शनिवार, 29 अक्टूबर 2011
शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011
सोमवार, 17 अक्टूबर 2011
क्या बोल गया अन्ना का मौन?
डॉ. महेश परिमल
आखिर हिसार से कुलदीप विश्वोई जीत गए। यहाँ कांग्रेस तीसरे क्रम पर रही। कांग्रेस प्रत्याशी जयप्रकाश एक कमजोर प्रत्याशी थे। उनकी हार से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। एक लहर यह चली कि शायद अन्ना की अपील काम कर गई। पर अब अपनी इस अपील पर शायद अन्ना को ही मलाल है। अब उन्होंने मौन साध लिया है। उनका मौन इसलिए आवश्यक भी था कि इन दिनों जो नए सवाल उपजे हैं, उसके जवाब उनके पास नहीं हैं। एक तो उन्होंने अनजाने में भाजपा की जिस तरह से सहायता की है, उससे उन पर संघ से प्रभावित होने का आरोप लग रहा है। इसके बाद जब आडवाणी जी रथयात्रा सतना पहुँची, तब उसके कवरेज के लिए पत्रकारों को जिस तरह से धन दिया गया, उससे यही साबित होता है कि जिस भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए उन्होंने रथयात्रा शुरू की है, उसके कवरेज के लिए भी भ्रष्टाचार का सहारा लेना पड़ रहा है। तीसरी बात येद्दियुरप्पा का जेल जाना भी इस बात का परिचायक है कि यदि ये वास्तव में दोषी थे, तो फिर इन्हें भाजपा ने ही इतने लम्बे समय तक संरक्षण क्यों दिया? इन सवालों का जवाब अन्ना के पास नहीं है। यही नहीं, आडवाणी भी इन सवालों का जवाब नहीं दे पा रहे हैं। भोपाल में उन्होंने इस तरह के सवालों से बचने की भरसक कोशिश की। कई बार तो उन्होंने खामोशी का सहारा लिया। आखिर कब तक वे और अन्ना खामोशी की चादर ओढ़े रखेंगे। कुछ तो जवाब देना ही होगा।
इसके अलावा अन्ना अपनों से ही परेशान हैं। उनके साथियों की हरकतें ही ऐसी हो गई हैं कि अन्ना को भी जवाब नहीं सूझ रहा है। स्वामी अग्निवेश की कपिल सिब्बल से बातचीत की सीडी बाहर आने के बाद अन्ना को जो झटका लगा, वह तो उनके आंदोलन को मिले जनसमर्थन से कम हो गया। पर कश्मीर पर प्रशांत भूषण ने जो बयान दिया, उसकी प्रतिक्रिया के एवज में उनकी जिस तरह से धुलाई हुई, वह भले ही एक लोकतांत्रिक देश के लिए शर्मनाक है, पर नाराजगी को बाहर आने के लिए कोई रास्ता तो चाहिए। जो प्रशांत भूषण ने कहा, वही तो पाकिस्तान लम्बे समय से कह रहा है। उनके बयान से पाकिस्तान को ही बल मिला। वह तो इसी ताक में है कि कश्मीर में किसी तरह से जनमत संग्रह हो, ताकि वह अपनी चालाकी से लोगों को भरमा सके। अपनों के दर्द से परेशान अन्ना का अब खामोश रहना ही ठीक है। हिसार चुनाव में कांग्रेस का प्रत्याशी भले ही न जीत पाया हो, पर अन्ना जीत गए, यह कहना मुनासिब नहीं होगा। जिस तरह से वहाँ कांग्रेस की हार तय थी, ठीक उसी तरह अन्ना की अपील कोई असर नहीं छोड़ेगी, यह भी तय था। अब भले ही कितना भी कह लिया जाए कि हिसार में कांग्रेस अन्ना के प्रभाव के कारण हारी, तो यह गलत ही होगा।
हिसार में कांग्रेस की हार कोई अर्थ नहीं रखती। लेकिन अन्ना की सीडी जिस तरह से वहाँ लोगों को सुनाई गई, उससे यही लगता है कि अन्ना को लोगों ने गंभीरता से नहीं लिया। जनलोकपाल विधेयक के लिए अन्ना के आंदोलन को भले ही अपार जनसमूह का साथ मिला हो, पर अब सरकार की लेटलतीफी से उनकी छवि लगातार धूमिल होती जा रही है। उस पर उनके साथियों के बयानों ने इस छवि को काफी नुकसान पहुँचाया है। अपनी लेटलतीफी के लिए पहचानी जाने वाले मनमोहन सरकार यही चाहती है कि अन्ना को मिल रहे जनसमर्थन का ग्राफ लगातार कम हो। यही हो रहा है। हिसार चुनाव के पहले अन्ना ने जिस तरह कांग्रेस के खिलाफ हवा चलाई थी, उसके जवाब में कांग्रेस ने कहा कि अगर अन्ना में हिम्मत है, तो वे हिसार में अपना प्रत्याशी खड़ा करके दिखाएँ, केवल प्रत्याशी खड़ा करना महत्वपूर्ण नहीं, उसे जीतना भी आवश्यक होता। तभी यह माना जाता कि अन्ना की अपील में दम है। ऐसा केवल लोकनायक जयप्रकाश ही कर सकते थे। जबलपुर में उन्होंने जिस तरह से कांग्रेस के गढ़ पर धावा बोला और एकदम नए नेता शरद यादव को जिताया, इससे उनके कद का पता चलता है।
