गुरुवार, 16 मार्च 2023

धनी बिना जग लागे मोर सूना सूना

काकी जीवन गुजार रहे विधुर और विधवाओं की अपनी अजब-गजब समस्याएं होती हैं, दुखड़ा रोते हैं। है कोई समाज  अथवा संगठन जो उनकी आंसुओं को पोंछ सके। बंद पड़ी जीवन की घड़ी अथवा धड़कनों को पुन: रिचार्ज कर सके, रुढिय़ों, परंपराओं मे जकड़े समाजों का कभी दिल नहीं पसीजता कि जिनके जीवन में नि:सारिता गई है, अंधेरे में भटक रहे हैं, उसे उपवन बना दिया जाए? एक ऐसा ही सार्थक प्रयास राजधानी के एक संगठन रायपुर ब्राइट फाउन्डेशन ने किया है। इसी पर आधारित है छत्तीसगढ़ी आलेख- बुढ़वा मन के बिहाव करे के साध....

बुढ़त काल मं जेकर गोसइन के इंतकाल हो जथे या फेर जेकर गोसइया चल बसथे, विधवा हो जथे या आधा उमर के पहिली रांडी अनाथिन हो जथे या गोसइया विधुर हो जथे तेकर मन के जिनगी अधर मं लटक जथे। बिन जोड़ी-जांवर के अइसन मन के जीव मुंहाचाली बिगन छटपटावत रहिथे। काकर संग अपन दुख-सुख के गोठ बात करिन, बात के छोड़े अउ दूसर इच्छा होगे ओकर भरपाई कइसे करे जाय। शरीर घला कुछु मांगथे, उहू ला कोनो जिनिस के भूख लगथे जइसे पेट हा खाय बर अनाज-पानी मांगथे। ये अलकरहा समस्या हे। घर-परिवार सबो हे फेर ये भूख अइसे हे ये सबो के रहिथे फेर भूख ला कोनो नइ मेटा सकय।

अइसन बहुत दाई-महतारी, बेटी-बहिनी, काकी, मामी, मौसी, भउजी, फूफू हे जउन आधा उमर में जुच्छा हाथ होगे हे विधवा होगे हे, अइसने पुरुष मन घला विधुर होगे हे। घर मं कांही जिनिस के कमी नइहे, कमी हे तो सिरिफ जोड़ी जांवर के? कहां जाय, कोन बतावय अपन दुख अउ तकलीफ? कहूं इच्छा पूरा करे खातिर ककरो संग अवैध संबंध बनावत हे, गांव-शहर  मं अइसन कारोबार धड़ल्ले से चलत हे, फेर अवैध हा तो अवैध होथे। कहूं ऊंच-नीच होगे, पकड़ागे, पेट भरागे तब बदनामी के सिवाय कांही हासिल नइ होवय।

कइसे करबे हरहा गरुवा हरियर चारा खाये बिगन मन माडय़ नहीं। सरी उमर भर तो टकराही परे रिहिसे तेकर सेती आदत  जाय रहिथे। उदुक ले खेत के चारा लुआ जथे तहां ले धपोर देथे गाड़ी हा। मन छुनहुन - छुनहुन लागत रहिथे। कतको मनाबे, लगाम तीरके रखबे फेर हरियर-हरियर चारा देख के  येहर उही कोती रेंगे ले धर लेथे। चारा लाइन मं लाय खातरि गजब उदीम करे ले परथे। फेर अइसन कतेक दिन ले चलही। पर के खेती पर के चारा, परे होथे, अपन हो नइ सकय। कतको झन किराया मं घला काम चला लेथे। गांव अउ शहर मं सबो जघा अइसन जुगाड़ हो जथे। फेर किराया के माल किराया के होथे, ओकर ऊपर अपन हक जता नइ सकस।

समाज के जबर समस्या हे। सब घर अइसन बहू - बेटी, दाई-बहिनी, काकी, मामी, फूफू कोनो-कोनो कारन से बेवा होके बइठे हे। ये माई लोगिन मन के जउन समस्या हे तउन तो हइहे, ओकर ले भारी समस्या अउ संकट ओकर परिवार के मुखिया मन के हे जेकर घर मं अइसन जवान या अधेड़ बहिनी, बेटी मन के हे। कइसे ओकर मन के जिनगी के नइया पार होही, उमर पहाही? ओकर मन के दुख अउ हालत देख-देख के  ओमन राहेर अउ संडइया काड़ी असन सुखावत जात हे।  कोनो-कोनो समाज मं ये समस्या के हल निकाल ले हे, चूरी पहिना के बहिनी बेटी के जिनगी ला संवार देथे। पटरी मं जथे ओकर मन के गाड़ी, बने चले ले धर लेथे। फेर कतको अइसे समाज हे जेकर मन के नियम, कानून कठोर हे। बेटी-बहू घर मं बइठके सरी उमर पहा लिही फेर ओकर मन के जिनगी संवारे के कोनो रस्दा नइ चतवार सकिन ओमन। ओकर मन बर जिनगी पहाड़ असन हो जथे।

सुरता आवत हे मोला, गांव के तीन झन अधेड़ जउन पचास, साठ अउ अस्सी के उमर पार कर डरे रिहिन, तेन मन विधवा विवाह करके गोसइन लाइन। ओकर मन के अपन-अपन घरेलू समस्या रिहिन, तब कतको के शरीर के भूख मेटाय बर जुगत करिन। शर्त, समझौता हे तिहां सब जुगाड़ हो जथे। लेन-देन, लिखा-पढ़ी करके ये बेवस्था करे जाथे। अस्सी साल के बुढ़वा, जेकर बेटी, नाती, नतनीन सबो रिहिसे तेला भला का के जरूरत रिहिस होही, फेर का करबे हरहा मन मानय नहीं। पांच एकड़ जमीन बेवा छोकरी के नांव मं रजिस्ट्री करा के गोसाइन बना के ले आनिस।

