रविवार, 6 नवंबर 2011

यूँ ही चला जाना भूपेन दा का..


डॉ. महेश परिमल
लगता है ईश्वर अचानक संवेदनशील हो उठा है। पहले तो जगजीत सिंह की सुरमई आवाज को अपने पास बुला लिया, फिर वह हमारे बीच माटी की सोंधी महक की पहचान बने चिरंजीवी आवाज के धनी भूपेन हजारिका को भी अपने पास बुला लिया। अब तक हम उनके गीतों से भाव-विभोर हुआ करते थे, अब ईश्वर अकेला ही उनके गीतों का रसास्वादन करेगा! यहाँ आकर लगता है, सचमुच ईश्वर भी अब स्वार्थी हो गया है।
भूपेन दा, ये वही भूपेन दा थे, जिन्होंने पहली बार चुनाव में ऐसा प्रयोग किया, जैसा आज तक कभी नहीं हुआ। ‘गन’ का मुकाबला ‘गान’ से करने वाले भूपेन दा हमारे बीच अब नहीं हैं, पर दिल जब भी हूम हूम करता है, तो वे अनायास ही याद आ जाते हैं। भूपेन दा को सुनते हुए ऐसा लगता है मानों चिरंजीवी आवाज का धनी यह व्यक्ति की आवाज हृदय की गहराइयों को किस तरह से अनजाने  में ही कैसे बाँध लेती है? गीत चाहे असमी हों, बंगला हों या फिर हिंदी, सभी गीत भावुक हृदय को बाँधकर रख देते हैं। उन्हें सुनना यानी असम के सुदूर गाँवों का भ्रमण करना। जहाँ संगीत का धारा दिल से बहती है। आवाज में इतनी मिठास कि लोग सुनते ही रह जाएँ। हिंदी में उनका परिचय हमें गुलजार साहब के माध्यम से मिलता है। उनके असमी गीत का हिंदी अनुवाद उन्होंने इतनी खूबसूरती से किया है लगता ही नहीं, ये मूल असमी से अनूदित हैं। ओ गंगा बहती हो क्यों, आमी एक जाजाबोर, एक कली दो पत्तियाँ, डोला हो डोला, आलसी सावन बदली चुराए आदि ऐसे गीत हैं, जिनका भाव न समझने के बाद भी ऐसा लगता है मानों यह हमारा ही गीत हमारे ही हृदय से निकल रहा है। गुलजार साहब के गीतों को जिस तरह से जगजीत ¨सह ने अपनी आवाज से अमर कर दिया, ठीक उसी तरह से भूपेन दा के गीतों को गुलजार साहब ने हिंदी के शब्द देकर अमर कर दिया। इन दोनों ने मिलकर हिंदी सिनेमा ही नहीं, बल्कि हिंदी जगत को ऐसे अमर गीत दिए हैं, जो देश ही नहीं, सात समुंदर पार भी बजते रहेंगे।
जिन्हें संगीत की थोड़ी सी भी समझ न हो, भूपेन दा ने ऐसे लोगों के लिए गीत रचे हैं, गाए हैं। उनके गीत संगीतमय कहानी बुनते हैं। कहीं डर से कँपा देने वाले, तो कहीं खुशी में झूमते हुए, कहीं देश-विदेश की यात्राएँ करवाने वाले, कहीं प्रेमी हृदय की तड़प बताते हुए, तो कहीं सिहरन पैदा करने वाले हैं। उन्हें सुनते हुए हम अपनी सारी पीड़ाएँ भूलकर एक ऐसे लोक में विचरण करने लगते हैं, जहाँ पीड़ा का सागर लहराता हो, अपनत्व की डोर में बँधे प्रेमी युगल हो, गंगा माता पर कटाक्ष करते हुए बोल हो। इन सभी को मिलाकर भूपेन दा का जो खाका तैयार होता है, वह उनकी मधुर आवाज में गुम हो जाता है, रह जाते हैं तो केवल गीत के बोल और हृदय को स्पंदित करता संगीत। अपने गीतों को बुनकर उन्होंने हमें जो संवेदनाएँ दी हैं, उसके लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं। शब्द तो आज गुलजार साहब के पास भी नहीं होंगे। हमेशा उनकी भावनाओं को शब्द देते-देते वे आज शब्दविहीन हो गए हैं। भूपेन दा शब्द रचते रहे, शब्द बुनते रहे, शब्द गाते रहे, हृदय को मथते रहे। विश्वास है उनकी अंतिम साँसें भी संगीतमय ही रहीं होंगी।
