शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

 इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्‍यावसायीरण

-मनोज कुमार
 इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण. इस बात में अब कोई दो राय नहीं है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण हो चुका है. आने वाले समय में व्यवसायिकरण का यह चेहरा और विकृत और विकराल देखने को मिले तो समाज को हैरान नहीं होना चाहिये.  माध्यम अर्थात अंग्रेजी का शब्द मीडिया. मीडिया का सामान्य सा अर्थ है मीडियम अर्थात समाज और सरकार के बीच संवाद का सेतु किन्तु संवाद का यह सेतु वह चाहे इलेक्ट्रानिक हो या मुद्रित, दोनों का चेहरा कारोबारी हो गया है. इस विषय पर विस्तार से चर्चा करने के पूर्व पत्रकारिता एवं माध्यम दोनों के स्वरूप एवं चरित्र पर गौर करना उचित होगा. पत्रकारिता एवं माध्यम अर्थात मीडिया दोनों की विषय-वस्तु अलग अलग है. दोनों की प्रवृति एवं प्रकृति एकदम अलग हैं. व्यवसायिकरण की चर्चा के पूर्व दोनों को समझना होगा. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण की बात करने के पूर्व मीडिया और पत्रकारिता के अन्र्तसंबंध एवं इन दोनों के बीच का अंतर समझना होगा. सबसे पहले मैं पत्रकारिता की प्रवृति एवं प्रकृति पर प्रकाश डालना चाहूंगा.
सर्वप्रथम हम बात करेंंगे पत्रकारिता की. पत्रकारिता समाज का वटवृक्ष है तो मीडिया नये जमाने का संचार माध्यम. पत्रकारिता निरपेक्ष होकर, लाभ-हानि के गणित से परे रहकर, सामाजिक सरोकार की पैरोकार है. पत्रकारिता का चरित्र और कार्य व्यवहार, मीडिया से एकदम भिन्न है. पत्रकारिता दिल से होती है. समाज में जब अन्याय होता है, अराजकता की स्थिति बनती है और आम आदमी के हितों पर कुठाराघात होता है तो पत्रकारिता स्वयं में आंदोलित हो उठती है. स्मरण कीजिये पराधीन भारत के उस दौर को जब गोरे शासकोंं के नाक में पत्रकारिता ने दम कर रखा था. तिलक, महात्मा गांधी से लेकर गणेशशंकर विद्यार्थी, गोखले, माधवराव सप्रे, माखनलाल चतुर्वेदी जैसे दर्जनों लोगों ने अपनी लेखनी से अंग्रेज शासकों की नींद उड़ा दी थी. समय बदला, काल बदला लेकिन पत्रकारिता के तेवर नहीं बदले. देश के स्वाधीन होने के बाद भारत वर्ष के नवनिर्माण में पत्रकारिता ने अपना योगदान दिया. देश की पहली पंचवर्षीय योजनाओं के लागू होने के साथ ही भ्रष्टाचार का श्रीगणेश हुआ. पत्रकारिता अपनी ही सरकार को आईना दिखाने से नहीं चूकी. परिणाम यह हुआ कि भ्रष्टाचार तो हुआ लेकिन उसका ग्राफ रूक गया. यह मान लेना भी भूल होगी कि पत्रकारिता ने भ्रष्टाचार को, अनाचार को, अत्याचार को खत्म कर दिया है लेकिन पत्रकारिता की ही ताकत थी कि भ्रष्ट को भ्रष्टतम नहीं होने दिया. पत्रकारिता को दमन का शिकार भी होना पड़ा है. पराधीन भारत में अंग्रेज शासकों ने किया और स्वतंत्र भारत में हमारे अपनों ने ही. उन अपनों ने जिन्हें अपनी करतूतों के खुल जाने का भय था. पत्रकारिता की ही ताकत है कि 25 बरस से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद भी अरूण शौरी द्वारा उद्घाटित किया गया बोफोर्स का मामला आज भी जीवित है. विश्व की भीषणत औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैस कांड को भला कौन भूल सकता है. एक अनाम सा साप्ताहिक अखबार ने सचेत किया था. पत्रकारिता का यह चरित्र है. पत्रकारिता के इस चरित्र के कारण ही पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तंभ संबोधित किया गया .
पत्रकारिता का इतिहास हमें गर्व से भर देता है. पराधीन भारत से लेकर स्वाधीन भारत की पत्रकारिता की विश्वसनीयता इतनी पक्की है कि करीब ढाई सौ सालों के इतिहास में कोई अखबार अथवा पत्रिका गलत खबर छापने के कारण बंद नहीं हुई लेकिन पश्चिमी देशों में पत्रकारिता की जो दशा है, उसके चलते हाल ही में सौ साल से अधिक पुराने अखबार का प्रकाशन बंद कर दिया गया. भारत में पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन रूका या बंद हुआ तो सिर्फ इसलिये कि उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं थी. वे व्यवसायिक नहीं बन पाये. पत्रकारिता एक चुनौती है. यह चुनौती आपको कस्बाई पत्रकारिता में देखने को मिल जाएगी. जहां एक दरोगा, एक पटवारी या एक मामूली सा धनवान व्यक्ति भी अपने खिलाफ कुछ पढऩा या सुनना नहीं जानता है. ऐसे में सच का साथ देना ही पत्रकारिता है.
पत्रकारिता की अपनी भाषा होती है. उसकी अपनी शैली है. पत्रकारिता की भाषा बेलौस नहीं होती है. वह संयमित होती है और सम्मानजनक भी. पत्रकारिता किसी को बेपर्दा भी करती है तो पूरे तथ्य और प्रमाण के साथ. वह सनसनी नहीं फैलाती है. पत्रकारिता का गुण यह भी है कि वह खबर का पीछा करती है. जिसे अंग्रेजी में फालोअप कहते हैं. वह आखिरी सिरे तक पहुंच कर सच को सामने लाने की कोशिश करती है ताकि समाज में शुचिता कायम रहे. पत्रकारिता का यह गुण उसकी विश्वसनीयता को बनाये रखता है. आगे पाठ, पीछे सपाट पत्रकारिता की शैली नहीं है.
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की बात के बरक्स मैं वापस दोहराना चाहूंगा कि इसे एक ही नाम मिला है मीडिया. मीडिया में पत्रकारिता को भी शामिल किया गया है, बावजूद इसके मीडिया और पत्रकारिता का फर्क वैसा ही दिखता है जैसा कि इलहाबाद में गंगा और जमुना के संगम का.  मीडिया का कार्य-व्यवहार दिमाग से होता है. वह पहले लाभ-हानि का गणित लगा लेता है. वह अपने लाभ को पहले रखता है, फिर वह एक निश्चित सोच के साथ अपने कार्य को पूर्ण करता है. मीडिया अर्थात टेलीविजन के पर्दे पर वही दिखाया जाता है, जो मीडिया के पक्ष में लाभकारी होता है. संचार के इस विधा में दिल का नहीं, सौफीसद दिमाग का कब्जा होता है. पत्रकारिता और मीडिया के बीच यह बुनियाद अंतर दोनों को कई अर्थों में अलग करता है. मीडिया का बहुत सीधा वास्ता सामाजिक सरोकार से नहीं होता है. वह अपने लाभ के लिये लोगों की इमेज बिल्डिंग का काम करता है. जिन खबरों या घटनाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम स्थान देता है तो इसलिये कि उसकी टीआरपी बढ़ सके.
