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बुधवार, 21 अगस्त 2019

घूम रहा है काल पहिया

 आज अगर अमित शाह की जगह कोई दूसरा गृहमंत्री होता तो चिदंबरम आज भी अपने घर पर मिलते। वे डरे हुए न होते। लापता न होते। वाकई बहुत ही दिलचस्प राजनीतिक लड़ाई है। संयोग देखिए। पी. चिदंबरम आज भागे हुए हैं और आज देश का गृह मंत्रालय अमित शाह के हाथ में है। कभी तस्वीर एकदम उल्टी थी। तब चिदंबरम देश के गृहमंत्री थे और अमित शाह साबरमती की जेल में थे। तब चिदंबरम नॉर्थ ब्लॉक स्थित गृहमंत्री कार्यालय में बैठकर "भगवा आतंकवाद" की फाइल तैयार करवा रहे थे और अमित शाह अपने बचाव की फ़ाइल में रोज़ ही नए पन्ने जोड़ रहे थे। अमित शाह इस मामले में हिसाब किताब पूरा रखने के आदी हैं। मुरव्वत करना उनकी आदत में नही है। ये अमित शाह के गृहमंत्री होने का खौफ ही है कि चिदंबरम रातोंरात लापता हैं।

यही अमित शाह के काम करने की शैली है। किसी ने कभी उम्मीद नही की थी कि एक रोज़ कश्मीर में यूँ बाजी पलट दी जाएगी। उम्मीद तो ये भी नही थी कि कभी देश के सबसे ताकतवर मंत्री रहे चिदंबरम का ये हश्र भी होगा! पर यही अमित शाह हैं। उनकी किताब में "रियायत" नाम का शब्द नही हैं। सही-गलत क्या है, ये फैसला वक़्त और कोर्ट पर छोड़ते हैं। आज सिर्फ राजनीति की नई इबारत को पढ़ने की कोशिश हैं। चिदम्बरम मार्च 2018 से लगातार अपनी गिरफ्तारी पर रोक का आदेश हासिल कर रहे थे। मगर आज किस्मत जवाब दे गई। उनके खिलाफ ठोस सबूत हैं। एक भी आरोप हवाई नहीं हैं। विदेशों में परिवार के नाम हजारों करोड़ों की संपत्ति के कागज हैं। आईएनएक्स मीडिया और फिर एयरसेल-मैक्सिस के मामले में एफआईपीबी नियमों को तोड़ मरोड़ कर सैकड़ों करोड़ का फायदा पहुंचाने और उसका एक बड़ा परसेंटेज अपने बेटे की कंपनी तक पहुंचाने के पक्के सबूत हैं। ये सब तब हो रहा था जब चिदंबरम देश के वित्तमंत्री थे।

यकीन मानिए कि इस देश की राजनीति वक़्त के एक निर्णायक दौर में पहुंच चुकी है। परिवार, खानदान, प्रभावशाली लोग, बड़े नेताओं से मीठे रिश्ते जैसे सियासत के खानदानी शब्द राजनीति की इस नई डिक्शनरी से साफ हो चुके हैं। अब ये आर-पार की लड़ाई है। आज चिदंबरम की बारी आई है। नोट कर लीजिए, कल दस जनपथ का बुलावा आएगा। इन पांच सालों में बहुत कुछ ऐसा होगा जो इतिहास में कभी न हुआ।

नोट कर लीजिए कि भारत की राजनीति के ये 5 साल अगले सौ सालों तक राजनीति के लिए शोध का विषय रहेंगे।