ये विकट समस्या हे, समाज ला एकर मन के समस्या ला समझना चाही। मरद मन तो बोल डरथे फेर बेटी, बहिनी अउ बहू मन कइसे बोल पाही बपरी गरीबीन मन। लोक लाज ओमन धर जाथे. हल निकाले बर चाही अउ जरूर ये दिशा मं कदम उठाना चाही। रस्दा नइ निकाले मं कदम भटक जथे, भरे जवानी के बोझ सहे नइ जा सकय। अइसन दरद उही जान सकत हे जेन गुजरत हे। अभी हाले के बात हे- एक झन संगवारी पूछथे- कइसे जी फलाना, गोसइन गुजरे के बाद तोला अब कइसे लागत हे, कमी खलत होही ना? मुड़ मं पथरा कचारे असन लगिस ओकर बात हा। आगी मं नून झन छिड़क भाई।  तेवर ला देख के चुप होगे।

भला होय, हमर राजधानी के जागरुक सियान मन ला, जउन अइसन मन के बज्र समस्या ला हल करे खातिर ठोसलगहा कदम उठाय हे। रायपुर बॉइट फाउन्डेशन नांव के एक संस्था हे जेकर पदाधिकारी मन जीवन के आखिरी पड़ाव मं एकाकी जीवन गुजारत बुजुर्ग मनखे बर जीवन साथी के जुगाड़ करे खातिर परिचय सम्मेलन करिन। तेमा तीरपन कोरी ले ऊपर महिला अउ पुरुष मन भाग लिन। एमा छै कोरी मन फिर से बिहाव करे के बातचीत आघू बढ़इन ये सम्मेलन मं दू कोरी ले कम उमर के महिला पुरुष के संख्या दस कोरी रिहिसे उहें तीन कोरी ले अधिक उमर के संख्या पांच कोरी रिहिस। महासमुंद, रायपुर, कांकेर, धमतरी ले घला अइसन महिला-पुरुष मनखे सम्मेलन मं भाग लिन। ये विधवा मन घला खुलके भाग लिन अउ अपन समस्या गिनाइन अउ एकाकी जीवन के दुखड़ा सुनइन।

परमानंद वर्मा

बुधवार, 15 मार्च 2023

रोना, कभी नहीं रोना

रोना, यह अच्छा गुण नहीं है लेकिन लोग रोते हैं? क्यों रोते हैं, किसके लिए रोते हैं, क्या मिलता है रोने से? क्या रोना  है, कहां तक उचित है? इतने ढेर सारे सवाल, एक साथ मानस पटल पर उभरना आश्चर्यजनक है और उतना ही मुश्किल है उसका उत्तर ढूंढ पाना, एकत्र कर पाना। 

जहां तक मुझे याद है, रोने से मैं कतराता था, बचने की कोशिश करता था। स्थिति, परिस्थितियां कभी-कभार ऐसी निर्मित हो जाया करती थी तब ऐसा लगता था, मन द्रवित हो गया है और अब तब रो पड़ूंगा लेकिन इससे बचने के लिए घर से बाहर निकल जाता था और ऐसी जगह पहुंच जाता था जहां लोगों की भीड़ हुआ करती थी। बच्चे अथवा साथी मैदान में केलकूद कर रहे होते थे और फिर क्या था, उन लोगों की टीम में शामिल होकर खेलने लग जाता था। इसका फायदा यह होता था, मनसा में आने वाला भावाभिव्यक्ति अथवा द्रवित होने वाले विचारों का शमन हो जाता था, और बच जाता था रोने से। मुझे याद पड़ता है, तीस-पैंतीस सालों में कभी रोया नहीं। रोने पर विजय प्राप्त कर लिया था। बचपन से गुरु दीक्षा ले लिया था, जिसका फायदा मिला, कुछ-कुछ साधना भी किया करता था जिसका लाभ मिल रहा था। 

लेकिन एक दिन ऐसा भूचाल आया कि सारा ज्ञान, साधना का कचूमर निकल गया। पूजा करके उठा ही था कि इसी दौरान गांव से सूचना आई कि पिताश्री नहीं रहे। इस सूचना से विचलित तो नहीं हुआ और तटस्थ भाव से सूचना देने आने वाले व्यक्ति के साथ गांव के लिए रवाना हुआ। साइकिल पर जा रहा था, पीछे बैठा था, साइकिल चालक से कोई बातचीत नहीं। लेकिन मन झकझोर रहा ता। कभी कहता रोना नहीं है, आने वालों को तो एक दिन जाना ही होता है, सभी लोग चले जाते हैं चाहे वह राजा हो, रंक हो, फकीर हो, अथवा आम आदमी। तुम्हें भी  एक दिन इस संसार से विदा लेना होगा। यह तो रंगशाला है, सब अ्भिनय करने वाले लोग होते हैं। पिताश्री का रोल खत्म हो गया और चला गया। तर्क-वितर्क, विचारों का उधेड़बुन, ऐसा लग रहा था जैसे संग्राम चल रहा हो। लेकिन इस संग्राम में आखिरकार मुझे पराजित होना पड़ा, मेरे आंखों से आंसू बच्चों की तरह नदियों के पानी की तरह झर-झर बहने लगे। घर पहुंचते तक यही स्थिति रही। मन ने कहा- देखो, पिताश्री की याद ने तुम्हें रूला दिया ना. 