मीडिया की उत्पत्ति लगभग तीन दशक के आसपास की है. मीडिया शब्द आया कहां से, यह अनसुलझा सा है.  इस बारे में विद्वानों की राय भी स्पष्ट नहीं है. कुछ लोगों का मत है कि जिस तरह पत्रकारिता से सम्पादक संस्था का लोप कर दिया गया, उसी समय मीडिया शब्द को चलन में लाया गया. सम्पादक संस्था की कमान प्रबंधकों के हाथों में आ गयी और मीडिया में सम्पादक संस्था के लिये कोई स्थान रखा ही नहीं गया था. इस तरह अर्मूत रूप से मीडिया शब्द की रचना की गयी और बेहद चालाकी के साथ इसे स्थापित कर दिया गया. मीडिया तो माध्यम है ही, पत्रकारिता को भी माध्यम बना दिया गया.
उपरोक्त संदर्भ के रूप में अब यह बात हमारे सामने स्पष्ट हो जाती है कि पत्रकारिता क्या है, उसकी प्रवृति और प्रकृति क्या है तथा मीडिया की प्रवृत्ति और प्रकृति क्या है. इन दोनों के बीच का अन्र्तसंबंध भी लगभग स्पष्ट हो गया है. सवाल यह है कि क्या दोनों माध्यम व्यवसायिक हो गये हैं, तो इस सवाल का सीधा-सादा जवाब हां में है. मुद्रित माध्यम से आशय पत्रकारिता से हो सकता है और आज की तारीख में पत्रकारिता को लेकर जो संशय और सवाल उठाये जा रहे हैं, सवाल उठ रहे हैं, वह पत्रकारिता के व्यवसायिकरण की ओर संकेत करता है. कुछ आगे बढक़र कहें कि पत्रकारिता के व्यवसायिकरण की बात को स्थापित करता है तो भी गलत नहीं होगा. पत्रकारिता के हिस्से में पेडन्यूज का जो धब्बा बार बार लगता रहा है, वह पत्रकारिता के व्यवसायिकरण का ही उदाहरण है. पेडन्यूज को लेकर चिंता चारों तरफ है तो इसलिये कि पत्रकारिता का मूल स्वरूप सामाजिक दायित्व, निरपेक्ष व्यवहार और सच का साथ देने की ताकत खत्म न हो जाये. यह बात हमें सुकून देती है कि पेडन्यूज का दाग तो लगा है लेकिन अभी रोशनी के कुछ सुराख ही बंद हुये हैं. पूरा केनवास अभी काला नहीं हुआ है. हालांकि जिस तेजी से पत्रकारिता का व्यवसायिकरण हो रहा है, वह भयावह है. पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामले प्रकाश में आये हैं जहां पत्रकारिता के दिग्गज भ्रष्टाचारियों को बचाने में शामिल पाये गये. यह और बात है कि प्रमाण के अभाव में या प्रभाव के बूूते पर वे अपने आसान पर जमे हुये हैं. अब पत्रकारिता की भाषा भी बेलौस होती जा रही है क्योंकि वह बाजार की भाषा बोलने लगी है. मुद्रित माध्यम का व्यवासायिक होने के पीछे उसका आधुनिक भी हो जाना है. महंगी मशीनें, महंगी छपाई, कागज और उत्पादन खर्च इतना है कि वह दो-पांच रूपये की कीमत से वसूला नहीं जा सकता है. इस तरह मुद्रित माध्यम पूर्णरूप से व्यवसायिकरण की ओर कदम बढ़ चुका है.
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम अपने जन्मकाल से व्ययवसायिक रहा है. पत्रकारिता अथवा मुद्रित माध्यम के विपरीत इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का चरित्र है. दूरदर्शन का जब जन्म हुआ था, तब इसे बुद्धु बक्सा कह कर इसे समाज ने तव्वजो नहीं दी थी किन्तु आकाशीय चैनलों के आगमन के साथ इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का एकछत्र राज्य कायम हो गया. इस माध्यम ने एक वाक्य गढ़ा जो दिखता है, वो बिकता है और इसी सूत्रवाक्य के सहारे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम पूरी तरह बाजार के कब्जे में आ गया. व्यवसायिकरण कुछ इस माध्यम की बुनियादी जरूरतें थी तो कुछ उसने स्वयं उत्पन्न कर लिया. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने मान लिया कि बाजार के मन के मुताबिक उसे चलना है और वह चलता गया. एक प्रिंस के गड्ढे में गिर जाने को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने इतना हाइप दिया कि लगा कि संसार में पहली दफा कोई बच्चा गड्ढे में गिरा है. इसके बाद ऐसी घटनाओं को दिखाने में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की रूचि कम होने लगी. उसे पता था कि दर्शक बहुत ज्यादा नहीं झेल पायेंगे. तथ्यपरक घटनाओं को दिखाने की कोशिश तो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में होती है लेकिन अवसर पाकर इस माध्यम ने सनसनी फैलायी है. ऐसा एक बार नहीं, कई कई बार हुआ है. दिल्ली की एक शिक्षिका के मामले में तो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम को अदालत का सामना भी करना पड़ा है.
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की प्रवृति हमेशा से आगे पाठ, पीछे सपाट की रही है. वह खबरों के पीछे भागना नहीं जानता है अथवा नहीं चाहता है. वह हर घड़ी नयी खबर की तलाश में जुटा रहता है. खबरों को अथवा घटनाओं को बीच में छोड़ देना भी इस माध्यम की प्रवृति रही है. इस बात का एक बड़ा उदाहरण है ऑपरेशन चक्रव्यूह. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने उन सांसदों को बेनकाब करने का अभियान चलाया था जो कथित रूप से गैरकानूनी ढंग से धन प्राप्त करते हैं. इस ऑपरेशन में 11 सांसदों को घेरे में लिया गया था और अचानक से यह अभियान बंद कर दिया गया. इसके पीछे क्या कारण समझा या माना जाये, दर्शकों के पास जो संदेश गया, वह क्या यह नहीं था कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का व्यवसायिकरण हो चुका है और शायद इन्हीं कारणों से यह अभियान बीच में बंद कर दिया गया. करप्सन अंगेस्ट इंडिया आंदोलन में भी मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाया गया था. जी-जिंदल विवाद किस बात की तरफ संकेत करते हैं?  इस तरह यह बात साफ है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का व्यवसायिकरण हो चुका है.
निष्र्कषत: हम यह मान लेना चाहिये कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम एवं मुद्रित माध्यम व्यवसायिकरण की तरफ अपना कदम बढ़ा चुके हैं. कुछ व्यवसायिक जरूरतों के कारण और कुछ कथित रूप से उत्पन्न जरूरतों के कारण. मुद्रित माध्यम को पेडन्यूज जैसे कलंक से स्वयं को बचाना होगा. यह राहत की बात है कि व्यवसायिकरण के इस दौर में मुद्रित माध्यम ने अपनी साख बचाकर रखी है. मुद्रित माध्यम पर लोगों का विश्वास अभी भी कायम है और बार बार टेलीविजन के पर्दे पर खबरें देखने और सुनने के बाद भी वह अखबार और पत्रिकाओं के पन्ने पलटने के बाद ही राहत पाता है. (औरगाबाद में हुए एक  दिवसीय सेमिनार में किया गया भाषण) 