लोकसभा चुनाव में जिस प्रत्याशी की जीत का संभावनाएँ प्रबल हो और वह चुनाव हार जाए, तो यह आश्चर्यजनक हो सकता है। हाँ यदि कमजोर प्रत्याशी जीत जाए, तो वह इसका पूरा श्रेय लेने से नहीं चूकता। हिसार में तो कांग्रेस के उम्मीदवार जयप्रकाश तीसरी पोजीशन में है। उनकी हार का श्रेय अन्ना को नहीं मिलेगा। इसे दूसरे नजरिए से देखें तो जयप्रकाश की हार के लिए कोशिश करने का मतलब यही है कि अन्य प्रत्याशियों को जिताने के लिए रास्ता साफ करना। ये दोनों प्रत्याशी भ्रष्ट हैं, यह तो सभी को पता है। पर शायद अन्ना को यह पता नहीं कि उन्होंने अनजाने में ही भ्रष्ट लोगों की सहायता ही की । भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले जब भ्रष्ट लोगों के संरक्षक बन जाए, तो इसे क्या कहा जाए?
कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि अन्ना अब रास्ते से भटक रहे हैं। उनकी अपनी सोच सीमित है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन तक उनकी सोच में साफगोई थी, पर अब वे अपनों से ही संचालित होने लगे हैं। उनकी टीम आंदोलन करने में सक्षम हो सकती है, पर चुनावी मैदान में उतरकर लोगों को रिझाने में नाकामयाब है, यह तय है। अन्ना की टीम को अपने आप पर ही विश्वास नहीं है। टीम के अंतर्कलह भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ऐसे में आखिर वे कब तक खींच पाएँगे, विभिन्न विचारधाराओं की इस नाव को? भाजपा यदि भ्रष्ट न होती और अन्ना उनके प्रत्याशियों का समर्थन करते, तो संभव है, लोग उन्हें गंभीरता से लेते। पर वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, इससे साफ है कि वे न तो अंतर्कलह को ही रोक पा रहे हैं और न ही चुनाव लड़ने के लिए हिम्मत ही बटोर पा रहे हैं। ऐसे में उनकी स्वच्छ छवि को उज्ज्वल बनाए रखना एक दुष्कर कार्य है। आज भले ही वे मौनधारण किए हुए हों, पर सच तो यह है कि इस मौन ने ही काफी कुछ कह दिया, पर इसे समझा कितनों ने?
डॉ. महेश परिमल
सोमवार, 10 अक्टूबर 2011
माँ पर पी-एच.डी. और पी-एच.डी. पर माँ
बहुत ही अनजाना-सा नाम है, सिंधुताई सपकाल का। उनका संघर्ष भले ही किसी के लिए महत्वपूर्ण हो न हो, पर उनके बेटे के लिए अवश्य है। इन दिनों सिंधुताई का बेटा उन पर पी-एच.डी. कर रहा है। लोग अपने आदर्शो पर अनुभवों की किताबें लिखते हैं, पर पी-एच.डी. करना अलग बात है। पी-एच.डी. का एक अलग ही आधार होता है। माँ को अध्यायों में विभाजित करना होता है। उनके संघर्षो और कड़वे अनुभवों को अक्षरों का रूप देते हुए एक-एक पन्नों पर बाँटना होता है। जहाँ हर पूर्ण विराम एक वेदना को आँसू का रूप देता है। बूँद-बूँद आँसूओं से लिखी इबारत माँ के संघर्ष को एक नई ऊँचाई देगी, ऐसा विश्वास किया जा सकता है। सिंधुताई के बेटे की पी-एच.डी. का आधार भी शायद यह हो सकता है। माँ चिंदी के रूप में, दसवें वर्ष में शादी अर्थात बालिका वधू के रूप में, बदचलनी का आरोप झेलनेवाली एक बेबस माँ के रूप में, समाज से निष्कासित नारी के रूप में, भीख माँगनेवाली एक लाचार माँ के रूप में, श्मशान में रहनेवाली एक नि:सहाय माँ के रूप में, चिता की आँच में रोटी सेंकने वाली एक बेचारी माँ के रूप में और अंत में स्नेह लुटाने वाली हÊार बच्चों एक स्नेहमयी माँ के रूप में। सिंधुताई पर केन्द्रित शोधप्रबंध के उक्त अध्याय हो सकते हैं। माँ पर महाकाव्य तो लिखा जा सकता है, पर उन पर शोधप्रबंध तैयार करना मुश्किल है, क्योंकि शोधप्रबंध में ईमानदारी के अवयव होते हैं। जो कुछ पर माँ पर बीता, उसे शब्दों की माला पहनाना एक अलग ही अनुभव होता है।
भाषाविज्ञान में पी-एच.डी. पर माँ को लेकर मेरा अलग ही तरह का अनुभव है। जब मैं अपना शोधप्रबंध लेकर अनपढ़ माँ के पास पहुँचा, तो हमारे बीच जो संवाद हुआ, वह कुछ इस तरह था -
- बेटा ! इसे तूने लिखा है ?
