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शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

एक झन सत्ता सुंदरी,दस झन लगवार

देस अउ परदेस म आज राजा बने खातिर उथल पुथल माते हे |उहिच बात ला सोचत बिचारत खटिया म परे रेहेंव | कतका बेर नींद लगिस ,नइ जानव | फेर ओकर बाद का होथे, सुते - सुते एक ठन अलकरहा सपना देख परथव |  सत्ता सुंदरी संग मोर स्वयंबर होगे हे। उडऩ खटोला मं उड़के एक दिन हनीमून मनाय बर मनाली जाथौं। दूनो जोड़ी जांवर हांसत, गोठियावत अउ खिलखिलावत हन। गजब सुग्घर होटल मं ठहरे हन।  चारों कोती चकाचक दीखत हे ,अइसे लगत हे जइसे सरग के देवी-देवता हन। उहां देखत हन, एक ले बढ़के एक परी असन सुंदरी मन अपन गोसइया मन के हाथ धरे किंजरत हें, कोनो मेर ओधहा, झिमझाम जघा दीखत हे तेन मेर चुमा-चाटी घला लेवत हें। महूं अपन सुंदरी संग घूमत हौं, छेहल्ला मारत हौं। रात के जब हनीमून के पारी आथे तब गोई हा नहीं... नहीं... कइके जोर से किकियाथे, महूं हा जोर से चिल्ला परथौं। अतके बेर दाई आ जथे, अउ कहिथे- का बर्रावत हस रे गड़ौना। वतका मं नींद खुलगे अउ मोर सपना देखे के मजा चकनाचूर होगे। 

चुरमुरावत ले रहिगेंव। राजा बने के सपना टूटगे, सत्ता-सुंदरी हाथ लगे रिहिस कोनो काल के तौंनो हा बिछलगे बाम्बी मछरी कस। दरअसल सत्ता अउ सुंदरी के सपना सब ला होथे। मुंगेरीलाल के सपना असन सब देखथे। आदिकाल ले एकर नांव ले के झगरा लड़ई, छीना-झपटी, मार-काट घला होथे। बहुत छल, प्रपंच, षडयंत्र घला होथे, आजो करत हें। फेर सत्ता अउ सुंदरी उही ला मिलथे जेकर नसीब मं होथे। 

आज मोला जोधू-बोधू के ओ बात के सुरता आगे जेन ला कका हर बताइस के कइसे छत्तीसगढ़ मं वइसने कस सपना एक झन नेता देखत हे। फेर ये बीच मं बवंडर माते हे। ये कोनो कोती ले आंधी-तूफान आगे हे अउ अपन संग मं पानी-बादर ला घला धर के आए हे। अइसे काबर करथे, ओकर नीयत मं खोट रहिथे के एमा ककरो भलई होथे, कांही-ककरो समझ मं नइ परय। फेर आ ही जरूर। अरे आतिस, कोनो ओला रोकय, छेंकय नहीं, अक्केला आतिस ना, दुल्हा डउका सही फेर अपन संग मं लेठवा ला धर के काबर आथे  ये लेठवा मन हा बदमाश होथे, नीयतखोर होथे। टूरी-टानकी, बहू-बेटी मन ला ताकत झांकत रहिथे। 

अड़बड़ बड़बड़ावत हंस मितान का होगे, काकर बात करत हस? कहां के आंधी-तूफान, दुल्हन  डउका अउ लेठवा मन के बात करत हस? तोर बात ला सुनके तो मैं अकबकागे हौं, कांही समझ नइ परत हे? 

जोधू-बोधू  नांव के दू झन मितान तरिया पार मं मुखारी करत अइसने गप-शप मारत रिहिन हे। जोधू के बात ला सुनके बोधू जब पूछिस- काकर बर बिहाव के बात गोठियावत हस मितान, का एसो गांव मं ककरो बिहाव होवइया हे? अच्छा हे, होना चाही, बने बारात जाय ले मिलथे, खाय-पीये अउ नाचे-कूदे बर घला मिलथे। 

तोला तो बस खवई-पीयई अउ नचई-कुदई भर चाही, फेर दुलहा ला का चाही, बने सुंदर गुनवती, रूपमति दुल्हन। अभी मउका मिले हे फेर  का करबे ओ चिरई हा धरउन  नइ देवत हे। पोंदमटकी चिरई असन पाछू कोती पूछी ला उघारथे फेर तोप देथे। जौंन दिन ले अइसन करत ओ चिरई ला देख डरे हे ओहर तब ले न बने ढंग ले सो सकत हे न खा-पी सकत हे। 

जोधू के ये बात ला सुनके बोधू के माथा चकरा जथे। का पहेली  बुझाथस मितान, बात का हे तेला बने फोर के बता न? तोर उलटा-पुलटा बात ह मोर मगज मं नइ बइठत हे। 

नइ बइठय मितान, जब ओ होवइया दुल्हा डउका हर अपन बिहाव के मुद्दा ला नइ सुलझा सकत हे, तब दूसर कोन सुलझा सकही? जोधू के ये बात ला सुनके फेर बोधू कहिथे- दुनिया मं कोन अइसन समस्या हे मितान जेकर समाधान नइ निकलत होही। अडिय़ल घोड़ा असन कहूं ओमन होही तब बात अलग हे। 

उहिच करा तो आके गाड़ी अटकते हे, जोधू हा कहिथे। 

बोधू कंझावत कहिथे- दुनिया भर के एती-तेती के बात करत हस फेर अभी तक ये बात ला नइ बतावत हस के ओ कोन हे जेकर बिहाव होवइया हे अउ ओ चिरई कोन हे, कहां के हे, तेला तैं जानत हस? 

- नइ जानतेंव तब तोर करा अतेक लम्बा-चौड़ा रामायन के कथा ला कइसे बाचतेंव जोधू। 

- जब सब कथा ला जानत हस तब संस्कृत के श्लोक बरोबर काबर अन्वय ला बतावत हस मोर ददा, ओकर अरथ ला बता ना। कइसे राम-लछिमन जनकपुरी मं गिस, उहां ले दूनो भाई पुष्प वाटिका घूमे बर निकलिन। उहां जाथे तहां ले खेल हो जथे। अइसने कस तोरो रामकथा होही तौंन ला बने साफ-साफ फोर के एक-एक ठन ला बता। कहां के ओ राजकुमार हे, कहां के राजकुमारी हे, कइसे स्वयंबर होही ते छत्तीसगढिय़ा परम्परा असन बाजा रूंजी धर के बरात जाबो, नाचबो, कूदबो। 

जोधू बताथे- तैं काहत हस तौंन बात सब ठीक हे बोधू, फेर ये बिहाव का गुलाझांझरी मं फंसगे हे।

-कइसे गुलाझांझरी मं फंसगे हे का लफड़ा हे, ओ चिरई ककरो संग फंसगे हे, पहिली ले ओकर सटर-पटर चलत हे?

