहर आया है कि स्वीडिश कंपनी द्वारा 64 करोड़ रुपए की रिश्वत दी गई थी। पर यह रिश्वत किसे मिली, यह किसी को नहीं पता। स्वीडन के पुलिस प्रमुख के रहस्योद्घाटन से यही पता चलता है कि यह रिश्वत जिसे दी गई, उसकी पहचान छिपाने के लिए राजीव गांधी ने खूब मेहनत की थी। उसकी पहचान छिपाने के पीछे उनका इरादा क्या था, इसकी जानकारी शायद हमें कभी नहीं मिल पाएगी।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 13 मार्च 2012

सिर-आंखों पर रहते हैं गुडइयर



आधुनिक जीवन में रबर का आविष्कार उन चीजों में शामिल है, जिसने सही मायने में दुनिया की शक्ल बदल दी। धनी परिवार में पैदा होने के बावजूद आविष्कारक चार्ल्‍स गुडइयर को रबर का आविष्कार करने के लिए संघर्षों से गुजरना पड़ा, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी...
रबर के प्रति चार्ल्‍स गुडइयर की दीवानगी इस कदर थी कि वे जूते से लेकर कपड़े और टोपी भी रबर की पहनते थे। गुडइयर की रबर के प्रति दीवानगी को लेकर एक बात बड़ी मशहूर थी कि अगर कोई आदमी मिले, जिसकी टोपी, जूते-मोजे और जैकेट वगैरह सभी चीजें रबर की हों और यहां तक कि पर्स भी रबर का हो और जेब में एक भी रुपया न हो, तो समझ जाएं कि वह गुडइयर ही होगा। गुडइयर के पिता प्रसिद्ध व्यवसायी थे, लेकिन गुडइयर का ध्यान पैसा कमाने में नहीं, बल्कि नए-नए आविष्कार करने और उसके रोमांच का मजा उठाने में रहता था। उन दिनों रबर के जूते तो पहने जाते थे, लेकिन गर्मी में अत्यधिक बदबू आने के कारण उन्हें काफी नापसंद किया जाता था। गुडइयर ने जलरोधक रबर बनाने का निश्चय किया और घर की रसोई को अपनी प्रयोगशाला बना लिया। जब उनकी पत्नी रात का खाना बनाकर चली जाती थीं, तो उन्हीं बर्तनों में गुडइयर का प्रयोग चलता था, लेकिन रबर की बदबू से परेशान हो रहे पड़ोसियों ने उन्हें अपनी प्रयोगशाला दूर बनाने के लिए बाध्य करना शुरू कर दिया। नतीजतन, उनकी प्रयोगशाला घर से दूर हो गई और गुडइयर रोज मीलों पैदल जाकर रबर के साथ अपना दिमाग खपाते रहते। इस तरह उन्होंने अच्छी गुणवत्ता का रबर तो बना लिया था, लेकिन उसकी बदबू से मुक्ति नहीं मिली थी। गुडइयर पूरी तरह से आकर्षक रंगों वाला तापरोधी रबर बनाना चाहते थे, जिस पर बाहरी चीजों का असर न पड़े। एक बार रबर को रंगते हुए उस पर धब्बा पड़ गया, तो उन्होंने ढेर सारा सल्फेट अम्ल डालकर उस धब्बे को उड़ाना चाहा। लेकिन धब्बे की जगह पूरे रबर का ही रंग उड़ गया। गुडइयर गुस्से से तमतमा उठे और रबर को उठाकर दूर फेंक दिया। थोड़ी देर बाद जब उनकी नजर फेंके गए रबर पर पड़ी, तो देखा कि जिस हिस्से पर सल्फेट अम्ल डाला गया था, वह काफी सख्त हो गया था। गुडइयर की खुशी का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि वह रबर पहले से कहीं ज्यादा शुद्ध, तापरोधी और सुरक्षित रूप में इस्तेमाल हो सकता था। गुडइयर यह खबर अपने परिवार वालों को देना चाहते थे, लेकिन किसी ने भी उसमें दिलचस्पी नहीं ली। पत्नी और बच्चे उनकी धुन से तंग आ चुके थे और गुडइयर पर कर्जे का बोझ भी काफी बढ़ चुका था। कर्ज के कारण उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा, लेकिन बिना हार माने वे अपने प्रयोग में लगे रहे। १९४४ के दौरान उन्होंने रबर का आधुनिक रूप खोज निकाला, जिसे वल्कनाइजेशन नाम दिया गया। रबर के इस रूप ने गुडइयर को अपार ख्याति दी। पैसा कमाने की चाहत न होने के कारण आर्थिक तंगी हमेशा बनी रही। लेकिन जब तक वे जीवित रहे, रबर पर प्रयोग निरंतर करते रहे। 

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

अब होगी मोबाइल सेवा और महँगी! सरकार कठघरे में?