गुरुवार, 14 मई 2015

कहीं चलन न बन जाए रोमन लिपि में हिंदी का लिखा जाना

डॉ. अमरीश सिन्हा
अमरीश सिन्हा पिछले दिनों एक संगोष्ठी में जाना हुआ । एक प्रतिभागी का  कहना था कि हिंदी को रोमन लिपि में लिखने से हमें  परहेज  नहीं करना चाहिए, बल्कि इसका स्वागत किया जाना  चाहिए । उन्होंने तर्क भी दिए कि एसएमएस, कंप्यूटर,  इंटरनेट में रोमन लिपि के सहारे हिंदी लिखने में आसानी  होती है । इसलिए समय की जरूरत के मुताबिक इस बात  पर  जोर देना हमें बंद करना चाहिए कि हिंदी को हम  देवनागरी लिपि में लिखें । उन्होंने यह भी कहा कि आजकल  फिल्मों  की स्क्रिप्ट, नाटकों की स्क्रिप्ट, नेताओं के भाषण के साथ-साथ सरकारी कार्यालयों में उच्च अधिकारियों के सम्बोधन –अभिभाषण आदि के लिए लिखे जाने वाले वक्तव्य रोमन लिपि में लिखे होते हैं। देवनागरी में टाइप करने में समय  अधिक लगता है। टाइप करना कठिन भी है । रोमन में मोबाइल में भी लिखना सरल है। इसलिए रोमन लिपि में हिंदी  लिखने से हिंदी का प्रचार तेजी से होगा । सरसरी तौर पर ये बातें जंचती हुई लग सकती हैं । परन्तु यदि हम इन्हें  इतिहास, समाज और भाषायी संस्कृति के पहलुओं पर विचार करते हुए देखें तो कई महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं    जिनको नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता । किया तो इतिहास को झुठलाना होगा ।
वस्तुत: भाषा एक सदा विकसित होने वाले और बदलने वाला क्रियाकलाप है जिसके पीछे सबसे बड़ा योगदान उस भाषा के मूलभाषियों का होता है । हिंदी भाषा उसका अपवाद नहीं है । हो भी नहीं सकती । हालांकि यह भी उतना ही सत्य और खरा है कि हिंदी को विकसित करने में हिंदीतर लोगों की बहुत बड़ी भूमिका है । दक्षिण भारत के भाषा-भाषियों के मध्य हिंदी का प्रचार-प्रसार इन हिंदीतर भाषियों की साधना का ही प्रतिफल है । बहरहाल, भाषा विज्ञान कहता है कि किसी भाषा का प्रसार तथा चरित्र उस भाषा का उपयोग करने वाले लोगों द्वारा लगातार परिभाषित और पुन: परिभाषित होते रहने में निहित है । औपनिवेशिक अतीत वाले क्षेत्रों में उपनिवेशकों की भाषा के शब्दों को भी खुलकर अपनाया जाता है । भारत के साथ भी ऐसा ही है । जापान, क्यूबा, तुर्की, निकारागुआ, फ्रांस, जर्मनी आदि जैसे विश्व के कई देशों के साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही है । इसलिए अधिकांश देशों ने उपनिवेशवाद से मुक्ति मिलते ही अपनी मूल भाषा के उपयोग के वास्ते कमर कस ली । नतीजा सामने है । न क्यूबा में अंग्रेजी या अन्य औपनिवेशिक भाषा में कामकाज होता है, न जापान, फ्रांस, जर्मनी, वियतनाम, पोलैंड आदि देशों में । भले ही, कामकाज सरकारी हो या निजी कंपनियों में । तुर्की के उदाहरण से तो हम सब वाकिफ हैं । मुस्तफा कमाल पाशा ने तुर्की के औपनिवेशिक दासता से छुटकारे के तुरंत बाद पूरे देश में तुर्की के इस्तेमाल और व्यवहार का फरमान जारी कर दिया । यह हम और हमारा भारतीय समाज ही है जो स्वाधीनता के 67 वर्ष बाद आज भी इसी एक मुद्दे पर रस्साकशी में जुटे हैं । आपको याद होगा एक नाम डॉ. दौलत सिंह कोठारी का । देश के ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक, शिक्षाविद और नीति नियंता थे वे । उन्हें देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रशासन के बारे में गहराई तक समझ थी । उनका हमेशा यह मानना रहा कि जिन नौकरशाहों को इस देश की भाषाएं नहीं आतीं, भारतीय साहित्य और संस्कृति का ज्ञान नहीं है, उन्हें भारत सरकार में शामिल होने का कोई हक नहीं है । उन्होंने कहा था कि साहित्य ही समाज को समझने की दृष्टि देता है ।
उनके निर्देशन में ही शिक्षा के संबंध में कोठारी समिति का गठन भारत सरकार ने किया था और उनकी सिफारिशों पर ही वर्ष 1979 से सभी प्रशासनिक सेवाओं में पहली बार अपनी भाषाओं में लिखने की छूट मिली । इसके अद्भुत परिणाम देखने को मिले । परीक्षा में बैठने वालों की संख्या एकबारगी ही दस गुना बढ़ गई । गरीब घरों के मेधावी छात्र आई.ए.एस. बनने लगे । आदिवासी, अनुसूचित जाति की पहली पीढ़ी के बच्चे प्रशासनिक सेवाओं में चुने गए । रिक्शाचालक का लड़का भी आई.ए.एस. बन सका और दूसरे के घरों में काम करने वाली की लड़की भी । वरना 1979 से पहले सिर्फ धनाढ्य अंग्रेजीदां के सुपुत्र – सुपुत्रियां ही जिलाधीश की कुर्सियों पर काबिज़ हो पाती थीं । संविधान में समानता के इसी आदर्श तक पहुंचने की लालसा हमारे संविधान – निर्माताओं के मन में थी । यद्यपि वर्ष 2013 की शुरूआत में इस पध्दति को बदलने की कोशिश की गई । एक डर सा छा गया देश के असंख्य युवक-युवतियों के मन में । संसद में बहस हुई और सिविल सेवाओं में भारतीय भाषाओं का परीक्षा का माध्यम बनाए रखने की पध्दति पूर्ववत रखने का फैसला ले लिया गया । यह सुखद और सुकुन भरा पक्ष रहा ।
शब्दों से प्रगाढ़ता बनाता शब्दों को आसान :
लेकिन फिर वह मसला ज्यों-का-त्यों रह जाता है कि हिंदी के लिए रोमन लिपि के इस्तेमाल के क्या-क्या खतरे हैं । महज इस वजह से कि हमें मोबाइल पर टाइप करते वक्त रोमन का प्रयोग सरल लगता है, रोमन लिपि की तरफदारी नहीं की जा सकती । यह विषय वस्तुपरक (सब्जेक्टिव) भी है । जो कार्य किसी एक के लिए आसान हो सकता है, वही दूसरे के लिए कठिन और दुरूह भी हो सकता है । ये दोनों स्थितियां व्यक्ति की क्षमता, योग्यता, उम्र, परिवेश, संस्कार और कौशल आदि कई गुण-दोषों पर निर्भर करती हैं । वैसे भी, अब एंड्राइड फोनों और कम्प्यूटरों दोनों जगह देवनागरी की वर्णमाला स्क्रीन पर एक क्लिक पर डिस्पले हो जाती है । आप हर चौकोर खाने की उंगली से छूते जाएं, टेक्स्ट टाइप होता जाएगा । कहां क्या परेशानी है ? इस संगोष्ठी में ही एक युवा अपने एंड्राइड फोन पर इस सुविधा को प्रदर्शित करते हुए सभी के समक्ष देवनागरी लिपि की पैरवी करता हुआ दिखा । यह देखकर युवा वर्ग पर लगने वाला यह आरोप भी खारिज़ होता है कि अंग्रेजी की मुख़़ालफत करने वाला वर्ग युवा वर्ग है । हिंदी में सरकारी कामकाज को कई लोग कठिन मानते हैं । उच्च शिक्षा हिंदी या मातृभाषा में नहीं प्राप्त की जा सकती, न ही, विज्ञान और तकनीकी संबंधी ज्ञान अंग्रेजी के इतर भारतीय भाषाओं में हासिल नहीं की जा सकती - यह मानना सिरे से मिथ्या है ; कारण यह कि जापान, चीन और दोनों कोरियाई देश, जर्मनी और यहां तक इजरायल भी अंग्रेजी में शिक्षा प्रदान नहीं करते हैं जबकि दुनिया में ये देश तकनीकी प्रगति के प्रणेता माने जाते हैं ।
इस संदर्भ में 'सरल' और 'कठिन' पर थोड़ी चर्चा जरूरी है । भाषा के बनावटीपन को छोड़ दें (जैसे, ट्रेन के लिए 'लौहपथगामिनी' या ट्रैफिक सिग्नल के लिए 'यातायात संकेतक' का प्रयोग) तो क्या सरल है और क्या कठिन, यह अक्सर उपयोग की बारम्बारता पर निर्भर करता है । बार-बार उपयोग से शब्दों से परिचय प्रगाढ़ हो जाता है और वे शब्द हमें आसान प्रतीत होने लगते हैं । जैसे 'रिपोर्ट' के लिए महाराष्ट्र में 'अहवाल' शब्द लोकप्रिय है लेकिन उत्तर प्रदेश में 'आख्या' का प्रयोग होता है । बिहार में 'प्रतिवेदन' का, तो कई अन्य जगह देवनागरी में 'रिपोर्ट' ही लिखी जाती है । उर्दू में पर्यायवाची शब्द है रपट । इसी तरह 'मुद्रिका (दिल्ली की बस सेवा में प्रयुक्त शब्द), विश्वविद्यालय, तत्काल सेवा, पहचान पत्र प्रचलित शब्द हैं गरज़ कि ये संस्कृत मूल शब्द हैं । स्कूली छात्र – छात्राओं के लिए बीजगणित (Algebra), अंकगणित (Arithmetic), ज्यामिति (Geometry), वाष्पीकरण (Veporisation) आदि संस्कृत मूल शब्द आसान हैं, क्योंकि प्रयोग की बारम्बरता यहां लागू होती है । क्वथनांक, गलनांक, घनत्व, रसायन शास्त्र, भौतिक शास्त्र, सिध्दांत, गुणनफल, विभाज्यता नियम, समुच्चय सिध्दांत, बीकर, परखनली, कलन शास्त्र आदि भी ऐसे ही शब्द हैं । इनका प्रथम प्रयोग दुरूह प्रतीत हो सकता है, पर निरंतर प्रयोग इन्हें हमारे लिए सरल बना देता है ।
अन्य भारतीय भाषाओं के साथ तालमेल जरूरी
अंग्रेजी के पैरोकारों का मानना है कि अंग्रेजी समृध्द भाषा है, अन्तर्राष्ट्रीय सम्पर्क-भाषा है । शेक्सपीयर, मिल्टन और डारविन जैसे मनिषियों ने उसमें अपनी रचनाएं की हैं । ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया में अंग्रेजी बोली जाती है, इस बात को स्वीकारने में कोई गुरेज नहीं है । लेकिन अंग्रेजी एकमात्र समृध्द भाषा है, सत्य नहीं है । ऐसा ही होता तो कम्प्यूटर के मसीहा कहे जाने वाले अमेरिकी निवासी बिल गेट्स अधिकारिक और सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहते कि संस्कृत कम्प्यूटर के लिए सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा और इसकी देवनागरी लिपि सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है ।
प्रसंगवश यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि यूरोपीय देशों में अंग्रेजी का प्रसार उसकी समृध्दि के कारण नहीं हुआ । उत्तरी अमेरिका, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया आदि देशों में लाखों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है, उनकी जमीन छीन ली गई है, वहां की जनता को गुलाम बनाकर बेचा गया है और आज भी कई समुदाय गुलामी की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं । यूरोपीय भाषाओं के बारे में एक भ्रान्त धारणा यह भी है कि उन सभी में अन्तरराष्ट्रीय शब्दावली प्रचलित है । अंग्रेजी की हिमायत करने वालों के पास एक तर्क यह भी है । लेकिन सत्य यह है कि अंग्रेजी सहित इन सभी यूरोपीय भाषाओं के पास पारिभाषिक शब्दावली गढ़ने के लिए कोई एक निश्चित स्त्रोत नहीं है । वे लैटिन से शब्द गढ़ती हैं । फ्रेंच, इतालवी के लिए यह स्वाभाविक है, क्योंकि वे लैटिन परिवार की हैं । यूरोप की भाषाएं ग्रीक के आधार पर शब्द बनाती हैं, क्योंकि यूरोप का प्राचीनतम साहित्य ग्रीक में है और वह बहुत सम्पन्न भाषा रही है । जर्मन, रूसी भाषाएं बहुत से पारिभाषिक शब्द अपनी धातुओं या मूल शब्द भंडार के आधार पर बनती हैं ।
जिस भाषा के पास अपनी धातुएं हैं और उपयुक्त मूल शब्द होंगे, वह भाषा समृध्द होगी । उसे ग्रीक या लैटिन या किसी अन्य भाषा से उधार लेने की जरूरत नहीं । संस्कृत, हिंदी और भारत की अन्य भाषाओं, विशेषतया दक्षिण भारत की मलयालम, तमिल और कन्नड जैसी शास्त्रीय भाषाएं तथा महाराष्ट्र की मराठी (मराठी को देश की छठी शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने के बाबत गठित अध्ययन समिति ने अपनी अनुशंसा दे दी है) के पास धातु-शब्दों का भंडार है । अंग्रेजी में अपने घर की पूंजी कुछ नहीं है । ग्रीक, लैटिन, फ्रेंच, फारसी, संस्कृत और हिंदी से उधार माल को अंग्रेजी में अंग्रेजी शब्द कहकर खपाया जाता है । बैंक, रेस्तरां, होटल, आलमीरा, लालटेन, जंगल, पेडस्टल ('पदस्थली' से बना) ऐसे ही चंद शब्द हैं जो मिसाल के लिए काफी हैं । एक तथ्य और है । धार्मिक कारणों से ब्रिटेन में ग्रीक की अपेक्षा लैटिन अधिक पढ़ी जाती रही है । इसलिए ग्रीक शब्दों के आधार पर बनी शब्दावली अधिक गौरवमयी समझी जाती है । हिंदी की बात करें तो इस भाषा में कई पारिभाषिक शब्दों का निर्माण हो चुका है ।
कई विद्वान निजी तौर पर पारिभाषिक शब्दों का निर्माण करते रहे हैं । अज्ञेय ने फ्रीलांस के लिए 'अनी-धनी' शब्द गढ़ा, हालांकि यह शब्द चला नहीं । भारत सरकार के अधीन कार्यरत वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग इस दिशा में सक्रिय रूप से कार्यरत रहते हुए हिंदी और अन्य मुख्य भारतीय भाषाओं में तकनीकी शब्दावली, शब्दार्थिकाओं, पारिभाषिक शब्दकोशों और विश्वकोशों का निर्माण करती रही है जिनमें सभी विज्ञानों, सामाजिक विज्ञानों और मानविकी विषयों को तथा प्रशासनिक लेखन से संबंधित शब्दावली को सम्मिलित किया गया है । हिंदी को आधुनिक अकादमिक विमर्श और ज्ञान मीमांसा
के नए क्षेत्र के हिसाब से सक्षम करने के लिए लाखों नए शब्द हिंदी में निर्मित किए गए हैं और यह प्रक्रिया अनवरत जारी है । देश की सामासिक संस्कृति (composite culture) को ध्यान में रखते हुए इतर भारतीय भाषाओं के लोकप्रिय और व्यावहारिक प्रयोग के शब्द हिंदी में शामिल किए जाते हैं । जैसे 'tomorrow' और 'note' के लिए मराठी शब्द क्रमश: 'उद्या' एवं 'नोंद' का प्रयोग महाराष्ट्र में लिखी जाने वाली हिंदी में देखने को मिलता है । क्योंकि यह आवश्यक और उपयुक्त प्रतीत नहीं होता कि हम नए पारिभाषिक शब्द बनाते समय हमेशा संस्कृत शब्दों का सहारा लें जैसा कि विगत में अक्सर होता रहा है, भले ही इतर भाषाओं, उर्दू, हिंदी तथा अंग्रेजी के लोकप्रिय शब्दों या 'बोलियों' के रूप में जाने जानी वाली भाषाओं में बेहतर विकल्प मौजूद हों जिनका भाषा के मुहावरे के साथ अच्छा तालमेल हो और समझने में भी आसान हो । ज्ञानार्जन की दृष्टि से, विशेषतया अध्ययन – अध्यापन – शोध – शिक्षण – प्रशिक्षण के क्षेत्रों में 'मानक' और संस्कृतनिष्ठ शब्दों की बजाय समझ में आने वाले स्पष्ट व उपयुक्त शब्दों का उपयोग श्रेयस्कर सिध्द हुआ है । कई अंग्रेजी तकनीकी शब्द भी हूबहू देवनागरी लिपि में लिखना प्रेरक और सफल रहा है । आई. टी. से जुड़े कई शब्द यथा, कम्प्यूटर, माउस, हैंग हो जाना, प्रिंटर, टेबलेट, फोल्डर, डेस्कटॉप, एप्लिकेशन, इंस्टॉल करना, इनबॉक्स, अपलोड, डाउनलोड, ट्रैश, स्पैम, स्क्रीन आदि कुछ ऐसे ही शब्द हैं । यह जरूरी है कि हिंदी में गरिमा और मानक के नाम पर अड़ियलपन और निरर्थक जटिलता के बंधनों को हटा दें । लोकप्रिय शब्दों को प्रयोग में लाएं पर सामासिक संस्कृति के हिसाब से, न कि सतही, अल्पकालिक और त्वरित उपाय ढूंढ़ने चाहिए । ऐसा न हो कि हिंदी में मानकीकरण और एकरूपता की धारणा पर हम ज्यादा ही जोर देने लगें । ऐसा होने पर अस्वाभाविक और बनावटी भाषा विकसित हो जाती है जो किसी भी मूलभाषी के भाषा भंडार का हिसाब नहीं होती । विख्यात हिंदी साहित्यकार कमलेश्वर ने कहा था - 'हिंदी तब तक विकसित नहीं हो सकती, जबतक कि अन्य भारतीय भाषाओं के साथ उसका गहरा संबंध नहीं बनेगा' । – यदि हमें हिंदी को बचाना है तो निश्चितरूप से क्षेत्रीय भाषाओं के साथ हमें तालमेल को विकसित करना होगा ।
दफ्तर में आते ही हिंदी भाती नहीं
एक दिलचस्प बात यह है कि जब हम सहज होते हैं, मनोरंजन की दुनिया में होते हैं, गाने सुनते हैं, ग़ज़ल-गीत सुनते हैं, फिल्में या टी.वी. धारावाहिक देखते हैं, या फिर बाजार में मोलभाव कर रहे होते हैं तब तो बड़े चाव से हिंदी का सहारा ले रहे होते हैं, लेकिन ज्योंही कार्यालयों में - सरकारी संस्थानों में प्रवेश होता है तो हिंदी लिखने में हमें शर्म महसूस होने लगती है या हाथ कांपने लगते हैं । कोई 'टाइपिंग नहीं आती' का रोना रोने लगते हैं, तो कोई 'जल्दी है' कहकर पीछा छुड़ाने लगते हैं । यह भी प्राय: सुनने को मिलता है कि हिंदी के शब्द जानने के वास्ते हमारे पास 'डिक्शनरी-ग्लॉसरी' नहीं है । पर मूल मुद्दा हमेशा एक ही रहता है - हिंदी लिखने में आत्मविश्वास की कमी । अंग्रेजी लिखने में हम बनावटी दंभ महसूस करते हैं, बस । जब आप अपनी कलम से किसी कागज पर या बैंक या रेल आरक्षण काउंटर पर फॉर्म भरते वक्त नाम लिखते हैं तो किसी टाइपिंग कला या कम्प्यूटर ज्ञान की जरूरत होती है ? किसी शब्दकोश – शब्दावली की आवश्यकता होती है ? फिर आपकी कलम की स्याही अंग्रेजी की तरफ क्यों बढ़ती है ? साफ है, या तो आप में आत्मविश्वास का अभाव है या आप अंग्रेजी के आतंक में हैं। पर यह स्पष्ट है कि तकनीक और शब्दकोशों से ज्यादा जरूरत हमें  इच्छाशक्ति की है।
भारत के विख्यात वैज्ञानिक व एकमात्र जीवित आविष्कारक और हिंदी में वैज्ञानिक उपन्यास लिखकर चर्चित हुए डॉ. जयंत नार्लिकर से यह पूछे जाने पर जब वैज्ञानिक लेखन करते वक्त मौलिक चिंतन की आवश्यकता महसूस हुई तब क्या आपने अंग्रेजी भाषा में ही सोचा, उन्होंने कहा - 'यह संभव ही नहीं था' । उस समय मातृभाषा के अतिरिक्त किसी भी भाषा ने मेरी मदद नहीं की और न ही कर सकती थी । फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रेंकोई मितरां से जब पूछा गया कि आप अपने देश में फ्रेंच भाषा को अंग्रेजी की बनिस्पत अधिक तरज़ीह क्यों देते हैं, राष्ट्रपति मितरां ने कहा कि क्योंकि हमें अपने सपने साकार करने हैं । जब हम सपने अपनी भाषा में देखते हैं तो उन्हें पूरा करने के लिए जो भी काम करेंगे उनके लिए अपनी ही भाषा का प्रयोग जरूरी होगा, पराई भाषा का नहीं ।

