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रविवार, 1 सितंबर 2024

राधा काबर नइ जलही मुरली/मोबाइल से

 सुनो भाई उधो

-परमानंद वर्मा

राधा क्यों न जले मुरली से... वह जान गई थी, कान्हा की चाल को, मुरली की आड़ में वह क्या गुल खिला रहा है। चतुर सुजान औरतें भांप लेती हैं अपने मर्दों के हाव-भाव, चाल और रंगत को देखकर। दिन-रात मुरली को अधरों से लगाए रहना...। आशंका सही साबित हुई, इस मुरली ने उसके लिए नइ मुसीबत खड़ी कर दी थी, आखिर जिसकी आशंका थी, वह सच हुआ। एक दिन उसने उन्हें पटरानी बनाकर ला दिया, रुखमणि को आज वही संकट ला खड़ा किया है मोबाइल ने। क्या स्त्री, क्या पुरुष, क्या जवान, क्या बाल-बच्चे, बहू, बेटियां और दो-तीन बच्चों वाली युवतियां भी घरों को छोड़-छोड़कर भाग रही हैं अपने प्रेमियों के साथ। संकट चहुं ओर है, मान-मर्यादा, लाज-शरम, नाक-कान सब कटा डाल रहे हैं। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह आलेख...

चाय, नाश्ता ला टेबल मं रख दीस, तहां ले आगू मं रखे खुरसी मं हमर इहां के मंडलीन सोनकुंवर फइसकरा के बइठगे। मुड़ी ला आज ओ का के सेती मुंड़मिंजनी माटी मं मिंजे रिहिसे, ओ बात ला बताय के लइक नइहे, ओला उही मन जानथे। 

अब आघू मं बइठे हे तब बने सोचत रेहेंव, कुछु खास बात होही, गोठियाही-बताही, फेर थोरकिन मं नागिन कस रूप धरत देखेंव तहां ले डर्रागेंव। सोचेंव, का होगे भगवान? ओ दिन भगवंतीन गउंटनीन संग गोठियावत-बतावत देख ले रिहिसे, तेकरे रीस ला तो आज नइ उतारही?

थोरकिन मं रिच्छिन बनगे, मइनता भड़कगे। तमतमावत पूछथे- कस जी, तंय ओ रात-रातभर मोबाइल चलावत रहिथस, का देखत रहिथस?

सोनकुंवर के बात ला सुन के सुकुरदुम हो गेंव,‌ ठाड़ सुखागेंव। लम्बा सांस भरत मने मन केहेंव- चल बाचगेंव, भगवंतीन गउंटनीन के लफड़ा ले। डर्रागे रेहेंव, आज ये मोर मुड़ी ऊपर पथरा तो नइ कचार के रइही?

चाय जुड़ावय झन कहिके ओला लकर-धकर पियेंव, नाश्ता ल पाछू कर लेहौं सोचके छोड़ देंव। 

केहेंव सोनकुंवर तोर बर चाय नइ लानेस?

चुंदी ला झटकारत अउ हलू-हलू ओकर ऊपर हाथ फेरत राहय। मोर सवाल के जवाब देना ओ गोसइन जरूरी नइ समझिस, अउ बिच्छी मारे असन फेर पूछथे- तोला पूछे हौं मोबाइल मं रात-रातभर का देखथस तेकर जवाब नइ देवत हस?

बताएंव- अरे भई समाचार देखथौं देश-दुनिया के, गीत-भजन अउ प्रवचन सुनथौं। अरे का जया किशोरी कइसन सुंदर हे ओकर रंग-रूप, मोहनी मूरत। ओ हांसथे ते अइसे लगथे ते अमरित झरत हे ओकर मुंह ले। 

ओला अउ बताथौं- अरे ओ प्रदीप मिश्रा हे ना, सिहोर वाले, कतेक सुग्घर शिवपुरान के कथा सुनाथे। चलबो का अभी भिलाई मं होवत हे। ओ पइत अमलेशर मं होइस ता बाप रे, पांच लाख के भीड़ जुरियाय रिहिसे प्रवचन सुने ला। अब तो कहां गय सुधांशु महाराज, ऋतंभरा अउ उमा भारती‌‌‍? ओकर मन के नांवे अब सुनब मं नइ आवय। 

सोनकुंवर फेर जोर से अपन गीला चुंदी ल झटकारथे तब पानी छरिया के अखबार, नाश्ता अउ मोरो कुरता मं पर जथे। खिसियायेंव- देख के चुंदी ला झटकार न।

खिसिया झन, गुर्रा झन कुकुर असन। जतका तैं जयाकिशोरी, प्रदीप मिश्रा, अउ काकर-काकर प्रवचन के बात लमियाय हस न तउन मन नोहय, मोर सवाल के जवाब। मोर सवाल हे, मोबाइल मं तैं रात-रात भर का देखत रहिथस?

माथा तो मोरो ठनकगे, एक मन होइस- एला बजेड़ दौं, दोहन दौं, हकन दौं का, एके घौं मं घुसड़ जही कतका मुंहबाज हे तउन हा? डौकी हे तब एमन ला डौकी असन रहना चाही। का मंथरा असन गुप्तचरी करही मरद मन के?

सोनकुंवर कहिथे- तैं का बताबे, मैं बतावत हौं तोला। ओ मोबाइल मं फेसबुक अउ यू-ट्यूब मं ओ बिगड़ैल वेश्या, छिनार, रांडी, सबखही मन ल देखथौ, ओकर सकल करम ला देखथौ। बेटी, बहिनी, बहू सब उकरे चरित्तर ला देख-देख के बिगड़त जात हे। 

ओहर बताथे- मोला तैं प्रवचन, भजन, गीता अउ समाचार सुनथौं कहिके भुलवारत हस, एकर आड़ मं ओ रांड़ मन के अनफभक अउ गंदा-गंदा फोटो ला देखथस। मैं मरगे हौं का तोर बर, तोर मन नइ बुतावत हे मोर से ते दूसर बाई बना के ले आ, तोला कुछु नइ कइहौं, फेर ये मोबाइल के रांडी, किरही मन ला झन देख। सब बेटी, बहिनी, बहू अउ गोसइन बिगड़त हे। दो-दो, तीन-तीन झन लइकोरी महतारी मन भाग-भाग के जाथे। घर-परिवार बिगाड़त हे ये मोबाइल हा। 

सोनकुंवर के सरलग फायरिंग ले घायल होय बिगन नइ रहि सकेंव। ओहर पूछथे- ये मोबाइल ला कोन नइ देखय। मंत्री, नेता, सन्यासी, महात्मा अऊ नौकरशाह, उद्योगपति, व्यापारी, जज, वकील, मास्टर, पटवारी, बहू-बेटा। का ककरो आंखी मं नइ दीखत होही कइसन अलकरहा-अलकरहा नइ देखे लेइक जउन चीज हे, गंदा-गंदा अंग प्रदर्शन देखाथे, सरकार एकर ऊपर प्रतिबंध काबर नइ लगावय। काबर अश्लीलता ला मोबाइल के जरिये समाज ला परोसत हे?

मंय निरुत्तर होगेंव सोनकुंवर के आगू मं। बात तो ओहर सोलह आना सही कहिस हे। अब देखे बर तो ओला सबो झन देखत हे, अब कानून अउ बेवस्था के सवाल हे। एला सरकारे हा कुछ कर सकत हे, अदालत घला संज्ञान लेके कानूनी कार्रवाई कर सकत हे, फेर अभी तक कोनो अइसन कदम नइ उठाय हे। सामाजिक संगठन, धार्मिक नेता मन घला कुछु कर सकत हे। फेर सबके मुंह काबर सिलाय हे भई, इही समझ नइ आवत हे। 

सोनकुंवर तो पथरा कचार के चल दीस, मुंह ला फुलाय-फुलाय। ओ जान डरे रिहिसे एहर का देखत रहिथे रात-रात भर कइके। एक दिन मौका पइस तब गुस्सा ला उछर दीस। अइसे लगिस, जइसे मोरो डौका तो नइ बिगड़ जही अउ कोनो रांड़ी ला धर के नइ भाग जाही?

नाश्ता टेबल मं रखे-रखे जुड़ागे रिहिसे। ओला हुदकरायेंव- ए सोनकुंवर, सुन तो ओ।

मरगे हे तोर सोनकुंवर आज ले, 

जा उही राड़ी मन करा तहू हा काहत चल दीस।


जाती बिराती 

सब मातगे हे मातगे हे मातगे हे रे,

भांग धतूरा खा पी के

सब मातगे मातगे हे मातगे रे,


सब टुरी टुरा अउ जवान,

का डौकी डौका ले बे,

ते का डोकरी अउ डोकरा,

सब मातगे हे मातगे हे मातगे रे,

का दुआपर के मुरली ला लेबे,

तब का कलजुग के मोबाइल,

राधा के जघा मं रुखमनि आगे,

तब कलजुग मं उढरिया लाने,

बात आंखी आंखी के खेल हे,

सब मातगे हे मातगे हे मातगे रे,

डौका पर के डौकी ले भागत हे,

त डौकी पर के डौका ले उडावत हे,

का समे आगे हे राम,

मातगे हे मातगे हे मातगे हे रे,

ये मुरली अउ मोबाइल, 

कोनो ला.कहूं के नइ रखिस राम,

ओ जुग मं राधा रोवत रहिगे,

कलजुग मं बारा हाल होवत हे राम,

सब मातगे हे मातगे हे मातगे हे रे।।

-डॉ. महेश परिमल, भोपाल

सोमवार, 14 अगस्त 2023

कलजुगी सूर्पनखा मन के छतरंगी चाल

 सुनो भाई उधो .....