छियासी साल के हजारिका को 1992 में सिनेमा जगत के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से नवाजा गया. इसके अलावा उन्हें नेशनल अवॉर्ड एज दि बेस्ट रीजनल फिल्म (1975), पद्म भूषण (2011), असोम रत्न (2009) और संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड (2009) जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। यही नहीं, ‘गांधी टू हिटलर’ फिल्म में महात्मा गांधी के प्रसिद्ध भजन ‘वैष्णव जन’ को उन्होंने ही अपनी आवाज दी। बहुमुखी प्रतिभा के धनी भूपने हजारिका ने केवल 13 साल 9 महीने की उम्र में मैट्रिक की परीक्षा तेजपुर से की और आगे की पढ़ाई के लिए गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज में दाखिला लिया. यहां उन्होंने अपने मामा के घर में रह कर पढ़ाई की. इसके बाद 1942 में गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज से इंटरमीडिएट किया और फिर बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया. वहां से उन्होंने 1946 में राजनीति विज्ञान में एम ए किया. इसके बाद उन्होंने न्यूयॉर्क स्थित कोलंबिया यूनिवर्सिटी से कम्युनिकेशन पर पीएचडी की डिग्री प्राप्त की. 1993 में असोम साहित्य सभा के अध्यक्ष भी रहे. उन्हें कई उपाधियों से नवाजा गया, जिनमें से प्रमुख हैं:- सुधाकण्ठ,  पद्मश्री, संगीत सूर्य, सुर के जादूगर, कलारत्न, धरती के गन्धर्व, असम गन्धर्व, गंधर्व कुंवर, कला-काण्डारी, शिल्पी शिरोमणि, बीसवीं सदी के संस्कृतिदूत, यायावर शिल्पी,  विश्वबंधु और  विश्वकण्ठ ।
जीवन चलता रहता है, भूपेन दा भी हमेशा अपने सुमधुर गीतों के साथ हमारे साथ चलते रहेंगे। गीतों में जब भी माटी के सोंधेपन की बात होगी, भूपेन दा का नाम सबसे आगे होगा। जगजीत अपनी सुरमई आवाज के साथ चले गए, तो भूपेन हजारिका अपनी चिरंजीवी आवाज को लेकर चले गए। संगीत की दुनिया में ये दोनों ही एक बेजोड़ गायक रहे, जिनका स्थान कभी कोई नहीं ले सकता। भूपेन दा को भावभीनी श्रद्धांजलि।

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

मारन बंधुओं पर लटकती तलवार




डॉ. महेश परिमल
