सोमवार, 22 अप्रैल 2019
सोमवार, 18 मार्च 2019
बेटी क्या है और क्या नहीं !!
उन पिताओं को समर्पित जो अपनी लाडली बेटियों के पापा हैं
१:- सूर्य के अगर बेटी होती और उसे विदा करने का अवसर आता तब उसे पता चलता कि अंधकार किसे कहते हैं ।
२:- हर बेटी अपने पापा से सबसे ज़्यादा प्यार क्यों करती है ?
३:- क्यों कि वह जानती है कि संसार में उसके पापा ही ऐसे व्यक्ति हैं जो उसे कभी दुखी देखना नहीं चाहते ।
४:- किसी भी परिवार में पापा को डाँटने का अधिकार बेटी को ही होता है क्यों कि जिसे प्यार किया जाता है, उसे ही डाँटा जा सकता है ।
५:- मुझे मेरे एक मित्र ने कहा- मैं अपनी पत्नी से भी ज़्यादा प्यार अपनी बेटी को करता हूँ ।
६:- जब मैं बीमार होता हूँ और बेटी हाल पूछने ससुराल से आती है तो मैं अपने सब दुख दर्द भूल जाता हूँ ।
७:- मुझे भी लगता है कि विदाई के समय पापा को तकलीफ़ कम नहीं होती ।
८:-- क्यों कि माँ तो सामने रो सकती है,पर पापा अंदर ही अंदर रोते हैं ।
९:- बेटी बीस बाईस की होने लगती है , उसके बाद
पापा का वात्सल्य और प्रेम बढने लगता है ।
१०:- बेटी कभी माँ बनेगी, कभी दादी भी, पर दोस्त तो सदैव बनी रहेगी ।
११:- बेटी का सुख पापा के होंठों की मुस्कान है ।
१२:- पापा के दुख में बेटी हथेली बनकर आँखों के आँसू पोंछती है ।
१३:- देखते ही देखते पता ही नहीं चलता कि बेटी बड़ी हो जाती है और एक दिन सुहाग का जोड़ा पहन कर विदा हो जाती है ।
१४:- जाते समय पापा से चिपक कर जब बेटी पापा से सजल नेत्रों से कहती है ।
१५:- पापा, मैं जा रही हूँ ,मेरी चिन्ता मत करना और अपना ध्यान रखना ।
१६:- और तब पापा अपनी आँखों में उमड़ते हुए आँसुओं को रोक नहीं पाते।
१७- हर एक पापा को भगवान से प्रार्थना करनी चाहिये- हे प्रभो ! तुम संसार के सभी पुरूषों को सयाना और समझदार बनाना क्यों कि उन्हीं में से एक मेरी बेटी का पति बनेगा ।
१८:- संसार की सभी स्त्रियों को बहुत प्रेममय बनाना क्यों कि उन्हीं में से कोई मेरी बेटी की सास या ननद बनने वाली है ।
१९:- हाल ही में निवृत एक मित्र ने मुझसे कहा- यदि आपके घर में बेटी नहीं है तो पापा बेटी की घनिष्ठता के बारे में नहीं जान सकते ।
२०:- बस इतना सा ख़याल रखना चाहिये कि पुत्रवधू बेटी की तरह रहे और बेटी को उसके पापा के बारे में कुछ कटुवचन न कहा जाये ।
२१:- क्यों कि बेटी भगवान के विरोध में सुन सकती है लेकिन अपने पापा के बारे में नहीं ।
१:- सूर्य के अगर बेटी होती और उसे विदा करने का अवसर आता तब उसे पता चलता कि अंधकार किसे कहते हैं ।
२:- हर बेटी अपने पापा से सबसे ज़्यादा प्यार क्यों करती है ?
