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बुधवार, 20 जून 2012

झोपड़ियों के खर्राटे और महलों के जागरण

झोपड़ियों के खर्राटे और महलों के जागरण
डॉ. महेश परिमल
जीवन के बारे में लोग अपनी तरह इसे परिभाषित करते रहते हैं। कोई जीवन को एक चुनौती मानता है, तो कोई खेल। किसी के लिए जीवन इतना दूभर होता है कि वह इसे जीना ही नहीं चाहता। कोई तो जीवन के आनंद में इतना अधिक रम जाता है कि उसे जीने के सिवाय और कुछ सूझता ही नहीं। वास्तव में जीवन जितना अधिक सरल है, उतना ही गुम्फित और पेचीदा भी है। जब लगातार दु:खों का रेला आता है, तो यही जीवन कष्टमय लगता है। ठीक इसी तरह जब आनंद के क्षण आते हैं, तो यही जीवन आल्हादकारी लगता है। कष्ट के दिन जल्द से जल्द बीत जाएं, इसका पूरा प्रयास किया जाता है। लेकिन आनंद के क्षणों को अधिक से अधिक लम्बा करने की भी कोशिश होती है। दोनों ही स्थितियों में इंसान की यह कोशिश बेकार साबित होती है। वास्तव में जीवन अपनी गति से चलता ही रहता है। हां हमारे द्वारा संपादित किए गए कार्यो के आधार पर जीवन की दिशा और दशा तय होती है।
जीवन में सुख-दु:ख आते-जाते रहते हैं। कोई यदि चाहे तो लगातार सुखी नहीं रह सकता । जीवन है तो उसे दु:ख का सामना तो करना ही होगा। हारमोनियम पर जब ऊंगलियां थिरकती हैं, तब केवल सफेद या काली पट्टियों पर ही नहीं थिरकतीं। दोनों के तालमेल से ही सुर-लहरियां निकलती हैं। बारिश या धूप को यह नहीं मालूम होता है कि यह अमीर का घर है या गरीब का। हवेलियों में जिस शिद्दत के साथ धूप बिखरती है, उसी शिद्दत के साथ झोपड़ी में भी बिखर जाती है। बारिश का भी यही संदेश है। वह न तो महल देखती है, न ही झोपड़ी। उसे तो भिगोना आता है। पूरी तरह से सराबोर करना उसके स्वभाव का एक हिस्सा है। जीवन है उतार-चढ़ाव का सिलसिला तो चलता ही रहता है। इस अंधेर-उजाले से हमें निकलने के बजाए यदि इसमें डूबकर जीवन जीने का आनंद लिया जाए, तो जीवन हमेशा सुखमय ही रहेगा।
जीवन के बारे में मां का फलसफा इतना अधिक सरल और ग्राह्य था कि उसे एक बार में ही समझा जा सकता है। वह अक्सर कहती-जीवन में कभी इतना अधिक अमीर मत बनना कि गरीब बनने पर दु:ख हो। छोटा था इसलिए मां के एक दर्शन को समझ नहीं पाता। आखिर कुछ तो है मां के इस संदेश में। बरसों बाद जीवन को कुछ समझने लगा, तो मां से ही पूछ लिया। मां कहती, तू तो भोला है रे! इतना भी नहीं समझता। आज देश में जितने भी अमीर लोग हैं, यदि वे गरीबों को काम देकर उनकी फाकेमस्ती दूर कर सकें, तो ही जीवन सार्थक होगा। क्या पता, जीवन का दूसरा रूप जब उनके सामने आए, तो वे उससे अनभिज्ञ न रहें। यानी जीवन के किसी मोड़ पर यदि वही अमीर फिर गरीब बन गया, तो उसे गरीबी का जीवन जीने में परेशानी नहीं होगी। इस उतार-चढ़ाव में कौन, कब कहां किस हालत में हो, कहा नहीं जा सकता।
मेरी अनपढ़ मां इतना कुछ कैसे समझती है? आखिर ये ज्ञान उसे कहां से प्राप्त हुआ? उसने कैसे कह दिया है कि जो आज अमीर है, वह कल गरीब होगा? पर आज जो कुछ भी देख रहा हूं, उससे तो यही लगता है कि सब दिन होत न एक समान। राजा को रंक बनते देर नहीं लगती। हां रंक को राजा बनने में अवश्य देर लगती है। आज जो अमीर हैं, उन्होंने गरीबी को बहुत ही अच्छी तरह से झेला है, तभी अमीर बन पाए हैं। गरीबी के दौरान किए गए अच्छे कार्यो ने ही उन्हें अमीर बनाया है। अमीरी के दौरान किए गए बुरे कार्य उन्हें रसातल में ले जाएंगे। इसीलिए आज झोपड़ियां खर्राटों से गूंजती है और हवेलियों में जागरण होता है। 
 डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 15 जून 2012