बोधू के बात ला सुन के जोधू खिलखिला के हांस भरथे, अउ कहिथे- तहूं कहां-कहां के अउ अइसन बात सोचत रहिथस? 

सोचे ले परथे मितान, आज समे बहुत खराब हे, बेटी-बहू मन के आज कांही ठिकाना नइ हे? दुलहा ओकर घर मं बारात लेके पहुंचे हे। भांवर परे के बेरा पता चलिस ते ओ बेटी हा गांव के कोनो टूरा ला धर के भाग गे। चुरमुरावत ले रहिथे दुलहा, पगरइत अउ बरतिया। यहा हाल हे मितान, आज समे अब्बड़ खराब हे, बहुत फूंक-फूंक के चले ल परथे। 

सही काहत हस बोधू तैंहर, इही हाल तो हे ओ बाबू के. बहुत सोचत, गुनत अउ विचारत हे। करौं ते नइ करौं उधेड़बुन मं लगे हे। 

तोर असन मितान नइ देखेंव जोधू मैं आज तक। अतेक अकन बात होगे फेर तैं ये नइ बताय के ओ होवइया दुलहा डउका कोन हे ओ पोंदमटकी चिरई कोन हे? 

बोधू हा कउवाय असन देखिस तहां ले जोधू कहिथे- अरे ओ छत्तीसगढ़ के राजा साहेब के नांव ला नइ जानत हस का जौंन ओ दिन कहिस - बेटी के बिहाव मं 'टाइम लगथे भई। धीरज धरौं। जोग-लगिन, नेत-घात सबे चलत हे। अभी महाराज मन अगुन-सगुन सब देखत हे, कुंडली ला जांचत-परखत हे। सब ठीक हो जही तहां ले नेवता बांटत मं कतेक दिन लगथे?

वाह मितान, तब हमर राजा साहेब के बिहाव होवइया हे, बाबा साहेब के बिहाव। छत्तीसगढ़ के राजा के बिहाव, तब एमा अतेक देरी करे के बात रिहिसे। बहुत घुमा-फिरा के बात ला बताय मितान, इही ला सीधा-सीधा बता दे रहिते तब का हो जाय रहितिस। जइसे तोर राजा साहेब राजनीतिक, कूटनीतिक हे तइसे ओकर चेला घला तहूं चलता-पुर्जा हस। अइसन मन के खेल घला वइसने टेडग़ा होथे। 

बोधी आगू कहिथे- अब मोला ओ चिरई कोन हे, तेला बताय के जरूरत हे, नइहे। मैं जानगेंव ओ सुंदरी ओर चिरई कोन हे- छत्तीसगढ़ के राजकुमारी सत्ता। इंकरे ऊपर तोर राजा साहब के नीयत गड़े हे ना। राजा, महाराजा अउ  नवाब मन तो होबे करथे वइसने, एक झन मं ओकर मन नइ अघावय, अउ बने कोनो मेनका, रंभा, मोहनी अउ नीलम ओकर मन के आंखी मं दीखगे तहां ले फेर डोरा डालना शुरू कर देथे। दूनो मितान के गोठबात चलते रिहिस अतके बेर कोन कोती ले कुकुर मन आके झपागे, हांव-हांव करे ले धर लीन। बातचीत के तार इही मेर टूटगे। 

बोधू ला कंझाय असन देखिस तहां ले जोधू कहिथे- अरे काला का कहिबे मितान, देखथौं सुनथौं न चारो मुड़ा ला तब अकबकाय असन लागथे जेला देखबे तउने दुलहा डउका बने बर सधाय हे? का छत्तीसगढ़, का महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार अउ झारखंड, सब बरात निकाल के आजथे दोर-दोर ले बरतिया मन ला धर के। ए बरात हाई-फाई होथे मितान, फेर दुलहा डरपोकना होथे, ओ राजकुमारी याने सत्ता सुंदरी पाये खातिर कोनो दूसर देस के राजा मेर जाके शरन मांगथे। ओला डर रहिथे ओकर सत्ता सुंदरी ला कोनो हरन करके झन लेग जाय। बड़े-बड़े डकैत अउ सेना पुलिस ला ओकर पाछू लगा देथे। पहिली के बरात तो घला अइसने होवत रिहिसे। 

जोधू, अउ आगू बताथे- रुखमणि हरन के किस्सा तो तैं सुने होबे मितान, जोधू के बात ला सुनके बोधू अकबका जथे, माथा धरके बइठ जथे अउ कहिथे- सोझ-बाय सीधा-सीधा बता ना मितान, काकर बिहाव होवत हे, कहां जाना हे बरात?

तब तैं बरात जाबे ना मितान, तब सुन, पांच सितारा होटल मं तोला ठहरे ले परही, उहां खाना-पीना, नाचना, जुआ-चित्ती अउ का कइथे बार डांस के छोकरी मन संग घला लटर-पटर होय के घला कार्यक्रम रखे गे हे। 

तोला सोझ बाय बता ना हे तब बता नइते मैं जाथौं घर। जा तहीं हा ओ दुलहा के बरात अउ मस्तियाबे उहां। बोधू कउआगे राहय। 

जोधू बताथे कउआ झन मितान बने काहत हौं, ये जउन बिहाव होथे  या फेर होवइया हे तउन अइसन वइसन बिहाव नोहय। इहां सब मेंछा मं ताव देवत दुलहा बने बर एक पांव मं खड़े हे। छत्तीसगढ़ के राजा साहेब गाहे-बगाहे बूढ़तकाल मं घला सत्ता सुंदरी ला देख के ललचा जथे, ओला देख परिस कहूं तहां ले 'आ गले लग जा कइके गाना गाये ले धर लेथे। मध्यप्रदेश के सत्ता सुंदरी ला देखके शिवराज चौहान, कमलनाथ ले झटक लिस। उही सुंदरी हे जेकर संग पन्दरह साल ले गुजारे रिहिसे तभो लो ओकर मन नइ भरे रिहिसे। महाराष्ट्र में अनदेखना मन भाई-भाई मं फूट करा दिन। उद्धव ठाकरे सत्ता सुंदरी संग बने रास-विलास करत रिहिसे। एकनाथ शिंदे ला भड़का  दिन अउ उहू बइहा अपन भवजी ऊपर नीयत गड़ा दिस। अब ओ सत्ता सुंदरी शिंदे संग हनीमून मनावत हे। का हरियाणा, का बिहार का झारखंड लेबे। अभी शीबू सोरेन फडफ़ड़ावत हे। कोनो रूपवती सुंदरी ला गोसइन बनाके रखना  पाप होगे हे। तभे तो आजकल के बेटी-बहू अउ गोसइन मन ला बुरका पहिले के सलाह ओ समाज के मन देवत रहिथे। कोनो भला नइ काहय, नइ करयं। सब नीयतखोट होगे हे। अपहरन के घटना रोज होवत हे। यहा का हे अपहरन के बाद बलात्कार, फेर हत्या। लगथे मितान अब समाज में रेहे के लइक नइहे। 

