मंगलवार, 14 नवंबर 2017

कर्म क्या है?

 बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। एक शिष्य ने पूछा- "कर्म क्या है?"
बुद्ध ने कहा- "मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।"

एक राजा हाथी पर बैठकर अपने राज्य का भ्रमण कर रहा था।अचानक वह एक दुकान के सामने रुका और अपने मंत्री से कहा- "मुझे नहीं पता क्यों, पर मैं इस दुकान के स्वामी को फाँसी देना चाहता हूँ।" 
यह सुनकर मंत्री को बहुत दु:ख हुआ। लेकिन जब तक वह राजा से कोई कारण पूछता, तब तक राजा आगे बढ़ गया। 

अगले दिन, मंत्री उस दुकानदार से मिलने के लिए एक साधारण नागरिक के वेष में उसकी दुकान पर पहुँचा। उसने दुकानदार से ऐसे ही पूछ लिया कि उसका व्यापार कैसा चल रहा है? दुकानदार चंदन की लकड़ी बेचता था। उसने बहुत दुखी होकर बताया कि मुश्किल से ही उसे कोई ग्राहक मिलता है। लोग उसकी दुकान पर आते हैं, चंदन को सूँघते हैं और चले जाते हैं। वे चंदन कि गुणवत्ता की प्रशंसा भी करते हैं, पर ख़रीदते कुछ नहीं। अब उसकी आशा केवल इस बात पर टिकी है कि राजा जल्दी ही मर जाएगा। उसकी अन्त्येष्टि के लिए बड़ी मात्रा में चंदन की लकड़ी खरीदी जाएगी। वह आसपास अकेला चंदन की लकड़ी का दुकानदार था, इसलिए उसे पक्का विश्वास था कि राजा के मरने पर उसके दिन बदलेंगे। 

अब मंत्री की समझ में आ गया कि राजा उसकी दुकान के सामने क्यों रुका था और क्यों दुकानदार को मार डालने की इच्छा व्यक्त की थी। शायद दुकानदार के नकारात्मक विचारों की तरंगों ने राजा पर वैसा प्रभाव डाला था, जिसने उसके बदले में दुकानदार के प्रति अपने अन्दर उसी तरह के नकारात्मक विचारों का अनुभव किया था।

बुद्धिमान मंत्री ने इस विषय पर कुछ क्षण तक विचार किया। फिर उसने अपनी पहचान और पिछले दिन की घटना बताये बिना कुछ चन्दन की लकड़ी ख़रीदने की इच्छा व्यक्त की। दुकानदार बहुत खुश हुआ। उसने चंदन को अच्छी तरह कागज में लपेटकर मंत्री को दे दिया। 

जब मंत्री महल में लौटा तो वह सीधा दरबार में गया जहाँ राजा बैठा हुआ था और सूचना दी कि चंदन की लकड़ी के दुकानदार ने उसे एक भेंट भेजी है। राजा को आश्चर्य हुआ। जब उसने बंडल को खोला तो उसमें सुनहरे रंग के श्रेष्ठ चंदन की लकड़ी और उसकी सुगंध को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। प्रसन्न होकर उसने चंदन के व्यापारी के लिए कुछ सोने के सिक्के भिजवा दिये। राजा को यह सोचकर अपने हृदय में बहुत खेद हुआ कि उसे दुकानदार को मारने का अवांछित विचार आया था। 

जब दुकानदार को राजा से सोने के सिक्के प्राप्त हुए, तो वह भी आश्चर्यचकित हो गया। वह राजा के गुण गाने लगा जिसने सोने के सिक्के भेजकर उसे ग़रीबी के अभिशाप से बचा लिया था। कुछ समय बाद उसे अपने उन कलुषित विचारों की याद आयी जो वह राजा के प्रति सोचा करता था। उसे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ऐसे नकारात्मक विचार करने पर बहुत पश्चात्ताप हुआ। 

यदि हम दूसरे व्यक्तियों के प्रति अच्छे और दयालु विचार रखेंगे, तो वे सकारात्मक विचार हमारे पास अनुकूल रूप में ही लौटेंगे। लेकिन यदि हम बुरे विचारों को पालेंगे, तो वे विचार हमारे पास उसी रूप में लौटेंगे। 



शनिवार, 11 नवंबर 2017

एक व्यापारी का सच

मै व्यापारी चोर हूँ ..
क्यों कि मै रात दिन खुद की रिस्क पर कमाता हूँ .सुबह से शाम तक काम मे जुटा रहता है...
क्योकि मेरे दिये हुये टैक्स से उस शिक्षक को तनख्वाह मिलती है जो साल मे 200 दिन भी नहीं  पढ़ाई  कराता..
क्योकि मेरे दिये पैसे से उस पुलिस को तनख्वाह मिलती है जो कभी समय पर नहीं मिलती..
क्योंकि मेरे दिये टैक्स से उस डाक्टर को तनख्वाह मिलती है जो कभी अस्पताल नहीं  जाता..
क्योंकि मेरे दिये टैक्स से उस अफसर को तनख्वाह मिलती है जो हर काम पैसा खा कर करता है..
मेरे दिये पैसे से ही मन्त्री मज़ा करते है..
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मोदीजी आपसे गुजारिश है कि हम चोर व्यापारियों को पकडने के लिये उन्ही अफसरो को भेजना जिसने कभी पैसा न खाया हो सदा ईमानदारी से काम किया हो...आपने गाना सुना होगा ..पहला पत्थर वो मारे जिसने पाप न किया हो जो पापी नहो..

हम व्यापारी तो चोर है...

हम टैक्स चोरी नहीं करते, टैक्स बचाते हैं, ये इसलिए ताकि हम अपने बच्चों और परिवार को भविष्य में किसी आकस्मिक आपदा से सुरक्षित रख सकें।
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(1)हमने अपने घरों में हजारों रुपये खर्च कर  जनरेटर/इन्वर्टर ख़रीदे, ---
     *क्योंकि सरकार हमें नियमित रूप से बिजली उपलब्ध नहीं करा सकी।*

(2) हमने submercible pump इसलिए लगाये--
   *क्योंकि सरकार हमें शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं करा सकी।*

(3) हमें private security guards इसलिए रखने पड़े
   *क्योंकि सरकार हमें सुरक्षा देने में असमर्थ है।*