- हाँ , माँ।
- क्या तू लेखक है ?
- नहीं, माँ।
- तो फिर इत्ता सारा कैसे लिख लिया ?
- इतना तो सबको लिखना ही पड़ता है माँ।
- पर तू तो विद्यार्थी है, लेखक नहीं।
- सभी विद्यार्थी को इतना लिखना ही होता है माँ।
- तब तो तुझे बहुत तकलीफ हुई होगी ?
- लिखने में कैसी तकलीफ माँ ?
- बेटा, मैं अनपढ़ जरूर हूँ, पर तुझे मिलाकर ग्यारह पढ़े-लिखे बच्चो की माँ भी हूँ। मुझे मालूम है, पढ़ने-लिखने में कितनी तकलीफ होती है।
- मैं खामोश!
- बेटे, अपने हाथों को जरा इधर ला, मैं उसे चूम लेती हूँ, ताकि तेरे हाथों की पीड़ा कुछ कम हो सके।
माँ मेरे हाथों को चूम रही थी। मैं गीली आँखों से उनका ममत्व रूप देख रहा था। मुझे तो उसी दिन पी-एच.डी. मिल गई थी। यह मैंने उसी दिन मान लिया था। यह बात 18 वर्ष पहले की है। माँ अब इस दुनिया में नहीं है। अभी दो अक्टूबर को उनकी दसवीं पुण्यतिथि थी। मैं आज भी पीड़ा के क्षणों में अपने हाथों पर माँ के चुम्बन को महसूस करता हूँ। हममें से कितने ऐसे हैं, जो माँ को इस रूप में याद करते हैं ?
माँ स्नेह की निर्झरिणी है, जो सतत प्रवाहमान है। इसकी हर बूँद में ममत्व का अहसास है, जो एक शिशु को जीवन जीने की प्रेरणा देता है। जब इसी माँ को वृद्धाश्रम में दिन बिताते हुए देखता हूँ तो माँ के प्रति हमारे दृष्टिकोण बदलते हुए दिखाई देते हैं। बदनसीब हैं वे जिनके माता-पिता वृद्धाश्रमों में कैद हैं और खुशनसीब है सिंधुताई का वह बेटा जो केवल अपनी माँ पर ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय समाज में सिंधुताई की तरह जीवन व्यतीत करती माँओं पर पी-एच.डी. कर रहा है।
डॉ. महेश परिमल
शनिवार, 24 सितंबर 2011
मौलवी, पादरी, आरएसएस और प्रजा सभी शामिल हैं उस आंदोलन में
डॉ. महेश परिमल
अगस्त में जिस तरह से अन्ना ने अपना आंदोलन चलाया और उसे देशव्यापी ख्याति मिली। इसी तरह का एक आंदोलन इन दिनों तमिलनाड़ु के कुंदनकुलम में चल रहा है, जिसमें क्या विद्यार्थी, क्या बच्चे, क्या बूढ़े, महिलाएँ सभी इस आंदोलन में भाग ले रहे हैं। यह आंदोलन है रुस के सहयोग से करीब 15 सौ करोड़ की लागत से बनने वाले परमाणु संयंत्र के खिलाफ। यह आंदोलन तब शुरू हुआ है, जब इसका 99 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। दिसम्बर में इसका उद्घाटन होना था। स्थानीय जनता इसका विरोध कर रही है। उनके इस आंदोलन में सभी वगोर्ं का साथ मिल रहा है। मुख्यमंत्री जयललिता के लिए एक नई परेशानी खड़ी हो गई है। कुछ दिनों पहले ही उन्होंने राज्य की जनता से यह अपील की थी कि परमाणु संयंत्र की तरफ से आपको कोई नुकसान नहीं होगा, आप सुरक्षित रहेंगे। पर उनकी इस अपील का नागरिकों पर कोई असर नहीं हुआ। नागरिक जापान के फुकुशिमा और हाल ही में फ्रांस के परमाणु संयंत्र में हुई दुर्घटना के मद्देनजर परमाणु संयंत्र का विरोध कर रहे हैं।
परमाणु संयंत्रों में होने वाली दुर्घटनाओं को देखते हुए अब भारतीय जनता भी इसके प्रति सचेत हो गई है। नागरिक यह मान रहे हैं कि परमाणु संयंत्रों के आसपास रहने वाले लोग सुरक्षित नहीं है। संयंत्र कितने भी मजबूत हों, पर वह नागरिकों की जान की हिफाजत नहीं कर सकते। यही धारणा अब लगातार बलवती होती जा रही है। तमिलनाड़ु के कुंदनकुलम में परमाणु संयंत्र के निर्माझा के संबंध में सन् 1988 में रुस के साथ समझौता हुआ था। इसका निर्माण कार्य पिछले 20 वर्षो से चल रहा था। पहले तो नागरिकों ने यह समझा कि इस संयंत्र से उन्हें रोजगार मिलेगा, पर जापान और फ्रांस में हुई दुर्घटना के बाद नागरिको को अपनी सुरक्षा का भय सताने लगा है। अब जाकर यह पूरा होने को है, तो स्थानीय नागरिक उसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं।