हां, तब मैं काहत रेहेंव मितान, तैं बिल्कुल तइयार राह। बारात चलना हे ते चलना हे। कार ले के आहौं, चार्टर प्लेन अवइया हे, मोबाइल करिहौं। स्वामी विवेकानंद  एरोड्रम मं तोला सब बात ला बताहौं, समझे। जोधू के बात ला सुनके बोधू ओला मने मन गारी देथे- सारे लपरहा, चार्टर प्लेन मं बइठे के सपना देखत हे अउ महूं ला देखावत हे। एकोठन बात एकर पतियाय  के लइक नइहे, थूके-थूक मं  बरा चुरोय ले बने सीखे हे। भाड़ मं जाय ओ दुलहा, बारात अउ चार्टर प्लेन। बने राहय ददा, हमर घर के बासी अउ पताल के चटनी। अभी अभी खबर मिलिस हे के राजा साहेब के बिहाव "कैंसिल" होगे हे |

परमानन्द वर्मा 

रविवार, 23 अगस्त 2020

एक अत्यंत प्रेरणादायक प्रसंग

 

विवाह उपरांत जीवन साथी को छोड़ने के लिए 2 शब्दों का प्रयोग किया जाता है 

1-Divorce (अंग्रेजी) 

2-तलाक (उर्दू) 

कृपया हिन्दी का शब्द बताए...??

कहानी आजतक के Editor संजय सिन्हा की लिखी है 

तब मैं जनसत्ता में नौकरी करता था एक दिन खबर आई कि एक आदमी ने झगड़ा के बाद अपनी पत्नी की हत्या कर दी मैंने खब़र में हेडिंग लगाई कि पति ने अपनी बीवी को मार डाला खबर छप गई किसी को आपत्ति नहीं थी पर शाम को दफ्तर से घर के लिए निकलते हुए प्रधान संपादक प्रभाष जोशी जी सीढ़ी के पास मिल गए मैंने उन्हें नमस्कार किया तो कहने लगे कि संजय जी, पति की बीवी नहीं होती

“पति की बीवी नहीं होती?” मैं चौंका था

“बीवी तो शौहर की होती है, मियां की होती है पति की तो पत्नी होती है

भाषा के मामले में प्रभाष जी के सामने मेरा टिकना मुमकिन नहीं था हालांकि मैं कहना चाह रहा था कि भाव तो साफ है न ? बीवी कहें या पत्नी या फिर वाइफ, सब एक ही तो हैं लेकिन मेरे कहने से पहले ही उन्होंने मुझसे कहा कि भाव अपनी जगह है, शब्द अपनी जगह कुछ शब्द कुछ जगहों के लिए बने ही नहीं होते, ऐसे में शब्दों का घालमेल गड़बड़ी पैदा करता है

प्रभाष जी आमतौर पर उपसंपादकों से लंबी बातें नहीं किया करते थे लेकिन उस दिन उन्होंने मुझे टोका था और तब से मेरे मन में ये बात बैठ गई थी कि शब्द बहुत सोच समझ कर गढ़े गए होते हैं

खैर, आज मैं भाषा की कक्षा लगाने नहीं आया आज मैं रिश्तों के एक अलग अध्याय को जीने के लिए आपके पास आया हूं लेकिन इसके लिए आपको मेरे साथ निधि के पास चलना होगा

निधि मेरी दोस्त है कल उसने मुझे फोन करके अपने घर बुलाया था फोन पर उसकी आवाज़ से मेरे मन में खटका हो चुका था कि कुछ न कुछ गड़बड़ है मैं शाम को उसके घर पहुंचा उसने चाय बनाई और मुझसे बात करने लगी पहले तो इधर-उधर की बातें हुईं, फिर उसने कहना शुरू कर दिया कि नितिन से उसकी नहीं बन रही और उसने उसे तलाक देने का फैसला कर लिया है

मैंने पूछा कि नितिन कहां है, तो उसने कहा कि अभी कहीं गए हैं बता कर नहीं गए उसने कहा कि बात-बात पर झगड़ा होता है और अब ये झगड़ा बहुत बढ़ गया है ऐसे में अब एक ही रास्ता बचा है कि अलग हो जाएं, तलाक ले लें

निधि जब काफी देर बोल चुकी तो मैंने उससे कहा कि तुम नितिन को फोन करो और घर बुलाओ, कहो कि संजय सिन्हा आए हैं

निधि ने कहा कि उनकी तो बातचीत नहीं होती, फिर वो फोन कैसे करे?

अज़ीब संकट था निधि को मैं बहुत पहले से जानता हूं मैं जानता हूं कि नितिन से शादी करने के लिए उसने घर में कितना संघर्ष किया था बहुत मुश्किल से दोनों के घर वाले राज़ी हुए थे, फिर धूमधाम से शादी हुई थी ढेर सारी रस्म पूरी की गईं थीं ऐसा लगता था कि ये जोड़ी ऊपर से बन कर आई है पर शादी के कुछ ही साल बाद दोनों के बीच झगड़े होने लगे दोनों एक-दूसरे को खरी-खोटी सुनाने लगे और आज उसी का नतीज़ा था कि संजय सिन्हा निधि के सामने बैठे थे उनके बीच के टूटते रिश्तों को बचाने के लिए

खैर, निधि ने फोन नहीं किया मैंने ही फोन किया और पूछा कि तुम कहां हो  मैं तुम्हारे घर पर हूं आ जाओ नितिन पहले तो आनाकानी करता रहा, पर वो जल्दी ही मान गया और घर चला आया

अब दोनों के चेहरों पर तनातनी साफ नज़र आ रही थी ऐसा लग रहा था कि कभी दो जिस्म-एक जान कहे जाने वाले ये पति-पत्नी आंखों ही आंखों में एक दूसरे की जान ले लेंगे दोनों के बीच कई दिनों से बातचीत नहीं हुई थी

नितिन मेरे सामने बैठा था मैंने उससे कहा कि सुना है कि तुम निधि से तलाक लेना चाहते हो

उसने कहा, “हां, बिल्कुल सही सुना है अब हम साथ नहीं रह सकते

मैंने कहा कि तुम चाहो तो अलग रह सकते हो पर तलाक नहीं ले सकते

“क्यों

“क्योंकि तुमने निकाह तो किया ही नहीं है”

अरे यार, हमने शादी तो की है

“हां, शादी की है शादी में पति-पत्नी के बीच इस तरह अलग होने का कोई प्रावधान नहीं है अगर तुमने मैरिज़ की होती तो तुम डाइवोर्स ले सकते थे अगर तुमने निकाह किया होता तो तुम तलाक ले सकते थे लेकिन क्योंकि तुमने शादी की है, इसका मतलब ये हुआ कि हिंदू धर्म और हिंदी में कहीं भी पति-पत्नी के एक हो जाने के बाद अलग होने का कोई प्रावधान है ही नहीं

मैंने इतनी-सी बात पूरी गंभीरता से कही थी, पर दोनों हंस पड़े थे दोनों को साथ-साथ हंसते देख कर मुझे बहुत खुशी हुई थी मैंने समझ लिया था कि रिश्तों पर पड़ी बर्फ अब पिघलने लगी है वो हंसे, लेकिन मैं गंभीर बना रहा

मैंने फिर निधि से पूछा कि ये तुम्हारे कौन हैं?