(4) हम private hospitals & नर्सिंग होम में जाने को विवश हुए--
   *क्योंकि सरकार ,सरकारी चिकित्सालयों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देने में नाकाम रही।*
(5) हम कार, मोटरसाइकिल खरीदने को विवश हुए---
   *क्योंकि सरकार, सार्वजनिक सस्ती परिवहन व्यवस्था बनाने में असफल रही।*
     और अंत में सरकार को टैक्स देने वालों को, उनके रिटायरमेंट के समय में, जब उसे अपनी जीवन रक्षा के लिए, सर्वाधिक सहायता की जरूरत होती है ? बदले में क्या मिलता है ?
*कुछ नहीं !*
 सरकार से कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं।
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लेकिन इसके विपरीत, उसके कठिन परिश्रम से अर्जित आय के स्रोतों का उपयोग सरकार, subsidy और गरीबों के कल्याण के नाम पर, *उन लोगों के वोट खरीदने में खर्च कर देती है जो सरकार को एक पैसा भी टैक्स नहीं देते।*
मुख्य बात ये है कि सरकार हमारे टैक्स के पैसों का क्या करती है ???:--
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*--न्यायालय खोलती है --*
   जहाँ न्याय नहीं मिलता। लाखों मुकद्दमें 10--20 साल से ज्यादा समय तक लटके रहते हैं।
*-पुलिस स्टेशन--*
    जो आम जनता की सुरक्षा के बजाय केवल राजनेताओं की सुरक्षा करती है ।
*--अस्पताल--*
   जहाँ न दवाईयाँ मिलती हैं और न ही ढंग से चिकित्सा ही होती है।
*--सड़कों का निर्माण --*
   जहाँ 40% ----60% राशि, ठेकेदार, बिचौलिए, नेताओं की जेब में चले जाते हैं।
   यह सूची तो अंतहीन है ........
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पश्चिमी देशों की तरह, यदि केंद्र और राज्य की सरकारें, जनता के लिए उपरोक्त सुविधाएँ भली भांति उपलब्ध करा दें, तो कोई टैक्स चोरी भला क्यों करना चाहेगा  ?
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हम सभी जानते हैं कि हमारे द्वारा दिए गए टैक्स का एक बहुत बड़ा हिस्सा, सरकारी कर्मचारियों और राजनेताओं पर खर्च हो जाता है
---   एक व्यापारी अपना मॉल  2%--10% लाभ पर विक्रय करता है, जबकि सरकार अपने खर्च के लिए उसकी आय का 30% ले लेती है। 
यह कहाँ तक उचित है ??
यही कारण है कि कोई टैक्स देना नहीं चाहता।
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हम टैक्स बचाते हैं--
     अपनी जरूरतों के लिए,परिवार के लिए,अपनी वृद्धावस्था के लिए, सुरक्षा के लिए।
    
     देश की आजादी के 70 वर्षों के बाद भी, केंद्र और राज्यों की सरकारें, वर्तमान परिस्थितियों के लिए, पूर्णतया जिम्मेदार हैं।
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कोशिश किजिये देश के प्रधान सेवक तक ये दर्द पहुंचे..!
एक व्यापारी का सच...