तमिलनाड़ु के तिरुनलवेल्ली जिले के समुद्र किनारे एक हजार मेगावाट की क्षमता के दो परमाणु बिजली संयंत्र रुस के सहयोग से बन रहे थे। इसका काम दस वर्ष पहले शुरू हुआ था। राज्य सरकार की योजना है कि इससे 1200 मेगावॉट की क्षमता वाले चार और संयंत्र स्थापित किए जाएँ। इस प्लांट का काम शुरू हुआ, तब कुंदनकुलम करीब-करीब उजाड़ था। आबदी मात्र दस हजार रह गई थी। यहाँ रोजगार के अवसर बिलकुल भी न थे। इसलिए लोग रोजी रोटी की तलाश में मेंगलोर, मैसूर, मुम्बई और दुबई चले गए। धीरे-धीरे प्लांट की ख्याति बढ़ने लगी। इससे लोगों को लगा कि अब यहाँ हमें रोजगार मिल जाएगा, तो वे अपने घरों की ओर लौटने लगे। वे सभी लौट तो आए, पर उलझन यह थी कि वे परमाणु संयंत्र से होने वाली समृद्धि की ओर देखें कि उससे होने वाले नुकसान और असुरक्षा पर ध्यान दें। इसी बीच फुकुशिमा में होने वाली दुर्घटना से उन्हें यह सोचने को विवश कर दिया कि समृद्धि से अधिक महत्वपूर्ण है सुरक्षा। बस शुरू हो गया विरोध।
परमाणु संयंत्रों का विरोध केवल तमिलनाड़ु में ही हो रहा है, ऐसा नहीं है। महाराष्ट्र के जैतापुर और गुजरात के मीठी वीरडी गाँव में भी परमाणु संयंत्रों का विरोध किया जा रहा है। इस विरोध और तमिलनाड़ु के विरोध में एक बड़ा अंतर यही है कि तमिलनाड़ु में परमाणु संयंत्रों का काम 99 प्रतिशत पूरा हो चुका है, जबकि इन दोनों का काम अभी शुरू ही नहीं हुआ है। विरोध करने वाले यही कह रहे हैं कि जब परमाणु संयंत्रों का काम शुरू हुआ, तब हम इनके दुष्परिणामों से अवगत नहीं थे, पर जापान के फुकुशिमा की हालत देखकर हम सचेत हो गए हैं। कुंदनकुलम में अभी 127 परिवार संयंत्र के सामने आमरण अनशन पर बैठे हैं। इनमें वरिष्ठ नागरिक, विद्यार्थी, पादरी, संघ परिवार के कार्यकत्र्ता और विकलांग नागरिक भी शामिल हैं। इस पूरे भू-भाग में करीब एक लाख लोग परमाणु संयंत्र का विरोध कर रहे हैं, इसलिए जयललिता सरकार भी मुश्किल में है। इस संयंत्र के लए न्यूक्लियर पॉवर कापरेरेशन ऑफ इंडिया द्वारा अभी तक करीब 15 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। 2003 में जब यहाँ सुनामी का कहर बरपा था, तब बेघर हुए लोगों को नए सिरे से बसाया गया था। बसाहट के दौरान बहुत से लोग आ गए, कोई अंकुश न होने के कारण अब यहाँ एक लाख लोग रह रहे हैं।
परमाणु संयंत्र के विरोध के पीछे एक रोचक तथ्य यह भी है कि न्यूक्लियर पॉवर कापरेरेशन के अधिकारियों द्वारा स्थानीय नागरिकों को परमाणु संयंत्र की सुरक्षा के बारे में जब प्रशिक्षण दिया गया, तब इसकी मोक ड्रील की गई। इस दौरान अधिकारियों ने नागरिकों से कहा कि आप जितना अधिक तेज दौड़कर इस संयंत्र से दूर हो सकते हो, हो जाओ। इससे नागरिक इतने अधिक दहशत में आ गए कि उन्होंने संयंत्र का विरोध करने का निर्णय ले लिया। इनके साथ तमिलनाडु के सभी धर्मो के लोग और राजनेता, स्थानीय नेता भी संगठित हो गए हैं। इसके पहले इस तरह की एकता कभी देखी नहीं गई। इसका केंद्र बिंदु कुंदनकुलम में स्थित सेंट मेरी चर्च है। आरएसएस के कार्यकर्ता भी इस विरोध में पादरियों के साथ खड़े हैं। यही नहीं इन्हें स्थानीय मौलवियों का भी पूरा सहयोग मिल रहा है। कई पर्यावरणविदों को भी यहाँ देखा जा सकता है। ग्रीनपीस जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था भी इंटरनेट का उपयोग करते हुए इस विरोध को विश्वव्यापी बना रही है। पहले तो राज्य के नेताओं ने इस विरोध की उपेक्षा की, पर जब उन्होंने देखा कि पूरा प्रदेश इस मामले में एकजुट है, तो वे भी विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए।