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

अमित पुराणिक की कविताऍं

डर लगता है
बंद रहने दो इन दरवाजों को है
खिड़की के पल्‍लों को डर लगता है
है हर तरफ बस धुआं धुआं
अब तो बाहर निकलने से डर लगÌæ ãñUÐ
न जाओ तुम इन उजालों से आगे
अजनबी अंधेरों से डर लगता है
कुछ यूं ले रही है करवट ये जिंदगी अपनी
कि अब तो हर कदम पे डर लगता है
नहीं मालूम कब आखिरी बार हँसा था खुलकर
हँसने की बात ना करो मेरे दोस्‍त
खुशी की हर बात से डर लगता है
पहले ऐसी डरावनी तो न थी ये जिंदगी
हर तरफ हँसी-खुशी थी अपने थे
मन में उत्‍साह उमंग का डेरा था
जाने अनजाने हमसे क्‍या भूल हुई
जीवन की खुशी जाने कहां गुम हुई
पहले तो हर पाल काम था
एक पल को न आराम था
यूं तो अब भी काफी कुछ है बाकी
बोझ से मेरी फटी जा रही है छाती
फिर भी कुछ करने में जाने क्‍यूं मन नहीं लगता है
कहा ना ममुझे अब हर नए काम में डर लगता है
हैं अभी सपने अधूरे, नींद अभी बाकी है
पता है मुझे मंजिल पाने में मेहनत अभी बाकी है
खुद पर अब भरोसा न रहा मेरा
न करो बात किस्‍मत की डर लगता है
जाने खुद को कैसे समझाऊं
ये लड़खड़ाते कदम कैसे बढ़ाऊं
मुकाम पे बढ़ते हर कदम पर डर लगता है
जो चाहा वो सब वक्‍त से पाहले पास है
फिर भी मन में जाने क्‍या पाने की आस है
आस की बात ना करो के डर लगता है
किस्‍मत ने सब दिया
भगवान ने दामन भर दिया
जाने क्‍यूं इनसे अब कुछ मांगने में डर लगता है
मिलने सबसे जाता हूं
अक्‍सर हँसता-हॅसाता हूं
पर दिल पर चुभने वाली उस फॉंस से डर लगता है
देर रात को सोता हूं और अल्‍सुबह उठ जाता हूं
ये नहीं कि सो नहीं पाता, ख्‍वाबों के आने से डर लगता है
छुपा रखा है नए काम का जोश दिल में
मगर आने वाले  पुराने परिणामों से डर लगता है
 यूं तो मैं डरपोक नहीं मगर
बहादुरी , निर्भयता की हर बात से डर लगता है
यही प्रार्थना है ईश्‍वर से और यही अभी की आखरी आस है
हो जाए सब कुछ अच्‍छा ओर मिल जाए, जो‍ बिलकुल पास है
दे जाए अचानक ये खुशी कोई मुझे हाथ बढ़ाने में डर लगता है