निधि ने नज़रे झुका कर कहा कि पति हैं मैंने यही सवाल नितिन से किया कि ये तुम्हारी कौन हैं? उसने भी नज़रें इधर-उधर घुमाते हुए कहा कि बीवी हैं

मैंने तुरंत टोका ये तुम्हारी बीवी नहीं हैं ये तुम्हारी बीवी इसलिए नहीं हैं क्योंकि तुम इनके शौहर नहीं तुम इनके शौहर नहीं, क्योंकि तुमने इनसे साथ निकाह नहीं किया तुमने शादी की है शादी के बाद ये तुम्हारी पत्नी हुईं हमारे यहां जोड़ी ऊपर से बन कर आती है तुम भले सोचो कि शादी तुमने की है, पर ये सत्य नहीं है तुम शादी का एलबम निकाल कर लाओ, मैं सबकुछ अभी इसी वक्त साबित कर दूंगा

बात अलग दिशा में चल पड़ी थी मेरे एक-दो बार कहने के बाद निधि शादी का एलबम निकाल लाई अब तक माहौल थोड़ा ठंडा हो चुका था, एलबम लाते हुए उसने कहा कि कॉफी बना कर लाती हूं

मैंने कहा कि अभी बैठो, इन तस्वीरों को देखो कई तस्वीरों को देखते हुए मेरी निगाह एक तस्वीर पर गई जहां निधि और नितिन शादी के जोड़े में बैठे थे और पांव पूजन की रस्म चल रही थी मैंने वो तस्वीर एलबम से निकाली और उनसे कहा कि इस तस्वीर को गौर से देखो

उन्होंने तस्वीर देखी और साथ-साथ पूछ बैठे कि इसमें खास क्या है?

मैंने कहा कि ये पैर पूजन का रस्म है तुम दोनों इन सभी लोगों से छोटे हो, जो तुम्हारे पांव छू रहे हैं

“हां तो

“ये एक रस्म है ऐसी रस्म संसार के किसी धर्म में नहीं होती जहां छोटों के पांव बड़े छूते हों लेकिन हमारे यहां शादी को ईश्वरीय विधान माना गया है, इसलिए ऐसा माना जाता है कि शादी के दिन पति-पत्नी दोनों विष्णु और लक्ष्मी के रूप हो जाते हैं दोनों के भीतर ईश्वर का निवास हो जाता है अब तुम दोनों खुद सोचो कि क्या हज़ारों-लाखों साल से विष्णु और लक्ष्मी कभी अलग हुए हैं दोनों के बीच कभी झिकझिक हुई भी हो तो क्या कभी तुम सोच सकते हो कि दोनों अलग हो जाएंगे? नहीं होंगे हमारे यहां इस रिश्ते में ये प्रावधान है ही नहीं तलाक शब्द हमारा नहीं है डाइवोर्स शब्द भी हमारा नहीं है

यहीं दोनों से मैंने ये भी पूछा कि बताओ कि हिंदी में तलाक को क्या कहते हैं?

दोनों मेरी ओर देखने लगे उनके पास कोई जवाब था ही नहीं फिर मैंने ही कहा कि दरअसल हिंदी में तलाक का कोई विकल्प नहीं हमारे यहां तो ऐसा माना जाता है कि एक बार एक हो गए तो कई जन्मों के लिए एक हो गए तो प्लीज़ जो हो ही नहीं सकता, उसे करने की कोशिश भी मत करो या फिर पहले एक दूसरे से निकाह कर लो, फिर तलाक ले लेना

अब तक रिश्तों पर जमी बर्फ काफी पिघल चुकी थी

निधि चुपचाप मेरी बातें सुन रही थी फिर उसने कहा कि

भैया, मैं कॉफी लेकर आती हूं

वो कॉफी लाने गई, मैंने नितिन से बातें शुरू कर दीं बहुत जल्दी पता चल गया कि बहुत ही छोटी-छोटी बातें हैं, बहुत ही छोटी-छोटी इच्छाएं हैं, जिनकी वज़ह से झगड़े हो रहे हैं

खैर, कॉफी आई मैंने एक चम्मच चीनी अपने कप में डाली नितिन के कप में चीनी डाल ही रहा था कि निधि ने रोक लिया, “भैया इन्हें शुगर है चीनी नहीं लेंगे

लो जी, घंटा भर पहले ये इनसे अलग होने की सोच रही थीं और अब इनके स्वास्थ्य की सोच रही हैं

मैं हंस पड़ा मुझे हंसते देख निधि थोड़ा झेंपी कॉफी पी कर मैंने कहा कि अब तुम लोग अगले हफ़्ते निकाह कर लो, फिर तलाक में मैं तुम दोनों की मदद करूंगा

शायद अब दोनों समझ चुके थे

हिन्दी एक भाषा ही नहीं - संस्कृति है

इसी तरह हिन्दू भी धर्म नही - सभ्यता है


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शुक्रवार, 11 मई 2018

“मेरी ढाई शंका”!!

एक चर्चित इस्लामिक स्टाल पर कुछेक लोगों की भीड़ देखकर मैं भी पहुँच गया। पता चला 'कुरान-ए-शरीफ़' की प्रति लोगों को मुफ़्त बाँटी जा रही है। शांति, प्रेम और आपसी मेलजोल को इस्लाम का संदेश बताया जा रहा था।

खैर जिज्ञासावश मैंने भी मुफ़्त में कुरान पाने को उनका दिया आवेदन फॉर्म भरने की ठानी जिसमें वो नाम-पता और मोबाइल नम्बर लिखवा रहे थे ताकि बाद में लोगों से सम्पर्क साधा जा सके।

एकाएक एक सज्जन अपनी धर्मपत्नी जी के साथ स्टाल में पधारे सामान्य अभिवादन से पश्चात उन्होंने मुस्लिम विद्वान् के सामने अपना विचार रखा - मैं अपनी धर्मपत्नी के साथ इस्लाम स्वीकार करना चाहता हूँ।

यह सुन मुस्लिम विद्वान के चेहरे पर प्रसन्नत्ता की अनूठी आभा दिखाई दी।
मुस्लिम धर्मगुरु ने अपने दोनों हाथ खोलकर कहा - आपका स्वागत है।
लेकिन उन सज्जन ने कहा - इस्लाम स्वीकार करने से पहले मेरी 'ढाई' शंका है। आपको उनका निवारण करना होगा। यदि आप उनका निवारण कर पाए तो ही मैं इस्लाम स्वीकार कर सकता हूँ!!