डॉ. महेश परिमल
सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद यह तय है कि अब मोबाइल सेवा और महँगी हो जाएगी। उपभोक्ता इसके लिए तैयार रहें। इस आशय के सभी 122 लायसेंस रद्द कर दिए गए हैं। अब लायसेंसों की नीलामी फिर से होगी। अब तक जो आरोप केवल ए.राजा आदि पर लग रहे थे, अब वही सारे आरोप सरकार के उन नेताओं पर भी लग गए हैं, जिन्होंने 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले की बहती गंगा में अपने हाथ धोए हैं। इनकी इस करतूतों का खामियाजा उपभोक्ताओं को उठाना होगा। निश्चित रूप से तमाम टेलिकॉम कंपनियाँ घाटा उठाकर तो व्यापार नहीं करेंगी, अलबत्ता मोबाइल उपभोक्ताओं को परेशानियों का सामना कर पड़ेगा।
तिहाड़ जेल में कैद भूतपूर्व टेलिकॉम मंत्री ए. राजा सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले को पढ़कर यह सोचते होंगे कि अब तक तो मेरे अलावा कुछ ही लोगों को 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले के लिए दोषी माना जा रहा था, लेकिन 122 लायसेंस रद्द करने के आदेश के बाद पूरी यूपीए सरकार के गाल पर तमाचा मारा गया है। यदि यूपीए सरकार यह मानती है कि ए. राजा द्वारा 2 जी स्पेक्ट्रम के लायसेंस का आवंटन अनुचित है, तो उसे यह आवंटन रद्द कर देना था। सरकार ने इस आवंटन को जारी रखकर राजा द्वारा किए गए पाप में अपनी भागीदारी जारी रखी थी। कोर्ट के फैसले से यह साफ हो गया है कि स्पेट्रम घोटाले में केवल ए. राजा ही नहीं, बल्कि और भी कई चेहरे शामिल हैं, जो अब तक सामने नहीं आ पाए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले की चपेट में रिलायंस, टाटा, आइडिया, भारती, वीडियाकॉन, एयरसेल, लूप और वोडाफोन आदि बड़ी टेलिकॉम कंपनियाँ आ गईं हैं। इन सभी कंपनियों ने 2 ली की नीलामी में मलाई खाई है। स्वान और यूनिटेक जैसी कंपनियों ने तो 2 जी लायसेंस मिलने के बाद अपनी कंपनी के शेयर विदेशी कंपनियों के खाते में डालकर हलकी हो गई थीं। अब इन विदेशी कंपनियों की हालत साँप-छछूंदर जैसी हो गई है। 2 जी स्पेक्ट्रम का लायसेंस पुरानी कीमत पर देने का निर्णय भले ही ए. राजा और चिदम्बरम ने मिलकर लिया हो, पर इसे लगातार अनदेखा कर पूरी मनमोहन सरकार पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि पूरे मंत्रिमंडल ने मिलकर यह फैसला लिया। कोर्ट के फैसले के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का रथ जो अब तक जमीन के अंदर चल रहा था, वह ऊपर आ गया है। सुप्रीमकोर्ट फैसले के बाद स्वान टेलिकॉम और यूनिटेक कंपनियों की प्रतिष्ठा बुरी तरह से प्रभावित हो गई है, यह तय है कि अब ये कंपनियाँ इस धंधे से हमेशा-हमेशा के लिए बाहर हो सकती हैं। दूसरी तरफ जिन कंपनियों के लायसेंस रद्द किए गए हैं, यदि वे कंपनियाँ अदालत का दरवाजा खटखटाती हैं, तो कानूनी लड़ाई लम्बी चल सकती है।
यह तय है कि अब सरकार को फिर से लायसेंसों की नीलामी करनी होगी। तब सहज रूप से टेलिकॉम कंपनियों को ऊँची कीमत चुकानी होगी। इस कारण कई प्रमुख कंपनियाँ नीलाम में भाग ही नहीं ले पाएँगी। इस स्थिति में उनके लायसेंस अन्य कंपनियों को आवंटित कर दिए जाएँगे। तब फिर पुरानी कंपनियाँ ही मैदान में रह जाएँगी। तब एक सत्ता होने के कारण कंपनियाँ अपनी मनमानी करंेगी और मोबाइल सेवा महँगी हो जाएँगी। पहले जिन कंपनियों को लाभ हुआ था, उसका पूरा फायदा उपभोक्ताओं को भी मिला, लेकिन अब जो उन्हें