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रविवार, 4 अगस्त 2024

अंधेर नगरी अउ चउपट राजा

-परमानंद वर्मा

क्या अंधे की औलाद अंधे ही होते हैं, यदि हां तब तो कुछ नहीं कहना और जब नहीं होते हैं तब इस कहावत को अनावश्यक रूप से क्यों गढ़ा गया है? कुछ तो इसका अर्थ निश्चित होगा ही। कहते हैं कलियुग में इसकी प्रचुरता है। यहां सब अंधे हो गए हैं, गलत तो गलत है ही, लेकिन सत्य को भी गलत करार साबित करने में यहां के लोगों ने महारत हासिल कर ली है। जिधर देखो उधर अनैतिक, अधार्मिक, असामाजिक और गैर कानूनी कार्य हो रहे हैं लेकिन इसे मानने को कोई तैयार नहीं। आतंक, अधर्म, अन्याय और पाखंड जिंदाबाद है, और इससे डरकर सत्य छिप गया है निर्जन स्थल जंगल में कहीं जाकर। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख...

पखरा ह कभू भगवान हो सकत हे, पीतल ह सोना हो सकत हे, दिन ह रात हो सकत हे, असत (झूठ) ह सत हो सकत हे, चांद ह सूरज हो सकत हे, इस्तीरी ह पुरुष हो सकत हे, नइ हो सकय ना, तीन जुग मं नइ हो सकय, चाहे लाख मुड़ी पटक-पटक के लहूलुहान कर डरौ, फेर कभू हो नइ सकय? 'अंधेर नगरी चउपट राजा, 'टका सेर भाजी-टका सेर खाजा' कस जमाना चलत हे। सच बोले के जउन तीर मनखे के हिम्मत नइ हो सकय, हार गे तउन तीर ओला मरे जान। भले जीव हे, दुनिया के सकल करम करत हे, फेर ओकर कोनो कीमत नइ होवय, मुरदा बरोबर। 

सच, सत लुकागे हे, असत के जमाना हे, पूरा संसार नकली होगे हे। सत ल पटक दे हे, अधमरा कर दे हे, हफरत हे, कांपत हे, डेर्रावत हे, कोनो दिन ओला मुरकेट के कोनो खेत-खार, घुरवा, नदिया, नरवा, तालाब कोती फेंक झन दैय। अतेक दुरदसा कइसे होगे, कभू ओहर सपना मं नइ सोचे रिहिस होही के एक दिन अइसन दिन ओला देखे ले परही? अपन ओ दिन, सतयुग के समे ल सुरता करत, आंसू ढारत रोवत रहिथे। 

सड़क के तीर मं झोपड़ी करा भिखारी कस रूप मं हाथ लमावत अवइया-जवइया मन करा भीख मांगत देख परेंव। जटर-बटर चूंदी, कोन जनी कभू तेल लगाय हे, चुपरे हे के नहीं, ओकर हालत ल देखेंव तब मोला दया आगे। ओकर तीर मं जाके खटारा साइकिल ल ब्रेक मारेंव। उतरेंव, ओला पहिली खीसा ले निकाल के दस ठन रुपिया ल देंव। लेये बर ओहर मना करत रिहिसे। जोजियाय ऊपर ले मुसकिल मं ओहर धरिस। 

सोचेंव पहिली बार अइसन भिखारी देखेंव जउन हा देवत रेहेंव तउन रुपया पइसा ल लेये बर मना करत रिहिसे। पूछेव-बबा, तैं हर ये रुपिया ल लेये बर काबर मना करत रेहे?

ओहर बहुत सरल अउ कोमल बानी मं कहिथे- बेटा, पहिली तैं ये बता के तैं कोन हस, अउ का समझ के मोला दस के नोट दे हस?

भिखारी के ये सवाल ल सुनके सकपका गेंव, सोचेंव- ये कइसन भिखारी हे भगवान, भिखारी हे ते कोनो पहुंचे हुए गियानी, मुनि अउ फकीर तो नोहे? हिम्मत करके पूछेंव- बबा, मंय तोरे सही एक झन मनखे हौं, इंसान हौं। तोर रूप-रंग, हालत ल देखेंव तब मन मं परेम, सरधा जाग गे, दया उमड़गे। अइसन हालत देखे नइ गिस ते रुकगेंव। कुछ गलती कर परे होहूं ते माफी देबे बबा। 

एमा माफी देये के कोनो बात नइहे बेटा, तोर कतेक नेक विचार हे, मन मं दया, करुणा लबालब भरे हे सागर सही। बबा, जब अइसन बात किहिसे तब मोर मन मं उथल-पुथल होये ले धर लिस। सोचेंव- कहां-कहां ये बबा के चक्कर मं तो नइ परगेंव, जात रेहेंव सीधा बजार कोती साग-सब्जी लेये बर अउ हपट परेंव त हर-हर गंगा कस ये बबा करा अभर गेंव। 

ओ भिखारी बबा फेर उलट के पूछथे- का सोचे ले धर लेस बेटा, तब ओला बात बनावत केहेंव, नहीं बबा, कांही नहीं। महूं पूछेंव उही पहिली वाले बात ल, तैंहर जउन मंय दस ठन रुपिया देवत रेहेंव तेन ला लेये बर काबर मना करत रेहें?

ओहर बताथे- बेटा, मैं भिखारी नो हौं, सतजुग हौं, सतजुग। ओ जुग मं राजा, महाराजा रेहेंव। फेर धीरे-धीरे खसलत-खसलत कलजुग मं ढकलागेंव। होगे अइसे उलटा-सुलटा, कोनो करम होगे रिहिस होही तेकर सेती आज अइसन हाल मं आगे हौं। 

भिखारी बताथे- ये कलजुग ल देख के मंय अकबकागे हौं बेटा, बाप रे... याहा का अंधेर जमाना हे, अधरम के राज चलत हे। पखरा ल भगवान मान के रात-दिन पूजा-आरती करत हे, संझा-बिहनिया जल चढ़ावत हें। अतेक अगियानी अउ मूरख बसे हे ये कलजुग मं। देखौ पापाचार, भ्रष्टाचार के राज चलत हे। इही कलजुग हे, जउन जतके गलत, भ्रष्ट अउ पाप करम कर हे तेकर बरकत होवत हे, सच बोलत हे तौन कांप जावत हे, डेर्रावत हें, कहूं जेल झन चल दौं, फांसी मं झन टांग देय। 

ओला पूछेंव- तहूं अइसने तो नइ डेर्रावत होबे बबा, के कभू ये कलजुग के सपड़ मं झन आ जांव, कोनो हटकार के ये तीर ले भगा झन दय, झोपड़ी ल तोड़फोड़ झन दय?

एकर कांही बेला-बिचार नइहे बेटा, के कब का कर दिही, जमराज बनगे हे ये कलजुग हा। इहां बड़े-बड़े मन के कुकुर गति होवत हे तउन ल तो देखबे करत हस? तहूं सावधान, सचेत होके रहिबे, अधरम, अनीति अउ कुमारग के रस्दा ले बचके रहिबे ना, तब भगवान हा हितवा होके तोर रक्छा करत रइही। 

अतके बेर सायरन बजावत पुलिस के गाड़ी आवत रिहिस तउन ल सुनके कहिथे- जा बेटा, वहि दे जमराज के गाड़ी आवत हे, जा भाग ये मेर ले। बबा के बात ल मान के धरेंव खटारा साइकिल अउ बाजार के रस्दा धर लेंव।

परमानंद वर्मा

सोमवार, 14 अगस्त 2023

छत्तीसगढ़ी लघुव्यंग्य-'कार्यकर्ता'

कइसे बेटा ? अठुरिया होगे। तोला एक ठन नानचुन काम जोंगे रेहेंव,तेला तो करवाय नइ अस ,उल्टा उही दिन ले घर मं रोवत बइठे रथस। तोर ओथरे मुंह,ओरमे गाल ये सबला देखके तो मोला संसो धर लेहे। कुछु फोर के बतावस घला निहि ??? दाई हा अपन मया पलावत गुरतुर भाखा मं बेसरम फुल कस मुरझुराय टूरा ला कांस के पुरखौती  थरकुलिया मं लाल चाहा अमरत किहीस।मन के बात गड़रिया जाने कथें तइसने बात तो आय दाई। जेन दिन ले मोला काम जोंगे हस न,तेने दिन ले ये संसो संचरे हे। इही काम कोनो दूसर के होतिस तब मोर कुछ कमई हो जतिस। ये मोर दाई के काम आय। एमा मोला का मिलना हे। जरुवत परही तब सौ-पचास अपन जेब ले लगाय बर परही। दाई ला पईसा कइसे मागंव? दाई के  काम आय,कइसे करवांव ? बस इही सब बात मियार के घूना कस मोला खावत हे दाई ऽ... ऽ ..ऽ..!अरे बेटा ,अतकी नानकुन बात बर अतेक बड़ संसो करत हस ? थूंके थूंक मं बरा नइ चुरय,येला महुं जानथों।अपन अंछरा के छोर मं बंधाय अलमारी के कुंची ला अपन टूरा कोती फेंकत दाई हा किहीस-जतका लागही,लगा लेबे। फेर एक बात महुं जानना चाहत हौं बेटा....? एकर पहिली तो अइसे कभू नइ काहत रेहेस। ये बखत अइसे का बात होगे तेमा...?

अब मैं पार्टी कार्यकर्ता बनगे हौं दाई। हाँ....,पार्टी कार्यकर्ता । दिल्ली के चाँदनी चंऊक के चौपाटी मं नावा नावा बिसाय नेहरु जाकिट के तरी मं पहिरे बंगाली के आस्तिन ला बांहा कोती चघावत टूरा हा अपन बात ला लमावत केहे लागिस।हमन ला पार्टी लाईन मं रहिके काम करना,करवाना परथे। 

अपन पार्टी गमछा ला डेरी खांध ले माई खांध में डारत फेर केहे लागिस।अब तोर हमर महतारी-बेटा, सोदर,हित-पिरीत,दोस्त-यार सब सिरिफ़ लेन-देन के नता-गोता रहिगे दाई।

पार्टी कार्यकर्ता...? यहा का पार्टी  कार्यकर्ता होथे रे ....? ऊपर संस्सु मारत ओकर दाई हा ठाढ़ चितियागे। ओला चन्दर धरलीस। देखो देखो होगे। सकलाय लोगन के बीच ओ बेटा हा अपन दाई ला पांचो-अमरित पियावत अपन मरे दाई के बहाना दू पईसा कमाय के उदीम सोंचत राहय....! अउ लोगन ओकर दाई के काठी-पानी के जोखा मं लगे राहंय।राम नाम सत्त हे ....!!

आस्तिन-बांही

बहाना- के नांव मं पढ़ें

बन्धु राजेश्वर राव खरे

'लक्ष्मण कुंज'

शिव मंदिर के पास,अयोध्यानगर

महासमुन्द (छ. ग.)

रविवार, 6 अगस्त 2023

बदलते समय की ऐतिहासिक कृति छत्तीसगढ़ी उपन्यास ’’करौंदा’’

-डुमन लाल ध्रुव 

बहुमुखी प्रतिभा के लेखक उपन्यासकार श्री परमानंद वर्मा ने ’’करौंदा’’ की महत्ता और प्रेरक भूमिका को खुले दिल से स्वीकार करते हुए उनके साहसिक योगदान को छत्तीसगढ़ी उपन्यास के रूप में प्रस्तुत की है। छत्तीसगढ़ी उपन्यास में करौंदा नारी चरित्र का ऐतिहासिक दृष्टिकोण है। उसका इंटरप्रेटेशन लेखक ने उसी तरह से किया है जैसे इतिहास और वर्तमान का। श्री परमानंद वर्मा जी का उद्देश्य हमेशा इतिहास से वर्तमान की ओर आना है। इसीलिए करौंदा का चरित्र समाज के लिए रेलीवेंट बने हुए हैं। लेखक ने करौंदा उपन्यास में जो सामाजिक द्वंद दिखाया है, उस समय के दबंग, गुंडा- बदमाश को सामने लाती है। उपन्यास को गहराई से देखें तो मिलेगा कि कितनी बड़ी संत्रास और द्वंद छुपा हुआ है। एक ओर समाज की विद्रूपता, समानता और शोषण की अभिव्यक्ति है और उन्हीं नीतियों के कारण करौंदा के मन में उपजे सामाजिक ठहराव का चित्रण है। स्थानीय गौंटिया द्वारा शोषण किये जाने व शराबबंदी से उत्पन्न होती है करौंदा की कहानी। वहीं दूसरी ओर बदलते समाज में रह रहे लोगों के जीवन की जटिलताएं उभरकर सामने आती हैं। उपन्यास में करौंदा शोषण के विरुद्ध संघर्ष करती रही हैं।

यहां श्री परमानंद वर्मा द्वारा लिखित छत्तीसगढ़ी उपन्यास करौंदा की लेखन-प्रक्रिया की निर्माणकारी स्थितियों को भी जान लेना बेहतर होगा। प्रारंभिक जीवन में मिले अप्रत्याशित आघातों ने उनकी मनोभूमि को आत्मसजग, कुछ अंतर्मुखी, कुछ जिज्ञासु बना दिया। परमानंद वर्मा जी छत्तीसगढ़ी के गंभीर लेखक होने के नाते उपन्यास लेखन में उनका मनीषी पक्ष बढ़ता गया और दृष्टि तात्विक  होती गई। क्योंकि करौंदा एक ऐसी पात्र है जो व्यक्ति और समाज का परिसंस्कार करने के लिए आगे आयी हैं।

करौंदा के तरेरे आंखी के सुरता ला भला पुरुषोत्तम कइसे भुला सकत हे। सजा कहौ चाहे दुख होय आखिर मं भुगते बर तो उही ल परथे। करौंदा हा अपन गोसइया ला बतावत कहिथे-परिवार मं सुख-शांति रखे बर एके लइका होना चाही।चाहे बेटी होय चाहे बेटा, फरक नइ मानना चाही, मोला बहुत नीक लागिस हे। सपरहिन दीदी ला पूछेंव तब उहू किहिस-हौ रे करौंदा, बेटी-बेटा मं कांही भेद नइ करना चाही। उही मन तो लछमी हे,धन हे घर के।जतका हो सकय,बन सकय पढ़ा-लिखा देना चाही।नइते हमर कमई- धमई अउ खेत- खार तो छुटय नइ बहिनी,इही तो हमन लिखा के आय हन भगवान करा ले। तब मेहनत करे ले काबर जीव ला चुराबो। बस कमाबो तब खाबो,पहिनबो अउ ओढ़बो। आंखी फूटय अनदेखना मन के।

करौंदा के अनुसार देखा जाए तो छत्तीसगढ़ की नारी संक्रमण की स्थिति से गुजर रही है। उसका एक पैर घर से बाहर है तो दूसरा अभी भी रसोई की चौखट के अंदर है। शिक्षण एवं उसके क्षितिज को विस्तार दिया, पर घर-परिवार की लक्ष्मण रेखा अब भी उसे घेरे हुए हैं ।परिवार और शिक्षा आज भी उसकी प्राथमिकता में है। प्रगतिशीलता की कितनी ही बातें कर लें आज भी बेटी- बेटा में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। समाज में सामंती सोच लिए बैठे पुरुष के कारण ही शुरू होती है औरत के संत्रास और शोषण की कहानी। कहने को हालात बदले हैं। पर क्या सचमुच बदले हैं? कई परिवारों में अभी भी स्त्रियां बेटी-बेटा की शिकार हैं। जो मानसिक यंत्रणा शारीरिक यंत्रणा से अधिक त्रासदी होती है।

तैं कइसे गोठियाथस मितान,ओ तो देवी हे देवी ? अइसे तो नइ हो सकय, मैं तोर बात ला पतियावौं नहीं? ओतेक बड़े घर के बेटी,अउ मंडल घर के बहू अइसन कुलछनीन हो नइ सकय? मैं जानत हौं ओला।ओकर असन रुप रंग,गुन-बेवहार कंडिल धर के खोजबे तभो नइ मिलय ये गांव में,तेकर ऊपर तैंहर अइसन बद्दी लगावत हस ? ’’मितान के बात ला सुनके पुरुषोत्तम दंग रहि जथे?’’