मजबूत संयंत्रन्यूक्लियर पॉवर कापरेरेशन ऑफ इंडिया के अधिकारी कहते हैं कि इस प्लांट को सुरक्षित बनाने के हरसंभव उपाय किए गए हैं। उनके अनुसार अणु रिएक्टरों को 1.20 मीटर मोटे सीमेंट के कांक्रीट से ढाँका गया है। उसकी सतह लीकप्रूफ लोहे की प्लेटों से बनाई गई है। इस प्लांट को समुद्र की सतह से 7.50 मीटर ऊँचे प्लेटफार्म पर बनाया गया है। ताकि सुनामी की आक्रामक लहरों से उसकी रक्षा की जा सके। सुनामी के दौरान इस संयंत्र की बिजली बंद हो जाए, तो रिएक्टरों को ठंडा रखने के लिए एक डीजल जेनेरेटर की आवश्यकता होती है, लेकिन यहाँ 4 जेरेरेटर रखे गए हैं। यदि ये जेनेरेटर भी फेल हो जाएँ, तो गर्मी कम करने के लिए भी वैकल्पिक व्यवस्था की गई है। दूसरी ओर संयंत्र का विरोध करने वाले यही कह रहे हैं कि ये सारी व्यवस्थाएँ जापान के फुकुशिमा में भी थीं। जापान विज्ञान एवं बेहतर प्रबंधन की दृष्टि से एक प्रगतिशील देश है, उसके बाद भी वहाँ दुर्घटना हो गई। प्रकृति के कोप के आगे उसने घुटने टेक दिए। यह सब होते हुए हम भारत के वैज्ञानिक, सरकारी अधिकारियों और प्रबंधन पर कैसे भरोसा करें? प्रकृति का कोप जब भी बरसता है, तो वह पहले से अधिक आक्रामक होता है। इसलिए हम कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते। उधर तमिलनाड़ु सरकार उलझन में है। मुख्यमंत्री जयललिता ने कुछ दिनों पहले ही इस संबंध में कुंदनकुलम की जनता के नाम एक अपील जारी कर यह विश्वास दिलाया था कि इस संयंत्र से उन्हें कोई खतरा नहीं है। लेकिन जनता इस सरकारी आश्वासन पर भरोसा करना ही नहीं चाहती। उसका कहना है कि वे क्या इस बात की गारंटी दे सकते हैं कि सुनामी की लहरे 7.5 मीटर से ऊँची नहीं होंगी। इसका जवाब किसी के पास नहीं था।
रुस सरकार की रोसेटम कंपनी द्वारा पश्चिम बंगाल के हरिपुर में एक हजार मेगावॉट की क्षमता वाले परमाणु संयंत्र के निर्माण की केंद्र सरकार की योजना थी। इस प्लांट के लिए समझौता 1988 में हुआ था। किंतु पश्चिम बंगाल की जनता द्वारा इसका विरोध किए जाने पर अभी तक इस प्लांट का काम शुरू ही नहीं हुआ है। पश्चिम बंगाल की कमान जब ममता बनर्जी ने सँभाली, तब इस प्लांट के निर्माण की आशा जागी थी, पर ममता बनर्जी ने एक बार में यह कहकर इस पर पानी फेर दिया कि मेरे रहते राज्य में कहीं भी परमाणु संयंत्र स्थापित करने की अनुमति नहीं मिलेगी। अब केंद्र सरकार इस प्लांट को और कहीं स्थापित करने की सोच रही है। फ्रांस के एटामिक पॉवर प्लांट में जो विस्फोट हुआ, उसे अरेवा कंपनी ने तयार किया था। यही नहीं उसका संचालन भी यही कंपनी कर रही थी। महाराष्ट्र के जैतापुर और गुजरात के मीठी वीरडी में जो परमाणु संयंत्र स्थापित होने हैं, उसका काम भी अरेवा कंपनी को ही करना है। साफ बात है जो कंपनी अपने ही देश में स्थापित परमाणु संयंत्र को सुरक्षित नहीं रख पाई, वह भारत में किस तरह से सुरक्षित रख सकती है? अब तो जब तक देश में स्थापित होने वाले परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा के बारे में समग्र चर्चा नहीं हो जाती, तब तक इन परमाणु संयंत्रों का काम स्थगित कर दिया जाना चाहिए। क्या आपको ऐसा नहीं लगता?