घाटा होगा, वह भी उपभोक्ताओं को ही उठाना होगा। भारत सरकार के कंट्रोलर एंड एडीटर जनरल (केग) के अनुसार 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सरकारी तिजोरी से 1.75 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। इस दावे की हँसी उड़ाते हुए दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने जीरो नुकसान की थ्योरी सामने रखी। अब इस थ्योरी का झूठ सामने आ गया है। एक झूठ पहले ही सामने आ चुका है जिसमें प्रधानमंत्री ने इसे दूरदर्शन में स्वीकारते हुए कहा था कि गठबंधन के कारण वे इस नीलामी पर चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाए। अपने फैसले में सुप्रीमकोर्ट ने प्रधानमंत्री मनमोहन ¨सह की कमजोरी को रेखांकित किया है। अभी जो 122 लायसेंस रद्द करने के आदेश दिए गए हैं, वे 2008 में जारी किए गए थे। इसके पहले और बाद में जो लायसेंस जारी किए गए हैं, उस पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर नहीं होगा। 2008 के शोर के बाद ही 2011 में जो लायसेंस जारी किए गए, वे पूरी तरह से अनुशासित रूप से किए गए थे। इससे सरकार को अच्छी आवक भी हुई थी। इन लायसेंसों को सरकार ने रद्द नहीं किया है। अभी मोबाइल फोन के जितने उपभोक्ता हैं, उसमें से दस प्रतिशत उपभोक्ता ही 2008 में जारी किए गए लायसेंसों के तहत हैं, यदि इनकी कंपनियों को नए सिरे से लायसेंस प्राप्त करने में विफल साबित होती हैं, तो उनकी सेवाएँ बंद हो जाएँगी। पर मोबाइल नम्बर पोर्टेबिलिटी के कारण उपभोक्ता अपने पुराने नम्बर जारी रख सकते हैं। केवल उनका बेलेंस ही बेकार जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद टेलिकॉम कंपनियों में उथल-पुथल होने की पूरी संभावना है। पहले जिन कंपनियों के पास इस क्षेत्र का अनुभव न होने के बाद भी वे मैदान में आ गई थीं, लेकिन अब बदले हुए हालात में वे सभी कंपनियाँ छटपटाएँगी। वे हाशिए पर भी जा सकती हैं। इस क्षेत्र में फिर पुरानी कंपनियों को आने का अवसर मिल जाएगा। फैसला आते ही भारती और एयरसेल के शेयरों के भाव में बहार आ गई, इसका कारण यही है। पर अब टेलिकॉम सेवाएँ भी महँगी होंगी, यह तय है। महँगी होने के साथ ही इस सेवा में सुधार आएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। फैसले से सबसे अधिक नुकसान यूनिटेक कंपनी को हुआ है। उन्हें 5 करोड़ का जुर्माना भी हुआ है। साख पर असर पड़ा है, वह अलग बात है। वोडाफोन, आइडिया और भारती एयरसेल को इससे लाभ होने की पूरी संभावना है। सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका के साथ ही सर्वोच्च अदालत ने ये जो फैसला दिया है, उसके कारण प्रजा का एक बार फिर न्याय के प्रति विश्वास जागा है। 2008 में जिस तरह से जनता की आँखों में धूल झोंकी गई थी और देश को चूना लगाने वालों को खुली छूट दे दी गई थी, उसे अदालत ने नजर से चूकने नहीं दिया। नागरिकों का स्पेक्ट्रम उन्हें सौंपते हुए अदालत ने यह संकेत भी दे दिया है कि अब भ्रष्टाचार से प्राप्त लायसेंस तो रद़द हो ही जाएँगे, स्पेक्ट्रम भी वापस हो जाएँगे, पर सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि सरकारी तिजोरी से जो धन मंत्रियों के हाथों होते हुए विदेशी खातों में पहुँच गया है, क्या वह रकम वापस आ सकती है? यह राशि तो अब ग्राहकों के जेब से ही वसूल की जाएगी।
     डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