भाषा 'फोनेटिक' है तभी वैज्ञानिक है
बहरहाल, उसी संगोष्ठी में एक और सज्जन का कहना था कि भाषा फोनेटिक (ध्वनि पर आधारित) होती है । अर्थात – सुनने में जैसा लगे, भाषा वैसी ही होनी चाहिए और इस लिहाज से तो देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी , मराठी, संस्कृत आदि भाषाओं की ही जरूरत है और भविष्य भी इनका ही है । देवनागरी लिपि में 52 वर्णाक्षर होते हैं । पांच स्वर होते हैं । शेष व्यंजन होते हैं । स्वर वे होते हैं जिन्हें उच्चारित करने के लिए ओंठ और दांतों का सहारा नहीं लिया जाता है । स्वर आधारित राग-रागिनियां हैं हमारे शास्त्रीय संगीत में । फिर कवर्ग (क, ख, ग, घ), टवर्ग (ट, ठ, ड़, ढ) व तवर्ग (त, थ, द, ध) आदि हैं । कितना सूक्ष्म विश्लेषण है अक्षरों का, शब्दों के उच्चारण का । बड़ी ई', छोटी 'इ', छोटा 'उ', बड़ा 'ऊ' की मात्राओं से शब्दों के अर्थ कितने विस्तृत हो जाते हैं ! जैसे, 'दूर' से भौगोलिक दूरी की अभिप्राय होता है तो 'दुर' से तुच्छ वस्तु का अर्थ सामने आता है । इसी प्रकार 'सुख' आनंद का पर्याय है, जबकि 'सूख' से शुष्क या सूख (dry) जाने का बोध होता है । एक उदाहरण लें । यदि हमें 'डमरू' लिखना हो रोमन में तो हम 'dumru' या 'damroo' लिखेंगे । पर क्या पढ़ने वाला 'दमरू' नहीं पढ़ सकता है । 'ण', 'र' के प्रयोग तो हिंदी में विलुप्त ही होते जाते रहे हैं । रोमन में बेड़ा किस कदर गर्क होगा, अनुमान लगाया जा सकता है । और फिर 'क्ष', 'त्र', 'ज्ञ', 'त्र' का क्या - - - 'ड' और 'ड़' तथा 'ढ' और 'ढ़' का क्या करेंगे ? इन सबको हटा देंगे अपने व्याकरण से, अपने जेहन से ? सुविधा और आधुनिकता के नाम पर भविष्य में ऐसा हो जाए तो अचरज नहीं । फिर देवनागरी लिपि के 52 वर्ण घटकर 25-26 रह जाएंगे । कल्पना कीजिए, यदि ऐसा ही कुछ हो गया तो !
हमारे देश व पूरी दुनिया में विगत पचास वर्षों में कई भाषाएं और बोलियां विलुप्त हो गई हैं । अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा अरूणाचल प्रदेश में कई भाषाएं, बोलियां इन कारणों से लुप्त हो गईं कि कुछ की लिपियां न होने के कारण शिक्षण का माध्यम न बन सकीं और कुछ के बोलने वाले नहीं रहे । झारखण्ड में बोली जाने वाली 'हो', 'संताली', 'मुंडारी' आदि भाषाओं को अक्षुण्ण बनाने के लिए प्रयास तीव्र हो गए हैं, क्योंकि उनके प्रयोग करने वालों की संख्या लगातार घट रही है ।
दरअसल सारी परेशानियां गुरूतर तब हो गई जब कम्प्यूटर का भारत की धरती पर प्रवेश हुआ । अंग्रेजी भाषा के हिमायती नागरिकों ने कहना शुरू कर दिया कि हिंदी व दूसरी भारतीय भाषाओं का भविष्य खतरे में है । खुद कम्प्यूटर के प्रचालकों ने भी यह अफवाह फैलानी शुरू कर दी । धीरे-धीरे लोगों को यह समझ में आया कि कम्प्यूटर की तो अपनी कोई भाषा नहीं होती । यह तो डॉट (.) के रूपों को ही स्क्रीन पर प्रदर्शित करता है । फिर धीरे-धीरे, बल्कि कहें तो 21 वीं सदी में काफी तेजी से कम्प्यूटर ने इंसानी जीवन में दखल देना शुरू कर दिया । तब भी आरंभ के कुछ वर्षों तक भी अंग्रेजी को ही कम्प्यूटर की मित्र भाषा समझा गया । लेकिन धीरे-धीरे यह बात सामने आई कि कम्प्यूटर की दरअसल कोई भाषा नहीं होती है और अगर भाषा की कोई दरकार है अप्लिकेशंस को लेकर तो वह है देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली भाषाएं । मसलन हिंदी, मराठी, संस्कृत आदि । माइक्रोसॉफ्ट के जनक बिल गेट्स ने यह भी कहा है कि देवनागरी लिपि और इस लिपि में लिखी जाने वाली संस्कृत एवं हिंदी भाषाएं सर्वाधिक तार्किक और तथ्यपरक भाषाएं हैं ।
देवनागरी लिपि : श्रेष्ठ लिपि
आइए, यह भी जान लें कि हिंदी भाषा की लिपि 'देवनागरी कहां से और कैसे शुरू हुई; क्योंकि भारत की संविधान सभा ने भी 14 सितम्बर 1949 को यह घोषणा आधिकारिक तौर पर की थी कि संघ की राजभाषा हिंदी होगी जिसकी लिपि देवनागरी होगी । वस्तुत: 'देवनागरी' लिपि नागरी लिपि का विकसित रूप है । ब्राम्ही लिपि का एक रूप 'नागरी लिपि' था । नागरी लिपि से ही 'देवनागरी लिपि' का विकास हुआ । अनेक प्राचीन शिलालेखों एवं ताम्रपत्रों में ब्राह्मी लिपि प्रयुक्त हुई है । अशोक के शिलालेख भी ब्राह्मी लिपि में ही लिखे गये हैं । ईसा की चौथी शताब्दी तक समस्त उत्तर भारत में ब्राह्मी लिपि प्रचलित थी । ईसा -पूर्व पाँचवीं सदी तक के लेख ब्राह्मी लिपि में लिखे हुए उपलब्ध हुए हैं । इस प्रकार यह लिपि लगभग ढाई हज़ार वर्ष पुरानी है । इतनी प्राचीन होने के कारण इसे 'ब्रह्मा की लिपि' भी कहा गया है । यही भारत की प्राचीनतम मूल लिपि है, जिससे आधुनिक सभी भारतीय लिपियों का जन्म हुआ ।
ईसा-पूर्व पाँचवीं शताब्दी से लेकर ईसा के बाद चौथी शताब्दी तक के लेखों की लिपि ब्राह्मी रही है । मौर्य-काल में भारत की राष्ट्रीय लिपि 'ब्राह्मी' ही थी । इसके बाद ब्राह्मी लिपि दो रूपों में विभाजित हो गई – उत्तरी ब्राह्मी तथा दक्षिणी ब्राह्मी । उत्तरी ब्राह्मी प्रमुखत: विंध्याचल पर्वतमाला के उत्तर में प्रचलित रही तथा दक्षिणी ब्राह्मी विंध्याचल के दक्षिण में । 'उत्तरी ब्राह्मी' का आगे चलकर विविध रूपों नें विकास हुआ । उत्तरी ब्राह्मी से ही दसवीं शताब्दी में 'नागरी लिपि' विकसित हुई तथा नागरी लिपि से 'देवनागरी लिपि' का जन्म हुआ । उत्तर भारत की अधिकांश लिपियां, यथा, कश्मीरी, गुरूमुखी, राजस्थानी, गुजराती, बंगला, असमिया, उड़िया आदि भाषाओं की लिपियाँ नागरी लिपि का ही विकसित रूप हैं । यही कारण है कि देवनागरी लिपि तथा उक्त सभी लिपियों में अत्यधिक समानता है । 'दक्षिण ब्राह्मी' से दक्षिण भारतीय भाषाओं, य़था, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालय आदि भाषाओं की लिपियों का विकास हुआ । यद्यपि इन लिपियों का विकास भी मूलत: ब्राह्मी लिपि से ही हुआ है, तथापि देवनागरी लिपि से इनमें कुछ भिन्नता आ गई है ।
इन कारणों से देवनागरी लिपि है वैज्ञानिक
• यह लिपि विश्व की सभी भाषाओं की ध्वनियों का उच्चारण करने में सक्षम है । अन्य लिपियों में, विशेषकर विदेशी लिपियों में यह क्षमता नहीं है । जैसे अंग्रेजी में देवनागरी लिपि की महाप्राण ध्वनियों, कुछ अनुनासिक ध्वनियों आदि के लिए कोई उपयुक्त ध्वनि उपलब्ध नहीं है ।
• देवनागरी लिपि में जो लिखा जाता है, वही बोला जाता है और जो बोला जाता है, वही लिखा जाता है । लिखने और बोलने में समानता के कारण इसे सीखना सरल है । विदेशी लिपियों में यह विशेषता नहीं है । अंग्रेजी में तो बिल्कुल ही नहीं ।
• देवनागरी लिपि में प्रत्येक वर्ण की ध्वनि निश्चित है । वर्णों की ध्वनियों में वस्तुनिष्ठता है, व्यक्तिनिष्ठता नहीं । अंग्रेजी शब्दों के उच्चारण हर व्यक्ति अपने तरीके से करता है ।
• इस लिपि में एक वर्ण एकाधिक ध्वनियों के लिए प्रयुक्त नहीं होता । अत: किसी भी वर्ण के उच्चारण में कहीं भी भ्रम की स्थिति नहीं है । अंग्रेजी में एक ही वर्ण भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न रूप में उच्चारित होता है, अत: भ्रम की स्थिति रहती है ।
• देवनागरी लिपि में प्रत्येक प्रयुक्त वर्ण ध्वनि अवश्य देता है । चुप नहीं रहता । अंग्रेजी में कहीं-कहीं प्रयुक्त वर्ण चुप भी रहते हैं । जैसे, Budget में 'd' का उच्चारण नही होता । walk और knife में क्रमश: l और k चुप रहते हैं । कैसी विडम्बना है कि जिन वर्णों का सृजन ध्वनि देने के लिए किया गया है, भावों की सम्प्रेषणीयता के लिए किया गया है, उन्हें प्रयुक्त होने के बाद भी चुप रहना पड़ता है ।
• देवनागरी लिपि में ध्वनियों को अधिकाधिक वैज्ञानिकता प्रदान करने के लिए स्वरों तथा व्यंजनो की पृथक-पृथक वर्णमाला निर्मित की गई है ।
• स्वरों के उच्चारण के समय जैसी मुख की आकृति होती है, वैसी ही आकृति सम्बन्धित वर्ण की होती है । जैसे - 'अ' का उच्चारण करते समय आधा मुख खुलता है । 'आ' की रचना पूरा मुख खुलने के समान है । 'उ' का आकार मुख बंद होने की तरह है । 'औ' में दो मात्राएँ मुख के दोनों जबड़ों के संचालन के समान हैं ।
• स्वरों की ध्वनियों की वैज्ञानिकता यह है कि बच्चा पैदा होने के बाद स्वरों के उच्चारण क्रम में ही होते हैं ।
• स्वरों के उच्चारण में हवा कंठ से निकल कर उच्चारण स्थानों को बिना स्पर्श किये, बिना अवरूध्द हुए, ध्वनि करती हुई मुख से बाहर निकलती है ।
• व्यंजनों के उच्चारण में हवा कंठ से निकलकर उच्चारण-स्थानों को स्पर्श करती हुई या घर्षण करती हुई, ध्वनि करती हुई, ओठों तक होती हुई मुख या मुख और नासिका से बाहर निकलती है । इस प्रकार स्वरों तथा व्यंजनों में ध्वनि उत्पन्न करने की प्रक्रिया में भिन्नता है । अत: सिध्दांतत: स्वरों तथा व्यंजनों का वर्गीकरण पृथक-पृथक होना ही चाहिए । देवनागरी लिपि में इसी वैज्ञानिक आधार पर स्वर और व्यंजन अलग-अलग वर्गीकृत किये गये हैं ।
• व्यंजनों को उच्चारण-स्थान के आधार पर कंठ्य, मूर्ध्दन्य, दन्त्य तथा औष्ठ्य-इन पाँच वर्गों में वर्गीकृत किया गया है । कंठ से लेकर ओठों तक ध्वनियों का ऐसा वैज्ञानिक वर्गीकरण अन्य लिपियों में उपलब्ध नहीं है । उक्त वर्गीकरण ध्वनि-विज्ञान पर आधारित है ।
• देवनागरी लिपि में अनुनासिक ध्वनियों के उच्चारण में भी वैज्ञानिकता है, क्योंकि शब्दों के साथ उच्चारण करने पर अनुनासिक ध्वनियों में अन्तर आ जाता है, इसलिए व्यंजनों के प्रत्येक वर्ग के साथ, वर्ग के अंत में उसका अनुनासिक दे दिया गया है ।
• देवनागरी लिपि में हृस्व और दीर्घ मात्राओं में स्पष्ट भेद है । उनके उच्चारण में कोई भ्रम की स्थिति नहीं है । अन्य लिपियों में हृस्व और दीर्घ मात्राओं के उच्चारण की ऐसी सुनिश्चितता नहीं है । अंग्रेजी में तो वर्णों से ही मात्राओं का काम लिया जाता है । वहाँ हृस्व और दीर्घ में कोई अंतर नहीं है, मात्राओं का कोई नियम नहीं है ।
बहरहाल, सरकारी संस्थानों में संगोष्ठियों का आयोजन स्वागतयोग्य है । इसके मूलत: तीन कारण मेरे विचार में हैं । पहला, कार्यालयीन कामकाज में तल्लीन व्यक्ति को वैचारिक धरातल पर कुछ सुनने - समझने और सोचने विचारने - के अवसर मिलते हैं । यह उसकी मस्तिष्कीय सक्रियता को बढ़ाता है और सुषुप्त पड़ी रचनात्मक प्रतिभा को सामने लाने में सहायक होता है । दूसरा कारण, विचारवान व्यक्तियों से परिवार व समाज विचारवान होता है । आखिरी वजह बुनियादी भी है । भारत सरकार की राजभाषा नीति के क्रियान्वयन की दिशा में यह एक सशक्त गतिविधि है । उम्मीद है, सशक्त संगोष्ठियों के आयोजन का सिलसिला सरकारी कार्यालयों और विभागों में बढ़ेगा ।
पर यह आवश्यक हे कि हम किसी भी भारतीय भाषा को उसी लिपि में लिखें और लिखने को तरज़ीह दें जो उस भाषा के लिए बनी हुई है । रोमन लिपि के प्रति आकर्षण अंतत: हमें अपनी जड़ों से अलग ही करेगा । आखिर में एक बात । ज्यों - ज्यों हमारे देश में हिंदी और दूसरी भाषाओं को हल्के में लिए जाने का षडयंत्र बढ़ेगा, त्यों - त्यों इन भाषाओं के जानकारों का वर्चस्व बढ़ेगा । अच्छी हिंदी - शुध्द हिंदी, अच्छी मराठी - शुध्द मराठी, अच्छी गुजराती - शुध्द गुजराती लिखने-बोलने वालों की तूती बोलेगी .। तथास्तु ।