देश के लिए शर्मनाक 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला न जाने कितनों की बलि लेगा। जैसे-जैसे इसकी परतें खुलती जा रही हैं, वैसे-वैसे नए-नए घोटालेबाज चेहरे सामने आते जा रहे हैं। अब एक नया तथ्य सामने आया है कि इस घोटाले की शुरुआत ए. राजा ने नहीं, बल्कि दयानिधि मारन ने की थी। केंद्र में दयानिधि मारन का कद आज की तारीख में इतना है कि इस घोटाले में सहभागिता के कारण उन्हें अपने पद से इस्तीफा देने के चार महीने बाद उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई। अभी तक उनकी धरपकड़ नहीं हुई है। जब इस मामले में सुप्रीमकोर्ट ने लाल आँखें दिखाई, तब सीबीआई सक्रिय हुई और उनके खिलाफ सबूत इकट्ठे करने लगी। अभी भी लगता यही है कि सीबीआई मारन बंधुओं की गिरफ्तारी का मुहूर्त ही देख रही है। हाल में मारन बंधुओं के कार्यालय में मारे गए छापे में कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिली हैं। वास्तव में यूपीए शासन के दौरान टेलीकॉम घोटाले की शुरुआत ए. राजा से पहले दयानिधि मारन ने की थी। 14 दिसम्बर 2005 में दयानिधि टेलीकॉम मिनिस्टर थे, तब उन्होंने ट्राई की मंजूरी के बिना नए लायसेंस देने के लिए गाइड लाइन तैयार की। अपने कार्यकाल में दयानिधि नीलाम किए बिना ही 27 लायसेंस जारी किए। दयानिधि ने टाटा समूह के आवेदन को भी नामंजूर कर उन्हें नाराज कर दिया। टाटा से उन्होंने तब हाथ मिलाया, जब सी. शिवशंकर ने एयर सेल कंपनी बेच दी। दयानिधि के बाद ए. राजा ने जब अपना कार्यभार संभाला,तब उन्होंने टाटा समूह को भी लाभ दिलाया। दयानिधि मारन फोब्र्स की महत्वपूर्ण हस्तियों की सूची में शामिल हैं। इतनी बेशुमार दौलत मारन बंधुओं ने गलत तरीके से कमाई है, ऐसा सीबीआई का मानना है। देश के 15 वें नम्बर के इस धनाढच्य व्यक्ति ने मलेशिया की कंपनी मेक्सीस से 700 करोड़ रुपए का लाभ लिया था। यदि मारन बंधु गिरफ्तार हो जाते हैं, तो ऐसा पहली बार होगा कि फोब्र्स की सूची में शामिल होने वाली हस्तियों को जेल जाना पड़े। गलत कार्यो से जो लगातार कमाई कर रहे हैं, उन्हें मारन बंधुओं की हालत से सबक लेना चाहिए।
2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में ए राजा और कनिमोझी के बाद अब तिहाड़ जेल के मेहमान बनने वाले हैं दो भाई, दयानिधि मारन और कलानिधि मारन। दयानिधि की उम्र केवल 38 वर्ष की थी, तब वे यूपीए वन के कार्यकाल में मंत्री पद प्राप्त कर लिया था। दयानिधि और कलानिधि पर भ्रष्टाचार के आरोप में सीबीआई ने उनके कार्यालयों में छापा मारा। वहाँ मिले दस्तावेज के आधार पर उनसे अब पूछताछ की जाएगी। उसके बाद उनकी गिरफ्तारी तय है। मारन बंधुओं का शुमार देश के अमीर लोगों में होता है। इनके सन टीवी समूह में 20 टीवी चैनल और 45 एफ.एम. चैनल हैं। तमिलनाड़ु के अलावा विश्व में दस करोड़ परिवार उनके चैनलों के मजे लेते हैं। उनके हाथ में तमिलनाड़ु के दो महत्वपूर्ण अखबार और चार पत्रिकाएँ हैं। उनकी एक फिल्म प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी के अलावा एयरलाइंस भी है। फोब्र्स मैगजीन द्वारा 2011 में सबसे अमीर भारतीयों की जो सूची प्रकाशित की, उसमें दयानिधि मारन 3.5 अरब डॉलर की सम्पत्ति के साथ 16 वें नम्बर पर रखा है। 2005 में उन्होनें एसएसबीसी बैंक से 42 करोड़ रुपए में जमीन का एक टुकड़ा खरीदा था, दूसरे वर्ष उन्होंने चेन्नई के पॉश इलाके में 80 करोड़ का एक प्लाट खरीदा। चेन्नई के इतिहास में अब तक का यह सबसे बड़ा जमीन का सौदा था।