३:- क्यों कि वह जानती है कि संसार में उसके पापा ही ऐसे व्यक्ति हैं जो उसे कभी दुखी देखना नहीं चाहते ।
४:- किसी भी परिवार में पापा को डाँटने का अधिकार बेटी को ही होता है क्यों कि जिसे प्यार किया जाता है, उसे ही डाँटा जा सकता है ।
५:- मुझे मेरे एक मित्र ने कहा- मैं अपनी पत्नी से भी ज़्यादा प्यार अपनी बेटी को करता हूँ ।
६:- जब मैं बीमार होता हूँ और बेटी हाल पूछने ससुराल से आती है तो मैं अपने सब दुख दर्द भूल जाता हूँ ।
७:- मुझे भी लगता है कि विदाई के समय पापा को तकलीफ़ कम नहीं होती ।
८:-- क्यों कि माँ तो सामने रो सकती है,पर पापा अंदर ही अंदर रोते हैं ।
९:- बेटी बीस बाईस की होने लगती है , उसके बाद
पापा का वात्सल्य और प्रेम बढने लगता है ।
१०:- बेटी कभी माँ बनेगी, कभी दादी भी, पर दोस्त तो सदैव बनी रहेगी ।
११:- बेटी का सुख पापा के होंठों की मुस्कान है ।
१२:- पापा के दुख में बेटी हथेली बनकर आँखों के आँसू पोंछती है ।
१३:- देखते ही देखते पता ही नहीं चलता कि बेटी बड़ी हो जाती है और एक दिन सुहाग का जोड़ा पहन कर विदा हो जाती है ।
१४:- जाते समय पापा से चिपक कर जब बेटी पापा से सजल नेत्रों से कहती है ।
१५:- पापा, मैं जा रही हूँ ,मेरी चिन्ता मत करना और अपना ध्यान रखना ।
१६:- और तब पापा अपनी आँखों में उमड़ते हुए आँसुओं को रोक नहीं पाते।
१७- हर एक पापा को भगवान से प्रार्थना करनी चाहिये- हे प्रभो ! तुम संसार के सभी पुरूषों को सयाना और समझदार बनाना क्यों कि उन्हीं में से एक मेरी बेटी का पति बनेगा ।
१८:- संसार की सभी स्त्रियों को बहुत प्रेममय बनाना क्यों कि उन्हीं में से कोई मेरी बेटी की सास या ननद बनने वाली है ।
१९:- हाल ही में निवृत एक मित्र ने मुझसे कहा- यदि आपके घर में बेटी नहीं है तो पापा बेटी की घनिष्ठता के बारे में नहीं जान सकते ।
२०:- बस इतना सा ख़याल रखना चाहिये कि पुत्रवधू बेटी की तरह रहे और बेटी को उसके पापा के बारे में कुछ कटुवचन न कहा जाये ।
२१:- क्यों कि बेटी भगवान के विरोध में सुन सकती है लेकिन अपने पापा के बारे में नहीं ।
शुक्रवार, 7 सितंबर 2018
इस्कान मंदिर की सच्चाई...अवश्य जानें...
ISKCON (International Society of Krishna Consiousness) एक अमेरिकन संस्था है जिसने अनेक देश मे कृष्ण भगवान के मंदिर खोले हुए हैं और ये मंदिर अमेरिका की कमाई के सबसे बड़े साधन है क्योंकि इन मंदिरों पर इनकम टैक्स भी नही है !
ये संस्था लोगों की अंधभक्ति का फ़ायदा उठाकर खरबों डॉलर इन मंदिरों में आनेवाले चढ़ावे के माध्यम से अमेरिका ट्रान्सफर कर देती है और दुर्भाग्य से इस लुटेरी ISKCON संस्था के सबसे ज्यादा मंदिर भारत मे हैं !
आपको जानकर आष्चर्य होगा कि अमेरिका की कोलगेट कंपनी एक साल मे जितना जितना शुद्ध लाभ अमेरिका भेजती है उससे 3 गुना ज्यादा अकेले बैंगलोर का ISKCON मंदिर भारत का पैसा अमेरिका भेज देता है !
बैंगलोर से बड़ा मंदिर दिल्ली मे है और दिल्ली से बड़ा मंदिर मुंबई मे है और उससे भी बड़ा मंदिर मथुरा मे हो गया है भगवान कृष्ण की छाती पर और वहां धुआंधार चढ़ावा आता है !
कृपया ISKCON और इस तरह की सभी लुटेरी संस्थाओं का प्रबल विरोध करके देश को लुटने से बचाने मे अपना अमूल्य सहयोग दें !
मन्दिरों मे दान देने वाले हिन्दू भाई बहन सुप्रीम कोर्ट की ये न्यूज़ पढ़ें...आप सोचते हैं कि मन्दिरों मे दिया हुआ दान, पैसा, सोना इत्यादि हिन्दू धर्म के उत्थान के लिए काम आ रहा है और आपको पुन्य मिल रहा है तो आप निश्चित ही बड़े भोले हैं !
कर्नाटक सरकार के मंदिर एवं पर्यटन विभाग (राजस्व) द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार 1997 से 2002 तक पांच साल मे कर्नाटक Congress सरकार को राज्य मे स्थित मंदिरों से चढ़ावे मे 391 करोड़ की रकम प्राप्त हुई, जिसे निम्न मदों मे खर्च किया गया :
मुस्लिम मदरसा उत्थान एवं हज मक्का मदिना सब्सिडी, विमान टिकट - 180 करोड़ (यानी 46%)
ईसाई चर्च को अनुदान (To convert poor Hindus into Christian) - 44 करोड़ (यानी 11.2%)
मंदिर खर्च एवं रखरखाव - 84 करोड़ (यानी 21.4%)
अन्य - 83 करोड़ (यानी 21.2%)
ये तो सिर्फ एक राज्य का हिसाब है, हर रोज हजारों करोड़ों रुपया / सोना दान होता है और ये सब हिन्दुओं को पता ही नही चल पता है !
भगवद गीता मे भगवान ने बताया है कि दान देते वक्त अपने विवेक और बुद्धि से दान दें, ताकि वह समाज/देश की भलाई मे इस्तेमाल हो, नही तो दानी पाप का भागीदार है !