* डॉ. अमरीश सिन्हा
पता : ए-103, सच्चिदानंद रहेजा कॉम्पलेक्स,
मालाड (पूर्व), मुंबई-400 097
मोबाइल : 9869531601
ई-मेल : amrishsinhaa@gmail.com

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

भटके मानसून पर कुछ शब्द चित्र

गर्मी जाने का नाम नहीं ले रही है और मानसून रास्ता भटक गया है, हमेशा की तरह। ग वर्षा ऋतु के रास्ते में ग्रीष्म ऋतु अवरोधक बनी हुई है। बारिश की राह तकते-तकते आंखें भी थकने लगी हैं। पूरा देश अच्छे दिनों की प्रतीक्षा कर रहा है, पर पेट्रोल-डीजल, प्याज उसे आने ही नहीं दे रहे हैं। ऐसे में शब्द चित्र बनते हैं कुछ इस तरह...
दो डॉक्टर खाली बैठे हैं, एक डॉक्टर दूसरे से कहता है:-

देखो, खाली बैठे-बैठे मारने के लिए मक्खियां तक नहीं हैं, बारिश आए तो हमारी मंदी दूर हो जाए।


मौसम विभाग के एक सीनियर अधिकारी को एक मामूली से चपरासी ने सलाह दी..,
सर, इससे तो अच्छा है, विभाग में एक-दो ज्योतिष की भर्ती कर लो, कम से कम उनके गॉसिप सच्चे हो जाएं।

एक बड़े मॉल में मैनेजर की केबिन में असिस्टेंट हाथ में लम्बा कागज लेकर रिपोर्ट दे रहा है, सर ‘समर डिस्काउंट’ में जितना ‘सेल’ हुआ, उससे कई गुना तो एसी का बिल आ गया है?
एक एयरकंडीशंड डाइनिंग हॉल-कम-रेस्टारेंट के बाहर एक बोर्ड लगा है..
दोपहर 2 से 5 बजे तक एसी बंद रहेगा। केवल छाछ पीने आने वाले ग्राहक इस पर विशेष ध्यान दें। बाय अॅार्डर
मौसम विभाग के एक अधिकारी गुस्से से अपने मातहत से पूछ रहे हैं:- हमने 15 दिन पहले ऑफिस में भीगी हुई छतरियों को रखने के लिए स्टैंड का ऑर्डर दिया था, वह अभी तक कैसे नहीं बन पाया?
असिस्टेंट- सर, उसे मालूम होगा कि आखिर बारिश कब हो रही है।

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

बस्तर पर केन्द्रित दो पुस्तकों का लोकार्पण एवं काव्य-संध्या

कोंडागाँव। भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की संस्था राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत यानी नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नयी दिल्ली तथा छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद् की कोंडागाँव जिला इकाई के संयुक्त तत्वावधान में गत दिवस बस्तर पर केन्द्रित दो महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। इनमें से एक पुस्तक थी, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा प्रकाशित ""बस्तर का आदिवासी एवं लोक संगीत"" (लेखक : हरिहर वैष्णव, चित्रकार एवं छायाकार : खेम वैष्णव) और छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद् द्वारा प्रकाशित काव्य-संग्रह ""मैं बस्तर बोल रहा हूँ"" (कवि : डॉ. राजाराम त्रिपाठी)। इस आयोजन की अध्यक्षता छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद् के प्रांतीय उपाध्यक्ष चितरंजन रावल ने की जबकि मुख्य अतिथि थे हेमचन्द्र सिंह राठौर। इस आयोजन में लोक-संगीत के साथ-साथ काव्य-संध्या का आयोजन भी हुआ।
कार्यक्रम आरम्भ करते हुए न्यास के संपादक पंकज चतुर्वेदी ने बताया कि ""बस्तर का आदिवासी एवं लोक संगीत"" पुस्तक की अन्य विशेषताओं में एक विशेषता यह भी है कि इसमें प्रकाशित सभी छायाचित्र स्वाभाविक और दुर्लभ हैं और रेखांकन भी बहुत ही आकर्षक, जिसके लिये उन्होंने छायाकार एवं चित्रकार श्री खेम वैष्णव को बधाई दी। 
""बस्तर का आदिवासी एवं लोक संगीत"" के लेखक श्री हरिहर वैष्णव ने बताया कि यह पुस्तक कोई ढाई सौ लोगों के सहयोग से चालीस साल तक चले शोध व अन्वेषण का सार है, जिसमें 237 गोंडी, हल्बी, भतरी तथा बस्तरी आदि जनभाषाओं के पारम्परिक गीत उनके अनुवाद सहित हैं। उन्होंने इस पुस्तक को अपने सहयोग से परिपुष्ट करने वाले समस्त जनों का आभार व्यक्त किया। वैष्णव बन्धुओं ने इसके लिये लोक गायिका श्रीमती सुकदई कोराम को सम्मानित भी किया। 
दूसरी पुस्तक ""मैं बस्तर बोल रहा हूँ"" के कवि डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने अपने उद्बोधन में कहा कि वे इस बात से आहत हैं कि बस्तर को बदतर बनाया जा रहा है और उनकी रचनाएँ भले ही किसी को कविता के शिल्प की दृष्टि से कमजोर लगें, लेकिन यह उनके अन्तर्मन की आवाज है कि यहाँ का सुख, शांति, नैसर्गिक सौंदर्य, लोक जीवन लौटाया जाए। उन्होंने कहा कि उनकी कविताओं में बस्तर के जंगल-जमीन की तरह अनगढ़ भाव हैं। श्री त्रिपाठी ने अपनी एक रचना का पाठ करते हुए कहा कि ये रचनाएँ बस्तर के आम जन व युवाओं की आवाज है।
अमरकण्टक (म.प्र.) स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय से आए शोध-छात्र अजय कुमार सिंह ने ""बस्तर का आदिवासी एवं लोक संगीत"" पुस्तक पर अपनी समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह पुस्तक बताती है कि किस तरह बस्तर के जनजीवन में प्रत्येक अवसर पर्व, संस्कार, ऋतुओं, सुख-दु:ख सभी पर यहाँ गीत-संगीत उपलब्ध है। यह पुस्तक बस्तर के सामाजिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक सभी पक्षों को सहेजती है। श्री सिंह का सुझाव था कि यदि इस पुस्तक को ऑडियो सी.डी. के साथ प्रस्तुत किया जाता तो आने वाली पीढ़ी के लिये और बेहतर संदर्भ-ग्रन्थ होता। 
श्री सुरेन्द्र रावल ने डॉ. राजाराम त्रिपाठी के काव्य-संग्रह ""मैं बस्तर बोल रहा हूँ"" की कविताओं को कवि की साफगोई, निर्भीकता के स्वर निरुपित करते हुए कहा कि डॉ. त्रिपाठी की रचनाओं में बस्तर के प्रति उनकी संवेदना, दु:ख-दर्द तो प्रकट होता ही है, ये रचनाकार के दार्शनिक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी उभारती हैं। इस अवसर पर श्री हेमचन्द्र सिंह राठौर ने कहा कि यह कोंडागाँव के लिये गर्व की बात है कि यहाँ के रचनाकार राष्ट्रीय स्तर पर यहाँ की कला, संस्कृति, समस्याओं को अपनी कलम के माध्यम से सतत प्रस्तुत कर रहे हैं। श्री चितरंजन रावल ने बीते 50 साल के दौरान हिन्दी साहित्य में कोंडागाँव के योगदान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को याद करते हुए कहा कि विमोचित दोनों पुस्तकों की भाव-भूमि भले ही अलग-अलग हो लेकिन उनके सरोकार समान हैं। 
आयोजन में खीरेन्द्र यादव व साथियों ने हल्बी में "लेजा" और भतरी में "डाँडामाली" लोक-गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं को थिरकने पर मजबूर कर दिया। कार्यक्रम के अन्त में आयोजित एक संक्षिप्त काव्य-संध्या में काव्य-पाठ किया ललित शर्मा (अभनपुर) एवं शिवकुमार पाण्डेय (नारायणपुर) ने। आयोजन में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के संपादक पंकज चतुर्वेदी ने उनके संस्थान द्वारा बस्तर क्षेत्र के लिये किये जा रहे कार्यों की जानकारी देते हुए इस बात के लिये कोंडागाँव के लोगों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया कि बस्तर में न्यास के कार्य की शुरुआत यहीं से हुई थी। 

(हरिहर वैष्णव)