दयानिधि और कलानिधि के पिता का नाम त्यागराज सुंदरम था। वे तांजोर जिले के एक छोटे से गाँव में रहते थे। चेन्नई के पचैअप्पा कॉलेज में पढ़कर उन्होंने एम.ए. कर पत्रकार बने। उस समय उनके चाचा करुणानिधि तमिलनाड़ु की राजनीति में सक्रिय हो रहे थे। करुणानिधि के ब्राrाण विरोधी राजनीति में स्थापित होन के लिए उन्होंने अपने नाम से त्यागराज जैसा उपनाम हटाकर मारन रख लिया। जब करुणानिधि ने अपने दैनिक अखबार ‘मुरासोली’ का संपादक बनाया, तब से त्यागराज सुंदरम मुरासोली मारन के नाम से पहचाने जाने लगे। इसके बाद वे अपने चाचा की ऊँगली थामकर राजनीति का ककहरा समझने लगे।सन 1967  द्रमुक के स्थापक अन्नादुराई तमिलनाड़ु के गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री बने, तब उन्होंने दक्षिण मद्रास की लोकसभा सीट खाली की थी। करुणानिधि के कहने से यह सीट मुरासोली मारन को दी गई। वे सांसद बन गए। मुरासोली मारन 36 साल तक दिल्ली की राजनीति में रहे। इस दौरान उत्तर भारत के नेताओं से उन्होंने प्रगाढ़ संबंध बनाए। उसके बाद तो हालत यह हो गई कि केंद्र में किसी की भी सरकार हो, मुरासोली उसमें अवश्य होते। 1988 में वीपी सिंह सरकार में वे मंत्री रहे, 1995 में यूनाइटेड फंट्र की सरकार में भी उनकी उपस्थिति रही, उसके बाद 1999 में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए में भी वे मंत्री बने। 2003 में मुरासोली मारन का देहांत हो गया। इससे करुणानिधि को बहुत सदमा लगा। तब उन्होंने मारन के छोटे पुत्र कलानिधि को केंद्रीय मंत्री पद का ऑफर दिया। कलानिधि को राजनीति से अधिक अपने काम-धंधे में अधिक दिलचस्पी थी। इसलिए करुणानिधि ने 38 वर्षीय दयानिधि को दिल्ली की राजनीति से जोड़ दिया। 2004 के लोकसभा चुनाव में दयानिधि को द्रमुक की टिकिट मिली और वे सांसद बनकर युपीए एक की सरकार में दूरसंचार मंत्री बने। कलानिधि मारन ने अमेरिका यूनिवर्सिटी से एमबीए किया था। तमिलनाड़ु में उन्होंने पहले निजी टीवी चैनल सन टीवी नेटवर्क की स्थापना की। उसका तेजी से विकास किया। सन 1991 में जब जयललिता पहली बार तमिलनाड़ु की मुख्यमंत्री बनी, तब सन टीवी उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गया था।