आदमी की दोस्ती

याद नहीं करते कभी सताते हैं दोस्त,
हमें हर खुशी हर गम मे याद आते हैं दोस्त,
हम दोस्तों को कभी भुल नहंीं पाते ....
पता नहीं हमें कैसे भूल जाते हैं दोस्त,
शायद है कमी मुझमें ही कोई ...
क्योंकि नहीं पत्थर दिल यहां इतना कोई,
दोस्तों के संग हंँसे रोए दोस्तों संग
हर सुख-दुख में रहे दोस्तों संग
अब क्यूं नहीं मेरा दु:ख बाँटने रहता है कोई दोस्त,
सुख भी तनहा अकेला कहता है मुझको,
सुख में नहीं रहा साथ हमारे कोई,
दु:ख में भी अकेले थे, मुश्किल यहां हुई,
लोग कहते है दोस्तो से बड़ा नहीं कोई,
अब जाने क्यूं लगे इससे छोटा नहीं कोई,
जाने क्यूं लगे खता है दोस्ती,
इस जमीं पे सबसे बड़ी सजा है दोस्ती,
 मँझधार की क्या कहूँ ......
किनारे पर ही छूट जाए, वो रिश्ता है दोस्ती,
कोई कभी भी तोड़ जाए,वो कमजोर नाता है दोस्ती,
सुना है बिना दोस्त आधा है आदमी,
जाने क्यूं लगे दोस्त संग मुर्दा है आदमी,
सारे राज बाँटता है दोस्तों से
बाद मे खुले राजों से पछताता है आदमी,
दोस्ती के हर मोड़ पर धोखा खाता है आदमी,
फिर भी दोस्ती बनाता है....
दोस्ती निभाता है....
मजबूर है आदमी,
मैं तो दुश्मन को भी ना दूं वो सजा है दोस्ती,
एक काली अंधेरी गुफा है दोस्ती
दुश्मन तो दुश्मनी में भी ईमानदार हैं,
यहां लोगों से दोस्ती भी ईमानदारी से निभती,
फिर भी दोस्ती बनाता है...
नांदा है आदमी
दुश्मन तो सीने में मारे
पीठ में पड़े वो खंजर है दोस्ती
दो कदम भी साथ चला ना जाए...
वो ढीला पंचर है दोस्ती
फिर क्यूं न कहूं-एक बुरा मंजर है दोस्ती,
उपजाऊ है दुश्मनी तो बंजर है दोस्ती,
धोखेबाजों, छलियों से भरा चंेबर है दोस्ती,
चंद दिन दूध पिलाओ तो सांप भी ना उसे
रह-रह के फन उठाए वो तक्षक है दोस्ती
हर अरमान हर सपने हर कामयाबी की भक्षक है दोस्ती,
फिर भी दोस्त बनाता है....
दोस्त निभाता है...
नासमझ है आदमी
सुना है बड़े-बड़े गम दोस्तों संग भुलाता है आदमी
एैसा लगता है हर बड़ा गम दोस्तों से ही पाता है आदमी
बार-बार मुसीबतों के दरवाजे पहुंच जाता है आदमी,
जिन्दगी के मोड़ की क्या कहुं .....
सीधे रास्तों में ठोकरें खाता है आदमी
सारी जिम्मेदारियां अकेला ढोता है
बोझ तले अकेला दबकर रोता है आदमी,
फिर भी दोस्त बनाता है...
बेवस है आदमी,
दोस्तों में मजबूर है आदमी
दुश्मनों में अकेला होकर भी सुखी है
कम से कम वहां दोस्तों से महफूज है आदमी
फिर भी दोस्त बनाता है
दोस्ती निभाता है...
बेतुक है आदमी
हरी-भरी जिन्दगी घावों से भरता है
जाने क्यूं दोस्ती करता है आदमी
हारना तो है ही मौत के सामने
फिर क्यूं दोस्ती में हारता है,सर झुकाता है आदमी
जिन्दगी से अकेले लड़ना क्यूं नहीं सीख लेता
तन्हाई की आड़ मे क्यूं शरमाता है आदमी
अकेला होने पर क्यूं घबराता है आदमी
खुद को पहचान सारी शक्ति तू ही तो है
फिर को क्यूं चंद बेवफाओं से घबराता है आदमी
सिर्फ तन्हाई दूर करने लोगों से मिलता है
इसीलिए दोस्त बनाता है...
दोस्ती निभाता है.... आदमी
वो सबके काम आया, कोई उसके भी आएगा
सबके दु:ख बाटे,कोई उसके भी बांटेगा
इसीलिए दोस्त बनाता है ....
दोस्ती निभाता है ....आदमी
अपने राजों के रास्ते चाहता है,
मुसीबतें नहीं उनका हल चाहता है
इसीलिए दोस्त बनाता है..
दोस्ती निभाता है ...आदमी
दु:ख तो सह लेगा अकेला, खुशियां बाँटना चाहता है
इसीलिए दोस्त बनाता है ...
दोस्ती निभाता है... आदमी
फिर भी छला जाता है, हर पल ठोकरें खाता है
जीवन के सफर में हर मोड़ पर, हर चौराहे पर ...
खुद को तन्हा-अकेला पाता है
क्या इसीलिए दोस्त बनाता है.......
दोस्ती निभाता है आदमी ..........


आदमी की दोस्ती

याद नहीं करते कभी सताते हैं दोस्त,
हमे हर खुशी हर गम में याद आते है दोस्त,
हम दोस्तों को कभी भुल नहीं पाते ....
पता नहीं हमें कैसे भुल जाते है दोस्त,
शायद है कमी मुझमें ही कोई ...
क्योंकि नहीं पत्थर दिल यहां इतना कोई,
दोस्तों के संग हंसे रोए दोस्तों संग
हर सुख-दुख मे रहे दोस्तों संग
अब क्यूं नहीं मेरा दु:ख बाँटने रहता है कोई दोस्त,
सुख भी तनहा अकेला कहता है मुझको,
सुख में नहीं रहा साथ हमारे कोई,
दु:ख में भी अकेले थे मुश्किल यहां हुई,
लोग कहते हैं दोस्तो से बड़ा नहीं कोई,
अब जाने क्यूं लगे इससे छोटा नहीं कोई,
जाने क्यूं लगे खता है दोस्ती,
इस जमीं पे सबसे बड़ी सजा है दोस्ती,
 मँझधार की क्या कहूं ......
किनारे पर ही छूट जाए,वो रिश्‍ता है दास्ती,
कोई कभी भी तोड़ जाए,वो कमजोर नाता है दोस्ती,
सुना है बिना दोस्त आधा है आदमी,
जाने क्यूं लगे दोस्त संग मुर्दा है आदमी,
सारे राज बाँटता है दोस्तों से
बाद मे खुले राजों से पछताता है आदमी,
दोस्ती के हर मोड़ पर धोखा खाता है आदमी,
फिर भी दोस्ती बनाता है....
दोस्ती निभाता है....
मजबूर है आदमी,
मै तो दुश्मन को भी ना दूं वो सजा है दोस्ती,
एक काली अंधेरी गुफा है दोस्ती
दुश्मन तो दुश्मनी में भी ईमानदार हैं,
यहां लोगों से दोस्ती भी ईमानदारी से निभती,
फिर भी दोस्ती बनाता है...
नांदा है आदमी
दुश्मन तो सीने मे मारे
पीठ में पड़े वो खंजर है दोस्ती
दो कदम भी साथ चला ना जाए...
वो ढीला पंचर है दोस्ती
फिर क्यूं न कहूं-एक बुरा मंजर है दोस्ती,
उपजाऊ है दुश्मनी तो बंजर है दोस्ती,
धोखे बाजों छलियों से भरा चंेबर है दोस्ती,
चंद दिन दूध पिलाओ तो सांप भी ना उसे
रह-रह के फन उठाए वो तक्षक है दोस्ती
हर अरमान हर सपने हर कामयाबी की भक्षक है दोस्ती,
फिर भी दोस्त बनाता है....
दोस्त निभाता है...
नासमझ है आदमी
सुना है बड़े-बड़े गम दोस्तों सग भुलाता है आदमी
एैसा लगता है हर बड़ा गम दोस्तों से ही पाता है आदमी
बार-बार मुसीबतों के दरवाजे पहुंच जाता है आदमी,
जिन्दगी के मोड़ की क्या कहुं ..??...??
सीधे रास्तों में ठोकरें खाता है आदमी
सारी जिम्मेदारीयां अकेला ढोता है
बोझ तले अकेला दबकर रोता है आदमी,
फिर भी दोस्त बनाता है...
बेबस है आदमी,
दोस्तों में मजबुर है आदमी
दुश्मनों में अकेला होकर भी सुखी है
कम से कम वहां दोस्तों से महफूज है आदमी
फिर भी दोस्त बनाता है
दोस्ती निभाता है...
बेतुक है आदमी
हरी-भरी जिन्दगी घावों से भरता है
जाने क्यूं दोस्ती करता है आदमी
हारना तो है ही मौत के सामने
फिर क्यूं दोस्ती में हारता है,सर झुकाता है आदमी
जिन्दगी से अकेले लड़ना क्यूं नहीं सीख लेता
तनहाई की आड़ मे क्यूं शरमाता है आदमी
अकेला होने पर क्यूं घबराता है आदमी
खुद को पहचान सारी शक्ति तु ही तो है
फिर को क्यूं चंद बेवफाओं से घबराता है आदमी
सिर्फ तनहाई दूर करने लोगों से मिलता है
इसीलिए दोस्त बनाता है...
दोस्ती निभाता है.... आदमी
वो सबके काम आया, कोई उसके भी आएगा
सबके दु:ख बाटे,कोई उसके भी बांटेगा
इसीलिए दोस्त बनाता है ....
दोस्ती निभाता है ....आदमी
अपने राजों के रास्ते चाहता है,
मुसीबतें नहीं उनका हल चाहता है
इसीलिए दोस्त बनाता है..
दोस्ती निभाता है ...आदमी
दु:ख तो सह लेगा अकेला, खुशियां बाँटना चाहता है
इसीलिए दोस्त बनाता है ...
दोस्ती निभाता है... आदमी
फिर भी छला जाता है, हर पल ठोकरें खाता है
जीवन के सफर में हर मोड़ पर, हर चौराहे पर ...
खुद को तनहा-अकेला पाता है
क्या इसीलिए दोस्त बनाता है.......
दोस्ती निभाता है आदमी ..........