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

एक बेहतरीन सटायर

मंत्री महोदय रविशंकर प्रसाद जी,
मेरा नाम नीलोत्पल मृणाल है। मैं मूलतः बिहार से हूँ और झारखण्ड के संथाल परगना में सुदूर देहात में रहता हूँ। मैं हमेशा सरकार पे भरोसा करने वाला अच्छा नागरिक रहा हूँ इसी नाते सरकार ने अपने स्कूल के माध्यम से जितना पढ़ाया लिखाया केवल उतना ही पढ़ लिख पाया और अपनी ओर से ज्यादा पढ़ लिख काबिल बनने की कोई प्राइवेट कोशिश नही की। युवा हूँ और 2014 से पहले भी बेरोजगार था और 2014 के बाद भी भयंकर बेरोजगार हूँ और फ़ख्र करता हूँ कि जो भी हूँ सरकारों की बदौलत ही हूँ।
बेरोजगार होने के कारण हम सब युवाओं का गांव में एक ही काम रहा है, दिन भर बैठ के गांजा पीना और अच्छे दिन का इंतज़ार करना। बचपन से ही भांग,गांजा एवं शुद्ध किस्म का ताड़ी सेवन करता रहा हूँ। आप fb पे मेरे पोस्ट और ख़ास कर प्रधान प्रचारक with अतिरिक्त प्रभार pm ऑफ़ india also के बारे में जब पोस्ट पढ़ेंगे तो आपको यकीन हो जायेगा कि मैं किस लेवल पर जा के गांजा ताड़ी पीता हूँ। हम सभी गांव के दोस्त कक्षा 3 से इसका सेवन करते हैं।हम अक्सर इलाके के बड़े बड़े चिलमबाज़ को चुनौती देते आये हैं कि ,है कोई हमारे जोड़ का नशेड़ी?
पर अभी कल जब हम सभी बड़े शान से गांजा पी रहे थे तभी किसी ने आपका बयान दिखाया नोटबंदी पर, "नोटबंदी से देह व्यापार में कमी आयी है।"  ये बयान पढ़ते ही हमारा घमंड चूर चूर हो गया सर।मेरा एक दोस्त चिलम छोड़ कूद के मोबाइल छीना, "मुझे फोटो दिखाओ गुरुआ का" हम सब भी भौचक्के थे कि ये कौन आ गया हम से टक्कर लेने मैदान में। तस्वीर देखी तो पहचान गया। देखा आप थे।हम सभी दोस्तों ने तत्काल अपनी चिलम और दोपहर तक पी लेने को रखी ताड़ी की सभी सात बाल्टी आपके तस्वीर के आगे समर्पित कर रख दी और सबने जोर से जयकारा लगाया 
" हमारा गुरुवर, बाबा रविशंकर"  
सर, सही बता रहा हूँ कि 20 साल से पीने खाने के कैरियर में हमारे ग्रुप को इतना हाई लेवल चुनौती पहली बार मिला है सर।हमलोग तो एक दूसरे का चेहरा देख लाज़ से मर रहे थे कि, फाल्तुए में एतना घमंड था अपना अनुभव पर हमलोग को। जबकि हमलोग कोनो कमजोर माल नही लेते थे। फिर भी सच तो सच है सर कि हमलोग तो 24सों घंटे पी के भी इस लेवल पर नही पहुँच पाये सर। मुझसे तो ख़ास कर कई लाल सलामी बल्लेबाज़ तक संकट में माल उधार ले जाते हैं पर आज तक इतना हिलोरन माल नही दिया लिया।
मेरे संपर्क में और भी कई लाल,नीले, पीले ,भगवे सलाम प्रणाम वाले भी साथी हैं।उनके बीच भी इस टक्कर का माल मिलना कभी नसीब नही हुआ सर।हम सभी साथियों ने कल ही तय किया कि आपको अपना कुलगुरु मान चिट्ठी लिखें और पूछे कि आखिर आप लोगों का माल कहाँ से आता है जो इतना ज्यादा हाहाकारी असरकारी मौज देता है।
सर, आप देश के मंत्री हैं, आपको हमने चुना है इसलिए हमारा ये अधिकार है कि हम जान पायें कि हमने जिसे चुन कर देश चलाने भेजा है उसके भेजे में किस क्वालिटी का माल भरा जा रहा है और ये माल हम आम चिलमधारियों के लिए क्यों नसीब नही।  सर, आपकी सरकार कहती है कि "सबका साथ,सबका विकास " तो फिर इस विकास यात्रा में हम लोग को अकेला छोड़ आप अकेले अकेले सारा जड़ी क्यों फूंक देते हैं सर?
सर, हम जानते हैं कि आपलोगों का अपना नेटवर्क है और अभी पार्टी के ही नेताओं में बांटा बांटी करते माल खत्म हो जाता होगा।
मध्य प्रदेश में जिस तरह शिव मामा जी ने अपनी सड़कों को अमेरिका से बेहतर बताया वो बताता है कि आपलोग जिस जड़ी का सेवन करते हैं वो जड़ी खुद आदि देव शिव जी के जड़ी से भी हज़ार गुणा ज्यादा असरकारी है।कल ही एक काली सूची में नाम आने पर आपके एक सांसद ने पत्रकार के सवाल पूछने पर तख्ती पे लिख के बताया"मैं भगवत गीता के यज्ञ में सात दिन के लिए मौन हूँ"
मतलब इस लेवल का सर्कस?इस लेवल की जोकरी? सर, प्लीज़ नु सर..सर देखिये हम युवा के बारे में अभी कल ही आपने ही कह दिया कि बेरोजगार केवल वही लोग हैं जो अयोग्य हैं, तो अब इतने बेरोजगारी में गांजा ही सहारा है जिसे पी पा हम अपनी जिंदगी घसीट घिस के ख़तम कर लें और बचे रहें तो 2019 में आपको वोट दे सकें।  कम से कम इतने के लिए तो फरियाद सुन लीजिये और हमारी आखिरी इच्छा पूरी कर दीजिये कि हम नरक में आपके आने पर पहले से जयकारा लगा गेट पर खड़ा रहेंगे और बाकि दल के नेताओं से कह सकेंगे कि बाबा रविशंकर जी के कारण ही हमलोग भी उस उच्च स्तरीय जड़ी का सेवन कर दुनिया से विदा हुए थे।
अच्छा अब जरा होश की बात भी सुन लीजिये सर,
सर, देश पर कल कोई और राज कर रहा था,आज आप हैं और कल कोई और होगा।राज तो हमेशा कोई नही रहा, रह जाता है उसका किया धरा।  आपको निम्बू चाट के बड़े होश हवास में ये याद दिलाना चाहता हूँ कि, आप भारत जैसे विशाल और गरिमामयी देश के मंत्री हैं।एक समय ठीक ठाक कमाऊ वकील भी रह चुके हैं। पर सर, किसी बड़े लोकतांत्रिक देश के मंत्री होने और किसी व्यापारी राजा के दरबारी होने का फर्क समझाइये खुद की आत्मा को।  नोटबंदी जैसे महाप्रभावी मुद्दे पर ये क्या खा पी के बयान दिए थे आप सर?
 क्या इस देश को अब इतना भी उम्मीद नही करना चाहिए कि देश का मंत्री भले अपने निर्णय के पक्ष में बोलेगा लेकिन तार्किक तो बोलेगा, मूर्खों की तरह तो नही न बोलेगा कम से कम।
 दुनिया का कौन अर्थशास्त्री नोटबंदी के प्रभाव पर उत्तर मांग रहे लोगों को ये जवाब दे उसका फायदा बताएगा कि, नोटबंदी से देह व्यापार कम हुआ और ये इसकी सफलता है। महराज याद हो तो बताइये कि क्या इसलिए किया था नोटबंदी? 
 रवि बाबू, वकील हैं न आप?  जरा भी नही सोंचे, कि जिस नोटबंदी के लिए 50 दिन मांग देश का नक्शा बदल देने की कसम खाई थी एक बातूनी ने वो उसके 364 दिन बाद भी उसी मुद्दे पर कुछ बोलने नही आया। दुनिया का सबसे बातूनी प्रधानमंत्री जिस मुद्दे पर मुँह खोलने में 56 इंच का सीना सिकुड़ के रह गया और जिस मुद्दे पर दुनिया के एकमात्र जीवित कौटिल्य उर्फ़ चाणक्य कुमार शाह चूं नही बोले उस मुद्दे पर आपको अपनी बेवकूफ़ी दिखाने का क्या प्रसाद मिला? रवि प्रसाद जी, राजनीति का स्तर ये है कि ये रोज नया सर्कस दिखाती है और रोज़ नये जोकर से मिलाती है।
 आपको बस यही कहना चाहता हूँ कि इस बार जोकर ऑफ़ द वीक का खिताब आपको जाता है जो आपने अपने ही मामू mp वाले से छीना है।बधाई।जय हो।l
Nilotpal mrinal

