सोमवार, 2 सितंबर 2013

लायसेंसी पत्रकार

-मनोज कुमार
पत्रकारों को अब ट्रक ड्रायवर की तरह लायसेंस रखकर चलना होगा, यदि सरकार ने तय कर दिया कि पत्रकारों को भी डाक्टर और वकील की तरह लायसेंस लेना होगा. इस लायसेंस के लिये बकायदा परीक्षा भी पास करनी होगी. केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कह दिया है कि पत्रकारों को भी लायसेंस दिया जाना चाहिये और इसके लिये डाक्टर-इंजीनियर की तरह परीक्षा भी आयोजित होना चाहिये. इसके पहले प्रेस कांऊसिल के अध्यक्ष ने तो पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता तय करने के लिये एक कमेटी का गठन तक कर दिया है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई हर दल और हर नेता देता रहा है लेकिन जब जब उनके हितों पर चोट पहुंची है तो सबसे पहले नकेल डालने की कोशिश की गई. पश्चिम बंगाल में ममता बेनर्जी ने जो कुछ किया या कश्मीर और असम में जो कुछ हुआ, वह सब अभिव्यक्ति की आजादी में खलल डालने का उपक्रम है. 
पराधीन भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम लगाने की बात समझ में आती थी. अंग्रेजों को अपने हितों को बचाने के लिये ऐसा करना जरूरी हो सकता था किन्तु स्वाधीन भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नियंत्रण करने का अर्थ समझ से परे है. पिछले तीन दशकों से एक शब्द मीडिया इजाद किया गया है और इस मीडिया ने पत्रकारिता को हाशिये पर डाल दिया है. समाज में जो समस्या उत्पन्न हो रही है, वह पत्रकारिता के कारण नहीं बल्कि मीडिया के कारण हो रही है. पत्रकारिता एक मिशन है और मीडिया पूरी तरह व्यवसाय. इस शब्द की उत्पत्ति के कारणों की तलाश में कुछ भी हाथ नहीं लगा. बस, जवाब मिला कि जिस तरह सम्पादक की कुर्सी पर प्रबंधक विराजमान है, उसी तरह पत्रकारिता पर मीडिया चिपक गया है. पत्रकारिता का रिश्ता दिल से है जबकि मीडिया का रिश्ता दिमाग से. दिल भावनाओं को समझता और जानता है तथा वह अपने से ऊपर उठकर जनहित और समाजहित में काम करता है जबकि दिमाग सबसे पहले नफा-नुकसान को देखता है और अपने हित के बारे में सोचता है. इस तरह मीडिया और पत्रकारिता के दायित्व, समझ और इन दोनों के बीच के अंतर को समझा जा सकता है.
जो लोग बार बार पत्रकारों की योग्यता की बात कर रहे हैं, उन्हें पता ही नहीं है कि वे मीडिया के लोगों के बारे में कह रहे हैं या पत्रकारों के बारे में. तीन दशकों में कुछ इसी तरह का भ्रम फैलाकर सम्पादक की सत्ता को समाप्त कर दिया गया. प्रबंधकों को सम्पादक होना गैरजरूरी लगा और वे कुर्सी पर काबिज हो गये. अब पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता और लायसेंस दिये जाने की बात की जा रही है और आने वाले दिनों में पत्रकार भी विलुप्त हो जाएंगे. इसी के साथ पत्रकारिता भी समाप्त हो जाएगी और रह जाएगा मीडिया. मीडिया में पत्रकार नहीं होते हैं बल्कि मीडियाकर होते हैं जो संस्था और प्रबंधकों के साथ स्वयं का लाभ देखते हैं. सन् 75 में जिस तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला गया था और इसी का परिणाम है कि मीडिया का प्रार्दुभाव हुआ. इसके बाद सिलसिला शुरू हुआ अखबारों को राजस्व कमाने का अधिकाधिक अवसर देने का और रातोंरात बहुख्यक नामी-बेनामी प्रकाशन आरंभ हो गये. बाद के सालों में तो अखबार और पत्रिकाओं का ऐसा अंबार खड़ा हुआ कि हर परिवार से कथित रूप से एक पत्रकार गिना जाने लगा. इस गिरावट को रोकने के लिये तब कोई प्रयास न तो संस्थागत हुये और न ही शासकीय नियंत्रण की कोई कोशिश ही हुई परिणामस्वरूप समाज के दूसरे क्षेत्रों की तरह पत्रकारिता में भी लगातार गिरावट आती गयी. प्रतिबद्ध लोगों के स्थान पर लाभ कमाने वालों की संख्या बढ़ती गयी.
