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सोमवार, 20 जनवरी 2025

महाकुंभ का वैज्ञानिक कारण

आज जानते हैं महाकुंभ के बारे में जो की  12 वर्षों के पश्चात दो ग्रहों एवं एक उपग्रह की त्रिकोणीय उपस्थिति के कारण बनता है। खासकर प्रयागराज में जहां के मुख्य केंद्र बिंदु के ऊपर बृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा के उपस्थिति में जो किरणें प्रयागराज त्रिवेणी के संगम में स्नान करने के दौरान पड़ता है उस कारण से हमारे शरीर को कितना पावरफुल बना देता है। इस वर्ष 2025 में तीनों ग्रह एवं उपग्रह लगभग 42 दिन तक इस स्थिति में रहेंगें। इस त्रिकोणीय स्थिति में शरीर को प्राप्त ऊर्जा सभी मरे हुए डेड सेल्स को सक्रिय कर देता है एवं बड़े-बड़े शरीर में मौजूद रोगों को नष्ट कर देता है, साथ ही आपके मन को प्रफुल्लित कर 100% सारी कोशिकाओं एवं ब्लॉक नसों को सक्रिय कर देता है।

     पृथ्वी नेगेटिव चार्ज है एवं नदी का पानी करंट का कंडक्टर है, जब हमारा शरीर आधा नदी में रहता है हमारा पैर पृथ्वी के ऊपर रखा रहता है और आधा शरीर एवं सिर जो धूप में रहता है, वह सूर्य की किरणें एवं बृहस्पति ग्रह के चुंबकीय ऊर्जा से पॉजिटिव एनर्जी प्राप्त कर सीधे शरीर में प्रवेश करता है एवं यही ऊर्जा अत्यधिक मात्रा में शरीर ग्रहण कर पूर्णरूपेण सक्रिय हो जाता है। इससे हमारे शरीर के सभी रोग दूर हो जाते हैं एवं हमारा शरीर प्रफुल्लित होता है। इस कारण से हमारा दिमाग भी बहुत तेज हो जाता है। स्वास्थ्य से संबंधित शरीर को ऊर्जा मिलने के कारण शरीर की उम्र भी बढ़ जाती है

मकर संक्रांति और महाकुंभ का गहरा महत्व -

महाकुंभ और इसमें निहित वैज्ञानिक आधारों को हम देखें तो हम पाते हैं कि यह अति प्राचीन एवं वृहद त्योहार भी खगोलीय संरेखण पर आधारित है. जैसा हम जानते हैं कि आज की अंतरराष्ट्रीय खगोल वैज्ञानिक संघ की ग्रहीय परिभाषा के अनुसार आज हमारे सौर मंडल में आठ ग्रह हैं. जिनका सूर्य से दूरी के क्रम में नाम निम्नानुसार है. आठ ग्रह बुद्ध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण हैं. उनमें से सबसे बड़ा ग्रह है बृहस्पति, जिसे गुरु भी कहा जाता है. प्राचीन कालीन सभ्यताओं ने भी पांच ग्रहों को अपनी साधारण आंखों से ही पहचान लिया था. जिनमें से बृहस्पति भी एक था. आज के समय में भी अगर आप भी थोड़ा अधिक प्रयास करेंगे तो अलग अलग रात्रि के दौरान दिखाई देने वाले इन पांचों ग्रहों को विभिन्न समय पर आप भी पहचान सकते हैं. गुरुवार जोकि शुक्र ग्रह के बाद सबसे ज्यादा चमकीला पिंड है, यह मुख्य रूप से लगभग 75 प्रतिशत हाइड्रोजन और 24 प्रतिशत हीलियम और अन्य से बना हुआ है.

1610 में हुई थी 4 बड़े चंद्रमाओं की खोज : दूरबीन से देखने पर इस पर बाहरी वातावरण में दृश्य पट्टियां भी दिखाई देती हैं और एक लाल धब्बा भी है, जिसे ग्रेट रेड स्पॉट कहा जाता है, जिसे गैलीलियो ने 17वीं सदी में अपनी दूरबीन से देखा था जबकि हमारे भारत में ऋषि के रूप में मौजूद वैज्ञानिक इसको हजारों वर्ष पहले ही जान चुके थे. सर्व प्रथम 1610 में गैलीलियो गैलिली ने इसके चार बड़े चंद्रमाओं को देखा. जिनके नाम हैं गैनिमेड, यूरोपा, आयो, कैलिस्टो. अगर हम बृहस्पति ग्रह की तुलना अपनी पृथ्वी से करें तो हम पाते हैं कि इसमें लगभग 1331 पृथ्वी समा सकती हैं, और इसका चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी की तुलना में 14 गुना ज्यादा शक्तिशाली है. यह सूर्य से लगभग 77 करोड़ 80 लाख किलोमीटर दूरहै और सूर्य का एक चक्कर लगाने में 11.86 वर्ष का समय लगता है जोकि लगभग 12 वर्ष के बराबर होता है, इसे हमारे पूर्वज पहले ही जान चुके थे. बृहस्पति का अक्षीय झुकाव केवल 3.13 डिग्री है. जिस कारण इस पर कोई मौसम परिवर्तन नहीं होता है. यह बहुत तेज़ गति से घूर्णन करता है. अपने अक्ष पर 09 घंटा 56 मिनट्स में एक बार घूमता है, इसका मतलब होता है कि इसका दिन लगभग 10 घंटे का ही होता है.

 इसे आधुनिक खगोल विज्ञान में वैक्यूम क्लीनर भी कहा जाता है, जोकि पृथ्वी पर आने वाले धूमकेतुओं से भी बचाता है. बृहस्पति ग्रह जिसे गुरु भी कहा जाता है का हमारे देश में एक विशेष स्थान है क्योंकि भारत में कुम्भ मेला आयोजित होता है. कुम्भ का शाब्दिक अर्थ होता है कलश. और कलश का मतलब होता है घड़ा, सुराही या पानी रखने वाला बर्तन. और मेला का मतलब होता है कि जहां पर मिलन होता है. इस मेला के दौरान शिक्षा, प्रवचन, सामूहिक सभाएं, मनोरंजन और यह सामुदायिक वाणिज्यिक उत्सव भी हैं, बड़ी बात यह है कि यह त्यौहार दुनिया की सबसे बड़ी सभा माना जाता है. इस उत्सव को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया है. खगोलीय गणनाओं के हिसाब से यह मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारंभ होता है और जब एक खास खगोलीय संयोजन घटित होता है तभी यह मेला घटित होता है.


अगली बार 2157 में लगेगा महाकुंभ मेला : खगोलविद ने बताया कि महाकुंभ तब आयोजित होता है जब सूर्य मकर राशि में, चंद्रमा मेष राशि में और बृहस्पति कुंभ राशि में होता है. इस बार वर्ष 2025 में प्रयागराज में पूर्ण कुम्भ मेला आयोजित किया जा रहा है. महाकुम्भ मेला प्रयागराज में प्रत्येक 144 वर्ष अर्थात 12 पूर्ण कुम्भ मेलों के बाद आयोजित होता है.

महाकुम्भ मेला अगली बार 2157 में लगेगा, जब गुरु कुम्भ राशि में, सूर्य मेष राशि में और चन्द्रमा धनु राशि में होता है तब कुम्भ मेला हरिद्वार में लगता है. जब गुरु वृषभ राशि में सूर्य, चन्द्रमा मकर राशि में होते हैं तब प्रयागराज में कुम्भ मेला आयोजित होता है.

जब गुरु सिंह राशि में सूर्य, चन्द्रमा कर्क राशि में होते हैं तो नासिक में कुम्भ मेला आयोजित होता है।

जब गुरु सिंह राशि में सूर्य, चन्द्रमा मेष राशि में होते हैं तो कुम्भ मेला उज्जैन में आयोजित होता है. जब गुरु सिंह राशि में होते हैं। तब त्र्यंबकेश्वर नासिक और उज्जैन में आयोजित होता है, जिसे सिंहस्थ कुंभ मेला भी कहा जाता है.

निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं कि दोनों घटनाएं, मकर संक्रांति और महाकुंभ, महत्वपूर्ण खगोलीय गतिविधियों के साथ संरेखित होती हैं जो मौसमी परिवर्तनों, मानव शरीर विज्ञान और पर्यावरण को प्रभावित करती हैं, जोकि हमारे पूर्वजों के विशिष्ट प्राचीन ज्ञान को भी दर्शाते हैं जो खगोलीय ज्ञान को स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देने वाली प्रथाओं के साथ एकीकृत भी करता है.