सोमवार, 6 नवंबर 2017

गांधी परिवार का परिचय



गांधी परिवार का परिचय

ओता गांधी                   गांधीजी के दादा
लक्ष्मीबाई गांधी                गांधीजी की दादी (ओता गांधी की दूसरी पत्नी)
कबा गांधी                    गांधीजी के पिताजी
पुतली माँ                    गांधीजी की माता (कबा गांधी की चौथी पत्नी)
लक्ष्मीदास गांधी                गांधीजी के बड़े भाई
(काला गांधी)
रलियात बेन                  गांधीजी की बड़ी बहन
(गोकी बेन)
करसनदास गांधी               गांधीजी के मंझले भाई
कस्तूरबा गांधी                 गांधीजी की पत्नी
हरिलाल गांधी                 गांधीजी के ज्येष्ठ पुत्र
गुलाब गांधी                   गांधीजी की ज्येष्ठ पुत्रवधू (हरिलाल गांधी की पत्नी)
रामी बहन                    गांधीजी की ज्येष्ठ पौत्री (हरिलाल गांधी की ज्येष्ठ पुत्री)
कुँवरजी पारेख                 गांधीजी के पौत्र जामाता (रामी गांधी के पति, हरिलाल गांधी के दामाद)
डॉ. कांतिभाई गांधी             गांधीजी के पौत्र (हरिलाल गांधी के पुत्र)
सरस्वती गांधी                 गांधीजी की पौत्रवधू (कांति गांधी की पत्नी और हरिलाल गांधी की पुत्रवधू)
रसिक गांधी                   गांधीजी के पौत्र (हरिलाल गांधी के द्वितीय पुत्र)
मनुबहन गांधी                 गांधीजी की पौत्री (हरिलाल गांधी की पुत्री)
सुरेन्द्र मश्रुवाला                गांधीजी की पौत्र जामाता (मनु गांधी के पति, हरिलाल गांधी के दामाद)
डॉ. शांति गांधी                गांधीजी के प्रपौत्र (डॉ. कांति गांधी के पुत्र, हरिलाल गांधी के पौत्र)
सूसन गांधी                   गांधीजी की प्रपौत्र
प्रदीप गांधी                   गांधीजी के प्रपौत्र (हरिलाल गांधी के पौत्र)
मंगला गांधी                  गांधीजी की प्रपौत्रवधू (प्रदीप गांधी की पत्नी)
उर्मि मश्रुवाला                 गांधीजी की प्रपौत्री (मनुबहन गांधी की बेटी)
मणिलाल गांधी                गांधीजी के दूसरे पुत्र
सुशीला गांधी                  गांधीजी की पुत्रवधू (मणिलाल गांधी की पत्नी)
सीता गांधी                   गांधीजी की पौत्री (मणिलाल गांधी की पुत्री)
नानूभाई धुपलिया               गांधीजी के पौत्र जामाता (सीता के पति, मणिलाल गांधी के दामाद)
अरुण गांधी                   गांधीजी के पौत्र (मणिलाल गांधी का पुत्र)
सुनंदा गांधी                   गांधीजी की पौत्रवधू (अरुण गांधी की पत्नी, मणिलाल गांधी की पुत्रवधू)
तुषार गांधी                   गांधीजी के प्रपौत्र (अरूण गांधी के पुत्र)
ईला गांधी                    गांधीजी की पौत्री (मणिलाल गांधी की पुत्री)
रामगोविंद मेवालाल             गांधीजी के पौत्र जामाता (ईला गांधी के पति)
रामदास गांधी                 गांधीजी के तीसरे पुत्र
निर्मला गांधी                  गांधीजी की पुत्रवधू (रामदास गांधी की पत्नी)
सुमित्रा गांधी                  गांधीजी की पौत्री (रामदास गांधी की पुत्री)
गजानन कुलकर्णी              गांधीजी के पौत्र जामाता(सुमित्रा गांधी के पति, रामदास गांधी के जामाता)
रामचंद्र  - श्रीकृष्ण             सुमित्रा गांधी के जुड़वा पुत्र (रामदास गांधी के दौहित्र)
सोनाली कुलकर्णी               सुमित्रा गांधी की पुत्री, (रामदास गांधी की दौहित्री)   
कनु गांधी                    गांधीजी का पौत्र, रामदास गांधी का पुत्र
शिवालक्ष्मी गांधी               गांधीजी की पौत्रवधु, रामदास गांधी की पुत्रवधू, कनु गांधी की पत्नी
उषा गांधी                    गांधीजी की पौत्री, रामदास गांधी की पुत्री
हरीश गोकाणी                 गांधीजी के पौत्र जामाता, रामदास गांधी के जामाता, उषा के पति
डॉ. आनंद गोकाणी              गांधीजी के प्रदौहित्र, रामदास गांधी के दौहित्र, उषा गांधी के पुत्र
संजय गोकाणी                 गांधीजी के प्रदौहित्र, रामदास गांधी के दौहित्र, उषा गांधी के पुत्र
देवदास गांधी                  गांधीजी के चौथे पुत्र
लक्ष्मी गांधी                   गांधीजी की पुत्रवधू, देवदास गांधी की पत्नी
तारा गांधी                    गांधीजी की पौत्री, देवदास गांधी की पुत्री
डॉ. ज्योतिप्रसाद भट्‌टाचार्य        गांधीजी के पौत्र जामाता, देवदास गांधी के जामाता, तारा गांधी के पति
सुकन्या भट्‌टाचार्य              गांधीजी की प्रदौहित्री, देवदास गांधी की दौहित्री, तारा गांधी की पुत्री
राजमोहन गांधी                गांधीजी के पौत्र, देवदास गांधी के पुत्र
उषा गांधी                    गांधीजी की प्रपौत्रवधू, देवदास गांधी की पुत्रवधू, राजमोहन गांधी की पत्नी
डॉ. रामचंद्र गांधी               गांधीजी के पौत्र, देवदास गांधी के पुत्र
लीला गांधी                   गांधीजी की प्रपौत्री, देवदास गांधी की पौत्री, रामचंद्र गांधी की पुत्री
गोपालकृष्ण गांधी               गांधीजी के पौत्र, देवदास गांधी के पुत्र
तारा गांधी                   गांधीजी की प्रपौत्रवधू, देवदास गांधी की पुत्रवधू, गोपालकृष्ण की पत्नी
दिव्या-अमृता                  गांधीजी की प्रपौत्री, गोपालकृष्ण गांधी की पुत्रियाँ
सुप्रिया गांधी                  गांधीजी की प्रपौत्री, देवदास गांधी की पौत्री, राजमोहन गांधी की पुत्री
देवव्रत गांधी                  गांधीजी के प्रपौत्र, देवदास गांधी के पौत्र, राजमोहन गांधी के पुत्र

( यह परिचय आज से 20 साल पहले का है, अब तक इनमें से कुछ परिवर्तन हो चुके होंगे।)







       

रविवार, 8 अक्टूबर 2017

एक पुत्र को जन्म दिया था सीता ने!