इधर दिल्ली और तमिलनाड़ु में मारन बंधुओं का कद लगातार बढ़ता गया। इसके साथ-साथ उनका काम-काज भी बढ़ने लगा। सन टीवी के माध्यम से उन्होंने अपना राजनैतिक दबदबा बढ़ाया। 2007 में  उनके अखबार दिनकरण में एक सर्वेक्षण प्रकाशित हुआ, जिसमें बताया गया कि तमिलनाड़ु की 70 प्रतिशत जनता करुणानिधि के वारिस के रूप में उनके छोटे पुत्र स्टालिन को चाहती है। जबकि उनके बड़े बेटे अजागिरी को मात्र दो प्रतिशत लोग ही चाहते हैं। इस खबर के प्रकाशन के बाद अजागिरी के समर्थक क्रोधित हुए और दिनकरण के मदुराई स्थित कार्यालय को आग लगा दी, जिसमें तीन कर्मचारी मारे गए। इस घटना की प्रतिक्रिया में दिल्ली में दयानिधि को मंत्री पद छोड़ना पड़ा था। उनके स्थान पर ए. राजा को भेजा गया। 2009 में यूपीए 2 की सरकार में दयानिधि को कपड़ा मंत्री बनाया गया। 2004 और 2007 के दौरान 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सहभागिता होने के कारण उन्हें यह पद भी छोड़ना पड़ा था।
जब 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया, तब न तो दयानिधि और न ही कलानिधि का नाम इसमें जोड़ा गया। एयरसेल कंपनी के भूतपूर्व मालिक सी. शिवशंकर ने जब यह आक्षेप किया कि दयानिधि मारन ने उन्हें लायसेंस के लिए काफी परेशान किया। न चाहते हुए भी मुझे अपनी मलेशिया स्थित कंपनी को मेक्सीस कम्युनिकेशन को बेचनी पड़ी। इसके बाद तो दयानिधि की कृपा से उन्हें 2 जी का लायसेंस मिल गया। इस लाभ के बदले में मेक्सीस की साथी कंपनी ‘एस्ट्रो’ ने कलानिधि मारन की कंपनी सन डायरेक्ट के शेयर 550 करोड़ रुपए में खरीद लिए। सीबीआई की एफआईआर के अनुसार यह रकम मारन बंधुओं को रिश्वत के बतौर दी गई थी। एयरसेल कंपनी ने 2 जी स्पेक्ट्रम के लिए दिसम्बर 2004 में आवेदन किया, तब दयानिधि मारन दूरसंचार मंत्री थे। दयानिधि ने ही इस फाइल पर टिप्पणी लिखी कि इस आवेदन के समाधान में बेवजह उतावलापन दिखाया जा रहा है। इस दौरान मलेशिया की मेक्सीस कंपनी ने एयरसेल को खरीदने का ऑफर दिया। अक्टूबर 2005 में एयरसेल के मालिक सी. शिवशंकरन और मेक्सीस के एक्जिक्यूटिव राल्फ मार्शल के बीच मंत्रणा हुई। मार्शल ने स्पष्ट कहा कि यदि वे एयरसेल कंपनी बेच देंगे, तो उन्हें तुरंत ही 2 जी का लायसेंस मिल जाएगा। मीटिंग के तुरंत बाद शिवशंकरन के पास दयानिधि का फोन आया। दयानिधि ने साफ तौर पर कहा कि उसे एयरसेल कंपनी को बेच देना चाहिए। उनकी बात मान ली गई। 2005 में जब एयरसेल कंपनी मेक्सीस को बेच दी गई, उसके तुरंत बाद उन्हें 2 जी का लायसेंस मिल गया। इसके एवज में मारन बंधुओं को 700 करोड़ रुपए का लाभ हुआ।
  डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

नवभारत रायपुर बिलासपुर में प्रकाशित मेरा आलेख


नवभारत रायपुर बिलासपुर में आज प्रकाशित मेरा आलेख







नवभारत रायपुर बिलासपुर में आज प्रकाशित मेरा आलेख

सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

क्या बोल गया अन्ना का मौन?