उपन्यास लेखक श्री परमानंद वर्मा की शैली, भाषा और अभिव्यक्ति की कौशल ऐसा है कि शुरू करने के बाद उपन्यास को अधूरी छोड़ पाना संभव नहीं होता। अनुभव की पूंजी और कल्पनाशीलता से वे ऐसा ताना बाना बुनते हैं कि हाथ में आ जाने के बाद सिरे को छोड़ पाना संभव नहीं होता। परमानंद जी के अनुसार कथानक से करौंदा का उद्देश्य और अभ्यांतरिक अर्थ स्पष्ट होता है। इस भाषा से लेखक के व्यक्तित्व का भी बोध होता है।

बहुत चतुर सुजान कस लगथस रे पुरुषोत्तम तैंहर, कोनो अनजान लइका मन कस कड़हार-कड़हार के पूछथस,का बात हे तेमा? हड़बड़ाय असन हो जथे तब ओहर कहिथे- ’’नहीं मालिक, नइ जानत हौं तेकर सेती पूछथौं। मनखे अतेक मर-मर के कमाथे तभो ले ओकर पेट नइ भरय,उन्ना के उन्ना रहिथे अउ जौंन नइ कमावय, बेईमानी करथे,परके गर ला रेतथे, ओमन मजा मारथे।अइसन काबर होथे। का ओकर मन के करम मं अइसन लिखाय रहिथे? ’’

श्री परमानंद वर्मा की उपन्यास करौंदा में समय और समाज बहुत कुछ कहती है। मध्यमवर्गीय जीवन की दारूण कथा, समय और समाज के नैतिक संकट बहुत कुछ प्रमाणिक रूप से दर्ज है। मध्यमवर्गीय समाज हमेशा ही नैतिक संकट से घिरा होता है, एक ओर आत्मा को धुंधलके में छोड़कर मान और सम्मान पाने की सीढ़ी है तो दूसरी ओर अभाव और उपेक्षा का अंतहीन संघर्ष जिसमें मालिक के बीच में पुरुषोत्तम को वेदना और यातना को सहना पड़ रहा है।

मैं जानथों मालिक ये देश मं,परदेश मं कलाकार मन के कतेक कदर हे तौंन ला? जइसे मजदूर के किसान के अउ जतका कमजोरहा बनिहार-मजदूर के सोसन होथे तइसने कलाकार, साहित्यकार मन तो घलो सोसन के शिकार होवत हे। बड़े-बड़े दलाल कलाकार मन के आड़ मं देश -विदेश मं नाम अउ पइसा कमावत हे। फेर कलाकार ला का मिलथे, फोकला। अपन बर एक ठन कुरिया घला नइ बना सकय। गरीबी मं जीथे अउ मर खप जथे। हम जानथन एक दिन हमरो उही गति होवइया हे।’’

श्री परमानंद वर्मा जी ने छत्तीसगढ़िया कलाकारों की त्रासद भरी जिंदगी को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है जहां अव्यवस्थित जीवन है। एक कलाकार ही हैं जो ताउम्र कलाकारी पेशे में जीवन जीने के साधन ढूंढते हैं। वैश्वीकरण का प्रभाव तो है ही आज हर कलाकार अपने परिवार के लिए बेहतर जीवन की लालसा को पाले हुए हैं। कलाकारों का काम सिर्फ कला दिखाना ही नहीं, कला से ज्यादा संघर्ष को मांजना पड़ता है। ’’करौंदा’’ उपन्यास में कलाकारों की सृजन यात्रा मन को बेहद प्रभावित करता है। गहरी समझ के साथ छत्तीसगढ़िया कलाकारों की बड़ी विशेषता को प्रदर्शित करता है।

करौंदा के बेवहार अउ बात ला सुनके गांव भर के मन ओकरे कोती होगे हे। गांव मं कुछु होही, बुढ़वा गउंटिया अउ सरपंच ला एक कोती छोड़ दिही, जौंने शरन देन तौंने हर तो नइ हमर अउ ये गांव के मालिक बन जाही ?

 लेखक श्री परमानंद वर्मा समाज के गरीब, पिछड़े, मजदूर और महिला वर्ग की चिंताओं और तकलीफों के चितेरे उपन्यासकार हैं। करौंदा का व्यवहार गांव और समाज के लिए प्रासंगिक है। गांव के बुढ़वा गउंटिया और सरपंच के अस्तित्व का संघर्ष गांव में ही देखने को मिलता है। यहां करौंदा अपने समय और परिवेश की भावों को व्यक्त करती है। समय को दुख को निकटता से देखते हैं और समाज के लिए नई बुनियाद का सूत्रपात करते हैं। वहीं करौंदा समाज में मानवीय मूल्यों का आदर्श चित्रण प्रस्तुत करती है।

करौंदा कहिथे- ’सरकार के चाल ला तो देख, कतेक गियानी मन कस जनता ला उपदेश देथे। शराब से सामाजिक बुराई फैलत हे ऐला रोके खातिर ओमन ला खुदे आगू आना चाही। ये तो वइसने कस बात होगे, कचरा गंदगी फैलावय कोनो दूसर अउ साफ सफाई करय जनता ? लगथे भगवान हर तो अक्कल उही मन ला दे है,  उही मन अपन दाई के दूध पिये हे।’

श्री परमानंद वर्मा के लेखन में विस्तार और व्यापकता दिखाई देती है। उनके लेखन का कैनवास विस्तृत है। एक ओर उनका लेखन सामाजिक सरोकारों को जोड़ती है साथ ही राजनीतिक पराभाव को भी प्रदर्शित करती है। ’’उही मन अपन दाई के दूध पिये हे’’ ये आवाज सिर्फ श्री परमानंद वर्मा की आवाज नहीं है। ये पूरी छत्तीसगढ़िया लोगों की आवाज है।

जेकर मन अउ हिरदय साफ हे तेकर कांही रोका-छेका नइहे ? जाके देख बाहिर मं माईलोगिन मन आज कहां ले कहां नइ पहंुच गे हे ? काला अंतरिक्ष कइबे, राजनीति, उद्योग, कला, संगीत, खेल, साहित्य, मं सब जगह ओमन बढ़-चढ़ के भाग लेवत हे अउ तुमन घर में गाय छेरी असन बांध के रखबो कइथौ। सियनहा मन समझावत कहिथे- ’अब ओ दिन नई रहिगे बाबू हो, अब बराबरी के दिन आ गे हे। तुमन मन के कुभाव ला मिटा दौ। ओ बपरी मन तो तुंहर संगवारी हे। मिल जुलके सुनता-सलाह काम करौ तब कोनो मेर बात नइ बिगड़य। असल में ओकर मन के बढ़ती ला तुमन देखे अउ सहे नइ सहत हौ। तेखर सेती छटपटावत हौं।

छत्तीसगढ़ी उपन्यास करौंदा बहुत से सवालों के बीच हमें ला छोड़ता है। पहले तो वह कथा के सुथरे विन्यास की अपेक्षाओं को ध्वस्त करती है। करौंदा प्रेमचंद की कथा विन्यास की तरह प्राचीन कथा-कहन की जकड़नों से भरा हुआ है। कुछ मौलिक किस्म के प्रश्नों से घिरे जरूर है परंतु भाषाई विमर्श जरूर करते हैं। एक ओर विमर्शों का परिज्ञान होता है तो दूसरी ओर स्थूल रूप से संस्कृति और समानांतर सृजनधाराओं का परिचयात्मक स्वरूप स्पष्ट होने लगता है और कई अर्थों में यह प्रवृत्ति पारंपरिक तुलनात्मक विवेक की निर्माणधारा का आद्य रुप लगती है।

करौंदा कहिथे-’ले अभी तो बात ला छोड़व, ओ बदमाश मन के मैं परवाह नई करौं। जौंन दिन के बात तौंन दिन देखे जाही। अभी थाना के बात गोठियात रेहेव तेकर बर का करना हे तौंन ला बतावौ ?

जो व्यक्ति समाज को अच्छे-बुरे चश्मे से देखते हैं, यह भूल जाते हैं कि अच्छे और बुरे के अंतर्गत आने वाली चीजों को स्पष्ट रूप से प्रगतिशील और पतनशील रूपों के ढांचे में फिट नहीं किया जा सकता। हमें समाज के विभिन्न रूपों को परिवर्तन के उस निर्धारक तत्व को टोहना पड़ेगा जो ऐसी परिस्थितियों के जन्म के मूल कारक हैं। मसलन गुंडे और बदमाशों की खुलेपन की आमद का अर्थ केवल एकतरफा स्वतंत्रता ही नहीं है इसलिए अराजकता और स्वतंत्रता में अंतर करना ही पड़ेगा, कहना ही पड़ेगा कि अराजकता की हिमायत नहीं की जा सकती। प्रजातांत्रिक मूल्यों की दृष्टि से देखें तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता की चाह इतनी बलवती है कि वह कहीं भी अराजकता की सीमाओं पर खड़ी दिखाई देती है।

 नदी नरवा मं पूरा आय कस पानी जइसे उफनत, लहरावत दिखते तइसे कस सेठानी के मन उबुक-चुबुक होवत रिहिस। का होगे ओहर चार-पांच लइका के महतारी हे, बहू-बेटी वाली हे फेर रूप रंग उमर अभी ले अटल कुंवारी कस दिखथे। अइसन लंदर-फंदर के फांदा मं कभू नई फंसे रहिसे। फेर आज रामू के रूप ओकर पांव म अइसने कांटे गड़े कस गड़गे ते न आह कर सकत हे न उह....। निकाल हे तब जीवरा अइसे तड़पत हे जइसे कोनो घायल सिपाही के शरीर ले तलवार के घांव लगे मं होथे। कइसनो करके खाना बनाइस। ओखर सेठ एक बजे बाहर आथे अउ खाना खा के मुंह पोंछत फेर निकल जथे धंधा पानी मं।

उपन्यास लेखक श्री परमानंद वर्मा की जीवन दृष्टि मनुष्य जीवन की विभिन्न परिस्थितियों को परखती है। जीवन का गहरा अनुभव उपन्यास की विकास यात्रा को पूरी करते हैं।


’तोर मोर बोली हर लगे हे तन मं,

कोन जादू ला मारे फिरत हौं बन मं।’

जब ये ददरिया ला ओ शांति देवारिन गाइस तब जौंन रंगरेलिहा हा ओला सीटी पार के बलाय रिहिस हे तौंन तो सिरतोन मं जादू मारे कस ओकर रंग रूप ला देखके बइहागे। जब ओकर तीर मं आके ओहर ठुमक-ठुमके के सिनेमा के हिरोइन कस नाचे ले धरित तब ओला पोटार लिस। शांति ला पोटारना का होइस भीड़ ओकर ऊपर उम्हियागे। हुड़दंग मचगे। ओ रंगरेलिहा ला अइसे मरत ले मारिन ते ओकर जतका मस्ती रिहिस हे तौंन घुसड़गे। भीड़ चिल्लाये ले धर लिस। देखव-देखव..... मारव-मारव.... पीटव-पीटव...। नाचा करइया गांव के मुखिया मन शांति ला पंडाल मेर लाइन। नाचा रूकगे रिहिस हे। माइक ले काहत रिहिन हे शांत रहव... फेर भीड़ के हो-हल्ला मं कोन का काहत हे, कोन कहां जात हे, तेन ककरो समझ मं नइ आवत रिहिस हे।

उपन्यास करौंदा में छत्तीसगढ़ में कला और संस्कृति का दर्जा ऊंचा है। लेखक श्री परमानंद वर्मा ने ददरिया शैली का अविष्कार करके संवाद के सहारे कथा की बहुत सी अदृश्य परतों को उघाड़ कर आधुनिक विन्यास संबंधी नई शैली का प्रणयन किया है।

 संझाकुन के बस मं दूनो झन घूम-फिर के आथे। अउ उही घर म रहिथे जिहां के बेवस्था करे के बात केहे रहिथे। हफ्ता के बीते ले अपन घर जाथे तब गोसइन मुंह फुलाय, कैकई कस न हुकिस न भुकिस। लइका मन गोठियाइन-बतइन। संझाकन घूमत-फिरत फेर शांति मेर आगे। अब तो दूनो के मजा हे। गउंटनीन बनगे शांति। रात-दिन के नचई-कुदई ले बाचगे। कुसुम घला अब दीदी-भाटो करा आय-जाय ले धर लिस। सुनब मं आय हे के शांति के पुतरी असन एक झन बेटी घलो हो गे। शांति ओकर नाव हरनारायन ला पूछके शीतल रखे हे। कुसुम मुस्कावत कहिथे-अच्छा संुदर नांव हे दीदी।