इस बार भी खूब भिगोएगी ये बारिश

इसकी एक एक बूंद सहेजने के लिए है
डॉ. महेश परिमल
अब तक तो हम सब सुन रहे थे, मानसूनी दस्तक। पर अब लगता है मानसून आ ही गया है। पूरा छत्तीसगढ़ भीगने लगा है। झुलसाती गर्मी की तपन के बाद चेहरे पर फुहारों की तरह पड़ी बारिश की बूंदें। सचमुच ऐसा लगा मानों हम सब प्रकृति की गोद में ही समा गए। कितनी उदार है प्रकृति, ठंडी फुहारें छिड़कती है, तो भी भयंकर तपिश के बाद। ताकि हम समझ पाएं, चेहरे पर ठंडक पहुंचाती उन बूंदों का महत्व। बारिश हमें भिगोने के लिए आतुर है, लेकिन हम अभी तक गर्मी को ही कोस रहे हैं। अरे भई, प्रकृति तुम्हारे द्वार पर आकर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है, तुम निकलो तो सही, फिर देखना प्रकृति का रंग। बारिश में पूरी तरह से भीगकर एक सिख मित्र ने कहा ‘प्राजी, जो बारिश विच्च भीग्याइ नई, वो जीणा सीख्याइ नई’। जीने का सही अर्थ भीगने में ही छिपा है। यानी पूरी तरह से सराबोर होकर जीना सीखो। डूबकर जीना सीखो। आखिर मोती तो सागर की अतल गहराइयों में ही मिलता है।