सवाल यह है कि आखिरकार सरकार पत्रकारिता के लिये शिक्षा और लायसेंस का दायरा क्यों बांध रही है? क्या सरकार को इस बात का इल्म नहीं है कि पत्रकारिता विशुद्ध रूप से अनुभव का मामला है और अनुभव डिग्री या डिप्लोमा लेने से नहीं आता और न ही लायसेंस लेकर पत्रकारिता की जा सकती है. जिन डाक्टरों और इंजीनियर से पत्रकारों की तुलना की जा रही है, वहां यह भी याद रखना चाहिये कि पत्रकार कोई पेशेवर नहीं हैं. उसके पास कभी न तो स्थायी पूंजी रही है और न वह कोई व्यापार कर सकता है. वह तो मिशनरी भाव से जीता है और दूसरों को खुश देखकर स्वयं खुश हो जाता है. उसका पहला और आखिरी लक्ष्य समाज में शुचिता कायम करना होता है लेकिन पेशेवर लायसेंसशुदा लोगों से यह अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है. आजादी के पहले और बाद में भी खबर पर मर-मिटने वाला पत्रकार ही होता है. 
यह सोच कर अच्छा लगता है कि आजादी के 66 बरसों में हमने कितनी तरक्की कर ली है. आजादी के पहले वे हमें कुचलने के लिये बर्नाकुलर प्रेसएक्ट लाते हैं तो स्वाधीन भारत में लायसेंसी बना दिया जाता है. लायसेंसी का अर्थ तो आप बेहतर समझते होंगे. संभव है कि सरकार अपने मकसद में कामयाब हो जाए और पत्रकारों को जरूरी शैक्षिक योग्यता हासिल करना पड़े. इसके बाद उसे लायसेंस हासिल करने के लिये फिर से परीक्षा देना हो और उसमें पास हो जाये और लायसेंसी पत्रकार के रूप में विख्यात हो जाएगा. इसके बाद की स्थिति की कल्पना कीजिये कि एक पत्रकार जो लायसेंसी है, वह भला इतनी हिम्मत कहां से लायेगा कि वह सरकार के काले कारनामों से परतें उखाड़ सके. वह कर सकता है लेकिन करेगा नहीं क्योंकि तब उसे अपने लायसेंस रद्द हो जाने की चिंता होगी और नहीं तो कम से कम लायसेंस के रिनीवल की चिंता सतायेगी. लायसेंसी पत्रकार के राज में आम आदमी की आवाज पत्रकारिता के कान बंद हो चुके होंगे. उसे सरकार के द्वारा दिखायी जा रही, सुनाई जा रही चीजें ही समझ में आएंगी क्योंकि वह पत्रकार नहीं, लायसेंसी होगा.