डॉ. महेश परिमल
आखिर हिसार से कुलदीप विश्वोई जीत गए। यहाँ कांग्रेस तीसरे क्रम पर रही। कांग्रेस प्रत्याशी जयप्रकाश एक कमजोर प्रत्याशी थे। उनकी हार से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। एक लहर यह चली कि शायद अन्ना की अपील काम कर गई। पर अब अपनी इस अपील पर शायद अन्ना को ही मलाल है। अब उन्होंने मौन साध लिया है। उनका मौन इसलिए आवश्यक भी था कि इन दिनों जो नए सवाल उपजे हैं, उसके जवाब उनके पास नहीं हैं। एक तो उन्होंने अनजाने में भाजपा की जिस तरह से सहायता की है, उससे उन पर संघ से प्रभावित होने का आरोप लग रहा है। इसके बाद जब आडवाणी जी रथयात्रा सतना पहुँची, तब उसके कवरेज के लिए पत्रकारों को जिस तरह से धन दिया गया, उससे यही साबित होता है कि जिस भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए उन्होंने रथयात्रा शुरू की है, उसके कवरेज के लिए भी भ्रष्टाचार का सहारा लेना पड़ रहा है। तीसरी बात येद्दियुरप्पा का जेल जाना भी इस बात का परिचायक है कि यदि ये वास्तव में दोषी थे, तो फिर इन्हें भाजपा ने ही इतने लम्बे समय तक संरक्षण क्यों दिया? इन सवालों का जवाब अन्ना के पास नहीं है। यही नहीं, आडवाणी भी इन सवालों का जवाब नहीं दे पा रहे हैं। भोपाल में उन्होंने इस तरह के सवालों से बचने की भरसक कोशिश की। कई बार तो उन्होंने खामोशी का सहारा लिया। आखिर कब तक वे और अन्ना खामोशी की चादर ओढ़े रखेंगे। कुछ तो जवाब देना ही होगा।
इसके अलावा अन्ना अपनों से ही परेशान हैं। उनके साथियों की हरकतें ही ऐसी हो गई हैं कि अन्ना को भी जवाब नहीं सूझ रहा है। स्वामी अग्निवेश की कपिल सिब्बल से बातचीत की सीडी बाहर आने के बाद अन्ना को जो झटका लगा, वह तो उनके आंदोलन को मिले जनसमर्थन से कम हो गया। पर कश्मीर पर प्रशांत भूषण ने जो बयान दिया, उसकी प्रतिक्रिया के एवज में उनकी जिस तरह से धुलाई हुई, वह भले ही एक लोकतांत्रिक देश के लिए शर्मनाक है, पर नाराजगी को बाहर आने के लिए कोई रास्ता तो चाहिए। जो प्रशांत भूषण ने कहा, वही तो पाकिस्तान लम्बे समय से कह रहा है। उनके बयान से पाकिस्तान को ही बल मिला। वह तो इसी ताक में है कि कश्मीर में किसी तरह से जनमत संग्रह हो, ताकि वह अपनी चालाकी से लोगों को भरमा सके। अपनों के दर्द से परेशान अन्ना का अब खामोश रहना ही ठीक है। हिसार चुनाव में कांग्रेस का प्रत्याशी भले ही न जीत पाया हो, पर अन्ना जीत गए, यह कहना मुनासिब नहीं होगा। जिस तरह से वहाँ कांग्रेस की हार तय थी, ठीक उसी तरह अन्ना की अपील कोई असर नहीं छोड़ेगी, यह भी तय था। अब भले ही कितना भी कह लिया जाए कि हिसार में कांग्रेस अन्ना के प्रभाव के कारण हारी, तो यह गलत ही होगा।