मारन बंधुओं पर लटकती तलवार




डॉ. महेश परिमल
देश के लिए शर्मनाक 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला न जाने कितनों की बलि लेगा। जैसे-जैसे इसकी परतें खुलती जा रही हैं, वैसे-वैसे नए-नए घोटालेबाज चेहरे सामने आते जा रहे हैं। अब एक नया तथ्य सामने आया है कि इस घोटाले की शुरुआत ए. राजा ने नहीं, बल्कि दयानिधि मारन ने की थी। केंद्र में दयानिधि मारन का कद आज की तारीख में इतना है कि इस घोटाले में सहभागिता के कारण उन्हें अपने पद से इस्तीफा देने के चार महीने बाद उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई। अभी तक उनकी धरपकड़ नहीं हुई है। जब इस मामले में सुप्रीमकोर्ट ने लाल आँखें दिखाई, तब सीबीआई सक्रिय हुई और उनके खिलाफ सबूत इकट्ठे करने लगी। अभी भी लगता यही है कि सीबीआई मारन बंधुओं की गिरफ्तारी का मुहूर्त ही देख रही है। हाल में मारन बंधुओं के कार्यालय में मारे गए छापे में कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिली हैं। वास्तव में यूपीए शासन के दौरान टेलीकॉम घोटाले की शुरुआत ए. राजा से पहले दयानिधि मारन ने की थी। 14 दिसम्बर 2005 में दयानिधि टेलीकॉम मिनिस्टर थे, तब उन्होंने ट्राई की मंजूरी के बिना नए लायसेंस देने के लिए गाइड लाइन तैयार की। अपने कार्यकाल में दयानिधि नीलाम किए बिना ही 27 लायसेंस जारी किए। दयानिधि ने टाटा समूह के आवेदन को भी नामंजूर कर उन्हें नाराज कर दिया। टाटा से उन्होंने तब हाथ मिलाया, जब सी. शिवशंकर ने एयर सेल कंपनी बेच दी। दयानिधि के बाद ए. राजा ने जब अपना कार्यभार संभाला,तब उन्होंने टाटा समूह को भी लाभ दिलाया। दयानिधि मारन फोब्र्स की महत्वपूर्ण हस्तियों की सूची में शामिल हैं। इतनी बेशुमार दौलत मारन बंधुओं ने गलत तरीके से कमाई है, ऐसा सीबीआई का मानना है। देश के 15 वें नम्बर के इस धनाढच्य व्यक्ति ने मलेशिया की कंपनी मेक्सीस से 700 करोड़ रुपए का लाभ लिया था। यदि मारन बंधु गिरफ्तार हो जाते हैं, तो ऐसा पहली बार होगा कि फोब्र्स की सूची में शामिल होने वाली हस्तियों को जेल जाना पड़े। गलत कार्यो से जो लगातार कमाई कर रहे हैं, उन्हें मारन बंधुओं की हालत से सबक लेना चाहिए।
2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में ए राजा और कनिमोझी के बाद अब तिहाड़ जेल के मेहमान बनने वाले हैं दो भाई, दयानिधि मारन और कलानिधि मारन। दयानिधि की उम्र केवल 38 वर्ष की थी, तब वे यूपीए वन के कार्यकाल में मंत्री पद प्राप्त कर लिया था। दयानिधि और कलानिधि पर भ्रष्टाचार के आरोप में सीबीआई ने उनके कार्यालयों में छापा मारा। वहाँ मिले दस्तावेज के आधार पर उनसे अब पूछताछ की जाएगी। उसके बाद उनकी गिरफ्तारी तय है। मारन बंधुओं का शुमार देश के अमीर लोगों में होता है। इनके सन टीवी समूह में 20 टीवी चैनल और 45 एफ.एम. चैनल हैं। तमिलनाड़ु के अलावा विश्व में दस करोड़ परिवार उनके चैनलों के मजे लेते हैं। उनके हाथ में तमिलनाड़ु के दो महत्वपूर्ण अखबार और चार पत्रिकाएँ हैं। उनकी एक फिल्म प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी के अलावा एयरलाइंस भी है। फोब्र्स मैगजीन द्वारा 2011 में सबसे अमीर भारतीयों की जो सूची प्रकाशित की, उसमें दयानिधि मारन 3.5 अरब डॉलर की सम्पत्ति के साथ 16 वें नम्बर पर रखा है। 2005 में उन्होनें एसएसबीसी बैंक से 42 करोड़ रुपए में जमीन का एक टुकड़ा खरीदा था, दूसरे वर्ष उन्होंने चेन्नई के पॉश इलाके में 80 करोड़ का एक प्लाट खरीदा। चेन्नई के इतिहास में अब तक का यह सबसे बड़ा जमीन का सौदा था।
दयानिधि और कलानिधि के पिता का नाम त्यागराज सुंदरम था। वे तांजोर जिले के एक छोटे से गाँव में रहते थे। चेन्नई के पचैअप्पा कॉलेज में पढ़कर उन्होंने एम.ए. कर पत्रकार बने। उस समय उनके चाचा करुणानिधि तमिलनाड़ु की राजनीति में सक्रिय हो रहे थे। करुणानिधि के ब्राrाण विरोधी राजनीति में स्थापित होन के लिए उन्होंने अपने नाम से त्यागराज जैसा उपनाम हटाकर मारन रख लिया। जब करुणानिधि ने अपने दैनिक अखबार ‘मुरासोली’ का संपादक बनाया, तब से त्यागराज सुंदरम मुरासोली मारन के नाम से पहचाने जाने लगे। इसके बाद वे अपने चाचा की ऊँगली थामकर राजनीति का ककहरा समझने लगे।