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

हाशिये पर रहे साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी

हरिहर वैष्णव
साहित्य-सेवा को तन-मन-धन से समर्पित, यहाँ तक कि इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये चिर कुमार रहे लालाजी (लाला जगदलपुरी) का देहावसान साहित्य-जगत के लिये एक अपूरणीय क्षति बन कर रह गयी है। अपने लेखन ही नहीं अपितु अपने मौखिक ज्ञान और अनुभव से साहित्यकारों की नयी-पुरानी पीढ़ी को सींचते उन्होंने लेखन के क्षेत्र में जीवन के लगभग आठ दशक व्यतीत कर दिये किन्तु समाज ने उन्हें उनकी साहित्य-साधना और तपस्या के लिये क्या दिया? ऐसा नहीं है कि साहित्य-जगत के पुरोधा उन्हें नहीं जानते। जानते सभी हैं। सभी ने उनके बस्तर सम्बन्धी ज्ञान और अनुभव का भरपूर लाभ भी लिया और अपने-अपने तरीके से उसका उपयोग भी किया किन्तु जिस तपस्वी से सब-कुछ पाया वे उसे ही हाशिये पर धकेलने में लगे रहे। जब कभी बस्तर सम्बन्धी कोई जानकारी लेने का समय आया, लालाजी सभी को याद आये किन्तु जब कभी सम्मान या पुरस्कार देने का समय आया, वे किसी को भी याद नहीं आये। नाम गिनाना यानी घाव को कुरेदना है। इसलिये बिना नाम लिये कहना होगा कि बस्तर की बात आते ही लालाजी को याद करने वाले महारथियों ने भी लालाजी के प्रति सदाशयता नहीं दिखायी। यह तो भला हो श्री रमेश नैय्यर जी,  श्री मुकुन्द हम्बर्डे जी और श्री अशोक पारख जी का कि 2004 के पं. सुन्दरलाल शर्मा साहित्य सम्मान (राज्य सम्मान) के लिये निर्णायक मण्डल में सम्मिलित इन महानुभावों ने लालाजी का नाम सर्वसम्मति से तय किया अन्यथा शायद यह सम्मान भी उनके हिस्से में नहीं आता। बस्तर का जन इन सभी का हृदय से आभारी है। हम आभारी हैं बस्तर विश्वविद्यालय के यशस्वी कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) एन. डी. आर. चन्द्र जी के भी जिन्होंने लालाजी को डी. लिट्. की मानद उपाधि से अलंकृत करवाने के प्रयास अपने स्तर पर किये। यह अलग बात है कि यह उपाधि उन्हें उनके जीवन-काल में नहीं मिल पायी। पद्मश्री के लिये न तो शासन स्तर पर कोई प्रयास हुए और न ही स्वनामधन्य साहित्यिक संस्थाओं अथवा जनप्रतिनिधियों की ओर से कभी कोई पहल की गयी।
17 दिसम्बर 1920 को जगदलपुर में जन्मे, 1936 से लेखन प्रारम्भ करने वाले लालाजी की रचनाएँ 1939 से देश के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं। स्तरीय और प्रामाणिक लेखन, जिसकी कोई सानी नहीं। जीवन के 93 वें वर्ष में 14 अगस्त 2013 की शाम 7.00 बजे उन्होंने इस संसार से विदा ले ली। उनके देहावसान की खबर को न तो प्रिन्ट मीडिया ने और न इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ही तवज्जो दी। यह शिकायत नहीं कड़वी सच्चाई है जिसे भोगना साहित्यकार की नियति है। विशेषत: बस्तर जैसे "पिछड़े" अंचल के साहित्यकारों को तो यह भोगना ही पड़ेगा; कारण चाहे जो हों। तभी मैं कई बार सोचने लगता हूँ, "साहित्यकार! तेरी क्या बिसात?" साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल कहा जाता रहा है। साहित्यकार को "ओपिनियन मेकर" कहा जाता रहा है। बेकार बात है यह। फालतू है यह कहना और सोचना। कौन पूछता है साहित्यकार को? हाँ, फर्जी और जुगाड़ू तथाकथित साहित्यकारों की बात अलग है। उनकी पूछ-परख उनकी चाटुकारिता की वजह से हर जगह होती है। उनके प्रायोजित सम्मान भी होते हैं। किन्तु हमें गर्व है कि लालाजी न तो फर्जी और जुगाड़ू साहित्यकार थे और न प्रायोजित सम्मान में सहभागी। ऐसे स्वाभिमानी और सच्चे साहित्यकार को, ऐसे युगपुरुष को, ऐसे साहित्य-ऋषि को मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि। मेरा शत-शत् नमन। 
छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद् की कोंडागाँव जिला इकाई ने पिछले दिनों स्व. लालाजी की पुण्य स्मृति में बस्तर सम्भाग के साहित्यकारों को प्रतिवर्ष "इन्द्रावती सम्मान" से अलंकृत करने की घोषणा की है, जिसका हार्दिक स्वागत है। क्या राज्य शासन या प्रादेशिक स्तर पर गठित और संचालित तथाकथित स्वनामधन्य महान साहित्यिक संस्थाएँ लालाजी की पुण्य स्मृति में कोई राज्य स्तरीय सम्मान या किसी शोध अथवा सृजन पीठ की स्थापना करना उचित समझेंगी? क्या कोई लालाजी की कृतियों के समुचित मूल्यांकन के लिये आगे आने का प्रयास करेगा? 