 छोटे बच्चे जब भूख से छटपटाते हैं, तिलमिलाते हैं और रोते-गाते हैं तब मां-बहनें दौड़कर आती हैं उनके पास। पूछती है -भूख लगी है ? तब दूध पिलाती हैं, खाना खिलाती हैं तब बच्चे शांत हो जाते हैं, मंद-मंद मुस्कुराने लगते हैं धीरे से झपकी आने के बाद सो भी जाते हैं। लेकिन इन माताओं की कौन-सी ऐसी भूख है जो उनके सिर चढ़कर सताने व परेशान करने लगी है, शैतानों की तरह वे भरा-पूरा परिवार छोड़कर 'पर पुरुष प्यारा लगे के तर्ज पर पंछियों की भांति उड़-उड़कर उनके घोंसले में जाकर चोंच लड़ाने लगी है। उनके बांहों में समा जाने के लिए बेताब हो रही हैं। इधर पति महोदय गण 'दो हंसों का जोड़ा बिछुड़ गयो रे, गजब भयो राम जुलूम भयो रे गाना गा-गाकर पत्नियों की याद में आंसू बहा रहे हैं और 'सारी-सारी रातें तेरी याद सताए गाना गुन-गुनाकर करवटें बदल रहे हैं। अब इन पंछियों का भी भरोसा नहीं, मर्दों का विश्वास उठने लगा है। पंछियां भी गुनगुनाने लगी है- 'चल उड़ जा रहे पंछी के अब ये देश हुआ बेगाना। 

अभी-अभी टेलीविजन अउ इंटरनेट मं खबर आवत हे के जब ले सावन लगे हे पेड़ मं राहय तउन पंछी मन भर-भरले उड़ा-उड़ा के ये  देश ले वो देश, ये शहर ले ओ शहर, ये गांव ले ओ गांव जा-जा के खुसरत (घुसना) जात हे। पता चले हे के ओ पंछी मन ला एक ठन कोरोना जइसे दूसर किसम के भयंकर रोग लग गे हे। ओ मन छटपटावत हे, जी-मिचलावत हे। ओ पंछी कोनो दूसर नहीं हमरे बहिनी-बेटी, बहू, गोसइन अउ दाई-महतारी हे। सब अपन घर गोसइयां, बेटा-बेटी, दाई-ददा, सास-ससुर ल छोड़-छोड़ के भागत हें अउ दूसर मरद संग रंगरेली मनावत हे। सबके नाक-कान काटत हें अउ खुदे नकटी बनत जात हे। 

पांच लइका के महतारी सेठइन ओं दिन सोना, चांदी, रुपया-पइसा ल धरके एक झन टरक वाले संग बेंगलूर भाग गे। मुंबई के डॉक्टरीन कुली संग बिहाव कर लिस। दिल्ली, कलकत्ता, लखनऊ, पटना, भोपाल अउ रायपुर में कोनो जगह नइ बांचे हे जिहां दस-दस, बीस-बीस साल पति संग जीवन गुजारे बेटी, बहू, बहिनी, अउ गोसइन मन ला का अइसे चांटी चाबत हे, कीरा काटत हे के उढ़रिया भागे असन पर मरद के बांह पकड़त हे। जब तरिया के पानी मतलाहा  (गंदा) हो जथे, तब मछरी मन उफला जथे, उमिहा जथे, जेने-पाय तेने कोतो रेंगे ले धर लेथे उही हाल अब होगे हे एकर मन के। 

इही सब बात ल एक दिन समारू अपन कका ल बतावत कहिथे- समय के धार तलवार ले घला जादा घातक होथे कका, एके बार मं सामने वाला के घेंच (गला) भुइयां मं गिरत देरी नइ लगय, पानी नइ मांग सकय, वारा-न्यारा हो जथे। 

भगेला पूछथे- सुने तो हौं बेटा फेर अइसन मउका के अभेडा  मन नइ परै हौं न तेकर सेती ओकर रस-कस ल नइ पाय हौं।

समारू अपन कका भगेला ला कहिथे- ठउका काहत हस कका, 'अपन मरे बिगन सरग नइ दीखय। जइसे अंधियार मं डोरी ल सांप समझथन फेर ओहर सांप नहीं डोरी होथे, सांप के अभेडा मं कहूं कोनो परही तब ओकर तीर मं कोनो ठहर सकत हे का?

तोर बात ल समझ नइ सकत हौं बेटा, तैं जउन कथा सुनाय ले जाथस तेकर कुछु ओर-छोर ल बताबे  के बाते-बात मं बेंझा के रख देबे?

अब तोला का बतावौं भगेला कका, जउन कथा तोला बताये बर जाथौं न, ओहर न शिव पुराण मं हे, न पद्म पुराण मं हे अउ गरुड़ पुराण मं। काग भुसुंडी, भारद्वाज, तुलसीदास, वैशम्पायन मुनि अउ न भगवान किसन घला अरजुन ल नइ सुनाय हे तइसन कथा तोला आज सुनाय ले जाथौं। 

भगेला पूछथे- तब कस रे समारू, तैं जउन कथा सुनाय ले जाथस तउन कथा ल कोन पुराण मं पढ़, सुन डरे हस रे?

हांसत समारू ह कहिथे- अभी-अभी ताजा अउ नवा पुराण सीता प्रेस जोधपुर ले छप के आय हे। एक लाख प्रति छपे हे। सब शहर मन के बुक स्टाल मं धड़ाधड़ बिकत हे। उदूक ले मोरो हाथ लग गे, एक ले बढ़के एक सुंदर कथा हे। ओला पढ़बे न, तब तहूं ह काकी ल सुनाय बिगन नइ रहि सकबे। 

अनेक सुंदर कथा हे ओ पुराण मं? तब भगेला कका पूछथे- तब ओ पुराण के का नांव हे बेटा समारू?

-ओकर नांव 'कलियुग पुराणÓ हे कका। समारू बताथे- काहत तो हौं न जइसे पहिली गुलशन नंदा के उपन्यास छपय तइसे ये 'कलियुग पुराणÓ बताथे, हाथों हाथ बिक गे। ओकर दूसर संस्करण छपे के तइयारी चलत हे। 

भगेला पूछथे- तब ये पुराण के कथा मन तो लगथे गजबे के सुंदर होही, तब एहा नोनी, बहू-बेटी अउ गोसइन मन के लइक हे के नहीं?

अरे काला कहिबे कका, उही मन तो जादा खरीदत हें, ओमन जादा कथा परेमी हे न। समारू कहिथे- देखस नहीं का शिव पुराण, भागवत पुराण, गरुड़ पुराण अउ जइसनों पुराण होवय तिहा उही माई लोगिन मन के संख्या जादा रहिथे, रहिथे के नहीं?

भगेला कहिथे- बात तो  सोलह आना सही बतावत हस बेटा 'फेर ले ना, ये कलियुग पुराण के एकाद ठन  कथा सुना न, घर जाहूं त तोर काकी ल घला सुनाहूं। अउ बनही ते एक ठन 'कलियुग पुराण मोरो बर बिसा के ले आनबे बेटा। 

समारू कलियुग पुराण सुनाय के पहिली गुरु वंदना करत ये दे इसलोक के उच्चारण करथे- 'गुरु ब्रम्हा, गुरु बिसनु, गुरु देवो महेश्वरा, गुरु: साक्षात पर ब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नम: ओकर बाद गनेश जी अउ सरसती देवी के वंदना करत उकरो मन के इसलोक के पाठ घला करथे। 

कका पूछथे- वाह बेटा, गजब के गियानी, धियानी लगथस रे, तैं हो न, अपन ददा ऊपर गेहस तइसे लगथे? समारू कहिथे- तुंहरे असन सियानहा मन के आशीर्वाद ल पाय हौं कका।

अब मेंहर जया किशोरी, पंडित प्रदीप मिश्रा अउ बागेश्वर धाम के धीरेन्द्रकृष्ण शास्त्री  के स्टाइल में तो नइ सुना सकौं कका, मोला ओ हाथ मटका-मटका के, मुसकुरा-गुरकुरा के नचकाहा, जोकर मन असन पल्लू ल मुंह मं ढाक के हे 'नइ आवय जइसे मुरारी बापू अउ सुधांशु सादा सरबदा कहिथे न तुलसी दास, काग भुसुंडी, भरद्वाज असन उही स्टाइल मं सुनावत हौं, बने धियान देके सुन