हिन्दुओं के पैसों से, हिन्दुओं के ही विनाश का षड़यंत्र ६० साल से चल रहा है और यह सच्चाई हिन्दुओं को पता ही नही...!!
कृपया अधिक से अधिक शेयर करें ताकि हिंदू जागरूक हो सकें...!!
मजेदार प्रयोग
एक बार कुछ वैज्ञानिकों ने एक बड़ा ही मजेदार प्रयोग किया..
उन्होंने 5 बंदरों को एक बड़े से पिंजरे में बंद कर दिया और बीचों -बीच एक सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे..
जैसाकि अनुमान था, एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा..
पर जैसे ही उसने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा..
पर वैज्ञानिक यहीं नहीं रुके,उन्होंने एक बन्दर के किये की सजा बाकी बंदरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया..
बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए..
पर वे कब तक बैठे रहते,कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया..
और वो उछलता-कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा..
अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..
और इस बार भी इस बन्दर की गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गई..
एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए…
थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाकया हुआ..
बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया,
ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..
अब प्रयोगकारों ने एक और मजेदार चीज़ की..
अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया..
नया बन्दर वहां के नियम क्या जाने..
वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका..
पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी..
उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर ख़ुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे..
ख़ैर उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं..
इसके बाद प्रयोगकारों ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया..
इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..
जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!
प्रयोग के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था..
पर उनका स्वभाव भी पुराने बंदरों की तरह ही था..
वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते..
हमारे समाज में भी ये स्वभाव देखा जा सकता है..
जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है,
चाहे वो पढ़ाई , खेल , एंटरटेनमेंट, व्यापार, राजनीति, समाजसेवा या किसी और क्षेत्र से सम्बंधित हो, उसके आस पास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं..
उसे असफलता का डर दिखाया जाता है..
और मजेदार बात ये है कि उसे रोकने वाले अधिकतर वो होते हैं जिन्होंने ख़ुद उस क्षेत्र में कभी हाथ भी नहीं आज़माया होता..
इसलिए यदि आप भी कुछ नया करने की सोच रहे हैं और आपको भी समाज या आस पास के लोगों के नकारात्मक विचारों को झेलना पड़ रहा है तो कान बंद कर लीजिए ..
और अपनी अंतरात्मा ,अपने सामर्थ्य और अपने विश्वास की सुनिए ...
उन्होंने 5 बंदरों को एक बड़े से पिंजरे में बंद कर दिया और बीचों -बीच एक सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे..
जैसाकि अनुमान था, एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा..
पर जैसे ही उसने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा..
पर वैज्ञानिक यहीं नहीं रुके,उन्होंने एक बन्दर के किये की सजा बाकी बंदरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया..
बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए..
पर वे कब तक बैठे रहते,कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया..
और वो उछलता-कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा..
अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..
और इस बार भी इस बन्दर की गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गई..
एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए…
थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाकया हुआ..
बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया,
ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..
अब प्रयोगकारों ने एक और मजेदार चीज़ की..
अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया..
नया बन्दर वहां के नियम क्या जाने..
वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका..
पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी..
उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर ख़ुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे..
ख़ैर उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं..
इसके बाद प्रयोगकारों ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया..
इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..
जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!
प्रयोग के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था..
पर उनका स्वभाव भी पुराने बंदरों की तरह ही था..
वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते..
हमारे समाज में भी ये स्वभाव देखा जा सकता है..
जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है,
चाहे वो पढ़ाई , खेल , एंटरटेनमेंट, व्यापार, राजनीति, समाजसेवा या किसी और क्षेत्र से सम्बंधित हो, उसके आस पास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं..
उसे असफलता का डर दिखाया जाता है..
और मजेदार बात ये है कि उसे रोकने वाले अधिकतर वो होते हैं जिन्होंने ख़ुद उस क्षेत्र में कभी हाथ भी नहीं आज़माया होता..
इसलिए यदि आप भी कुछ नया करने की सोच रहे हैं और आपको भी समाज या आस पास के लोगों के नकारात्मक विचारों को झेलना पड़ रहा है तो कान बंद कर लीजिए ..
और अपनी अंतरात्मा ,अपने सामर्थ्य और अपने विश्वास की सुनिए ...
कृष्ण आज भी प्रासंगिक
समय नें कृष्ण के बाद 5000 साल गुजार लिए हैं ... तो क्या अब बरसाने से राधा कृष्ण को नहीँ पुकारती होगी...?
बृज की गोपियों, दही बेचने वालियों नें कृष्ण को आवाज़ देनी बँद कर दी होगी ...?
भूखी प्यासी गायें क्या कृष्ण को याद कर नहीँ रम्भाती होगी अब...?