हां, मैं पराजित हो गया और यह 'रोना ने विजय प्राप्त कर लिया। 

बातें चल रही है लोग राते क्यों हैं, उन्हें रोना नहीं चाहिए लेकिन कभी-कभी शिकारी भी ऐसे शिकार में फंस जाता है कि उसका संकट से उबरना मुश्किल हो जाता है। ऐसी ही एक बार की बात है, एक आश्रम में प्रवचन का कार्यक्रम शुरू होने वाला था। कथा वाचक मंच पर विराजमान हो चुके थे। उसका परिचय और कार्यक्रम का विवरण देने के लिए आश्रम के प्रभारी ने माइक संभाला। वे बड़े ज्ञानी और योगी महापुरुष थे। उनके बड़े भाई का हाल ही में निधन हुआ था। कार्यक्रम का विवरण देते वक्त दिवंगत भाई का उन्हें स्मरण हो आया। उनका गला रुंध गया। पंछे से आंखों से झर रहे आंसुओं को पोंछने लगे। सभा में सन्नाटा पसर गया। कुछ देर के लिए शांति का माहौल निर्मित हो गया। श्रोताओं के बीच मैं भी बैठा हुआ था। सोचने लगा, मन में तर्क-वितर्क उठने लगा- इतने ज्ञानी, योगी, तपस्वी, साधक और संसार को ज्ञान, योग का प्रसाद बांटने वाले महात्मा के आंखों में आंसू क्यों, भाईश्री की मौत पर इनके मन में शोक की साया क्यों? जब घर-बार छोड़कर ब्रम्हचर्य जीवन यापन करने वाले महात्मा की यह स्थिति है तब सामान्य आदमी और इनमें अंतर क्या है? इनकी साधना, ज्ञान, योग और तपस्या सब निष्फल है। इससे बेहतर तो आम इंसान ही है जो सुख-दुखों के बीच जीवन यापन करते हैं। सच मुच बड़ी अजीब है यह दुनिया । कभी किसी को हंसाती है तो रुलाने से बाज भी नहीं आती। इसी बीच एक फिल्मी गीत का स्मरण हो आया। गीत के बोल इस प्रकार हैं- 'रोना कभी नहीं रोना, चाहे टूट जाए तेरा खिलौना ।  हीरो अपने बच्चे को सीने में लेकर कहता है- 'जिंदगी में कभी रोना नहीं, भले ही खिलौना टूट जाए।  बच्चों को खिलौनों से कितना प्यार होता है, इसे कौन नहीं जानता? कदाचित जाने-अनजाने में वह टूट-फूट जाए तब वह कैसे नहीं रोयेगा। अर्थात जिस चीज से जिसका प्यार होता है, लगाव और संबंध होता है और यदि उससे विच्छेद हो जाए, अंत हो जाए तब शोक भला किसे नहीं होगा? यह संसार है, बच्चा जन्म लेता है तब खुशी होती है और मर जाता है पूरे घर में मातम छा जाता है। मां बच्चे के वियोग में छाती पीट-पीटकर रोती है। इसी तरह बच्चे भी खिलौना टूट जाने पर रोते हैं। माता-पिता उसे दूसरा खिलौना लाने का आश्वासन देते हैं तब कहीं वह चुप होता है। 

प्यार, लगाव, संबंध- यही तो माया है। इसी से तो सारा संसार चल रहा है। जकड़े हुए हैं सब। जब ज्ञानी, ध्यानी भी माया के च्ककर में फंस जाते हैं तब आम जन की बात जाने दीजिए। कोई चाहे कितना भी दावा करे कि वह मोह मुक्त है, तो यह असंभव है। बिरले ही लोग मिलेंगे। इसी प्रसंग में एक वाक्या का स्मरण सुनाते हुए एक साध्वी  का 'आप बीती बता रहा हूं। इस शहर में एक कार्यक्रम के दौरान श्रोताओं को उसने बताया कि एक बार उसके जीवन में अजीबो गरीब संकट आया। वह असमंजस में पड़ गई कि अब करे तो क्या करे। नष्टोमोहा की परीक्षा की घड़ी थी। उन्हें यह दीक्षा मिली थी कि जीवन में चाहे कैसी भी परिस्थिति आ जाए लेकिन आंखों से एक बूंद आंसू नहीं टपकना चाहिए। उसने बताया कि मां के निधन का समाचार आया तब वह स्तब्ध रह गई। दूसरे दिन घर पहुंचने का बुलावा था। सोचने लगी- क्या करूं, क्या न करूं। जाना तो था, रास्तेभर ट्रेन में सोचती-गुनती रही कि मां तो मां है, उसकी बेटी हूं, संतान हूं। उसकी कोख से जन्म लिया है तब उससे  जरूर लगाव और संबंध होना स्वाभाविक है। और इधर ज्ञान में आने के बाद वह सब संबंध विलुप्त सा हो गया और एक परमात्मा से सब संबंध जोड़ लिया। लेकिन मां की याद उसकी ममता और प्यार को कैसे विस्मृत किया जा सकता है? सोचने लगी- जब उसके मृत देह और चेहरे को देखूंगी तब क्या धैर्य का बांध टूट नहीं जाएगा, कैसे नहीं छलकेंगे आंसू? लेकिन उसे इस वक्त यह स्मरण हो रहा था कि बाबा ने कहा है- बेटी, मां मरे तो हलुवा खावो, बाप मरे तब हलुवा खाना। जब मां के मृत शरीर को देखा तब मन एकदम शांत हो गया। आंखें निहारती रही, ऐसा लग रहा था जैसे कुछ हुआ ही नहीं है। यहां नष्टोमोहा की डिग्री मिल गई, परीक्षा में सफल हो गया। सचमुच रोते तो बच्चे हैं जो अनजान और अज्ञानी की तरह होते हैं, वे नहीं जानते कि खिलौने को तो एक न एक दिन टूटना-फूटना ही है। इसी तरह यह मानव शरीर है, नश्वर देह है। इसको भी एक दिन इस संसार से विदा लेना है तब इसके लिए क्या रोना-धोना, सिर पिटना?