श्री परमानंद वर्मा छत्तीसगढ़ी उपन्यास करौंदा में जीवन के अनेक अनछुए पहलुओं को एक नई दृष्टि से देखने और विकसित करने का प्रयास किया है। रिश्तों की संजीदगी मन को आकर्षित करती है।


गांव मं दीदी बैंक, रामायन मंडली अउ महिला मजदूर संगठन बनाके करौंदा तो ताकत बना लिस जइसना चुनाव लड़े बर नेता मन बनाथे। अब तो गांव के छोटे-बड़े सब ओकर आदर करथे,  कोनो अइसने मनखे नई होही जेन ओकर दुआरी मं आगे तेकर काम नइ बनत होगी। दे दे, देवा दे नइते रस्दा बता दे महामंत्र ओकर अइसे पंचाक्षरी ताकत हे के छिन मं लोगन के काम बन जाथे। रात बारह बजे ककरो घर मं बीमार परे हे, अस्तपाल ले जाना हे कोनो सकरी ला खटखटा दिस ओकर घर के मन तब कइसनों नींद मं रइही करौंदा उठ जथे। लुगरा बदलिस अउ ओकर मन संग चले बर तइयार हो जथे। पटवारी, आरआई, तहसीलदार, बुलाक आफिस, थाना जिहां का हौं चौबीसो घंटा तइयार। घर के काम ला सास संभाल लेथे तेकर सेती अउ जादा चिंता नइ राहय। जनपद अध्यक्ष, विधायक अउ थानादार सब जानथे, पहिचानथे तेकर सेती काम घला ओकर फटाफट हो जथे।

 छत्तीसगढ़ी उपन्यास करौंदा बदलते समय की ऐतिहासिक कृति है। हकीकत बयानी के आधार पर कही गई कहानी हमारे समाज के बदलते परिवेश की एक झलक को प्रस्तुत करती है। करौंदा समाज में समस्याओं का अंत करके समाधान की दिशा में उठाए जाने वाले पहलुओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। समाज में अच्छाई को साधने का प्रयास करती है। नई पीढ़ी के बदलते सोच की प्रति ध्वनि को मुखरित करती है। उपन्यासकार श्री परमानंद वर्मा ने करौंदा की प्रतिबद्धता को औपन्यासिक रुप से उजागर किया है।

करौंदा के सास ला जौंने बात के डर रिहिस आखिर उही होइस। ओ तो पहिली ले जान डारे रिहिस हे के ये बहू नोहय कोनो कंकालीन अउ चुड़ेलिन आय जौंन ला ओहर अपन बेटा बर बिहा के लानिस। का जानय बहू के आड़ मं कुलछनीन घर मं समा गे हे। बहू होतिस त बहू असन नइ रहितिस जइसन दूसर मन के रहिथे। चले हे बड़े-बड़े के नाक मारे ले अउ घर ला इंहा देखव तब माहकत परे हे।

इस उपन्यास में करौंदा की सास की भाषा हमेशा ही ग्रामीण भाषा का रूप लेती है।कंकालिन,चुड़ेलिन,कुलकछीन ठेठ ग्रामीण की भाषा के रूप में हमारे सामने आती है। इस भाषा के अनेक रूप व अर्थ हैं। श्री परमानंद वर्मा ने चमत्कारिक और कलात्मक भाषा के प्रयोग से पूरी औपन्यासिक शैली को अद्वितीय ढंग से विश्वसनीय और जीवंत बनाए रखते हैं ।


करौंदा बिहान भर नहा-धोके तइयार होके सबले पहिली महामाया मंदिर जाथे अउ उहां जीत के खुशी मं चढ़ावा चढ़ाथे। उहा ले निकल के अपन गोसइया पुरूषोत्तम संग अपन गांव के भइया भवानी परसाद जौंन ये शहर मं बड़े साहेब हे तेकर घर मिठाई धर के जाथे। घर मं जाके भइया-भउजी के पांव-परत रो डरथे। अउ कहिथे-तुमन मोर लाज बचा लेव। मैं तो उही करौंदा हौं, गांव के बनिहारिन तौंन ला आज कुरसी मं बइठार देव। तोर ये करजा ला मैं कइसे छुटहौं भइया ? 

’’तुमन मोर लाज बचा लेव’’ करौंदा की एक सहज समझदारी थी। महामाया माई के समक्ष अपनों के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता, सामाजिक परिवेश के कारण आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास को बनाए रखने में सोचने की शक्ति देता है। करौंदा लोगों की मर्म को भेदता है। उपन्यासकार श्री परमानंद वर्मा के लिए ’’करौंदा’’ जैसी छत्तीसगढ़ी उपन्यास लिखना बेहद जरूरी था क्योंकि करौंदा का इतिहास करौंदा को पहले से अधिक और विकसित करेगी।



डुमन लाल ध्रुव

मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

पिनकोड-493773

मो. नं.- 9424210208

रविवार, 28 मई 2023

मर जा... मर जा..., मत जा... मत जा...!

 सुनो भाई उधो\]

'मर जा... मर जा..., मत जा... मत जा... प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आजकल हरेक जनसभा में यह जुमला प्राय: उच्चारित करते रहते हैं। यह किसी चन्द्रास्वामी जैसे विख्यात तांत्रिकों, गुरुओं अथवा बाबाओं  से हासिल किया गया मंत्र-तंत्र है अथवा जनता को प्र्रभावित करने का कोई कोड वर्ड। इसके उच्चारण मात्र से ही विरोधी दलों के हौसले पस्त हो जाएंगे और जनता की तालियों की गडग़ड़ाहट से सत्तारुढ़ दल की सफलता उसकी झोली में होगी। इसी तरह का प्रयोग कभी अली बाबा चालीस चोर, राजाओं  व नवाबों खजानों को लूटने  में किया करते थे। बस 'खुल जा सिम-सिम, सिम-सिम, सिम-सिम उच्चारित करते थे। खजाने का दरवाजा खुल जाता था। एटीएम से नोटों की गड्डियां निकालने के लिए भी इसी तरह का ‘कोड वर्ड’ प्रयोग में लाया जाता है। यहाँ पेश है 'मर जा... मर जा..., मत जा... मत जा...  नामक छत्तीसगढ़ी आलेख।  

हमर देश के परधान मंतरी नरेन्द्र मोदी जिहां जाथे तिहां के आमसभा म जनता मन ला संबोधित करत एक ठन अलकरहा बात कहिथे माधो, मोला अच्छा नइ लगय। दुख लगथे। अतेक बड़े नेता अउ अइसन बात?

फेर का बात होगे उधो, माधो ओला पूछत कहिथे- जब कभू मोर करा तैं आथस तब सादा-सरबदा विचार, भाव अउ हिरदय लेके नइ आवस। उटपुटांग अउ अलकरहा बात ल धर के आथस अउ हर्रस ले पथरा कचारे असन मोर आघू मं पटक देथस। हां, बता का बाते तउन ला?

माधो बताथे- परधान मंतरी हा कहिथे- ये देश के विरोधी दल वाले मन मोला, मोर सरकार के रीति-नीति, कामकाज ल पसंद नइ करयं। मोला सरकार ले बेदखल करे के नाना परकार के षड़यंत्र करथे अउ कहिथे- मोदी मर जा... मर जा... फेर तुंहर मन के आसिरवाद अउ पियार हा मोर ताकत हे अउ एकरे सेती तुमन कहिथौ- मोदी मत जा... मत जा... मत जा...  इही बात ल ओहर सभा मंच ले दू-तीन घौं दुहराथे। एला सुन के जनता खुश हो जथे अउ ओकर मन के ताली के गडग़ड़ाहट ले आकास गूंजे ले धर लेथे।  

उधो पूछथे- अब तहीं बता माधो, ओला अइसन मर जा... मर जा..., मत जा... मत जा... कहना चाही? 

माधो कहिथे- तोला का लगथे?

उधो बताथे- मोदी जरूर कोनो सिद्ध साधु-महात्मा करा ले संजीवनी बूटी कस ये तंत्र मंत्र 'मर जा... मर जा..., मत जा... मत जा... दक्षिणा मं पाय होही। उही ला जनसभा मं पाठ करे बरोबर पढ़थे। मोला तो दाल मं काला लगथे माधो। 

उधो के बात ल सुन के माधो हांस परथे तब ओहर कहिथे- ये हांसे के बात नइहे माधो, ये जतका बड़े पद मं रहिथे न तउन मन अइसने सिद्ध जोगी बबा अउ तांत्रिक मन ल पाल के रखथे। 

माधो ल बतावत उधो कहिथे हमर देश मं चंद्रास्वामी नांव के बहुत बड़े तांत्रिक होगे हे। पूर्व परधान मंतरी इंदिरा गांधी ल ओहर बड़े-बड़े मंत्र दे रिहिसे। तभे अतेक साल ले ओहर देश मं अकंटक राज करे रिहिसे। मोला तो भुस-भुस जाथे कहूं वइसने कस नरेन्द्र मोदी घला हा तो नइ कोनो तांत्रिक अउ सिद्ध बबा करा ले जादू के तंत्र मंत्र पागे होही?

माधो कहिथे- तैं बइहागे हस, तोर मन के भरम हे। वइसन कुछ नइहे मोदी हा। साफ-सुथरा नेता हे। ओकर सफलता देख के विराधी दल के नेता मन के आंखी फूटत हे। 

ओ दिन के बाद उधो लहुट के चल दिस अपन घर। चार-आठ दिन बाद फेर बीरबल कस विनोदी सुभाव के परिचय देवत राज दरबार कोती पहुंचथे। 

एक पचरंगा डोले डोल

दुई पंचरंगा डोले डोल

तीन पचरंगा डोले डोल

चार पचरंग डोले डोल। 

'ये का पचरंगा  डोले डोल, लगा देहत, ये हाथ मं का खंजेरी धरे बजावत किंजरत हस अउ चूंदी कइसे जटर-बटर साधु बैरागी कस बगरा डरे हस। कोनो देखही त पूछही, ये कहां के झुलपाहा आय हे, ये गली ओ खोर भटकत हे।

माधो, उधो ल पूछथे, तब ओहर बताथे, अब तोला का बताओं माधो- अब तोर ओ जमाना नइ रहिगे जब कदम तरी बइठ के बंसरी बजावस तब सब गोप-गुवालिन सब काम-बुता ल छोड़ के तोर करा पहुंच जाय। का जादू मंतर डारे रेहे तोर बंसुरी म, ओ बात आज तक मोर समझ मं नइ परिस?

तब ओला समझ के, जान के का करबे उधो, तैं तो साधु, जोगी, गियानी, तोला जादू-मंतर ले का लेना-देना?

उधो कहिथे- मोला लेड़हार झन माधो, महूं हा कुछु सीखना, जानना अउ समझना चाहत हौं। 

ओ चक्कर मं झन पर, ये माया के खेल हे, राजनीति, कूटनीति अउ धरम नीति के बात हे। तैं तो परम गियानी हस, तैं तो ये सबो बात जानत हस, फेर मोर करा पूछे के का जरूरत?

माधो के बात ल सुनके माधो कहिथे- अइसने तो कहि के नारद ल भुलवार दे रेहे, कतेक सुंदर सपना देखे रिहिसे। 

अच्छा... अच्छा... अब धीरे-धीरे तोर बात समझ मं आवत हे उधो के तोर मनसा का हे, काबर तैं खंजेरी धर के बजावत अउ गावत ये गली ले ओ गली गिंजरत हस ? 

अउ हां... माधो पूछथे- ये 'एक पंचरंगा डोले, डोल, दुई पंचरंगा डोले डोल कोन फिलिम के गाना हे। आजकल तोर छत्तीसगढ़ मं किसम-किसम नांव के फिलिम बनथे कइके सुने हौं। जइसे- जिमी कांदा, शुरू होगे परेम कहानी...

अउ हां... माधो फेर पूछथे- अरे ओ एक झन छत्तीसगढ़ी गायिका हे सीमा कौशिक, ओला तैं जानथस का?

वाह, ओला कइसे नइ जानिहौं, माधो, मोर खियाल से, सलाह हे के राज दरबार के गायिका बनाय मं कोनो हरजा नइहे। ओकर एके गाना अइसे हिट होगे के पूरा छत्तीसगढ़ ल कोन काहय मुंबई के बड़े-बड़े संगीतकार मन ओकर आवाज के दीवाना होगे। 

माधो पूछथे- अच्छा तब का सुर सम्राज्ञी लता मंगेश्कर, आशा भोसले, नूरजहां मन ले घला सुंदर आवाज हे?

उधो कहिथे- तैं एक घौं सुनबे न माधो तब बंसुरी ल एक कोती तिरिया देबे। ओकर सुर मं ओं जादू हे के जब ओहर गीत गाये ले धरथे तब शमा ल देख के जइसे परवाना मन झपाय परथे ओकर ऊपर वइसने छत्तीसगड़ के जतेक गीत-संगीत के रसिक परेमी हे  तउन मन छपाए परथे। 

अतेक जादू हे, ताकत हे। तब वइसने कस तहूं बनिहौं, कहिके सोचत हस का? उधो कहिथे- नहीं माधो, मोर चिंता फिकर दूसर हे। 

भला बताबे माधो- का गांव, का शहर, का देश, का राजनीति, कूटनीति, धरम नीति, आरथिक नीति सब जघा जादू मंतर चलत हे। 

फोरके बता न साफ-साफ का जादू मंतर चलत हे? माधो के सवाल ल सुनके उधो बताथे- तैं मोर बात लन नइ पतियाबे, फेर बात सोलह आना सही हे। हमर देश के परधान मंतरी ल कोनो सिद्ध महात्मा एक ठन मंत्र देहे अउ केहे के, ए मंत्र ल जनसभा होही तिंहा बोले करबे, पूरा जनता तोर पक्ष मं हो जही। ओ मंत्र का हे उधो , बता तो मोर मन अकुलावत हे ओला जाने बर? 