सोमवार, 7 जनवरी 2013

मजबूत होने चाहिए संस्कारों के तटबंध

डॉ. महेश परिमल
देश में कोई घटना हो या दुर्घटना, बयानवीर नेताओं को तो बोलना ही है। वह भी बेहूदा तरीके से, ताकि बयान सुर्खियां बन जाएं। मानव की सोच उसके विचार से स्पष्ट होती है और सोच तैयार होती है संस्कार से। आज की पीढ़ी इतनी संस्कारवान तो है कि अपनी प्रेमिका की जान बचाने के लिए जूझ सकती है। पीठ दिखाकर भागने वाली पीढ़ी नहीं है यह। पर यह तो सोचो कि क्या मोमबत्ती जलाने से सोच बदली जा सकती है? सोच बदलने के लिए अच्छे संस्कार होने चाहिए। एक मां अपनी कोख से बेटे को जन्म देती है और बेटी को भी। आगे चलकर बेटे को स्वतंत्रता और बेटी को जंजीरें मिलती हैं। आखिर इसका क्या कारण है? संस्कार की गलत शुरुआत तो यही से हो रही है। आज सोचने का वक्त  पालकों का है। हमारे देश के नेताओं को ऐसे संस्कार मिले ही नहीं, यह तो उनके बयानों से ही स्पष्ट हो जाता है। नेता हमेशा यही कहते हैं कि मीडिया ने उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया। किसी विवादास्पद बयान के बाद हर नेता यही कहता है कि उनके पूरे बयान पर ध्यान नहीं दिया गया। आश्चर्य होता है, ऐसा कभी बाल ठाकरे के बारे में नहीं कहा गया। उन्होंने जब भी बयान दिया, सोच-समझकर दिया। फिर चाहे मीडिया ने उसे किसी भी तरह से तोँड़-मरोड़कर पेश किया हो। पर वे अपने बयान से कभी नही पलटे। आखिर ये नेता अपने बयान से पलट क्यों जाते हैं?
बलात्कार जैसी घटना नृशंस है, पाशवी है, अमानवीय है और बलात्कारी कड़ी से कड़ी सजा का पात्र है। बलात्कार क्यों होते हैं, यह सभी जानते हैं, पर इसे रोकने के लिए क्या करना चाहिए, इस पर विचार नहीं किया जा रहा है। ये बयानवीर नेता बलात्कार के लिए केवल नारी को ही दोषी मान रहे हैं। क्या इसके लिए केवल और केवल नारी ही दोषी है? ये नेता भूल जाते हैं कि बलात्कार के आरोपी सांसद-विधायक भी हैं, जो उनके साथ संसद और विधानसभा में आज तक बैठ रहे हैं। बलात्कार किसी नेता की बेटी या पत्नी के साथ क्यों नहीं होता। क्यों मजबूर और लाचार युवतियों बलात्कारियों के चंगुल में फंस जाती हैं। नेताओं के बयान खाप पंचायतों के मनसबदारों की तरह हैं, जो आज भी पुरातत्वकालीन दिनों में जी रहे हैं। बलात्कार को लेकर आज जो भी बयान सामने आ रहे हैं, वे सभी पूर्वग्रह से ग्रस्त हैं। सोच बदलने की बात कोई नहीं कर रहा है। पहले नेताओं के बारे में यह कहा जाता था कि वे जब भी जो कुछ कहते हैं, पूरी तरह से नाप-तौलकर बोलते हैं। पर अब ऐसा नहीं है, अब तो बड़े-बड़े महारथी नेताओं की जबान फिसलने लगी है। उन्हें खुद ही पता नहीं होता कि वे क्या कह रहे हैं। बाद में पछताते हैं और अपने बयान वापस लेने का ढोंगे करते हैं। शायद उन्हें नही मालूम की बंदूक से निकली गोली और जबान से निकले शब्द कभी वापस नहीं आते। आज सबसे अधिक आवश्यकता यह है कि महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को किस तरह से रोका जाए, ऐसे में हमारे बयानवीर नेता अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। विचार मंथन के समय ऐसी हरकतों शोभा नहीं देती। इन नेताओं को शायद इंडिया गेट और जंतर-मंतर पर भीड़ कम होने का ही इंतजार था। भीड़ घटी और नेता फट पड़े।
मध्यप्रदेश के उद्योग मंत्री कैलास विजयवर्गीय ने कहा कि यदि नारी लक्ष्मण रेखा पार करेंगी, तो रावण ही मिलेगा। यदि वे इसे दिल्ली में हुए गेंगरेप से जोड़कर कह रहे हैं तो सवाल यह उठता है कि दामिनी ने कौन सी लक्ष्मण रेखा पार की थी, जो उसे 6-6 रावण मिले? आज नारी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है और समाज को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दे रही है। ऐसे में इस तरह का बयान मूर्खतापूर्ण है। यदि सीता ने लक्ष्मण रेखा पार की थी, तो क्या उसे पूजा नहीं जाना चाहिए। आखिर उनकी पूजा क्यों हा ेरही है? सीता के बजाए रावण की हरकतों पर ध्यान क्यों नहीं दिया जा रहा है? क्या रावण के लिए लक्ष्मण रेखा नहीं होनी चाहिए? नारी पर हर तरह से बंदिशें लगाई जा रही हैं, पर पुरुष आज तक अपनी मनमानी कर रहा है।  उधर संघ से भागवत का बयान भी कम आपत्तिजनक नहीं है। आज छोटे-छोटे गांव में दुष्कर्म हो रहे हैं। गुजरात में इस समय जितने भी दुष्कर्म के मामले सामने आए, उसमें अधिकांश गांव में हुए हैं। इन घटनाओं पर वे क्या कहना चाहेगे? शायद उन्हें ही नहीं मालूम। आज कई परिवार ऐसे हैं, जहां महिलाएं काम न करें, तो उनका गुजारा ही मुश्किल हो जाए। ऐसे में नारी के योगदान को किसी भी तरह से कम नहीं आंका जाना चाहिए।
देश में बलात्कार की घटना एक सामाजिक रोग है, इसे भौगोलिक सीमा में नहीं बांधना चाहिए। इसे ाश्चात्य संस्कृति से भी जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। नारी अत्याचार को लेकर पहले अपनी सोच बदलनी होगी। इसे संस्कार से जोड़कर देखा जाना चाहिए। राम बनने के लिए कौशल्या जैसी मां और दशरथ जैसे पिता का होना आवश्यक है। आज जवान बेटे की हरकतों से डरने वाले माता-पिता बेटे को अनजाने में किस तरह का संस्कार दे रहे हैं, किसी से छिपा नहीं है। बेटे को मिली छूट को ही देखकर बेटी भी यदि बगावत करे, तो उस पर तुरंत ही पाबंदी लगा दी जाती है। नारी पहले से ही अपनी सीमाओं में हैं, पर पहले पुरुष तो अपनी सीमा तय करे। संस्कारों के तटबंध मजबूत होंगे, तभी सीमाएं सुरक्षित रह पाएंगी, अन्यथा आज जो कुछ हो रहा है, हालात उससे भी बदतर हो सकते हैं।
    डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

नेहरु-गांधी परिवार से उद्धार संभव नहीं


डॉ. महेश परिमल
कांग्रेसी अब तक यह मानते आए हैं कि नेहरु या गांधी परिवार के सिवाय उनका कोई उद्धार कर ही नहीं सकता। वे ये भी मानते आए हैं कि नेहरु-गांधी परिवार यदि चुनावी मैदान पर हैं, तो उन्हें कोई हरा नहीं सकता। इन दोनों ही मान्यताओं को पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों ने गलत साबित कर दिया। यदि राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जीत नहीं दिला सके, तो फिर उन पर यह भरोसा कैसे किया जा सकता है कि वे 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी मतों वे विजयश्री दिलवा सकते हैं। यदि कांग्रेस को फिर से केंद्र की सत्ता पर आना है, तो उसे अपनी व्यूह रचना में आमूल-चूल परिवर्तन करना ही होगा। अभी जो परिणाम आए हैं कि अगले चुनावों के सेमीफाइनल परिणाम हैं। ये परिणाम देश की राजनीति को एक नया आयाम देंगे। इसके अलावा इस परिणाम ने यह साबित कर दिया कि देश के सभी दल अब चेत जाएँ। यह आत्मनिरीक्षण का समय है। इस समय कांग्रेस को जबर्दस्त झटका लगा है, भविष्य में अन्य दलों को भी लग सकता है। इसलिए केवल वही वादे करें, जिसे पूरा कर सकते हों। अपराध और अपराधियों को पार्टी से दूर ही रखना होगा। तभी वे लोगों का मत प्राप्त कर सकते हैं।
कांग्रेस को भी यह तय करना होगा कि अब सारा दारोमदार राहुल गांधी पर छोड़ना उचित नहीं है। कोई ऐसा लोकप्रिय चेहरा सामने आना चाहिए, जो जमीन से जुड़ा हो। अभी यह तय नहीं है कि उत्तराखंड में भाजपा सत्ता पर रहेगी या नहीं। भाजपा के हाथ में भले ही उत्तर प्रदेश न आया हो, पर गोवा उसने अपने ही दम पर और पंजाब में अकाली दल के साथ गठजोड़ करके सत्ता प्राप्त कर ली है। उसके लिए यह एक शुभ संकेत है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की चुनावी बागडोर राहुल गांधी अपने कांधे पर लेकर चल रहे थे। 48 दिनों तक उन्होंने बिजली की गति से पूरे राज्य का दौरा कर 211 रैलियों को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने काफी आक्रामक रूप से लोगों के सामने अपनी बात रखी। यदि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की जीत हो जाती, तो इसका सारा श्रेय राहुल गांधी को ही मिलता। इसे उनकी व्यक्तिगत विजय माना जाता। पर अब वहाँ कांग्रेस कमजोर साबित हुई, तब उसका ठिकरा प्रदेश के अन्य नेताओं पर फोड़ने की कोशिश हो रही है। कांग्रेस में ऐसा हमेशा से होता आया है। 1999 के चुनाव के समय कांग्रेस की हार को किसी ने सोनिया गांधी की हार नहीं माना। पर 2004-2009 की जीत को सोनिया गांधी की जीत बताया गया। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की पराजय से भले ही राहुल गांधी के अलग रखने की कोशिश की जाए, पर राहुल गांधी इस चुनाव में बुरी तरह से सुपर फ्लाप साबित हुए हैं, इसमे कोई दो मत नहीं।
उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी की उपस्थिति के कारण चुनाव प्रचार हाई-प्रोफाइल बन गया था। बाहर के लोगों को यह बताया जा रहा था कि उत्तर प्रदश्ेा में असली टक्कर राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच है। पर मुख्य स्पर्धा तो मायावती और मुलायम सिंह के बीच थी। उत्तर प्रदेश के मतदाताओं को मायावती के काम करने की शैली पसंद नहीं आई। वे उनकी स्टंटबाजी से परेशान थे। वे उन्हें सबक सिखाना चाहते थे। मायावती के विकल्प के रूप में उन्होंने राहुल गांधी को नहीं, बल्कि मुलायम सिंह को देखा। मतदाताओं की सूझबूझ की भी दाद देना होगी। उन्हें यह अच्छी तरह से पता था कि यदि उन्होंने कांग्रेस को वोट दिया, तो राहुल गांधी लखनऊ में रहकर तो प्रदेश संभालेंगे नहीं, किसी बिना चेहरे के नेता को उन पर थोप दिया जाएगा। उन्हें मुलायम सिंह को मायावती के सही विकल्प के रूप में देखा। इसलिए उन्होंने मुलायम सिंह को अपना वोट दिया। सपा को जितने वोट मिले, उसमें से अधिकांश मायावती के विरोध के वोट हैं।
पाँच राज्यों के चुनाव परिणामों से कांग्रेस-भाजपा समेत अन्य दलों को कोई संदेश मिला है, तो वह यही कि दिल्ली से आयातित नेता सभाओं को संबोधित कर भीड़ तो इकट्ठी कर सकते हैं, पर मतपेटियों को वोट से भर नहीं सकते। उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के सामने मायावती के विकल्प के रूप में एक तरफ जमीन से जुड़े मुलायम सिंह जैसे नेता थे, तो दूसरी तरफ आकाशीय उड़ान के शौकीन राहुल गांधी थे। कांग्रेस की तरह भाजपा के लिए भी यह मुश्किल थी कि उनके पास ऐसा कोई कद्दावर नेता नहीं था, जो वोट बटोरने में माहिर हो। इसलिए उसे मध्यप्रदेश से उमा भारती को आयात करना पड़ा। उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने जिस तरह से राहुल गांधी को अलग कर दिया, ठीक उसी तरह उमा भारती को भी नकार दिया। यदि कांग्रेस-भाजपा को 2014 का लोकसभा चुनाव जीतना है, तो दिल्ली के नेताओं को थोपने के बजाए राज्य स्तर के नेताओं को आगे करना होगा। दिल्ली के नेता वाणी विलास के सहारे वोट दिलवा पाएंगे, उसका जमाना अब गया। राहुल गांधी ने मतदाताओं को रिझाने के लिए अपनी तमाम ताकत झोंक दी। इसके बाद भी कांग्रेस हार गई, उसका मुख्य कारण यही है कि व्यूह रचना तैयार करने में कांग्रेस चूक गई। प्रदेश में भी कांग्रेस संगठन कमजोर है। यह जानते हुए भी कांग्रेस ने अपने दम पर चुनाव लड़ने की भूल की। यदि कांग्रेस मुलायम के साथ गठबंधन करती, तो शायद उसे अधिक लाभ मिलता। तब मायावती का मायाजाल तो टूटता ही, साथ ही सपा को बहुमत मिलने के बाद भी कांग्रेस को सत्ता का लाभ मिला होता। कांग्रेस का इरादा किंगमेकर बनने का था। अब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने अपनी ताकत पर बहुमत प्राप्त कर लिया है, तो कांग्रेस के सामने विपक्ष में बैठने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता बचा ही नहीं है।
केंद्र की यूपीए सरकार ने उत्तर प्रदेश के चुनाव के दौरान पिछड़े वर्ग के मुस्लिमों के लिए 4.5 प्रतिशत आरक्षण के मुद्दे को उछाला था, इससे वे मुस्लिमों की सहानुभूति बटोरना चाहती थी। इसके कारण दलित नाराज हो गए। क्योंकि उन्हें दिए गए 27 प्रतिशत ओबीसी कोटे में से ही यह आरक्षण दिया जाना था। मुसलमान 9 प्रतिशत आरक्षण की माँग कर रहे थे। कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद ने 4.5 प्रतिशत आरक्षण के मुद्दे पर चुनाव आयोग को आँखें दिखाने लगे, इससे मुस्लिम बिलकुल भी प्रभावित नहीं हुए। सपा नेता मौलाना मुलायम सिंह यादव ने अपने छीने गए मुस्लिम वोट बैंक पर पुन: कब्जा करने में सफल रहे। 2007 के चुनावों में मायावती ने अनेक ब्राह़्मण नेताओं को अपनी पार्टी में लेकर उन्हें महत्वपूर्ण स्थान दिया था, इसलिए उन्हें सवर्णो का भी वोट मिला। लखनऊ में सत्ता पर काबिज होते ही मायावती ने इन ब्राrाण नेताओं की उपेक्षा शुरू कर दी। इसलिए ये उपेक्षित नेता एक के बाद एक उनसे अलग होते गए। यही कारण है कि इस चुनाव में मायावती को सवर्णो का वोट नहीं मिला। ये वोट मुख्य रूप से कांग्रेस और भाजपा में विभाजित हो गए। पाँच वष्रो के शासन में मायावती ने दलितों के हित में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इससे दलित वोट भी कट गए। इस चुनावमें मायावती को यह सबक मिला कि दलितों और सवर्णो के बीच संतुलन रखना बहुत ही मुश्किल है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में रचकर वे केंद्र की राजनीति में छलांग लगाना चाहती थीं, यही महत्वाकांक्षा उन पर भारी पड़ी।
2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 22 सीटें मिली थी, इससे यह आशा जागी थी कि 2012 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर होगा। लोकसभा की 22 सीटों का मतलब है कि विधानसभा की 100 सीटों से भी अधिक सीटें मिलनी चाहिए। इससे भी आधी सीटें प्राप्त कर कांग्रेस ने वास्तव में यूपी में जिद की। 2009 में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह को कम सीटें मिली, इसका मतलब था कल्याण ¨सह को पार्टी में लेना। इससे मुस्लिम मतदाता उनसे नाराज हो गए थे। मुलायम ने अपनी इस भूल को सुधारा और मुस्लिम वोट कबाड़ने में सफल रहे। कांग्रेस ने मुस्लिमों की सहानुभूति जीतने के लिए बाटला हाऊस एनकाउंटर के मुद्दे को उछालने की कोशिश की। यह मुद्दा टांय-टांय फिस्स हो गया। बाटला हाऊस का मुद्दा मुस्लिमों को लुभा नहीं पाया। इससे हिंदू मतदाता सचेत हो गए। इसका पूरा लाभ भाजपा को मिला। मुलायम सिंह याद का अखिलेश यादव को चुनावी मैदान में उतारने का फैसला मास्टर स्ट्रोक साबित हुआ। मुलायम ने युवा और डायनेमिक राहुल गांधी के ठोस विकल्प के रूप में अखिलेश को सामने खड़ा कर दिया। मतदाताओं ने स्वाभाविक रूप से अखिलेश को पसंद किया। मुलायम भले ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें, पर उनके भावी मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश को स्थापित कर दिया है।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

एक पत्र सांताक्लॉस के नाम ...

