सोमवार, 24 मई 2021

शब्दों का संसार

 


शब्द रचे जाते हैं,

शब्द गढ़े जाते हैं,

शब्द मढ़े जाते हैं,

शब्द लिखे जाते हैं,

शब्द पढ़े जाते हैं,

शब्द बोले जाते हैं,

शब्द तौले जाते हैं,

शब्द टटोले जाते हैं,

शब्द खंगाले जाते हैं,

अंततः

शब्द बनते हैं,

शब्द संवरते हैं,

शब्द सुधरते हैं,

शब्द निखरते हैं,

शब्द हंसाते हैं,

शब्द मनाते हैं,

शब्द रूलाते हैं,

शब्द मुस्कुराते हैं,

शब्द खिलखिलाते हैं,

शब्द गुदगुदाते हैं, 

शब्द मुखर हो जाते हैं,

शब्द प्रखर हो जाते हैं,

शब्द मधुर हो जाते हैं,


फिर भी-

शब्द चुभते हैं,

शब्द बिकते हैं,

शब्द रूठते हैं,

शब्द घाव देते हैं,

शब्द ताव देते हैं,

शब्द लड़ते हैं,

शब्द झगड़ते हैं,

शब्द बिगड़ते हैं,

शब्द बिखरते हैं

शब्द सिहरते हैं,

किंतु-


शब्द मरते नहीं,

शब्द थकते नहीं,

शब्द रुकते नहीं,

शब्द चुकते नहीं,

अतएव-

शब्दों से खेले नहीं,

बिन सोचे बोले नहीं,

शब्दों को मान दें,

शब्दों को सम्मान दें,

शब्दों पर ध्यान दें,

शब्दों को पहचान दें,

ऊँची लंबी उड़ान दे,

शब्दों को आत्मसात करें...

उनसे उनकी बात करें,

शब्दों का अविष्कार करें...

गहन सार्थक विचार करें,


क्योंकि-

शब्द अनमोल हैं...

ज़ुबाँ से निकले बोल हैं,

शब्दों में धार होती है,

शब्दों की महिमा अपार होती,

शब्दों का विशाल भंडार होता है,


और सच तो यह है कि-

शब्दों का अपना एक संसार होता है....

सोमवार, 17 मई 2021

वह पागल भिखारी...

जब बुढ़ापे में अकेला ही रहना है तो औलाद क्यों पैदा करें उन्हें क्यों काबिल बनाएं जो हमें बुढ़ापे में दर-दर के ठोकरें खाने  के लिए छोड़ दे ।

क्यों दुनिया मरती है औलाद के लिए, जरा सोचिए इस विषय पर।

मराठी भाषा से हिन्दी ट्रांसलेशन की गई ये सच्ची कथा है ।

जीवन के प्रति एक नया दृष्टिकोण आपको प्राप्त होगा।समय निकालकर अवश्य पढ़ें।

हमेशा की तरह मैं आज भी, परिसर के बाहर बैठे भिखारियों की मुफ्त स्वास्थ्य जाँच में व्यस्त था। स्वास्थ्य जाँच और फिर मुफ्त मिलने वाली दवाओं के लिए सभी भीड़ लगाए कतार में खड़े थे।

अनायाश सहज ही मेरा ध्यान गया एक बुजुर्ग की तरफ गया, जो करीब ही एक पत्थर पर बैठे हुए थे। सीधी नाक, घुँघराले बाल, निस्तेज आँखे, जिस्म पर सादे, लेकिन साफ सुथरे कपड़े। 

कुछ देर तक उन्हें देखने के बाद मुझे यकीन हो गया कि, वो भिखारी नहीं हैं। उनका दाँया पैर टखने के पास से कटा हुआ था, और करीब ही उनकी बैसाखी रखी थी।

फिर मैंने देखा कि,आते जाते लोग उन्हें भी कुछ दे रहे थे और वे लेकर रख लेते थे। मैंने सोचा ! कि मेरा ही अंदाज गलत था, वो बुजुर्ग भिखारी ही हैं।

उत्सुकतावश मैं उनकी तरफ बढ़ा तो कुछ लोगों ने मझे आवाज लगाई : 

"उसके करीब ना जाएँ डॉक्टर साहब, 

वो बूढा तो पागल है । "

लेकिन मैं उन आवाजों को नजरअंदाज करता, मैं उनके पास गया। सोचा कि, जैसे दूसरों के सामने वे अपना हाथ फैला रहे थे, वैसे ही मेरे सामने भी हाथ करेंगे, लेकिन मेरा अंदाज फिर चूक गया। उन्होंने मेरे सामने हाथ नहीं फैलाया।