बारिश ने इस मौसम पर धरती का आँचल भिगोने की पहली तैयारी की। प्रकृति के इस दृश्य को देखने के लिए मैं अपने परिवार के साथ अपने परिसर की छत पर था। बारिश की नन्हीं बूँदों ने पहले तो माटी को छुआ और पूरा वातावरण उसकी सोंधी महक से भर उठा। ऐसा लगा मानो इस महक को हमेशा-हमेशा के लिए अपनी साँसों में बसा लूँ। उसके बाद शुरू हुई रिमझिम-रिमझिम वर्षा। ऐसा लगा कि आज तो इस वर्षा और माटी के सोंधेपन ने हमें पागल ही कर दिया है। हम चारों खूब नहाए, भरपूर आनंद लिया, मौसम की पहली बारिश का। मैंने अपनी खुली छत देखी। विशाल छत पर केवल हम चारों ही थे। पूरे38  पक्के मकानों का परिसर। लेकिन एक भी ऐसा नहीं, जो प्रकृति के इस दृश्य को देखने के लिए अपने घर से बाहर निकला हो। बाद में भले ही कुछ बच्चे भीगने के लिए छत पर आ गए, लेकिन शेष सभी कूलर की हवा में अपने को कैद कर अपने अस्तित्व को छिपाए बैठे थे। क्या हो गया है इन्हें? आज तो प्रकृति ने हमें कितना अनुपम उपहार दिया है, हमें यह पता ही नहीं। कितने स्वार्थी हो गए हैं हम प्रकृति से दूर होकर। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपने आप से ही दूर हो गए हैं?
पूरी गर्मी हम छत पर सोए, वहाँ था मच्छरों का आतंक। हमने उसका विकल्प ढूँढ़ा, बड़े-बड़े पत्थर हमने मच्छरदानी के चारों तरफ लगाकर पूरी रात तेज़ हवाओं का आनंद लिया। हवाएँ इतनी तेज होती कि कई बार पत्थर भी जवाब दे जाते, हम फिर मच्छरदानी ठीक करते और सो जाते। कभी हवाएँ खामोश होती, तब लगता कि अंदर चलकर कूलर की हवा ली जाए, पर इतना सोचते ही दबे पाँव हवाएँ फिर आती, और हमारे भीतर की तपन को ठंडा अहसास दिलाती। कभी तो हवा सचमुच ही नाराज़ हो जाती, तब हम आसमान के तारों के साथ बात करते, बादलों की लुकाछिपी देखते हुए, चाँद को टहलता देखते। यह सब करते-करते कब नींद आ जाती, हमें पता ही नहीं चलता।
ए.सी., कूलर और पंखों के सहारे हम गर्मी से मुक़ाबला करने निकले हैं। आज तो हालत यह हे कि यदि घर का एसी या कूलर खराब हो गया है, उसे बनवाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है, चाहे इसके लिए दफ्तर से छुट्टी ही क्यों न लेनी पड़े। शायद हम यह भूल गए हैं कि कूलरों और एसी की बढ़ती संख्या यही बताती है कि पेड़ों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। आज से पचास वर्ष क्यों, पच्चीस वर्ष पहले ही चले जाएँ, तो हम पाएँगे कि तब इतनी क्रूर तो नहीं थी। उस समय गर्मी भी नहीं पड़ती थी और ठंडक देनेवाले इतने संसाधन भी नहीं थे। पेड़ों से बने जंगल आज फर्नीचर के रूप में ड्राइंग रूम में सज गए या ईँधन के रूप में काम आ गए। अब उसी ड्राइंग रूम में जंगल वॉलपेपर के रूप में चिपक गए या फिर कंप्यूटर की स्Rीन में कैद गए। वे हमारी आँखों को भले लगते हैं। हम उन्हें निहार कर प्रकृति का आनंद लेते हैं।
कितना अजीब लगता है ना प्रकृति का इस तरह से हमारा मेहमान बनना? प्रकृति ने बरसों-बरस तक हमारी मेहमान नवाज़ी की, हमने मेहमान के रूप में क्या-क्या नहीं पाया। सुहानी सुबह-शाम, पक्षियों का कलरव, भौरों का गुंजन, हवाओं का बहना आदि न जाने कितने ही अनोखे उपहार हमारे सामने बिखरे पड़े हैं, लेकिन हम हैं कि उलझे हैं आधुनिक संसाधनों में। हम उनमें ढूँढ़ रहे हैं कंप्यूटर में या फिर ड्राइंग रूम में चिपके प्राकृतिक दृश्य में। असल में हुआ यह है कि हमने प्रकृति को पहचानने की दृष्टि ही खो दी है। वह तो आज भी हमारे सामने फुदकती रहती है, लेकिन हमें उस ओर देखने की फुरसत ही नहीं है। हमने अपने भीतर ही ऐसा आवरण तैयार कर लिया है, जिसने हमारी दृष्टि ही संकुचित कर दी है। विरासत में यही दृष्टि हम अपने बच्चों को दे रहे हैं, तभी तो वे जब कभी आँगन में या गैलरी में लगे किसी गमले में उगे पौधों पर ओस की बूँद को ठिठका हुआ पाते हैं, तो उन्हें आश्चर्य होता है। वे अपने पालकों से पूछते हैं कि या क्या है? पालक भी इसका जवाब नहीं दे पाते। भला इससे भी बड़ी कोई विवशता होती होगी?
बारिश के बाद मिट्टी की सोंधी खुशबु किसे नहीं पसंद आती, पर यह आती कैसे है, यह जानने की कोशिश की कभी आपने? मिट्टी अधिकांश एल्युमिनियम, लौह और केल्शियम के सिलिकोट तथा मुक्त सिलिका के घातु कणों से बनी है। अकार्बनिक घटकों के अतिरिक्त इस में कार्बनिक अवयव भी होते हैं, जो मुख्यत: वनस्पति के अवशेष से मिलते हैं। इन कार्बनिक पदाथोर्ं को सामूहिक रूप से ह्यूमस कहते हैं। जब पहली वर्षा शुष्क और तपती हुई धरती पर गिरती है, तो तुरंत वाष्प बन कर उड़ जाती है और अपने साथ आसवन द्वारा कुछ ह्यूमस भी ले जाती है। अनेक अविलय कार्बनिक योगिक जो उच्चतर बुदबुदांक पर गरम होने पर अपघटित होते हैं, वाष्प के होने से बादल बन जाते हैं .विशेषकर यही ह्यूमस के अंश मिट्टी की गंध के लिए उतरदायी हैं ...तो आओ, हम सब इस मानसूनी बारिश का स्वागत करें।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 10 जून 2011