एक घौं के बात हे कका, वैशम्पायन मुनि राजा जन्मेजय ल कलियुग पुराण के कथा सुनावत बताय रिहिसे के कलिजुग कइसे, कोन डहर ले अउ काकर ऊपर पहिली आइस हे।

वैशम्पायन मुनि बताइस- राजा सबसे पहिली कलिजुग भारत देश मं तोर ददा (पिता- परीक्षित) के मुड़ी ऊपर आइस, एकरे बाद पूरा संसार मं ओहर पांव पसार डरिस। अब तो ओहर कालिया नाग बनके सब ल डसत हे। 

भगेला पूछथे- बेटा समारू, कालिया नाग तो जमुना नदी के रिहिसे, देश अउ संसार मं कइसे ओकर  आतंक बगरगे, बने फोर के के बता ना। 

सुन कका, अब असली कथा ला, सुन समारू भगेला ल बतावत कहिथे- अरे कका- कलियुग तो अब घर-घर मंं खुसरगे हे, बेटी-बहू, बहिनी- दाई-माई सबके मति ला भरमावत हे, छारियावत हे। 

कइसे तोर केहे के का मतलब हे, तैं कहना का चाहत हस? समारू अपन कका भगेला ल धीरज बंधावत कहिथे- सुन, इही कथा ल तो अब शुरूआत करे ले जाथौं।

ओहर बताथे- एला तो तैं जानत हस के नहीं, पहिली के राजा-महाराजा, नवाब, पूंजीपति, मालगुजार  मन कइसे दूसर के बहू, बेटी, मन ल भगा के लानय, गोसइन बना लै, रखैल राख ले, एक नहीं दस-दस...।

सही काहत हौं नहीं? भगेला जवाब देवत कहिथे- बात तो तोर सोलह आना सही हे बेटा। 

समारू बताथे- अब पासा पलटगे हे, जमाना बदलगे हे अउ तेजी से बदलत जात हे। 

एकर तोर करा कोनो परमान हे, के बस हवा मं सांय... सांय... तीर मारत हस? भगेला पूछथे।

समारू कहिथे- 'हाथ कंगन ल आरसी का, एक नई दू ठो परमान देवत हव कका 'अभी ओ दिन पाकिस्तान के सीमा हैदर नांव के एक झन मोटियारी, चार-चार लइका के महतारी तउन ल अपन देश अउ लइका मन ल छोड़ के सात समुंदर पार करके अपन परेमी करा आके बिहाव कर डरिस। मुसलिम औरत हिन्दू बनगे, मांग मं सिंदूर, हाथ मं चूड़ी अउ बने साड़ी, पोलका पहिन के राहत हे। बाद मं मीडिया वाले मन जानिन तब ओकर पीछू परगे हे।

कलियुग पुराण के दूसर अध्याय ले कथा सुनावत हौं, भारत के अंजू नांव के बाई अपन बिहाता ल छोड़के पाकिस्तान जाके नसरूल्लाह संग निकाह कर लिस। अउ सुन कका- ये तोरे शहर के बात सुनावत हौं- एक झन बंगाली बाई हा घला अइसने एक झन बेटा ला छोड़ के दूसर संग रेहे ले चल दीस। ओकर सास-ससुर अब बहुत परेशान हे। 

ये तो अड़बड़, गड़बड़ झाला हे बेटा, ए सब कइसे होवत हे। समारू बताथे- ये सब तो कलजुग पुराण मं लिखाय हे कका। ओ दिन एक गांव के बेटी, शादी-शुदा हे, जगदलपुर मं ओकर नौकरी लगे हे, उहां दूसर संग शादी कर लिस। जब ओकर दाई-ददा मन जाके देखिन तब घर मं शराब के बोतल, सिगरेट पीयत देखके सब दंग रहिगे। 

अउ सुन कका- जया किशोरी के कथा अउ गुलशन  नंदा के उपन्यास घला एकर आगू मं फीका हे। एक गांव के मस्टरीन, बने खाता-पीता घर के बेटी अउ बहू, कोनो चीज-बस, रुपया कौड़ी के कोनो कमी नइहे तेकर मसमोटी ल देख, चार बेटी-बेटा ला छोड़ के आन जात के पियार मं पागल होगे, तलाक ले लिस, अइसने कस दसो ठन मामला रोज सुने मं आवत हे। 

समारू बताथे- अइसन हाल अपने गांव, अपने देश भर मं नइ होवत हे पूरा संसार भर के होवत हे लगथे, बहिनी, बेटी, बहू, दाई-माई मन चरस, हेरोइन, धतूरा, नइते भांग खा-पी ले हे तइसे लगथे। 

समारू कहिथे- अरे कका, पढ़े-लिखे, नौकरी लगे, लिव इन रिलेशनशिप, टीवी सीरियल, मॉल, होटल, क्लब और फिलिम के कमाल हे। सब पुराण फेल हे ये कलियुग पुराण के आघू मं। 

भगेला कहिथे- अंधेर होवत हे बेटा, झन सुना अब अइसन कथा, मोर माथा चकरावत हे। 

सुन कका, एक ठन आखिरी कथा सुनके कलिजुग पुराण के पुरनाहुति करत हौं।

तब सुन- एक झन चीनी महिला हे, अपन ब्वायफ्रेंड ऊपर अतेक मोहागे होगे के जउन बैंक मं ओहर काम करत रिहिसे हे तिहां ले पांच करोड़ रुपिया चोरा लिस सिरिफ एकर सेती के ओकर ऊपर काला जादू करके ओला अपन वश में करके रखिहौं। ओ परेमी थोकन नखरा देखावत रिहिसे। तंत्र-मंत्र, गुरु बाबा सब करा ले आन लाइन सेवा लेवत रिहिसे। 

कका कहिथे- बस... बंद कर बेटा, ये पुराण ल सुनके तो मैं पागल हौं जाहौं। 

समारू कहिथे- तै का पूरा घर परिवार, समाज, देश अउ संसार पागल होवत हे कका, ये महारोग झपागे हे, ये तो कोरोना ले अउ बढ़के बड़े रोग आगे हे। ए रोग ह कइसे ठीक होही तेला सुप्रीम कोर्ट के जज मन जाने, डॉक्टर मन जानय। 

आखिर मं टिमोली (मजाक) लगावत समारू कहिथे- सुन कका, तोला ये नकटी-नकटा मन के ऊपर एक ठन गाना सुनावत हौं, मजेदार हे-

मैं बिलासपुरहिन अउ तैं रायगढ़िया। 

तोर मोर जोड़ी फभे हे कतेक बढ़िया।।

-परमानंद वर्मा


गुरुवार, 5 मई 2022

" अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है "

वर्ष 1979 में जाधव 10 वीं की परीक्षा देने के बाद अपने गाँव में ब्रह्मपुत्र नदी के बाढ़ का पानी उतरने पर इसके बरसाती भीगे रेतीले तट पर घूम रहे थे।