मुस्लिम विद्वान ने शंकित से भाव से उनकी ओर देखते हुए प्रश्न किया - महोदय, शंका या तो 'दो' हों या 'तीन'! ये 'ढाई' शंका का क्या तुक है?
सज्जन ने अपने मुस्कुराते हुए कहा - जब मैं शंका रखूँगा आप खुद समझ जायेंगे। यदि आप तैयार हो तो मैं अपनी पहली शंका आपके सामने रखूँ?
मुस्लिम विद्वान् ने कहा - जी, रखिये...

सज्जन - मेरी पहली शंका है कि सभी इस्लामिक बिरादरी के मुल्कों में जहाँ मुस्लिमों की संख्या 50 फीसदी से ज़्यादा है, मसलन 'मुस्लिम समुदाय' बहुसंख्यक हैं, उनमें एक भी देश में 'समाजवाद' नहीं है, 'लोकतंत्र नहीं है। वहाँ अन्य धर्मों में आस्था रखनेवाले लोग सुरक्षित नहीं हैं। जिस देश में 'मुस्लिम' बहुसंख्यक होते हैं वहाँ कट्टर इस्लामिक शासन की माँग होने लगती है। मतलब उदारवाद नहीं रहता, लोकतंत्र नहीं रहता। लोगों से उनकी अभिवयक्ति की स्वतंत्रता छीन-सी ली जाती है। आप इसका कारण स्पष्ट करें, ऐसा क्यों? मैं इस्लाम स्वीकार कर लूँगा!!

मुस्लिम विद्वान के चेहरे पर एक शंका ने हजारों शंकाए खड़ी कर दीं। फिर भी उन्होंने अपनी शंकाओं को छिपाते हुए कहा - दूसरी शंका प्रकट करें...

सज्जन – मेरी दूसरी शंका है, पूरे विश्व में यदि वैश्विक आतंक पर नज़र डालें तो इस्लामिक आतंक की भागीदारी 95% के लगभग है। अधिकतर मारनेवाले आतंकी 'मुस्लिम' ही क्यों होते है? अब ऐसे में यदि मैंने इस्लाम स्वीकार किया तो आप मुझे कौन-सा मुसलमान बनायेंगे? हर रोज़ जो या तो कभी मस्ज़िद के धमाके में मर जाता, तो कभी ज़रा-सी चूक होने पर पर इस्लामिक कानून के तहत दंड भोगनेवाला या फिर वो मुसलमान जो हर रोज़ बम-धमाके कर मानवता की हत्या कर देता है! इस्लाम के नाम पर मासूमों का खून बहानेवाला या सीरिया की तरह औरतों को अगवाकर बाज़ार में बेचनेवाला! मतलब में मरनेवाला मुसलमान बनूँगा या मारनेवाला?

यह सुनकर दूसरी शंका ने मानो उन विद्वान पर हज़ारों मन बोझ डाल दिया हो। दबी-सी आवाज़ में उन्होंने कहा - बाकी बची आधी शंका भी बोलो?..
.
सज्जन ने मंद-सी मुस्कान के साथ कहा - वो आधी शंका मेरी धर्मपत्नी जी की है... इनकी शंका 'आधी' इसलिए है कि इस्लाम नारी समाज को पूर्ण दर्जा नहीं देता। हमेशा उसे पुरुष की तुलना में आधी ही समझता है तो इसकी शंका को भी 'आधा' ही आँका जाये!

मुस्लिम विद्वान ने कुछ लज्जित से स्वर में कहा - जी मोहतरमा, फरमाइए!...

सज्जन की धर्मपत्नी जी ने बड़े सहज भाव से कहा - ये इस्लाम कबूल कर लें, मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं किन्तु मेरी इनके साथ शादी हुए करीब 35 वर्ष हो गये। यदि कल इस्लामिक रवायतों-उसूलों के अनुसार किसी बात पर इन्हें गुस्सा आ गया और मुझे 'तलाक-तलाक-तलाक' कह दिया तो बताइए मैं इस अवस्था में कहाँ जाऊँगी? यदि तलाक भी न दिया और कल इन्हें कोई पसंद आ गयी और ये उससे निकाह करके घर ले आये तो बताइए उस अवस्था में मेरा, मेरे का बच्चों का, मेरे गृहस्थ जीवन क्या होगा? तो ये मेरी 'आधी' शंका है।

इस प्रश्न के वार से मुस्लिम विद्वान को निरुत्तर कर दिया। उसने इन जवाबों से बचने के लिए कहा - आप अपना परिचय दे सकते हैं...
सज्जन ने कहा - मेरी शंका ही मेरा परिचय है। यदि आपके पास इन प्रश्नों का उत्तर होगा, हमारी 'ढाई शंका' का निवारण आपके पास होगा तो आप मुझे बताना।

सज्जन तो वहाँ से चले गये पर मौलाना साहब सिर पकड़कर बैठे रहे। किन्तु इस सारे वार्तालाप से मेरे मन में ज़रूर एक शंका खड़ी हो गयी कि आखिर ये सज्जन कौन हैं...?
भारतीय लोग अग्रेषित करे , , इंडियन प्रजाति आगे बढ़े।(जैसा प्राप्त हुआ वैसा ही भेजा गया) ।

शनिवार, 11 मार्च 2017

किसी का भी झूठ पकड़ सकते हैं आप, जानें कैसे


लोगों की आदतें उनके स्वभाव का एक बड़ा हिस्सा बन जाती हैं। तभी तो वे क्या बोलते हैं, समझते हैं और क्या करना चाहते हैं इसका अंदाजा लगा पाना कठिन हो जाता है। उनका अंदाज़ इतना प्रभावशाली बन जाता है कि उनके द्वारा बोला गया झूठ भी सच लगने लगता है।

लोगों का अंदाज़

जी हां, कुछ लोगों का व्यक्तित्व ही कुछ इस प्रकार का होता है कि वह झूठ को भी सच से बढ़कर प्रदर्शित कर सकते की क्षमता रखते हैं। इतनी सफाई से झूठ बोलते हैं कि उसके सामने आपको सच्ची बात भी झूठी लगने लगती है।

झूठ से बचें

लेकिन सच को नीचा दिखाते हुए बोला गया झूठ आपके लिए बेहद हानिकारक है। इससे जितना हो सके बचें, परन्तु मुद्दा तो यह है कि हम कैसे पहचानें कि सामने वाला व्यक्ति सच बोल रहा है या झूठ’?