मैं उनसे बोला : "बाबा, आपको भी कोई शारीरिक परेशानी है क्या ? "

मेरे पूछने पर वे अपनी बैसाखी के सहारे धीरे से उठते हुए बोले : "Good afternoon doctor...... I think I may have some eye problem in my right eye .... "

इतनी बढ़िया अंग्रेजी सुन मैं अवाक रह गया। फिर मैंने उनकी आँखें देखीं। 

पका हुआ मोतियाबिंद था उनकी ऑखों में । 

मैंने कहा : " मोतियाबिंद है बाबा, ऑपरेशन करना होगा। "

बुजुर्ग बोले : "Oh, cataract ? 

I had cataract operation in 2014 for my left eye in Ruby Hospital."

मैंने पूछा : " बाबा, आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? "

बुजुर्ग : " मैं तो यहाँ, रोज ही 2 घंटे भीख माँगता हूँ  सर" ।

मैं : " ठीक है, लेकिन क्यों बाबा ? मुझे तो लगता है, आप बहुत पढ़े लिखे हैं। "

बुजुर्ग हँसे और हँसते हुए ही बोले : "पढ़े लिखे ?? "

मैंने कहा : "आप मेरा मजाक उड़ा रहे हैं बाबा। "

बाबा : " Oh no doc... Why would I ?... Sorry if I hurt you ! "

मैं : " हर्ट की बात नहीं है बाबा, लेकिन मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है। "

बुजुर्ग : " समझकर भी, क्या करोगे डॉक्टर ? "

अच्छा "ओके, चलो हम, उधर बैठते हैं, वरना लोग तुम्हें भी पागल हो कहेंगे। "(और फिर बुजुर्ग हँसने लगे)

करीब ही एक वीरान टपरी थी। हम दोनों वहीं जाकर बैठ गए।

" Well Doctor, I am Mechanical Engineer...."--- बुजुर्ग ने अंग्रेजी में ही शुरुआत की--- " 

मैं, *** कंपनी में सीनियर मशीन ऑपरेटर था।

एक नए ऑपरेटर को सिखाते हुए, मेरा पैर मशीन में फंस गया था, और ये बैसाखी हाथ में आ गई। कंपनी ने इलाज का सारा खर्चा किया, और बाद में  कुछ रकम और सौंपी, और घर पर बैठा दिया। क्योंकि लंगड़े बैल को कौन काम पर रखता है सर ? "

"फिर मैंने उस पैसे से अपना ही एक छोटा सा वर्कशॉप डाला। अच्छा घर लिया। बेटा भी मैकेनिकल इंजीनियर है। वर्कशॉप को आगे बढ़ाकर उसने एक छोटी कम्पनी और डाली। "

मैं चकराया, बोला : " बाबा, तो फिर आप यहाँ, इस हालत में कैसे ? "

बुजुर्ग : " मैं...? 

किस्मत का शिकार हूँ ...."

" बेटे ने अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए, कम्पनी और घर दोनों बेच दिए। बेटे की तरक्की के लिए मैंने भी कुछ नहीं कहा। सब कुछ बेच बाचकर वो अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जापान चला गया, और हम जापानी गुड्डे गुड़िया यहाँ रह गए। "

ऐसा कहकर बाबा हँसने लगे। हँसना भी इतना करुण हो सकता है, ये मैंने पहली बार अनुभव किया।

फिर बोला : " लेकिन बाबा, आपके पास तो इतना हुनर है कि जहाँ लात मारें वहाँ पानी निकाल दें। "

अपने कटे हुए पैर की ओर ताकते बुजुर्ग बोले : " लात ? कहाँ और कैसे मारूँ, बताओ मुझे  ? "

बाबा की बात सुन मैं खुद भी शर्मिंदा हो गया। मुझे खुद बहुत बुरा लगा।

प्रत्यक्षतः मैं बोला : "आई मीन बाबा, आज भी आपको कोई भी नौकरी दे देगा, क्योंकि अपने क्षेत्र में आपको इतने सालों का अनुभव जो है। "

बुजुर्ग : " Yes doctor, और इसी वजह से मैं एक वर्कशॉप में काम करता हूँ। 8000 रुपए तनख्वाह मिलती है मुझे। "


मेरी तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। मैं बोला : 

"तो फिर आप यहाँ कैसे ? "