परमानंद वर्मा

सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

जभे जागव तभे सबेरा

परमानंद वर्मा

प्रतिबंध :  सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। लेकिन अचानक ऐसा वक्त आया कि तलवार उठाना ही पड़ गया। जनसंख्या विस्फोट और महंगाई ने सारी व्यवस्थाएं चौपट कर दी जिससे समाज भी अछूता नहीं रहा। जन्मदिन, विवाह, मृत्युभोज तथा इसी तरह के अन्य उत्सव व कार्यक्रमों में फिजूलखर्ची बढ़ रही थी। डीजे, डांस, तथा अनावश्यक कार्यक्रमों से फिजूलखर्ची की जाने लगी थी, शादियों में भी दिखावे के लिए पैसे पानी की तरह बहाए जा रहे थे। सम्पन्न वर्ग के लोगों पर पैसे की बर्बादी का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था लेकिन पीसे जा रहे थे सामान्य वर्ग के लोग। इसी को ध्यान में रखते हुए लगभग सभी समाज के प्रमुखों ने कुरीतियों पर प्रतिबंध लगाने का कठोर निर्णय लिया है। इसी संदर्भ में है यह छत्तीसगढ़ी आलेख।

जइसन कभू सोचे, समझे नइ जाने रहिबे तउनो बात उदुक ले अचानचकरित हो जथे तउन ला भला का केहे जाए? अइसन होथे अउ होय घला हे। तब सब माथा धर के बइठगे हे। बात अउ समस्या आथे मुड़ी ऊपर तब सरक जथे, तब ओ समे हाथ मं हाथ धरे बइठे म तो कोनो बात नइ बनय ? रस्दा चतवारे ले परथे, वइसने कस समस्या के निराकरन करे खातिर सियान मन कदम उठाय हें। बड़ नीक लगिसे। जइसे समे तइसे काम करे मं ही भलइ हे। 

अभी होय का हे, देश के सबो समाज जइसे जैन, कायस्थ, अग्रवाल, हिन्दू, मुस्लिम सबो मं मृत्यु भोज के बेवस्था चलत आवत रिहिसे। पहिली परिवार छोटे-छोटे राहत रिहिसे, सबो झन के आर्थिक स्थिति सजोर रिहिसे। धीरे-धीरे परिवार बढ़त गिस, सबो झन के आरर्थिक स्थिति जहां चरमराय लगिस तहां ले दांत ल निपोर दिन। जतका सामाजिक बेवस्था रिहिसे तउनो लखड़ावत गिस। खान-पान, लेना-देना, बात-बेवहार, सब गड़बड़ाए ल धर लिस। बहुत अकन सामाजिक बेवस्था अइसे रहिसे जउन गैरजरूरी  असन रिहिसे फेर पूर्वज मन चला दे हे, चलत आवत रिहिसे ते पायके संकोच बस कोनो कांही नइ बोल सकत रिहिन हे। कुछ कर नइ पावत रिहिन हे। 

फेर होथे का, जब पानी मुड़ ले ऊपर बाढ़े ले धर लेथे जीव उबूक-चुबुक होय ले धर लेथे, परान छूटे ले धर लेथे तब ओ बखत हाथ-पैर मारके कइसने करके परान बचाए ले परथे। अइसने कस हाल अभी देखे बर मिलिसे। कउवागे सब, केहे ल लगिन के  समाज मं जउन कुरीति हे ओकर ले किनारा करे बिन भलई नइहे। ते पाके छत्तीसगढ़ के कतको समाज मन सादगी अउ साफ-सुथरा ले सब कारज ल निपटाय के निरनय लिन, अइसन करे ले जउन ओमन आरर्थिक तंगी ले जूझत रिहिन हे, तेकर ले छुटकारा पाय ल लगिन। 

सबो समाज मं शादी, जन्मदिन, मरनी-हरनी अउ श्राद्ध जइसन कार्यक्रम मंं उछाहे-उछाह मं मनमाने खरचा कर डरय। फेर पाछू चलके भुगते ले उही मन ल परय। पीढ़ी दर पीढ़ी तो अइसन रीति-रिवाज चलत आवत हे। जरूरत ले जादा दिखावटी कार्यक्रम मं जेकर कोनो जरूरत नइ राहय, फेर शान-शौकत मं कोनो कमी झन होवय, सोच के मनमाने रुपया, पइसा फूंक डरय। श्राद्ध अउ मृत्युभोज मं घला वइसने फिजूलखर्ची। इही सब ला रोके खातिर समाज के मुखिया मन बइठक करके ओला छोड़े के  निरनय लिन। एमा जैन समाज मं अब शादी समारोह मं कोनो पार्टी नइ होही, कायस्थ समाज मृत्युभोज पर बंदिश लगइन, मुस्लिम समाज मं शादी मं डीजे नइ बाजही। वइसने अउ समाज मन घला आघू आवत हे।

परमानंद वर्मा

बुधवार, 18 जनवरी 2023

ए नंदा जाही का रे नंदा जाही का


'ए उड़ा जाही का रे

उड़ा जाही का रे

उड़ा जाही का

मनकैना चिरइया कलरा करइया

फुदुक-फुदुक फुदकाए

सोन चिरई उड़ा जाही का?