जमुना की वो मछलियाँ जो कृष्ण के पैरों से लिपट के खेलती थी क्या उन्होने कृष्ण को बिसार दिया होगा...?
क्या मीरा नें हाथ की मेहन्दी में कृष्ण का नाम लिख कर उनकी याद में रोना छोड़ दिया होगा...?
आखिर समय नें कृष्ण को क्यों नहीँ पुकारा होगा...?
क्या कृष्ण किसी एक युग,एक धर्म के थे, अगर नहीँ तो क्या बाद के युगों, धर्मों नें कृष्ण को नहीँ पुकारा होगा...?
कृष्ण की आवश्कता तो आज भी हैं... क्या आज कोई कंस नहीँ हैं...?
क्या कोई वासुदेव आज कैद में नहीँ हैं...?
क्या किसी देवकी की कोख आज नहीँ कुचली जाती...?
क्या द्रौपदी का चीर हरण नहीँ होता अब...?
क्या आज भी कालिया का फन कुचले जाने की आवश्कता नहीँ हैं...?
कंस की तानाशाही तो आज भी हैं, करोड़ों गालियाँ देने वाले शिशुपाल तो हर गली हर नुक्कड़ पर जिंदा घूम रहे है...
फ़िर क्यों नहीँ आते कृष्ण...?
शायद इसलिए क्योंकि आज कृष्ण हमारे लिए सिर्फ मूरत होकर, अगबत्ती दिखाने भर के लिए रह गए हैं... गोविंदा आला रे कह कर हुल्लड़ मचाना आसान है पर क्या वाकई हमने कृष्ण को अनुकरणीय समझा है...?
क्या हमने कृष्ण को अपने जीवन में उतारने की कोशिश की है..? क्या हमने कृष्ण के गुणों का एक प्रतिशत भी खुद में आत्मसात किया है...?
कृष्ण वो शिखर हैं जहाँ पहुँच कर एक इंसान की मानव से ईश्वर बनने कि राह आरम्भ होती हैं... कृष्ण वो केन्द्र बिन्दु हैं जहाँ से ईश्वर की सत्ता शुरू होती हैं... कृष्ण उस ज्योतिर्मय लौ का नाम है जिसमें नृत्य है, गीत है, प्रीत है, समर्पण है, हास है, रास है और ज़रूरत पड़ने पर युध्द का शंखनाद भी है... जय श्रीराम, अल्लाह हो अकबर या लाल सलाम कह कर हथियार उठाने का मतलब कृष्ण होना नहीँ हैं, कृष्ण होने का मतलब हैं ताकत होने के बावजूद समर्पण भाव से मथुरा को बचाना, कृष्ण होने का मतलब है अपनी खुद की द्वारिका बसाना... कृष्ण राजा नहीँ थे, न ही उन्होंने राजा बनने के लिए कोई युद्ध लड़ा, फ़िर भी उनके एक इशारे पर हजारों राजमुकुट उनके चरणों में समर्पित हो सकते थे... कृष्ण महान योगी थे जिन्होने वासना को नहीँ जीवन रस को महत्व दिया... कृष्ण अकेले ऐसे व्यक्ति है जो ईश्वर की सत्ता की परम गहराई और परम ऊँचाई पर पहुँच कर भी आत्म्मुग्ध नहीँ थे... एक हाथ में बंसी और दूसरे हाथ में सुदर्शन चक्र लेकर महाइतिहास रचने वाला कोई दूसरा व्यक्तिव नहीँ हुआ इस संसार में आज तक...
हम कहते है कृष्ण तुम्हें आना होगा.. कितने मासूम है हम जो आज भी कृष्ण के आने का इंतजार कर रहे है कि वो आयेंगे और हमारी लड़ाई लड़ेंगे, क्योंकि कृष्ण नें कहा था "यदा यदा हि धर्मस्य...", कृष्ण नें "कर्मण्येवाधिकारस्ते..." भी कहा था...कंस, जरासंध,पूतना और दुर्योधन जैसों के नाश के लिए कोई भी कृष्ण बन सकता है, तुम भी... कृष्ण किसी एक धर्म के नहीँ थे, जिस धर्म में भी धर्म और न्याय पीडित होंगे वहाँ न्याय दिलाने के लिए कोई न कोई कृष्ण ज़रूर खड़ा होगा...
कृष्ण क्या किसी और दुनियाँ से आएँगे, कृष्ण कब आयेंगे और कैसे... कृष्ण तो कहीँ गए ही नहीँ हैं, वो तो युगों युगों से यही है... माखन में मिश्री की तरह घुले है कृष्ण, मोर पंख की आँखों में है कृष्ण, बाँसुरी की तान में है कृष्ण, गाय चराते ग्वालो में हैं कृष्ण, जमुना की लहरों में है कृष्ण, कण कण में है कृष्ण,कण कण है कृष्ण... ज़रूरत उन्हे पहचानने की है... कृष्ण लुप्त नहीँ है वो तो अाज भी अपने विराट स्वरूप में सामने आ सकते हैं पर किसमे हिम्मत हैं अर्जुन होने की...?