तभी उनकी नजर लगभग 100 मृत सांपों के विशाल गुच्छे पर पड़ी। आगे बढ़ते गए तो पूरा नदी का किनारा मरे हुए जीव जन्तुओं से अटा पड़ा एक मरघट सा था। मृत जानवरों के शव के कारण पैर रखने की जगह नही थी। इस दर्दनाक सामूहिक निर्दोष मौत के दृश्य ने जाधव के किशोर मन को झकझोर दिया।
हज़ारो की संख्या में निर्जीव जीव जन्तुओ की निस्तेज फटी मुर्दा आँखों ने जाधव को कई रात सोने न दिया। गाँव के ही एक आदमी ने चर्चा के दौरान विचलित जाधव से कहा जब पेड़ पौधे ही नही उग रहे हैं, तो नदी के रेतीले तटों पर जानवरों को बाढ़ से बचने का आश्रय कहाँ मिले? जंगलों के बिना इन्हें भोजन कैसे मिले? बात जाधव के मन में पत्थर की लकीर बन गयी कि जानवरों को बचाने पेड़ पौधे लगाने होंगे।
50 बीज और 25 बांस के पेड़ लिए 16 साल का जाधव पहुंच गया नदी के रेतीले किनारे पर रोपने। ये आज से 35 साल पुरानी बात है। उस दिन का दिन था और आज का दिन, क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि इन 35 सालों में जाधव ने 1360 एकड़ का जंगल बिना किसी सरकारी मदद के लगा डाला।
क्या आप भरोसा करेंगे कि एक अकेले आदमी के लगाये जंगल में 5 बंगाल टाइगर,100 से ज्यादा हिरन, जंगली सुअर, 150 जंगली हाथियों का झुण्ड, गेंडे और अनेक जंगली पशु घूम रहे हैं, अरे हाँ सांप भी जिसने इस अद्भुत नायक को जन्म दिया।
जंगलों का क्षेत्रफल बढ़ाने सुबह 9 बजे से पांच किलोमीटर साइकल से जाने के बाद, नदी पार करते और दूसरी तरफ वृक्षारोपण कर फिर सांझ ढले नदी पार कर साइकल से 5 किलोमीटर तय कर घर पहुँचते। इनके लगाये पेड़ो में कटहल, गुलमोहर, अन्नानाश, बांस, साल, सागौन, सीताफल, आम, बरगद, शहतूत, जामुन, आडू और कई औषधीय पौधे हैं। लेकिन सबसे आश्चर्यजनक और दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि इस असम्भव को सत्य कर दिखाने वाले साधक से महज़ पांच साल पहले तक देश अनजान था।
यह लौहपुरुष अपने धुन में अकेला आसाम के जंगलो में साइकिल में पौधो से भरा एक थैला लिए अपने बनाए जंगल में गुमनाम सफर कर रहा था। सबसे पहले वर्ष 2010 में देश की नजर में आये जब वाइल्ड फोटोग्राफर “जीतू कलिता” ने इन पर डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाई “The Molai Forest” यह फिल्म देश के नामी विश्वविद्यालयों में दिखाई गयी। दूसरी फिल्म आरती श्रीवास्तव की “Foresting Life” जिसमें जाधव की जिन्दगी के अनछुए पहलुओं और परेशानियों को दिखाया। तीसरी फिल्म “Forest Man” जो विदेशी फिल्म महोत्सव में भी काफी सराही गई।
एक अकेले व्यक्ति ने वन विभाग की मदद के बिना, किसी सरकारी आर्थिक सहायता के बगैर इतने पिछड़े इलाके से कि जिसके पास पहचान पत्र के रूप में “राशन कार्ड” तक नहीं है, ने हज़ारो एकड़ में फैला पूरा जंगल खड़ा कर दिया। जानने वाले सकते में आ गए उनके नाम पर आसाम के इन जंगलो को “मिशिंग जंगल” कहते हैं (जाधव आसाम की मिशिंग जनजाति से हैं)। जीवन यापन करने के लिए इन्होने गाय पाल रखी हैं। शेरों द्वारा आजीविका के साधन उनके पालतू पशुओं को खा जाने के बाद भी जंगली जानवरों के प्रति इनकी करुणा कम न हुई। शेरों ने मेरा नुकसान किया क्योंकि वो अपनी भूख मिटाने के लिए खेती करना नहीं जानते।
आप जंगल नष्ट करोगे वो आपको नष्ट करेंगे। एक साल पहले महामहिम “राष्ट्रपति” द्वारा देश के चतुर्थ सर्वोच्च नागरिक सम्मान “पद्मश्री” से अलंकृत होने वाले जाधव आज भी आसाम में बांस के बने एक कमरे के छोटे से कच्चे झोपड़े में अपनी पुरानी में दिनचर्या लीन हैं। तमाम सरकारी प्रयासों, वृक्षारोपण के नाम पर लाखो रुपये के पौधों की खरीदी करके भी ये पर्यावरण, वन-विभाग वो मुकाम हासिल न कर पाये जो एक अकेले की इच्छाशक्ति ने कर दिखाया। साइकिल पर जंगली पगडंडियों में पौधों से भरे झोले और कुदाल के साथ हरी-भरी प्रकृति की अनवरत साधना में ये निस्वार्थ पुजारी।
कभी कभी “अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है।”
(सुदीप शुक्ला की वॉल से साभार)

गुरुवार, 27 जनवरी 2022

शब्दों का संसार

 

शब्द रचे जाते हैं,

शब्द गढ़े जाते हैं,

शब्द मढ़े जाते हैं,

शब्द लिखे जाते हैं,

शब्द पढ़े जाते हैं,

शब्द बोले जाते हैं,

शब्द

तौले जाते हैं,

शब्द टटोले जाते हैं,

शब्द खंगाले जाते हैं,

#अंततः

शब्द बनते हैं,

शब्द

संवरते हैं,

शब्द सुधरते हैं,

शब्द निखरते हैं,

शब्द हंसाते हैं,

शब्द मनाते हैं,

शब्द

रूलाते हैं,

शब्द मुस्कुराते हैं,

शब्द खिलखिलाते हैं,

शब्द गुदगुदाते हैं,

शब्द मुखर हो

जाते हैं,

शब्द प्रखर हो जाते हैं,

शब्द मधुर हो जाते हैं,

फिर भी-

शब्द चुभते हैं,

शब्द

बिकते हैं,

शब्द रूठते हैं,

शब्द घाव देते हैं,

शब्द ताव देते हैं,

शब्द लड़ते हैं,

शब्द

झगड़ते हैं,

शब्द बिगड़ते हैं,

शब्द बिखरते हैं

शब्द सिहरते हैं,

#किंतु-

शब्द मरते

नहीं,

शब्द थकते नहीं,

शब्द रुकते नहीं,

शब्द चूकते नहीं,

अतएव-

शब्दों से खेले

नहीं,

बिन सोचे बोले नहीं,

शब्दों को मान दें,

शब्दों को सम्मान दें,

शब्दों पर ध्यान

दें,

शब्दों को पहचान दें,

ऊँची लंबी उड़ान दे,

शब्दों को आत्मसात करें...

उनसे उनकी

बात करें,

शब्दों का अविष्कार करें...

गहन सार्थक विचार करें,

क्योंकि-

शब्द

अनमोल हैं...

ज़ुबाँ से निकले बोल हैं,

शब्दों में धार होती है,

शब्दों की महिमा अपार होती है

शब्दों का विशाल भंडार होता है,

और सच तो यह है कि-

शब्दों का अपना

एक संसार होता है

बुधवार, 9 जून 2021

सभी धर्मो के ग्रंथों में पर्यावरण का उल्लेख




कुरान में 485 बार प्रकृति का जिक्र, गुरुग्रंथ साहिब के पहले श्लोक में ही ग्लोबल वार्मिंग का समाधान, जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों के नाम से 24 पौधे कोरोनाकाल में सांसों पर छाया संकट अभी दूर नहीं हुआ है। दवा, दुआ और प्रार्थना के दौर के बीच यह सत्य भी एक बार फिर उभरकर सामने आ चुका है कि हमें अपने प्राण बचाने के लिए प्राणवायु अर्थात ऑक्सीजन की कितनी जरूरत है। इस प्राणवायु का शुद्ध होना भी जरूरी है, ताकि हमारे फेफड़े भी पाक-साफ रहे। 

कैसी विडंबना है कि हम जिस परमात्मा और रब से प्राणों की रक्षा के लिए गुहार लगाते हैं, उसकी कही बातों पर ही अमल नहीं करते। ऐसा कोई धर्म नहीं है, जिसके ग्रंथों और देवी-देवताओं से लेकर पैगंबर और तीर्थंकर तक ने प्रकृति व पर्यावरण सुरक्षा और संरक्षण का संदेश न दिया हो। गीता में प्रकृति के साथ अभेद को व्यक्त करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं- “अश्वथ सर्ववृक्षाणां” अर्थात वृक्षों में वह अपने को पीपल बतलाते हैं। सनातन धर्म में तो पेड़ और पर्वतों की पूजा का विधान है। रामायणकालीन भारत में समाज में पेड़-पौधों, नदी व जलाशयों के प्रति लोगों में जैव सत्ता का भाव था। गुरुनानक देव ने अपनी बाणी के जरिए इंसान को कुदरत में समाने का संदेश दिया है। 

इस्लाम में कायनात का शोषण गुनाह और संरक्षण करना इबादत माना है। भगवान बुद्ध पर्यावरण के रक्षक- भंते शाक्यपुत्र सागर का कहना है कि भगवान बुद्ध ने ढाई हजार साल पहले कहा था कि-जीव संजिनों अर्थात पेड़ों में जीवन है। प्रकृति इन सभी मानवीय घटकों में सर्वोपरि है।

गुरुग्रंथ साहिब- श्री गुरुग्रंथ साहिबजी के पहले श्लोक के 7 अक्षर ही ग्लोबल वार्मिंग का समाधान की बात दर्शाते हैं। उन्होंने संदेश में सात शब्द कहें हैं। इनमें उन्होंने हवा को गुरु,पानी को पिता व धरती को मां कहा है। हम इनका सम्मान व संरक्षण करें, तो सृष्टि और हम सभी सुरक्षित रह सकते है।

जैन धर्म- प्रतिष्ठाचार्य कमल कमलांकुर का कहना है कि जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों के नाम से अलग-अलग 24 पौधे हैं। जैन धर्म वृक्षों को ईश्वर का प्रतिनिधि मानता है। पेड़ काटने को हत्या जैसे अपराध में शामिल किया गया है।