सील-लोङहा, ढेंकी-मुसर, कलम-दवात, अगतरिया-भंदई, धान कोठी, जांता,ये सब नंदागे,बइला-भइसा गाड़ा-गाड़ी नंदागे, घोड़ा नंदागे, गाय-भइस, बछिया-बछवा, पड़वा सब एक-एक कर नंदावत जात हे, नांगर नंदागे, गांव घला नंदावत हे, तीज-तिहार, परब, बोली-भाखा अउ मनखे मन घला नंदावत जात हे। माई कोठी नंदागे, दउरी-बेलन, करमा, ददरिया, सोहर, बिहाव गीत नंदागे, कुंआ-तरिया नंदागे, गुड़ी चंवरा मं गीता-रमायन होवय तउनो नंदागे। जेवर-गहना पांव ले गर, नाक-कान तक पहिने राहय तउनो सब नंदागे। पठोनी, लेठवा जवई घला सब नंदागे। पहिली के अनाज, बीजा मन घलो सब नंदागे। कोलिहा, हुर्रा, मिरगा, चिरई, चुरगुन मन घला एक-एक कर नंदावत जात हे। कतेक ल चेत करबे, कतेक ल हियाव करबे। सब धीरे-धीरे करके नंदावत हे। अब एखर आघू का होही तउन ल विधाता जानही। पाया घर के, संसार के खिसलत जात हे। अइसे झन होवय घर-दुआर भरभरा के गिर जाए, जइसे भूकम्प के आय ले होथे। जोशीमठ मं का होवत हे, देख-सुनके सब थर्रागे हे। 

लगथे समय ह तमाशा देखाय बरोबर दमचगहा सही तइयार बइठे हे। अइसन सब बात के परख कवि, शायर, गीतकार मन ल पहिले ले कइसे हो जथे। तभे तो केहे गे जिहां न जाय रवि तिहां पहुंचे कवि। जनाब मीर अली मीर साहब वइसने हिरदय वाले कवि, शायर, अउ पेशा ले गुरुजी हे। ओला ये सब के परख कइसे पहिली ले होगे ते ऊपर लिखे गीत ओहर रच डरिस- नंदा जाही का रे, नंदा जाही का? ओकर आज ये गीत हर गांव-गांव के गली खोर मं शोर मचावत हे। शहर-शहर के सबके जुबान मं आके समागे हे, जेती देखबे तेती जइसे कभू स्व. लछिमन मस्तुरिहा के गीत 'मोर संग चलव रे, मोर संग चलव गा धूम मचावत रिहिसे हे। मस्तुरिया जी के ओ गीत के कड़ी देखिन- 

'गिरे-परे हपटे मन

परे डरे मनखे मन

मोर संग चलव रे

मोर संग चलव गा।

ये गीत जउन मेर बाजत सुनिही कोनो मनखे होवय, ओकर पांव उही मेर ठिठक जथे, अउ जब तक पूरा नइ सुन लिही, आघू नइ बढय़। 

गीत, संगीत, शायरी, कविता मं ओ शक्ति होथे, ताकत होथे जउन पथरा ल पिघला देथे, पानी कस ओगरा देथे। कतको क्रोधी, तामसी अउ कठोर सुभाव के परानी होही, ओकर हिरदय पिघल जथे, आंखी कोती ले आंसू अइसे झरे ले धर लेथे जइसे कोनो पहाड़ ले झरना झरत हे। जादू हे, शक्ति हे। तभे तो जब अकबर के दरबार मं तानसेन नांव के संगीतकार रिहिसे, दीपक राग के तान छेडि़स तब कहिथे- दीया मं रखे बाती अपने आप बरगे, जलगे। का अइसे शक्ति, जादू हे गीत-संगीत मं, होवत होही तब तो अइसन हो जथे ना। 

महतारी मन जब लइका रोवत रहिथे, चुप होयके  नांव नई लेवे तब लोरी सुना - सुना के न केवल रोवत लइक ल चुप करा देथे भलुक ओ लोरी के सुर, धुन मं ओ जादुई ताकत होथे के लइका मन ल निंदरी आ जथे। अक्षर, ब्रम्ह कहिथे तउन उही तो नोहय। अब ये बात ल गियानी, धियानी, जोगी जती अउ पंडित मन बने जानही। 

कवि, शायर, गीतकार मन तो शब्द के जादूगर होथे। जंवारा, भोजली अउ गौरा-गौरी के गीत के रचना तो करथे, इही शब्द अउ अक्षर के जादूगर मन हर तो आय।  ओ गीत मन के बजते सांठ डड़इया चढ़ जथे। जंवारा माइलोगिन अउ पुरुष मन ला हाल चढ़ जथे। झूपे ले धर लेथे, चेत-सुरता नइ राहय अपन शरीर के। जीभ, हाथ मं बाना गोभवा लेथे, हाथ-पांव मं सोंटा मरवाथे। ये सब काये, गीत, संगीत के धुन ओमन ला ये दुनिया ले ओ दुनिया मं ले जाथे। अशरीरी बना देथे। अइसने जब शादी के बखत मं बेटी के बिदा होय के बेरा होथे, ओ समे जउन गीत गाथे, बाजा, बजथे तउन धुन ल सुन के बेटी ल कोन काहय, घर परिवार के जम्मो मनखे मन के आंखी कोती ले आंसू के धार अइसे बोहाय ले धरथे के ओहर थमे के नांव नइ लेवय। 