डॉ महेश परिमलसांताक्लॉज केवल उपहार देने वाला एक देवदूत ही नही, बल्कि मासूमों को अपना प्यार लुटाने वाला एक ऐसा शख्स है, जिससे बच्चे कई अपेक्षाएँ पालते हैं. बच्चे तो आखिर बच्चे होते हैं, वे क्या समझें सांताक्लॉज के व्यक्तित्व को. वे तो उसे देवदूत मानते हैं और उनसे अपनी माँगें मनवाते हैं. सांताक्लाँज एक कल्पना है, इसकी जानकारी मासूमों को नहीं है. वे उसे एक सच्चाई मानते हैं. ऐसे में प्राकृतिक आपदाओं से पीडि़त कोई मासूम सांताक्लॉज से अपने स्वर्गीय माता-पिता को ही माँग ले, तो उसकी माँग भला किस तरह से पूरी हो सकती है. कुछ इसी तरह की माँग एक मासूम ने सांताक्लॉज से की है, प्रस्तुत है उस मासूम का पत्र...
प्यारे सांता,
लोग तुम्हें उपहार बाँटने वाले एक देवदूत के रूप में जानते हैं. पूरे विश्व के करोड़ों मासूमों को तुम्हारा इंतजार रहता है. कई मासूमों को तो तुम्हारा साल भर इंतजार रहता है. पहले मुझे तुम्हारा इंतजार नहीं रहता था, लेकिन इस बार मैं तुम्हारी राह देख रहा हूँ. मेरी विवशता कुछ दूसरी ही है. पहले मैं खास था, पर अब मैं आम हूँ. पहले मेरे पास सबकुछ था, पर आज मेरे पास मेरी ईमानदारी के सिवाय कुछ भी नहीं है. पर स्वर्गीय माता-पिता से विरासत में मिली ये ईमानदारी मैं अधिक समय तक सँभालकर नहीं रख पाऊँगा. मेरी ये ईमानदारी अब मेरा साथ नहीं दे रही है. इस ईमानदारी ने मुझे कई रात भूखे सोने के लिए विवश कर दिया है. लगता है बहुत जल्द ही मैं इस ईमानदारी कोअलविदा कह दूँगा.
हर साल इस धरती पर क्रिसमस की रात तुम आते हो. सूनी आँखों में आशाओं के दीप जलाते हो, उदास चेहरे पर मुस्कान खिलाते हो. मासूमों के देवदूत बनकर उनके लिए अपना प्यार लुटाते हो. तुम्हारी झोली में ढेरों उपहार होते हैं, जो उन मासूमों के इंद्रधनुषी सपनों को एक आकार देते हैं. यही कारण है कि हर बच्चा क्रिसमस की रात तुम्हारा बेसब्री से इंतजार करता है. इस इंतजार में पूरे साल भर के इंतजार का पल-पल का सफर होता है और विदा लेती बेला में फिर से एक लंबे इंतजार का अहसास होता है. इस अहसास के साथ जीते हुए करोड़ों मासूम सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी ही राह तकते हैं.
आज उन करोड़ों में एक नाम मेरा भी शामिल हो गया है. कल तक नहीं था मुझे तुम्हारा इंतजार. क्योंकि कल तक मेरे लिए तुम एक कोरी कल्पना ही थे. उस समय मेरे पास वह सब कुछ था, जो एक बच्चा चाहता है. माता-पिता ही नहीं, बल्कि बहुत से दोस्त, बहुत सारे खिलौनों का भी संसार था मेरे आसपास. तुम्हें केवल दोस्तों के बीच समय गुजारने और अपनी बुद्धिमानी दिखाने के लिए ही जानबूझकर याद किया जाता था. किंतु आज? आज तुम मेरे लिए एक फरिश्ते से कम नहीं हो. क्योंकि अब तुमसे मुझे कई अपेक्षाएँ हैं. मैं जानना चाहता हूँ कि तुम क्या-क्या दे सकते हो. अब मेरे पास केवल अच्छी यादों के सिवाय कुछ नहीं है.
करीब पाँच महीने पहले ही मुम्‍बई में जो धमाका हुआ, उसमें मेरे मॉं की मौत हो गई। उनका कोई दोष नहीं था, वह तो एक आम आदमी की तरह खरीददारी करने गई थी। शायद मौत उनका रास्‍ता देख रही थी। इसके बाद तो लोग मुझ पर दया करने लगे, कोई कुछ दे जाता, कोई कुछ। इस दौरान मेरे पिता ने ही मुझे मॉं बनकर पालते रहे। मुझे समझदार बनाने की कोशिश करते रहे।
मैं समझदार हो भी जाता, यदि वे असमय ही मुझे छोड़ न गए होते। एक दिन रास्‍ते में उन्‍हें एक र्टक ने कुचल दिया। मेरी दुनिया भी उसी ट्रक के नीचे खत्‍म हो गई। आपदाऍं इस तरह से जीवन में आती ही रहती हैं। सच तो यह है कि इन आपदाओं से कई मासूम अपने ऊपर स्नेह की छाँव से वंचित हो जाते हैं. फिर चाहे वह कश्मीर का भूकंप हो या फिर सुनामी. हर तरह की आपदा मेरे जैसे कई मासूमों को अनाथ कर जाती है. इन आपदाओं ने मुझसे मेरा बचपन ही छीन लिया. मैं कहीं का नहीं रहा. पहले माँ मुझे पिता के हवाले कर ईश्वर के पास चली गई. मैं पिता की छाया में ही बढऩे लगा, पर दूसरे हादसे ने मुझसे मेरे पिता को ही छीन लिया, अब मैं क्या करुँ?
आज मैं बेसहारा होकर यहाँ-वहाँ भटक रहा हूँ. कभी भूखा ही सो जाता हूँ, तो कभी पानी पीकर अपनी भूख मिटाता हूँ. कभी किसी का कोई छोटा-मोटा काम करने से कुछ पैसे मिल जाते हैं, तो खुशी से झूम उठता हूँ. कभी किसी के सामने हाथ फैलाया नहीं, तो इसके लिए हिम्मत भी नहीं कर पाता हूँ. मैं जानता हूँ कि अगर यही हाल रहा तो एक दिन यही करना होगा. कब तक याद रख पाऊँगा, ईमानदारी का पाठ? पेट की भूख सब भूला देती है. मुझ मासूम को भी एक दिन भिखारी बना ही देगी. लेकिन मैं वैसा नहीं बनना चाहता. मैं तो पढऩा चाहता हूँ. खूब आगे बढऩा चाहता हूँ. अपने माता-पिता के सपनों को साकार करना चाहता हूँ. लेकिन कैसे क रूँ? मेरा तो कोई वर्तमान ही नहीं, तो भविष्य क्या होगा? मेरी आँखों में तो अब आँसू भी नहीं, हाँ सूखे आँसुओं के बाद की कोरी जलन है, जो मुझे भीतर तक आहत कर देती है. मैं पल-पल टूट रहा हूँ और ऐसे में क्रिसमस के अवसर पर तुम एक विश्वास बन कर आए हो.
सुना है कि हर साल बड़े-बड़े शहरों में कई लोग सांता क्लास के वेश में मासूमों के बीच आते हैं और अपनी झोली में से अनेक उपहार निकाल कर उन्हें देते हैं. उनके होठों पर मुस्कान खिलाते हैं. अब तो विदेशों में कई ऐसे टे्रनिंग सेंटर भी खुल गए हैं, जहाँ बुजुर्ग व्यक्ति सांता क्लॉस बनने की ट्रेनिंग लेते हैं, ताकि 24 दिसम्बर की रात वे प्यारे बच्चों के साथ एक यादगार क्षण बिता सकें. मुझे भी उस 24 दिसम्बर की रात का इंतजार है.
सुना है, तुम बच्चों को कई तरह के उपहार बाँटते हो, पर मुझे उपहार नहीं, खुशियाँ चाहिए. मुस्कान चाहिए. मेरे लिए उपहार मत लाना सांता क्लॉस, वह तो मुझे बहुत मिल जाएँगे. मुझे तो चाहिए मेरे माता-पिता, मेरे दोस्त, मेरा घर, मेरा परिवार. मुझे तो यहीं मिल जाएगी खुशियाँ. इन खुशियों मेें डूबकर ही मैं अपने उन सभी साथियों को याद कर लूँगा, जिनके दामन में खुशियाँ है ही नहीं. तुम्हें आना ही होगा सांता क्लॉस, मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ. अपनी झोली से मेरी झोली में थोड़ी सी खुशियाँ डालने तुम आओगे ना सांताक्लॉस?
तुम्हारे इंतजार में....
एक मासूम
डा. महेश परिमल

सोमवार, 30 मई 2011

महिला बैड़मिंटन खिलाड़ी अब नहीं पहनेंगी स्कर्ट

विश्व बैडमिंटन फेडरेशन को आखिरकार अपने उस फैसले को वापस लेने को बाध्य होना पड़ा है, जिसमें कहा गया था कि महिला बैडमिंटन खिलाड़ी एक जून से स्कर्ट पहनकर ही कोर्ट पर उतरेंगी। फेडरेशन की इसकी पीछे व्यवसायिक सोच थी। उसे लगता है कि ऐसा करने पर टेनिस और दूसरे खेलों की तरह दर्शक बैड़मिंटन कोर्ट पर भी जुटने शुरू होंगे और इससे प्रायोजक भी मिलने लगेंगे। अभी हालात यह है कि विभिन्न सुपर सीरीज और खेल प्रतिस्पर्द्धाओं के शुरुआती मैचों में उतने दर्शक नहीं आते हैं, जितनी अपेक्षा रहती है। हां, सेमीफाइनल और फाइनल मुकाबलों में जरूर काफी दर्शक पहुंचते हैं। यह बहुत हद तक मुकाबलों पर भी निर्भर करता है कि वह किन खिलाड़ियों के बीच होता है और खेल का स्तर क्या है। अक्सर देखने में आता है कि जहां मुकाबला हो रहा है, वहां यदि उस देश के खिलाड़ी कोर्ट में नहीं खेल रहे हैं तो स्थानीय दर्शकों की मौजूदगी कम ही रहती है। वैसे बात सोच की है। फेडरेशन की इस सोच पर बहस और विचार की जरूरत है कि यदि महिला खिलाड़ी छोटे साइज के कपड़े पहनकर कोर्ट में उतरेंगी और खेलेंगी तो दर्शक ज्यादा आकर्षित होंगे। ऐसा सोचना कि छोटे कपड़ों में ही लड़कियां अथवा खिलाड़ी ग्लैमर्स लगती हैं, गलत है। सुंदरता कपड़ों में भी उतना ही आकर्षण रखती है। बल्कि अनेक सर्वेक्षणों में यह सिद्ध हो चुका है कि कम कपड़े पहनने वाली महिलाएं अपना आकर्षण शीघ्र खो देती हैं जबकि पारंपरिक परिधानों को धारण करने वाली महिलाएं कहीं अधिक खूबसूरत लगती हैं। लेकिन मामला चूंकि कोर्ट पर खेलने वाली महिला खिलाड़ियों से जुड़ा हुआ है, इसलिये इसे ध्यान में रखना जरूरी है कि वे सूट-सलवार या इसी तरह के कपड़े पहनकर नहीं खेल सकती। और इस तरह के कपड़े पहनकर कोई खेलती भी नहीं है। भारत की साइना नेहवाल सहित दुनिया की कई चोटी की बैड़मिंटन खिलाड़ियों ने स्कर्ट की अनिवार्यता पर नाखुशी जाहिर की थी। हालांकि प्रसारण माध्यमों में साइना ने कहा था कि यदि इसे अनिवार्य कर ही दिया गया तो वे स्कर्ट पहनेंगी लेकिन भारतीय बैड़मिंटन फेडरेशन के जरिये उन्होंने भी अपना एतराज दर्ज करा दिया था। कई अन्य देशों की खिलाड़ियों को भी विश्व बैड़मिंटन फेडरेशन का यह विचार रास नहीं आया था। यही कारण है कि पहले इसे लागू करने की तारीख एक महीना बढ़ाई गई और अब इसे रद्द करते हुए कहा गया है कि इस पर फिर से विचार करने की जरूरत है।विश्व बैड़मिंटन फेडरेशन को तीखे विरोध के चलते अपना फरमान वापस लेना ही पड़ा