बुधवार, 1 नवंबर 2023

ये दे फेर आगे ललकारत रावन

 सुनो भाई उधो

पूरे संसार में रावण का साम्राज्य फैला हुआ है।  श्रीलंका से निकलकर यूक्रेन, रूस, कनाडा, ईरान, इराक, इजरायल, फिलिस्तीन, अफगानिस्तान सहित सभी देशों में अपना पांव पसार लिया है। कहीं युद्ध, कहीं मारकाट और खून-खराबा... सब इससे आतंकित, दुखी और परेशान हैं। भारत भर में इसका बूत बनाकर मारा-पीटा, जलाया। लेकिन दूसरे दिन फिर वहां जिंदा होकर आ गया और उधम मचाने लगा है। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख...। 

कोनो ल मारना, दुचरना, ओकर जान लेना आसान नइ होवय। ओला तैं एक झापड़ मारबे, लात-घूसा लगाबे तब अपन आप ल बचाव खातिर कुछु तो उहू हा उदिम करही अउ करथे घला। फेर भीड़ के मारे ककरो कांही नइ चलय। बोहावत गंगा मं सबो झन ल हर्रा लागय न फिटकरी तइसन कस सबो झन सोचथे वइसने कस हाल होगे। अस मारिन रावन ल, दुचरिन, लात-घूसा लगइन, जेकर जइसन मन लगिस तइसने लइका-सियान सबो एक-दू थपरा मार ले नइ छोडिऩ। 

महूं सब झन के देखा-सिखी, आरुग काबर राहौं, कोनो अइसे झन सोचय एहर रावन के आदमी हे, संगवारी हे, तेकर सेती चिनहारी काबर बनौ, सोच के दू-चार हाथ जमा देंव, मार के मारे सिहरगे रिहिसे, कल्हरत रिहिसे। सोग तो लगिस, गारी घला देंव मरइया मन ल मने-मन, फेर सबके नजर मोर ऊपर रिहिसे, एहर मारथे के नहीं, बजेड़ेंव गारी देवत, साले अंखफुट्टा, सबके बहू-बेटी ऊपर नीयत खराब करथस, लूटपाट, आतंक, भ्रष्टाचार, अत्याचार करथस। गांव, शहर, देश ल कोन काहय, पूरा विदेश मं दाउद इब्राहिम, लादेन, हमास, हिजबुल सही आतंक फइलाके रखे हस। पूरा जनता बियाकुल हे तोर मारे। 

ये रावन के परिवार संसार भर मं बगरगे हे। यूक्रेन, रूस, अमेरिका, इजराइल, फिलिस्तीन, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान अउ भारत तक ल नइ छोड़े हे। गलत काम, धंधा करना एकर पेशा हे। कतेक सइही कोनो। डर के मारे कोनो कांही नइ काहय एकर मतलब ये तो नइ होवय के छानही मं चढक़े होरा भूंजना चाही। अति के घला एक दिन अंत आथे। लादेन ल देखेव नहीं, कइसे पताल के चटनी असन सील लोड़हा मं पीसागे। बहुत पदनीपाद पदोवत रिहिसे। रायपुर मंं काली सप्पड़ मं आगे, कप्तान ल जइसे सूचना मिलिस के रावन ओकर शहर मं आ धमके हे, ओकर कान खड़ा होगे। सायरन बजावत तीन-चार लारी (बस) समेत कप्तान पुलिस दल-बल के संग रामलीला मैदान मं पहुंचगे। मैदान मं कटाकट भीड़, सब रावन ल मारते राहय। कप्तान रावन के तीर मं पहुंचतिस तेकर पहिली ओकर ऊपर केरोसिन छिडक़ के आगी छोड़ दीन। भांय-भांय करके जले लगिस। 

नंदकुमार बघेल ल कोन कोती ले सूचना मिलिस ते उहू हर यहा सियानी उमर मं लुड़बुड़-लुड़बुड़ करत भीड़ ल काहत रिहिसे- ‘अरे मत मारौ रे ब्राम्हण कुमार रावन ल’ तुमन ल ब्रम्ह हत्या के पाप लग जही। अब भीड़ मं ओकर बात के कोन सुनइया। जब ये सुनिस के रावन तो भांय.. भांय.. करके जलत हे, मार डरिन ओला। ओ छाती पीटे ल धर लिस अउ किहिस- हत् रे हत्यारा हो। कोनो ओकर बात ल नइ सुनिन अउ रावन मरे के खुशी मं सब फटाखा फोरे लगिन। 

रावन मरे के खुशी तो महूं ल होइस, काबर ओकर परसादे कतको मोरो काम सधत रिहिसे। फेर रिहिसे बदमाश, जेकर घर जातिस तेकरे बहू-बेटी अउ बाई ल आरुग नइ छोड़तिस। ओकर आतंक के देखे सब मुंह मं पैरा बोज लंय। पउर साल वइसने रामसागरपारा मं बड़े परिवार के बेटी ल तलवार के बल मं खीचं के लेगे। मजाल कोनो रोक लय। शेर संग कोन बैर ठानही, जान गंवाही। कोनो सेठ, साहूकार अउ उद्योगपति ल फोन मं धमकी देके लाखों, करोड़ों रुपया मंगा लय, कोनो अनाकानी करतीन तब बहू-बेटी नइते छोटे-छोटे लइका मन के अपहरन करे के धमकी दे देवय। ओकर डर के मारे पुलिस मं कोनो रिपोट घला नइ लिखावयं।

बड़े-बड़े नेता, मंत्री, नौकरशाह, ठेकेदार मन ल तो ये रावन अपन लंगू-झंगू असन समझय। कोन ल चुनाव जितवाना हे, मंत्री बनवाना हे, ओ सब एक इशारा मं पलक झपकते करवा दय। पूरा देश का विदेश मं एकर डंका बाजत रिहिस हे तउन हा कइसे जब कुकुर के मौत आथे तब शहर कोती झपाथे कहिथे नहीं तइसे कस हाल होगे। शहर के जनता मन ओला दुचर-दुचर के मार डरिन, अउ आगी छोड़ दीन, भांय.. भांंय.. करके ओकर काया पंचतत्व मं मिलगे। सब कुछ होगे तब कप्तान पहुंचथे अपन पुलिस बल लेके। हमर देश के पुलिस अइसने होथे, हवा मं फायर करना भर जानथे अउ बहादुरी के बड़े-बड़े तमगा लेये मं कभू पीछू नइ राहय। 

बिलासपुर, दुरुग, भिलाई अउ राजनांदगांव ले मोर करा फोन आथे, कहिथे- हमन सुने हन, रायपुर वाले मन रावन ल मार डरेव, बड़ा बहादुरी के काम करेव। जेकर नांव ल सुन माईलोगिन के गरभ गिर जथे, रोवत लइका चुप हो जथे तउन परतापी रावन ल तुमन मार डरेव? मैं केहेंव- हां... हां... भई, मार डरेन, तुंहर मन असन गीदड़ नइ हन। रायपुर वाले मन डालडा घी नहीं बाबा रामदेव के कम्पनी पतंजलि के बने घी खाथन, समझेव। मोर जुआब ल सुनके ओकर मन के बोलती बंद होगे। 

रावन मरे के खुशी मं बने घर मं खीर-पुड़ी हकन के खायेन। बेफिकर होके रात मं लात-तान के सोयेन। बिहनिया ‘मार्निंग वाकिंग’ मं निकलिहौं सोच के दरवाजा करा पहुंचथौ तब देखथौं, उही रावन जउन ल काली दुचर-दुचर के मारे रेहेन, आगी मं लेसे रेहेन तउन ह संउहत अड़दंग खड़े राहय, मेंछा मं ताव देवत। ओला देखते साठ मोर चड्डी पेंट खराब होगे, केहेंव- अरे बाप रे, अब का होही, परान नइ बाचय ददा। दउड़े-दउड़े बाथ रूम मं आयेंव। अब का बतावौं, मोर ‘बी.पी.’ हाई होगे। मन मोला ललकारथे- शेर बनत रेहे बेटा, अब कइसे घुसडग़े तोर सबो होशियारी?

डर के मारे कांपे ले धर लेंव। हाथ तो छोड़े रेहेंव। एक झन महिला संगवारी ल फोन करथौं- मइया मोर संग अइसन-अइसन घटना होगे हे, आठ दस दिन बर तोर घर मं एकाध कमरा खाली होही ते दे देते। ओहर समझावत कहिथे- भइया, जउन रावन ल मारे हन कहाथौ ओ असली रावन नोहे, ओकर छाया ल देखे के डेर्रावत हस। असली रावन तो तोर हिरदे मं बसे हे, उही ल मार। उही ल जउन दिन मार लेबे तउन दिन तोर मन, हिरदय अउ घर मं रामराज आ जही। ओ दिन ओ मइया मोर आंखी ल खोल दीस, सोचेंव- रावन कोनो मनखे नोहय, हमरे मन के मन-चित्त मं रचे-बसे विकार हे, काम, क्रोध, मोह, लोभ अउ अहंकार हर हे, इही ल जउन दिन मारबो, विजय पाबो ओकर ऊपर तभे सबो कोती सुख, शांति अउ संतोष उजियारा बगर जही। 

-परमानंद वर्मा

सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

छठ पूजा का महत्व

1. यह पूर्णरूप से प्रकृति की पूजा है, जिस प्रकृति से हम सबका जीवन चलता है। 

 2. वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित पूरे संसार में ऊर्जा के स्रोत भगवान भाष्कर की आराधना की जाती है। 

 3. उगते सूरज की पूजा तो सब करते है, इस पर्व में डूबते सूरज की भी पूजा की जाती है। 

 4. यह पर्व किसी भी जाति व सम्प्रदाय के बंधन से मुक्त है। इसे हर कोई कर सकता है। 

 5. यह सामाजिक सहजीविता का अनुपम उदाहरण है। इसमें प्रयुक्त होने वाले कुछ वस्तु डोम यानि दलित के घर से भी आते है। 

 6. इसमें अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े , ऊंच-नीच किसी का भेद नहीं है। 

 7. छठी मैया की पूजा प्रकृति में उपलब्ध सामान्य वस्तु केला, नींबू, बैगन, मूली, गन्ना, फल, गुड़ व दूध से बनी वस्तुओं से होती है। कोई कीमती चढ़ावा नहीं। 

 8. स्वच्छता व पवित्रता का सबसे अधिक ध्यान रखा जाता है। 

 9. इसमें किसी पंडित - पुरोहित या किसी तंत्र-मंत्र की जरूरत नहीं है। 

 10. इसमें भक्त व भगवान के बीच सीधा संवाद है,- आत्मा से परमात्मा का सीधा सम्पर्क बिना किसी के मदद के। यह पवित्र मन से पूर्ण समर्पण का पर्व है। 11. इस पर्व को 70 साल तक उम्र के लोग करते है। करीब 3 दिन का निर्जला उपवास के बाद सुबह 4 बजे से भींगे बदन ठंडे पानी में ठंड के मौसम में करीब 2 घण्टे पानी में खड़े होकर भगवान सूर्यदेव व छठी मैया की आराधना करते है, लेकिन आज तक कहीं किसी के भी सर्दी-जुकाम तक होने की शिकायत नहीं मिली।  यह है छठी मैया व सूर्य देव के पूजा का महत्व। साक्षात प्रमाण है इनके शक्ति का। 

कौन हैं छठी मैया ?