कौन है जो अपने अतिप्रिय बंधु बान्धवों के विरोध के बावजूद न्याय के साथ खड़ा हो सके...
कौन है जो किसी द्रौपदी का सम्मान स्थापित करने के लिए अपने माथे पर सहर्ष कलंक को धारण कर सके...?
बृज की गोपियों, दही बेचने वालियों नें कृष्ण को आवाज़ देनी बँद कर दी होगी ...?
भूखी प्यासी गायें क्या कृष्ण को याद कर नहीँ रम्भाती होगी अब...?
जमुना की वो मछलियाँ जो कृष्ण के पैरों से लिपट के खेलती थी क्या उन्होने कृष्ण को बिसार दिया होगा...?
क्या मीरा नें हाथ की मेहन्दी में कृष्ण का नाम लिख कर उनकी याद में रोना छोड़ दिया होगा...?
आखिर समय नें कृष्ण को क्यों नहीँ पुकारा होगा...?
क्या कृष्ण किसी एक युग,एक धर्म के थे, अगर नहीँ तो क्या बाद के युगों, धर्मों नें कृष्ण को नहीँ पुकारा होगा...?
कृष्ण की आवश्कता तो आज भी हैं... क्या आज कोई कंस नहीँ हैं...?
क्या कोई वासुदेव आज कैद में नहीँ हैं...?
क्या किसी देवकी की कोख आज नहीँ कुचली जाती...?
क्या द्रौपदी का चीर हरण नहीँ होता अब...?
क्या आज भी कालिया का फन कुचले जाने की आवश्कता नहीँ हैं...?
कंस की तानाशाही तो आज भी हैं, करोड़ों गालियाँ देने वाले शिशुपाल तो हर गली हर नुक्कड़ पर जिंदा घूम रहे है...
फ़िर क्यों नहीँ आते कृष्ण...?
शायद इसलिए क्योंकि आज कृष्ण हमारे लिए सिर्फ मूरत होकर, अगबत्ती दिखाने भर के लिए रह गए हैं... गोविंदा आला रे कह कर हुल्लड़ मचाना आसान है पर क्या वाकई हमने कृष्ण को अनुकरणीय समझा है...?
क्या हमने कृष्ण को अपने जीवन में उतारने की कोशिश की है..? क्या हमने कृष्ण के गुणों का एक प्रतिशत भी खुद में आत्मसात किया है...?
कृष्ण वो शिखर हैं जहाँ पहुँच कर एक इंसान की मानव से ईश्वर बनने कि राह आरम्भ होती हैं... कृष्ण वो केन्द्र बिन्दु हैं जहाँ से ईश्वर की सत्ता शुरू होती हैं... कृष्ण उस ज्योतिर्मय लौ का नाम है जिसमें नृत्य है, गीत है, प्रीत है, समर्पण है, हास है, रास है और ज़रूरत पड़ने पर युध्द का शंखनाद भी है... जय श्रीराम, अल्लाह हो अकबर या लाल सलाम कह कर हथियार उठाने का मतलब कृष्ण होना नहीँ हैं, कृष्ण होने का मतलब हैं ताकत होने के बावजूद समर्पण भाव से मथुरा को बचाना, कृष्ण होने का मतलब है अपनी खुद की द्वारिका बसाना... कृष्ण राजा नहीँ थे, न ही उन्होंने राजा बनने के लिए कोई युद्ध लड़ा, फ़िर भी उनके एक इशारे पर हजारों राजमुकुट उनके चरणों में समर्पित हो सकते थे... कृष्ण महान योगी थे जिन्होने वासना को नहीँ जीवन रस को महत्व दिया... कृष्ण अकेले ऐसे व्यक्ति है जो ईश्वर की सत्ता की परम गहराई और परम ऊँचाई पर पहुँच कर भी आत्म्मुग्ध नहीँ थे... एक हाथ में बंसी और दूसरे हाथ में सुदर्शन चक्र लेकर महाइतिहास रचने वाला कोई दूसरा व्यक्तिव नहीँ हुआ इस संसार में आज तक...
हम कहते है कृष्ण तुम्हें आना होगा.. कितने मासूम है हम जो आज भी कृष्ण के आने का इंतजार कर रहे है कि वो आयेंगे और हमारी लड़ाई लड़ेंगे, क्योंकि कृष्ण नें कहा था "यदा यदा हि धर्मस्य...", कृष्ण नें "कर्मण्येवाधिकारस्ते..." भी कहा था...कंस, जरासंध,पूतना और दुर्योधन जैसों के नाश के लिए कोई भी कृष्ण बन सकता है, तुम भी... कृष्ण किसी एक धर्म के नहीँ थे, जिस धर्म में भी धर्म और न्याय पीडित होंगे वहाँ न्याय दिलाने के लिए कोई न कोई कृष्ण ज़रूर खड़ा होगा...