अमित पुराणिक
मुंगेली छत्‍तीसगढ़
 
अमित पुराणिक साप्‍टवेयर इंजीनियर हैं, सिंटेल पुणे में कार्यरत हैं। इन दिनों वे नेशविल टेनिसी यूएसए में हैं।

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

कलाबाज़-सा शरीर, अभिनेता-सा दिमाग और कवि-सा हृदय



      माइम कला देखने में जितनी आसान लगती है, उसे करना उतना ही मुश्किल होता है, लेकिन सतत परिश्रम और अभ्यास से इसे साधा जा सकता है। फ्रांस के विश्व-विख्यात माइम कलाकार एटीएन दक्रू ने कहा है-"माइम कलाकार का शरीर एक कलाबाज़ (जिम्नास्ट) जैसा, दिमाग एक अभिनेता जैसा और हृदय एक कवि जैसा होना चाहिए।" एकाग्रता, कल्पनाशीलता, त्वरित प्रतिक्रिया तथा वस्तुओं और क्रियाओं के बारीक अवलोकन से इस कला में निपुणता प्राप्त की जा सकती है।
     यह बातें गाँधी भवन स्थित चिल्ड्रंस थियेटर अकादमी में 11 जनवरी 2013 से आयोजित तीन दिवसीय माइम कार्यशाला के दौरान भोपाल के प्रख्यात माइम कलाकार श्री मनोज नायर ने बच्चों से साझा कीं। कार्यशाला में 6 वर्ष की आयु के बच्चों से लेकर 25 वर्षीय युवाओं तक ने भाग लिया। श्री नायर ने अपने साथी कलाकार श्री मिथुन की सहायता से विद्यार्थियों को माइम कला के इतिहास और उसके विभिन्न आयामों से परिचित कराया। उन्होंने बताया कि संवादरहित होते हुए भी यह एक अत्यंत मनोरंजक और लोकप्रिय कला है। माइम में भाषा का बंधन नहीं होता, इसलिए इसे किसी के भी सामने प्रस्तुत किया जा सकता है। यह एक भावप्रधान कला है, जिसमें नवरसों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। श्री नायर ने सिखाया कि किस प्रकार अपनी शारीरिक मुद्राओं एवम हाव-भाव के माध्यम से कलाकार नवरसों को प्रदर्शित कर सकता है। इसके लिए उन्होंने बच्चों को कई खेल सिखाए तथा शरीर को फुर्तीला बनाए रखने के लिए शारीरिक अभ्यास की क्रियाएँ बताईं जैसे धीमी गति में कार्य करने का अभिनय, रोबोट-चाल आदि।
     श्री नायर ने बताया कि माइम कला में हमेशा कोशिश करनी चाहिए कि मंच पर कम से कम वस्तुओं का प्रयोग हो। कलाकार को चीज़ों को बहुत आसान बनाकर करना चाहिए, जिससे दर्शक को कथा से भटकने से रोका जा सके। कलाकार को उच्च कोटि का कल्पनाशील, अच्छी याददाश्त एवम तेज़ दिमाग वाला होना चाहिए, ताकि वह स्थिति को भाँपकर तुरंत निर्णय कर सके। अगर हम अपनी क्रियाओं का बारीकी से अवलोकन करें और निरंतर अभ्यास करें तो माइम करना आसान बन सकता है। उन्होंने बताया कि माइम में किस प्रकार किसी क्रिया की धीमी अथवा देर से दी गई प्रतिक्रिया से भी दर्शक को गुदगुदाया जा सकता है।
     श्री नायर ने बच्चों को अभ्यास के लिए कुछ काल्पनिक परिस्थितियाँ बताते हुए उन पर माइम करने को कहा, जिसके परिणामस्वरूप बच्चों ने छोटी-छोटी कई मनोरंजक प्रस्तुतियाँ दीं। उन्होंने सिखाया कि माइम में अपनी जगह पर स्थिर रहकर किस तरह चलने, भागने या हवा में उडने का भ्रम पैदा किया जा सकता है। उदाहरण के लिए श्री मनोज नायर एवम उनके साथी श्री मिथुन ने स्वयं काल्पनिक गुब्बारे, गेंद, छाते और पतंग के साथ मनोरंजक प्रस्तुतियाँ दीं। उन्होंने आगे बताया कि माइम में संगीत के मिश्रण से उसे अधिक मनोरंजक बनाया जा सकता है। इससे दर्शक लम्बे समय तक प्रस्तुति से बंधता है।
     कार्यशाला के आखिरी दिन बच्चों ने सीखी हुईं बातों को दो छोटी समूह प्रस्तुतियों के माध्यम से प्रदर्शित किया और श्री नायर से आशीर्वाद प्राप्त किया। कार्यशाला के लगभग 30 प्रतिभागियों में से एक अजय कुमार मेहरा ने अपना अनुभव बताते हुए कहा- मुझे हमेशा माइम प्रस्तुति देखने में बहुत मज़ा आता था इसलिए इसे सीखने के लिए मैं तुरंत तैयार हो गया। वास्तव में इसे पर्फेक्ट्ली करना मुश्किल है, लेकिन मुझे विश्वास है कि मनोज सर की सिखाई टेक्नीक्स से मैं जल्द ही अच्छे से माइम करने लगूँगा।
            एक अन्य प्रतिभागी प्रसन्न गुप्ता, जो एक स्कूल विद्यार्थी हैं, ने कहा- मैंने वर्कशॉप को खूब एंजॉय किया। मनोज सर ने बताया कि चूँकि माइम और पढाई दोनों में ही कंसंट्रेशन की बहुत ज़रूरत होती है इसलिए मुझे लगता है कि सभी स्टूडेंट्स को यह सीखना चाहिए। इससे उन्हें स्टडीज़ में भी हेल्प मिलेगी।
आरुणि परिमल