झूठ का आत्मविश्वास

क्योंकि उसका बोलने का अंदाज़, उसका आत्मविश्वास और उसकी ओर से दी गईं दलीलें हमें इस असमंजस में डाल देती हैं कि किस बात पर विश्वास करें और किस पर नहीं।

कुछ आसान टिप्स

आपकी इसी दुविधा को हल करने के लिए इस आलेख  में कुछ ऐसे तरीके बताए जा रहे हैं जो आपको झूठ पकड़ने में मदद कर सकते हैं। यह टिप्स इतने कारगर हैं कि ये एक विशाल समुद्र में से भी पत्थर का छोटा सा टुकड़ा खोज पाने जितनी क्षमता से लैस हैं।

सच एवं झूठ में फर्क

दरअसल यह कोई जादू-टोना नहीं है बल्कि ऐसे टिप्स हैं जिन्हें आज़माने पर आप सच एवं झूठ में फर्क खोज सकते हैं। लेकिन इसके लिए जरूरी है आपकी एकाग्रता। आप जितना ध्यानबद्ध होकर सामने वाले व्यक्ति की समीक्षा करेंगे, उतना ही आप समझ पाएंगे कि उसके दिमाग में चल क्या रहा है।

दिलोदिमाग में चल रही बात

दूसरे शब्दों में यह मन एवं मस्तिष्क में चल रही बात को खींचकर ज़ुबान पर लाने की एक कोशिश है, जिसके सफल होने की संभावना काफी ज्यादा होती है। इन आसान टिप्स में आपको जिस व्यक्ति के सच या झूठ का टेस्ट करना है, उसकी हर हरकत का ध्यान रखना होगा।

पढ़ें बॉडी लैंग्वेज

सबसे पहले ध्यान दें उसकी बॉडी लैंग्वेज पर। किसी से बात करते समय जब भी आपको शक हो कि सामने वाला इंसान हो ना हो आपसे झूठ बोल रहा है तो उसकी बॉडी लैंग्वेज यानी कि उस समय वह किस तरह से व्यवहार कर रहा है, उस पर ध्यान दें।

चेहरे की चिंता

यदि बोलते समय वह बेहद आराम से बैठा है, उसके चेहरे पर कोई चिंता नहीं है तो इसका मतलब है वह झूठ नहीं बोल रहा। लेकिन इसके विपरीत यदि बात करते समय अचानक वह अपने हाथ-पांव हिलाने लगे, हाथों को जेब के भीतर डाल ले या फिर पांव को बैठे-बैठे हिलाने लगे तो इसका मतलब है कि कुछ गड़बड़ है।

हाथ-पांव की हलचल

उसकी ऐसी हरकत उसके भीतर चल रही चिंता को दर्शाती है। झूठ बोलते हुए भी उसके पकड़े जाने का भय उससे ऐसे फिजूल काम करवाता है। अमूमन ऐसी अवस्था में लोग झूठ बोलते समय हाथ-पांव खुजाते हैं या फिर सिर खुजाते हैं। तभी समझ जाएं कि वह इंसान आपसे कुछ छिपा रहा है।

आंखों की मूवमेंट

बॉडी लैंग्वेज में खास है आंखों द्वारा की जा रही हरकत। आंखें हमारे मन की खिड़की का काम करती हैं। जो मन में है वही आंखें उसी रूप में व्यक्त कर देती हैं। यदि बात करते समय कोई पूरे आत्मविश्वास से आंखों में आंखें मिलाकर बात कर रहा है तो उसके दिल में कोई दोष नहीं है।

आंखें चुराकर बात करना

लेकिन यदि वह आंखें चुरा रहा है या फिर बात करते समय उसकी आंखें आपकी बजाय कहीं दूसरी दिशा में हैं तब भी यह उसके द्वारा बोले जा रहे झूठ की निशानी है। कई बार बातों को छिपाने के लिए भी लोग बोलते हुए ज़मीन की ओर देखते हैं।

आवाज़ की थरथराहट को पहचानें

केवल आंखों की घबराहट ही नहीं, आवाज़ की थरथराहट भी बोले गए झूठ को बखूबी व्यक्त कर देती है। अचानक आवाज़ की टोन का बदल जाना, या फिर जानबूझकर कुछ छुपाते हुए जल्दी में बात करना। इतना ही नहीं, आवाज़ की हिचकिचाहट भी झूठ का पर्दाफाश कर देती है।

हिचकिचाहट

ऐसे में आपको इस आवाज़ को पहचानने की जरूरत है। फर्ज़ कीजिए, आप किसी से बात कर रहे हैं और अचानक अपने मन का कोई शक दूर करने के लिए आपने उनसे कोई सवाल कर लिया, तभी आगे से आपको चुप्पी मिलती है।

बातों को घुमाना

कुछ पल की शांति और फिर दोबारा उकसाने पर वह इंसान बातों को घुमाते हुए जब सामान्य गति से तेज़ अंदाज़ में बात करता है तो तुरंत भांप लें कि वह इंसान आपको झूठी पट्टी पढ़ा रहा है।  
तभी कहा जाता है कि किसी व्यक्ति के बोलने के अंदाज़ को समझ पाना ही अपने आप में एक कला के समान है। और यदि आप इसमें सफल हुए तो आपको कोई इंसान भी झूठी बात कहने की हिम्मत नहीं करेगा।  
परन्तु कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यह जरूरी नहीं कि तेजी से बोलने का संबंध झूठ से ही है। कई बार हड़बड़ाहट में भी इंसान गति बढ़ा लेता है। ऐसे में अपनी दुविधा को दूर करने के लिए आप एक और तरीका अपना सकते हैं।  
यदि नॉर्मल तरीके से बात करते हुए आपका दोस्त बहुत धीरे और सोच-सोचकर बात करने लगे तो तब भी यहां शक की संभावना बन जाती है।

यहां बढ़ती है शंका


दरअसल बात केवल गति की नहीं है, बात यह है कि आपसे वार्तालाप करते समय यदि अचानक कुछ पूछे जाने पर सामने वाले व्यक्ति की बोलने की स्पीड में बदलाव आए तो इसका कारण झूठ हो सकता है।

मंगलवार, 16 जून 2015

फेसबुक - झमेलों से कैसे बचें ?

आजकल फेस बुक पर भी लोगों को तरह - तरह की परेशानियाँ सामने आ रही हैं । फेसबुक को ठगने, परेशान करने  से लेकर अपराध तक के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

इसे लेकर हमने सूचना-प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ व भाषा - प्रौद्योगिकीविद बालेन्दु शर्मा दाधीच से मार्गदर्शन प्राप्त किया जो निम्नवत है?- डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य'

फ़ेसबुक पर ऐसे मित्रता-अनुरोध स्वीकार न करें तो बेहतर-

मित्रता अनुरोध आने पर पहले संबंधित व्यक्ति के फ़ेसबुक प्रोफाइल पर जाकर एक नज़र ज़रूर डालें। ऐसे व्यक्तियों के मित्रता अनुरोध स्वीकार करने से बचें-