कृष्ण क्या किसी और दुनियाँ से आएँगे, कृष्ण कब आयेंगे और कैसे... कृष्ण तो कहीँ गए ही नहीँ हैं, वो तो युगों युगों से यही है... माखन में मिश्री की तरह घुले है कृष्ण, मोर पंख की आँखों में है कृष्ण, बाँसुरी की तान में है कृष्ण, गाय चराते ग्वालो में हैं कृष्ण, जमुना की लहरों में है कृष्ण, कण कण में है कृष्ण,कण कण है कृष्ण... ज़रूरत उन्हे पहचानने की है... कृष्ण लुप्त नहीँ है वो तो अाज भी अपने विराट स्वरूप में सामने आ सकते हैं पर किसमे हिम्मत हैं अर्जुन होने की...?
कौन है जो अपने अतिप्रिय बंधु बान्धवों के विरोध के बावजूद न्याय के साथ खड़ा हो सके...
कौन है जो किसी द्रौपदी का सम्मान स्थापित करने के लिए अपने माथे पर सहर्ष कलंक को धारण कर सके...?
ब्रेन हेमरेज क्या है
मस्तिष्क आघात के मरीज़ को कैसे पहचानें?
मस्तिष्क आघात -- जी वही, जिसे कईं बार ब्रेन-स्ट्रोक भी कह दिया जाता है अथवा आम भाषा में दिमाग की नस फटना या ब्रेन-हैमरेज भी कह देते हैं।
इस के बारे में पोस्ट डाक्टर साहब लिखते हैं ----
एक पार्टी चल रही थी, एक मित्र को थोड़ी ठोकर सी लगी और वह गिरते गिरते संभल गई और अपने आस पास के लोगों को उस ने यह कह कर आश्वस्त किया कि सब कुछ ठीक है, बस नये बूट की वजह से एक ईंट से थोड़ी ठोकर लग गई थी। (आस पास के लोगों ने ऐम्बुलैंस बुलाने की पेशकश भी की).
साथ में खड़े मित्रों ने उन्हें साफ़ होने में उन की मदद की और एक नई प्लेट भी आ गई। ऐसा लग रहा था कि इन्ग्रिड थोड़ा अपने आप में नहीं है लेकिन वह पूरी शाम पार्टी तो एकदम एन्जॉय करती रहीं। बाद में इन्ग्रिड के पति का लोगों को फोन आया कि कि उसे हस्पताल में ले जाया गया लेकिन वहां पर उस ने उसी शाम को दम तोड़ दिया।
दरअसल उस पार्टी के दौरान इन्ग्रिड को ब्रेन-हैमरेज हुआ था --अगर वहां पर मौजूद लोगों में से कोई इस अवस्था की पहचान कर पाता तो आज इन्ग्रिड हमारे बीच होती।
ठीक है ब्रेन-हैमरेज से कुछ लोग मरते नहीं है --लेकिन वे सारी उम्र के लिये अपाहिज और बेबसी वाला जीवन जीने पर मजबूर तो हो ही जाते हैं।
जो नीचे लिखा है इसे पढ़ने में केवल आप का एक मिनट लगेगा ---
स्ट्रोक की पहचान ---
एक न्यूरोलॉजिस्ट कहते हैं कि अगर स्ट्रोक का कोई मरीज़ उन के पास तीन घंटे के अंदर पहुंच जाए तो वह उस स्ट्रोक के प्रभाव को समाप्त (reverse)भी कर सकते हैं---पूरी तरह से। उन का मानना है कि सारी ट्रिक बस यही है कि कैसे भी स्ट्रोक के मरीज़ की तुरंत पहचान हो, उस का निदान हो और उस को तीन घंटे के अंदर डाक्टरी चिकित्सा मुहैया हो, और अकसर यह सब ही अज्ञानता वश हो नहीं पाता।
स्ट्रोक के मरीज़ की पहचान के लिये तीन बातें ध्यान में रखिये --और इस से पहले हमेशा याद रखिये ----STR.
डाक्टरों का मानना है कि एक राहगीर भी तीन प्रश्नों के उत्तर के आधार पर एक स्ट्रोक के मरीज की पहचान करने एवं उस का बहुमूल्य जीवन बचाने में योगदान कर सकता है.......इसे अच्छे से पढ़िये और मन में बैठा लीजिए --
S ---Smile आप उस व्यक्ति को मुस्कुराने के लिये कहिए।
T-- talk उस व्यक्ति को कोई भी सीधा सा एक वाक्य बोलने के लिये कहें जैसे कि आज मौसम बहुत अच्छा है।
R --- Raise उस व्यक्ति को दोनों बाजू ऊपर उठाने के लिये कहें।
अगर इस व्यक्ति को ऊपर लिखे तीन कामों में से एक भी काम करने में दिक्कत है , तो तुरंत ऐम्बुलैंस बुला कर उसे अस्पताल शिफ्ट करें और जो आदमी साथ जा रहा है उसे इन लक्षणों के बारे में बता दें ताकि वह आगे जा कर डाक्टर से इस का खुलासा कर सके।
नोट करें ---- स्ट्रोक का एक लक्षण यह भी है --
1. उस आदमी को जिह्वा (जुबान) बाहर निकालने को कहें।
2. अगर जुबान सीधी बाहर नहीं आ रही और वह एक तरफ़ को मुड़ सी रही है तो भी यह एक स्ट्रोक का लक्षण है।
एक सुप्रसिद्ध कार्डियोलॉजिस्ट का कहना है कि अगर इस ई-मेल को पढ़ने वाला इसे आगे दस लोगों को भेजे तो शर्तिया तौर पर आप एक बेशकीमती जान तो बचा ही सकते हैं ....