हिसार में कांग्रेस की हार कोई अर्थ नहीं रखती। लेकिन अन्ना की सीडी जिस तरह से वहाँ लोगों को सुनाई गई, उससे यही लगता है कि अन्ना को लोगों ने गंभीरता से नहीं लिया। जनलोकपाल विधेयक के लिए अन्ना के आंदोलन को भले ही अपार जनसमूह का साथ मिला हो, पर अब सरकार की लेटलतीफी से उनकी छवि लगातार धूमिल होती जा रही है। उस पर उनके साथियों के बयानों ने इस छवि को काफी नुकसान पहुँचाया है। अपनी लेटलतीफी के लिए पहचानी जाने वाले मनमोहन सरकार यही चाहती है कि अन्ना को मिल रहे जनसमर्थन का ग्राफ लगातार कम हो। यही हो रहा है। हिसार चुनाव के पहले अन्ना ने जिस तरह कांग्रेस के खिलाफ हवा चलाई थी, उसके जवाब में कांग्रेस ने कहा कि अगर अन्ना में हिम्मत है, तो वे हिसार में अपना प्रत्याशी खड़ा करके दिखाएँ, केवल प्रत्याशी खड़ा करना महत्वपूर्ण नहीं, उसे जीतना भी आवश्यक होता। तभी यह माना जाता कि अन्ना की अपील में दम है। ऐसा केवल लोकनायक जयप्रकाश ही कर सकते थे। जबलपुर में उन्होंने जिस तरह से कांग्रेस के गढ़ पर धावा बोला और एकदम नए नेता शरद यादव को जिताया, इससे उनके कद का पता चलता है।
लोकसभा चुनाव में जिस प्रत्याशी की जीत का संभावनाएँ प्रबल हो और वह चुनाव हार जाए, तो यह आश्चर्यजनक हो सकता है। हाँ यदि कमजोर प्रत्याशी जीत जाए, तो वह इसका पूरा श्रेय लेने से नहीं चूकता। हिसार में तो कांग्रेस के उम्मीदवार जयप्रकाश तीसरी पोजीशन में है। उनकी हार का श्रेय अन्ना को नहीं मिलेगा। इसे दूसरे नजरिए से देखें तो जयप्रकाश की हार के लिए कोशिश करने का मतलब यही है कि अन्य प्रत्याशियों को जिताने के लिए रास्ता साफ करना। ये दोनों प्रत्याशी भ्रष्ट हैं, यह तो सभी को पता है। पर शायद अन्ना को यह पता नहीं कि उन्होंने अनजाने में ही भ्रष्ट लोगों की सहायता ही की । भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले जब भ्रष्ट लोगों के संरक्षक बन जाए, तो इसे क्या कहा जाए?
कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि अन्ना अब रास्ते से भटक रहे हैं। उनकी अपनी सोच सीमित है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन तक उनकी सोच में साफगोई थी, पर अब वे अपनों से ही संचालित होने लगे हैं। उनकी टीम आंदोलन करने में सक्षम हो सकती है, पर चुनावी मैदान में उतरकर लोगों को रिझाने में नाकामयाब है, यह तय है। अन्ना की टीम को अपने आप पर ही विश्वास नहीं है। टीम के अंतर्कलह भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ऐसे में आखिर वे कब तक खींच पाएँगे, विभिन्न विचारधाराओं की इस नाव को? भाजपा यदि भ्रष्ट न होती और अन्ना उनके प्रत्याशियों का समर्थन करते, तो संभव है, लोग उन्हें गंभीरता से लेते। पर वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, इससे साफ है कि वे न तो अंतर्कलह को ही रोक पा रहे हैं और न ही चुनाव लड़ने के लिए हिम्मत ही बटोर पा रहे हैं। ऐसे में उनकी स्वच्छ छवि को उज्ज्वल बनाए रखना एक दुष्कर कार्य है। आज भले ही वे मौनधारण किए हुए हों, पर सच तो यह है कि इस मौन ने ही काफी कुछ कह दिया, पर इसे समझा कितनों ने?