1. जो आपके परिचित न रहे हों और इतना ही नहीं, आपके किसी परिचित के भी परिचित न हों। यानी किसी भी मित्र के मित्र न हों।
2. जिन्होंने अपना प्रोफ़ाइल चित्र न लगाया हो, यानी जो अपनी पहचान छिपाना चाहते हों। जो प्रोफाइल चित्र के स्थान पर किसी सेलिब्रिटी का, फूल या किसी वस्तु का, ढंके हुए चेहरे का, या पीछे से लिए गए चित्र आदि का प्रयोग करते हों।
3. जिनके मित्रों की संख्या बहुत ही कम हो (5-7) या न हो।
4. जिन्होंने अभी-अभी फ़ेसबुक प्रोफाइल बनाया हो।
5. जिनके फेसबुक पेज पर कोई टिप्पणी न हो। (क्योंकि उनका उद्देश्य टिप्पणी करना है ही नहीं)।
6. जिनकी फोटो गैलरी में कोई फोटो न हो, संभवतः पहचान छिपाने के लिए। कुछ लोग कैमरा न होने के कारण भी चित्र नहीं लगा पाते। यहाँ अपने विवेक का प्रयोग करें।
7. जिनके फ़ेसबुक पेज पर दी गई टिप्पणियाँ आपत्तिजनक हों। गाली-गलौच की भाषा इस्तेमाल करते हों या अश्लील टिप्पणियाँ/सामग्री प्रयोग करते हों।
8. धार्मिक कट्टरपंथी हों और फेसबुक का प्रयोग इसीलिए करते हों।
9. जिनके साथ आपकी मित्रता का कोई आधार न हो।
10. जो विदेशी हों और आप समझ न पाएँ कि उन्हें आपसे मित्रता करने में क्या दिलचस्पी हो सकती है।

मित्र बनाने के बाद भी यदि कोई शख्स आपके या आपके मित्रों के साथ, या आपकी सामग्री के साथ गलत हरकत करता है तो उसे Unfriend करने में जरा भी संकोच न करें।

ज़रूरत समझें तो गलत व्यक्तियों के बारे में Facebook को सूचित करें ताकि वे किसी अन्य को अपना निशाना न बनाएँ।

बंधुवर बालेन्दुजी से हमने विशेषरूप से पूछा कि पिछले कुछ समय से ऐसी घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है जिसमें कुछ अश्लील, आपत्तिजनक वीडियो  या चित्र किसी के भी फेसबुक से किसी के फेसबूक मित्रों को चले जाते हैं और उन्हें शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है । जिनका नाम आता है उन्हें बदनामी और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है ।किसी ने बताया कि यह एक प्रकार का वायरस होता है जिसके चलते वीडियो  या चित्र को हटाना भी संभव नहीं हो पाता  क्योंकि उसमें डिलिट की सुविधा नहीं होती । पिछले 10-15 दिनों में ऐसी घटनाओँ में तेजी आई है । कृपया बताएँ कि इसके लिए क्या सावधानी बरतें ? इस संबंध में हमारा मार्गदर्शन करें ताकि लोगों को इस समस्या से बचाया जा सके।

उन्होंने बताया:-
नमस्कार गुप्ता साहब,
- फेसबुक का पासवर्ड बदलकर कोई मजबूत पासवर्ड बना लें, जिसमें कैपिटल और स्माल लैटर्स के साथ-साथ अंक भी हों। ताकि आपका अकाउंट हैक न हो सके।
- कंप्यूटर में अच्छा एंटी-वायरस और एंटी-स्पाइवेयर (नॉर्टन, क्विकहील आदि) इन्स्टाल कर लें।
- कोई आपको टैग न कर सकें यह व्यवस्था फेसबुक की सिक्योरिटी सेटिंग्स में जाकर कर दें।
- कमेंट, मैसेज आदि का अधिकार सिर्फ मित्रों तक सीमित कर दें।
- फेसबुक एप्स, गेम्स आदि से बचें। बेहतर है, इस्तेमाल ही न करें और यदि पहले किए हुए हैं तो उन्हें हटा दें।
- ऐसे किसी भी लिंक पर क्लिक न करें जो किसी अनजान व्यक्ति ने भेजा है, अजीब है या फिर जिसमें आपको लुभाने का प्रयास किया गया है (यह कहकर कि इसे जरूर देखिए आदि आदि..)
सादर,
बालेन्दु

शनिवार, 1 सितंबर 2012

सबसे बड़ा सवाल, कसाब को फांसी कब?