और यह जान आप की अपनी भी हो सकती है -।
समय गूंगा नहीं
बस मौन है,
वक्त पर बताता है
किसका कौन है!
डॉ.. महेश सिन्हा की एक बहुत उपयोगी पोस्ट ---
मस्तिष्क आघात -- जी वही, जिसे कईं बार ब्रेन-स्ट्रोक भी कह दिया जाता है अथवा आम भाषा में दिमाग की नस फटना या ब्रेन-हैमरेज भी कह देते हैं।
इस के बारे में पोस्ट डाक्टर साहब लिखते हैं ----
एक पार्टी चल रही थी, एक मित्र को थोड़ी ठोकर सी लगी और वह गिरते गिरते संभल गई और अपने आस पास के लोगों को उस ने यह कह कर आश्वस्त किया कि सब कुछ ठीक है, बस नये बूट की वजह से एक ईंट से थोड़ी ठोकर लग गई थी। (आस पास के लोगों ने ऐम्बुलैंस बुलाने की पेशकश भी की).
साथ में खड़े मित्रों ने उन्हें साफ़ होने में उन की मदद की और एक नई प्लेट भी आ गई। ऐसा लग रहा था कि इन्ग्रिड थोड़ा अपने आप में नहीं है लेकिन वह पूरी शाम पार्टी तो एकदम एन्जॉय करती रहीं। बाद में इन्ग्रिड के पति का लोगों को फोन आया कि कि उसे हस्पताल में ले जाया गया लेकिन वहां पर उस ने उसी शाम को दम तोड़ दिया।
दरअसल उस पार्टी के दौरान इन्ग्रिड को ब्रेन-हैमरेज हुआ था --अगर वहां पर मौजूद लोगों में से कोई इस अवस्था की पहचान कर पाता तो आज इन्ग्रिड हमारे बीच होती।
ठीक है ब्रेन-हैमरेज से कुछ लोग मरते नहीं है --लेकिन वे सारी उम्र के लिये अपाहिज और बेबसी वाला जीवन जीने पर मजबूर तो हो ही जाते हैं।
जो नीचे लिखा है इसे पढ़ने में केवल आप का एक मिनट लगेगा ---
स्ट्रोक की पहचान ---
एक न्यूरोलॉजिस्ट कहते हैं कि अगर स्ट्रोक का कोई मरीज़ उन के पास तीन घंटे के अंदर पहुंच जाए तो वह उस स्ट्रोक के प्रभाव को समाप्त (reverse)भी कर सकते हैं---पूरी तरह से। उन का मानना है कि सारी ट्रिक बस यही है कि कैसे भी स्ट्रोक के मरीज़ की तुरंत पहचान हो, उस का निदान हो और उस को तीन घंटे के अंदर डाक्टरी चिकित्सा मुहैया हो, और अकसर यह सब ही अज्ञानता वश हो नहीं पाता।
स्ट्रोक के मरीज़ की पहचान के लिये तीन बातें ध्यान में रखिये --और इस से पहले हमेशा याद रखिये ----STR.
डाक्टरों का मानना है कि एक राहगीर भी तीन प्रश्नों के उत्तर के आधार पर एक स्ट्रोक के मरीज की पहचान करने एवं उस का बहुमूल्य जीवन बचाने में योगदान कर सकता है.......इसे अच्छे से पढ़िये और मन में बैठा लीजिए --
S ---Smile आप उस व्यक्ति को मुस्कुराने के लिये कहिए।
T-- talk उस व्यक्ति को कोई भी सीधा सा एक वाक्य बोलने के लिये कहें जैसे कि आज मौसम बहुत अच्छा है।
R --- Raise उस व्यक्ति को दोनों बाजू ऊपर उठाने के लिये कहें।
अगर इस व्यक्ति को ऊपर लिखे तीन कामों में से एक भी काम करने में दिक्कत है , तो तुरंत ऐम्बुलैंस बुला कर उसे अस्पताल शिफ्ट करें और जो आदमी साथ जा रहा है उसे इन लक्षणों के बारे में बता दें ताकि वह आगे जा कर डाक्टर से इस का खुलासा कर सके।
नोट करें ---- स्ट्रोक का एक लक्षण यह भी है --
1. उस आदमी को जिह्वा (जुबान) बाहर निकालने को कहें।
2. अगर जुबान सीधी बाहर नहीं आ रही और वह एक तरफ़ को मुड़ सी रही है तो भी यह एक स्ट्रोक का लक्षण है।
एक सुप्रसिद्ध कार्डियोलॉजिस्ट का कहना है कि अगर इस ई-मेल को पढ़ने वाला इसे आगे दस लोगों को भेजे तो शर्तिया तौर पर आप एक बेशकीमती जान तो बचा ही सकते हैं ....