बाइबिल- प्रोटेस्टेंट चर्च के पास्टर अर्जुन सिंह व अनिल मार्टिन के अनुसार बाइबिल में सर्व शक्तिमान परमेश्वर यहोवा, जिसने धरती पर पर्यावरण को बनाया है, तो उसने मानव को इसकी सुरक्षा करने का जिम्मा दिया है। उन्होंने कहा कि मानव के प्रकृति का केयर टेकर मानना चाहिए, न की मालिक।

तुलसीदासजी ने कहा- पंचतत्वों में ही जीवन समाया है, प्रकृति निर्मल रहने पर यह प्राणीमात्र के लिए सुखदायी हो जाती हैवित्र कुरान- मप्र उलेमा बोर्ड के अध्यक्ष काजी सैयद अनस अली ने बताया कि कुरान में तकरीबन 1600 में से 700 में प्रकृति का उल्लेख है। कुरान में धरती शब्द का प्रयोग 485 बार हुआ है। पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब से जुड़ीं सैकड़ों हदीसों में पर्यावरण संबंधी प्रसंग हैं। कुरान और हदीस में वन संरक्षण की सीख दी गई है।

रामचरित मानस- गोस्वामी तुलसीदास ने बताया कि प्रकृति निर्मल रहने पर प्राणीमात्र के लिए सुखदायी होती है। चौपाई से स्पष्ट है-क्षिती जल पावक गगन समीरा, पंच रचित अति अधम सरीरा। कल्पना लोक प्रत्येक मानव हृदय का ऐसा स्वप्न लोक है जहाँ सजग मस्तिष्क से वह अपनी समस्त अनुभूतियों, सुख, वेदना, भक्ति, प्रेम, वात्सल्य, मानवीय बोध, प्रकृति के सौंदर्य के सत्य को जीता ही नहीं, बल्कि पहचानने का प्रयास भी करता है। यह मन का मौन है, जहाँ भावनाओं की छटपटाहट व अंतर्द्वंद्व है और इन्हीं से संवाद बनता है और फिर कल्पना साकार रूप लेती है।

रविवार, 30 अगस्त 2020

छत्तीसगढ़ के खेल

 " किस्म-किस्म के खेल हमर छत्तीसगढ़ म "

" अपन माटी ले मया चाहे गांव हो या शहर म "
(1) फुगड़ी =
खेत म गुरतूर फर होथे गूरसूकडी
एक गोड म लाल भाजी एक गोड म माहूर
कतेक ल मानव कुरा ससूर = फूगड़ी फूफू
(2) नदी पहाड़ =
हिन्दी म सर्दी , छत्तीसगढ़ी म कथे जाड
उतारु ल नदी , ऊपर ल कथे पहाड़ = नदी पहाड़
(3) घाम छांव =
कुछ पाय खातिर खुद ल
मेहनत के संग लगाय ल लगथे दांव
खेल के नाम बताव = घाम छांव
(4) रेसटीप =
जीओ और जीने दो के जलाओ दीप
चुपचाप रहूं,बताहू झन खेलत हन = रेसटीप
(5) पिठ्ठ्ल =
मीठ बोल‌ईय्या के सुरतिया
नज़रें नजर म झूलथे झूल
खपर‌ईल पथरा के खेलन = पिठ्ठ्ल
(6) बांटी =
बबा संग नाती , दिया संग बाती
मयारू के गोड म चुकचुक ले दिखे साटी
कनेखि नेत के नेतेव = बाटी
(7) गोटा =
आयुर्वेदिक गुण अबड फायदा हे भाजी चरोटा
गरिगन्डा 20-20 आना के खेलबो = गोटा
(8) चुड़ी बिन‌ऊल =
बड़े जनिक मखना ल , हसिया म दूफाकी प‌ऊल
छूआना न‌ई चाहि __ लाल,हरियर = चुड़ी बिन‌ऊल
(9) चोर सिपाही =
जे ज‌ईसन काम करही व‌ईसन फल पाही
कोतवाल, पुलिस,पाछू पडेहे = चोर सिपाही
(10) भटक‌ऊला =
ज्ञान बढाय बर पूछन जन‌ऊला
6:6: घर के रहाय खेल = भटक‌ऊला
(11) अटकन मटकन =
सबों तिहार म देवी-देवता ल सुमरथन
दोनों हाथ ले खेलथन = अटकन-मटकन.....
(12) गोल-गोल रानी
डोकरी दाई हुकारु देवय बबा सुनावय कहानी
माडी भर-भर पानी = गोल-गोल रानी
(13) तिरी-पासा =
झन हो उदास मन में रख आशा
अमली के चिचोल हो,चाहे कौड़ी म
झिर्रा खेलबो खेल = तिरीपासा
(14) कुस्ती =
व्यायाम करेले भाग जही तोर सुस्ती
नाम-संजय निषाद गांव-मुस्की
चलना खेलबो खेल = कुस्ती
(15) गुल्ली-डंडा =
सबले ऊंचा रहे हमर देश के तिरंगा झंडा
कुर्रु के गुल्ली , सेन्हा के डण्डा = गुल्ली-डंडा
(16) ब‌ईला दौड
बड़ ममहाथे जब लगे आमा म मौर
कोन अगवाथे चलतो हो जाय = ब‌ईला दौड़
(17) डंडा पचरंगा =
जाति-धर्म के नाम में झन करव दंगा
मनखे-मनखे एक-हरन ,खेल अच्छा हे =डंडा पचरंगा
(18) पुतरी-पुतरा =
इंग्लिश म गर्ल -बाय
हिन्दी म लड़की-लड़का
अऊ छत्तीसगढ़ी म कथे टूरी-टूरा
सगा प‌ऊना संग खेलेन खेल = पुतरी-पुतरा
(19) केऊ मेऊ मेकरा के जाला
कतेक हाय हपट करबे , संग म लेग जबे काला
तोर कान ल मैं धरव , मोर कान ल तै धर
दूनो झन संघरा कबो = केऊ मेऊ मेकरा के जाला

पीयूष दत्ता की वॉल से

रविवार, 16 अगस्त 2020

तिरंगा झंडा फ़्लैग पोस्ट के ऊपर गया और लाखों लोगों से घिरे माउंटबेटन ने अपनी बग्घी पर ही खड़े-खड़े उसे सेल्यूट किया : बीबीसी

 

AUGUST 16, 2020 RAMESH THAKUR LEAVE A COMMENT EDIT

जब 14 अगस्त, 1947 की शाम लॉर्ड माउंटबेटन कराची से दिल्ली लौटे तो वो अपने हवाई जहाज़ से मध्य पंजाब में आसमान की तरफ़ जाते हुए काले धुएं को साफ़ देख सकते थे. इस धुएं ने नेहरू के राजनीतिक जीवन के सबसे बड़े क्षण की चमक को काफ़ी हद तक धुंधला कर दिया था.

14 अगस्त की शाम जैसे ही सूरज डूबा, दो संन्यासी एक कार में जवाहर लाल नेहरू के 17 यॉर्क रोड स्थित घर के सामने रुके. उनके हाथ में सफ़ेद सिल्क का पीतांबरम, तंजौर नदी का पवित्र पानी, भभूत और मद्रास के नटराज मंदिर में सुबह चढ़ाए गए उबले हुए चावल थे.

जैसे ही नेहरू को उनके बारे में पता चला, वो बाहर आए. उन्होंने नेहरू को पीतांबरम पहनाया, उन पर पवित्र पानी का छिड़काव किया और उनके माथे पर पवित्र भभूत लगाई. इस तरह की सारी रस्मों का नेहरू अपने पूरे जीवन विरोध करते आए थे लेकिन उस दिन उन्होंने मुस्कराते हुए संन्यासियों के हर अनुरोध को स्वीकार किया.

थोड़ी देर बाद अपने माथे पर लगी भभूत धोकर नेहरू, इंदिरा गांधी, फ़िरोज़ गाँधी और पद्मजा नायडू के साथ खाने की मेज़ पर बैठे ही थे कि बगल के कमरे मे फ़ोन की घंटी बजी.

ट्रंक कॉल की लाइन इतनी ख़राब थी कि नेहरू ने फ़ोन कर रहे शख़्स से कहा कि उसने जो कुछ कहा उसे वो फिर से दोहराए. जब नेहरू ने फ़ोन रखा तो उनका चेहरा सफ़ेद हो चुका था.

उनके मुँह से कुछ नहीं निकला और उन्होंने अपना चेहरा अपने हाथों से ढँक लिया. जब उन्होंने अपना हाथ चेहरे से हटाया तो उनकी आँखें आँसुओं से भरी हुई थीं. उन्होंने इंदिरा को बताया कि वो फ़ोन लाहौर से आया था.