खेत-खार मं सावन-भादो के महीना मं निंदई-कोड़ई के बखत कमइलिन-कमइया जब जौंजर होथे तउन पइत ओकर मन के मुख ले निकले ददरिया अइसे छाती मं बान मारे असन लगथे, एला तो उही परेमी-परेमिका मन बता सकत हे। ओ ददरिया के नमूना देखिन- 

'आघू नांगर मं फंदाय टिकला 

मंय डोली मं उतरिहौं

त हो जाही चिखला।

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नदिया तीर के पटवा भाजी

पट-पट दीखथे रे,

आए हे बरतीया ते मन

बुढ़वा-बुढ़वा दीखथे रे।

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लाली भइगे भाजी

पिंयर भइगे भात

निकलत नइ बनय

अंजोरी होगे रात।

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नवा हे नांगर

नवा हे नाहना,

सास हवय घर मं

ससुर हे अंगना।

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बागे बगीचा दिखे ले हरियर

दुरुग वाला नइ दिखे

बदै हौं नरियर। 

बहतु ताकत होथे शब्द मं, अक्षर मं। कभू हंसा देथे तब कभू रोआ देथे। बड़े-बड़े रिसी मुनि मन इही शब्द अउ अक्षर मं अइसे-अइसे मंत्र रचे हे, गुंथे हे, ओला सिद्ध करे हें। देखिन एकाध मंत्र- 

ॐ भू-भुर्भुव: स्व:तत्स वितुर्वरेण्यम्

भर्गो देवस्य धिमहि धियो योन: प्रचोदयात।

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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

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ॐ  गं गंनपतये नम:।

ये सब सिद्ध मंत्र हे। अक्षर ल जोर के मंत्र बनइन, साधना करके सिद्ध करिन, बड़े-बड़े बिगड़े काम बन जाथे ये मंत्र मन से। 

ये कवि, गीतकार अउ शायर मन के का कहना, एकर मन के दृष्टि, वृत्ति, सोच, कल्पना, सात समुंदर पार के जिनिस मन ल पारखी नजर वाले मन कस देख डरथे। तभे तो केहे गेहे- जिहां न जाय रवि, तिहां पहुंचे कवि।

कवि, शायर, गीतकार मन शब्द ले खेलथे अउ रचना अइसे तइयार हो जथे जइसे दही ल मथे के बाद लेवना (मक्खन) बाहिर उफला (निकल) जथे। ये तो वइसने कस बात होगे जइसे परेम करे नइ जाय, हो जथे। वइसने ये रचनाकार मन के हाल हे। चलत, फिरत, खेत-खार, बारी-बियारा, नदिया-नरवा, झील-झरना, बगीचा, पहाड़, गोबर बीनत, छेना थापत कोनो दुनो परानी ल हांसत-गोठियावत कहूं देख परिन, नजर परगे, तहां ले ओकर मन के कलम दउड़ जथे, पल्ला घोड़ा, हिरन-हिरनी नइते कोनो चिरई-चिरगुन कस चाल मं उड़े ले धर लेथे। 

स्व. लक्ष्मण मस्तुरिया के गीत गायन तो चंदैनी गोंदा मं जउन पइत ले धूम मचाना शुरू करे हे तब ले आज तक सदाबहार बने हे। ओकर नांव छत्तीसगढ़ के इतिहास मं अमर होगे। बिहनिया के उवत सुरुज देवता कस छाहित रइही। ओकर सोच, दृष्टि, वृत्ति, भावना, विचार, गीत मं पोहाय हे, समाय हे। रूंआ ठाढ़ हो जथे, त कभू रोआसी  आ जथे, ओकर गीत ल सुनबे त। अइसे तो नइ काहौं के ओकर असन गीतकार गायन, कवि अउ होही ते नहीं, काबर के छत्तीसगढ़ के माटी मं तो हीरा, सोना, पन्ना, मणि-माणिक उपजारे के ताकत हे। फेर मस्तुरिया जी तो अभी तक बेजोड़ हे। ओकर प्रतिभा, काबिलियत ह ओला छत्तीसगढ़ी राजभासा आयोग के कुरसी तक पहुंचाइस। पूर्व मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी तो ओकर प्रशंसक में से एक रिहिसे। 

उही कड़ी मं मीर अली मीर साहब के नांव जुड़त हे। उकरो गीत के बहुत शोर उड़त हे अउ जिहां-जिहां ओहर जाथे, कवि सम्मेलन मं भाग लेथे, तब श्रोता मन के भीड़ उमड़ जथे, ताली गूंजे ले धर लेथे। ओकर जउन गीत अभी नांव कमावत हे, ओहे- नंदा जाही का रे, नंदा जाही का। लेवौ मजा गीत के-

ए उड़ा जाही का रे

उड़ा जाही का रे

उड़ा जाही का

मनकैना चिरैया कलरा करइया

फुदुक फुदुक फुदकइया

सोन चिरया उड़ा जाही का

ए नंदा जाही का रे नंदा जाही का रे

कमरा अउ खुमरी अरई तुतारी

अ र र र र त त त छो...