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

माँ पर पी-एच.डी. और पी-एच.डी. पर माँ


बहुत ही अनजाना-सा नाम है, सिंधुताई सपकाल का। उनका संघर्ष भले ही किसी के लिए महत्वपूर्ण हो न हो, पर उनके बेटे के लिए अवश्य है। इन दिनों सिंधुताई का बेटा उन पर पी-एच.डी. कर रहा है। लोग अपने आदर्शो पर अनुभवों की किताबें लिखते हैं, पर पी-एच.डी. करना अलग बात है। पी-एच.डी. का एक अलग ही आधार होता है। माँ को अध्यायों में विभाजित करना होता है। उनके संघर्षो और कड़वे अनुभवों को अक्षरों का रूप देते हुए एक-एक पन्नों पर बाँटना होता है। जहाँ हर पूर्ण विराम एक वेदना को आँसू का रूप देता है। बूँद-बूँद आँसूओं से लिखी इबारत माँ के संघर्ष को एक नई ऊँचाई देगी, ऐसा विश्वास किया जा सकता है। सिंधुताई के बेटे की पी-एच.डी. का आधार भी शायद यह हो सकता है। माँ चिंदी के रूप में, दसवें वर्ष में शादी अर्थात बालिका वधू के रूप में, बदचलनी का आरोप झेलनेवाली एक बेबस माँ के रूप में, समाज से निष्कासित नारी के रूप में, भीख माँगनेवाली एक लाचार माँ के रूप में, श्मशान में रहनेवाली एक नि:सहाय माँ के रूप में, चिता की आँच में रोटी सेंकने वाली एक बेचारी माँ के रूप में और अंत में स्नेह लुटाने वाली हÊार बच्चों एक स्नेहमयी माँ के रूप में। सिंधुताई पर केन्द्रित शोधप्रबंध के उक्त अध्याय हो सकते हैं। माँ पर महाकाव्य तो लिखा जा सकता है, पर उन पर शोधप्रबंध तैयार करना मुश्किल है, क्योंकि शोधप्रबंध में ईमानदारी के अवयव होते हैं। जो कुछ पर माँ पर बीता, उसे शब्दों की माला पहनाना एक अलग ही अनुभव होता है।
भाषाविज्ञान में पी-एच.डी. पर माँ को लेकर मेरा अलग ही तरह का अनुभव है। जब मैं अपना शोधप्रबंध लेकर अनपढ़ माँ के पास पहुँचा, तो हमारे बीच जो संवाद हुआ, वह कुछ इस तरह था -
- बेटा ! इसे तूने लिखा है ?
- हाँ , माँ।
- क्या तू लेखक है ?
- नहीं, माँ।
- तो फिर इत्ता सारा कैसे लिख लिया ?
- इतना तो सबको लिखना ही पड़ता है माँ।
- पर तू तो विद्यार्थी है, लेखक नहीं।
- सभी विद्यार्थी को इतना लिखना ही होता है माँ।
- तब तो तुझे बहुत तकलीफ हुई होगी ?
- लिखने में कैसी तकलीफ माँ ?
- बेटा, मैं अनपढ़ जरूर हूँ, पर तुझे मिलाकर ग्यारह पढ़े-लिखे बच्चो की माँ भी हूँ। मुझे मालूम है, पढ़ने-लिखने में कितनी तकलीफ होती है।
- मैं खामोश!
- बेटे, अपने हाथों को जरा इधर ला, मैं उसे चूम लेती हूँ, ताकि तेरे हाथों की पीड़ा कुछ कम हो सके।
माँ मेरे हाथों को चूम रही थी। मैं गीली आँखों से उनका ममत्व रूप देख रहा था। मुझे तो उसी दिन पी-एच.डी. मिल गई थी। यह मैंने उसी दिन मान लिया था। यह बात 18 वर्ष पहले की है। माँ अब इस दुनिया में नहीं है। अभी दो अक्टूबर को उनकी दसवीं पुण्यतिथि थी। मैं आज भी पीड़ा के क्षणों में अपने हाथों पर माँ के चुम्बन को महसूस करता हूँ। हममें से कितने ऐसे हैं, जो माँ को इस रूप में याद करते हैं ?
माँ स्नेह की निर्झरिणी है, जो सतत प्रवाहमान है। इसकी हर बूँद में ममत्व का अहसास है, जो एक शिशु को जीवन जीने की प्रेरणा देता है। जब इसी माँ को वृद्धाश्रम में दिन बिताते हुए देखता हूँ तो माँ के प्रति हमारे दृष्टिकोण बदलते हुए दिखाई देते हैं। बदनसीब हैं वे जिनके माता-पिता वृद्धाश्रमों में कैद हैं और खुशनसीब है सिंधुताई का वह बेटा जो केवल अपनी माँ पर ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय समाज में सिंधुताई की तरह जीवन व्यतीत करती माँओं पर पी-एच.डी. कर रहा है।
डॉ. महेश परिमल