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रामायण की कथा के कई सारे संस्करण उपलब्ध हैं, लेकिन उस काल का सही वर्णन महर्षि वाल्मीकि द्वारा रची गई वाल्मीकि रामायण में ही मिलता है। वाल्मीकि रामायण के बाद श्रीराम एवं सीता के जीवन के सफर को अन्य कई ऋषि-विद्वानों ने अपने अनुसार लिखने की सोची।
फलस्वरूप कई सारे ग्रंथों-उपग्रंथों का जन्म हुआ। इनमें असल वाल्मीकि रामायण मंर बताए गए कई तथ्य तो मौजूद होते हैं, लेकिन कुछ रामायण प्रसंगों को कहानी का रूप देते हुए बदल दिया जाता है।
इन सभी ग्रंथों में राम एवं सीता के मिलन से लेकर वनवास एवं रावण के अंत की कथा अवश्य होती है, लेकिन इसके बीच कई सारी ऐसी कहानियां जोड़ दी गई हैं जिनका प्रमाण कहीं नहीं मिलता। उदाहरण के लिए जैन रामायण के अनुसार रावण को श्रीराम ने नहीं, बल्कि लक्ष्मण ने मारा था।
आनंद रामायण के अनुसार श्रीराम एक कठोर राजा थे, वे अपने राज्य में किसी को हंसने की अनुमति नहीं देते थे। किंतु ये सभी बातें वाल्मीकि रामायण में नहीं मिलती। महर्षि वाल्मीकि ने तो कभी “लक्ष्मण रेखा” का भी वर्णन रामायण कथा लिखते हुए नहीं किया।
रामायण काल के जिस प्रसंग की आज हम यहां चर्चा करने जा रहे हैं, वह श्रीराम एवं सीता जी और लक्ष्मण के वनवास से वापस अयोध्या आने के बाद की घटना पर है। यह वह समय है जब श्रीराम एवं सीता जी को पहली बार पता चलता है कि वे माता-पिता बनने वाले हैं।
यह सूचना मिलने पर कि सीता जी गर्भवती हैं, पूरे महल में खुशियों का माहौल बन गया, श्रीराम के साथ-साथ परिवार के सभी सदस्य अत्यंत प्रसन्न थे। लेकिन इन खुशियों के जाने का और दुखों के आने का समय दूर नहीं था।
जल्द ही यह बात सबके समक्ष आने लगी कि सीता जी अपने पति से दूर लंका में रहकर आई हैं, लेकिन सब जानते हुए भी श्रीराम ने उन्हें अपने जीवन में पनाह दी है। यह ऐसा समय था जब पत्नी यदि एक रात भी अपने पति से दूर रहती थी, तो उसे दोबारा पति के घर में दाखिल होने की अनुमति नहीं मिलती थी।
लेकिन लंबे समय के लिए रावण की लंका में रहने के बावजूद भी सीता जी अयोध्या के महल में सुखी थीं। यह देख अयोध्या की सभी पत्नियां भी अपने पति का विरोध करने लगीं। अब बात श्रीराम तक आ पहुंची, इस स्थिति को देखते हुए सीता जी ने स्वयं ही अयोध्या छोड़कर चले जाने का फैसला कर लिया।
स्वयं लक्ष्मण उन्हें जंगल तक छोड़कर आए जहां महर्षि वाल्मीकि उन्हें आकर ले गए। इस समय सीता जी गर्भवती थीं, यह ऐसा समय था जब उन्हें श्रीराम की सबसे अधिक आवश्यकता थी, लेकिन प्रजा का सुख देखते हुए उन्होंने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में एक आम संन्यासिन बनने का निर्णय ले लिया।
आश्रम में पहुंचकर महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें अयोध्या की सभी बातें भुलाकर, एक सामान्य जीवन व्यतीत करने की सलाह दी, तभी वे अपने दर्द से बाहर आ सकेंगी।
कई दिन बीत गए, दिन कुछ महीनों में भी तब्दील हो गए। वह समय बेहद समीप आ गया जब सीता जी एक संतान को जन्म देने वाली थीं। इस बीच ना उन्होंने अयोध्या के साथ किसी प्रकार का कोई संपर्क साधने का प्रयास किया और ना ही वहां से वाल्मीकि आश्रम में कोई सुखद संदेश आया।
कहा जाता है कि सीता जी के अयोध्या छोड़ देने के बाद श्रीराम ने राज्य तो बखूबी संभाला, लेकिन वे अंदर से दुखी रहने लगे। यह भी कहा जाता है कि श्रीराम जमीन पर सोते थे।
कुछ और दिन बीते तो वाल्मीकि आश्रम में नन्हें से बच्चे की किलकारी गूंज उठी। सीता जी ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया। वाल्मीकि जी के साथ आश्रम के सभी लोग प्रसन्नता से भर गए।
सीता जी द्वारा संतान को जन्म देने की घटना से संबंधित कई कहानियां प्रचलित हैं। लोक कथाओं के अनुसार तो सीता जी ने एक साथ दो बालकों को जन्म दिया था। लेकिन महर्षि वाल्मीकि द्वारा रची रामायण में इसका उल्लेख नहीं मिलता। ना ही इस बात को कोई प्रमाण दिया जाता है।
बल्कि एक अन्य कथा के अनुसार कुश के जन्म की बात बताई जाती है। जिस पुत्र को सीता जी ने जन्म दिया, उसका नाम ‘लव’ रखा गया। लव के जन्म के बाद सीता जी का अधिकतम समय उसके पालन-पोषण में गुजरता। आश्रम के अन्य लोग भी उसका ध्यान रखने में सीता जी की मदद करते।
एक दिन सीता जी कुछ आवश्यक लकड़ियां लाने के लिए आश्रम से बाहर के पास स्थित जंगल जा रही थीं (अन्य कथा के अनुसार नहाने के लिए नदी तक जा रही थीं), लेकिन उन्हें यह चिंता थी कि वे लव को कैसे लेकर जाएं।
निकलते हुए उन्होंने वाल्मीकि जी को कुछ कार्य करते हुए देखा, तो उन्होंने उनसे लव पर नजर रखने को कहा। सिर हिलाते हुए जवाब में हां कहकर वाल्मीकि जी ने लव को उनके पास बैठाने के लिए कह दिया, लेकिन जैसे ही सीता जी कुछ आगे बढ़ीं तो उन्होंने देखा कि महर्षि का ध्यान केवल अपने कार्य में हैं और वे लव की ओर देख भी नहीं रहे।
इसलिए सीता जी ने लव को साथ ही लेकर जाने का निर्णय लिया, लेकिन जब उन्होंने लव को उठाया तो महर्षि ने यह दृश्य नहीं देखा। कुछ देर बाद जब महर्षि ने इधर-उधर देखा तो उन्हें लव दिखाई नहीं दिया और उन्हें यह भय हुआ कि हो ना हो लव कहीं चला गया होगा और किसी जानवर का शिकार हो गया होगा।
अब वे सीता जी को वापस आश्रम लौटने पर क्या जवाब देंगे, सीता विलाप करने लगेगी, इसी डर के कारण वाल्मीकि जी ने पास में पड़े कुशा (घास) को लिया और कुछ मंत्र पढ़ने के बाद एक ‘नया लव’ बना दिया। यह लव हूबहू पहले जैसे लव की तरह ही था, अब उन्होंने सोचा कि सीता के वापस लौटने पर वो उसे यही लव सौंप देंगे और कुछ नहीं बताएंगे।
कुछ समय के पश्चात जब सीता आश्रम लौटीं ने उन्हें देख महर्षि चकित रह गए। उनके पास लव को पहले से ही देख वे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे। पूछने पर मालूम हुआ कि सीता जी लव को अपने साथ ही ले गई थीं।
लेकिन जब सीता जी ने उस नए लव को देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुईं। कुशा के कारण जन्म होने की वजह से, उसका नाम ‘कुश’ रखा गया। और वह श्रीराम और सीता जी की दूसरी संतान के रूप में जाना गया।