लोगों में यह एक आम जिज्ञासा यह रही है कि भगवान सूर्य की उपासना के लोक महापर्व छठ में सूर्य के साथ जिन छठी मैया की अथाह शक्तियों के गीत गाए जाते हैं, वे कौन हैं। ज्यादातर लोग इन्हें शास्त्र की नहीं, लोक मानस की उपज मानते हैं। लेकिन हमारे पुराणों में यत्र-तत्र इन देवी के संकेत जरूर खोजे जा सकते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार सूर्य और षष्ठी अथवा छठी का संबंध भाई और बहन का है। षष्ठी एक मातृका शक्ति हैं जिनकी पहली पूजा स्वयं सूर्य ने की थी। 'मार्कण्डेय पुराण' के अनुसार प्रकृति ने अपनी अथाह शक्तियों को कई अंशों में विभाजित कर  रखा है। प्रकृति के छठे अंश को 'देवसेना' कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इनका एक नाम षष्ठी भी है। देवसेना या षष्ठी श्रेष्ठ मातृका और समस्त लोकों के बालक-बालिकाओं की रक्षिका  हैं। इनका एक नाम कात्यायनी भी  है जिनकी पूजा नवरात्रि की षष्ठी तिथि को होती रही है। पुराणों में निःसंतान राजा प्रियंवद द्वारा इन्हीं देवी षष्ठी का व्रत करने की कथा है। छठी षष्ठी का अपभ्रंश हो सकता है। आज भी छठव्रती छठी मैया से संतानों के लंबे जीवन, आरोग्य और सुख-समृद्धि का वरदान मांगते हैं। शिशु के जन्म के छह दिनों बाद इन्हीं षष्ठी या छठी देवी की पूजा का आयोजन होता है जिसे बोलचाल की भाषा में छठिहार कहते हैं। छठी मैया की एक आध्यात्मिक पृष्ठभूमि भी हो सकती है। अध्यात्म कहता है कि सूर्य के सात घोड़ों पर सवार की सात किरणों का मानव जीवन पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। सूर्य की छठी किरण को आरोग्य और भक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला माना गया है। संभव है कि सूर्य की इस छठी किरण का प्रवेश अध्यात्म से लोकजीवन में छठी मैया के रूप में हुआ हो।



शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2022

कहां हे रावन, कोन हे रावन, घर-घर हे रावन

दसहरा तिहार विजय, खुशी अउ आनंद के तिहार हे, बुराई मं अच्छाई के विजय के तिहार हे। आज के दिन गांव ले लेके देस, परदेस तक मं घर-घर मं मनाय जाथे। बुराई के परतीक रावन के पुतला ल आगी के हवाले करे जाथे। देखते देखत ओ रावन जर के राख हो जथे। 

पहिली तो कहूं-कहूं रावन के पुतला बनावय, हमला सुरता आवत हे, जब नानकिन लइका रेहेन तब तीर-तखार कोनो गांव मं अइसन पुतला नइ बनावत रिहिन  हे, जइसन आज देखे ले मिलथे। अब तो गांव-गांव, गली-गली, शहर-शहर मं दू कोरी (बीस) ल कोन काहय पांच-पांच कोरी ऊंच के रावन के पुतला बनाय ले धर ले हें। कतको जघा मं तो पक्की सीमेंट के घला रावन के पुतला बनवा डारे हे। लगथे सब आज राम के कम, रावन के भक्त जादा जनम ले लेहे। एकर परमान हर गांव, हर गली अउ हर शहर मं देखे जा सकत हे। पुलिस थाना मं अइसन रावन भक्त अउ सूर्पनखा देखे जा सकत हे, बड़े-बड़े होटल, क्लब अउ माल मन में घला सूर्पनखा अउ रावन के औलाद मन गुलछर्रा उड़ावत हे। अब राम के नहीं, सचमुच मं ये दुनिया भर मं रावन के राज चलत हे। 

जउन जतके झूठ-लबारी, गलत काम, अनीति, अत्याचार, कुकरम, बेइमानी, भ्रष्टाचार करत हे ओकर मन के चांदी हे, रोज इहां दुरपति मन के चीरहरन, शीलहरन का-का नइ होवत हे। हत्या, लूट, आतंक के कारोबारी सब जघा बगरे हे। सतवादी गहूं मं कीरा असन रमजावत हे, मरत हे, सड़त-गलत हे। गांधी बबा के 'रघुपति राघव राजा राम के भजन के कोनो सुनइया नइहे। सब दारू, गांजा , भांग , हफीम अउ चरस पीके डिस्को डांस करके छोकरी मन असन जेती देखबे तेती रावन जिंदाबाद के नारा लगत हे। झूठ के बोलइया, सकलकर्मी मन दरबार के खिलाड़ी बन बइठे हे। 'अंधेर नगरी चउपट राजा कस खेल चलत हे। 

रावन कोनो अउ दूसर नोहय, मनखे के अंदर जउन बुराई, पांच विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह अउ अहंकार हे, उही हर रावन हे। एमन पहिली जेल मं रिहिन हे, याने एला संयम, नियम के हथकड़ी पहिरा के धांधे  रिहिन हे। अब इही कैदी मन बरोबर जेल के दीवार ला फांद के बाहिर निकलगे हे अउ भारी उत्पात मचावत हे, देस ला कोन काहय, संसार भर मं। हद करत हे रावन, धरउन नइ देवत हे, पकड़ावत नइहे। बड़े-बड़े रावन रोज पैदा होवत हे। कोनेा देस अइसे हे जिहां रावन के पैदावार नइ होवत हे। आज के तारीख मं ओमन ला आतंकवादी कहिथे। ओ तो अमरीका हे जउन ओसामा बिन लादेन, जवाहरी जइसन दुरदांत रावन मन ला ठिकाना लगइस हे। पाकिसान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, इजराइल अउ भारत जइसन देस मं घला नकली भेस मं रावन जनम ले ले हे। ओमन ला जानना, अउ पहिचानना कठिन हे। जानत, मानत सब हे फेर कोनो बोल नइ सकत हे, काबर 'समरथ को नहीं दोस गोसाई जब गोसाइयां हर रावन होगे हे तब गोसइन, परिवार, लइका अउ गांव के का हाल ल लेबे। 

धन हे ये दुरगा मइया के जउन अइसन राक्षस, रावन मन ल संहार करे खातिर जनम लेथे। इही पाके तो ओला महिसासुर मरदिनी कहिथे। आज अष्टमी हे, कल नवमी हो जही। परन दिन दसहरा। अब ओ मइया कोनो-कोन, कतेक महिसासुर, राक्षस अउ रावन के संघार करथे तउन पता चल जही। इही रावन के खातमा होय के सुरता मं खुशी के रूप मं देशभर मं दशहरा  तिहार मनाय जथे। 

अलग-अलग परदेस मं, गांव मं, शहर मं कई रूप मं ये तिहार ल मनाय जथे। हमर छत्तीसगढ़ मं बस्तर अइसे जघा हे जिहां नवरात शुरू होय के दिन ले दशहरा उत्सव मनाय बर धर लेथे। विश्व परसिध बस्तर दशहरा के एक अलग-अपन विधान हे, नियम हे। जानकारी मिले हे तेकर अनुसार नवरात के पहिली दिन ले लकड़ी के बनाय रथ ल छै दिन तक परिकरमा कराय जाथे। ये परम्परा चार सौ गियारह साल पहिली शुरू करे गे रिहिसे तउन आज तक चलत आवत हे। राजा बीरसिंह देव एला शुरू करवाय रिहिसे। ए रथ ला फूल रथ के हे जाथे। रथ मं आठ पहिया होथे, एला विजय रथ घला कहिथे, हर साल1एला बनाय ले परथे। 

वइसने बस्तर दशहरा के शुरूआत उहां के राजा पुरुषोत्तम देव के शासनकाल मं होइस हे। बताथे- महाराजा पुरुषोत्तम भगवान जगन्नाथ के भक्त रिहिसे। ओहर सोलह पहिया वाले रथ मं चार पहिया अलग जुड़वाइस तेला गोंचा रथ कहिथे, अइसन बारह पहिया वाला रथ ला दशहरा रथ के नांव दे गिस तउन ला दो सौ साल तक खींचे गिस। ए रथ मन के अलग इतिहास हे जउन दशहरा उत्सव के बखत खींचे जात रिहिसे। चार पहिया वाला फूल रथ अउ आठ पहिला वाला ला विजय रथ के नाव दे गिस। इही रथ मन जेमा देवी अउ राजा विराजमान रहिते, दो सौ साल ले खींचे जाय के परमान हे अउ आज ले चलत आवत हे। विश्व परसिध ये बस्तर दशहरा ल देखे खातिर अपन देश ल कोन काहय, विदेश के मन घला हर साल देखे ला आथे। बाकी जघा तो बनाय रावन के पुतला ला आगी के हवाले कर दे जाथे। राम-लछिमन बनाके रावन मैदान मं ले जाथे, ओमन परतीक स्वरूप बान चलाथे अउ रावन धरासायी हो जथे। इकरे सुरता मं राम लीला घला जघा-जघा करथे। दूसर दिन फेर रावन सड़क मं जाथे अउ शुरू हो जथे ओकर घमा-चौकड़ी, उत्पात अउ आतंक। जब तक अंतस मं घर जमाये बइठे बुराई (रावन) नइ मरिही, रावन जीयत रइही। अउ ओकर सेनापति, सिपाही मन के आतंक बने रइही।

-परमानंद वर्मा

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

छत्तीसगढ़ के राऊत नाचा के दोहों में कटाक्ष





छत्तीसगढ़ की दिवाली में एक प्रमुख आकर्षण होता है राऊत-नाचा। यदुवंशियों द्वारा पारे जाने वाले दोहों और  गाये जाने वाले गीतों के साथ ताल मिलाते हुए आकर्षक परिधानों से सुसज्जित बजनियों की थाप से जब गांड़ा बाजा घिड़कता है तब शौर्य-श्रृंगार से सजे अहीरों के संग संग समूचा छत्तीसगढ़ थिरकने लगता है।सरस दोहों, गीतों और नृत्यों की त्रिवेणी में पूरा छत्तीसगढ़ डूबकी लगाता है,