कभी सुना है आपने एकांत का मद्धम संगीत. . .!


डॉ. महेश परिमल
सुबह हुई और सूरज की सिंदूरी आभा के साथ पूरब दिशा मुस्करा उठी। अल्लसुबह जो चिड़िया उनींदी होकर अपने पंखों को समेटते हुए घोसले में दुबक गई थी, उसने पहली किरण के साथ ही अपनी आँखें खोली और पंखों को फैलाकर उसमें रश्मियों का पुंज भर दिया। हवा के गुलाबी झौंके से पेड़ों की डालियों ने दोस्ती की और शांत वातावरण में पत्तों का संगीत गुनगुनाने लगा। धीरे-धीरे सूरज का साम्राज्य चारोंे दिशाओं में फैलता गया और धरती का रूप उसकी किरणों के श्रंगार से सँवर उठा।
प्रकृति का यह अद्भुत और मोहक दृश्य देखकर मन ने कहा- आज इस सुखद सुबह की शुरुआत भी सुखद कार्य से होनी चाहिए। सुखद कार्य ? मगर कौन सा कार्य सुखद कहा जा सकता है ? आज तो इंसानों की भीड़ में खुद को खोजना ही मुश्किल है! यदि घड़ी भर के लिए खुद से ही मुलाकात हो भी गई, तो जब तक यकीन करें कि ये हम खुद ही हैं, तब तक इंसानी भीड़ का एक रेला आता है और खुद को ही धकेलकर दूर ले जाता है। ऐसे में क्षण भर पहले हुई खुद से मुलाकात ही एक युग का सफर बन कर रह जाती है। आप सोचेंगे, शब्दों का कैसा जाल फैलाया जा रहा है, जिसमें केवल उलझन ही उलझन है! लेकिन यह उलझन नहीं, हमारी जि़ंदगी की हकीकत है।

आज इंसान के पास सभी के लिए समय है, लेकिन केवल खुद के लिए ही समय नहीं है। जब-जब खुद से बातें करने के लिए मोबाइल पर अपना ही नंबर लगाया जाए, तो वह व्यस्त ही मिलता है। व्यस्तताओं की पैनी धार पर बैठा आदमी धीरे-धीरे समय के साथ कटता चला जा रहा है। ऐसा कोई क्षण, कोई लम्हा नहीं, जब उसे एकांत मिला हो, और इस एकांत में उसने अपने आप से बातें की हों। खुद को अपना दोस्त बनाने की बात, खुद को अपना सुख-दुख कहने की साध तो सबके मन में होती है। पर कहाँ कर पाते हैं हम ऐसा। हम सबके बारे में जानने का दावा भले ही कर लें, पर अपने आप को जानने का दावा कभी नहीं कर सकते।
आजकल डॉक्टर मरीज को दवाओं के रूप में एक सलाह देने लगे हैं। अखबार, टीवी, मोबाइल से दूर होकर एक सप्ताह के लिए अपनों से इतनी दूर चले जाओ, जहाँ बिजली तक न हो। यानी सुदूर गाँव में। वहाँ जाकर सुनो एकांत का संगीत। अकेलेपन में भीतर से आवाज आएगी। इस आवाज को पहचानो, यह अपनी ही आवाज होगी, जो हमें पुकारती है। कई बार कोशिश करोगे, तो इस आवाज को साफ सुनने लगोगे। फिर शुरू कर देना, अपने आप से बातचीत। बात करते रहना, करते रहना। एक समय ऐसा भी आएगा, जब आप खुद को अजनबी लगने लगेंगे। अरे! ये तो मैं ही हूं, ये तो मेरे बचपन की आवाज है, अब तक कहाँ थी यह आवाज? इसी आवाज को सुनने के लिए मैं तरस गया था। आखिर कहाँ थी यह आवाज? मेरे ही भीतर थी, तो सुनाई क्यों नहीं दी मुझे?
अक्सर ऐसा ही होता है,जब हम एकांत का संगीत सुनते हैं, तब हम अपने बेहद करीब होते हैं। यही क्षण होता है, जब हम अपनी आवाज सुनें। हम क्या कहते हैं, क्या सोचते हैं, हमें क्या करना है, कहाँ जाना है, हमारी मंजिल क्या है आदि। इन सबका उत्तर मिल जाएगा, जब हम वास्तव में अपनी दुनिया में लौट आएँगे। जहाँ हमारे अपने हमारा इंतजार कर रहे होते हैं। बहुत ही कम होती है, इन अपनों की संख्या। पर हौसला बढ़ाने मे इनका कोई सानी नहीं। शायद इसीलिए कहा जाता है कि एकांत का संगीत सुनो..
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 25 अगस्त 2010