उधो बताथे- 'मर जा... मर जा..., मत जा... मत जा...

माधो खिलखिला के हांस परथे अउ कहिथे- ये कोनो मंत्र हे उधो, मही मिलेंव तोला एक झन मुरख बनाय बर?

ये मंत्र तोला  छोटे दीखत हे, फेर हे भारी ताकत हे एमा। जब सभा मं ए मंत्र ल पढ़थे तब ताली के गडग़ड़ाहट अइसे लगथे जैसे आकाश मं बिजली गरजत हे। वइसने कस ताकत मोर एक पचरंगा डोले-डोल कस मंत्र मं हे। अतके बेर सीबीआई अउ इ.डी. के पुलिस गाड़ी आथे तहां ले उधो अउ माधो ओ तिर ले दफा हो जथे।

-परमानंद वर्मा

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

गोल्लर कस हुकरत हे फेर कोरोना


शेर खून पीता है, खून ही उसका आहार है, मांस, हड्डी को छोड़ देता है क्योंकि उसे खून पसंद है। वह इसी तलाश में रहता है कहीं कोई जानवर मिल जाए। कोरेाना ऐसा ही एक हिंसक जानवर की तरह ही है। वह रोग ही नहीं महारौग है, राक्षस है। एक बार विश्व में तबाही मचाया, भारत भी इसकी चपेट में आया। हमारा देश उबर तो गया किसी तरह इस रोग से, लेकिन जिसे एक बार खून की लत लग जाती है वह अपने शिकार के लिए फिर निकल पड़ता है। चीन को अभी अपना ग्रास बना रहा है, धीरे-धीरे भारत में दस्तक देने की तैयारी कर रहा है। इस संदर्भ में पेश है यह छत्तीसगढ़ी आलेख... ।

सब छेहेल्ला मारत हें, गोल्लर असन हुकरत हें, एक दूसर ऊपर चढ़े लेवत हे। काला का कहिबे, कोन ला का कहिबे। सब मतंग होगे हे। अतेक जल्दी भुलागे सब कोरोना के कहर ला। दुख के दिन अतेक जल्दी नइ बिसराय जाय, फेर आज देखब मं एकर उल्टा होवत हे। 

कोनो नइ उबार सके रिहिन हे कोरोना के कहर ले सरकार के छोड़े। मौका रहिते हमर भारत सरकार अतेक सजगता दिखाइस ते कोरोना ला पूछी टांग के भागे ले परिस फेर अपन चिनहारी वइसने छोड़ के चल दे हे जइसे अंग्रेज मन छोड़ के गे हें। जइसे अंगरेजी ल ये देश के मन पोटार के धरे बइठे हें वइसने कोरोना घला अभी निरमामुल भागे नइहे। जहां-तहां अपन रूप ला देखावत हे। सरकार सावचेत होगे हे, स्वास्थ्य कर्मी मन के कान घला खड़ा होगे हे। फेर भला होवय ये देश के जनता मन ला, कब ओमन चेतही, समझही तेला उही मन जानय। 

परोसी के घर मं आगी लग गे हे,  लेसावत हे घर-दुआर, मनखे अउ पूंजी पसरा। ये तो जाने बात हे के जब परोसी के घर मं आगी लगे हे तब ओकर लपट जउन उठत हे तउन तो तीरतार के घर मन ला अपने लपेट मं लेबे करही। चीन मं कोरोना अपन उग्र रूप देखावत हे। जइसन खबर सबो कोती ले छन-छन के आवत हे तेकर मुताबिक चीन अउ दुनिया भर के देश म ओमिक्रान वेरिएंट के नया स्ट्रेन बीएफ-7 सबो जघा कहर बरसावत हे। अउ भारत समेत छत्तीसगढ़ मं घला पहुंचगे हे। रायपुर मं जउन मरीज मिले हे तेकर जीनोम सिक्वेसिंग के सेम्पल जांचे बर भुनेश्वर (उड़ीसा) भेज देगे हे। 

याने के दुश्मन फेर घूम-फिर के छत्तीसगढ़ आगे हे अउ अपन रुदबा देखावत हे, अउ इहां के जनता ल देख कतेक अंधरा बने बइठे हे। पूरा देश के अर्थव्यवस्था ला जउन राक्षस चउपट करे रिहिसे, लाश के ढेर बिछा दे रिहिसे ओहर फेर ताल ठोंकत आवत हे अउ हमर देश के जनता मगन हे गीता, भागवत, रामायन मं, नाचत-मटकत हे, राधे-राधे, राम-राम, कृष्ण-कृष्ण के संकीर्तन करत हे। राजनेता मन सत्ता के दउड़ मं, कुरसी हथियाय खातिर उठापटक मं लगे हे, उद्योगपति, व्यापारी निनानबे के चक्कर मं हें, किसान, मजदूर, अधिकारी, करमचारी अपन-अपन गुना-भाग मं लगे हे। सब ओ दुख ला अतेक जल्दी भुलागे कोरोना के जउन सबके रांड़ बेच दे रिहिस, करलई अउ रोवई-गवई के सिवा कांही नइ छोड़े रिहिसे। काकर बेटा, बेटी, दाई-ददा, भाई-भउजी, काकी-कका, फूफा-फूफी सब ला हलाकन करके गे रिहिसे। अतेक जल्दी सब कइसे भुलागे। 

कोनो कथावचक, मंदिर, मसजिद, गिरिजा, गुरुद्वारे के साधु-संत, मठाधीश, शंकराचार्य तब आगू नइ आय रिहिन हे। सब मुंह लुका के खुसरगे रिहिन हे अपन-अपन ठीहा मं। कहां गे रिहिसे ओकर मन के ज्ञान-विज्ञान, योग-तपस्या के बल? ऐ सब ढोंगी पाखंडी हे, एकर मन के सत होतिन ते आतिन आगू मं, करतिन कोरोना ले मुकाबला। हजारों, लाखों चेला-चपाटी बनाय बइठे हें, पइसा बटोरे बर। कोरोना ह न एकर मन के यज्ञ, तप ला घेपिस अउ न ज्ञान-धियान ला। सब ला अपन आंधी मं गहूं कस कीरा रमंज के स्वाहा-स्वाहा कर डरिस। 

सब अंधरा होगे हे, अंधरौटी छा गे हे, बइरी आगू मं आवत हे दल-बल के साथ भयानक राक्षस के रूप धरके फेर चेते नइ चढ़त हे। नइते बरसात के पहिली जइसे आंधी-तूफान आथे तब किसान जान जथे के बरसात के मौसम अवइया हे, अपन खेती-किसानी के तइयारी मं जुट जथे। बइद मन माथा अउ चेहरा देखके, नाड़ी टमर के रोग के लक्षण जान जथे फेर हमर देश के नेता, पुरोहित, पंडित, उद्योगपति, व्यापारी पता नहीं कोन से नींद मं सुते हें के परोसी के घर मं आग लग गेहे तभो ले ओकर आंच ओकर मन करा नइ पहुंचे हे। कुंभकरनी नींद में सुते हे। समय रहिते नइ जागही, सावचेत होही तब तो भगवाने मालिक हे ओकर मन के। भोरहा मं रइहौ, आगी तो परोसी के घर मं लगे हे, हमला का फिकर हे सोचिह तब तो लेना के देना पर जही। एक झकोरा आवत देरी हे, फेर सर्वनाश होय मं देरी नइहे।

परमानंद वर्मा

गुरुवार, 22 सितंबर 2022

गाँधी चौक : एक हरा भरा खेत

इस सृष्टि में मनुष्य का अस्तित्व आशा और निराशा के दो चक्रों के मध्य घूमता रहता है। इनमें से एक तीसरा चक्र अभिलाषा का निकलता है। खुद को अभिव्यक्त करने की अभिलाषा से ही साहित्य का जन्म होता है। बाहरी वातावरण में घटित घटनाओं का प्रभाव हमारे भीतर पड़ता है। जब हम उन प्रभावों को कागज पर उड़ेल देते हैं, तब भीतर का भारीपन कुछ कम होता है ;और मन फिर निकल पड़ता है, बाहरी प्रभावों को आत्मसात करने; ताकि उन्हें पुनः उड़ेला जा सके। यहाँ घटनाएँ उतनी महत्वपूर्ण नहीं होतीं, और ना ही उनका खुद पर प्रभाव उतना महत्वपूर्ण माना जा सकता है। क्योंकि जब तक स्वानुभूति प्रसारित होकर परानुभूति में परिवर्तित नहीं हो जाती, घटनाओं का प्रभाव व्यक्तिगत ही होता है। इस व्यक्तिगत प्रभाव को सार्वजनिक करने के लिए अभिव्यक्ति अनिवार्य है, जिसकी खोज करते हुए मुक्तिबोध लिखते हैं -

"खोजता हूँ पठार...पहाड़... समुंदर,

जहाँ मिल सके मुझे

मेरी वह खोई हुई

परम अभिव्यक्ति अनिवार आत्मसंभवा।"1

 क्योंकि इस आतुर अभिव्यक्ति का एक सशक्त और सुंदर माध्यम साहित्य है; इसलिए बालकृष्ण भट्ट ने साहित्य को 'जनसमूह के हृदय का विकास' तथा आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'जनता की चित्तवृत्तियों का संचित प्रतिबिंब' कहा है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने निबंध 'साहित्यकारों का दायित्व' में साहित्य की महत्ता की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए लिखा है-

" हमें जीवन के हर क्षेत्र में अग्रसर होने के लिए साहित्य चाहिए- साहित्य जो मनुष्य मात्र की मंगलभावना से लिखा गया है और जीवन के प्रति एक सुप्रतिष्ठित दृष्टि पर आधारित हो।"2

       कल्पनाश्रित कथा तथा भोगे हुए यथार्थ में कोहरे और किरण जितना ही अंतर होता है,परंतु यदि यथार्थ की किरणों के इर्द-गिर्द कल्पना के कोहरे बिखेर दिए जाएँ,तो उन किरणों की धवलता अवश्य बढ़ जाएगी। डॉ. आनंद कश्यप ने प्रतियोगी परीक्षाओं को अपने पंद्रह वर्ष दिए। इतने वर्षों के यथार्थ अनुभव को कल्पना का ज़ामा पहनाकर, उन्होंने अपने उपन्यास 'गाँधी चौक' में प्रस्तुत किया है। यह  अश्विनी, नीलिमा तथा सूर्यकांत के इर्द-गिर्द घूमती सुखांत औपन्यासिक कथा है। गरीब, ग्रामीण किसान-पुत्र अश्विनी का पीएससी परीक्षा की तैयारी के लिए शहरी परिवेश में आकर संघर्ष करते हुए, कई असफलताओं के बाद सफलता प्राप्त करना, भीष्म जैसे कर्मनिष्ठ और जीवट पात्र का कई विफलताओं के बाद सफल होने के ठीक पहले धैर्य खोकर प्राण त्याग देना, मध्यम वर्गीय, खुद्दार परिवार की आत्म विश्वासी लड़की नीलिमा का डिप्टी कलेक्टर बनना, तथा अमीर और ओहदेदार पिता के इकलौते पुत्र सूर्यकांत की सोच में परिवर्तन तथा प्रतियोगी परीक्षा की तप्त भूमि में तप कर निखरने तक के सफर में साथ होना बड़ा दिलचस्प रहा। इस उपन्यास में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे परीक्षार्थियों की मन:स्थिति, संघर्ष, समर्पण तथा सफलता-विफलता की खट्टी-मीठी दास्तान को सरल किंतु असरदार शब्दों में प्रस्तुत किया गया है-

" सपने इंसानों के ऊबड़-खाबड़ मन की फसल है। गाँधी चौक भी एक हरा- भरा खेत है। एक ऐसा खेत जिसमें डिप्टी कलेक्टर , डी एस पी, आबकारी अधिकारी जैसी अनेक फसलों का उत्पादन होता है।यह चौक अमरत्व लेकर आया है। देशकाल, परिस्थितियां, परिदृश्य सब कुछ बदल गया है, लेकिन यह चौक नहीं बदला है।"3

        डॉ. आनंद कश्यप का उपन्यास 'गाँधी चौक' न केवल लोक सेवा आयोग परीक्षा की तैयारी के दौर से गुजर चुके और गुजर रहे, अनगिनत युवाओं के संघर्ष का खुला वृतांत है, बल्कि यह इक्कीसवीं सदी के भारत में भी बलभद्र जैसे जमीदारों के चंगुल में फंसे कई समयलाल,चंगू और भागीरथी जैसे खेतिहर मजदूरों की पिघलती दास्तान है, कार्यालय और गृहस्थ जीवन के दोहरे मापदंडों पर खरा उतरने के प्रयास में ख़ाक होती अनेक प्रज्ञाओं का आख्यान है,जिन्होंने सपने देखना कभी नहीं छोड़ा। अर्थ की सत्ता पर आधारित रिश्तों की संवेदनहीनता के घेरे में आकर, नौकरी के अभाव में, संघर्ष की सेज पर आत्महत्या करते अनेकानेक भीष्मों की मर्मभेदी कथा है।

             वैश्वीकरण की दुनिया में स्थानीय भाषा और संस्कृति तेजी से सिमटकर खत्म होने के कगार पर हैं। आज हम संसार के फैलाव को जान लेने की चाह में अपने आसपास की जीवन-पद्धति और संस्कारों को महसूसने का जहमत नहीं उठाना चाहते। परिणाम स्वरूप कई स्थानीय चलन और  प्रचलित- पूर्व प्रचलित शब्द हमसे छूटते चले जा रहे हैं। बल्कि यों कहें कि हम जानबूझकर उनका अस्तित्व मिटाते जा रहे हैं। इसलिए वास्तविक अशोक वृक्ष की गुमनामी से उदास होकर हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने कहा है-

" दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है। केवल उतना ही याद रखती है जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंककर आगे बढ़ जाती है।"4

 'गाँधी चौक' उपन्यास मूलतः हिंदी भाषा में लिखा गया है, परंतु बीच-बीच में छत्तीसगढ़ी बोली का प्रयोग उपन्यास में स्थानीयता का रंग भर देता है। छत्तीसगढ़ के खान-पान जैसे- बासी नून के साथ लालमिर्च-गोंदली, जिमी कांदा, खेड़हा, कोंचई, इड़हर साग, चरपनिया भाजी इत्यादि के स्वाद पाठकों की जिह्वा में रस भर देते हैं-