तब लगता है कि ये मतवाली दिवाली छत्तीसगढ़ की है।
राऊत नाचा छत्तीसगढ़ के लोकगीत,लोकसंगीत व  लोकनृत्यों का सिरमौर है। ऐसी कोई लोकविधा नही जो इसमें न समाया हो। स्वागत सत्कार,रामकृष्ण भक्ति,देवधामी पूजा अर्चना,संत कबीर,तुलसीदास व रहीम के दोहे,प्रकृति-प्रेम,पशुधन महिमा,आल्हा-उदल गाथा,लोकगाथायें,सुआ पंड़की,ददरिया,करमा,समाजोपयोगी संदेश परक दोहों गीतों के अलावा हास-परिहास के साथ हास्य-व्यंग्य के दोहे भी नर्तकों द्वारा उच्चारित किया जाता है जिसे दोहा पारना कहते हैं।जैसे सुआ गीत का परिचय मुखड़ा तरी हरि नाहना मोर नाहा नरी नाहना रे सुआ होता है वैसे ही राऊत नाचा दोहों-गीतों का परिचय मुखड़ा होता है- अरे ररे ररे ररे भाई रे.....होता है।इसी के साथ ही नर्तक दोहों व गीतों का उच्चारण करते हैं।
सबसे पहले सगा-पहुनों और आगन्तुकों के स्वागत में गांव एवं ग्राम देवता की महिमा बखान करते हुए दोहे की ये बानगी देखिए-

भले गांव मोर तुमगांव भईया कि,बहुते उबजे बोहार हो।
ठाकूर देवता के पंईया लागंव कि,सबो सगा ल जोहार हो।

दिवाली में गौमाता और उसका चरवाहा यानी अहीरों के शोभायमान साज श्रृंगार व मदमस्त मनोभावों को अभिव्यक्त करता एक दोहा- 

रंग माते रंगरसिया भईया कि,छापर माते गाय हो।
अहीरा माते देवारी संगी कि,शोभा बरन नहि जाय हो।।

राऊत चरवाहों के दैनिक उपयोग व उनके साज श्रृंगार में लाठी विशेष मायने रखती है।उनकी लाठी बहूधा तेंदू पेड़ की होती है जो काफी मजबूत मानी जाती है।लाठी उसकी मान-मर्यादा,ताकत और स्वाभिमान का प्रतीक होती है-

तेंदूसार के लउठी भईया कि,सेर सेर घीव खाय।
इही लउठी के परसादे अहीरा,पेल के गाय चराय।।

भगवान कृष्ण के वंशज होने के नाते कृष्ण ही उनके आराध्य हैं।संकट के समय उन्हे पुकारते ही सभी बाधाओं से मुक्त हो जाने का अहसास देखिये-

अड़गड़ टूटगे बड़गड़ टूटगे,भूरी भंईस के छांद हो।
उँहा ले निकले गोकुल कन्हैया,भागे भूत मसान हो।।

जैसे बाजा वैसे नाचा।बाजा ठीक से बजता रहे तभी नर्तकों में स्फूर्ति बनी रहती है और नाचा का आकर्षण बरकरार रहता है।वाद्यों को टन्न रखने व  वादकों में ऊर्जा का संचार करते रहने के लिये उनका हौसला आफजाई करने का अनोखा ढंग इस दोहे में-

आमा खांधी के ढोल बनाये,बेंदरा खाल छवाय हो।
परे बठेना बजकरी के तब,उदल खाँव खाँव नरियाय हो।।

माता पिता का स्वयं की सुख-सुविधा में मगन रहना और बच्चों के प्रति उनकी गैरजिम्मेदाराना हरकतों व लापरवाही  पर कटाक्ष करता यह दोहा-

दार भात के सरपट सईया,मोंगरी मछरी के झोर हो।
दाई ददा सुत भुलाईन, लईका ला लेगे चोर हो।।

भाइयों के प्रति स्नेह,दुलार व अपनापन झलकता यह प्रसंग-

राम दुलरवा लछमन भईया,पण्डो दुलरवा भीम हो।
आल्हा दुलरवा उदला भईया कि, रन में फिरे अधीर हो।।

जीवनसंगिनी के रंग रूप के फेर में न पडें,जीवन के सुख दुख में उसकी भूमिका को महत्व दें। हास-परिहास व हास्य-व्यंग्य से सराबोर यह दोहा-

तींवरा भाजी पेट पिरौना,बेल फर मतौना हो।
कारी सुआरी मन मिलौना,गोरी बड़ बिटोना हो।।

पर्यावरण संरक्षण में पेंड़ पौधों का खास महत्व है। पेड़ पौधों को न काटें,उसके काटने पर बुरा परिणाम भोगना पड़ता है। प्रकृति संरक्षण का भाव प्रकट करती ये पंक्तियाँ-

बर काटे बईमान कहाये,पीपर काटे चण्डाल हो।
मऊरत आमा ल काटे,तेला नइ आवय मनुख अवतार हो।।

राऊत चरवाहा अपने मालिक के प्रति यद्यपि पूज्य भाव रखता है तथापि जब वह मालिक के घर के आँगन में नृत्य करने जाता है तो आखिर में उन्हे सःपरिवार दीर्घायु होने की मंगलकामना के साथ हास्य से भरपूर आशीष कुछ इस तरह देता है-

भात भात ल खाहू मालिक,दार ल घलो पीहू।
असीस लेलव हमर अहिरा के,टूकना तोपात ले जींहू।
          
                                      बन्धु राजेश्वर राव खरे
                                           लक्ष्मण कुंज
             .        शिव मंदिर के पास,अयोध्यानगर महासमुन्द
छत्तीसगढ़ 493445