सोमवार, 7 जनवरी 2013

मजबूत होने चाहिए संस्कारों के तटबंध

डॉ. महेश परिमल
देश में कोई घटना हो या दुर्घटना, बयानवीर नेताओं को तो बोलना ही है। वह भी बेहूदा तरीके से, ताकि बयान सुर्खियां बन जाएं। मानव की सोच उसके विचार से स्पष्ट होती है और सोच तैयार होती है संस्कार से। आज की पीढ़ी इतनी संस्कारवान तो है कि अपनी प्रेमिका की जान बचाने के लिए जूझ सकती है। पीठ दिखाकर भागने वाली पीढ़ी नहीं है यह। पर यह तो सोचो कि क्या मोमबत्ती जलाने से सोच बदली जा सकती है? सोच बदलने के लिए अच्छे संस्कार होने चाहिए। एक मां अपनी कोख से बेटे को जन्म देती है और बेटी को भी। आगे चलकर बेटे को स्वतंत्रता और बेटी को जंजीरें मिलती हैं। आखिर इसका क्या कारण है? संस्कार की गलत शुरुआत तो यही से हो रही है। आज सोचने का वक्त  पालकों का है। हमारे देश के नेताओं को ऐसे संस्कार मिले ही नहीं, यह तो उनके बयानों से ही स्पष्ट हो जाता है। नेता हमेशा यही कहते हैं कि मीडिया ने उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया। किसी विवादास्पद बयान के बाद हर नेता यही कहता है कि उनके पूरे बयान पर ध्यान नहीं दिया गया। आश्चर्य होता है, ऐसा कभी बाल ठाकरे के बारे में नहीं कहा गया। उन्होंने जब भी बयान दिया, सोच-समझकर दिया। फिर चाहे मीडिया ने उसे किसी भी तरह से तोँड़-मरोड़कर पेश किया हो। पर वे अपने बयान से कभी नही पलटे। आखिर ये नेता अपने बयान से पलट क्यों जाते हैं?
बलात्कार जैसी घटना नृशंस है, पाशवी है, अमानवीय है और बलात्कारी कड़ी से कड़ी सजा का पात्र है। बलात्कार क्यों होते हैं, यह सभी जानते हैं, पर इसे रोकने के लिए क्या करना चाहिए, इस पर विचार नहीं किया जा रहा है। ये बयानवीर नेता बलात्कार के लिए केवल नारी को ही दोषी मान रहे हैं। क्या इसके लिए केवल और केवल नारी ही दोषी है? ये नेता भूल जाते हैं कि बलात्कार के आरोपी सांसद-विधायक भी हैं, जो उनके साथ संसद और विधानसभा में आज तक बैठ रहे हैं। बलात्कार किसी नेता की बेटी या पत्नी के साथ क्यों नहीं होता। क्यों मजबूर और लाचार युवतियों बलात्कारियों के चंगुल में फंस जाती हैं। नेताओं के बयान खाप पंचायतों के मनसबदारों की तरह हैं, जो आज भी पुरातत्वकालीन दिनों में जी रहे हैं। बलात्कार को लेकर आज जो भी बयान सामने आ रहे हैं, वे सभी पूर्वग्रह से ग्रस्त हैं। सोच बदलने की बात कोई नहीं कर रहा है। पहले नेताओं के बारे में यह कहा जाता था कि वे जब भी जो कुछ कहते हैं, पूरी तरह से नाप-तौलकर बोलते हैं। पर अब ऐसा नहीं है, अब तो बड़े-बड़े महारथी नेताओं की जबान फिसलने लगी है। उन्हें खुद ही पता नहीं होता कि वे क्या कह रहे हैं। बाद में पछताते हैं और अपने बयान वापस लेने का ढोंगे करते हैं। शायद उन्हें नही मालूम की बंदूक से निकली गोली और जबान से निकले शब्द कभी वापस नहीं आते। आज सबसे अधिक आवश्यकता यह है कि महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को किस तरह से रोका जाए, ऐसे में हमारे बयानवीर नेता अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। विचार मंथन के समय ऐसी हरकतों शोभा नहीं देती। इन नेताओं को शायद इंडिया गेट और जंतर-मंतर पर भीड़ कम होने का ही इंतजार था। भीड़ घटी और नेता फट पड़े।
मध्यप्रदेश के उद्योग मंत्री कैलास विजयवर्गीय ने कहा कि यदि नारी लक्ष्मण रेखा पार करेंगी, तो रावण ही मिलेगा। यदि वे इसे दिल्ली में हुए गेंगरेप से जोड़कर कह रहे हैं तो सवाल यह उठता है कि दामिनी ने कौन सी लक्ष्मण रेखा पार की थी, जो उसे 6-6 रावण मिले? आज नारी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है और समाज को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दे रही है। ऐसे में इस तरह का बयान मूर्खतापूर्ण है। यदि सीता ने लक्ष्मण रेखा पार की थी, तो क्या उसे पूजा नहीं जाना चाहिए। आखिर उनकी पूजा क्यों हा ेरही है? सीता के बजाए रावण की हरकतों पर ध्यान क्यों नहीं दिया जा रहा है? क्या रावण के लिए लक्ष्मण रेखा नहीं होनी चाहिए? नारी पर हर तरह से बंदिशें लगाई जा रही हैं, पर पुरुष आज तक अपनी मनमानी कर रहा है।  उधर संघ से भागवत का बयान भी कम आपत्तिजनक नहीं है। आज छोटे-छोटे गांव में दुष्कर्म हो रहे हैं। गुजरात में इस समय जितने भी दुष्कर्म के मामले सामने आए, उसमें अधिकांश गांव में हुए हैं। इन घटनाओं पर वे क्या कहना चाहेगे? शायद उन्हें ही नहीं मालूम। आज कई परिवार ऐसे हैं, जहां महिलाएं काम न करें, तो उनका गुजारा ही मुश्किल हो जाए। ऐसे में नारी के योगदान को किसी भी तरह से कम नहीं आंका जाना चाहिए।
देश में बलात्कार की घटना एक सामाजिक रोग है, इसे भौगोलिक सीमा में नहीं बांधना चाहिए। इसे ाश्चात्य संस्कृति से भी जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। नारी अत्याचार को लेकर पहले अपनी सोच बदलनी होगी। इसे संस्कार से जोड़कर देखा जाना चाहिए। राम बनने के लिए कौशल्या जैसी मां और दशरथ जैसे पिता का होना आवश्यक है। आज जवान बेटे की हरकतों से डरने वाले माता-पिता बेटे को अनजाने में किस तरह का संस्कार दे रहे हैं, किसी से छिपा नहीं है। बेटे को मिली छूट को ही देखकर बेटी भी यदि बगावत करे, तो उस पर तुरंत ही पाबंदी लगा दी जाती है। नारी पहले से ही अपनी सीमाओं में हैं, पर पहले पुरुष तो अपनी सीमा तय करे। संस्कारों के तटबंध मजबूत होंगे, तभी सीमाएं सुरक्षित रह पाएंगी, अन्यथा आज जो कुछ हो रहा है, हालात उससे भी बदतर हो सकते हैं।
    डॉ. महेश परिमल