सन 1967  द्रमुक के स्थापक अन्नादुराई तमिलनाड़ु के गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री बने, तब उन्होंने दक्षिण मद्रास की लोकसभा सीट खाली की थी। करुणानिधि के कहने से यह सीट मुरासोली मारन को दी गई। वे सांसद बन गए। मुरासोली मारन 36 साल तक दिल्ली की राजनीति में रहे। इस दौरान उत्तर भारत के नेताओं से उन्होंने प्रगाढ़ संबंध बनाए। उसके बाद तो हालत यह हो गई कि केंद्र में किसी की भी सरकार हो, मुरासोली उसमें अवश्य होते। 1988 में वीपी सिंह सरकार में वे मंत्री रहे, 1995 में यूनाइटेड फंट्र की सरकार में भी उनकी उपस्थिति रही, उसके बाद 1999 में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए में भी वे मंत्री बने। 2003 में मुरासोली मारन का देहांत हो गया। इससे करुणानिधि को बहुत सदमा लगा। तब उन्होंने मारन के छोटे पुत्र कलानिधि को केंद्रीय मंत्री पद का ऑफर दिया। कलानिधि को राजनीति से अधिक अपने काम-धंधे में अधिक दिलचस्पी थी। इसलिए करुणानिधि ने 38 वर्षीय दयानिधि को दिल्ली की राजनीति से जोड़ दिया। 2004 के लोकसभा चुनाव में दयानिधि को द्रमुक की टिकिट मिली और वे सांसद बनकर युपीए एक की सरकार में दूरसंचार मंत्री बने। कलानिधि मारन ने अमेरिका यूनिवर्सिटी से एमबीए किया था। तमिलनाड़ु में उन्होंने पहले निजी टीवी चैनल सन टीवी नेटवर्क की स्थापना की। उसका तेजी से विकास किया। सन 1991 में जब जयललिता पहली बार तमिलनाड़ु की मुख्यमंत्री बनी, तब सन टीवी उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गया था।
इधर दिल्ली और तमिलनाड़ु में मारन बंधुओं का कद लगातार बढ़ता गया। इसके साथ-साथ उनका काम-काज भी बढ़ने लगा। सन टीवी के माध्यम से उन्होंने अपना राजनैतिक दबदबा बढ़ाया। 2007 में  उनके अखबार दिनकरण में एक सर्वेक्षण प्रकाशित हुआ, जिसमें बताया गया कि तमिलनाड़ु की 70 प्रतिशत जनता करुणानिधि के वारिस के रूप में उनके छोटे पुत्र स्टालिन को चाहती है। जबकि उनके बड़े बेटे अजागिरी को मात्र दो प्रतिशत लोग ही चाहते हैं। इस खबर के प्रकाशन के बाद अजागिरी के समर्थक क्रोधित हुए और दिनकरण के मदुराई स्थित कार्यालय को आग लगा दी, जिसमें तीन कर्मचारी मारे गए। इस घटना की प्रतिक्रिया में दिल्ली में दयानिधि को मंत्री पद छोड़ना पड़ा था। उनके स्थान पर ए. राजा को भेजा गया। 2009 में यूपीए 2 की सरकार में दयानिधि को कपड़ा मंत्री बनाया गया। 2004 और 2007 के दौरान 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सहभागिता होने के कारण उन्हें यह पद भी छोड़ना पड़ा था।
जब 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया, तब न तो दयानिधि और न ही कलानिधि का नाम इसमें जोड़ा गया। एयरसेल कंपनी के भूतपूर्व मालिक सी. शिवशंकर ने जब यह आक्षेप किया कि दयानिधि मारन ने उन्हें लायसेंस के लिए काफी परेशान किया। न चाहते हुए भी मुझे अपनी मलेशिया स्थित कंपनी को मेक्सीस कम्युनिकेशन को बेचनी पड़ी। इसके बाद तो दयानिधि की कृपा से उन्हें 2 जी का लायसेंस मिल गया। इस लाभ के बदले में मेक्सीस की साथी कंपनी ‘एस्ट्रो’ ने कलानिधि मारन की कंपनी सन डायरेक्ट के शेयर 550 करोड़ रुपए में खरीद लिए। सीबीआई की एफआईआर के अनुसार यह रकम मारन बंधुओं को रिश्वत के बतौर दी गई थी। एयरसेल कंपनी ने 2 जी स्पेक्ट्रम के लिए दिसम्बर 2004 में आवेदन किया, तब दयानिधि मारन दूरसंचार मंत्री थे। दयानिधि ने ही इस फाइल पर टिप्पणी लिखी कि इस आवेदन के समाधान में बेवजह उतावलापन दिखाया जा रहा है। इस दौरान मलेशिया की मेक्सीस कंपनी ने एयरसेल को खरीदने का ऑफर दिया। अक्टूबर 2005 में एयरसेल के मालिक सी. शिवशंकरन और मेक्सीस के एक्जिक्यूटिव राल्फ मार्शल के बीच मंत्रणा हुई। मार्शल ने स्पष्ट कहा कि यदि वे एयरसेल कंपनी बेच देंगे, तो उन्हें तुरंत ही 2 जी का लायसेंस मिल जाएगा। मीटिंग के तुरंत बाद शिवशंकरन के पास दयानिधि का फोन आया। दयानिधि ने साफ तौर पर कहा कि उसे एयरसेल कंपनी को बेच देना चाहिए। उनकी बात मान ली गई। 2005 में जब एयरसेल कंपनी मेक्सीस को बेच दी गई, उसके तुरंत बाद उन्हें 2 जी का लायसेंस मिल गया। इसके एवज में मारन बंधुओं को 700 करोड़ रुपए का लाभ हुआ।
  डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 24 सितंबर 2011