हरिहर वैष्णव
सरगीपाल पारा, कोंडागाँव 494226 (बस्तर-छ.ग.), मोबाइल : 76971 74308

बुधवार, 28 अगस्त 2013

साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी की स्मृति में इन्द्रावती सम्मान

कोंडागाँव। साहित्य-जगत में बस्तर के पर्यायवाची बन चुके साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी की पुण्य स्मृति में प्रतिवर्ष इन्द्रावती सम्मान दिये जाने की घोषणा 25 अगस्त को यहाँ आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में की गयी। अवसर था बस्तर के वरिष्ठतम व्यंग्यकार चित्तरंजन रावल की व्यंग्य रचनाओं के संग्रह "व्यंग्य रचनाएँ" के विमोचन का। विमोचन-समारोह में जगदलपुर एवं नारायणपुर से आमन्त्रित एवं स्थानीय कवियों द्वारा काव्य-पाठ किया गया। विमोचन किया छत्तीसगढ़ प्रदेश की महिला एवं बाल विकास मन्त्री सुश्री लता उसेण्डी ने, जो स्वयं भी कोंडागाँव निवासी तथा कोंडागाँव विधान सभा क्षेत्र से विधायक हैं। 
चितरंजन रावल मूलत: व्यंग्यकार एवं कवि हैं। 80 वर्षीय श्री रावल पिछले कई दशकों से सृजन-रत हैं और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन पाते रहे हैं। इससे पहले उनका काव्य-संग्रह "कुचला हुआ सूरज" प्रकाशित हो चुका है। 
लाला जगदलपुरी, जिनकी स्मृति में बस्तर सम्भाग के साहित्यकारों को प्रतिवर्ष दिये जाने वाले "इन्द्रावती सम्मान" की घोषणा छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद्, कोंडागाँव जिला इकाई द्वारा हुई है, का जन्म 17 दिसम्बर 1920 को जगदलपुर (बस्तर-छत्तीसगढ़) में हुआ था। उन्होंने 1936 से लेखन आरम्भ किया था और 1939 से लगातार प्रकाशन पाते रहे।  प्रकाशन के साथ ही विभिन्न सम्मानों से भी वे विभूषित किये गये। साहित्य के क्षेत्र में ऋषि कहे जाने वाले लाला जगदलपुरी पिछले दिनों 14 अगस्त को हम सबको रोता-बिलखता छोड़ कर अन्तिम यात्रा के लिये प्रस्थान कर गये। छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि देश भर में अपनी रचनाओं, विशेषत: बस्तर सम्बन्धी शोधपरक और प्रामाणिक रचनाओं के लिये ख्यात लालाजी ने साहित्य-सेवा के चलते विवाह तक नहीं किया था। उनकी जीवन-संगिनी थी उनकी लेखनी और सन्तान थी उनका लेखन। उनके निधन का समाचार पाते ही बस्तर सम्भाग के गाँव-गाँव में शोक-सभाएँ आयोजित कर उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दी गयी। हाल ही में बस्तर विश्वविद्यालय, जगदलपुर (बस्तर-छत्तीसगढ़) द्वारा उन्हें डी.लिट्. की मानद उपाधि से विभूषित किये जाने की घोषणा की गयी थी और पद्मश्री से अलंकृत किये जाने की भी चर्चा चल रही थी। 
ज्ञात हो कि उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित पुस्तक "साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी : लाला जगदलपुरी समग्र" दो खण्डों में दिल्ली के यश प्रकाशन से शीघ्र ही प्रकाशित हो कर पाठकों के बीच आ रही है।

सोमवार, 5 अगस्त 2013

मीडिया का बाजारवाद


-मनोज कुमारसम्पादक, समागम, भोपाल 