होत बिहनिया पखरा के आगी

टेडग़ा हे चोंगी टेडग़ा हे पागी

नुइ झूले जस गर कस माला

धरे कसेली दउड़त हे ग्वाला

टेडग़ा लेवड़ी ल बाखा दबाए

बंशी मं धेनु चरइया नंदा जाही का...

ए नंदा जाही का रे, नंदा जाही का रे

कमरा अउ खुमरी अरई तुतारी

अ र र र र त त त छो...

मीर साहब के गीत के शैली अंदाज अउ मिजाज अपन तरह के अलग हे। ओकर पेश करे के जउन नाटकीय अंदाज हे श्रोता मन ल बहुत परभावित करथे। अउ जिहां जाथे तिहां अक्सर ये गीत ल सुने बर श्रोता मन फरमाइस करथे। गुरतुर अउ मिठास ल तो सब पसंद करथे। छत्तीसगढ़ के जनता इही मं खुश हे। मीर साहब ल ये गीत ह बहुत ऊंचई देवत हे। मुकाम मं पहुंचे हे। आसा करिन अउ अइसन कोनो गीत के सुग्घर रचयिता तो आही... बधाई...।

परमानंद वर्मा

गुरुवार, 5 जनवरी 2023

ऐतिहासिक_रायपुर

 

रायपुर का नाम सतयुग में कनकपुर, त्रेता में हाटकपुर और द्वापर में कंचनपुर था। इसकी जानकारी नागपुर के भोसले राजा रघुजी तृतीय के शासनकाल के दस्तावेजों से मिलती है।

1. सतयुग में रायपुर का नाम कनकपुर और द्वापर में कंचनपुर था। जनश्रुति के अनुसार यह क्षेत्र बहुत ही समृद्ध था। इसे सोने के समान माना जाता था। भगवान राम इसी क्षेत्र से होकर वनवास गए थे।

2. त्रेतायुग में खारून नदी के किनारे स्थित हटकेश्वर महादेव के नाम पर रायपुर का नामकरण हाटकपुर हुआ था। सन् 1837 में तत्कालीन राजा रघुजी तृतीय भोसले ने रायपुर के नाम को लेकर सर्वे करवाया था। इसमें नामकरण की यह जानकारी सामने आई थी। बूढ़ातालाब के राजघाट में सम्वत् 1458 का शिलालेख मिला था। इसमें राजा ब्रह्मदेव राय व रायपुर के नाम का जिक्र है। इतिहासकार इसे भी नामकरण का आधार मानते हैं।

3. कलचुरी काल की राजधानी रतनपुर को लेकर कहावत प्रचलित है, राय-रतन दूनो भाई। इसके अनुसार रायपुर और रतनपुर दो भाइयों की राजधानी थी। दोनों के पास 18-18 गढ़ (राज्य) थे। रायपुर से पहले खल्लारी में राजमहल था।

4. चौदहवीं शताब्दी में रायपुर राज्य की राजधानी खल्लारी थी। बाद में खारून तट पर रायपुरा और फिर बूढ़ातालाब, महाराजबंद, महामाया मंदिर परिसर के मध्य ब्रह्मपुरी में स्थापित हुई। यहां एक किला था, जिसके पास की खाई आज भी है। यहां अब पानी जमा रहता है। राजा ब्रह्मदेव राय ने शहर विकसित किया था। इस वजह से यह रायपुर के नाम से जाना जाता है। किला सफीलईसी पत्थर से बना था। कुल बड़े-छोटे 16 दरवाजे थे। छत्तीसगढ़ में अंग्रेजों का राज स्थापित होने के बाद किले के पत्थर का उपयोग कलेक्ट्रेट भवन बनाने में हुआ। शहर में महामाया देवी मंदिर, श्री रामचंद्र स्वामी का मंदिर (दूधाधारी मंदिर), खारून किनारे हटकेश्वर महादेव मंदिर के पास किला बना था।

5. रायपुर का संग्रहालय (अष्टकोणीय भवन) 1875 में बना था। यह मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ का पहला और देश का आठवां सबसे प्राचीन संग्रहालय है। बाद में इस संग्रहालय को महंत घासीदास संग्रहालय में शिफ्ट कर दिया गया। 

128 साल पहले टाउन हॉल बनाने में ऐतिहासिक किले के पत्थरों का उपयोग हुआ है।

रायपुर को विकसित करने वाले राजा ब्रह्मदेव राय के नाम पर नामकरण

युग के साथ बदला नाम

साभार:- डॉ. रमेंद्र नाथ मिश्र, वरिष्ठ इतिहासकार

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

गोल्लर कस हुकरत हे फेर कोरोना


शेर खून पीता है, खून ही उसका आहार है, मांस, हड्डी को छोड़ देता है क्योंकि उसे खून पसंद है। वह इसी तलाश में रहता है कहीं कोई जानवर मिल जाए। कोरेाना ऐसा ही एक हिंसक जानवर की तरह ही है। वह रोग ही नहीं महारौग है, राक्षस है। एक बार विश्व में तबाही मचाया, भारत भी इसकी चपेट में आया। हमारा देश उबर तो गया किसी तरह इस रोग से, लेकिन जिसे एक बार खून की लत लग जाती है वह अपने शिकार के लिए फिर निकल पड़ता है। चीन को अभी अपना ग्रास बना रहा है, धीरे-धीरे भारत में दस्तक देने की तैयारी कर रहा है। इस संदर्भ में पेश है यह छत्तीसगढ़ी आलेख... ।