मौलवी, पादरी, आरएसएस और प्रजा सभी शामिल हैं उस आंदोलन में


डॉ. महेश परिमल
अगस्त में जिस तरह से अन्ना ने अपना आंदोलन चलाया और उसे देशव्यापी ख्याति मिली। इसी तरह का एक आंदोलन इन दिनों तमिलनाड़ु के कुंदनकुलम में चल रहा है, जिसमें  क्या विद्यार्थी, क्या बच्चे, क्या बूढ़े, महिलाएँ सभी इस आंदोलन में भाग ले रहे हैं। यह आंदोलन है रुस के सहयोग से करीब 15 सौ करोड़ की लागत से बनने वाले परमाणु संयंत्र के खिलाफ। यह आंदोलन तब शुरू हुआ है, जब इसका 99 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। दिसम्बर में इसका उद्घाटन होना था। स्थानीय जनता इसका विरोध कर रही है। उनके इस आंदोलन में सभी वगोर्ं का साथ मिल रहा है। मुख्यमंत्री जयललिता के लिए एक नई परेशानी खड़ी हो गई है। कुछ दिनों पहले ही उन्होंने राज्य की जनता से यह अपील की थी कि परमाणु संयंत्र की तरफ से आपको कोई नुकसान नहीं होगा, आप सुरक्षित रहेंगे। पर उनकी इस अपील का नागरिकों पर कोई असर नहीं हुआ। नागरिक जापान के फुकुशिमा और हाल ही में फ्रांस के परमाणु संयंत्र में हुई दुर्घटना के मद्देनजर परमाणु संयंत्र का विरोध कर रहे हैं।
परमाणु संयंत्रों में होने वाली दुर्घटनाओं को देखते हुए अब भारतीय जनता भी इसके प्रति सचेत हो गई है। नागरिक यह मान रहे हैं कि परमाणु संयंत्रों के आसपास रहने वाले लोग सुरक्षित नहीं है। संयंत्र कितने भी मजबूत हों, पर वह नागरिकों की जान की हिफाजत नहीं कर सकते। यही धारणा अब लगातार बलवती होती जा रही है। तमिलनाड़ु के कुंदनकुलम में परमाणु संयंत्र के निर्माझा के संबंध में सन् 1988 में रुस के साथ समझौता हुआ था। इसका निर्माण कार्य पिछले 20 वर्षो से चल रहा था। पहले तो नागरिकों ने यह समझा कि इस संयंत्र से उन्हें रोजगार मिलेगा, पर जापान और फ्रांस में हुई दुर्घटना के बाद नागरिको को अपनी सुरक्षा का भय सताने लगा है। अब जाकर यह पूरा होने को है, तो स्थानीय नागरिक उसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं।
तमिलनाड़ु के तिरुनलवेल्ली जिले के समुद्र किनारे एक हजार मेगावाट की क्षमता के दो परमाणु बिजली संयंत्र रुस के सहयोग से बन रहे थे। इसका काम दस वर्ष पहले शुरू हुआ था। राज्य सरकार की योजना है कि इससे 1200 मेगावॉट की क्षमता वाले चार और संयंत्र स्थापित किए जाएँ। इस प्लांट का काम शुरू हुआ, तब कुंदनकुलम करीब-करीब उजाड़ था। आबदी मात्र दस हजार रह गई थी। यहाँ रोजगार के अवसर बिलकुल भी न थे। इसलिए लोग रोजी रोटी की तलाश में मेंगलोर, मैसूर, मुम्बई और दुबई चले गए। धीरे-धीरे प्लांट की ख्याति बढ़ने लगी। इससे लोगों को लगा कि अब यहाँ हमें रोजगार मिल जाएगा, तो वे अपने घरों की ओर लौटने लगे। वे सभी लौट तो आए, पर उलझन यह थी कि वे परमाणु संयंत्र से होने वाली समृद्धि की ओर देखें कि उससे होने वाले नुकसान और असुरक्षा पर ध्यान दें। इसी बीच फुकुशिमा में होने वाली दुर्घटना से उन्हें यह सोचने को विवश कर दिया कि समृद्धि से अधिक महत्वपूर्ण है सुरक्षा। बस शुरू हो गया विरोध।
परमाणु संयंत्रों का विरोध केवल तमिलनाड़ु में ही हो रहा है, ऐसा नहीं है। महाराष्ट्र के जैतापुर और गुजरात के मीठी वीरडी गाँव में भी परमाणु संयंत्रों का विरोध किया जा रहा है। इस विरोध और तमिलनाड़ु के विरोध में एक बड़ा अंतर यही है कि तमिलनाड़ु में परमाणु संयंत्रों का काम 99 प्रतिशत पूरा हो चुका है, जबकि इन दोनों का काम अभी शुरू ही नहीं हुआ है। विरोध करने वाले यही कह रहे हैं कि जब परमाणु संयंत्रों का काम शुरू हुआ, तब हम इनके दुष्परिणामों से अवगत नहीं थे, पर जापान के फुकुशिमा की हालत देखकर हम सचेत हो गए हैं। कुंदनकुलम में अभी 127 परिवार संयंत्र के सामने आमरण अनशन पर बैठे हैं। इनमें वरिष्ठ नागरिक, विद्यार्थी, पादरी, संघ परिवार के कार्यकत्र्ता और विकलांग नागरिक भी शामिल हैं। इस पूरे भू-भाग में करीब एक लाख लोग परमाणु संयंत्र का विरोध कर रहे हैं, इसलिए जयललिता सरकार भी मुश्किल में है। इस संयंत्र के लए न्यूक्लियर पॉवर कापरेरेशन ऑफ इंडिया द्वारा अभी तक करीब 15 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। 2003 में जब यहाँ सुनामी का कहर बरपा था, तब बेघर हुए लोगों को नए सिरे से बसाया गया था। बसाहट के दौरान बहुत से लोग आ गए, कोई अंकुश न होने के कारण अब यहाँ एक लाख लोग रह रहे हैं।