मीडिया का बाजारवाद कहें अथवा बाजार का मीडिया, दोनों ही अर्थों में मीडिया और बाजार एक-दूसरे के पर्याय हैं। मीडिया का बाजार के बिना और बाजार का मीडिया के बिना गुजारा नहीं है। दरअसल, दोनों ही एक सायकल के दो पहिये के समान हैं जहां एक पहिया बाहर हुआ तो सायकल विकलांग होने के कगार पर खड़ी होगी। मीडिया का बाजारवाद बहुआयामी अर्थों वाला है। मीडिया से बाजार का संचालन होता है फिर वह मसला खबरों को बेचने और खरीदने का हो, लोगों की भावनाओं को खरीदने या बेचने का हो या समाज की जरूरत की वस्तुओं की तरफ लोगों को आकर्षित करने का हो।
ध्यान रहे कि यहां हम मीडिया के बाजारवाद की बात कर रहे हैं न कि पत्रकारिता की। पत्रकारिता का न तो कभी कोई बाजार रहा है और न ही उसका बाजारवाद से कभी कोई रिश्ता बन सकता है क्योंकि पत्रकारिता खरीदने अथवा बेचने की वस्तु नहीं बल्कि वह समाज को दिशा देने का कार्य करती रही है और अपने जिंदा रहने तक यह दायित्व निभाती रहेगी। पत्रकारिता का फलक इतना विस्तारित है कि उसे किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता है। समाज में उपजने वाली विसंगति के केन्द्र में पत्रकारिता है, लोगों की पीड़ा को आवाज देने का नाम पत्रकारिता है, जोर-जुल्म और समाज के ताने-बाने को क्षतिग्रस्त करने वालों के खिलाफ जो आवाज गूंजती है, वह पत्रकारिता है। पत्रकारिता का यह गौरवशाली स्वरूप अपने जन्मकाल से रहा है। पराधीन भारत में पत्रकारिता ने अपने दायित्वों का निर्वहन किया और आज स्वाधीन भारत में पत्रकारिता की ओज कायम है। समाज का विश्वास पत्रकारिता पर है तो इसलिये कि जब उसकी सुनवाई कहीं नहीं होती है तब पत्रकारिता उसकी आवाज बन जाती है। जिस सरकार और सरकारी दफ्तर में आम आदमी की आवाज अनसुनी कर दी जाती है, वहां पत्रकारिता आम आदमी की आवाज बन कर उसे न्याय दिलानेे के लिये तत्पर दिखायी देता है। यह पत्रकारिता की साख है और यही साख मीडिया से उसे अलग बनाता है।
लगभग तीन दशक के आसपास का समय हुआ होगा जब टेलीविजन अवतरित हुआ। पहले पहल तो इसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कहकर पुकारा गया लेकिन यह नाम असरदायक नहीं लगा और पत्रकारिता और टेलीविजन प्रसारण को मिलाकर एक नाम दिया गया मीडिया। कोई पक्के दावे के साथ नहीं कह सकता कि मीडिय नाम की यह चिडिय़ा किस देश से उडक़र भारत में आयी। मीडिया इतना सहज और सरल शब्द लगा कि यह तेजी से लोगों की जुबान पर चढ़ता गया और बिना किसी विरोध मीडिया शब्द ऐसा स्थापित हुआ कि पत्रकारिता नेपथ्य में चला गया और मीडिया का वर्चस्व स्थापित हो गया।
मीडिया वास्तव में है क्या? मीडिया का शाब्दिक अर्थ हिन्दी में माध्यम होता है। माध्यम अर्थात किसी कार्य को अंजाम तक पहुंचाने का साधन। इस अर्थ में मीडिया का स्वरूप पत्रकारिता से कतई मेल नहीं खाता है क्योंकि पत्रकारिता, मीडिया की तरह साधन नहीं, साध्य है और साध्य एक निश्चित लक्ष्य एवं उद्देश्य की पूर्ति के लिये किया जाता है।