वहाँ के नए प्रशासन ने हिंदू और सिख इलाक़ों की पानी की आपूर्ति काट दी थी. लोग प्यास से पागल हो रहे थे. जो औरतें और बच्चे पानी की तलाश में बाहर निकल रहे थे, उन्हें चुन-चुन कर मारा जा रहा था. लोग तलवारें लिए रेलवे स्टेशन पर घूम रहे थे ताकि वहाँ से भागने वाले सिखों और हिंदुओं को मारा जा सके.

फ़ोन करने वाले ने नेहरू को बताया कि लाहौर की गलियों में आग लगी हुई थी. नेहरू ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा, ‘मैं आज कैसे देश को संबोधित कर पाऊंगा? मैं कैसे जता पाऊंगा कि मैं देश की आज़ादी पर ख़ुश हूँ, जब मुझे पता है कि मेरा लाहौर, मेरा ख़ूबसूरत लाहौर जल रहा है.’

इंदिरा गाँधी ने अपने पिता को दिलासा देने की कोशिश की. उन्होंने कहा आप अपने भाषण पर ध्यान दीजिए जो आपको आज रात देश के सामने देना है. लेकिन नेहरू का मूड उखड़ चुका था.

नेहरू के सचिव रहे एम ओ मथाई अपनी किताब ‘रेमिनिसेंसेज ऑफ़ नेहरू एज’ में लिखते हैं कि नेहरू कई दिनों से अपने भाषण की तैयारी कर रहे थे. जब उनके पीए ने वो भाषण टाइप करके मथाई को दिया तो उन्होंने देखा कि नेहरू ने एक जगह ‘डेट विद डेस्टिनी’ मुहावरे का इस्तेमाल किया था.

मथाई ने रॉजेट का इंटरनेशनल शब्दकोश देखने के बाद उनसे कहा कि ‘डेट’ शब्द इस मौके के लिए सही शब्द नहीं है क्योंकि अमरीका में इसका आशय महिलाओं या लड़कियों के साथ घूमने के लिए किया जाता है.

मथाई ने उन्हें सुझाव दिया कि वो डेट की जगह रान्डेवू (rendezvous ) या ट्रिस्ट (tryst) शब्द का इस्तेमाल करें. लेकिन उन्होंने उन्हें ये भी बताया कि रूज़वेल्ट ने युद्ध के दौरान दिए गए अपने भाषण में ‘रान्डेवू’ शब्द का इस्तेमाल किया है.

नेहरू ने एक क्षण के लिए सोचा और अपने हाथ से टाइप किया हुआ डेट शब्द काट कर ‘ट्रिस्ट’ लिखा. नेहरू के भाषण का वो आलेख अभी भी नेहरू म्यूज़ियम लाइब्रेरी में सुरक्षित है.

संसद के सेंट्रल हॉल में ठीक 11 बजकर 55 मिनट पर नेहरू की आवाज़ गूंजी, ‘बहुत सालों पहले हमने नियति से एक वादा किया था. अब वो समय आ पहुंचा है कि हम उस वादे को निभाएं…शायद पूरी तरह तो नहीं लेकिन बहुत हद तक ज़रूर. आधी रात के समय जब पूरी दुनिया सो रही है, भारत आज़ादी की सांस ले रहा है.’

अगले दिन के अख़बारों के लिए नेहरू ने अपने भाषण में दो पंक्तियाँ अलग से जोड़ीं. उन्होंने कहा, ‘हमारे ध्यान में वो भाई और बहन भी हैं जो राजनीतिक सीमाओं की वजह से हमसे अलग-थलग पड़ गए हैं और उस आज़ादी की ख़ुशियाँ नहीं मना सकते जो आज हमारे पास आई है. वो लोग भी हमारे हिस्से हैं और हमेशा हमारे ही रहेंगे चाहे जो कुछ भी हो. ‘

जैसे ही घड़ी ने रात के बारह बजाए शंख बजने लगे. वहाँ मौजूद लोगों की आँखों से आंसू बह निकले और महात्मा गाँधी की जय के नारों से सेंट्रल हॉल गूंज गया.

सुचेता कृपलानी ने, जो साठ के दशक में उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, पहले अल्लामा इक़बाल का गीत ‘सारे जहाँ से अच्छा’ और फिर बंकिम चंद्र चैटर्जी का ‘वंदे मातरम’ गाया, जो बाद में भारत का राष्ट्रगीत बना. सदन के अंदर सूट पहने हुए एंग्लो – इंडियन नेता फ़्रैंक एन्टनी ने दौड़ कर जवाहरलाल नेहरू को गले लगा लिया.

संसद भवन के बाहर मूसलाधार बारिश में हज़ारों भारतीय इस बेला का इंतज़ार कर रहे थे. जैसे ही नेहरू संसद भवन से बाहर निकले मानो हर कोई उन्हें घेर लेना चाहता था. 17 साल के इंदर मल्होत्रा भी उस क्षण की नाटकीयता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके थे.

जैसे ही घड़ी ने रात के बारह बजाए उन्हें ये देख कर ताज्जुब हुआ कि दूसरे लोगों की तरह उनकी आँखें भी भर आई थीं.

वहाँ पर मशहूर लेखक खुशवंत सिंह भी मौजूद थे जो अपना सब कुछ छोड़ कर लाहौर से दिल्ली पहुंचे थे. उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए कहा था. ‘हम सब रो रहे थे और अनजान लोग खुशी से एक दूसरे को गले लगा रहे थे.’

आधी रात के थोड़ी देर बाद जवाहरलाल नेहरू और राजेंद्र प्रसाद लॉर्ड माउंटबेटन को औपचारिक रूप से भारत के पहले गवर्नर जनरल बनने का न्योता देने आए.

माउंटबेटन ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया. उन्होंने पोर्टवाइन की एक बोतल निकाली और अपने हाथों से अपने मेहमानों के गिलास भरे. फिर अपना गिलास भर कर उन्होंने अपना हाथ ऊँचा किया,’ ‘टु इंडिया.’

एक घूंट लेने के बाद नेहरू ने माउंटबेटन की तरफ अपना गिलास कर कहा ‘किंग जॉर्ज षष्टम के लिए.’ नेहरू ने उन्हें एक लिफ़ाफ़ा दिया और कहा कि इसमें उन मंत्रियों के नाम हैं जिन्हें कल शपथ दिलाई जाएगी.

नेहरू और राजेंद्र प्रसाद के जाने के बाद जब माउंटबेटन ने लिफ़ाफ़ा खोला तो उनकी हँसी निकल गई क्योंकि वो खाली था. जल्दबाज़ी में नेहरू उसमें मंत्रियों के नाम वाला कागज़ रखना भूल गए थे.

अगले दिन दिल्ली की सड़कों पर लोगों का सैलाब उमड़ा पड़ा था. शाम पाँच बजे इंडिया गेट के पास प्रिंसेज़ पार्क में माउंटबेटन को भारत का तिरंगा झंडा फहराना था. उनके सलाहकारों का मानना था कि वहाँ करीब तीस हज़ार लोग आएंगे लेकिन वहाँ पाँच लाख लोग इकट्ठा थे.

भारत के इतिहास में तब तक कुंभ स्नान को छोड़ कर एक जगह पर इतने लोग कभी नहीं एकत्रित हुए थे. बीबीसी के संवाददाता और कमेंटेटर विनफ़र्ड वॉन टामस ने अपनी पूरी ज़िदगी में इतनी बड़ी भीड़ नहीं देखी थी.

माउंटबेटन की बग्घी के चारों ओर लोगों का इतना हुजूम था कि वो उससे नीचे उतरने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे. चारों ओर फैले हुए इस अपार जन समूह की लहरों ने झंडे के खंबे के पास बनाए गए छोटे से मंच को अपनी लपेट में ले लिया था.

भीड़ को रोकने के लिए लगाई गई बल्लियाँ, बैंड वालों के लिए बनाया गया मंच, बड़ी मेहनत से बनाई गई विशिष्ट अतिथियों की दर्शक दीर्घा और रास्ते के दोनों ओर बाँधी गई रस्सियाँ- हर चीज़ लोगों की इस प्रबल धारा में बह गईं थीं. लोग एक दूसरे से इतना सट कर बैठे हुए थे कि उनके बीच से हवा का गुज़रना भी मुश्किल था.

फ़िलिप टालबोट अपनी किताब ‘एन अमेरिकन विटनेस’ में लिखते हैं, ‘भीड़ का दवाब इतना था कि उससे पिस कर माउंटबेटन के एक अंगरक्षक का घोड़ा ज़मीन पर गिर गया. सब की उस समय जान में जान आई जब वो थोड़ी देर बाद खुद उठ कर चलने लगा.’

माउंटबेटन की 17 वर्षीय बेटी पामेला भी दो लोगों के साथ उस समारोह को देखने पहुंचीं थीं. नेहरू ने पामेला को देखा और चिल्ला कर कहा लोगों के ऊपर से फाँदती हुई मंच पर आ जाओ.