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

फेसबुक पर फुसफुसाहट और साहित्य उत्सव का समापन


संजय स्वदेश
रायपुर साहित्य उत्सव संपन्न हुआ। इसकी शुरुआत से लेकर समापन के बाद तक फेसबुक पर तरह तरह के मुद्दे को लेकर फुसफुसाहट जारी है। कोई दमादारी से इसके पक्ष में आवाज उठा रहा है तो कई मित्र छत्तीसगढ़ के कुछ मुद्दों को पैनालिस्टों द्वारा नहीं उठाने को लेकर विधवा विलाप कर रहे हैं। इस आयोजन के पहले और समापन के बाद तक ढेरों ऐसी बातें हैं जो इस समारोह में शामिल होने वाले भी नहीं जान पाए होंगे या दिल्ली से टाइमलाइन पर पोस्ट करने वाले महसूस कर पाए होंगे। जिस दौर में अखबारों के पन्नों से साहित्यिक को लेकर जगह के आकाल पड़ने को लेकर अखबार मालिक व संपादकों को कोसा जाता है, उस दौर में एक ऐसा राज्य साहित्य का एक ऐसा भव्य उत्सव का आयोजन करता है, जिससे न केवल रचनाकार बेहतरीन सम्मान पाता है बल्कि उसे अच्छा मानेदय दिया जाता है, यह कम बड़ी बात नहीं है। हिंदी साहित्य वाले हमेशा पारिश्रमिक को लेके रोना रोते हैं। दिल्ली जैसे महानगर में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में शायद अतिथियों को उतना मानदेय नहीं दिया जाता है जितना की छत्तीसगढ़ सरकार ने दिया।
इस पर यह तर्क देकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है कि यह पैसा गरीबों का है, नसबंदी कांड के पीड़ितों को दे दिया जाता तो उनका भला हो जाता। नसबंदी कांड निश्चय ही शर्मनाक घटना थी, लेकिन मामले के प्रकाश में आते ही जिस तरह से प्रशासन ने हरकत में आकर इस पर कार्रवाई की, उससे कई महिलाओं की जान बच गई। उन्हें सरकार ने मुआवजा दिया। उनके बच्चों को सरकार ने गोद ले लिया। 18 साल तक के उम्र तक बेहतरीन अस्पताल में इलाज का पूरा खर्च उठाने का निर्णय लिया। इन सब सकारात्मक चीजों को स्थानीय अखबारों में जगह तो मिल गई, लेकिन बाहरी मीडिया में इसे तब्बजों नहीं मिला। सरकार हर विभाग को अपनी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए बजट देती है। तो क्या स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से जो मातमी माहौल बना, उसमें सांस्कृतिक विभाग और जनसंपर्क विभाग अपनी जिम्मेदारी और दायित्व को छोड़ दे।
रायपुर साहित्य उत्सव को लेकर सोशल मीडिया में जो बातें आ रही हैं, उसका न कोई ठोस तर्क है न ही विरोध का मजबूत आधार। चूंकि साहित्य का इतना बड़ा आयोजन पहली बार हो रहा था। थोड़ी बहुत चूक की गुजांईश स्वाभाविक है। लेकिन थोड़ी चुक से पूरी साकारात्मक पहल को नाकार देना कहां का न्याय है? दिल्ली में साहित्यिक संगोष्टि होती है तो तब उसमें विरोध करने वाले यह मुद्दा क्यों नहीं उठाते हैं कि हर दिन दिल्ली की सड़कों पर लापरवाही से वाहन चलाने वाले दो-चार लोगों को अकाल मौत की नींद सुला देते हैं। आखिर वहां भी तो आयोजन होते हैं और दिल्ली की सड़कों पर होने वाली मौतें कम बड़ा मुद्दा नहीं है। चलिए इस मौतों को छोड़िए, दुष्कर्म के तो हर दिन मामले दर्ज होते हैं, फिर ये साहित्यकार क्यों नहीं भक्तिकाल और रीतिकाल से साहित्यिक गतिविधियों बहिष्कार या विरोध करते हैं। दिल्ली में महिला सुरक्षा तो बड़ा मुद्दा है। इस मुद्दे को लेकर साहित्यक गतिविधियों में साहित्यकारों का क्या स्टैंड होता है?
दरअसल पूरी प्रवृत्ति विरोध करने को लेकर विरोध की मानसिकता की दिखती है। शहर से कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने तक इस कार्यक्रम को लेकर जितने होर्डिंग या बोर्ड लेगे थे निश्चय ही उससे कहीं ज्यादा कुर्सियां यहां खाली दिखी। लेकिन जो अतिथि वक्ता आएं, उनसे बातचीत के आधार पर स्थानीय अखबारों ने जो कवरेज और बातों को प्रस्तुत किया, अगले दो दिनों तक भीड़ बढ़ती गई। इसके बाद भी कुछ लोगों की यह शिकायत थी कि मंडल में कुर्सियां खाली रही। इसको लेकर एक बात और सुनिए।
हर मंडल में दिन एक ही समय पर तीन से चार कार्यक्रम। भव्य आयोजन था। इतने साहित्य प्रेमी कहां से आते। जिन्हें जो विषय पंसद आया वे उसे मंडप में बैठे रहे। हमें एक ही समय में दो मंडपों के कार्यक्रम पसंद आए, लेकिन एक ही मंडप में बैठना पड़ा। यदि दिल्ली में इसी तर्ज पर साहित्य का उत्सव हो तो संभवत हर मंडल में भीड़ उमड Þपड़े। लेकिन वह कार्यक्रम दिल्ली से बाहर सूरजकुंड में हो तो शायद दर्शकों और श्रोताओं का टोटा पड़ जाता। यहां तो एक छोटे से राज्य के एक छोटी सी राजधानी में बाहर जहां घुमने जाने के लिए भी हिम्मत जुटानी पड़ती है, वहां साहित्य का उत्सव होता है और सीधे सादे छत्तीसगढ़ के मुठ््ठी भर साहित्य प्रेमी इस उत्सव में पहुंचते हैं, यह कम बड़ी बात नहीं है। दिल्ली मुंबई से आए हुए वक्ताओं को तो यहां की ट्रैफिक उनके शहर की तुलना में नागण्य दिखी होगी, लेकिन वह यहां की जनता के लिए ज्यादा है? हर शहर की अपनी क्षमता होती है।
एक और चीज तो फेसबुक पर लेकर चर्चा हो रही है कि यहां आने वाले वक्ताओं ने सरकार को नहीं घेरा। मैं स्वयं एक मंडप में उपस्थित था। वहां देखा ही नहीं सुना भी। दिल्ली के एक वक्ता ने तो यहां के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह  के उद्घाटन में दिए गए वक्तव्यों को लेकर कटघरे में खड़ा करते हुए रियल दुनिया वर्चुअल और ओर वर्चुअल रियल है का बेहतरीन ओर सटीक उदाहरण दिया। इसी मंडप के मंच पर दो अन्य वक्ताओं से भी सत्ता को कटघरे में खड़ा करने वाली बातें सुनने को मिली।
कार्यक्रम में अंतिम दिन तो हालत यह थी कि पार्किंग दो पहिया और चार पहिया वाहनों से भरी हुई थी। भीड़ गैर साहित्यकारों से की ज्यादा थी। गैर साहित्य प्रेमी इस उत्सव को देखने पहुंचे थे। संभव हो इससे उनमें रुचि जगे ओर अगले बरस के आयोजन में वे सुनने के लिए मंडप में भी बैठ जाएं।
उत्सव में बाहर से आए वक्ताओं के बारे में एक और बात। यह साहित्य गैर साहित्यिक आयोजनों में हमेशा होता है। एक आयोजन में उसे विषय से जुड़े सभी साहित्यकारों को तो नहीं बुलाया जा सकता है। जिन्हें बुलाओ, उनके विरोधी गुट हमेशा मुंह फुलाते हैं और जो हवा छोड़ने हैं, वह निश्चय ही आयोजन को असफल करने के लिए होती है। मतलब उन्हें बुलाया जाता तो कार्यक्रम सफल होता। उनके नहीं जाने से ही यह अधूरा रह गया। कोई अतिथि सही है या गलत कभी कभी इसका निर्णय मेजवान पर भी छोड़ना चाहिए। मेहमान तो अपना चरित्र दिखा ही देते हैं। इसके भी उदाहरण है। एक पैनलिस्ट को आमंत्रण मिला तो उसने मेजबान अधिकारी को फोन लगा कर पूछा-कार्यक्रम में मेरी बेटी भी आने वाली है, क्या उसे भी प्लेन का टिकट मिलेगा...अधिकारी महोदय ने अपने अधिनस्त को बोला जो लड़की आना चाहती है, उसके और गेस्ट के सर नेम और उम्र का अंतर आदि सब मिलान कर देखों कि क्या सच में वह अपनी बेटी को ही ला रहा है न...।
रायपुर साहित्य उत्सव में बुलाए गए मेहमान वक्ताओं को  अच्छा खासा मानदेय मिला, प्लेन का किराया भी दिया गया। उस होटल, जिसमें एक रात का किराया कम से कम पांच साढ़े पांच हजार रुपए है, उसमें ठहराया गया। उन्हें खाने की सुविधा मिली। कार्यक्रम स्थल तक लाने ले जाने के लिए एसी वाली कार भी उपलब्ध कराई गई। लेकिन इसमें भी कुछ मेहमान ऐसे थे जो इस बात को लेकर नाराज थे कि होटल में इतनी बेहतरीन सुविधा तो थी, लेकिन लेकिन दारू की व्यवस्था नहीं थी। इसके लिए होटल में थोड़ा बहुत बवाल भी किया। पर होटल वाले ने साफ कह दिया कि उन्हें बस रखने और खिलाने की ही बुकिंग हुई है, पीने के लिए अपना खर्चना पड़ेगा।
ऐसी साहित्यिक आयोजनों में विचारों को लेकर वाद प्रतिवाद हमेशा से होता रहा है और होता भी रहेगा। लेकिन यदि कोई सरकार आगे साहित्य के हित में इतना बड़ा आयोजन करती है तो उसे दूसरे मुद्दे को लेकर नाकार देना उचित नहीं लगता है। छोटे से छत्तीसगढ़ ने देश के बड़े साहित्याकरों को बुलाया, इसको लेकर छत्तीसगढ़ का साहित्यप्रेमी गदगद है। इस आयोजन ने भविष्य में एक बेहतरीन साहित्यिक आयोजन की परंपरा का बीज बो दिया। जैसे जयपुर का लिटरेचर फेस्टिवल देश दुनिया में नाम कर चुका हैं, वैसे छत्तीसगढ़ का भी होगा, इतना सपना देखने का हक तो छत्तीसगढ़ को भी बनता है।
नया रायपुर के जिस पुरखौती मुक्तांगन में यह भव्य आयोजन संपन्न हुआ, उस ओर मुख्यमार्ग से जाने वाली करीब सौ मीटर की दिवार पर छत्तीसगढ़ की लोक कला भित्ति चित्र शैली में यहां के राम वन गमन व अन्य पौराणिक लोक कथाओं के प्रसंगों के चित्र बने हैं और उसकी चार लाइन की छोटी सी व्याख्या दी गई है। उसमें दो भित्ति चित्र पर नजर पड़ी। उस की व्याख्या लिखी थी-इधर महीने बाद राजा दक्ष ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें पृथ्वी के तमाम महाराज व साधु संतों को आमंत्रित किया गया। किंतु शिव को नहंी बुलाया गया.....इस तरह से राजा दक्ष ने ना चाहते हुए भी सत्ती का विवाह बड़े ही धूमधाम से भगवान शंकर से संपन्न हुआ। आसमान से फुल  बरसे...। छत्तीसगढ़ में साहित्य का यह भव्य आयोजन निश्चय ही किसी यज्ञ से कम नहीं था। दिल्ली में बैठ कर इस यज्ञ को नकारने वालों की नाकारात्मक मंशा के बाद भी सफल हुआ। हालांकि यह युग शिव और दक्ष का नहीं है, इसलिए आसमान से फूल तो नहीं बरसे, लेकिन एक संवेदनशील साहित्यकार ने भविष्य में साहित्य की बेहतर संभावनाओं के प्रोत्साहन का आंकलन जरूर कर लिया।