मीडिया शब्द का फौरीतौर पर देखें तो टेलीविजन प्रसारण के लिये प्रयुक्त होता है जहां समाचार है, विचार है, मनोरंजन है, बाजार है आदि-इत्यादि। हालांकि टेलीविजन की अपनी सीमा है किन्तु टेलीविजन प्रसारण जब मीडिया बन जाता है तो उसकी सारी सीमायें टूट जाती है और वह बाजार के मुंह में चला जाता है। मीडिया इस समय बाजारवाद के शिकंजे में है। मर्यादा और सीमा बाजार के लिये कभी कोई मायने नहीं रखती हैं। शायद यही कारण है कि बाजार ने मीडिया को भी वस्तु मान लिया और खरीद-फरोख्त के स्तर पर पहुंच गया। बाजार एक मगरमच्छ है और उसका मुंह इतना बड़ा है कि वह हर किसी को निगलने के लिये तैयार है।
पिछले दिनों कुछेक मामले समाज के सामने आये जिनमें मीडिया के खरीद-फरोख्त की सूचनायें शामिल है। मामला अदालत तक पहुंच गया और समाज के सामने सवालिया निशान छोड़ गया है। देने वाला कहता है कि मांगने वाला दोषी और मांगने वाला स्वयं को पाक-साफ बताता है। यह कोई प्रसंग नहीं है कि दोषी कौन? असल बात तो यह है कि लेन-देन की बात ही कहां से आयी? यदि मामला ऐसा है तो यह विचारणीय है कि बाजार ने कहा कि तुम बिको और दूसरे से कहा खरीदो। बाजार अपनी नीति और नियम से चल रहा था। सौदा बना नहीं और टूट गया और इस टूटन में नैतिकता को आड़े लिया गया। बाजार इस मामले में भी जीत गया क्योंकि इस पूरे सौदे में जो दो शामिल थे, उनका जमकर प्रचार हुआ जिसे समाज बदनामी कहता है किन्तु बदनाम होकर भी नाम कमाने की प्रवृत्ति ने बाजार को विजयी बना दिया।
बाजार के पास नैतिक-अनैतिक शब्द के लिये कोई स्थान नहीं होता है। वह तो नफा और नुकसान पर टिका होता है और उसका झुकाव नफे की तरफ ही होता है क्योंकि व्यापार में नुकसान कोई नहीं उठाना चाहता। बाजार हर उस चीज को बेच देना चाहता है जो बिक रही हो। इस खरीद-बिकवाली में सामाजिक रिश्तों का ताना-बाना भले ही छिन्न-भिन्न हो जाये, इसकी परवाह बाजार नहीं करता है। इन दिनों मीडिया के बाजार में सर्वाधिक बिकने वाला मामला था बलात्कार का। देश की राजधानी नईदिल्ली में हुये वीभत्स बलात्कार के मामले के बाद तो जैसे बलात्कार की बाढ़ सी आ गयी। मीडिया रोज खोद-खोद कर मामले लाता रहा और इस बात का भी ध्यान नहीं रखा कि रोज-रोज की खबरों से किशोरवय के बच्चों के मानस पर क्या असर होगा। मीडिया की रेटिंग ने नैतिकता के सारे पैमाने को किनारे कर दिया। स्मरण रहे कि इसके पहले गड्ढे में गिरा प्रिंस भी मीडिया के लिये हॉटकेक की तरह था जिसे भुनाया गया। प्रिंस के बाद गड्ढे में गिरने वाला हर बच्चा कैमरे की कैद में था। यह और बात है कि मीडिया के प्रयासों से कितने बच्चों की जान बची या आज की तारीख में कितने बच्चों को गड्ढे में गिरने से बचाया जा सका है, इसकी कोई जानकारी नहीं है। हो सकता है कि अब कोई बच्चा गड्ढे में गिर नहीं रहा हो।