पामेला भी चिल्लाई, ‘मैं ऐसा कैसे कर सकती हूँ. मैंने ऊंची एड़ी की सैंडल पहनी हुई है.’ नेहरू ने कहा सैंडल को हाथ में ले लो. पामेला इतने ऐतिहासिक मौके पर ये सब करने के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकती थीं.

अपनी किताब ‘इंडिया रिमेंबर्ड’ में पामेला लिखती हैं, ‘मैंने अपने हाथ खड़े कर दिए. मैं सैंडल नहीं उतार सकती थी. नेहरू ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा तुम सैंडल पहने-पहने ही लोगों के सिर के ऊपर पैर रखते हुए आगे बढ़ो. वो विल्कुल भी बुरा नहीं मानेंगे. मैंने कहा मेरी हील उन्हें चुभेगी. नेहरू फिर बोले बेवकूफ़ लड़की सैंडल को हाथ में लो और आगे बढ़ो.’

पहले नेहरू लोगों के सिरों पर पैर रखते हुए मंच पर पहुंचे और फिर उनकी देखा देखी भारत के अंतिम वॉयसराय की लड़की ने भी अपने सेंडिल को उतार कर हाथों में लिया और इंसानों के सिरों की कालीन पर पैर रखते हुए मंच तक पहुंच गईं, जहाँ सरदार पटेल की बेटी मणिबेन पटेल पहले से मौजूद थीं.

डोमिनीक लापिएर और लैरी कॉलिंस इपनी किताब ‘फ़्रीडम एट मिडनाइट’ में लिखते हैं, ‘मंच के चारों ओर उमड़ते हुए इंसानों के उस सैलाब में हज़ारों ऐसी औरतें भी थीं जो अपने दूध पीते बच्चों को सीने से लगाए हुए थीं. इस डर से कि कहीं उनके बच्चे बढ़ती हुई भीड़ में पिस न जाएं, जान पर खेल कर वो उन्हें रबड़ की गेंद की तरह हवा में उछाल देतीं और जब वो नीचे गिरने लगते तो उन्हें फिर उछाल देतीं. एक क्षण में हवा में इस तरह सैकड़ों बच्चे उछाल दिए गए. पामेला माउंटबेटन की आखें आश्चर्य से फटी रह गईं और वो सोचने लगीं, ‘हे भगवान, यहाँ तो बच्चों की बरसात हो रही है.”

उधर अपनी बग्घी में कैद माउंटबेटन उससे नीचे ही नहीं उतर पा रहे थे. उन्होंने वहीं से चिल्ला कर नेहरू से कहा,’ बैंड वाले भीड़ के बीच में खो गए हैं. लेट्स होएस्ट द फ़्लैग.’

वहाँ पर मौजूद बैंड के चारों तरफ़ इतने लोग जमा थे कि वो अपने हाथों तक को नहीं हिला पाए. मंच पर मौजूद लोगों ने सौभाग्य से माउंटबेटन की आवाज़ सुन ली. तिंरंगा झंडा फ़्लैग पोस्ट के ऊपर गया और लाखों लोगों से घिरे माउंटबेटन ने अपनी बग्घी पर ही खड़े खड़े उसे सेल्यूट किया.

लोगों के मुंह से बेसाख़्ता आवाज़ निकली,’माउंटबेटन की जय….. पंडित माउंटबेटन की जय !’ भारत के पूरे इतिहास में इससे पहले किसी दूसरे अंग्रेज़ को ये सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था कि वो लोगों को इतनी दिली भावना के साथ ये नारा लगाते हुए सुने. उस दिन उन्हें वो चीज़ मिली जो न तो उनकी परनानी रानी विक्टोरिया को नसीब हुई थी और न ही उनकी किसी और संतान को.

भारत के इतिहास में किसी दूसरे अंग्रेज़ को ये सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ था कि वो लोगों को इतनी शिद्दत के साथ ये नारा लगाते हुए सुने. यह माउंटबेटन की कामयाबी को भारत की जनता का समर्थन था.

उस मधुर क्षण के उल्लास में भारत के लोग प्लासी की लड़ाई, 1857 के अत्याचार, जालियाँवाला बाग की ख़ूनी दास्तान सब भूल गए. जैसे ही झंडा ऊपर गया उसके ठीक पीछे एक इंद्रधनुष उभर आया, मानो प्रकृति ने भी भारत की आज़ादी के दिन का स्वागत करने और उसे और रंगीन बनाने की ठान रखी हो.

वहाँ से अपनी बग्घी पर गवर्नमेंट हाउज़ लौटते हुए माउंटबेटन सोच रहे थे सब कुछ ऐसा लग रहा है जैसे लाखों लोग एक साथ पिकनिक मनाने निकले हों और उन में से हर एक को इतना आनंद आ रहा हो जितना जीवन में पहले कभी नहीं आया था.

इस बीच माउंटबेटन और एडवीना ने उन तीन औरतों को अपनी बग्घी में चढ़ा लिया जो थक कर निढ़ाल हो चुकी थीं और उनकी बग्घी के पहिए के नीचे आते आते बची थीं. वो औरतें काले चमड़ों से मढ़ी हुई सीट पर बैठ गईं जिसकी गद्दियाँ इंग्लैंड के राजा और रानी के बैठने के लिए बनाई गई थीं.

उसी बग्घी में भारत के प्रधानमंत्री जवाहललाल नेहरू उसके हुड पर बैठे हुए थे क्योंकि उनके लिए बग्घी में बैठने के लिए कोई सीट ही नहीं बची थी.

अगले दिन माउंटबेटन के बेहद करीबी उनके प्रेस अटाशे एलन कैंपबेल जॉन्सन ने अपने एक साथी से हाथ मिलाते हुए कहा था, ‘आखिरकार दो सौ सालों के बाद ब्रिटेन ने भारत को जीत ही लिया !’

उस दिन पूरी दिल्ली में रोशनी की गई थी. कनॉट प्लेस और लाल किला हरे केसरिया और सफ़ेद रोशनी से नहाये हुए थे. रात को माउंटबेटन ने तब के गवर्नमेंट हाउस और आज के राष्ट्रपति भवन ने 2500 लोगों के लिए भोज दिया.

बीबीसी,

DrAlok Gupta,

Ramesh Thakkur, 16-8-2020


मंगलवार, 11 जून 2019

समय के साथ चलें

1998 में Kodak में 1,70,000 कर्मचारी काम करते थे और वो दुनिया का 85% फ़ोटो पेपर बेचते थे..चंद सालों में ही Digital photography ने उनको बाज़ार से बाहर कर दिया.. Kodak दिवालिया हो गयी और उनके सब कर्मचारी सड़क पे आ गए।

HMT (घडी)
BAJAJ (स्कूटर)
DYNORA (टीवी)
MURPHY (रेडियो)
NOKIA (मोबाइल)
RAJDOOT (बाईक)
AMBASDOR (कार)

मित्रों,
इन सभी की गुणवक्ता में कोई कमी नहीं थी फिर भी बाजार से बाहर हो गए!!
कारण???
उन्होंने समय के साथ बदलाव नहीं किया.!!

आपको अंदाजा है कि आने वाले 10 सालों में दुनिया पूरी तरह बदल जायेगी और आज चलने वाले 70 से 90% उद्योग बंद हो जायेंगे।

चौथी औद्योगिक क्रान्ति में आपका स्वागत है...

Uber सिर्फ एक software है। उनकी अपनी खुद की एक भी Car नहीं इसके बावजूद वो दुनिया की सबसे बड़ी Taxi Company है।

Airbnb दुनिया की सबसे बड़ी Hotel Company है, जब कि उनके पास अपना खुद का एक भी होटल नहीं है।

Paytm, ola cabs , oyo rooms जैसे अनेक उदाहरण हैं।

US में अब युवा वकीलों के लिए कोई काम नहीं बचा है, क्यों कि IBM Watson नामक Software पल भर में ज़्यादा बेहतर Legal Advice दे देता है। अगले 10 साल में US के 90% वकील बेरोजगार हो जायेंगे... जो 10% बचेंगे... वो Super Specialists होंगे।

Watson नामक Software मनुष्य की तुलना में Cancer का Diagnosis 4 गुना ज़्यादा Accuracy से करता है। 2030 तक Computer मनुष्य से ज़्यादा Intelligent हो जाएगा।

अगले 10 सालों में दुनिया भर की सड़कों से 90% cars गायब हो जायेंगी... जो बचेंगी वो या तो Electric Cars होंगी या फिर Hybrid...सडकें खाली होंगी,Petrol की खपत 90% घट जायेगी,सारे अरब देश दिवालिया हो जायेंगे।

आप Uber जैसे एक Software से Car मंगाएंगे और कुछ ही क्षणों में एक Driverless कार आपके दरवाज़े पे खड़ी होगी...उसे यदि आप किसी के साथ शेयर कर लेंगे तो वो ride आपकी Bike से भी सस्ती पड़ेगी।

Cars के Driverless होने के कारण 99% Accidents होने बंद हो जायेंगे.. इस से Car Insurance नामक धन्धा बंद हो जाएगा।

ड्राईवर जैसा कोई रोज़गार धरती पे नहीं बचेगा। जब शहरों और सड़कों से 90% Cars गायब हो जायेंगी, तो Traffic और Parking जैसी समस्याएं स्वतः समाप्त हो जायेंगी... क्योंकि एक कार आज की 20 Cars के बराबर होगी।

आज से 5 या 10 साल पहले ऐसी कोई ऐसी जगह नहीं होती थी जहां PCO न हो। फिर जब सब की जेब में मोबाइल फोन आ गया, तो PCO बंद होने लगे.. फिर उन सब PCO वालों ने फोन का recharge बेचना शुरू कर दिया। अब तो रिचार्ज भी ऑन लाइन होने लगा है।

आपने कभी ध्यान दिया है..?