सोमवार, 7 जुलाई 2014

रिमझिम के तराने लेकर आई बरसात

प्रेम कुमार
फिल्मों में बरसात या उसमें फिल्माए गाने फिल्म का अहम हिस्सा रहे है और इनका इस्तेमाल फिल्मकार अपनी फिल्म को हिट बनाने के लिए अक्सर करते आए हैं। फिल्म इंडस्ट्री का इतिहास देखा जाए तो सबसे पहले संभवतघ् वर्ष 1941 में प्रदíशत फिल्म खजांची में बरसात पर आधारित ‘सावन के नजारे हैं अहा अहा’ गीत फिल्माया गया था। हालांकि इसके बाद भी बरसात पर आधारित कुछ गीत फिल्माए गए, लेकिन वर्ष 1949 में प्रदíशत फिल्म बरसात में फिल्म अभिनेत्री निम्मी पर ‘बरसात में हमसे मिले तुम सजन ’ गाना बारिश में फिल्माया गया, जो बरसात पर आधारित पहला सुपरहिट गीत बना। यूं तो फिल्म इंडस्ट्री में ना जाने कितनी फिल्में बनी होंगी, जिसमें बारिश के दृश्य या गाने फिल्माए गए होंगे, लेकिन वर्ष 1955 में प्रदíशत फिल्म श्री 420 की बात कुछ और ही है। तो यूं तो फिल्म श्री 420 कई कारणों से याद की जाती है, लेकिन फिल्म में राजकपूर और नरगिस बारिश में पर फिल्माया गाना ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ का फिल्मांकन इतने सजीव तरीके से पेश किया गया कि इसकी याद दर्शकों के दिल में आज भी ताजातरीन है। बरसात पर आधारित गीतों में वर्ष 1958 में प्रदíशत फिल्म चलती का नाम गाड़ी का नाम भी उल्लेखनीय है। तीन भाइयों की कहानी पर आधारित फिल्म की कहानी में बारिश से कोई मेल नही था, लेकिन एक दृश्य में जब अभिनेत्री मधुबाला बारिश से भींगने से बचने के लिए अभिनेता किशोर कुमार के गैरेज में शरण लेती है, तो उसे देख किशोर कुमार प्यार करने लगते हैं और उसे खुश करने के लिए ‘एक लड़की भीगी भागी सी’ गीत गाते हैं तो यह फिल्म की जान बन जाती है और यह गीत आज भी सिने प्रेमी नही भूल पाए है।
नृत्य और संगीत की बात हो और अभिनेता शम्मी कपूर का जिक्र ना आए ऐसा संभव नही है। इसी क्रम में वर्ष 1962 में प्रदíशत फिल्म ‘दिल तेरा दीवाना’ में शंकर जयकिशन के संगीतबद्ध गीत ‘दिल तेरा दीवाना है सनम’ का जिक्र करना लाजमी है जो बरसात में ही फिल्माए गए थे। संभवत दिल तेरा दीवाना है सनम बरसात में फिल्माए गीत में पहले गानों में एक है, जब उसका फिल्मांकन स्टूडियो के सेट में न होकर आउट डोर लोकेशन में किया गया। इस गीत में शम्मीकपूर अपनी विशेष नृत्य शैली से अभिनेत्नी माला सिन्हा को रिझाने का प्रयास करते हैं। वर्ष 1980 में एक फिल्म प्रदíशत हुई थी ‘नमक हलाल’ यूं तो इस फिल्म के सारे गीत हिट हुए थे, लेकिन फिल्म में एक गाना ऐसा भी था जो बारिश में फिल्माया गया था, जिसे दर्शक आज भी नही भूल पाए हैं। अभिनेता अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गाना ‘आज रपट जाए तो हमें ना उठइयो’ गाने के माध्यम से अमिताभ बच्चन बारिश की फुहारों के बीच स्मिता पाटिल से अपने प्यार का इजहार कुछ इस तरीके से करते है कि दर्शक हंसते हंसते लोटपोट हो जाते हैं। ¨कग ऑफ रोमांस दिवंगत यश चोपड़ा अक्सर अपनी फिल्मों में बारिश के गीत का फिल्मांकन करते आए हैं। इनमें फिल्म चांदनी के गीत ‘लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है’ और दिल्वाले दुल्हनिया ले जाएंगे के गीत ‘मेरे ख्वाबो में जो आए’ सिने दर्शका के बीच आज भी लोकप्रिय है। इसके अलावा ये दिल्लगी में देखो जरा देखा बरखा की झड़ी और दिल तो पागल है में कोई लड़की है जब वो गाती है गीत भी बारिश में ही फिल्माए है। देखा जाए तो फिल्मों में बारिश का इस्तेमाल फिल्मकार नायक और नायिका के प्रेम के इजहार के रूप में करते हैं, लेकिन कुछ मौके पर बारिश की मांग किसी शुभ काम के लिए की जाती है। ऐसे ही गानों में फिल्म गाइड का गाना अल्लाह मेघ दे और लगान का गाना काले मेघा काले मेघा खास तौर पर उल्लेखनीय है1
इन सबके साथ ही बरसात के गाने के माध्यम से विरह की आग प्रेमियो को किस प्रकार जलाती है उसे पेश किया जाता रहा है। ऐसे गानो में फिल्म जख्मी का गीत जलता है जिया मेरा भीगी भीगी रातो में और दो बदन का गीत जब चली ठंडी हवा जब उठे काली घटा मुझको ऐ जाने वफा तुम याद आए । इसके अलावा बरसात के गीत के माध्यम से मस्ती को भी दिखाया गया है। फिल्म छलिया का गीत डम डम डिगा डिगा मौसम भीगा भीगा या गोपी किशन का गीत छतरी ना खोल बरसात में प्रमुख है। इन सबके साथ ही फिल्मकारो ने बरसात को ध्यान में रखते हुए कई फिल्मो का निर्माण किया। इन फिल्मों में बरसात बरसात की एक रात आया सावन झूम के सावन को आने दो, सावन भादों, मानसून वेडिग, सोलहवा सावन, बिन बादल बरसात, बादल जैसी कई फिल्में शामिल हैं। इसी तरह कई फिल्मकार ने अपनी फिल्मों में बारिश के गाने फिल्माए हैं, जो आज भी श्रोताओं की जुबान पर चढ़े हुए हैं। ऐसे ही गानों में शामिल लंबी फेहरिस्त में कुछ है बरसात में हमसे मिले तुम सजन, ये रात भीगी भीगी, बरखा रानी जरा जमके बरसो, ¨जदगी भर नही भूलेगी वो बरसात की रात, काली घटा छाए मोरा, हरियाला सावन ढोल बजाता आया, रिमझिम के तराने लेके आई बरसात, ओ सजना बरखा बहार आयी सावन का महीना पवन करे शोर मेघा छाई आधी रात रिमझिम के गीत सावन गाए भीगी भीगी रातो में  रिमझिम गिरे सावन काटे नही कटते दिन ये रात टिप टिप टिपटिप बारिश शुरू हो गयी रिमझिम रिमझिम, मेरे ख्वाबों में जो आए, टिप टिप बरसा पानी, दिल ये बेचैन रे, जो हाल दिल का, सांसों को सांसों से, बरसो रे मेघा आदि शामिल है।

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

जीसस के प्रवचनों में निहित अर्थो को समझें


डॉ. महेश परिमल
पुस्तकें भेंट करना एक अच्छी परंपरा है़ इसमें यदि कोई धर्मिक पुस्तक मिल जाए, तो मन श्रद्धा से भर उठता है। एक मित्र ने मुझे पवित्र बाइबल भेंट की। नया नियम और पुराना नियम, ये दोनों ही इसके दो रूप हैं। पूरी बाइबल प़ढी, फिर शुरू हुआ चिंतन। बार-बार एक ही जगह जाकर विचार की तरंगें अटक जातीं, जीसस के ये वाक्य, जो बार-बार बाइबल में आए हैं, जिनके पास आँखें हों, वे मुझे देखें और जिनके पास कान हो, वे मुझे सुनें़ इन्हीं वाक्यों ने विवश कर दिया कुछ सोचने को़ आँखें और कान तो हम सभी के पास हैं, उनका बार-बार यह दोहराना, क्या ऐसा नहीं लगता कि वे अंधे और बहरों के बीच बोल रहे थे ?
समझ की सोच ने यहीं से विचार यात्रा प्रारंभ की। नहीं, वे अंधे-बहरों के समूह में नहीं बोल रहे थे, पर उस समय अंधे और बहरों का समूह अधिक था, जिनकी आँखें थीं और कान भी थे। जीसस को देखना सचमुच मुश्किल है, ठीक उसी तरह, जैसे विशाल पेड़ के बीज को देखना। पेड़ तो हमें दिखाई देता है, पर बीज नहीं। जीसस का शरीर उस समय सभी को दिखाई देता था, लेकिन उनकी जो आत्मा थी, वह केवल उन्हीं को दिखाई देती थी, जो परमशांत, परमशून्य और परमध्यान में लीन होकर देखते थे। ये सभी जीसस की आत्मा से साक्षात्कार करते थे, इनके लिए जीसस के साक्षात रूप से कोई वास्ता न था, क्योंकि उन्हें जो दिखाई दे रहा था, वह था जीसस का तेजस रूप, उनका प्रज्ञा रूप, उनका ज्योतिर्मय अलौकिक रूप, इसीलिए जीसस पर दोहरे मत हैं, एक मत है अंधों का, जिन्होंने जीसस को सूली पर चढ़ाया, इन अंधों का मानना था कि यह तो साधारण मानव है और दावा करता है कि वह ईश्वर का पुत्र है। वैसे इन अंधों का विचार गलत नहीं था, जो उन्हें दिखलाई पड़ रहा था, वहाँ तक उनकी बात बिल्कुल सही थी, उन्हें पता था कि यह तो बढ़ई जोसेफ का बेटा है, मरियम का बेटा है, यह ईश्वर का पुत्र कैसे हो सकता है ? लेकिन जीसस जिसकी बात कर रहे थे, वह ईश्वर का पुत्र ही है। वह कोई जीसस में ही खत्म नहीं हो जाता है, आपके-हमारे भीतर जो आत्मा के रूप में है, वह ईश्वर का पुत्र है, अतएव हम सभी जो निष्पाप आत्मा के स्वामी हैं, ईश्वर के पुत्र हैं।
जिन्होंने जीसस की आत्मा से साक्षात्कार किया, वे सभी अनपढ़ और गँवार लोग थे, उनकी आत्मा को पंडितों-ज्ञानियों ने नहीं देखा, देखने वाले थे, निम्न तबके के लोग, जैसे जुलाहे, मछुआरे, ग्रामीण किसान, भोलेभाले लोग। इनका वास्ता कभी शाों और शब्दों से नहीं प़डा, इन्होंने जीसस पर विश्वास किया, इन्हें उनके आत्मिक रूप के दर्शन हुए, जो विद्वान थे, ज्ञानी थे, धर्म के ज्ञाता थे, शाों के पंडित थे, उन्हें जीसस एक साधारण इंसान लगे, क्योंकि उनकी बुद्धि में ज्ञान की कई परतें थीं, जिससे उनके देखने की क्षमता कम हो गई, इसलिए जीसस की आत्मा को वे लोग नहीं देख पाए।
ज्ञानी जो कुछ भी स्वीकार करता है, तर्क से स्वीकार करता है, अनपढ़ और गँवार अपने विश्वास के आधार पर स्वीकार करते हैं, जितना गहरा विश्वास, उतनी गहरी आस्था़ इसी गहरी आस्था में छिपा है प्रेम, जो सभी जीवन मूल्यों से ऊपर है, यही हमारा मार्गदर्शक है, हमारा साथी है। लेकिन आज हम भटक रहे हैं, क्योंकि हम ज्ञानी हैं, अनपढ़ गँवार होते, तो कोई न कोई राह मिल ही जाती। आज यदि हम थोड़े समय के लिए भी अपने ज्ञानी मन को अपने से अलग रख दें, तो संभव है राह दिख जाए़
अब हम सब शुतुरमुर्ग हो गए हैं, विपदाओं से लड़ने के बजाए हम सब उस दिशा की ओर से आँखें ही बंद कर लेते हैं, शुतुरमुर्ग की तरह अपना सर रेत में गाड़ देते हैं, ताकि हम बाधाओं को न देख पाएँ़ तुमने बाधाओं को नहीं देखा तो क्या हुआ, बाधाओं ने तो तुम्हें देख ही लिया ना ? वे तुम्हें नहीं छोड़ेंगी, तुम्हारे पलायनवाद को धिक्कारेंगी, संभव हुआ तो खत्म भी कर देंगी। जीसस के माध्यम से यही कहना है कि हमने खुद को नहीं समझा, न ही दूसरों को समझने की कोशिश की़ एक वायवीय संसार बना लिया अपने आसपास और जीने लगे कूप-मंडूक की तरह।
हर कोई कह रहा है मेरा धर्म महान् है, इससे बड़ा कोई धर्म नहीं़ कैसे तय कर लिया आपने यह सब! क्या आपने दूसरे धर्मो के ग्रंथ पढ़े ? क्या उनके पंडितों से चर्चा की ? उत्तर नकारात्मक है, फिर यह मुगालता क्यों ? क्या अभी तक नहीं समझा आपने कि इंसानियत का धर्म सबसे ऊपर है ? इससे ऊपर कोई धर्म नहीं़ पीड़ा से छटपटाते व्यक्ति के करीब बैठकर पूजा करना, प्रार्थना करना धर्म नहीं है, धर्म है उस व्यक्ति को पीड़ा से राहत दिलाना, इंसानियत का धर्म, मानवता का धर्म। संकट में पड़े किसी अपने को बिलखता छोड़कर कितनी भी धार्मिक यात्राएँ कर लें, हमें पुण्य नहीं मिलेगा। धर्म की आत्मा सेवा में छिपी है, नि:स्वार्थ सेवा ही वह सीढ़ी है, जो हमें हमारे आराध्य तक पहुँचाती है।
आज जब पूरे विश्व में मानवता रो रही है, जीवन मूल्यों का लगातार पतन हो रहा है, ऐसे में लगता है कि क्या ईमानदारी से जीने वालों के लिए इस दुनिया में कोई जगह नहीं है, तब लगता है कि आज भी पूरा विश्व ईमानदारों के कारण ही बचा हुआ है़ तब हम क्यों छो़डें अपनी ईमानदारी़ ऐसे में यदि हम ईमानदारी से ही जीने का संकल्प ले लें, तो शायद पूरे विश्व का चेहरा बदलने में समय नहीं लगेगा़ तो आओ संकल्प लें, अपने इंसानियत के धर्म को महान् बनाएँ़ त्याग, नि:स्वार्थ सेवा और सत्कर्मो से स्वयं को बेहतर और बेहतर बनाएँ, ईश्वर हमें आत्मसात् कर ही लेगा।
    डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