और यह जान आप की अपनी भी हो सकती है -।
समय गूंगा नहीं
बस मौन है,
वक्त पर बताता है
किसका कौन है!
डॉ.. महेश सिन्हा की एक बहुत उपयोगी पोस्ट ---
सोमवार, 3 सितंबर 2018
कृष्ण के बारे में बहुत कुछ...
भगवान् श्री कृष्ण को अलग अलग स्थानों में अलग अलग नामो से जाना जाता है।
* उत्तर प्रदेश में कृष्ण या गोपाल गोविन्द इत्यादि नामो से जानते है।
* राजस्थान में श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से जानते है।
* महाराष्ट्र में बिट्ठल के नाम से भगवान् जाने जाते है।
* उड़ीसा में जगन्नाथ के नाम से जाने जाते है।
* बंगाल में गोपालजी के नाम से जाने जाते है।
* दक्षिण भारत में वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जाते है।
* गुजरात में द्वारिकाधीश के नाम से जाने जाते है।
* असम ,त्रिपुरा,नेपाल इत्यादि पूर्वोत्तर क्षेत्रो में कृष्ण नाम से ही पूजा होती है।
* मलेशिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है।
* गोविन्द या गोपाल में "गो" शब्द का अर्थ गाय एवं इन्द्रियों , दोनों से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद में गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रिया...जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश में इंद्रिया हो वही गोविंद है गोपाल है।
* श्री कृष्ण के पिता का नाम वसुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन "वासुदेव" के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था..
* श्री कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल में हुआ था।
* श्री कृष्ण के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे,
* श्री कृष्ण ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी में उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था।
क्योंकि उस युग में हरण की हुयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नहीं था।।
* श्री कृष्ण की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और श्री कृष्ण का शत्रु ।
* दुर्योधन श्री कृष्ण का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था।
* श्री कृष्ण के धनुष का नाम सारंग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था। उनकी प्रेमिका का नाम राधारानी था जो बरसाना के सरपंच वृषभानु की बेटी थी। श्री कृष्ण राधारानी से निष्काम और निश्वार्थ प्रेम करते थे। राधारानी श्री कृष्ण से उम्र में बहुत बड़ी थी। लगभग 6 साल से भी ज्यादा का अंतर था।
श्री कृष्ण ने 14 वर्ष की उम्र में वृंदावन छोड़ दिया था।। और उसके बाद वो राधा से कभी नहीं मिले।
* श्री कृष्ण विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन मध्य प्रदेश आये थे। और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सान्दीपनि से अलौकिक विद्याओ का ज्ञान अर्जित किया था।।
* श्री कृष्ण की कुल 125 वर्ष धरती पर रहे । उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घंटे पवित्र अष्टगंध महकता था।
उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था।
उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ में चार घोड़े जुते होते थे। उनकी दोनो आँखों में प्रचंड सम्मोहन था।
* श्री कृष्ण के कुलगुरु महर्षि शांडिल्य थे।
* श्री कृष्ण का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था।
* श्री कृष्ण के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए श्री कृष्ण ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था।
* श्री कृष्ण ने गुजरात के समुद्र के बीचो बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। द्वारिका पूरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया था।
* श्री कृष्ण को ज़रा नाम के शिकारी का बाण उनके पैर के अंगूठे मे लगा वो शिकारी पूर्व जन्म का बाली था,बाण लगने के पश्चात भगवान स्वलोक धाम को गमन कर गए।
* श्री कृष्ण ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट में दे दिया था।
* श्री कृष्ण ने सिर्फ एक बार बाल्यावस्था में नदी में नग्न स्नान कर रही स्त्रियों के वस्त्र चुराए थे और उन्हें अगली बार यु खुले में नग्न स्नान न करने की नसीहत दी थी।
* श्री कृष्ण के अनुसार गौ हत्या करने वाला असुर है और उसको जीने का कोई अधिकार नहीं।
* श्री कृष्ण अवतार नहीं थे बल्कि अवतारी थे....जिसका अर्थ होता है "पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्" न ही उनका जन्म साधारण मनुष्य की तरह हुआ था और न ही उनकी मृत्यु हुयी थी।
सर्वान् धर्मान परित्यजम मामेकं शरणम् व्रज
अहम् त्वम् सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामी मा शुच--
( भगवद् गीता अध्याय 18 )
डॉ.सौरभ श्रीवास्तव
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