डॉ. महेश परिमल
बुधवार, 7 सितंबर 2011
रविवार, 7 अगस्त 2011
नहीं मानेंगे अन्ना, प्रशासन है चौकन्ना
डॉ. महेश परिमल
भ्रष्टाचार इस देश की रग-रग में समा गया है। भ्रष्टाचार के बिना इस देश का पत्ता तक नहीं हिलता। इसके बिना तो बच्चे को स्कूल में एडमिशन तक नहीं मिलता। भ्रष्टाचार से ही थाने में किसी के खिलाफ एफआईआर लिखाई जा सकती है। भ्रष्टाचार के बिना चुनाव नहीं लड़ा जा सकता। भ्रष्टाचार के बिना रोड बनाने के लिए ठेकेदार नही मिलता। इसके बिना न तो नौकरी मिलती है और न ही राशनकार्ड, और तो और बिना लेन-देन के आप अपना ड्राइविंग लायसेंस बनवाकर देख लें। भ्रष्टाचार से केवल हमारा ही देश नहीं, बल्कि पूरी दुनिया ही इससे ग्रस्त है। सभी के लिए यह एक महारोग है। यह अच्छी बात है कि अन्ना हजारे ने देश में फैेले भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर सरकार के खिलाफ लड़ाई शुरू की है। परन्तु सोचो, क्या एक लोकपाल की नियुक्ति हो जाने से गाँवों में होने वाले पुलिस अत्याचार कम हो जाएँगे? पटवारी ग्रामीणों से रिश्वत लेना बंद कर देंगे। सरकारी कार्यालयों में बाबू बिना दाम के लोगों का काम करना शुरू कर देंगे? एक लोकपाल की नियुक्ति से ही क्या पूरे देश में भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा? यह सोचना एक दिवास्वप्न ही है। देश में भ्रष्टाचार एक श्सिस्टम यानी व्यवस्था्य से पैदा हुआ है। जब तक सिस्टम नहीं बदला जाएगा, तब तक देश से भ्रष्टाचार को दूर नहीं किया जा सकता।
अन्ना साहब से यही कहना है कि भ्रष्टाचार ही इस देश की सबसे बड़ी समस्या नहीं है। गरीबी और भुखमरी इस देश की उससे बड़ी समस्या है। इसी देश में हर आधे घंटे में एक किसान आत्महत्या करता है। इसकी वजह यही है कि उसकी फसल जब तक तैयार होती है, तब तक उसके बाजार भाव गिर जाते हैं। ओड़ीशा के जंगलों में एक विदेशी कंपनी को आदिवासियों की जमीन दी जा रही है। उमुम्बई के उपनगर धारावी की झोपड़पट्टी पर रहने वाले नारकीय जीवन जी रहे हैं। देश में रोज एक दर्जन से अधिक किशोरियों से बलात्कार होता है। विरोध करने वाली किशोरी की आँखें भी निकाली जाने लगी है। मुम्बई में सरकार का नहीं, पर अंडरवल्र्ड का शासन चल रहा है। देश की राशन दुकानों का माल सीधे बाजार पहुँच रहा है। वायदा बाजार से व्यापारी खूब कमा रहे हैं। गरीबों का लगातार शोषण हो रहा है। खुलेआम नफरत की आग फैलाई जा रही है। अनशन के पहले जिसे चार मंत्री मनाने जाते हों, अनशन करने पर उसे डंडे से मार कर भगा दिया जाता हो। उसके बाद उस पर तमाम कानूनों का इस्तेमाल किया जाता हो, ऐसा केवल इस देश में ही हो सकता है। इस तरह की बहुत सी समस्याएँ हैं, जिनको लेकर अन्ना अनशन कर सकते थे। ये नहीं हो सकता, तो कम से कम केरोसीन, पेट्रोल और डीजल के दाम कम करने के लिए तो अनशन कर ही सकते थे।
जब अन्ना ने देश में फैले भ्रष्टाचार को लेकर अनशन करने की घोषणा की है, तब से उनके साथ कुछ समझदारों लोगों की एक टीम भी शामिल हो गई है। आज अन्ना के हर साथी का अपना अलग एजेंडा है। जब तक वे उपवास कर रहे थे, तब तक सब ठीक था, जैसे ही सरकार ने उनकी बात मान ली, सभी अपना-अपना राग अलापने लगे। अन्ना ने जब सरकार की बात को मानते हुए लोकपाल विधेयक तैयार करने के लिए ड्राफ्टिंग कमेटी बनाई, उसमें जिन्हें शामिल किया गया, उन पर कई तरह के आरोप लगने लगे। प्रशांत भूषण और शांतिभूषण पर आरोप लगे, स्वामी अग्निवेश पर नक्सलियों से सांठगाँठ के आरोप लगे, किरण बेदी पर अपनी लड़की का प्रवेश मेडिकल कॉलेज में कराने के लिए गलत तरीके का इस्तेमाल करने का आरोप लगा। मल्लिका पर कबूतरबाजी का आरोप लगा। उधर बाबा रामदेव ने भी अनशन किया, टीवी ने खूब टीआरपी बढ़ाई, हश्र यही हुआ कि पुलिस के डर से बाबा को महिला के वेश धारण कर भागना पड़ा। अब अन्ना ने तय कर ही लिया है कि 16 अगस्त स अनशन पर बैठना ही है। जो मानवीयता की थोड़ी सी भी समझ रखते हैं, वे यह अच्छी तरह से जानते हैं कि अन्ना कहीं न कहीं बच्चों से भी अधिक जिद्दी हैं। वे सरकार को हर बात बंदूक की नोक पर मनवाना चाहते हैं। एक आशंका यह है कि उन पर किसका वरदहस्त है। कहीं वे किसी गुप्त संगठन के इशारे पर तो काम नहीं कर रहे हैं? संभवतरू यह संगठन चाहता है कि हमारा देश आंदोलन, उपवास से अराजकता की स्थिति में पहुँच जाए। ताकि 1914 में होने वाले चुनावों में अपनी ताकत सिद्ध कर सकें। अन्ना की टीम में जो लोग हैं, उनमें इतनी कूब्बत नहीं है कि किसी गाँव में जाकर सरपंच का चुनाव जीत सकें। ये सभी फेसबुक पर सक्रिय दिखाई देेते हैं। धन इनके पास अपार है, लेकिन इनमें प्रचार की भूख है, इसी कारण लाइट में आने के लिए ये छटपटाते रहते हैं।
लगता है अन्ना इतिहास में अपनानाम जयप्रकाश की तरह अमर करना चाहते हैं। वे गांधीवादी हैं, इसमें कोई शक नहीं, पर वे इतने अधिक पढ़े लिखे नहीं है कि एक प्रजातांत्रिक देश के कानून को अच्छी तरह से समझ सकें। कंप्यूटर की भाषा में कहें, तो अन्ना हार्डवेयर हैं और सिविल सोसायटी उनका साफ्टवेयर। अपने उपवास से अधिक वे उसकी पब्लिसिटी में अधिक दिलचस्पी दिखाते हैं। वे कांगे्रसाध्यक्ष को चुपचाप पत्र लिखते हैं और जब उसका जवाब आता है, तो उसे तुरंत मीडिया को दे देते हैं। ताकि सोनिया जी को पता चल जाए कि उन्होंने अन्ना के पत्र का जो उत्तर दिया था, वह उनके पास पहुँच गया है। एक बात तो है कि अगर अन्ना के पीछे से मीडिया हट जाए, तो न तो उनका अनशन चल पाएगा और न ही उनकी पब्लिसिटी हो पाएगी, क्योंकि उनका आंदोलन मीडिया को लक्ष्य करने वाला है। अन्ना सड़क की राजनीति कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि लोकपाल विधेयक के दायरे में प्रधानमंत्री और सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीशों एवं सांसदों का भी समावेश हो। इस बारे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि उन्हें तो कोई गुरेज नहीं है। परंतु अन्ना सड़क पर बैठकर सरकार को अपनी तरह से चलाना चाहते हैं। किसी भी प्रस्ताव को कानून बनाना हो,तो उसकी एक प्रक्रिया होती है। छोटे से छोटे प्रस्ताव को लाना होता है, तो प्रजा का अभिप्राय जानना होता है। इसके अलावा अन्य राजनैतिक दलों से बातचीत करनी होती है। लोगों से इस पर आपत्ति मँगानी होती है। लोकसभा में सांसद इस पर बहस करते हैं। इन सारी प्रक्रियाओं को दरकिनार रखते हुए अन्ना की टीम, जिसमें पिता-पुत्र वकील, स्वामी का वेश धारण करने वाले एक एक्टिविस्ट कहते हैं कि जैसा हम कह रहे हैं वैसा ही करो, नहीं तो अनशन। यह तो सीधा-सीधा भयादोहन यानी ब्लेकमेलिंग है। नागरिकों की भावनाओं को उकसाकर अनुशासित लोकतंत्र की सारी प्रक्रियाओं को ताक पर रखने वाली बात है। देश की 121 करोड़ की आबादी में से 98 प्रतिशत लोगों को यही नहीं मालूम कि ये सिविल सोसायटी आखिर क्या हे? देश में अनेक बुद्धिशाली कानूनविद हैं, पर अन्ना ने पिता-पुत्र की जोड़ी को ही आखिर क्यों पसंद किया?