"बेटी महूं इहें खाहूं! इड़हर के साग हर अब्बड़ मिठाथे।"5

 साथ में सूरुज,पचरी, कथरी जैसे छत्तीसगढ़ी शब्दों का प्रयोग उपन्यास में आंचलिकता को स्थापित कर,इसकी विश्वसनीयता को पुख़्ता बनाते हैं। कई भाषाओं और बोलियों वाले भारतवर्ष में अक्सर रचनाकार की मातृभाषा उसकी साहित्यिक भाषा से भिन्न होती है। परंतु कभी-कभी साहित्यकार मातृभाषा का प्रयोग करके साहित्यिक भाषा को अधिक सुंदर,संप्रेषणीय एवं समृद्ध बनाते हैं। डॉ. कश्यप इसी श्रृंखला की एक कड़ी हैं।स्थानीय बोलियों से संपृक्त होकर साहित्यिक भाषा अधिक असरदार बनकर पाठकों का ध्यान, संबंधित संस्कृति की ओर आकर्षित करती है। क्योंकि स्थानीय बोलियाँ भी उसी साहित्यिक भाषा परिवार की अभिन्न अंग होती हैं। साहित्यकार वक्त के थपेड़ों को मात देकर अपनी भाषा के साथ सदैव जीवित रहता है। कवि दिविक रमेश के शब्दों में-

"वे तमाम शब्द

जिन्हें लिखा है मैंने, रचा है जिन्हें और बोला भी है बोलियों की तरह टटोल कर तो देखो उन्हें

साक्षी हैं वे

मेरे जीवित होने के।"6

   रंग समायोजन के माध्यम से बिंब निर्माण करना इस उपन्यास की प्रमुख विशेषता है। जब कथा नायक सूर्यकांत की प्रथम भेंट, नायिका नीलिमा से होती है,तब नीलिमा नीले परिधान में होती है। नीली आँखों, नीले वस्त्र के साथ नाम का समायोग देखकर सूरदास के राधा-कृष्ण की स्मृति हो आती है। जब राधा को नीले वस्त्र में देखकर कृष्ण ठगे के ठगे रह जाते हैं-

 "गए स्याम रवि तनया के तट, अंग लसति चंदन की खोरी,

औचक ही देखि तहं राधा, नैन विशाल भाल दिए रोरी ।

नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनि पीठि रूलती झकझोरी,

सूर स्याम देखत ही रीझे,

नैन- नैन मिली परी ठगोरी।"7

उपन्यास में समयलाल और चंगू मजदूर वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनके जीवन का संघर्ष दो वक्त की रोटी के लिए है। ऐसे में चंगू जैसे अनपढ़ व्यक्ति का शराब पीकर कृष्ण, राम, गौतम बुद्ध तथा जीवन और त्याग संबंधित दर्शन बघारना, पाठकों को कुछ असहज करता जरूर है-

" यदि राम अपने महलों से निकलकर जंगल नहीं जाते,लोगों से नहीं मिलते, तो राजा राम, भगवान राम कभी नहीं बनते। कान्हा भी माता यशोदा के हाथ के बने पकवान, उनके प्रेम के मोह का, गोपियों संग अठखेलियों  का त्याग करके मथुरा न जाते, तो वे कभी भी भगवान कृष्ण नहीं बनते। गौतम बुद्ध अपने राज महलों को नहीं त्यागते तो वह कभी भी भगवान बुद्ध नहीं बनते।×××× त्याग व्यक्ति को समाज में स्थापित करने में सहयोग करता है। आज यदि कोई सफल है तो उसके पीछे उसका त्याग है।"8

परंतु कभी-कभी पाठशाला के औपचारिक दौर के बिना भी जीवन का पाठ पढ़ चुके अपढ़ व्यक्तियों की विद्वता का डंका बजते देखा जाता है। 'मसि कागद छुयो नहीं, कलम गह्यो नहीं हाथ' कहने वाले कबीर की चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में लिखे दोहे आज भी इक्कीसवीं सदी में अपनी सार्थकता सिद्ध कर रहे हैं। 

     सामान्यतः शराबियों में लड़ाई- झगड़ा करके पारिवारिक कलह बढ़ाने की प्रवृत्ति देखी जाती है। परंतु बात-बात में पुत्र अश्वनी पर लात जमाने वाले समय लाल के साथ उल्टा होता है। शराब पीकर उसे अपराध बोध होता है, और वह सोए हुए पुत्र पर प्रेम लूटाता है-

"समयलाल को आज अश्वनी के प्रति प्रेम उमड़ रहा था। वह उसके सिरहाने जाकर बैठ गया और उसके सिर को सहलाने लगा। आज अपने बच्चे के पास बैठ कर उसे अलौकिक आनंद आ रहा था। कुछ देर बाद अश्वनी की आँखें खुल गईं लेकिन वह सोने का बहाना करता रहा। वह बाबूजी के मुँह से आने वाली गंध से समझ गया था कि वो पीकर आए हैं।" 9

 एक दो पैग लगाकर पढ़ने बैठे राजा का दिमाग दोगुनी गति से काम करने की बात भी हजम नहीं होती-

"जैसे ही राजा को मौका मिलता एक पैग लगा कर चुपचाप पढ़ने बैठ जाता था। पीने के बाद उसका दिमाग दुगुना काम करने लगता था। उस समय वह चाचा चौधरी को भी मात दे सकता था।"10

उपन्यास में घटित इस तरह की घटनाएँ शराब की महिमा का मंडन करती नजर आती हैं,परंतु प्रतियोगी परीक्षाओं में अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले भीष्म की मृत्यु का कारण शराब को बताकर उपन्यासकार ने शराब की महिमा का खंडन भी किया है-

"भीष्म को नकारात्मक विचारों ने उसी तरह घेर लिया था। जैसे चंदन के वृक्षों को सर्प लपेट लेते हैं। नशे की वजह से उनके नकारात्मक विचार बढ़ते ही जा रहे थे। निराशा पीड़ा और अवसाद जैसी भावनाएँ उन पर हावी हो रही थीं ।11

              'गाँधी चौक' उपन्यास के प्रमुख चरित्रों को तीन भागों में विभक्त कर उपन्यासकार की वर्णन- पद्धति को समझा जा सकता है।  पहला- बने हुए को और बनाना, जैसे सूर्यकांत। दूसरा- टूटे हुए को और तोड़ना, जैसे- भीष्म और तीसरा- परिश्रम से अभाव की खाई को पाटना, जैसे -अश्विनी और नीलिमा।

 उपन्यास का एक पात्र सूर्यकांत  सर्वसंपन्न पिता का इकलौता पुत्र है, जिसके जीवन में किसी भी चीज की कमी नहीं थी। उसकी बड़ी से बड़ी गलतियों पर पर्दा डाल दिया जाता है। वह दो बार यमराज को भी शिकस्त दे चुका है। लोक सेवा आयोग की परीक्षा में पहले वह पैसे के दम पर पद प्राप्त करता है, क्योंकि प्रारंभ में उसे विश्वास था कि पैसे के बल पर सबकुछ खरीदा जा सकता है।सूर्यकांत की इस सोच की नीलिमा विरोधी थी। नीलिमा को पाने की चाह में सूर्यकांत की सोच में बदलाव आया। नीलिमा उसके लिए प्रेरणा थी, जिसके कारण ही उसने विलासितापूर्ण जीवन का त्याग किया। बाद में वह मेहनत के दम पर पद हासिल कर लेता है। पिता हर कदम पर उसके साथ खड़े हैं। अंततः प्रेमिका पत्नी के रूप में मिल जाती है।उपन्यास के अंत में इसी पात्र को संपूर्णता प्राप्त होती है। कारण बने हुए को हर कोई बनाता है।

"शादी का मंडप वही रहता है। सजावटें वही रहती हैं। बस बदलता है तो दूल्हा। सूर्यकांत और नीलिमा का विवाह उसी मंडप में संपन्न हो जाता है।"12

    उपन्यास का दूसरा पात्र भीष्म, जिसने अपनी जवानी के कितने ही बसंत प्रतियोगी परीक्षाओं को समर्पित कर दिये। भीष्म का सफलता की गंगा में डुबकी लगाने का भागीरथ प्रयास बार-बार विफल होता रहा,और जब डुबकी लगाने का अवसर मिला तब तक उसका मृत शरीर अग्नि स्नान कर चुका था। वह जिन पुस्तकों पर माथा रखा करता था उन्हीं पुस्तकों पर पैर रखकर फाँसी के फंदे पर झूल गया। जिसका जीवन अंधेरे में गुज़रा , जिसे नौकरी की सबसे ज्यादा जरूरत थी; घरवालों के अमानवीय व्यवहार तथा गाँव वालों के असहनीय कटाक्ष ने आखिरकार उसके धैर्य की कड़ी को तोड़ दिया। कारण टूटे हुए को हर कोई तोड़ता है।

" रात भर सफर करने के बाद पार्थिव शरीर सवेरे सवेरे भीष्म के गाँव पहुँचा। गाँव में लोगों की भीड़ इकट्ठा थी। उनकी आँखें भी नम थीं। यह वही लोग थे जो जीते जी उन्हें ताना देते थे।"13

    इन दोनों पात्रों के मध्य का सर्वश्रेष्ठ भाव, पुरुष पात्र में अश्वनी तथा नारी पात्र में नीलिमा प्रस्तुत करते हुए दिखाई देते हैं। जिन्होंने आर्थिक थपेड़ों से जूझते हुए, मेहनत के बल पर अपने लक्ष्य को हासिल किया। यह उपन्यास सिविल सर्विस परीक्षा की श्रेष्ठता का बखान करते हुए यह संदेश देता है कि यदि इक्कीसवीं सदी में जमींदार बलभद्र जैसे रावण की लंका का दहन करना है तो अश्वनी के समान सिविल सर्विस परीक्षा की देवी को अपने कर्म की तपस्या से प्रसन्न करना होगा। परंतु बलभद्र की लंका दहन के बाद तहसीलदार अश्वनी का स्थानांतरण सुकमा (नक्सलाइट जिला) करवा दिया जाना तथा उसका स्थानांतरण रुकवाने में योगानंद जैसे, राजनीतिक दखल रखने वाले व्यक्ति का हाथ होना, इस बात की पैरवी भी करता है कि वर्तमान युग में देवी सरस्वती की कृपा के साथ-साथ देवी लक्ष्मी एवं देवी दुर्गा की छत्रछाया भी आवश्यक है। लिंगभेद के कारण पनपे आडंबरों का खुले शब्दों में विरोध डॉ. कश्यप ने किया है। पिता समयलाल की मृत्यु पर , अश्वनी के मुँह से, अपनी बहन माया के लिए यह कहलवाकर -

" वो भी तो उनकी ही पुत्री है।पिता की संपत्ति पर जब पुत्री का अधिकार हो सकता है तो उसके दाह- संस्कार पर क्यों नहीं।"14  उपन्यासकार ने स्त्री-पुरुष समानता का पक्ष लेते हुए स्त्रियों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति समाज की आँखों में पड़े पर्दे को भी हटाया है। 

            'गाँधी चौक' उपन्यास को 20 शीर्षकों में विभक्त किया गया है, परंतु उपन्यास में अनुक्रमणिका की अनुपस्थिति ने पाठक के समक्ष पसंदीदा शीर्षक तक पहुँचने में कठिनाई उपस्थित कर दी है। जिस प्रकार 'गोदान' उपन्यास में प्रेमचंद ने प्रोफ़ेसर मेहता को अपनी विचारधारा का उद्घोषक बनाया है ठीक उसी प्रकार डॉ. आनंद कश्यप ने उपन्यास 'गाँधी चौक' में कृषि वैज्ञानिक रामप्रसाद को अपने विचारों का प्रवक्ता बनाया है।

 'गाँधी चौक'  वर्तमान सहायक प्राध्यापक डॉ. आनंद कश्यप द्वारा लिखित उपन्यास नहीं है, बल्कि इसे कई विफलताओं का दंश झेल चुके, सहायक प्राध्यापक पद की प्राप्ति के लिए संघर्षरत, डॉ. आनंद कश्यप ने लिखा है। छत्तीसगढ़ में सहायक प्राध्यापक पद का विज्ञापन सालों बाद निकलता है। विज्ञापन के बाद परीक्षा देने से लेकर पद प्राप्त करने में वर्षों लग जाते हैं। सहायक प्राध्यापक परीक्षा 2014 के परीक्षाफल में डॉ.आनंद कश्यप और मेरी लगभग समान स्थिति थी। हम दोनों ही पुरुष व महिला वर्ग में, प्रतीक्षासूची में प्रथम स्थान पर रहकर असफल हो चुके थे। तब से लेकर 2020 तक अपने आपको आगामी परीक्षा की तैयारी में लगाए रखना किसी तपस्या से कम नहीं था। परीक्षार्थी, परिवार वालों के साथ रहकर भी अकेला होता है। वह दीपावली, दशहरा, होली आदि सभी त्यौहारों की खुशियाँ ,अपने पठन की मोटी-मोटी पुस्तकों में ढूंढ लेता है। जहाँ इस तपस्या में दुनियावी माया ने प्रवेश किया कि तपस्या ख़त्म और तपस्वी धराशायी। ऐसी विषम परिस्थितियों में, परीक्षा के ठीक पहले , इतने प्रभावी लेखन के लिए मैं डॉ.आनंद कश्यप को बधाई देती हूँ । उन्होंने, वर्षों जिए यथार्थ के मोतियों को कल्पना के धागे में पिरोकर, तैयारी कर रहे परीक्षार्थियों के भविष्य के गले में पहना दिया है। सफल उपन्यासकार डॉ. आनंद कश्यप को उनके आगामी लेखन के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ!  पुनः बधाई!