बुधवार, 4 मई 2011

अहिंसक हिंसा


श्रीभगवान सिंह
कुछ समय पहले विलासपुर में प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा जनकवि
नागार्जुन पर आयोजित संगोष्ठी में युवा कवि अरुण शीतांश के इस वाक्य
ने मेरा ध्यान खींचा- ‘हिंसा सिर्फ वही नहीं है जो पुलिस या नक्सलियों द्वारा हो
रही कार्रवाइयों में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रही है, बल्कि वह भी है जो मॉल
के रूप में छोटे-छोटे दुकानदारों की रोजी-रोटी का अंत कर रही है।’ शीतांश
की बात ने इस न दिखाई पड़ने वाली हिंसा के विविध रूपों को सामने खड़ा
कर दिया। विकास के नाम पर बन रहे विशालकाय कल-कारखाने, नए
औद्योगिक प्रतिष्ठान, भीमकाय बांध, चौड़ी सड़कें आदि से कितने किसान खेती
से बेदखल हो रहे हैं, कितने लोग पुश्तैनी आवास से विस्थापित हो रहे हैं,
कितनी वन-संपदा नष्ट हो रही है, कितनी नदियों का संहार हो रहा है,
अनुत्पादक कार्यों पर कितना पानी खर्च हो रहा है, लेकिन यह सब हिंसा के
पारंपरिक अर्थ में हिंसा नहीं समझा जाता। जबकि सच्चाई है कि यह एक ऐसी हिंसा है
जो अहिंसक ढंग से बहुत सारी अनमोल कुदरती नियामतों का संहार कर रही है।
सच कहें तो आए दिन आराम, सुविधा, प्रगति आदि के लिए आविष्कृत होने
वाले उत्पादों से हम जीवन के सुकून से महरूम होते जा रहे हैं। ट्रेन में यात्रा करते
समय जब हम गहरी नींद में होते हैं, तब अचानक किसी का मोबाइल और खुद
मोबाइलधारक चीखने लगता है। तब आराम से यात्रा करने के मकसद से कराया
गया आरक्षण बेमतलब हो जाता है। लेकिन इसे हम हिंसा नहीं, प्रगति की र
कहते हैं, जबकि किसी की नींद में खलल डालना भी एक तरह की हिंसा है।
तेज र
वाहनों की तादाद इस कदर बढ़ती जा रही है कि सड़क पर पैदल चलते वक्त हमें
हमेशा भ्रम, आतंक से वैसे ही सहमे, दुबके चलना पड़ता है जैसे बिल्ली के भय
से चूहों को। यही नहीं, जब सड़क को पार करना पड़ता है तब दोनों तरफ से
वाहनों की लगातार दौड़ से हमें कितनी-कितनी देर तक इंतजार करना पड़ता है।
लेकिन किसी वाहन चालक को पैदल चलने वाले का तनिक ख्याल नहीं रहता कि
इसे भी सड़क पार कर लेने दें, क्योंकि इसका भी समय कीमती है। वाहन चालक
सिर्फ अपने समय को कीमती और काम को जरूरी समझते हुए पैदल पथिक के
समय का जो नुकसान करते हैं, वह हिंसा नहीं तो क्या है? कई बार तो वे पैदल
पथिक को कुचलते हुए निकल जाते हैं, जिसे हिंसा नहीं दुर्घटना कहते हैं।
जब मैं दोपहर का भोजन करने बैठता हूं तो कमरे से लगी बालकनी की रेलिंग पर
ढेर सारे बंदर-बंदरियां और उनके बच्चे आ बैठते हैं और मुझे खाते हुए टुकुर-टुकुर
देखने लगते हैं। कभी एकाध रोटी या थोड़ा भात या कोई फल हम उन्हें दे देते हैं जो
ऊंट के मुंह में जीरा जैसा होता है। कभी-कभार यह खबर पढ़ने-सुनने को मिलती है
कि अमुक गांव में तेंदुए या बाघ को देखा गया। कुछ माह पूर्व ही पश्चिम बंगाल के
जलपाईगुड़ी में ट्रेन की चपेट में एक नहीं, सात हाथियों की एक साथ बलि चढ़ गई।
विविध विहग हमारे दृष्टिपथ से ओझल होते जा रहे हैं। यह सब देखते-सुनते सोचता
रह जाता हूं कि इन प्राणियों को ऐसी दयनीय स्थिति में लाने के जिम्मेवार हम नहीं तो
कौन हैं? विकास और शहरीकरण के जोशीले अभियान में हम बागान, वन आदि को
काट-काट कर इन पशु-पक्षियों को आवासविहीन और इनके खाद्य-पदार्थ से वंचित
किए जा रहे हैं। पुराने ढंग के बने मकानों में गौरेया जैसे पक्षी अपने लिए भी आवास
बना लेते थे, लेकिन नए ढंग की बन रही इमारतों और
रही। क्या यह बंदूक, बारूद से होने वाली हिंसा से कम विनाशकारी, अनिष्टकारी है?
हम मुग्ध हो रहे हैं बहुमंजिली इमारतों के फैलते जंगलों, धरती के नीचे दौड़ती ट्रेनों,
हाइवे-एक्सप्रेस वे पर दौड़ती गाड़ियों, नए-नए रेलवे-ट्रैकों और उन पर दौड़ती सुपरफास्ट
रेलगाड़ियों को देख कर। लेकिन यह सब हो रहा है किसकी कीमत पर? सृष्टि के
आदिकाल से जो पहाड़ अब तक सुरक्षित थे, उन्हें ही तोड़-तोड़ कर ये सारी उपलब्धियां
हासिल की जा रही हैं। स्थिरता, दृढ़ता के प्रतीक रहे इन पर्वतों की विकास सुविधा की वेदी
पर बलि चढ़ रही है। विभिन्न मशीनों की दखलंदाजी बैल, घोड़े जैसे मवेशियों की नस्ल को
समाप्ति की ओर धकेलती जा रही है। यह क्या किसी हिंसा से कमतर है?
ऐसे विकासोन्मुख कृत्यों को देखते हुए महसूस होता है कि सृष्टि को खतरा
अब आणविक अस्त्रों से अधिक विकास, सुविधा,
बनने वाली सामग्रियों से है। अगर मॉल से लेकर बांध, फैक्ट्रियां, चौड़ी सड़कें,
बहुमंजिली इमारतें, रात में भी बिजली का दुरुपयोग कर खेलों का मजा लेने आदि
का यह अविराम सिलसिला चलता रहा तो सारे आणविक हथियार धरे के धरे रह
जाएंगे और दुनिया इस अहिंसक-हिंसा की बदौलत उजड़िस्तान में तब्दील हो
जाएगी। बगैर तीसरा विश्वयुद्ध हुए ही दुनिया वीरान हो जाएगी। यह अहिंसक
हिंसा प्रौद्योगिकी-सभ्यता का वरदान है या अभिशाप, विचारणीय है!

श्रीभगवान सिंह
μतारμतार से चलने वाले तरह-तरह के दुपहिए, तिपहिए, चौपहिए, छह-पहिएलैटों में इसकी गुंजाइश नहींतेज रफतार के नाम पर नित नई

मंगलवार, 3 मई 2011

ओसामा को जहन्‍नुम की आग मिले

 
खौफ का दूसरा नाम बन चुके ओसामा बिन लादेन के आतंक से दुनिया को निजात मिलने का मुस्लिम युवकों ने बड़े पैमाने पर स्वागत किया है। अलकायदा प्रमुख की मौत की खबर फैलते ही सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक और ट्विटर पर विश्व समुदाय के साथ भारी तादाद में मुसलमान युवक भी एक-दूसरे को मुबारकबाद देने लगे। हालांकि ट्वीट के दौरान भारतीय और पाकिस्तानी मुस्लिम युवाओं के बीच जंग भी देखने को मिली। भारतीय युवाओं ने जहां पाकिस्तान पर आतंकवादियों को पनाह देने का आरोप मढ़ा, वहीं पाकिस्तानी इससे चिढ़े दिखे। अमेरिका रहा निशाने पर हालांकि ट्वीट करने वाले अधिकतर नौजवानों का मानना था कि ओसामा के रूप में अमेरिका ने दरअसल अपने ही एक गुर्गे को मार गिराया है। मुंबई से हसन राशिद ने दुनिया के नंबर एक आतंकवादी के मारे जाने की तस्वीर अपलोड करने के साथ-साथ लिखा है कि बड़े अब्बा (अमेरिका) को अपना खोया हुआ बेटा (ओसामा) वहीं मिला, जहां वह ढूंढ रहे थे। जानम मेहदी ने ट्वीट किया है कि अंकल सैम ने बाजी मार ली। रिजवान मुस्तफा के अनुसार, अमेरिका ने संरक्षण देकर जिसे दुनिया का सबसे खूंखार आतंकवादी बनाया और उसका अलकायदा संगठन खड़ा कराया, उसी ओसामा को ओबामा ने मार गिराया। मुहम्मद अब्बास का कहना है, ओसामा को जहन्नुम की आग मिले। युवा शबाहत ने फेसबुक पर पवित्र कुरान शरीफ की वह आयत लिखी है, जिसमें कहा गया है कि जालिमों की कौम पर अल्लाह की लानत हो। दरअसल ओसामा की मौत की खबर फैलते ही फेसबुक और ट्विटर पर सुबह से ही प्रतिक्रिया का दौर शुरू हो गया। कुछ मुस्लिम युवक ओसामा के मारे जाने पर हंसी-मजाक के मूड में भी रहे, लेकिन अमेरिका के खिलाफ जो गुस्सा मुस्लिम समुदाय के मन में है, वह फेसबुक और ट्विटर पर जगह-जगह दिखा। अनीस आजमी ने व्यंग्यात्मक अंदाज में ट्वीट किया है कि अब अमेरिका का नया मकसद गद्दाफी पूरा करेगा। ओसामा अब किसी काम का नहीं रह गया था। इस लिए उसे मार दिया। खुदा करे दहशतगर्दी हो जाए नेस्तनाबूद एक युवक के अनुसार, लखनऊ के कोनेश्वर मंदिर के निकट स्थित काला इमाम बाड़ा के पास ओसामा की मौत पर जश्न का भी आयोजन किया गया है। आसिम जैदी ने लिखा है कि खुदा करे दहशतगर्दी का नामोनिशान दुनिया से नेस्तनाबूद हो जाए, क्योंकि कुछ लोगों की बेजा हरकतों की वजह से सब बदनाम होते हैं। ट्वीट करने वाले कुछ भारतीय और पाकिस्तानी युवकों के तीखी तकरार भी हुई। एक भारतीय मुस्लिम युवक ने कहा कि पाकिस्तान आतंकवादी पैदा करने की फैक्टरी है तो उससे नाराज पाकिस्तानी ने ट्वीट किया कि आतंकी अमेरिका बनाता है। इस पर भारतीय युवक ने कहा कि उत्पाद तो पाकिस्तान का ही है, अमेरिका तो सिर्फ उसकी ब्रांडिंग का काम करता है। मुहम्मद शाकिब का कहना था कि जब अमेरिका को किसी मुस्लिम देश पर हमला करना होगा तो वह कोई नया ओसामा पैदा कर देगा। जबकि कई मुस्लिम युवकों ने आशंका जताई है कि ओसामा की मौत के बाद भी दुनिया को आतंकवाद से निजात नहीं मिलने जा रहा है क्योंकि अलकायदा प्रमुख अपने पीछे अपने काफी गुर्गे छोड़ कर गया है। अब पाकिस्तान का क्या होगा? फेसबुक पर एक युवक कलीम ने लिखा है, मैं सोच रहा हूं कि पाकिस्तान का अब क्या होगा? उसकी तो पोल खुल गई है। वह फिर लिखते हैं कि अभी मेरी टिप्पणी को एक मिनट भी नहीं हुआ कि पाकिस्तान की एक मस्जिद में धमाका हो गया।