आईपीएल के लिए लोगों का पिघलता उत्साह


डॉ. महेश परिमल
चार अप्रैल से आईपीएल का कुंभ शुरू हो गया है। अब तक चार आईपीएल हो चुके हैं। इन चारों में दर्शकों की भागीदारी बेहतर रही। पर इस बार पांचवें आईपीएल में दर्शक काफी निराश हैं। उनका उत्साह अब पिघलता दिखाई दे रहा है। इस बार आईपीएल की ब्रांड वेल्यू में भी कमी आई है। मीडिया पर छाने वाले विज्ञापनों की आवक भी कम हुई है। इन बातों को देखते-समझते हुए यही कहा जा सकता है कि इस बार दर्शकों में आईपीएल को लेकर कोई विशेष उत्साह नजर नहीं आ रहा है। कहा जाता है कि किसी भी चीज की अति हमेशा बुरी होती है। चार वर्ष पहले आईपीएल को लेकर दर्शकों की तरफ से काफी रिस्पांस मिला था। आईपीएल शुरू होने के पहले ही अखबार और टीवी इसके विज्ञापनों से लद जाते थे। मैच के दौरान तो सिनेमा घरों में सन्नाटा छा जाता था। आईपीएल के चलते नई फिल्में भी रिलीज नहीं होती थीं। पहले आईपीएल समारोह में अक्षय कुमार, ऋतिक रोशन और केटरीना कैफ की उपस्थिति से लोगों को खूब मनोरंजन हुआ था। इस बार ऐसा कुछ भी दिखार्ठ नहीं दे रहा है। बालीवुड को भी आईपीएल का भय नहीं है, इसीलिए एजेंट विनोद और हाऊसफुल 2 भी प्रदर्शित हो गई। इसके बाद 6 अपै्रल को टाइटेनिक का थ्री डी संस्करण रिलीज हो रहा है, संभव है उस दिन मैदान खाली रहें और सिनेमाघरों में भी़ उमड़ पड़े।  टीवी पर विज्ञापन देने वाली कंपनियों में भी उत्साह दिखाई नहीं दे रहा है। सुपरस्टॉर अमिताभ बच्चन को बुलाकर यदि अपना उद्धार कर लेती है, तो उसका भला हो सकता है, पर इसकी उम्मीद कम ही है। बच्चन जी इसके पहले श्मिस वर्ल्ड्य के कर्ताधर्ता रह चुके हैं। वह स्पर्धा भी कामयाब नहीं हो पाई थी।
आईपीएल दर्शकों के उत्साह में कमी आने का सबूत है टीआरपी। आईपीएल के तीसरे सीजन में उसकी टीआरपी 5.2 थी, चौथी सीजन में वह घटकर 3.9 पर पहुंच गई। इस बार इसमें और कमी आएगी, यह भी तय है। ईपीएल के प्रसारण का अधिकार प्राप्त करने वाली सेट मेक्स चौनल को विज्ञापनों का स्लॉट बेचने और प्रायोजक खोजने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ इसी तरह की परेशानी आईपीएल चार के समय भी एसोसिएट स्पॉन्सर और मीडिया स्पॉन्सर को ढूंढने में भी आई थी। आईपीएल ने वह ख्याति प्राप्त नहीं की, जो इंग्लिश प्रीमियर लीग और बिम्बलडन को प्राप्त है। संभवतरू इसके पीछे आईपीएल का नाम घोटालों से जुड़ जाना हो सकता है। आखिर आईपीएल की एक बड़ी हस्ती ललित मोदी को कौन नहीं जानता, जिसके कारण इसकी काफी फजीहत हुई थी। आईपीएल के लिए विज्ञापन देने वाली कंपनियां भी निरुत्साहित हैं। गोदरेज जैसी कंपनी ने भी इसके लिए इस बार अपने विज्ञापन देने से इंकार कर दिया। उसे लग रहा है कि इस स्पर्धा की कीमत आवश्यकता से अधिक आँकी गई है। अब तक इसके लिए सबसे अधिक विज्ञापन देने वाली कंपनी एलजी ने भी इस बार आईपीएल से खुद को दूर रखा है। उसे भी यही लगता है कि आईपीएल में दिए जाने वाले विज्ञापनों के लिए जितना खर्च किया जाता है, उसका रिस्पांस उतना नहीं मिल पाता है। अब तक हर बार इसमें विज्ञापन की दर बढ़ती रहती थी, पर इस बार दर बढ़ाने की हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा है। पिछले साल दस सेकंड के स्लाट के लिए 3.3 लाख रुपए वसूले जाते थे, इस बार इसके दर में दस प्रतिशत की कमी होने की संभावना है। हालांकि  सेट मेक्स ने विज्ञापनों की दरों में कमी करने से इंकार किया है, पर परदे के पीछे से बार्गेनिंग जारी है।
इस बार आईपीएल के फ्रेंचाइजीस की भी हालत अच्छी नहीं है। उन्हें भी प्रायोजक के भाव में कमी करने का दबाव है। पिछले वर्ष जिस टीम की टाइटल स्पांसरशिप 16 थी,वह 18 करोड़ में बिकी थी। वह इस बार 8 करोड़ में बिकने के लिए तैयार है। टीम की जर्सी पर सीने वाले भाग में जो लोगो था, उसकी स्पांसरशिप पिछले वर्ष 8 करोड़ रुपए थी, वह इस बार 4 करोड़ रुपए है। जिन्होंने आईपीएल की टीम खरीदी है, उन्हें अभी तक मुनाफा नहीं मिला है। कई टीमों के मालिक इस ताक में हैं कि किसी तरह अपनी टीम को बेच दिया जाए। पहले चार वर्ष में आईपीएल की कई टीमों ने काफी नुकसान किया था। उसके बाद भी वे किस तरह से स्पर्धा में टिकी रही, ये एक सवाल हो सकता है। किंग इलेवन पंजाब ने चार साल में 40 करोड़ का नुकसान किया, इसे तो उसके एक उच्च अधिकारी स्वीकार भी करते हैं। बड़ी और ख्यातिप्राप्त टीमें एक साल में 20 करोड़ का नुकसान करती हैं, तो कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि आईपीएल द्वारा उसके ब्रांड का प्रचार होता है। किंतु छोटी टीमों द्वारा किए गए नुकसान के बाद उनका स्पर्धा में टिका रहना भी कठिन है। दिल्ली डेरडेविल के एक अधिकारी का कहना है कि हम बड़ी टीमों के सामने प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं सकते, यह हमारी विवशता है। हाल ही में चेन्नई की टीम ने रवींद्र जाडेजा के लिए 30 करोड़ का भुगतान किया। उसी तरह बेंगलोर की टीम ने क्रिस गेल के लिए मोटी राशि का भुगतान किया। ऐसा भी कहा जा रहा है कि आईपीएल में कई सौदे दो नम्बर पर किए जा रहे हैं।
प्रेक्षकों के घटते उत्साह के साथ-साथ आईपीएल की ब्रांड वेल्यू भी कम होती जा रही है। ब्रिटन की ब्रांड फाइनांस कंपनी ने 2009 में आईपीएल की ब्रांड वेल्यू 2.01 अब डॉलर आंकी थी, यही वेल्यू 2010 में बढ़कर 4.13 अरब डॉलर तक पहुंच गई थी, पर 2011 में यही वेल्यू घटकर 3.67 अरब डॉलर पर पहुंच गई है। आईपीएल की टीमों की ब्रांड वेल्यू भी कम ज्यादा होती रहती है। 2009 में राजस्थान रायल्स की ब्रांड वेल्यू मुंबई इंडियंस से अधिक थी। एक वर्ष बाद मुंबई की टीम टॉप पर पहुंच गई और राजस्थान की टीम नीचे चली गई। राजस्थान रॉयल्स के मालिकों ने कोलकाता के एक बिजनेसमेन को उसका अधिकांश हिस्सा 20 करोड़ डॉलर में बेचना चाहते हैं, ऐसी अफवाह है। पर अभी तक सौदा हुआ नहीं है। इसका कारण यह है कि नुकसान देने वाली कंपनी को कोई खरीदना ही नहीं चाहता। राजस्थान के बाद कोलकाता, दिल्ली, हैदराबाद और पंजाब की टीम भी बिकने वाली हैं, ऐसा कहा जा रहा है। एक जानकार का कहना है कि आईपीएल से कभी मुनाफा नहीं होता, बड़ी कंपनियाँ उसका उपयोग अपने उत्पादन के प्रचार-प्रसार के लिए करते हैं। आईपीएल में मुनाफा भी लगातार घट रहा है। इसे भले ही अभी स्वीकार न किया जा रहा हो, पर इस बार यदि दर्शकों की संख्या कम होती है, तो उसे स्वीकारना ही होगा। इस कारण इस बार अमिताभ बच्चन और सलमान खान को भी मैदान में उतारा जा रहा है। इन दोनों हस्तियों के कारण प्रारंभिक मैचों में भीड़ देखी जा सकती है। 2008 में जब आईपीएल की शुरुआत हुई थी, तब सभी टीमों के साथ 5 साल का कांटेक्ट किया गया था, इस वर्ष ये कांटेक्ट खत्म हो रहा है। आईपीएल के मुख्य प्रायोजक डीएलएफ का भी कांटेक्ट इस सीजन में खत्म हो रहा है। डीएलएफ को यह कांटेक्ट 5 करोड़ डॉलर में मिला था। अब यह दूसरे कांटेक्ट के लिए सामने आती है या नहीं, यह देखना है। मैचों को टीवी पर दिखाने का कांटेक्ट भी इसी वर्ष खत्म हो रहा है। ये सारी कंपनियाँ अगली बार के लिए सामने आती हैं या नहीं, इसी पर आईपीएल का भविष्य निर्भर करता है। इसी से यह तय हो जाएगा कि भारत में आईपीएल का भविष्य उज्जवल है या नहीं।
पहले भारतीय दर्शक पाँच दिनों का टेस्ट मैच देखने का मजा लेते थे। फिर इससे बोर होने लगे। तब एक दिवसीय मैच की शुरुआत हुई। कुछ समय बाद दर्शक इससे भी बोर होने लगे। तब 20-20 का सीजन शुरू हो गया। यदि दर्शक इससे भी बोर होते हैं, तो क्रिकेट खेलने की नई शैली इजाद करनी होगी। आज इंसान सस्ता मनोरंजन चाहता है। यही कारण है कि वी टीवी और फिल्मों के बाद इंटरनेट की ओर बढऩे लगा है। आज की युवा पीढ़ी फेसबुक और ट्विटर पर घंटों समय गुजारती है। इस पीढ़ी को किसी और मनोरंजन की आवश्यकता ही नहीं है। ऐसे में आईपीएल कहाँ तक युवाओं की मनोरंजन की भूख को शांत कर पाता है, यही देखना है।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 6 नवंबर 2010