आजकल बाज़ार में हर तीसरी दुकान आजकल मोबाइल फोन की है।
sale, service, recharge , accessories, repair, maintenance की।

अब सब Paytm से हो जाता है.. अब तो लोग रेल का टिकट भी अपने फोन से ही बुक कराने लगे हैं.. अब पैसे का लेनदेन भी बदल रहा है.. Currency Note की जगह पहले Plastic Money ने ली और अब Digital हो गया है लेनदेन।

दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है.. आँख कान नाक खुले रखिये वरना आप पीछे छूट जायेंगे..।

समय के साथ बदलने की तैयारी करें।

इसलिए...
व्यक्ति को समयानुसार अपने व्यापार एवं अपने स्वभाव में भी बदलाव करते रहना चाहिये।

"Time to Time Update & Upgrade"

समयके साथ चलिये और सफलता पाइए ।

रविवार, 1 अप्रैल 2018

ऑफिस में नींद आना एक खतरनाक बीमारी

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जी नींद तो बहुत ही जरूरी चीज़ है, लेकिन यह ऑफिस के समय आ जाए तो मुसीबत बन जाती है। काम करते हुए आंखें बंद होने लगें, थकान महसूस होने लगे और अगर ऐसे मौके पर नींद लेने का मौका ना मिले, तो बस सिरदर्द शुरू हो जाता है। ऐसे में करें तो क्या करें...
अगर बॉस को पता चल गया कि हम काम छोड़कर नींद की नदी में गोते लगाने की तैयारी में हैं तो वह हमारी हमेशा के लिए काम से छुट्टी कर देंगे। ऐसी हालत अमूमन उन लोगों की होती है जो एक जगह पर बैठकर काम करते हैं। जो इधर-उधर घूमकर काम करने के आदी होते हैं, उनकी नींद चलने-फिरने से ही काफी हद तक गायब हो जाती है।
लेकिन घंटों कम्प्यूटर स्क्रीन के सामने बैठकर काम करने वालों के लिए तो नींद के साथ-साथ कम्प्यूटर की स्क्रीन भी एक बड़ी चुनौती बन जाती है। मैं किसी अन्य इंसान का क्यों, बल्कि स्वयं अपना ही उदाहरण दे सकती हूं। ऑफिस में घंटों लैपटॉप के सामने बैठने के बाद जब आंखें थक जाती हैं तो उन्हें खोल सकना भी एक कठिन टास्क बन जाता है।
और अगर साथ ही नींद भी आ रही हो तो शायद गर्मागर्म चाय भी उसे भगा नहीं सकती। ऐसे में तो मन करता है कि एक कोई ज़ोरदार धमाका हो जिससे दिमागी नसें खुल जाएं और यह नींद उड़ जाए। क्योंकि ऑफिस में आने के बाद आराम करने की अपेक्षा आप सपने में भी नहीं कर सकते, आपको कैसे भी करके काम को पूरा करना ही है।

जानें कुछ कारण

एक शोध के मुताबिक ऑफिस के दौरान भी नींद आने के कुछ विशेष कारण सामने आए हैं। पहला कारण उन लोगों से जुड़ा है जो रात के समय पूरी नींद लेने में असमर्थ रहते हैं। ऐसे में वे शायद ऑफिस आकर काम कर भी लेते हैं, लेकिन दिमाग नींद की ओर होने की वजह से वे खुली आंखों से भी बंद आंखों के समान काम करते चले जाते हैं और परिणाम यह होता है कि कोई भी काम ठीक तरीके से नहीं होता।
लेकिन जो नींद पूरी लेते हैं उनका क्या? सच में ऐसे कई लोग होते हैं जो रात में जरूरत के अनुसार आराम से 7 से 8 घंटे की नींद ले लेते हैं और सुबह फिर भी मुश्किल से उठते हैं। इतना ही नहीं, उठने के बाद नहाकर और फिर तैयार होकर ऑफिस आ तो जाते हैं, लेकिन नींद उन पर नशे की तरह चढ़ी रहती है।

काम में मन नहीं लगता

ऐसे में वे काम में मन नहीं लगा पाते। इसका एक कारण हो सकता है कि उनकी शारीरिक एवं मानसिक थकान की तुलना में जितनी नींद की उन्हें आवश्यकता है शायद वह उन्हें नहीं मिल रही। लेकिन दूसरा कारण उनमें शारीरिक रूप से कुछ कमियां होना हो सकता है। ऐसे में इन लोगों को जरूरत है तो एक डॉक्टर की।

व्यायाम है फायदेमंद

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किन्तु यदि ऐसी कोई परेशानी नहीं है और फिर भी अपने आलसी स्वभाव के कारण आपको रोज़ ऑफिस में नींद आती है, तो कुछ टिप्स जरूर आजमाएं। विशेषज्ञों की राय में ऐसे में व्यक्ति को व्यायाम करने की जरूरत है। रोज़ाना कसरत करने से वह दिमागी नसों को जागरुक कर सकता है।
ऐसे लोगों को ऐरोबिक्स करनी चाहिए, जो ना केवल शरीर में स्फूर्ति लाती है बल्कि एक ऐसी ऊर्जा प्रदान करती है, जिससे हम हमेशा तरोताजा महसूस करते हैं। फिर ऐसे में बिना वजह नींद का आना असंभव सी बात है।
लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक बार-बार नींद आने का एक और कारण भी हो सकता है। यह है एक प्रकार की बीमारी, जिसे चिकित्सकीय दुनिया “हायपरसोम्निया” के नाम से जानती है। आम भाषा में हम इसे जरूरत से अधिक नींद आने की तकलीफ भी कह सकते हैं।

हायपरसोम्निया

हायपरसोम्निया से पीड़ित वे लोग होते हैं जो हर थोड़े समय के बाद नींद आने की शिकायत रखते हैं। जैसे कि सुबह उठने के बाद भी जब दोबारा बिस्तर पर जाने का मन करे। इसके अलावा कहीं भी बैठे-बैठे सो जाना, साथ ही भोजन करने या फिर अनचाहे समय पर नींद आना, जबकि उनकी रात की नींद जरूरत के अनुसार पूरी हुई थी।
फिर भी बार-बार नींद आने की यह परेशानी ही उस इंसान को हायपरसोम्निया से पीड़ित होना मानती है। ऐसे लोग यदि गलती से गहरी नींद में चले जाएं, तो कुछ भी हो जाए, लेकिन इन्हें उठा सकना एक मुश्किल कार्य हो जाता है। लेकिन इसका एक ही हल डॉक़्टरों को दिखाई देता है, और वो है ऐरोबिक्स करना।
इस बीमारी पर शोध कर रहे शोधकर्ताओं ने कुछ लोगों को एकत्रित करके उनके ब्लड सैम्पल लिए। यह वे लोग थे जो इस बीमारी से ग्रस्त हैं, लेकिन इससे निजात पाने के लिए ऐरोबिक्स कर रहे हैं। इस वर्ग के लोगों का जब डॉक्टरों ने ब्लड सैम्पल लिया तो उन्हें काफी आश्चर्यजनक तथ्य हासिल हुए।

एक कारण है डिप्रेशन

इस टेस्ट में डॉक्टरों ने देखा कि शोध का हिस्सा बनने वाले लोगों में से कम से कम 100 लोग ऐसे थे जो डिप्रेशन का शिकार थे। यह डिप्रेशन ही उनमें हायपरसोम्निया जैसी बीमारी को पैदा होने दे रहा है, जिसके कारण वे घंटों तक सोते रहते हैं और उठने के बाद भी दोबारा सोने की ख्वाहिश रखते हैं।
लेकिन यही लोग जब ऐरोबिक्स को अपना रहे हैं तो यह व्यायाम उनके दिमाग में पनपने वाले दो खास विकारों को खत्म कर रहा है। यानी कि डिप्रेशन जैसे हालात में ऐरोबिक्स काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। तो यदि सच में आप इतना सोने के आदी हो गए हैं तो डॉक्टर की सलाह के साथ ऐरोबिक्स भी जरूर आज़माएं।