शनिवार, 11 मार्च 2017

किसी का भी झूठ पकड़ सकते हैं आप, जानें कैसे


लोगों की आदतें उनके स्वभाव का एक बड़ा हिस्सा बन जाती हैं। तभी तो वे क्या बोलते हैं, समझते हैं और क्या करना चाहते हैं इसका अंदाजा लगा पाना कठिन हो जाता है। उनका अंदाज़ इतना प्रभावशाली बन जाता है कि उनके द्वारा बोला गया झूठ भी सच लगने लगता है।

लोगों का अंदाज़

जी हां, कुछ लोगों का व्यक्तित्व ही कुछ इस प्रकार का होता है कि वह झूठ को भी सच से बढ़कर प्रदर्शित कर सकते की क्षमता रखते हैं। इतनी सफाई से झूठ बोलते हैं कि उसके सामने आपको सच्ची बात भी झूठी लगने लगती है।

झूठ से बचें

लेकिन सच को नीचा दिखाते हुए बोला गया झूठ आपके लिए बेहद हानिकारक है। इससे जितना हो सके बचें, परन्तु मुद्दा तो यह है कि ‘हम कैसे पहचानें कि सामने वाला व्यक्ति सच बोल रहा है या झूठ’?

झूठ का आत्मविश्वास

क्योंकि उसका बोलने का अंदाज़, उसका आत्मविश्वास और उसकी ओर से दी गईं दलीलें हमें इस असमंजस में डाल देती हैं कि किस बात पर विश्वास करें और किस पर नहीं।

कुछ आसान टिप्स

आपकी इसी दुविधा को हल करने के लिए इस आलेख  में कुछ ऐसे तरीके बताए जा रहे हैं जो आपको झूठ पकड़ने में मदद कर सकते हैं। यह टिप्स इतने कारगर हैं कि ये एक विशाल समुद्र में से भी पत्थर का छोटा सा टुकड़ा खोज पाने जितनी क्षमता से लैस हैं।

सच एवं झूठ में फर्क

दरअसल यह कोई जादू-टोना नहीं है बल्कि ऐसे टिप्स हैं जिन्हें आज़माने पर आप सच एवं झूठ में फर्क खोज सकते हैं। लेकिन इसके लिए जरूरी है आपकी एकाग्रता। आप जितना ध्यानबद्ध होकर सामने वाले व्यक्ति की समीक्षा करेंगे, उतना ही आप समझ पाएंगे कि उसके दिमाग में चल क्या रहा है।

दिलोदिमाग में चल रही बात

दूसरे शब्दों में यह मन एवं मस्तिष्क में चल रही बात को खींचकर ज़ुबान पर लाने की एक कोशिश है, जिसके सफल होने की संभावना काफी ज्यादा होती है। इन आसान टिप्स में आपको जिस व्यक्ति के सच या झूठ का टेस्ट करना है, उसकी हर हरकत का ध्यान रखना होगा।

पढ़ें बॉडी लैंग्वेज

सबसे पहले ध्यान दें उसकी बॉडी लैंग्वेज पर। किसी से बात करते समय जब भी आपको शक हो कि सामने वाला इंसान हो ना हो आपसे झूठ बोल रहा है तो उसकी बॉडी लैंग्वेज यानी कि उस समय वह किस तरह से व्यवहार कर रहा है, उस पर ध्यान दें।

चेहरे की चिंता

यदि बोलते समय वह बेहद आराम से बैठा है, उसके चेहरे पर कोई चिंता नहीं है तो इसका मतलब है वह झूठ नहीं बोल रहा। लेकिन इसके विपरीत यदि बात करते समय अचानक वह अपने हाथ-पांव हिलाने लगे, हाथों को जेब के भीतर डाल ले या फिर पांव को बैठे-बैठे हिलाने लगे तो इसका मतलब है कि कुछ गड़बड़ है।

हाथ-पांव की हलचल

उसकी ऐसी हरकत उसके भीतर चल रही चिंता को दर्शाती है। झूठ बोलते हुए भी उसके पकड़े जाने का भय उससे ऐसे फिजूल काम करवाता है। अमूमन ऐसी अवस्था में लोग झूठ बोलते समय हाथ-पांव खुजाते हैं या फिर सिर खुजाते हैं। तभी समझ जाएं कि वह इंसान आपसे कुछ छिपा रहा है।

आंखों की मूवमेंट

बॉडी लैंग्वेज में खास है आंखों द्वारा की जा रही हरकत। आंखें हमारे मन की खिड़की का काम करती हैं। जो मन में है वही आंखें उसी रूप में व्यक्त कर देती हैं। यदि बात करते समय कोई पूरे आत्मविश्वास से आंखों में आंखें मिलाकर बात कर रहा है तो उसके दिल में कोई दोष नहीं है।

आंखें चुराकर बात करना

लेकिन यदि वह आंखें चुरा रहा है या फिर बात करते समय उसकी आंखें आपकी बजाय कहीं दूसरी दिशा में हैं तब भी यह उसके द्वारा बोले जा रहे झूठ की निशानी है। कई बार बातों को छिपाने के लिए भी लोग बोलते हुए ज़मीन की ओर देखते हैं।

आवाज़ की थरथराहट को पहचानें

केवल आंखों की घबराहट ही नहीं, आवाज़ की थरथराहट भी बोले गए झूठ को बखूबी व्यक्त कर देती है। अचानक आवाज़ की टोन का बदल जाना, या फिर जानबूझकर कुछ छुपाते हुए जल्दी में बात करना। इतना ही नहीं, आवाज़ की हिचकिचाहट भी झूठ का पर्दाफाश कर देती है।

हिचकिचाहट

ऐसे में आपको इस आवाज़ को पहचानने की जरूरत है। फर्ज़ कीजिए, आप किसी से बात कर रहे हैं और अचानक अपने मन का कोई शक दूर करने के लिए आपने उनसे कोई सवाल कर लिया, तभी आगे से आपको चुप्पी मिलती है।