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संदर्भ ग्रंथ  :-

1.मुक्तिबोध, गजानन माधव, चाँद का मुँह टेढ़ा है,भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, इक्कीसवां संस्करण 2013, पृष्ठ 296

2. द्विवेदी, हजारी प्रसाद, अशोक के फूल, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद,  इकतीसवां संस्करण:2013,पृष्ठ-132

3.कश्यप, डॉ. आनंद, गाँधी चौक, हिंद युग्म ब्लू, नोएडा (उ.प्र.) पहला संस्करण:2021, पृष्ठ-9

4.सिंह, नामवर, हजारी प्रसाद द्विवेदी संकलित निबंध, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत ,नई दिल्ली, नौवीं आवृत्ति 202, पृष्ठ- 4

5.कश्यप, डॉ. आनंद, गाँधी चौक, हिंद युग्म ब्लू, नोएडा (उ.प्र.), पहला संस्करण:2021, पृष्ठ-21

6. वागर्थ, मासिक पत्रिका, वर्ष 28, अंक 315, फरवरी 2022, संपादक-शंभूनाथ, पृष्ठ-52

7.शुक्ल, रामचंद्र, भ्रमरगीत सार; लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2012 ,पृष्ठ 23

8. कश्यप, डॉ. आनंद,गाँधी चौक, हिंद युग्म ब्लू, नोएडा (उ.प्र.), पहला संस्करण:2021, पृष्ठ 17

9.वही,पृष्ठ- 18

10. वही,पृष्ठ-156

11. वही, पृष्ठ -150

12. वही, पृष्ठ-190

13. वही, पृष्ठ-153

14. वही, पृष्ठ- 172


   डॉ. चंद्रिका चौधरी

  सहायक प्राध्यापक हिन्दी

  स्व. राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह शासकीय महाविद्यालय सरायपाली, 

जिला- महासमुंद (छ.ग.)

मोबाइल नंबर- 8889923883

drchandrikachoudhary@gmail.com

मंगलवार, 16 अगस्त 2022

अंधियारी रात के अतियाचार

ये रात, तू अपनी शौर्य, शक्ति, काली घटा रूपी अंधकार पर इतना गर्व और गुमान न कर, न इस दर्प में रह कि तू भारत तो क्या पूरा विश्व मेरी आगोश में है, सबको कैदकर रखा है, बंदरिया की तरह। यह सब तेरी भूल है। दिन बहुत ही करीब है, कुछ घंटे के फासले पर है वह प्रकाश, ज्योति लेकर आ रहा है।तुम्हारी सभी कारगुजारियों का वह पर्दाफाश कर देगा। गिना देगा- ये रात, तुमने प्रजा को क्या-क्या दुख नहीं दिया, अत्याचार किया, दर-दर भटकने के लिए विवश किया, सारे उल्टे-सीधे काम किए। सत्य को असत्य, अहिंसा को हिंसा, प्रेम को नफरत और धर्म को अधर्म और न्याय को अन्याय में तब्दील करने की कोशिश की, बदला है। 'सत्यमेव जयते' के लिए असत्यमेव जयते का नारा का ढिंढोरा पिटवाने का प्रयास किया है। रात तू यह कैसे भूल गया कि अति का भी अंत आता है। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख- 'अंधियारी रात के अतियाचार।'

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घपटे अंधियारी रात मं अगास मं चंदा दीखत हे न चंदइनी, गली-खोर-रस्दा घलो नइ दीखत हे, अंधरा कस होगे हे आंखी कोन मेर जांव,कहां जांव, कइसे जांव? न हाथ मं लाठी, न पांव में पनही, अउ न चप्पल, उखरा खड़े हौं। ककरो कांही सहारा नइ हे, काला गोहराऔं, कोन ला हुत करा के बलावौं. जइसे सावन-भादो के घपटे अंधियारी रात मं जब मनखे भटक जथे, तीर मं खड़े मनखे नइ दीखय तइसने कस ये कलजुग घला खरागे हे, घपटगे हे चारो मुड़ा अंधियार, अजगर सही निगलत जात हे, सत, इमान, धरम, अहिंसा अउ परेम ल। ओकर मुंह मं फंसे मेचका असन छटपटावत हे, तडफ़त हे मुक्ति पाय खातिर, ग्राह फंदा मं फंसे गज (हाथी) हाथ-गोड़ मारत हे भरे तरिया मं फेर सबो ओकर कोशिश अकारथ जात हे। काल के गाल मं अरझे अइसन परानी मन ला कोनो कोती सहारा के एक ठन किरन नइ दीखत हे। अब अइसन मं ओमन ला बचावय ते बचावय कोन? कोनो तो होही ये संसार मं, ब्रम्हांड मं बचइया सबके सब तो राक्षस नइ होगे होही। अतेक बड़े धरती हे कोनो तो होही शूरवीर, इमान, धरम के रक्षा करइया?

सियान, ज्ञानवान, अउ वेद, पुरान मं कहे हें,देर हे, अंधेर नइ हे। सत्, इमान, धरम, अहिंसा अउ परेम के टोटा (गला) ला कोनो कतको रेते (मारे) के कोशिश करही मेचका अउ गज (हाथी) बरोबर? फेर ओमन मरय नहीं, भले घायल होही। परान छूटइया हे अब तब तइसे लागही फेर सांस कोनो मेर न कोनो मेर अटके रहि जथे, अउ आखिर मं ओकर परान बच जथे। वइसने कस छल  आज कर दे हे। सबके इमान, धरम, इज्जत, आबरू, मान मरजादा ला मेटे खातिर अइसे उतारू होगे हे जइसे बाजार में आये करोड़पति सब ला खरीदे बर पइसा के लालच देखा-देखा के सत्यानाश करथे। 

आग लग गे हे चारो मुड़ा, सब हाय-हाय मरत हे, त्राहि-त्राहि करत हे, फेर ये भयानक रूप धरे कलयुग राक्षस के आगू मं कखरो सख नइ चलत हे, कोनो मुंह नइ खोल सकत हे। खासकर भारत ला हलाहल कर दे हे। ओकर डर के मारे सब बिके खातिर एक पांव मं खड़े हे। चाहे राजनीतिक म देख ले, चाहे धारमिक, सामाजिक, उद्योग, व्यवसाय सब मं इही हाल हे। बड़े घर के बहू-बेटी होय, चाहे गरीब-मजदूर, चाहे कला, साहित्य, चिकित्सा। कोनो दूध के धुले आज इहां नइहे, जउन अपन सत, इमान, धरम, इज्जत, आबरू ला नइ बेचत होही, अउ बेचे बर तइयार नइ बइठे होही? अइसे हालत बना दे हे के कोनो ओकर चाल,चकरी मं नइ फंसहीं। मरता का नइ करता तइसे कस हाल होगे हे सबके। चारो मुंड़ा अंधियार, करिया-करिया बादर करिया नाग, डोमी, घोड़ा करायत सही फन काढ़े आघू मं खड़े हे डसे बर तइसे लागथे। 

कोन बचही, कोन बचाही, कोरोना ले, ये कइसनो करके अपनी जीव-परान ला बचा लेव, डॉक्टर मन बचा लिन। फेर ये जउन कोरोनो दूसर बदल के आय हे, देश, परिवार, समाज ला डराये बर, तेकर ले कोनो बचाही? एकर डर के मारे तो सत, इमान घला कांपत हे, मुंह लुकावत फिरत हे। कहां जाबे, काकर करा अपन दुख-करलेस ला गुराबे? कहूं ककरो मेर गोठियावत-बतावत सुन लिही तब परान नइ बाचही। देशभर इही, सीबीआई अउ पुलिस के जासूस मन घूमत फिरत हे। मैं कांही नइ करे हौं। सत इमान हौं, ककरो कांही बिगाड़ नइ करे हौं, अपन इज्जत-आबरू, मान-मरियादा ला बना के राखे हौं, अपन घर, परिवार, समाज अउ पारटी के प्रति निष्ठावान हौं, मैं सतवंतिन हौं, सतिव्रता हौं, साधु-महात्मा हौं, अइसन कहूं केहे, गोठियाय तब तो सउंहें हंटर परत हे, जेल मं ठूंसत हे, वेश्यालय मं फेंकत हें अउ रावन सही गुर्रावत काहत हे- जादा सफाई अउ ईमानदारी देखाय के कोशिश झन करौ अउ जइसे हम काहत हन, वइसने करौ। अपत, बेइमानी, झूठ-फरेब, लूट खसोट, डकैती, अनाचार, अत्याचारअउ अधरम के जय बोलव, ये सब के जिंदाबाद के नारा लगावौ। मैं कोन हौं, एला बताय के कोनो ला जरूरत नइहे, समझगे होहू सब। वइसे सब समझदार हौ, चतुरा हौ। सब इहां बिकइया घोड़ी-घोड़ा हौ। मोर करा नहीं के कोनों सवाल नइहे, सब हां काहौ? जतका मं बिकहौ, मैं खरीदे बर तइयार हौं। मोर खजाना खुले हे। मोर डर के मारे देखत हौ- ये सत् इमान कइसे कांपत हे, आंसू ढारत हे। बड़ा चले रिहिस हे 'सत्यमेव जयते', 'अहिंसा परमो धर्म:' के नारा लगावत। मोर एक घुड़की मं मुसुवा (चूहा) बरोबर अइसे बिला मं खुसरगे हे बिलई के देखते साठ खुसर जथे। अब निरनय तुंहर मन के हाथ मं हे।

-परमानंद वर्मा

गुरुवार, 18 नवंबर 2021

ये तो होना ही था...

भी सोचा न था, न ही समझा और जाना व माना था कि एक दिन ऐसा आयेगा कि मनुष्य जानवरों की तरह बेमौत मारे जाएंगे और उनकी लाशों को प्लास्टिक के पैकेट में लपेट कर यदा-कदा फेंक दिए जाएंगे, कुत्तों, कौंओ, चीलों और गिद्धों को भी मानव मांस चखने को नहीं मिलेगा। वक्‍त अपना खेल और करतब मदारी की तरह दिखाता है। देखने वाले देखते रह जाते हैं सशंकित होकर कि जैसा हो रहा है, देख रहे है कि ही वैसा ही दिन उलट कर उनकी तरफ ही न लौट जाए।

चौसर सौर शतरंज के खिलाडी अच्छी तरह जानते हैं खेल का कोई भरोसा नही। पांडव सब कुछ हार गए थे लेकिन कया जरूरत थी खेल को आगे बढ़ाने के लिए। हालांकि मना कर रहे थे कि आगे नही खेलेंगे लेकिन शकुनि मामा के झांसे में आखिर आ ही गए और फंस गए उनकी चाल में | कोई पत्नी को दांव पर लगाता है क्‍या, ऐसा तो उस समय के इतिहास में नहीं हुआ था। और द्रोपदी तो कुलवधू थी। क्‍या शकुनि, कौरव सम्राट, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण जैसे महान हस्तियां उस समय वहां उपस्थित थी। जब द्रौपदी को दांव पर लगाया गया तब किसी की बुद्धि काम नही आई, गिरवी रख दी गई थी अकल को। खेल जो होना था, हुआ जरा सी बात ने महाभारत रच दिया। ऐसा ही होता है, अनहोनी हो जाती है, जिसकी कभी सपने में कल्पना नही की गई थी।

सत्य और शांति, धर्म का मूल तत्व है। जब ये दोनों तत्व विद्यमान होते हैं संसार में प्राणी सुखमय जीवन व्यतीत करते है। लेकिन कहते हैं समय कभी एक समान नही रहता। सत्य और शांति को कालांतर में ग्रहण घेर लेता है और असत्य और अशांति के भंवर जाल में जब वह फंस जाता है तब कलह और क्लेश बढ़ जाता है। संसार में हाहाकर मचने लगता है। धर्म, अधर्म का रूप ले लेता है। सज्जन दुर्जन बन जाते है और धार्मिक स्थल शैतानो का गढ़ बन जाता है।

सब कुछ ठीक-ठीक चल रहा था, कहीं किसी बात की आशंका नहीं थी, कि ऐसा भी हो जाएगा लेकिन अनहोनी को भला कौन रोक सकता है। एक दिन अचानक शूर्पनखा का प्रवेश हुआ और सब कुछ तमाम हो गया। सारी चतुराई धरी की धरी गई और उसको जो करना था किया, बर्बादी के सिवा हासिल आया कुछ भी नही। जब अशुभ ग्रहो का प्रवेश होता है और ग्रह गोचर अनिष्ट चाल चलते है तब अमरीका जैसे देश के भी होश ठिकाने आ जाते है । यदि ऐसा न होता तो अफगानिस्तान से उसको भागना नहीं पड़ता। तालिबानियो के सामने उसने घुटने टेक दिए। न धन काम आया और न शक्ति।

कुत्ते, कुत्ते ही होते है चाहे उसे कितने ही दुध पिलाओं, मांस खिलाओं, कार में बिठाकर तफरीह कराओं। उसका जो मौलिक और प्राकृतिक गुण होता है , उसे काई भी नष्ट नही कर सकता। हिंसक पशुएं कितने पालतू क्यो न हो जाए लेकिन वक्‍त आने पर अपनी असलियत गुण को वह दिखा ही देता है उसी तरह मनुष्यों में भी आजकल पाशविकता बढ़ रही है। जहां सत्य, शांति, और धर्म का हास होगा वहां शैतानों की संख्या निरंतर बढ़ती जाएगी। अब तो कुछ देशो ने शैतानो की पाठशालाएं भी खोल रखी है। इन शालाओ से पढ़कर निकले छात्र अराजकता, आतंक, लूटपाट, अपहरण, आगजनी, हत्या और कुकर्मो से अशांत है, उद्वेलित है। कब, कहां, किस समय, क्‍या हो जाएगा कहा नहीं जा सकता ?

अभी अपने ही देश में देख लीजिए, सलमान खुर्शीद के नव प्रकाशित किताब को लेकर कोहराम मच गया। उनके नैनीताल स्थित घर पर तोड़फोड़ और आगजनी हो गई। कहा जा रहा है कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद के किताब “सनराइज ओवर आयोध्या : नेशनहुड इन ओवर टाइम्स” में हिंदुत्व की तुलना आतंकी समूहों बोकोहराम और आईएसआईएस से की गई है। इसके बाद से खुर्शीद निशाने पर हैं। कुमाऊं के डी आई जी के अनुसार कुछ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। किसी धर्म व सम्प्रदाय के खिलाफ इस तरह की टिप्पणी व आरोप अवांछनीय और निंदनीय है। क्‍या सोचकर ऐसा पत्थर फेंका गया है इसे वही जाने लेकिन खुर्शीद तो वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं एडवोकेट हैं। केंद्रीय मंत्री रहे हैं, उनसे ऐसी अपेक्षा नहीं थी। लेकिन होनी को कौन रोक सकता है? जब द्रौपदी को दाँव पर लगाने और चीरहरण जैसी घटना को बड़े-बड़े धुरंधर नही रोक सके, उनकी मति मार गई तब खुर्शीद जैसे खिलाड़ी का क्‍या कहिए, ऐसा तो होना ही था और हो गया। पासा फेंका गया है, खेल आगे देखिये क्‍या-क्या होता है ?

   – परमानंद वर्मा


सोमवार, 19 जुलाई 2021

परिंदे की गुहार....


सुबह कुछ जल्दी ही जाग गई थी,

टक - टक की आवाज़ आ रही थी | 

दरवाज़ा  खोलकर देखा

कोई दिखा नहीं ! ...

आवाज़ की दिशा में देखा

खिड़की पर दिखा एक पक्षी

अपनी चोंच से खिड़की पर

उकेर रहा था नक्काशी ...

मैंने पूछा -

"भाई क्या बात है"

बोला " क्या किराये से मिलेगा

कोई पेड़ घोंसला बनाने के लिए ?

अकेला तो कहीं भी रह लेता,

परन्तु घर चाहिए चूज़ों के लिए

तुम्हारे ही भाइयों ने लूट लिया है,

हमारा जंगल पूरा ही काट दिया है | 

बेघर तो कर ही दिया है, 

दाने-पानी के लिए भी तरसा दिया  है | 

पुण्य कमाने के लिए रख देते हैं ,

छत पर थोड़ा दाना थोड़ा पानी,

पर रहने के लिए छत भी तो चाहिए

यह तो कोई सोचता भी नहीं 

पेट तो भरना ही है,

भीख ही सही ,थोड़ा खा-पी लेते हैं 

थोड़ा घर भी ले जाते हैं  

भले ही सर पर छत न हो

पेट में भूख तो है ना?

कभी -कभी सोचता हूँ 

आत्मघात कर लूँ | 

बिजली के तारों  पर बैठ जाऊँ ,

या पटक दूँ सर मोबाइल के ऊँचे टावर पर 

जैसे सरकार दे देती है कुछ

फाँसी  लगाने वाले किसान को

वैसे ही मिल जाएगा  कोई पेड़

मेरे चूज़ों के घोंसले के लिए "

सुनकर मैं सुन्न हो गया

इतना कुछ तो सोचा न था ?

जंगल काटकर घर उजाड़ दिया 

इन बेचारों का विचार नहीं किया ! 

मैंने हाथ जोड़कर उससे कहा

"  सबकी ओर से मैं माफी माँगता हूँ , आत्मघात का विचार त्याग दो, यह दिल से निवेदन है मेरा 

अभी तो इस गमले के पौधे पर

अपना वन रूम किचन  का घर बसा लो

थोड़ी अड़चन तो होगी परंतु अभी इसी से काम चला लो"

उसने कहा 

"बड़ा  उपकार होगा 

परंतु किराया क्या होगा ? 

और कैसे चुकाऊँगा "

मैंने कहा-

 "तीनों पहर मंगल कलरव सुनूँगा , और कुछ नही माँगूँगा "

वह बोला "मुझे तो आप मिल गए पर मेरे भाई बंधुओ का क्या?

उन्हें भी तो घर चाहिए ,कहाँ रहेंगे वे सब ?"

मैंने कहा "अरे ! अब लोग जाग रहे हैं,

बड़, पीपल, नीम, गूलर रोप रहे हैं

धीरे -धीरे बदलाव आ रहा है

किसी को आत्मघात करने की आवश्यकता अब नहीं  है"

सुनकर पक्षी उड़ गया,

घोंसले  का सामान लाने के लिए

और मैंने मोबाइल उठाया

आपको बताने के लिए


पक्षी की टक -टक से 

मेरे मन का द्वार खुल गया

आप भी एक पेड तो रोपेंगे !

आंगन में... या गमले में ही सही...

वाट्स एप्प से प्राप्त

सोमवार, 17 मई 2021

वह पागल भिखारी...

जब बुढ़ापे में अकेला ही रहना है तो औलाद क्यों पैदा करें उन्हें क्यों काबिल बनाएं जो हमें बुढ़ापे में दर-दर के ठोकरें खाने  के लिए छोड़ दे ।

क्यों दुनिया मरती है औलाद के लिए, जरा सोचिए इस विषय पर।

मराठी भाषा से हिन्दी ट्रांसलेशन की गई ये सच्ची कथा है ।

जीवन के प्रति एक नया दृष्टिकोण आपको प्राप्त होगा।समय निकालकर अवश्य पढ़ें।

हमेशा की तरह मैं आज भी, परिसर के बाहर बैठे भिखारियों की मुफ्त स्वास्थ्य जाँच में व्यस्त था। स्वास्थ्य जाँच और फिर मुफ्त मिलने वाली दवाओं के लिए सभी भीड़ लगाए कतार में खड़े थे।

अनायाश सहज ही मेरा ध्यान गया एक बुजुर्ग की तरफ गया, जो करीब ही एक पत्थर पर बैठे हुए थे। सीधी नाक, घुँघराले बाल, निस्तेज आँखे, जिस्म पर सादे, लेकिन साफ सुथरे कपड़े। 

कुछ देर तक उन्हें देखने के बाद मुझे यकीन हो गया कि, वो भिखारी नहीं हैं। उनका दाँया पैर टखने के पास से कटा हुआ था, और करीब ही उनकी बैसाखी रखी थी।

फिर मैंने देखा कि,आते जाते लोग उन्हें भी कुछ दे रहे थे और वे लेकर रख लेते थे। मैंने सोचा ! कि मेरा ही अंदाज गलत था, वो बुजुर्ग भिखारी ही हैं।

उत्सुकतावश मैं उनकी तरफ बढ़ा तो कुछ लोगों ने मझे आवाज लगाई : 

"उसके करीब ना जाएँ डॉक्टर साहब, 

वो बूढा तो पागल है । "

लेकिन मैं उन आवाजों को नजरअंदाज करता, मैं उनके पास गया। सोचा कि, जैसे दूसरों के सामने वे अपना हाथ फैला रहे थे, वैसे ही मेरे सामने भी हाथ करेंगे, लेकिन मेरा अंदाज फिर चूक गया। उन्होंने मेरे सामने हाथ नहीं फैलाया।

मैं उनसे बोला : "बाबा, आपको भी कोई शारीरिक परेशानी है क्या ? "

मेरे पूछने पर वे अपनी बैसाखी के सहारे धीरे से उठते हुए बोले : "Good afternoon doctor...... I think I may have some eye problem in my right eye .... "

इतनी बढ़िया अंग्रेजी सुन मैं अवाक रह गया। फिर मैंने उनकी आँखें देखीं। 

पका हुआ मोतियाबिंद था उनकी ऑखों में । 

मैंने कहा : " मोतियाबिंद है बाबा, ऑपरेशन करना होगा। "

बुजुर्ग बोले : "Oh, cataract ? 

I had cataract operation in 2014 for my left eye in Ruby Hospital."

मैंने पूछा : " बाबा, आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? "

बुजुर्ग : " मैं तो यहाँ, रोज ही 2 घंटे भीख माँगता हूँ  सर" ।

मैं : " ठीक है, लेकिन क्यों बाबा ? मुझे तो लगता है, आप बहुत पढ़े लिखे हैं। "

बुजुर्ग हँसे और हँसते हुए ही बोले : "पढ़े लिखे ?? "

मैंने कहा : "आप मेरा मजाक उड़ा रहे हैं बाबा। "

बाबा : " Oh no doc... Why would I ?... Sorry if I hurt you ! "

मैं : " हर्ट की बात नहीं है बाबा, लेकिन मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है। "

बुजुर्ग : " समझकर भी, क्या करोगे डॉक्टर ? "

अच्छा "ओके, चलो हम, उधर बैठते हैं, वरना लोग तुम्हें भी पागल हो कहेंगे। "(और फिर बुजुर्ग हँसने लगे)

करीब ही एक वीरान टपरी थी। हम दोनों वहीं जाकर बैठ गए।

" Well Doctor, I am Mechanical Engineer...."--- बुजुर्ग ने अंग्रेजी में ही शुरुआत की--- " 

मैं, *** कंपनी में सीनियर मशीन ऑपरेटर था।

एक नए ऑपरेटर को सिखाते हुए, मेरा पैर मशीन में फंस गया था, और ये बैसाखी हाथ में आ गई। कंपनी ने इलाज का सारा खर्चा किया, और बाद में  कुछ रकम और सौंपी, और घर पर बैठा दिया। क्योंकि लंगड़े बैल को कौन काम पर रखता है सर ? "

"फिर मैंने उस पैसे से अपना ही एक छोटा सा वर्कशॉप डाला। अच्छा घर लिया। बेटा भी मैकेनिकल इंजीनियर है। वर्कशॉप को आगे बढ़ाकर उसने एक छोटी कम्पनी और डाली। "

मैं चकराया, बोला : " बाबा, तो फिर आप यहाँ, इस हालत में कैसे ? "

बुजुर्ग : " मैं...? 

किस्मत का शिकार हूँ ...."

" बेटे ने अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए, कम्पनी और घर दोनों बेच दिए। बेटे की तरक्की के लिए मैंने भी कुछ नहीं कहा। सब कुछ बेच बाचकर वो अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जापान चला गया, और हम जापानी गुड्डे गुड़िया यहाँ रह गए। "

ऐसा कहकर बाबा हँसने लगे। हँसना भी इतना करुण हो सकता है, ये मैंने पहली बार अनुभव किया।

फिर बोला : " लेकिन बाबा, आपके पास तो इतना हुनर है कि जहाँ लात मारें वहाँ पानी निकाल दें। "

अपने कटे हुए पैर की ओर ताकते बुजुर्ग बोले : " लात ? कहाँ और कैसे मारूँ, बताओ मुझे  ? "

बाबा की बात सुन मैं खुद भी शर्मिंदा हो गया। मुझे खुद बहुत बुरा लगा।

प्रत्यक्षतः मैं बोला : "आई मीन बाबा, आज भी आपको कोई भी नौकरी दे देगा, क्योंकि अपने क्षेत्र में आपको इतने सालों का अनुभव जो है। "

बुजुर्ग : " Yes doctor, और इसी वजह से मैं एक वर्कशॉप में काम करता हूँ। 8000 रुपए तनख्वाह मिलती है मुझे। "


मेरी तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। मैं बोला : 

"तो फिर आप यहाँ कैसे ? "

बुजुर्ग : "डॉक्टर, बेटे के जाने के बाद मैंने एक चॉल में एक टीन की छत वाला घर किराए पर लिया। वहाँ मैं और मेरी पत्नी रहते हैं। उसे Paralysis है, उठ बैठ भी नहीं सकती। "

" मैं 10 से 5 नौकरी करता हूँ । शाम 5 से 7 इधर भीख माँगता हूँ और फिर घर जाकर तीनों के लिए खाना बनाता हूँ। "

आश्चर्य से मैंने पूछा : " बाबा, अभी तो आपने बताया कि, घर में आप और आपकी पत्नी हैं। फिर ऐसा क्यों कहा कि, तीनों के लिए खाना बनाते हो ? "

बुजुर्ग : " डॉक्टर, मेरे बचपन में ही मेरी माँ का स्वर्गवास हो गया था। मेरा एक जिगरी दोस्त था, उसकी माँ ने अपने बेटे जैसे ही मुझे भी पाला पोसा। दो साल पहले मेरे उस जिगरी दोस्त का निधन हार्ट अटैक से हो गया तो उसकी 92 साल की माँ को मैं अपने साथ अपने घर ले आया तब से वो भी हमारे साथ ही रहती है। "

मैं अवाक रह गया। इन बाबा का तो खुद का भी हाल बुरा है। पत्नी अपंग है। खुद का एक पाँव नहीं, घरबार भी नहीं, 

जो था वो बेटा बेचकर चला गया, और ये आज भी अपने मित्र की माँ की देखभाल करते हैं। 

कैसे जीवट इंसान हैं ये ?

कुछ देर बाद मैंने समान्य स्वर में पूछा : " बाबा, बेटा आपको रास्ते पर ले आया, ठोकरें खाने को छोड़ गया। आपको गुस्सा नहीं आता उस पर ? "

बुजुर्ग : " No no डॉक्टर, अरे वो सब तो उसी के लिए कमाया था, जो उसी का था, उसने ले लिया। इसमें उसकी गलती कहाँ है ? "

" लेकिन बाबा "--- मैं बोला "लेने का ये कौन सा तरीका हुआ भला ? सब कुछ ले लिया। ये तो लूट हुई। "

" अब आपके यहाँ भीख माँगने का कारण भी मेरी समझ में आ गया है बाबा। आपकी तनख्वाह के 8000 रुपयों में आप तीनों का गुजारा नहीं हो पाता अतः इसीलिए आप यहाँ आते हो। "

बुजुर्ग : " No, you are wrong doctor. 8000 रुपए में मैं सब कुछ मैनेज कर लेता हूँ। लेकिन मेरे मित्र की जो माँ है, उन्हें, डाइबिटीज और ब्लडप्रेशर दोनों हैं। दोनों बीमारियों की दवाई चल रही है उनकी। बस 8000 रुपए में उनकी दवाईयां मैनेज नहीं हो पाती । "

" मैं 2 घंटे यहाँ बैठता हूँ लेकिन भीख में पैसों के अलावा कुछ भी स्वीकार नहीं करता। मेडिकल स्टोर वाला उनकी महीने भर की दवाएँ मुझे उधार दे देता है और यहाँ 2 घंटों में जो भी पैसे मुझे मिलते हैं वो मैं रोज मेडिकल स्टोर वाले को दे देता हूँ। "

मैंने अपलक उन्हें देखा और सोचा, इन बाबा का खुद का बेटा इन्हें छोड़कर चला गया है और ये खुद किसी और की माँ की देखभाल कर रहे हैं।

मैंने बहुत कोशिश की लेकिन खुद की आँखें भर आने से नहीं रोक पाया।

भरे गले से मैंने फिर कहा : "बाबा, किसी दूसरे की माँ के लिए, आप, यहाँ रोज भीख माँगने आते हो ? "

बुजुर्ग : " दूसरे की ? अरे, मेरे बचपन में उन्होंने बहुत कुछ किया मेरे लिए। अब मेरी बारी है। मैंने उन दोनों से कह रखा है कि, 5 से 7 मुझे एक काम और मिला है। "

मैं मुस्कुराया और बोला : " और अगर उन्हें पता लग गया कि, 5 से 7 आप यहाँ भीख माँगते हो, तो ? "

बुजुर्ग : " अरे कैसे पता लगेगा ? दोनों तो बिस्तर पर हैं। मेरी हेल्प के बिना वे करवट तक नहीं बदल पातीं। यहाँ कहाँ पता करने आएँगी.... हा....हा... हा...."