परमाणु संयंत्र के विरोध के पीछे एक रोचक तथ्य यह भी है कि न्यूक्लियर पॉवर कापरेरेशन के अधिकारियों द्वारा स्थानीय नागरिकों को परमाणु संयंत्र की सुरक्षा के बारे में जब प्रशिक्षण दिया गया, तब इसकी मोक ड्रील की गई। इस दौरान अधिकारियों ने नागरिकों से कहा कि आप जितना अधिक तेज दौड़कर इस संयंत्र से दूर हो सकते हो, हो जाओ। इससे नागरिक इतने अधिक दहशत में आ गए कि उन्होंने संयंत्र का विरोध करने का निर्णय ले लिया। इनके साथ तमिलनाडु के सभी धर्मो के लोग और राजनेता, स्थानीय नेता भी संगठित हो गए हैं। इसके पहले इस तरह की एकता कभी देखी नहीं गई। इसका केंद्र बिंदु कुंदनकुलम में स्थित सेंट मेरी चर्च है। आरएसएस के कार्यकर्ता भी इस विरोध में पादरियों के साथ खड़े हैं। यही नहीं इन्हें स्थानीय मौलवियों का भी पूरा सहयोग मिल रहा है। कई पर्यावरणविदों को भी यहाँ देखा जा सकता है। ग्रीनपीस जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था भी इंटरनेट का उपयोग करते हुए इस विरोध को विश्वव्यापी बना रही है। पहले तो राज्य के नेताओं ने इस विरोध की उपेक्षा की, पर जब उन्होंने देखा कि पूरा प्रदेश इस मामले में एकजुट है, तो वे भी विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए।
मजबूत संयंत्रन्यूक्लियर पॉवर कापरेरेशन ऑफ इंडिया के अधिकारी कहते हैं कि इस प्लांट को सुरक्षित बनाने के हरसंभव उपाय किए गए हैं। उनके अनुसार अणु रिएक्टरों को 1.20 मीटर मोटे सीमेंट के कांक्रीट से ढाँका गया है। उसकी सतह लीकप्रूफ लोहे की प्लेटों से बनाई गई है। इस प्लांट को समुद्र की सतह से 7.50 मीटर ऊँचे प्लेटफार्म पर बनाया गया है। ताकि सुनामी की आक्रामक लहरों से उसकी रक्षा की जा सके। सुनामी के दौरान इस संयंत्र की बिजली बंद हो जाए, तो रिएक्टरों को ठंडा रखने के लिए एक डीजल जेनेरेटर की आवश्यकता होती है, लेकिन यहाँ 4 जेरेरेटर रखे गए हैं।  यदि ये जेनेरेटर भी फेल हो जाएँ, तो गर्मी कम करने के लिए भी वैकल्पिक व्यवस्था की गई है। दूसरी ओर संयंत्र का विरोध करने वाले यही कह रहे हैं कि ये सारी व्यवस्थाएँ जापान के फुकुशिमा में भी थीं। जापान विज्ञान एवं बेहतर प्रबंधन की दृष्टि से एक प्रगतिशील देश है, उसके बाद भी वहाँ दुर्घटना हो गई। प्रकृति के कोप के आगे उसने घुटने टेक दिए। यह सब होते हुए हम भारत के वैज्ञानिक, सरकारी अधिकारियों और प्रबंधन पर कैसे भरोसा करें? प्रकृति का कोप जब भी बरसता है, तो वह पहले से अधिक आक्रामक होता है। इसलिए हम कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते। उधर तमिलनाड़ु सरकार उलझन में है। मुख्यमंत्री जयललिता ने कुछ दिनों पहले ही इस संबंध में कुंदनकुलम की जनता के नाम एक अपील जारी कर यह विश्वास दिलाया था कि इस संयंत्र से उन्हें कोई खतरा नहीं है। लेकिन जनता इस सरकारी आश्वासन पर भरोसा करना ही नहीं चाहती। उसका कहना है कि वे क्या इस बात की गारंटी दे सकते हैं कि सुनामी की लहरे 7.5 मीटर से ऊँची नहीं होंगी। इसका जवाब किसी के पास नहीं था।
रुस सरकार की रोसेटम कंपनी द्वारा पश्चिम बंगाल के हरिपुर में एक हजार मेगावॉट की क्षमता वाले परमाणु संयंत्र के निर्माण की केंद्र सरकार की योजना थी। इस प्लांट के लिए समझौता 1988 में हुआ था। किंतु पश्चिम बंगाल की जनता द्वारा इसका विरोध किए जाने पर अभी तक इस प्लांट का काम शुरू ही नहीं हुआ है। पश्चिम बंगाल की कमान जब ममता बनर्जी ने सँभाली, तब इस प्लांट के निर्माण की आशा जागी थी, पर ममता बनर्जी ने एक बार में यह कहकर इस पर पानी फेर दिया कि मेरे रहते राज्य में कहीं भी परमाणु संयंत्र स्थापित करने की अनुमति नहीं मिलेगी। अब केंद्र सरकार इस प्लांट को और कहीं स्थापित करने की सोच रही है। फ्रांस के एटामिक पॉवर प्लांट में जो विस्फोट हुआ, उसे अरेवा कंपनी ने तयार किया था। यही नहीं उसका संचालन भी यही कंपनी कर रही थी। महाराष्ट्र के जैतापुर और गुजरात के मीठी वीरडी में जो परमाणु संयंत्र स्थापित होने हैं, उसका काम भी अरेवा कंपनी को ही करना है। साफ बात है जो कंपनी अपने ही देश में स्थापित परमाणु संयंत्र को सुरक्षित नहीं रख पाई, वह भारत में किस तरह से सुरक्षित रख सकती है? अब तो जब तक देश में स्थापित होने वाले परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा के बारे में समग्र चर्चा नहीं हो जाती, तब तक इन परमाणु संयंत्रों का काम स्थगित कर दिया जाना चाहिए। क्या आपको ऐसा नहीं लगता?
      डॉ. महेश परिमल