न सावन, न सावन के झूले

डॉ महेश परिमल
अपनी पूरी मस्ती और शोख अदाओं के साथ सावन कब हमारे सिरहाने आकर चुपचाप खड़े हो गया, हमें पता ही नहीं चला। हमारी आँखों का सावन तो कब का सूख चुका। हाँ बिटिया कॉलेज जाने की तैयारी करते हुए कुछ गुनगुनाती है, तब लगता है, उसका सावन आ रहा है। कई आँखें हैं, जिनमें हरियाला सावन देखता हूँ, पर उससे भी अधिक सैकड़ों आँखें हैं, जिनमें सावन ने आज तक दस्तक ही नहीं दी है। उन्हें पता ही नहीं, क्या होता है और कैसा होता है सावन?
सावन कई रूपों में हमारे सामने आता है। किसान के सामने लहलहाती फसल के रूप में, व्यापारी के सामने भरे हुए अनाज के गोदामों के रूप में, अधिकारी के सामने नोटों से भरे बैग के रूप में और नेता के सामने चुनाव के पहले मतदाता के रूप में और चुनाव के बाद स्वार्थ में लिपटे धन के रूप में। सबसे अलग सावन होता है युवाओं का। प्रेयसी या प्रिय का दिख जाना ही उनके लिए सावन के दर्शन से कम नहीं होता। इनके सावन की मस्ती का म$जा तो न पूछो, तो ही अच्छा!
इस सावन को अपनी मस्ती में सराबोर देखना हो, तो किसी भी गाँव में चले जाएँ, जहांँ पेड़ों पर झूला डाले किशोरियाँ, नवयुवतियाँ या फिर महिलाएँ अनायास ही दिख जाएँगी। सावन के ये झूले मस्ती और अठखेलियों का प्रतीक होते हैं। यही झूला हम सबको मिला है माँ की बाँहों के रूप में। कभी पिता, कभी दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, भैया-भाभी या फिर दीदी की बाँहों का झूला। भला कौन भूल पाया है?
बचपन का सावन याद है आपको? मुझे याद है, मेरे सामने जातियों में बँटी देश की सामाजिक व्यवस्था के सावन का चित्र है। पूरे गाँव में आम, नीम, इमली के पेड़ों पर कई जगह झूले बाँधे जाते थे, हम सब उस पर झूलते थे। ऐसा नहीं था कि केवल किशोरियाँ या स्त्रियाँ ही झूलती हों। किशोर, अधेड़, बच्चे सभी झूलते थे। विशेष बात यह थी कि सभी जाति के लोग झूलते थे। जिस झूले पर ब्राह्मण का छोरा झूलता, उसी पर पहले या बाद में हरिजन की छोरी या छोरा भी झूलता था। एक बात अवश्य थी, सब साथ-साथ नहीं झूलते थे। जातिगत दूरी बनी ही रहती थी। यह दूरी झूले, रस्सी, पेड़ और स्थान को लेकर नहीं थी, व्यक्ति को लेकर थी। कुछ लोग हमें अपने समय पर झूलने का आनंद नहीं लेने देते थे। हम साथियों के साथ उन्हें झूलता देखते रहते। दिन में तो हमें झूुलने का अवसर कम ही मिलता। पर रात को, उस वक्त तो मैदान साफ मिलता। हम कुछ लोग रात में ही झूलते। खूब झूलते।