बातों को घुमाना

कुछ पल की शांति और फिर दोबारा उकसाने पर वह इंसान बातों को घुमाते हुए जब सामान्य गति से तेज़ अंदाज़ में बात करता है तो तुरंत भांप लें कि वह इंसान आपको झूठी पट्टी पढ़ा रहा है।  
तभी कहा जाता है कि किसी व्यक्ति के बोलने के अंदाज़ को समझ पाना ही अपने आप में एक कला के समान है। और यदि आप इसमें सफल हुए तो आपको कोई इंसान भी झूठी बात कहने की हिम्मत नहीं करेगा।  
परन्तु कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यह जरूरी नहीं कि तेजी से बोलने का संबंध झूठ से ही है। कई बार हड़बड़ाहट में भी इंसान गति बढ़ा लेता है। ऐसे में अपनी दुविधा को दूर करने के लिए आप एक और तरीका अपना सकते हैं।  
यदि नॉर्मल तरीके से बात करते हुए आपका दोस्त बहुत धीरे और सोच-सोचकर बात करने लगे तो तब भी यहां शक की संभावना बन जाती है।

यहां बढ़ती है शंका


दरअसल बात केवल गति की नहीं है, बात यह है कि आपसे वार्तालाप करते समय यदि अचानक कुछ पूछे जाने पर सामने वाले व्यक्ति की बोलने की स्पीड में बदलाव आए तो इसका कारण झूठ हो सकता है।

शनिवार, 26 नवंबर 2016

क्यों नहीं मिलती एक अपराधी और बलात्कारी को सजा?

राजीव दीक्षित
आपमें से अगर कोई वकील मित्र है तो उनको बात जरा जल्दी समझ में आएगी। हमारे देश में न्याय व्यवस्था का जो सबसे बड़ा कानून है, उसका नाम है IPC इंडियन पीनल कोड, एक दूसरा कानून है CPC सिविल प्रोसीजर कोड, एक तीसरा कानून है क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (अपराध दंड सहीता), ये 3 कानून है, जो भारतीय न्याय व्यवस्था के आधार बताए गए हैं या जिन्हें आधार माना जाता है आपको मालूम है ये तीनो कानून अंग्रेजो के ज़माने के बने हुए हैं। IPC को बनाने का काम तो खुद मैकाले ने किया था, IPC की ड्राफ्टिंग खुद मेकाले की बने हुई है जिसको इंडियन पीनल कोड यानि भारतीय दंड सहीता कहते है जिसके आधार पर दंड की व्यवस्था होती है,

 मेकाले ने अपने पिता को एक पत्र लिखा है उस पत्र में वो कहता है कि मैंने भारत में ऐसे न्याय के कानून का आधार रख दिया है जिसपर भारतवाशियों कभी को न्याय मिलेगा ही नहीं, जिसके आधार पर भारतवाशी न्याय पा ही नहीं सकते। हमेशा इनके ऊपर अन्याय होगा ये अच्छा ही होगा क्योकि गुलाम जिनको बनाया जाता है उनके ऊपर अन्याय ही किया जाता है उनको न्याय नहीं दिया जाता फिर जब राजीव दीक्षित जी और उनके साथियों ने ढूंढ़़ना शुरू किया तो पाया कि जो IPC नाम का कानून भारत में मैकाले ने 1860 में लागु किया यही कानून अंग्रेजो ने आयरलैंड में सबसे पहले लागु किया था आयरलैंड को अंग्रेजो ने गुलाम बनाकर रखा हुआ है हजार साल से। तो आयरलैंड को गुलाम बनाकर रखने के लिए अंग्रेजो ने कानून बनाया Irish Penal Code उसी कानून को भारत में कह दिया Indian Penal Code ।
आप जानते है जब आयरलैंड लिखते हैं तो A से नहीं लिखा जाता, I से लिखा जाता है Ireland तो आयरलैंड का I ले लिया और इंडिया का भी I है तो कानून वैसे का वैसा ही लगा दिया इस देश पर, जो आयरलैंड का कानून था आयरिश पीनल कोड वही इंडियन पीनल कोड है।
जब राजीव दीक्षित जी ने आयरलैंड के पीनल कोड को खरीदकर पढ़ा और इंडियन पीनल कोड को पढ़ा, दोनों को सामने रखा, तो राजीव दीक्षित जी को इतना गुस्सा आया कि इसमें तो कोमा और फुल स्टॉप तक नहीं बदला गया है वो भी वैसे का वैसे ही है। बस इतना ही किया मैकाले ने कि आयरिश पीनल कोड में जहाँ-जहाँ आयरिश है, वहां वहां इंडियन और इंडिया कर दिया बाकी की सब धाराए वैसी की वैसी हैं, सब अनुछेद वैसे के वैसे है तो आयरलैंड को गुलाम बनाकर रखना है, इसलिए आयरिश पीनल कोड बनाया और भारत को गुलाम बनाकर रखना है तो इंडियन पीनल कोड बना दिया।

जिस कानून को गुलाम बनाने के लिए तैयार किया गया हो उस कानून के आधार पर न्याय कैसे मिलेगा बताइए जरा, अन्याय ही होने वाला है सबसे बड़ा अन्याय क्या होता है कि जब IPC के आधार पर जब कोई मुकदमा दर्ज होता है, इस देश में, तो सबसे पहले तो मुकदमा दर्ज होने में ही महीनो महीनो लग जाते है FIR करनी पड़ती है, उसके बाद पुलिस को साबित करना पड़ता है, सबूत जुटाने पड़ते है, अदालत में जाना पड़ता है इस पूरी प्रक्रिया में ही देर लगती है, क्योकि तरीका अंग्रेजो का यही है, फिर अगर वो मुकदमा दाखिल हो जाए तो सुनवाई शुरू होती है सुनवाई के लिए सबूत इकठे किए जाते हैं उन सबूतों के लिए अंग्रेजो के ज़माने का एक कानून है Indian Evidence Act. और वो सबूत जल्दी इकट्ठे हो नहीं पाते हैं, धीरे धीरे समय बढता जाता है और एक मुकदमे को 4 साल 5 साल 10 साल 15 साल 20 साल 25 साल 30 साल 35 साल समय निकल जाता है मुक़दमे को दाखिल करने वाला मर जाता है फिर उसके लड़के-लड़कियाँ उस मुक़दमे को लड़ते है वो जवान होकर बूढ़े हो जाते हैं तब भी मुकदमा चलता ही रहता है चलता ही रहता है उसमे कभी अंतिम फैसला नहीं आ पाता।