डॉ. महेश परिमल
29 अगस्त बुधवार को देश के न्यायप्रणाली की गरिमा और सर्वोपरिता का रहा। एक फैसला अहमदाबाद और दूसरा दिल्ली में सुनाया गया। एक तरफ देश के दुश्मन का फंदा बरकरार रहा, तो दूसरी तरफ सद्भाव के दुश्मन दोषी करार हुए। दोनों ही फैसलों से न्यायप्रणाली की छवि उजली हुई है। दोनों ही फैसलों को सुनकर देश के नागरिकों ने राहत की सांस ली। एक बार फिर यह साबित हो गया है कि हमारी न्याय प्रक्रिया शायद धीमी है, पर ढीली नहीं। उधर अहमदाबाद के नरोडा पाटिया इलाके में हुए नरसंहार के मामले में अदालत ने शुRवार को पूर्व मंत्री माया कोडनानी को कुल 28 साल और बाबू बजरंगी को उम्रकैद की सजा सुनाई है। बाकी 29 दोषियों को भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। कोडनानी को दो अलग-अलग धाराओं के तहत 18 और 10 साल की सजा सुनाई गई। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई आतंकवादी हमले के आरोपी अजमल कसाब की फांसी की सजा बरकरार रखी है।
25 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले में 165 लोग मारे गए और ढाई सौ से अधिक लोग घायल हुए। पाकिस्तान से समुद्र के रास्ते से आए आतंकवादियों में से एकमात्र कसाब ही जिंदा पकड़ा गया। एक अंदाज के मुताबिक अजमल कसाब की सुरक्षा पर अब तक करीब 40 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। अभी उसे जब तक फांसी पर नहीं लटकाया जाता, तब तक उस पर लाखों खर्च होने हैं। अजमल कसाब को जिस तरह से सुरक्षा दी गई है, उसकी खूब आलोचना भी हो रही है। अलबत्ता जिस तरह से न्याय प्रक्रिया चल रही है, उसे भारत के मानव अधिकार और न्याय प्रणाली का श्रेष्ठतम उदाहरण बताया जा रहा है। विश्व में इसकी प्रशंसा भी हो रही है। मुम्बई हमले का यह चौथा वर्ष चल रहा है। यह समय कम नहीं है। फिर भी कहना पड़ेगा कि आतंकवाद के दूसरे अन्य मामलों की अपेक्षा यह मामला जल्दी चला है। वैसे ऐसे मामलों पर फैसला इससे भी जल्दी आ जाना चाहिए। ऐसा लोग मानते हैं। हमारे पास विदेशों का उदाहरण है, जिसमें ऐसे गंभीर मामलों पर बहुत ही जल्द निर्णय ले लिया जाता है। हाल ही में नार्वे की घटना को याद किया जाए, तो स्पष्ट होगा कि 22 जुलाई 2011 को ओस्लो में एंडर्स बेररिंग ब्रेइविक ने धुंआधार गोलीबारी और बम विस्फोट कर 77 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। अभी 24 अगस्त को ही अदालत ने उसे 21 वर्ष की सजा सुनाई है। यह मामला 13 महीने में ही निपटा दिया गया।
विकल्पों के द्वार खुले हैं..
अभी तो कसाब के सामने कई विकल्प हैं। वह राष्ट्रपति के सामने गुहार लगा सकता है। देखना यह है कि आखिर कसाब को फांसी पर कब लटकाया जाता है? 13 दिसम्बर 2001 में संसद में हुए हमले का मुख्य आरोपी अफजल गुरु अभी तक जिंदा है। उसे फांसी की सजा सुना दी गई है, पर वोट की राजनीति हावी होने के कारण वह अभी तक फांसी पर नहीं लटक पाया है। इस बात को 11 साल हो रहे हैं, फिर भी अफजल पर अभी तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है। यह साफ हो गया है कि अजमल कसाब पाकिस्तानी है। अभी तक पाकिस्तान यही कह रहा है कि मुम्बई में हुए आतंकवादी हमले से उसका कोई लेना-देना नहीं है। बाद में यह भी स्पष्ट हो गया कि पूरी घटना पाकिस्तान से ही आपरेट की गई थी। आतंकवादी हमले के समय पाकिस्तान से सूचना मिल रही थी। पाकिस्तानी सेना और जासूसी संस्था आईएसआई ने इस पूरी वारदात को अंजाम दिया गया था। मजे की बात यह है कि अब स्वयं पाकिस्तान ही कह रहा है कि कसाब को फांसी दे देनी चाहिए। 10 नवम्बर 2011 को ही पाकिस्तान के गृह मंत्री रहमान मलिक ने घोषणा की थी कि अजमल कसाब आतंकवादी है और उसे फांसी होनी चाहिए।
अदालत ने मुम्बई हमले को देश पर हमला निरुपित किया गया है। अब देश के एक-एक नागरिक को इसी बात का इंतजार है कि कसाब को कब फांसी दी जाती है। 2004 में पश्चिम बंगाल में धनंजय चटर्जी को बलात्कार और हत्या के मामले पर फांसी की सजा दी गई थी। उसके बाद कई अपराधियों को फांसी की सजा दी गई है। पर उन सभी मामलों को ताक पर रख दिया गया है। राजीव गांधी के तीन हत्यारों मुरुगन, सांथन और पेरारिवलन को फिल्मी घटना की तरह फांसी की तारीख तय होने के बाद भी सजा रोक दी गई। पता नहीं अजमल कसाब आखिर कब तक मुफ्त की रोटियां तोड़ता रहेगा। लोगों को सब्र रखना ही होगा, क्योंकि कसाब लम्बी उम्र लेकर इस दुनिया में आया है। अभी उसके पास तीन विकल्प हैं। यदि वह राष्ट्रपति के सामने दया याचिका करे, तो भी उसका क्रम 18 होगा। जिस व्यक्ति को सभी ने अंधाधुंध गोली चलाते हुए देखा, जिसने पुलिस के अधिकारियों को मार डाला, उस पर चार साल से मुकदमा चल रहा है। अभी तक उसे फाँसी नहीं हुई। उस पर 40 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, वह अलग। अभी जब तक वह जिंदा है, खर्च जारी रहेगा। उसे बचा रही है, हमारी न्याय प्रणाली। जो इतनी अधिक लम्बी-चौड़ी और पेचीदा है कि साधारण इंसान को तो तुरंत सजा मिल जाती है, पर कुख्यात को सजा देने में सरकार के सारे कानून सामने आ जाते हैं। राष्ट्रपति के पास अभी भी सजायाफ्ताओं के 17 आवेदन हैं, अभी उन पर विचार नहीं हो पाया है। जब तक अफजल गुरु की याचिका पर निर्णय नहीं हो जाता, तब तक कसाब पर भी निर्णय नहीं हो पाएगा। अफजल गुरु पिछले 11 साल से जीवित है ही। बसाब की लम्बी उम्र होने का कारण यह भी है कि अभी हमारे यहां जल्लाद हैं ही नहीं। 2004 में जिस धनंजय चटर्जी को जिस जल्लाद ने फांसी पर चढ़ाया था, उसकी मौत हो चुकी है। जब सरकार ने यह विचार किया कि अब किसी को फांसी नहीं दी जाएगी, तो जल्लादों को प्रशिक्षण देने का काम भी सुस्त हो गया। जल्लाद न होने के कारण ही पंजाब का आतंकवादी वलवंत सिंह तारीख तय होने के बाद भी बच गया। सोचो, कसाब की फाँसी की तारीख तय होने के बाद भी क्या वह जल्लाद की कमी के कारण बच नहीं सकता?
दो जल्लाद सामने आए
दूसरी ओर यह खबर भी आई है कि कसाब को फांसी देने के लिए दो जल्लाद सामने आए हैं। इसमें से एक ने इंदिरा गांधी के हत्यारों को फांसी पर चढ़ाया है। अभी वह जीवन के 70 वें पड़ाव पर है। वह स्वयं ही टीबी का मरीज है, उसकी मौत भी करीब ही है। फिर भी उसने हिम्मत दिखाई, इसके लिए उसकी सराहना की जानी चाहिए। दूसरा जल्लाद है कोलकाता का महादेव मलिक। वह नगर निगम में सफाई कर्मचारी है। पर उसने अभी तक न ही इसका प्रशिक्षण लिया है और न ही उसके किसी को फांसी पर चढ़ाया है। तो क्या कसाब को फांसी नहीं दी जाएगी? कानून कहता है कि ऐसी परिस्थितियों में सीनियर इंस्पेक्टर अथवा उससे ऊंचे पद पर आसीन पुलिस अधिकारी प्रशिक्षण के बाद फांसी दे सकता है। प्रशिक्षण प्राप्त करने में 6 महीने लगते हैं। इसका आशय यही हुआ कि यदि कसाब दया याचिका पेश करता है, तो उसमें जो देर होगी, उसके अलावा 6 महीने और लग जाएंगे। ये स्थिति उसकी सांसों को लम्बा कर सकती है। एक बात और पूरे विश्व में अभी फांसी की सजा न देने के प्रावधान पर बहस चल रही है। 2006 में राष्ट्रसंघ में लिथुआनिया ने मौत की सजा के प्रावधान को विश्व से रद्द करने का प्रस्ताव रखा था, जिस पर कुल 11 देशों ने हस्ताक्षर किए थे, हस्ताक्षर करने वालों में भारत भी एक था। केवल इस बात को लेकर विश्व की मानवाधिकार संस्थाएं सक्रिय हो जाती हैं, तो मानों कसाब को जीवनदान मिल जाएगा। कसाब इस देश का सबसे महंगा कैदी है। उसके नाम पर पकिस्तान में 6 संस्थाएं हैं। कसाब को संरक्षण देने वाली 125 वेबसाइट्स हैं। एक मक्कार आतंकवादी को आखिर हम कब तक सेलिब्रिटी बनाएंगे? ये सवाल जीतने तीखें हैं, उसका जवाब उतना ही मुश्किल है।

डॉ. महेश परिमल