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

सत्याग्रह का अमोघ अ 200 वर्ष पूर्व ईजाद हुआ था


जंतर मंतर पर सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे का आमरण अनशन और काहिरा में तहरीर चौक पर हजारों लोगों के जमा होने जैसे अ¨हसक आंदोलनों की शुरुआत 200 वर्ष पूर्व 1811 में हुई थी,जब धाíमक नगरी बनारस के मेहनतकश मजदूरों और कारीगरों ने अपनी मांगे मनवाने के लिए सत्याग्रह का अमोघ अ ईजाद किया था। करीब सौ साल बाद महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के इस नवीन हथियार का दक्षिण अफ्रीका में प्रयोग किया। बनारस सत्याग्रह अंग्रेज हुकूमत द्वारा नगरवासियों पर गृह कर (हाउस टैक्स) लगाने के खिलाफ शुरू हुआ था। अधिकतर नगरवासी अपने मकानों और दुकानों पर ताला बंद कर शहर के बाहर जमा हो गए तथा अधिकारियों को दो टूक जवाब दिया कि जिसका मकान और दुकान हो उससे टैक्स लो गांधीवादी विचारक और इतिहासकार धर्मपाल ने अपनी चíचत पुस्तक भारतीय परम्परा में सविनय अवज्ञा में उल्लेख किया है कि सरकारी कारिन्दों पुलिसकíमयों को नजर अंदाज करते हुए लाखों नगरवासियों ने जनवरी फरवरी 1811 में अपना धरना-प्रदर्शन और हडताल जारी रखी। आंदोलनकारियों की एकता,विरोध के नित नए तरीकों और निर्भीकता से हुकूमत सकते में आ गई।
बनारस के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट डब्ल्यू डब्ल्यू बर्ड ने कोलकाता स्थित गवर्नर जनरल और लखनऊ स्थित सैनिक कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जे मैक्डोनाल्ड को शहर की विस्फोटक स्थिति के बारे में आपात संदेश भेजे। श्री बर्ड ने अपने पत्न में लिखा कि 25 दिसम्बर 1810 को जैसे ही बनारस के लोगों को हाउस टैक्स लगाने के फैसले की जानकारी मिली, शहर में उžोजना फैल गई। लोगों ने शहर के बाहर बडी सभा कर ऐलान किया कि वह किसी कीमत पर टैक्स अदा नहीं करेंगे। श्री बर्ड ने जनवरी 1811 में कोलकाता भेजे गए अपने पत्न में कहा कि लोगों ने अपनी दुकानें बंद कर दी हैं,जुलाहों के करघे ठप्प हैं, लोहारों ने औजार बनाना बन्द कर दिया है, दर्जी कपड़े नहीं सिल रहे हैं,नाई हजामत नहीं बना रहे हैं तथा मल्लाहों ने नावों को किनारे बांध दिया है तथा डोमों ने शवों का जलाना बंद कर दिया है। पुजारियों ने पूजा पाठ बंद कर दिया। शहरी जीवन ही ठप्प नहीं हुआ बल्कि हल, खुरपी और कुदाल की आपूíत नहीं होने के कारण खेती भी प्रभावित हो गई। अंग्रेज कलेक्टर और पुलिस कप्तान ने आंदोलन को ठंडा करने के लिए साम दाम दंड भेदके सभी हथकंडे अपनाए लेकिन लोग अपनी इस मांग पर कायम रहे कि हाउस टैक्स वापस लिए जाने तक वह अपने घरों में नहीं लौटेंगे। फिरंगी अधिकारी इस मुगालते में थे कि कारोबार बंद होने से लोग आíथक दिक्कतों के कारण परेशान हो जाएंगे तथा आंदोलन खत्म कर देंगे। उन्हें यह भी उम्मीद थी कि सबसे पहले दिहाड़ी मजदूर आंदोलन का साथ छोडें़गे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। शहर के बाहर जमा आंदोलनकारी अपनी जाति एवं पेशे के आधार पर पंचायत करते तथा आंदोलन की भावी रणनीति तैयार करते। उन्होंने दिहाड़ी मजदूरों और आíथक जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए एक कोष भी स्थापित कर लिया। सत्याग्रह में शामिल नहीं होने वालों को जाति से बहिष्कृत कर दिया गया।
वर्ष 2011 में अरब जगत के आंदोलनकारी जहां इंटरनेट फेसबुक और ट्विटर का इस्तेमाल कर रहे हैं तो 200 वर्ष पहले बनारस के लोगों ने सूचनाएं इधर उधर भेजने के लिऐ धर्मपत्री का सहारा लिया था। धर्मपत्री में आंदोलन का ब्योरा था तथा दूरदराज के लोगों से समर्थन देने के लिए अपील थी। विभिन्न जाति समुदायों ने उत्तर भारत में अपने भाई बंधुओं को धर्मपत्री भेजी। अंग्रेज अधिकारियों ने आशंका व्यक्त की कि बनारस से पैदा हुई विद्रोह की चिनगारी दावानल का रुप लेकर पूरे भारत में पांव पसारने में लगी हुकूमत को भस्म कर सकती है। कलेक्टर बर्ड ने अपने एक पत्र में हैरानी जाहिर की कि आंदोलन में हर जाति हर पेशे और हर मजहब के लोग शामिल हैं। ब्राrाण और मौलवी लोगों को शपथ दिला रहे हंै कि वह हाउस टैक्स खत्म होने तक अपना आंदोलन जारी रखें। हाउस टैक्स के खिलाफ लोगों का विरोध धनराशि को लेकर नहीं बल्कि इस सिद्धांत पर आधारित था कि हमारी वस्तु पर टैक्स लगाने का सरकार को कोई अधिकार नहीं है। एक समय ऐसा आया जब अधिकारियों ने सेना के बलबूते आंदोलन को कुचलने का फैसला किया। मेजर जनरल मैक्डोनाल्ड ने सैनिक टुकड़ियों को लखनऊ से बनारस मार्च करने का आदेश दिया। ऐनमौके पर फिरंगी अधिकारियों को सद्बुद्धि आई तथा उन्होंने बनारस के राजा उदित नारायण ¨सह और समाज के अन्य प्रतिष्ठित लोगों की मदद ली। सरकार ने नगर के धाíमक मठ मंदिरों पुजारियों और समाज के गरीब तबकों को टैक्स के दायरे से बाहर करने की घोषणा की। उसने टैक्स संबंधी फैसले की समीक्षा करने के लिए एक जनयाचिका गवर्नर जनरल के पास भेजी।
बनारस के राजा का शहर के लोगों में बहुत सम्मान था तथा उन्हें अभिभावक का दर्जा हासिल था। राजा ने लोगों से आग्रह किया कि दो महीने तक चला उनका आंदोलन सफल रहा है तथा इसे अब खत्म किया जाए। उन्होंने हाउस टैक्स में कटौती किए जाने को एक अच्छा कदम बताया। उन्होंने कहा कि जनता ने अपनी ताकत प्रदíशत कर दी है तथा सरकार को अंतत यह टैक्स वापस लेना पडेगा। प्रतिष्ठित नागरिकों के समझाने बुझाने पर अंतत लोगों ने अपना विरोध आंदोलन खत्म किया तथा अपने घर वापस लौटे। शहर में दुकानें फिर खुलीं। राजा बनारस की भविष्यवाणी सही सिद्ध हुई तथा साल खत्म होते होते सरकार ने दिसम्बर 2011 में हाउस टैक्स लगाने के फैसले को रद्द कर दिया। सरकार के राजस्व विभाग ने इंग्लैंड भेजी गई अपनी रिपोर्ट में आगाह किया कि अधिकारियों को भारत के लोगों के चरित्र और मिजाज को ध्यान में रखकर ही नीतियां बनानी चाहिए। कोई भी टैक्स लगाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि लोगों में उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी। भावी प्रशासन के लिए भी जरूरी है कि वह कोई भी फैसला करते समय पूरी दूरदíशता और बुद्धिमत्ता प्रदíशत करे। रिपोर्ट में कहा गया कि लोगों पर धाíमक नेताओं और फकीरों का काफी असर है। वह लोगों को सरकार का खुला विरोध करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। बनारस में लोगों का प्रतिरोध इतना व्यापक हो गया था कि उसे केवल सेना के बल प्रयोग से कुचला जा सकता था।
अधिकारियों ने राहत की सांस ली कि बनारस के राजा उदित नारायण ¨सह और समाज के प्रतिष्ठित लोगों के हस्तक्षेप से जनविद्रोह ठंडा पडा। अधिकारियों ने स्वीकार किया कि यदि नागरिकों के खिलाफ सेना का प्रयोग किया जाता तो इसके बहुत गंभीर परिणाम होते।

गुरुवार, 17 मार्च 2011

इस बड़े चांद से डरना नहीं


इंटरनेट पर सुपरमून के हौव्वे पर मुकुल व्यास की टिप्पणी
आगामी 19 मार्च को चांद कुछ बड़ा होकर पृथ्वी के नजदीक आएगा। लगभग 18 साल बाद हो रही इस खगोलीय घटना को लेकर तरह-तरह की भविष्यवानियां की जा रही हैं। कुछ लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया है कि जापान में 11 मार्च को आए विनाशकारी भूकंप के लिए यह बड़ा चांद अथवा सुपरमून ही जिम्मेदार है। कुछ लोग सूरज की बढ़ी हुई गतिविधि से उत्पन्न सौर तूफान से इसका संबंध बता रहे हैं। अनेक वैज्ञानिकों का कहना है कि इनका जापान के भूकंप से कोई संबंध नहीं है। पूर्णिमा के दिन समुद्र में ऊंचे ज्वार उठ सकते हैं लेकिन भूकंप और सूनामी जैसी घटनाओं से इसका कोई संबंध नहीं देखा गया है। गौर करने वाली बात यह यह है कि जापान का भूकंप पूर्णिमा से 8 दिन पहले आया और उस दिन चांद अपनी कक्षा में पृथ्वी से अपने सबसे दूरवर्ती बिंदु पर था। नासा के एस्ट्रोनॉमर डेव विलियम्स का कहना है कि उस दिन चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव सामान्य से भी कम था। जहां तक चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण और ज्वारीय हलचल का संबंध है, 11 मार्च को पृथ्वी पर बहुत ही सामान्य दिन था। आखिर यह सुपरमून क्या होता है? चंद्रमा हमारे इर्द-गिर्द अंडाकार कक्षा में चक्कर काटता है। जब यह अपनी कक्षा में पृथ्वी के सबसे समीपवर्ती बिंदु के आसपास पहुंचता है तो यह सुपरमून हो जाता है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा एकदम अपने निकटम बिंदु पर पहुंचेगा। कुछ लोग इसे सुपरमून कह कर एक्सट्रीम सुपरमून कह रहे हैं। इंटरनेट पर की जा रही भविष्यवाणियों के मुताबिक सुपरमून से भयंकर भूकंप, विनाशकारी तूफान आते हैं या असामान्य जलवायु परिवर्तन उत्पन्न होते हैं, लेकिन नासा वैज्ञानिक विलियम्स का कहना है कि 19 मार्च को एक बड़े और चमकीले चांद के दिखने के अलावा कोई असामान्य घटना नहीं होने वाली है। अत: सुपरमून से किसी को आतंकित होने या घबराने की जरूरत नहीं है। हां, उस दिन आप ज्यादा बड़े और ज्यादा चमकदार चांद के नजारे को कैद करना भूलें क्योंकि ऐसी खगोलीय घटनाएं लंबे अंतराल के बाद देखने को मिलती हैं। पृथ्वी पर प्राकृतिक आपदाएं सामान्य दिनों में कहीं भी सकती हैं और इन्हें किसी खगोलीय घटना से जोड़ना वैज्ञानिक तौर पर सही नहीं है। 19 मार्च को चंद्रमा हालांकि 18 या 19 वर्षो में पृथ्वी के बहुत नजदीक होगा लेकिन यह नजदीकी संभवत: आधा प्रतिशत ही ज्यादा होगी। आप जब तक एकदम सही गणना नहीं करते, आप को कुछ नया नहीं लगेगा। चांद शायद पृथ्वी के कुछ हजार किलोमीटर करीब आएगा, लेकिन यदि हम चांद की कक्षा पर गौर करें तो यह कुछ भी नहीं है। यह सही है कि चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से समुद्र में ज्वार उत्पन्न होते हैं। जब चांद नजदीक आता है तो ज्वार कुछ ज्यादा बड़े होते हैं लेकिन यह मानने का कोई वैज्ञानिक कारण नहीं है कि इस सुपरमून से बाढ़ जाएगी या कोई और विषम मौसमीय घटना हो जाएगी। जापान का भूकंप किसी सुपरमून की वजह से नहीं आया है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि यह घटना पूर्णिमा से लगभग एक हफ्ते पहले हुई है। चांद और भूकंपीय गतिविधियों के बीच थोड़ा-बहुत संबंध होता है क्योंकि सूरज और चांद के पंक्ति में होने की वजह से सामान्य से ज्यादा ताकतवर ज्वार उत्पन्न होते हैं। इससे पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेट्स पर स्ट्रेस और बढ़ जाता है लेकिन जापान का भूकंप ऐसे समय आया है, जब सूरज और चांद के पंक्तिमें होने की वजह से ज्वार की ताकत सबसे कमजोर थी। चंद्रमा भूकंप उत्पन्न नहीं करता। भूकंप के लिए सुपरमून को दोषी देना वास्तव में किसी मकान में आग के लिए एक ऐसे व्यक्तिको दोषी ठहराने जैसा है जो शहर में नहीं है। किसी खगोलीय घटना से एक सप्ताह पहले भूकंप का आना महज एक संयोग है। भूकंप, सुनामियां और प्राकृतिक विपदाएं चंद्रमा के चक्र या ज्वारों का अनुसरण नहीं करतीं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)