बाबा की बात पर मुझे भी हँसी आई। लेकिन मैं उसे छिपा गया और बोला : " बाबा, अगर मैं आपकी माँ जी को अपनी तरफ से नियमित दवाएँ दूँ तो ठीक रहेगा ना। फिर आपको भीख भी नहीं मांगनी पड़ेगी। "

बुजुर्ग : " No doctor, आप भिखारियों के लिए काम करते हैं। माजी के लिए आप दवाएँ देंगे तो माजी भी तो भिखारी कहलाएंगी। मैं अभी समर्थ हूँ डॉक्टर, उनका बेटा हूँ मैं। मुझे कोई भिखारी कहे तो चलेगा, लेकिन उन्हें भिखारी कहलवाना मुझे मंजूर नहीं। "

" OK Doctor, अब मैं चलता हूँ। घर पहुँचकर अभी खाना भी बनाना है मुझे। "

मैंने निवेदन स्वरूप बाबा का हाथ अपने हाथ में लिया और बोला : " बाबा, भिखारियों का डॉक्टर समझकर नहीं बल्कि अपना बेटा समझकर मेरी दादी के लिए दवाएँ स्वीकार कर लीजिए। "

अपना हाथ छुड़ाकर बाबा बोले : " डॉक्टर, अब इस रिश्ते में मुझे मत बांधो, please, एक गया है, हमें छोड़कर...."

" आज मुझे स्वप्न दिखाकर, कल तुम भी मुझे छोड़ गए तो ? अब सहन करने की मेरी ताकत नहीं रही...."

ऐसा कहकर बाबा ने अपनी बैसाखी सम्हाली। और जाने लगे, और जाते हुए अपना एक हाथ मेरे सिर पर रखा और भर भराई, ममता मयी आवाज में बोले : "अपना ध्यान रखना मेरे बच्चे..."

शब्दों से तो उन्होंने मेरे द्वारा पेश किए गए रिश्ते को ठुकरा दिया था लेकिन मेरे सिर पर रखे उनके हाथ के गर्म स्पर्श ने मुझे बताया कि, मन से उन्होंने इस रिश्ते को स्वीकारा था।

उस पागल कहे जाने वाले मनुष्य के पीठ फेरते ही मेरे हाथ अपने आप प्रणाम की मुद्रा में उनके लिए जुड़ गए।

हमसे भी अधिक दुःखी, अधिक विपरीत परिस्थितियों में जीने वाले ऐसे भी लोग हैं।

हो सकता है इन्हें देख हमें हमारे दु:ख कम प्रतीत हों, और दुनिया को देखने का हमारा नजरिया बदले....

हमेशा अच्छा सोचें, हालात का सामना करे...।

वाट्स एप से साभार

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

क्या वाकई डीजलपेट्रोल बहुत मंहगा हो गया है?

निम्न तथ्यों पर गौर करें....

यदि पिछले 25-30 सालों को याद करें तो मुझे याद है कि वाहन खरीदने से पहले और खरीदने के बाद कहीं जाने के लिये स्कूटर मोटरसाइकिल घर से निकालने से पहले लोग ईंधन के खर्च का हिसाब लगाते थे। और ये खर्च उनकी मासिक आय में से एक बड़ा हिस्सा होता था। इसलिये अक्सर प्लान को बदल देते थे।आज 624 CC की टाटा नैनो कोई नहीं खरीदना चाहता। 1500-1600 CC की ब्रेजा, क्रेटा व उससे भी ज्यादा बड़े इंजन की कारें सड़कों पर ऐसे दिखती हैं जैसे कभी मारुति 800 दिखा करती थीं। किसी को किफायती कारे नहीं चाहिये बल्कि ज्यादा पावर वाली बड़ी कारें चाहियें.... क्यों? 

क्या इसलिये कि पैट्रोल डीजल मंहगा हो रहा है?

80 CC की मोपेड की बजाय विगत वर्षों में 350 व 500 CC की बुलट की संख्या बेतहाशा बढ़ी है.... क्यों?

 क्या इसलिये कि पैट्रोल डीजल लगातार मंहगा हो रहा है?

यदि किसानों की भी बात करूं तो 24 हॉर्स पॉवर के आयशर व 25 हॉर्स पावर के HMT 2511 ट्रैक्टर ही कभी 90% किसान खरीदते थे। ये ट्रैक्टर 30-40 एकड़ तक की खेती को संभालने के लिये पर्याप्त होते थे। लेकिन आज ज्यादातर किसान 45 से 90 हॉर्स पावर तक के ट्रैक्टर खरीदते हैं। 2 एकड़ का मालिक किसान भी बिना बड़े ट्रैक्टर के खेती नहीं करता। हल बैल तो छोड़िए 24-25 हॉर्स पावर के ट्रैक्टर भी गांवों से खेतों से ऐसे गायब हो गए हैं जैसे सड़कों से मोपेड.... क्यों?

 क्या इसलिये कि पैट्रोल डीजल मंहगा हो रहा है?

आपका 17-18 साल का लड़का जिम करने व ट्यूशन के लिये बाइक से जाता है और आप नहीं रोकते। पार्किंग की आफत के बावजूद एक दो km दूर बाजार या सब्जी मंडी तक जाने के लिये भी लोगों को कार चाहिए... क्यों❓

 क्या इसलिये कि पैट्रोल डीजल मंहगा हो गया है?

और बिना कारण के इतना डीजल पैट्रोल फूँकने का क्या प्रभाव पर्यावरण पर पड़ रहा है इससे भी कोई अनजान तो नहीं है।

उपरोक्त सब का कारण क्या ये है कि पैट्रोल डीजल मंहगा हो गया है?

 जी नहीं...उपरोक्त सब का कारण ये है कि लोगों की आय के मुकाबले में डीजल पैट्रोल का कोई मूल्य ही नहीं रह गया है। एक सत्य ये भी है कि इतना डीजल पैट्रोल फूंकना लोगों की जरूरत नहीं बल्कि लक्जरी बन गयी है।

पहले पतली सड़के हुआ करती थीं पर जाम नहीं लगते थे।

👉पर आज सड़कें पहले से संख्या व चौड़ाई में भी ज्यादा हैं पर सड़कों पर जाम रहता है.... क्यों?

 क्या इसलिये कि पैट्रोल डीजल मंहगा हो रहा है❓

हर घर के बाहर गली में खड़ी कारों की वजह से गली में चलना भी दूभर होता है। सोचिये यदि डीजल पैट्रोल आज 10 रुपये लीटर हो जाये तो जाम की स्थिति क्या होगी? क्या सड़कों पर हम चल भी पाएंगे?

मेरी नजर में ये वक्त की मांग है कि इस बढ़ी हुई आमदनी से सरकार को पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को बेहतर बनाने के प्रयास अवश्य करने चाहिएँ। ईंधन का खर्च बढ़ने से इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ भी लोगों का रुझान बढ़ेगा। उससे फायदा ये होगा कि अरब देशों की औकात और पर्यावरण प्रदूषण स्तर..... दोनों लिमिट में आ जाएंगे।

अरविन्द राय की पोस्ट __

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

आखिर क्या होता है क्रिएटिव ब्लॉक

#क्रिएटिव_ब्लॉक :- आत्मविश्वास की कमी, बिना कोशिश किए ही हार मान जाना और जलन की भावना, ईर्ष्या, और खुद को हीन समझना मानसिक रुप से कमजोर व्यक्ति के मुख्य लक्षण होते हैं। ये संकेत बताते हैं कि व्यक्ति मानसिक रुप से कमजोर है। और इसी कमजोरी को हम मनोविज्ञान की भाषा मे क्रिएटिव ब्लॉक कहते है !!

आइए जानते है क्या है ये :-
हर व्यक्ति की मानसिक स्थिति एक जैसी नहीं होती। कुछ लोग मानसिक रुप से कमजोर हो सकते हैं जिससे हम दूसरों से खुद को कमजोर मानते हैं। दिमागी रुप से कमजोर ( ब्लॉक ) होने के कारण आपको अन्य लोगों से अधिक बलिदान और संघर्ष करना पड़ सकता है।
ऐसे में हर रचनात्मक इंसान जीवन में कभी ना कभी क्रिएटिव ब्लॉक से गुजरता है। और फिर उसका कमजोर दिमाग अक्सर बहुत सारी भावनाएं और विचार चलता है जो कि दिमाग को क्रियात्मक सोचने से रोकते हैं। जिससे वो कुछ नया नही कर पाते।
ऐसी कंडीश् में तनाव और नकारात्मकता को दूर करने के लिए लोग रचनात्मक तरीकों का सहारा देते हैं। यह रचनात्मक तरीके पेंटिंग, राइटिंग कुछ भी हो सकता है। मगर कभी-कभी ऐसा होता है कि आप कुछ रचनात्मक करने की बहुत कोशिश करते हैं लेकिन वैसा हो नहीं पाता है जैसा आप सोचते हैं। यह मानसिक रुप से ब्लॉक होने पर होता है जब आप कुछ रचनात्मक नहीं कर पाते हैं। हर क्रिएटिव इंसान इस समस्या से गुजरता है, इस समस्या को क्रिएटिव ब्लॉक कहते हैं।
👉 लक्षण कुछ इस तरह के होते है इनमे :-
1. कंफर्ट जोन से बाहर नहीं आते :- अपनी सुविधाओं के दायरे में रहकर हर व्यक्ति काम करना चाहता है। लेकिन जो व्यक्ति क्रिएटिव ब्लॉक से गुजर रहा होता है वह अपने कंफर्ट ज़ोन से कभी भी बाहर आकर काम नहीं करना चाहता है। ऐसे लोग अक्सर कोई भी नई जिम्मेदारी आने से बेहद घबरा जाते हैं।
2. आसानी से हार मान जाते हैं :- परिस्थितियों से हार मानना मानसिक रुप से कमजोर होने की निशानी होती है। जो लोग मानसिक रुप से क्रिएटिव ब्लॉक होते हैं वे जीतने के लिए लड़ नहीं सकते और आसानी से हार मान जाते हैं।
3. दूसरों की सफलता से जलते हैं :- मानसिक रुप से मजबूत लोग दूसरों की सफलता से जलते हैं। लेकिन खुद सफल होने की कोशिश नहीं करते हैं। लगातार दूसरों को सफल और खुद को कम आंकना भी मानसिक रुप से क्रिएटिव ब्लॉक लोगों की निशानी होती है।
4. भरोसे की कमी :- खुद पर भरोसा ना होने के कारण आप आत्म-निर्भर नहीं बन सकते हैं। इससे आप अपने लक्ष्यों की प्राप्ति से अवरोधित हो जाते हैं। क्रिएटिव ब्लॉक में व्यक्ति खुद पर भरोसा नहीं करते और अक्सर हर काम से डरते रहते हैं। खुद पर यह संदेह ही उन्हें असफलता की ओर ले जाता है।
5. प्रतिस्पर्धा से दूर रहना :- जीत-हार जीवन का हिस्सा है। लेकिन अगर आप परीक्षा से ही डर जाएंगें तो सफल होने की कोई गुंजाईश ही नहीं रह जाती है। ऐसे लोग हार जाने के डर से किसी भी प्रतिस्पर्धा में भाग ही नहीं लेते और खुद को आगे बढ़ने का मौका नहीं देते हैं।
👉 करे स्वस्थ मन का निर्माण और मिटाएँ अपना ब्लॉक :-
★ कुछ नया करने की कोशिश करें :- जब आप खुद पर कुछ रचनात्मक करने के लिए दबाव डालते हैं तो आप अपने तनाव को बढ़ा रहे होते हें। इस समस्या को दूर करने के सबसे आसान तरीका कुछ नया करना है। जब आप कुछ नया करने की सोचते हैं तो आपका दिमाग डाइवर्ट हो जाता है जिससे तनाव दूर होता है। एक बार जब तनाव चला जाता है तो आपको कुछ रचनात्मक करने में दिक्कत नहीं होती है।
★ दूसरों के क्रिएटिव वर्जन को फॉलो करें :- आपकी रचनात्मक चीजों को सबको दिखाना जरुरी होता है। कुछ रचनात्मक करने के साथ बाकि लोगों की रचना को देखने के लिए भी समय निकालें। यह आपको प्रेरित करने में मदद करते हैं।
★ परिणाम पर ध्यान ना दें :- बहुत से लोगों के क्रिएटिव ब्लॉक होने के पीछे का कारण किसी भी रचना का परिणाम सोचना होता है। वह रचना करते समय आनंद लेने की बजाय परिणाम के बारे में सोचकर परेशान होते रहते हैं। रचना करना आपको खुशी देता है ना कि तनाव देना इसलिए रचना करने की प्रक्रिया को तनावपूर्ण बनाने की बजाय छोटी-छोटी चीजों का आनंद लें।
★ ट्रेवल करें :- रोज के काम में आप इतने फंसे रहते हैं कि कुछ भी रचनात्मक करने के लिए प्रेरित नहीं हो पाते हैं। इसके लिए सबसे अच्छा तरीका अपने रोज के रुटीन से बाहर आकर ट्रेवल करें। अगर आप कहीं दूर घूमने नहीं जा सकते हैं तो 1 घंटे घुमना भी काफी होता है।
★ सीमाओं से बाहर आएं :- रचनात्मक होने के लिए अपनी सीमाओं से बाहर जाने में हिचके नहीं। आप जितना नया सोचते हैं वह रचनात्मक काम करने में मदद करते हैं।
सुश्री मोनिका जौहरी (विवेक गुप्ता की वॉल से)