मीडिया का सूत्र वाक्य रहा है कि जो दिखता है, वह बिकता है और वह सबकुछ बेचने पर आमादा है। सामान तो वह बेचने के उपक्रम में जुटा हुआ ही है, वह इमोशन का भी व्यापार करने से चूक नहीं रहा है। मीडिया के घेरे में जब अखबार भी आ जाये तो उसका चरित्र पूरा न सही, थोड़ा तो बदल ही जाता है। कहावत है ना गिरगिट को देखकर गिरगिट रंग बदल ही लेता है, सो अखबारों के बारे में इस मुद्दे पर बहुत अलग राय नहीं बनाया जाना चाहिये। मेरी पत्रकारिता के शुरूआती दिनों में कस्बानुमा अखबार के पाठकों के बारे में हमें बताया जाता था कि हमारे अखबार के ग्राहक वो सारे लोग हैं जो मैट्रिक अथवा उसके समकक्ष है और यही कस्बाई अखबार जब राजधानी पहुंचा तो इसके मायने ही बदल गये। कल तक आम आदमी का अखबार नौकरशाहों और पूंजीपतियों का अखबार बन गया। यह दुर्भाग्यजनक ही नहीं बल्कि शर्मनाक भी कहें तो संकोच नहीं होना चाहिये।
मीडिया का बाजारवाद का फलक इतना बड़ा है कि वह किसी को नहीं बख्शता है। शर्त यही होती है कि टीआरपी बढऩे तक ही किसी विषय को वस्तु बनाया जाता है। एक टेलीविजन चैनल के हेड बताते हैं कि सुबह सुबह ही यह तय कर दिया जाता है कि आज किस खबर को खेलना है अर्थात उस दिन की सबसे ज्यादा बिकने वाली यानि टीआरपी देने वाली खबर को बार बार दिखाया जाना है। याद रहे कि एक चैनल ने चर्चित आरूषि हत्याकांड को लेकर एक स्पेशल स्टोरी प्लान किया और बता दिया कि आज यह स्पष्ट हो जाएगा कि आरूषि का हत्यारा कौन है? तकरीबन एक घंटे के इस कार्यक्रम में विज्ञापन तो बटोरा गया लेकिन दर्शकों को निराशा ही हाथ लगी। दरअसल, यह एक किस्म की सनसनी फैलाने का मामला है। लम्बे समय से लोग इंतजार में बैठे हैं कि आरूषि के हत्यारों का पता चले और ऐसे में जब एक टेलीविजन चैनल कहता है कि वह इस राज से परदा उठायेगा तो स्वाभाविक है कि दर्शकों की रूचि होगी। दर्शकों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ का यह तरीका बेहद घटिया है।
मीडिया की बातें करते हैं तो यह भी साफ हो जाता है कि मीडिया में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के साथ साथ मुद्रित माध्यम भी शामिल है। बाजारवाद का शिकार मुद्रित माध्यम भी है, इस बात से इंकार करना मुश्किल है। जिस तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिये कुछ खेल-तमाशे करता है, वैसे ही अपनी प्रसार संख्या बढ़ाने के लिये मुद्रित माध्यम कुछ भी करगुजरने को तैयार है।
अखबार और पत्रिकाओं की कीमत को जमीन पर लाने से लेकर अखबार, पत्रिकाओं के साथ बाल्टी, साबुन और न जाने क्या क्या उपहार देने के लिये बेताब हैं। मुद्रित माध्यम के पास कंटेंट को समृद्ध करने का कोई प्रयास नहीं दिखता है बल्कि वह शार्टकट तरीके से अपनी प्रसार संख्या को आसमानी ऊंचाई तक पहुंचाना चाहता है। यह राज-रोग किसी एक को नहीं बल्कि लगभग हर प्रकाशन संस्थान को लग चुका है। आज खबरों के नाम पर पाठकों को सूचनायें मिल रही है और जो खबरें आ रही हैं, उसमें भी संदेह की कुछ लाइनें होती हैं। यक्ष प्रश्र तो यह है कि इसमें भेद करे कौन और पहचान कर ठीक करेगा कौन।