रविवार, 23 दिसंबर 2012

पंछी ताल नहाने आया

बहुत दिनों से
गायब कोई पंछी
ताल नहाने आया |
चोंच लड़ाकर
गीत सुनाकर
फिर -फिर हमें रिझाने आया |

बरसों से
सूखी टहनी पर
फूल खिले ,लौटी हरियाली ,
ये उदास
सुबहें फिर खनकीं
लगी पहनने झुमके ,बाली ,
शायद मुझसे
ही मिलना था
लेकिन किसी बहाने आया |

धूल फांकती
खुली खिड़कियाँ
नये -नये कैलेण्डर आये ,
देवदास के
पागल मन को
केवल पारो की छवि भाये ,
होठों में
उँगलियाँ फंसाकर
सीटी मौन बजाने आया |

सर्द हुए
रिश्तों में खुशबू  लौटी
फिर गरमाहट आई ,
अलबम खुले
और चित्रों को
दबे पांव की आहट भाई ,
कोई पथराई
आँखों को
फिर से ख़्वाब दिखाने आया |

दुःख तो
बस तेरे हिस्से का
सबको साथी गीत सुनाना ,
कोरे पन्नों
पर लिख देना
प्यार -मोहब्बत का अफ़साना ,
मैं तो रूठ गया था
ख़ुद से
मुझको कौन मनाने आया |


जयकृष्‍णा राय तुषार

बुधवार, 28 नवंबर 2012

अदृश्य रहस्यमयी गाँव टेंवारी


ब्लॉ.ललित शर्मा, शनिवार, 24 नवम्बर 2012

धरती पर गाँव-नगर, राजधानियाँ उजड़ी, फिर बसी, पर कुछ जगह ऐसी हैं जो एक बार उजड़ी, फिर बस न सकी। कभी राजाओं के साम्राज्य विस्तार की लड़ाई तो कभी प्राकृतिक आपदा, कभी दैवीय प्रकोप से लोग बेघर हुए। बसी हुयी घर गृहस्थी और पुरखों के बनाये घरों को अचानक छोड़ कर जाना त्रासदी ही है। बंजारों की नियति है कि वे अपना स्थान बदलते रहते हैं, पर किसानों का गाँव छोड़ कर जाना त्रासदीपूर्ण होता है, एक बार उजड़ने पर कोई गाँव बिरले ही आबाद होता है। गरियाबंद जिले का केडी आमा (अब रमनपुर )गाँव 150 वर्षों के बाद 3 साल पहले पुन: आबाद हुआ। यदा कदा उजड़े गांव मिलते हैं, यात्रा के दौरान। ऐसा ही एक गाँव मुझे गरियाबंद जिले में फिंगेश्वर तहसील से 7 किलो मीटर की दूरी पर चंदली पहाड़ी के नीचे मिला।

गूगल बाबा की नजर से
सूखा नदी के किनारे चंदली पहाड़ी की गोद में 20.56,08.00" उत्तर एवं 82.06,40.20" पूर्व अक्षांश-देशांश पर बसा था टेंवारी गाँव। यह आदिवासी गाँव कभी आबाद था, जीवन की चहल-पहल यहाँ दिखाई देती थी। अपने पालतू पशुओं के साथ ग्राम वासी गुजर-बसर करते थे। दक्षिण में चंदली पहाड़ी और पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती सूखा नदी आगे चल कर महानदी में मिल जाती है। इस सुरम्य वातावरण के बीच टेंवारी आज वीरान-सुनसान है। इस गाँव के विषय में मिली जानकारी के अनुसार इसे रहस्यमयी कहने में कोई संदेह नहीं है। उजड़े हुए घरों के खंडहर आज भी अपने उजड़ने की कहानी स्वयं बयान करते हैं। ईमली के घने वृक्ष इसे और भी रहस्यमयी बनाते हैं। ईमली के वृक्षों के बीच साँपों बड़ी-बड़ी बांबियाँ  दिखाई देती हैं। परसदा और सोरिद ग्राम के जानकार कहते हैं कि गाँव उजड़ने के बाद से लेकर आज तक वहां कोई भी रहने की हिम्मत नहीं कर पाया।

रमई पाट के पुजारी प्रेम सिंह ध्रुव

ग्राम सोरिद खुर्द से सूखा नदी पार करने के बाद इस वीरान गाँव में अब एक मंदिर आश्रम स्थित है। रमई पाट के पुजारी प्रेम सिंह ध्रुव कहते हैं- जब हम जंगल के रास्ते से गुजरते थे तो एक साल के वृक्ष की आड़ में विशाल शिवलिंग दिखाई देता था। जो पत्तों एवं घास की आड़ छिपा था। ग्रामीण कहते थे कि उधर जाने से देवता प्रकोपित हो जाते हैं इसलिए उस स्थान पर ठहरना हानिप्रद है। इसके बाद मंगल दास नामक साधू आए, उनके लिए हमने पर्णकुटी तैयार की। पहली रात को ही हमे भयावह नजारा देखने मिल गया। हम दोनों एक चटाई पर सोये थे, बरसाती रात में शेर आ गया और झोंपड़ी को पंजे से खोलने लगा। हम साँस रोके पड़े रहे और भगवान से जान बचाने की प्रार्थना करते रहे। छत की तरफ निगाह गयी तो वहां बहुत बड़ा काला नाग सांप लटक कर जीभ लपलपा रहा था। हमारी जान हलक तक आ गयी थी, भगवान से अनुनय-विनय करने पर दोनों चले गए। मैं झोंपड़ी से निकल कर शिवलिंग के सामने दंडवत हो गया। उस दिन के पश्चात इस तरह की घटना नहीं हुयी।