दीप पर्व दीपावली पर आपको लख-लख वधाइयां

 
कई लोगों का मानना हो सकता है कि दीपावली के पर्व को धमाकेदार रहना ही चाहिए। पर आजकल भारी आतिशबाजी से प्रदूषण होने लगा है। और अब इन धमाकों से खुशियां या शुभकामनाएं नहीं मिल रही हैं। मेरे परिवार में दो लोगों को अस्थमा की समस्या है। वो कई दिनों तक अनिद्रा, श्वांस फूलने और उल्टी की टेन्डेंसी से परेशान रहते हैं। इन्हीं तरह के शिकायतों के आधार पर तंग आकर सर्वोच्च न्यायालय ने पटाखों पर रात दस बजे से सुबह छह बजे तक का प्रतिबंध लगाया है। दिल्ली में तो दिल्ली पर्यावरण विभाग को इस निर्देश का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है। आदमी ने तो अपनी सेहत को नापने के लिए कई तरह के यंत्र बना लिए हैं। मेरे छज्जे पर गमले में लगी तुलसी को क्या परेशानी हुई, हमारे पास जानने का इसके लिए कोई यंत्र है क्या? जरा से भी शोर से डर जाने वाली गौरैया के दो-तीन दिन तक चलने वाले अनवरत शोर और धमाकों में रात-दिन कैसे कटते होंगे, कभी सोचा है क्या?दरअसल हम अंदर से खोखले होते जा रहे हैं। खाली होते हमारे अंदर को भरने के लिए हम बाहर के शोर में उमंग, खुशी, ग्लैमर खोजते रहते हैं। अंदर को भरने के किए गये लाख जतन क्या हमें सही खुशी दे पाने में सक्षम हुए हैं। पर्व-त्योहारों को हम सिर्फ धूम-धड़ाका और पूजा-पाठ के कर्मकान्ड के रूप में समझने लगे हैं। जिस अंधकार को दूर करने के लिएदीपक जलाने’ के कर्मकान्ड करते हैं। दीपक तो बचारे एक कोने में दुबक गये हैं। महंगी हजारों रुपये की इलेक्ट्रानिक लड़ियां जिस बिजली से रोशन हो रही हैं। क्या कभी सोचा है कि उसमें रोशनी भरने के लिए कितने लोगों की जिंदगी अंधेरे में डुबो दी जाती है। नर्मदा बांध के उजड़े, टिहरी के विस्थापित, भाखड़ा-नांगल के उजड़े आधी सदी से भटक रहे लोगों और उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश में बन रहे 500 से ज्यादा बांध हजारों-लाखों की जिंदगी को अंधेरे में धकेल देने के बाद ही आपको रोशनी देने में सक्षम हुए हैं। दीपावली पूजा- "तमसो मा ज्योतिर्गमय"- अंधकार से प्रकाश की ओर चलो; अज्ञान से ज्ञान, असत्य से सत्य की ओर तथा जन्म और मृत्यु के चक्र से अमरत्व की ओर चलो; का संदेश देती है। पूजा क्या है? जो हमें ईश्वर से प्राप्त है, उसके प्रति अहसास और कृतज्ञता व्यक्त करना। प्रकाश का देवता सूर्य, हमारे ऋतु-मौसम चक्र का सहभागी चन्द्रमा और लालन-पालनकर्ता पृथ्वी के प्रति समय-समय पर हम कृतज्ञता व्यक्त करते रहते हैं। इन समयों पर पर्व-उत्सव करते हैं, पूजा, अपनी कृतज्ञता और सम्मान दर्शाने का सब से स्वाभाविक तरीका है। वेद के सूत्रों में कहा गया है- 'पृथ्वी, जिसमें बसे हैं सागर-नदी और अन्य जल भंडार, जिसमें अन्न और धान्य के खेत हैं, जिसमें जीते हैं चराचर सभी, वही भूमि हमको दे अपने अपूर्व फल। पृथ्वी जो जाए हैं तुम्हारे- वे हों रोगमुक्त और शोकमुक्त' अगर कर सकें तो सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी को प्रति कृतज्ञ होवें। अंदर के अंधकार को इलेक्ट्रानिक लड़ियों के प्रकाश से नहीं प्रेम और ज्ञान के प्रकाश से भरें। कबीर साहब की वाणीएक नूर से सब जग उपज्या, कौन भले कौन मन्दे।’ हम सब प्रकाश से ही पैदा हुए हैं। आइंस्टीन ने भी यही कहा है कि द्रव्यमान-ऊर्जा के बीच एक समीकरण है। प्रकाश द्रव्यमान की रचना करता रहता है। हम भूल क्या कर रहे हैं? कबीर कहते हैं "रामहिं थोडा जाणिं करि, दुनिया आगै दीन। जीवां कौं राजा कहैं, माया के आधीन।।" प्रकाश को, प्रकृति को तुच्छ समझ कर इस संसार और इसकी माया को महत्व दे दिया है, तभी तो आदमी अपने को राजा तथा स्वामी समझने की भूल कर बैठा है जो कि वैभव से रहता है और माया के अधीन है।
किसी भी तरह की गुलामी से मुक्ति प्रकाश पर्व पर करने का एक बड़ा काम है। अपने पेड़, पशु-पक्षी और आस-पास के जीवन में प्रकाश कैसे आए, सोचेंगे। प्रेम और ज्ञान का प्रकाश जीवन में आए, इसके लिए मन और सोच के किस-किस अंधेरे की गंठरी फेंकनी है, यह प्रकाश पर्व का एक प्रोग्राम हो सकता है, देखना, निश्चय ही ज्यादा मजा, ज्यादा उमंग आएगा।
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सिराज केसर
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