 

सोमवार, 9 मई 2011

http://www.navabharat.org/raipur.asp

नवभारत रायपुर बिलासपुर के संपादकीय पेज पर दस मई 2011 को प्रकाशित

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

एक वर्ष में डेढ़ लाख मौतें सड़कों पर



नवभारत, रायपुर एवं बिलासपुर संस्‍करण में 2 अप्रैल 2011 के संपादकीय पेज पर प्रकाशित

बुधवार, 22 सितंबर 2010

क्या आप जानते हैं?

 
·        क्या आपने कभी यह समाचार पढ़ा कि किसी मुस्लिम राष्ट्र का कोई प्रधानमंत्री या बड़ा नेता तोकियो की यात्रा पर गया हो?
·        क्या आपने कभी किसी अखबार में यह भी पढ़ा कि ईरान अथवा सऊदी अरब के राजा ने जापान की यात्रा की हो?
 
कारण
·        दुनिया में केवल जापान ही एक ऐसा देश है जो मुसलमानों को जापानी नागरिकता नहीं देता है।
·        जापान में अब किसी भी मुसलमान को स्थायी रूप से रहने की इजाजत नहीं दी जाती है।
·        जापान में इस्लाम के प्रचार-प्रसार पर कड़ा प्रतिबंध है।
·        जापान के विश्वविद्यालयों में अरबी या अन्य इस्लामी राष्ट्रों की भाषाएं नहीं पढ़ायी जातीं।
·        जापान में अरबी भाषा में प्रकाशित कुरान आयात नहीं की जा सकती है।
 
इस्लाम से दूरी
·        सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जापान में केवल दो लाख मुसलमान हैं।
·        और ये भी वही हैं जिन्हें जापान सरकार ने नागरिकता प्रदान की है।
·        सभी मुस्लिम नागरिक जापानी बोलते हैं और जापानी भाषा में ही अपने सभी मजहबी व्यवहार करते हैं।
·        जापान विश्व का ऐसा देश है जहां मुस्लिम देशों के दूतावास न के बराबर हैं।
·        जापानी इस्लाम के प्रति कोई रुचि नहीं रखते हैं।
·        आज वहां जितने भी मुसलमान हैं वे ज्यादातर विदेशी कम्पनियों के कर्मचारी ही हैं।
·        परन्तु आज कोई बाहरी कम्पनी अपने यहां से मुसलमान डाक्टर, इंजीनियर या प्रबंधक आदि को वहां भेजती है तो जापान सरकार उन्हें जापान में प्रवेश की अनुमति नहीं देती है।
·        अधिकतर जापानी कम्पनियों ने अपने नियमों में यह स्पष्ट लिख दिया है कि कोई भी मुसलमान उनके यहां नौकरी के लिए आवेदन न करे।
·        जापान सरकार यह मानती है कि मुसलमान कट्टरवाद के पर्याय हैं इसलिए आज के इस वैश्विक दौर में भी वे अपने पुराने नियम नहीं बदलना चाहते हैं।
·        जापान में किराए पर किसी मुस्लिम को घर मिलेगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
·        यदि किसी जापानी को उसके पड़ोस के मकान में अमुक मुस्लिम के किराये पर रहने की खबर मिले तो सारा मोहल्ला सतर्क हो जाता है।
·        जापान में कोई इस्लामी या अरबी मदरसा नहीं खोल सकता है।
 
मतांतरण पर रोक
·        जापान में मतान्तरण पर सख्त पाबंदी है।
·        किसी जापानी ने अपना पंथ किसी कारणवश बदल लिया है तो उसे और साथ ही मतान्तरण कराने वाले को सख्त सजा दी जाती है।
·        यदि किसी विदेशी ने यह हरकत की होती है उसे सरकार कुछ ही घंटों में जापान छोड़कर चले जाने का सख्त आदेश देती है।
·        यहां तक कि जिन ईसाई मिशनरियों का हर जगह असर है, वे जापान में दिखाई नहीं देतीं।
·        वेटिकन के पोप को दो बातों का बड़ा अफसोस होता है। एक तो यह कि वे 20वीं शताब्दी समाप्त होने के बावजूद भारत को यूनान की तरह ईसाई देश नहीं बना सके। दूसरा यह कि जापान में ईसाइयों की संख्या में वृध्दि नहीं हो सकी।
·        जापानी चंद सिक्कों के लालच में अपने पंथ का सौदा नहीं करते। बड़ी से बड़ी सुविधा का लालच दिया जाए तब भी वे अपने पंथ के साथ धोखा नहीं करते हैं।
·        जापान में 'पर्सनल ला' जैसा कोई शगूफा नहीं है।
·        यदि कोई जापानी महिला किसी मुस्लिम से विवाह कर लेती है तो उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है।
·        जापानियों को इसकी तनिक भी चिंता नहीं है कि कोई उनके बारे में क्या सोचता है।
·        तोकियो विश्वविद्यालय के विदेशी अध्ययन विभाग के अध्यक्ष कोमिको यागी के अनुसार, इस्लाम के प्रति जापान में हमेशा यही मान्यता रही है कि वह एक संकीर्ण सोच का मजहब है। उसमें समन्वय की गुंजाइश नहीं है।
·        स्वतंत्र पत्रकार मोहम्मद जुबेर ने 9/11 की घटना के पश्चात अनेक देशों की यात्रा की थी। वह जापान भी गए, लेकिन वहां जाकर उन्होंने देखा कि जापानियों को इस बात पर पूरा भरोसा है कि कोई आतंकवादी उनके यहां पर भी नहीं मार सकता।
 
सन्दर्भ
·        जापान सम्बंधी इस चौंका देने वाली जानकारी के स्रोत हैं शरणार्थी मामले देखने वाली संस्था 'सॉलीडेरिटी नेटवर्क' के महासचिव जनरल मनामी यातु।
·        मुजफ्फर हुसैन द्वारा लिखित लेख के कुछ मुख्य बिन्दु जो कि पांचजन्य, के 30 मई, 2010 के अंक से लिए गए हैं।