सब छेहेल्ला मारत हें, गोल्लर असन हुकरत हें, एक दूसर ऊपर चढ़े लेवत हे। काला का कहिबे, कोन ला का कहिबे। सब मतंग होगे हे। अतेक जल्दी भुलागे सब कोरोना के कहर ला। दुख के दिन अतेक जल्दी नइ बिसराय जाय, फेर आज देखब मं एकर उल्टा होवत हे। 

कोनो नइ उबार सके रिहिन हे कोरोना के कहर ले सरकार के छोड़े। मौका रहिते हमर भारत सरकार अतेक सजगता दिखाइस ते कोरोना ला पूछी टांग के भागे ले परिस फेर अपन चिनहारी वइसने छोड़ के चल दे हे जइसे अंग्रेज मन छोड़ के गे हें। जइसे अंगरेजी ल ये देश के मन पोटार के धरे बइठे हें वइसने कोरोना घला अभी निरमामुल भागे नइहे। जहां-तहां अपन रूप ला देखावत हे। सरकार सावचेत होगे हे, स्वास्थ्य कर्मी मन के कान घला खड़ा होगे हे। फेर भला होवय ये देश के जनता मन ला, कब ओमन चेतही, समझही तेला उही मन जानय। 

परोसी के घर मं आगी लग गे हे,  लेसावत हे घर-दुआर, मनखे अउ पूंजी पसरा। ये तो जाने बात हे के जब परोसी के घर मं आगी लगे हे तब ओकर लपट जउन उठत हे तउन तो तीरतार के घर मन ला अपने लपेट मं लेबे करही। चीन मं कोरोना अपन उग्र रूप देखावत हे। जइसन खबर सबो कोती ले छन-छन के आवत हे तेकर मुताबिक चीन अउ दुनिया भर के देश म ओमिक्रान वेरिएंट के नया स्ट्रेन बीएफ-7 सबो जघा कहर बरसावत हे। अउ भारत समेत छत्तीसगढ़ मं घला पहुंचगे हे। रायपुर मं जउन मरीज मिले हे तेकर जीनोम सिक्वेसिंग के सेम्पल जांचे बर भुनेश्वर (उड़ीसा) भेज देगे हे। 

याने के दुश्मन फेर घूम-फिर के छत्तीसगढ़ आगे हे अउ अपन रुदबा देखावत हे, अउ इहां के जनता ल देख कतेक अंधरा बने बइठे हे। पूरा देश के अर्थव्यवस्था ला जउन राक्षस चउपट करे रिहिसे, लाश के ढेर बिछा दे रिहिसे ओहर फेर ताल ठोंकत आवत हे अउ हमर देश के जनता मगन हे गीता, भागवत, रामायन मं, नाचत-मटकत हे, राधे-राधे, राम-राम, कृष्ण-कृष्ण के संकीर्तन करत हे। राजनेता मन सत्ता के दउड़ मं, कुरसी हथियाय खातिर उठापटक मं लगे हे, उद्योगपति, व्यापारी निनानबे के चक्कर मं हें, किसान, मजदूर, अधिकारी, करमचारी अपन-अपन गुना-भाग मं लगे हे। सब ओ दुख ला अतेक जल्दी भुलागे कोरोना के जउन सबके रांड़ बेच दे रिहिस, करलई अउ रोवई-गवई के सिवा कांही नइ छोड़े रिहिसे। काकर बेटा, बेटी, दाई-ददा, भाई-भउजी, काकी-कका, फूफा-फूफी सब ला हलाकन करके गे रिहिसे। अतेक जल्दी सब कइसे भुलागे। 

कोनो कथावचक, मंदिर, मसजिद, गिरिजा, गुरुद्वारे के साधु-संत, मठाधीश, शंकराचार्य तब आगू नइ आय रिहिन हे। सब मुंह लुका के खुसरगे रिहिन हे अपन-अपन ठीहा मं। कहां गे रिहिसे ओकर मन के ज्ञान-विज्ञान, योग-तपस्या के बल? ऐ सब ढोंगी पाखंडी हे, एकर मन के सत होतिन ते आतिन आगू मं, करतिन कोरोना ले मुकाबला। हजारों, लाखों चेला-चपाटी बनाय बइठे हें, पइसा बटोरे बर। कोरोना ह न एकर मन के यज्ञ, तप ला घेपिस अउ न ज्ञान-धियान ला। सब ला अपन आंधी मं गहूं कस कीरा रमंज के स्वाहा-स्वाहा कर डरिस। 

सब अंधरा होगे हे, अंधरौटी छा गे हे, बइरी आगू मं आवत हे दल-बल के साथ भयानक राक्षस के रूप धरके फेर चेते नइ चढ़त हे। नइते बरसात के पहिली जइसे आंधी-तूफान आथे तब किसान जान जथे के बरसात के मौसम अवइया हे, अपन खेती-किसानी के तइयारी मं जुट जथे। बइद मन माथा अउ चेहरा देखके, नाड़ी टमर के रोग के लक्षण जान जथे फेर हमर देश के नेता, पुरोहित, पंडित, उद्योगपति, व्यापारी पता नहीं कोन से नींद मं सुते हें के परोसी के घर मं आग लग गेहे तभो ले ओकर आंच ओकर मन करा नइ पहुंचे हे। कुंभकरनी नींद में सुते हे। समय रहिते नइ जागही, सावचेत होही तब तो भगवाने मालिक हे ओकर मन के। भोरहा मं रइहौ, आगी तो परोसी के घर मं लगे हे, हमला का फिकर हे सोचिह तब तो लेना के देना पर जही। एक झकोरा आवत देरी हे, फेर सर्वनाश होय मं देरी नइहे।

परमानंद वर्मा