मीडिया और पत्रकारिता के बीच एक बड़ा बुनियादी फर्क यह भी है कि एक सीमा के बाद जाकर मीडिया की समाज के प्रति संवेदना खत्म हो जाती है। वह निर्मम होकर बाजार का अनुगामी बन जाता है और बाजार के दिशा-निर्देशों का पालन करने लगता है। उसके सामने बाजार का दिया लक्ष्य और जरूरत होती है और उसी के अनुरूप काम करता है। मीडिया के ठीक उलट पत्रकारिता की प्रवृत्ति है। वह मीडिया की तरह एक सीमा के बाद संवेदनहीन नहीं होता है बल्कि पत्रकारिता की धडक़न समाज की संवेदनाओं में ही बसती है। वह करीब से और बेहद करीब से समाज की भावनाओं और संवेदनाओं को समझ कर उसकी भावनाओं को व्यक्त करता है। वह जानता है कि किस बात और तथ्य को रखने से समाज आलोकित होगा और किन बातों से सामाजिक संरचना छिन्न-भिन्न हो जाएगी। पत्रकारिता मीडिया की तरह गैरजवाबदार, गैरजिम्मेदार नही हो सका है, इसलिये बाजार उसके नियंत्रण में रहा है न कि पत्रकारिता बाजार के नियंत्रण में।
मीडिया के बाजारवाद का ही परिणाम है कि पिछले एक दशक से पेडन्यूज को लेकर समाज चिंता में है। अधिकाधिक धन बटोरने की प्रवृत्ति ने भ्रामक और झूठे विषय-वस्तु को स्थापित किया और आज बात मीडिया से लेकर पत्रकारिता की विश्वसनीयता को तार तार कर रहा है। पेडन्यूज के संदर्भ में इस बात को समझ लेना भी जरूरी है कि पेड न्यूज, पेडन्यूज न होकर पेड कटेंट होता है।
कंटेंट से यहां आशय समाचार विश£ेषण एवं फीचर को लेकर है क्योंकि पेडन्यूज में वह गुंजाईश नहीं होती है जो कि कंटेंट एनालिसिस में होती है। मीडिया शब्द की तरह पेडन्यूज भी एक आसान और सरल शब्द है जिसे कहीं भी चलाया जा सकता है। पेडन्यूज के मामले में मीडिया के साथ साथ पत्रकारिता भी कटघरे में है। पेडन्यूज के मामले में मुद्रित माध्यम भी लांछित हुआ है। हालांकि पेडन्यूज की बीमारी आज की नहीं है, यह भी सच है क्योंकि किसी भी सरकार द्वारा अपनी इमेज बिल्डिंग के लिये न्यूज फीचर की सूरत में दिया जाने वाले तथ्य सौफीसद सरकारी होते हैं जिसकी पड़ताल किये बिना ज्यों का त्यों प्रकाशित कर दिया जाता है। यह भी सच है कि ऐसे न्यूज फीचर के साथ मुद्रित माध्यम इम्पेक्ट फीचर, स्पॉटलाइट जैसे उपशीर्षक का उपयोग करते हैं जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह न्यूज का हिस्सा नहीं है बल्कि प्रायोजित है। टेलीविजन के परदे पर यह अलग करना जरा मुश्किल सा काम होता है क्योंकि रोजमर्रा की खबरों के फ्रेम के आसपास विज्ञापनों का जमावड़ा होता है जिसे देखने के बाद यह कह पाना मुश्किल होता है कि परदे पर दिखाया जा रहा न्यूज प्रायोजित है अथवा विज्ञापन को न्यूज प्रायोजित कर रहा है। चुनाव ने दस्तक देना आरंभ कर दिया है और एक बार फिर पेडन्यूज का राक्षस अपना मुंह खोलेगा ताकि वह समूचे मीडिया को निगल जाये, गटक जाये क्योंकि मीडिया का बाजारवाद अपने चरम पर है।
मीडिया का बाजारवाद वास्तव में समाज के लिये घातक बनता जा रहा है। कभी दूरदर्शन से आरंभ हुआ टेलीविजन चैनलों की संख्या सौ से ऊपर जा पहुंची है और लगातार संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। अपराध और अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है जिसका समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।