अन्ना शायद यह भूल जाते हैं कि लोकपाल के रूप में जो व्यक्ति आएगा, वह भी तो एक इंसान ही होगा। ईश्वर तो नहीं होगा? मान लो कि भ्रष्टाचार विरोधी जाँच के लिए सेंट्रल विजिलेंस कमिशन के चेयरमेन के रूप में थामस जैसा कोई विवादास्पद व्यक्ति का चयन हो गया? ऐसी स्थिति में क्या वह सबके साथ न्याय कर पाएगा? लोकपाल स्वयं भ्रष्ट नही होगा, इसकी गारंटी देने वाला कौन होगा? क्या अन्ना बता सकते हैं कि इस देश मे कौन ईमानदार है? भूतकाल में सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीशों पर भी आरोप लगे हैं। ऐसे में एक ईमानदार लोकपाल की कल्पना कैसे की जा सकती है? अन्ना कहीं समानांतर सरकार चलाने की चाहत रखने वाले कथित चरमपंथियों से तो नहीं मिल गए? भारत के प्रधानमंत्री कानूनी रूप से एक श्संस्था ्य हैं, व्यक्ति नहीं। उस पद की गरिमा का भी हमें खयाल रखना होगा। लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री के सर पर लटकती तलवार हो, तो वे देश का संचालन नहीं कर पाएँगे। यदि उनके द्वारा कोई गलत काम होता है, तो वे सजा के हकदार हैं, पर जब तक वे एक सरकार को अनुशासित रूप से चला रहे हैं, तो उन्हें सरकार चलाने देना चाहिए।
क्या अन्ना को इतना भी नहीं पता कि भारत में प्रजातंत्र होने के बाद भी वह जातिवाद के दायरे से आज तक बाहर नहीं निकल पाया है। मायावती खुलेआम सवर्णों को मनुवादी कहकर उन्हें भला-बुरा कहती रहती हैं। कांगे्रस मुस्लिमों को रिझा रही है। उधर भाजपा हिंदुओं को रिझाने में लगी है। बाल ठाकरे और राज ठाकरे बिहारियों से नफरत करते हैं। उधर कश्मीरी मुसलमान कश्मीरी पंडितों से नफरत करते हैं। क्या लोकपाल इन सबसे अलग होगा? ये सभी अत्यंत नाजुक और संवेदनशील मुद्दे हैं। इन सब पर पूरी चर्चा होनी चाहिए। लोकपाल बिल पर समग्र चर्चा के बाद ही इस पर विचार किया जाना चाहिए। हमारे देश का एक-एक सांसद अपने क्षेत्र के करीब दस से बीस लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। आखिर सांसदों अपने मतदाताओं के प्रति भी कुछ जवाबदार हैं। अब अगर अन्ना सड़क पर बैठकर सरकार को तारीख दे दें, कि इस तारीख तक उनका बनाया हुआ लोकपाल विधेयक पारित कर दिया जाए, नहीं तो अनशन। एक प्रजातांत्रिक देश में इस प्रकार से कोई असंवैधानिक कार्य करे, तो सरकार अपना बचाव तो करेगी ही। बिना चुनाव लड़े अन्ना गांधीजी के नाम पर तानाशाह बनना चाहते हैं, ऐसा कभी हो सकता है। कानून बनाने का काम सड़क पर बैठे कुछ लोगों का नहीं है। वह काम पार्लियामेंट का है। अन्ना का गर्व कुछ दिनों पहले टीवी के एक साक्षात्कार के दौरान दिखा- मैं एक मंदिर में 10 बाय 8 फीट के एक कमरे मे ं रहता हूँ, पर मैंने महाराष्ट्र के 6 मंत्रियों का विकेट गिराया है। इस प्रकार की भाषा उनके भीतर बैठे किसी दंभी व्यक्ति की लगती है। इसके अलावा जब वे कहते हैं कि ये सरकार तो अब जाने वाली है, तो क्या यह भाषा किसी गांधीवादी की लगती है आपको?
अब यदि अन्ना पेट्रोल-डीजल की भारी कीमतों को कम करने के लिए उपवास करते हैं आंदोलन करते हैं, तो इस देश का बच्चा-बच्चा उनके साथ होगा। पर किसी के इशारे पर सरकार को परेशान करने की बात करते हैं, तो उनकी ईमानदारी पर शक होता है। मात्र कुछ लोग अन्ना को चला रहे हैं और अन्ना इनसे पूरा देश चलाना चाहते हैं? यदि उनकी नीयत साफ होती, तो उनका यह आंदोलन तो बहुत पहले शुरू हो जाना था। भ्रष्टाचार के अलावा इस देश में ऐसी बहुत सी समस्याएँ हैं, जिन पर सरकार का ध्यान आकृष्ट कराना आवश्यक है।
डॉ. महेश परिमल
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