 हमारे देश का दुर्भाग्य है कि आजादी ने 63 वर्षो में हमारे देश की अदालतों में लगभग साढ़े 3 करोड़ (2009 के आकड़ो के अनुसार) मुक़दमे हैं जो दर्ज किए गए हैं अलग अलग प्रार्थियो के द्वारा लेकिन उनमे कोई फैसला नहीं आ पा रहा है, साढ़े 3 करोड़ मुक़दमे लम्भित पड़े हुए हैं पेंडिंग हैं। हमारे देश के न्याय व्यवस्था के अधिकारियो से जब पूछा जाता है कि इन साढ़े 3 करोड़ मुकदमो का फैसला कब आएगा तो वो मजाक करते हुए कहते हैं कि 300 -400 साल में फैसला आ जाएगा तो जब कोई उनसे पूछते हैं कि वो कैसे ? तो वो कहते हैं कि जिस गति से कानून व्यवस्था चल रही है इस गति से तो इन सभी मुकदमो का फैसला आने में 300- 400 साल तो लग ही जाएगे तो ना वादी (मुकदमा दर्ज करने वाला) जिन्दा रहेगा ना प्रतिवादी (जिसके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है) जिन्दा रहेगा, न्याय व्यवस्था को इससे कुछ लेना देना नहीं है कि वादी जिन्दा है या प्रतिवादी जिन्दा है उनको को लेना देना है अंग्रेजो के बनाए गए कानून के आधार पर फैसला देने से।

 अब राजीव दीक्षित जी बहुत गहरी बात आपके बीच रखते हैं और सारे राष्ट्र का ध्यान इस और आकर्षित करते हुए कहते हैं कि “कोई न्यायधीश अंग्रेजो के बनाए गए कानून के आधर पर अगर फैसला दे रहा हैं तो वो न्याय कैसे कर सकता है ये पूछिए? अपने दिल से पूछिए उस न्यायधीश से पूछिए ”
न्यायाधीशो से जब जब राजीव दीक्षित जी ने ये पूछा है कि “क्या आप न्याय देते हैं” तो वो कहते हैं कि ईमानदारी से हम न्याय नहीं दे पाते, हम को मुकदमो का फैसला करते हैं। फैसला देना अलग बात है न्याय देना बिलकुल अलग बात है।
अब आपको एक उदहारण से समझाते हैं फैसला क्या होता है और न्याय क्या होता है। मान लीजिए आपने एक गाय को एक डंडे से पिटा तो कानून के हिसाब से आपको जेल हो जाएगी, गाय को डंडे से पीटना भारत में अपराध है जुर्म है इसके लिए जेल हो जाती है लेकिन अगर उसी गाय को आपने गर्दन से काट दिया और उसके मास की बोटी-बोटी आपने बेच दी बाजार में, आपको कुछ नहीं होगा क्योकि कानून से वो न्याय सम्मत है अब गाय को डंडे से मारो तो जेल हो जाती है लेकिन गाय को गर्दन से काटकर उसकी बोटी-बोटी बेचो तो भारत सरकार करोड़ो रूपए की सब्सिडी देती है आपको।

 मै अगर गोशाला खोलना चाहूं तो इस देश की कानून व्यवस्था के अनुसार मुझे बैंक से कर्ज नहीं मिल सकता, लेकिन गाय को कत्ल करने के लिए कत्लखाना बनाना हो तो उसके लिए बैंक करोड़ो रूपए कर्ज देने को तैयार है मुझे। आप सोचिए मैं गौशाला बनाकर गाय का दूध बेचना चाहता हूँ, बैंक के पास जाता हूँ कि मुझे कर्ज दे दो। बैंक कहता है कि हमारी योजना में गाय को कर्ज देने की व्यवस्था नहीं है लेकिन उसी बैंक के पास मै जाता हूँ कि मुझे कत्लखाना खोलना है और मुझे कर्ज दे दो तो बैंक ख़ुशी से कर्ज देता है उस कर्जे पर ब्याज सबसे कम लिया जाता है और करोड़ों रूपए का कर्ज तो मुफ्त में दिया जाता है सब्सिडी के रूप में। आप बताओ कि अगर हम गाय का मास बेचने के लिए कतलखाना खोलू तो हमारे लिए कर्ज है सब्सिडी है गौशाला खोले गाय के पालन करने के लिए तो हमें ना तो सब्सिडी है ना बैंक की कोई मदद है ऐसी व्यवस्था में न्याय कहा हो सकता है।
और एक उदहारण से समझे अगर किसी बच्चे को जन्म लेने से पहले कोई मारे ना तो उसे गर्भपात कहके छोड़ देते हैं, लेकिन जन्म लेने के बाद मारे तो हत्या हो जाती है धारा 302 का मामला बनता है, बच्चे को गर्भ में मारे तो भी हत्या है जन्म लेने के बाद मारे तो भी हत्या है दोनों में सजा एक जैसी होनी चाहिए और वो फांसी ही होनी चाहिए, लेकिन जन्म से पहले मारो तो गर्भपात है और जन्म के बाद मारो तो हत्या है इसलिए इस देश के लाखों लालची डॉक्टर करोड़ो बेटियों को गर्भ में ही मार डालते है क्योकि गर्भ में मार देने से उन्हें फांसी नहीं होती है, गर्भ में बाहर मरेंगे तो उन्हें फांसी होने की संभावना है, एक करोड़ बेटियों को हर साल इस देश में गर्भ में ही मार दिया जाता है इसी कानून की मदद से। अब आप बताओ कि बेटी को गर्भ में मार दो तो गर्भपात और गर्भ में बहार मारो तो हत्या। अगर इन कानूनों के आधार पर कोई फैसला होगा तो क्या वो न्याय दे सकता है, फैसला हो सकता है न्याय नहीं दे सकता,
इसलिए राजीव दीक्षित जी इस देश के बड़े न्यायाधीशों को कहते हैं कि आप लोगो को अपना नाम बदलना चाहिए, कायदाधीश लिखना चाहिए, कानूनाधीश लिखना चाहिए आप न्यायाधीश तो हैं ही नहीं, क्योकि आप न्याय तो दे ही नहीं पा रहे है आप तो मुकदमो का फैसला कर रहे हैं, अगर अंग्रेजी में उनके शब्दों में कहे तो वो कहते हैं हम तो केस डीसाइड करते है, जजमेंट नहीं करते क्योकि न्याय देना बिलकुल अलग है मुक़दमे का फैसला देना बिलकुल अलग है। मुक़दमे का फैसला होता है कानून के आधार पर और न्याय होता है धर्म के आधार पर, सत्य के आधार पर। धर्म और सत्य से न्याय की स्थापना हो सकती है कानून से न्याय की स्थापना नहीं हुआ करती है। दुर्भाग्य से हमारे देश में धर्म और सत्य की सत्ता नहीं है कानून की सत्ता है लॉ एंड आर्डर की बात होती है धर्म और न्याय की बात नहीं होती तो ये अंग्रेज छोड़ के चले गए कानून व्यवस्था को और वही ढो रही है हम आजादी के 70 साल के बाद भी।
राजीव दीक्षित