टानेश्वर नाथ महादेव

आश्रम में पहुचने पर भगत सुकालू राम ध्रुव से भेंट होती है, शिव मंदिर आश्रम खपरैल की छत का बना है, सामने ही एक कुंवा है। कच्ची मिटटी की दीवारों पर सुन्दर देवाकृतियाँ बनी हैं। शिव मंदिर की दक्षिण दिशा में सूखा नदी है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि यह शिवलिंग प्राचीन एवं मान्य है। इसे टानेश्वर नाथ महादेव कहा जाता है, यह एकमुखी शिवलिंग तिरछा है। कहते हैं कि फिंगेश्वर के मालगुजार इसे ले जाना चाहते थे, खोदने पर शिवलिंग कि गहराई की थाह नहीं मिली। तब उसने ट्रेक्टर से बांध कर इसे खिंचवाया। तब भी शिवलिंग अपने स्थान से टस से मस नहीं हुआ। थक हार इसे यहीं छोड़ दिया गया। तब से यह शिवलिंग टेढ़ा ही है। मंगल दास बाबा की समाधी हो गयी। वे ही यहाँ रात्रि निवास करते थे, उसके बाद से आज तक यहाँ रात्रि को कोई रुकता नहीं है। अगर कोई धोखे से रुक जाता है तो स्थानीय देवी-देवता उसे विभिन्न रूपों में आकर परेशान करते हैं, डराते हैं। सुकालू भगत भी शाम होते ही अपने गाँव धुडसा चला जाता है।

सुकालू भगत

बाबा मंगल दास के पट्ट शिष्य परसदा निवासी भूतपूर्व सरपंच जगतपाल इस गाँव के उजड़ने का बताते हैं कि टेंवारी गाँव में इतने सारे देवी देवता इकट्ठे हो गए हैं कि त्यौहार के अवसर पर एक कांवर भर के उनके नाम के दिए जलाने पड़ते हैं। किसी देवता की भूलवश अवहेलना होने पर उसके उत्पात गाँव में प्रारंभ हो जाते थे। महिलाओं के मासिक धर्म के समय की अपवित्रता के दौरान अगर कोई महिला घर से बाहर निकल जाती थी तो ग्रामवासियों को दैवीय प्रकोप झेलना पड़ता था। बीमारी हो जाना, रात को जानवरों का बाड़ा स्वयमेव खुल जाना, मवेशियों को शेर, बुंदिया द्वारा उठा ले जाना, अकस्मात किसी की मृत्यु हो जाना इत्यादि दैवीय प्रकोपों को निरंतर झेलना पड़ता था। इससे बचने के लिए मासिक धर्म के दौरान पुरुष, महिलाओं के स्नान के लिए स्वयं पानी भर के लाते थे। सावधानी बरतने के बाद भी चूक हो ही जाती थी। तब फिर से दैवीय प्रताड़ना का सिलसिला प्रारंभ हो जाता था।

घरों के अवशेष

एक समय ऐसा आया की सभी ग्रामवासियों ने यहाँ से उठकर अन्य स्थान पर निवास करने का निर्णय किया।  भागवत जगत "भुमिल" कहते हैं कि सोरिद मेरी जन्म भूमि है, लगभग सन 1934 में टेंवारी के ग्राम वासी सोरिद खुर्द, नांगझर एवं फिन्गेश्वरी  में विस्थापित हुए, 1920 के राजस्व अभिलेखों में इस गाँव का उल्लेख मिलता है। अदृश्य शक्तियों के उत्पात इस वीरान गाँव में तहलका मचाते हैं। यहाँ के शक्तिशाली देवता बरदे बाबा हैं, इनका स्थान चंदली पहाड़ी पर है। जगतपाल कहते हैं कि यदि इस पहाड़ी पर कोई भटक जाता है तो बरदे बाबा उसे भूखा नहीं मरने देते। उसे जंगल में ही चावल, पानी और पकाने का साधन मिल जाता है। यहाँ के समस्त देवी देवताओं की जानकारी तो नहीं मिलती पर मरलिन-भटनिन, कोडिया देव, कमार-कमारिन, कोटवार, धोबनिन, गन्धर्व, गंगवा, शीतला, मौली, पूर्व दिशा में सोनई-रुपई जानकारी में हैं तथा नायक-नयकिन यहाँ के मालिक देवी-देवता हैं।

ईमली के पेड़ों के बीच अवशेष

जगतपाल कहते हैं कि जब मैं आश्रम में रुकता था तो तरह-तरह के सर्प दिखाई देते थे। दूध नाग, इच्छाधारी नागिन, लाल रंग का मणिधारी सर्प दिखाई देता था, वह अपनी मणि को उगल कर शिकार करता है, अगर मैं चाहता तो उसकी मणि को टोकनी से ढक भी सकता था पर किसी अनिष्ट की आशंका से यह काम नहीं किया। आश्रम में रात को सोनई-रुपई स्वयं चलकर आती हैं। मैंने कई बार देखा है। इस स्थान पर सिर्फ मंगल दास बाबा ही टिक सके, अन्य किसी के बस की बात नहीं थी। बाबा ने बताया था कि एक बार 12 लोगों ने मिल कर खुदाई करके सोनई-रुपई को निकल लिया था, पर ले जा नहीं सके। यहाँ कोई चोरी करने का प्रयास करता है उससे स्थानीय अदृश्य शक्तियां स्वयं निपट लेती है। कहते हैं कि इस पहाड़ी की मांद में सात खंड हैं, पहले खंड में टोकरी-झांपी, दुसरे खंड में नाग सर्प, तीसरे में बैल , चौथे में शेर, पांचवे में सफ़ेद हाथी, छठे में देव कन्या एवं सातवें में बरदे बाबा निवास करते हैं।

बाबा मंगल दास के पट्ट शिष्य परसदा निवासी भूतपूर्व सरपंच जगतपाल

टानेश्वर नाथ शिवजी के विषय में मान्यता है कि जब इसके पुजारी धरती पर जन्म लेते हैं तब यह (भुई फोर) धरती से ऊपर आकर प्रकाशित होते हैं, इनके पुजारी नहीं रहते तो ये फिर धरती में समाहित हो जाते हैं। साथ ही किंवदंती है कि टानेश्वर नाथ महादेव के दर्शन करने से सभी पाप एवं कल्मषों का शमन हो जाता है। टेंवारी गाँव उजड़े लगभग एक शताब्दी बीत गयी पर दूबारा किसी ने इस वीरान गाँव को आबाद करने की हिम्मत नहीं दिखाई। ईश्वर ही जाने अब टेंवारी कब आबाद होगा? शायद इसकी भी किस्मत केडी आमा गाँव जैसे जाग जाए।

सूखा नदी के किनारे यायावर