मुझे याद है, कुछ हरिजन छोरे भी मेरे दोस्त थे। दिन में तो झूले जातियों में बँट जाते थे, पर रात में यह दायरा हम तोड़ देते थे। उस वक्त सारे भेदभाव अंधेरे में डूब जाते। हम दो-दो या तीन-तीन दोस्त साथ-साथ झूलते। झूलने का म$जा तब तक नहीं आता, जब तक कोई लोकगीत न हो। हम बच्चे थे, लोकगीत तो याद नहीं थे, सो पाठ्यपुस्तक की कोई कविता, कोई फिल्मी गीत या फिर कबीर, रसखान, सूर-तुलसी के पद, मीरा के दोहे या फिर झाँसी की रानी के गीत ही गाने लगते। बड़ा अच्छा लगता। रात गहराती, बिजली चमकती, बादल गरजते, तो हम चुपचाप माँ के पास आकर दुबक जाते। ऐसा होता था हमारा सावन।
आज सावन बदल गया है। आने के पहले खूब तपिश देता है, अपने आगमन का विज्ञापन करता है। छतरी, बरसाती, रेनकोट, तालपत्री के रूप में। पर जब कभी यह रात में आ धमकता है, तो सारे विज्ञापन धराशायी हो जाते हैं। न तालपत्री काम आती है, न पन्नियाँ, और न ही रेनकोट। गृहस्थी की पूरी झाँकी तैरती रहती है, ढहने की तैयारी करती झोपड़ी में। सावन अमीरों के यहाँ भी आता है, पर रात में ही कुछ म$जदूर लग जाते हैं, बंगले का पानी उलीचने में। नाली खोद दी जाती है, पानी झोपड़पट्टी की तरफ जाने लगता है। रात में बिजली धोखा न दे जाए, इसलिए नया इन्वर्टर खरीदा जाता है। बच्चों के झूलने के लिए एक सीट वाला आधुनिक झूला हॉल में लगा दिया जाता है, पर इसमें वह म$जा कहाँ? जो उस झोपड़पट्टी के सामने एक पेड़ पर साइकिल के खराब टायरों से बने झूले में है। बच्चे उस पर झूलते हैं, मस्तियाते-बतियाते हैं और फिर गिरने पर रो-रोकर घर चले जाते हैं।
सावन... कभी पनीली आँखों का सावन, सूखी आँखों का रेगिस्तानी सावन, खाली बैठे शहरी म$जदूर का सावन, लोकगीतों के साथ खेतों में बुवाई करती महिलाओं का सावन, बीज के लिए क$र्ज देते व्यापारी का सावन, बाइक पर सरपट भागते युवाओं का सावन, घर में कैद होकर खेलते बच्चों का सावन... कितने रूप हैं सावन तुम्हारे... ? तुम्हारे रंग की भी कोई सीमा नहीं। सावनी रंग जिस चेहरे पर है, समझो उसके पौ-बारह। यूँ ही हर किसी के चेहरे पर नहीं खिलता सावनी रंग।
रंगों की रंगत में सावनी झूलों की डोर अब भीगने लगी है। टूटते लोगों का सहारा भी बनता है सावन और तिनका-तिनका लोगों को तोड़ भी देता है सावन। हम तुम्हें सर-आँखों पर बिठा सकते हैं, पर तबाही का मंजर लेकर मेरे देश के किसी शहर में मत आना सावन। नहीं तो न बाँहोंं के झूले होंगे, न मस्ती, न अठखेलियाँ। खुशियों को लेकर आओ, तो स्वागत है तुम्हारा मेरे देश के हरियाले-मस्त सावन......

डॉ महेश परिमल