बुजुर्ग : "डॉक्टर, बेटे के जाने के बाद मैंने एक चॉल में एक टीन की छत वाला घर किराए पर लिया। वहाँ मैं और मेरी पत्नी रहते हैं। उसे Paralysis है, उठ बैठ भी नहीं सकती। "

" मैं 10 से 5 नौकरी करता हूँ । शाम 5 से 7 इधर भीख माँगता हूँ और फिर घर जाकर तीनों के लिए खाना बनाता हूँ। "

आश्चर्य से मैंने पूछा : " बाबा, अभी तो आपने बताया कि, घर में आप और आपकी पत्नी हैं। फिर ऐसा क्यों कहा कि, तीनों के लिए खाना बनाते हो ? "

बुजुर्ग : " डॉक्टर, मेरे बचपन में ही मेरी माँ का स्वर्गवास हो गया था। मेरा एक जिगरी दोस्त था, उसकी माँ ने अपने बेटे जैसे ही मुझे भी पाला पोसा। दो साल पहले मेरे उस जिगरी दोस्त का निधन हार्ट अटैक से हो गया तो उसकी 92 साल की माँ को मैं अपने साथ अपने घर ले आया तब से वो भी हमारे साथ ही रहती है। "

मैं अवाक रह गया। इन बाबा का तो खुद का भी हाल बुरा है। पत्नी अपंग है। खुद का एक पाँव नहीं, घरबार भी नहीं, 

जो था वो बेटा बेचकर चला गया, और ये आज भी अपने मित्र की माँ की देखभाल करते हैं। 

कैसे जीवट इंसान हैं ये ?

कुछ देर बाद मैंने समान्य स्वर में पूछा : " बाबा, बेटा आपको रास्ते पर ले आया, ठोकरें खाने को छोड़ गया। आपको गुस्सा नहीं आता उस पर ? "

बुजुर्ग : " No no डॉक्टर, अरे वो सब तो उसी के लिए कमाया था, जो उसी का था, उसने ले लिया। इसमें उसकी गलती कहाँ है ? "

" लेकिन बाबा "--- मैं बोला "लेने का ये कौन सा तरीका हुआ भला ? सब कुछ ले लिया। ये तो लूट हुई। "

" अब आपके यहाँ भीख माँगने का कारण भी मेरी समझ में आ गया है बाबा। आपकी तनख्वाह के 8000 रुपयों में आप तीनों का गुजारा नहीं हो पाता अतः इसीलिए आप यहाँ आते हो। "

बुजुर्ग : " No, you are wrong doctor. 8000 रुपए में मैं सब कुछ मैनेज कर लेता हूँ। लेकिन मेरे मित्र की जो माँ है, उन्हें, डाइबिटीज और ब्लडप्रेशर दोनों हैं। दोनों बीमारियों की दवाई चल रही है उनकी। बस 8000 रुपए में उनकी दवाईयां मैनेज नहीं हो पाती । "

" मैं 2 घंटे यहाँ बैठता हूँ लेकिन भीख में पैसों के अलावा कुछ भी स्वीकार नहीं करता। मेडिकल स्टोर वाला उनकी महीने भर की दवाएँ मुझे उधार दे देता है और यहाँ 2 घंटों में जो भी पैसे मुझे मिलते हैं वो मैं रोज मेडिकल स्टोर वाले को दे देता हूँ। "

मैंने अपलक उन्हें देखा और सोचा, इन बाबा का खुद का बेटा इन्हें छोड़कर चला गया है और ये खुद किसी और की माँ की देखभाल कर रहे हैं।

मैंने बहुत कोशिश की लेकिन खुद की आँखें भर आने से नहीं रोक पाया।

भरे गले से मैंने फिर कहा : "बाबा, किसी दूसरे की माँ के लिए, आप, यहाँ रोज भीख माँगने आते हो ? "

बुजुर्ग : " दूसरे की ? अरे, मेरे बचपन में उन्होंने बहुत कुछ किया मेरे लिए। अब मेरी बारी है। मैंने उन दोनों से कह रखा है कि, 5 से 7 मुझे एक काम और मिला है। "

मैं मुस्कुराया और बोला : " और अगर उन्हें पता लग गया कि, 5 से 7 आप यहाँ भीख माँगते हो, तो ? "

बुजुर्ग : " अरे कैसे पता लगेगा ? दोनों तो बिस्तर पर हैं। मेरी हेल्प के बिना वे करवट तक नहीं बदल पातीं। यहाँ कहाँ पता करने आएँगी.... हा....हा... हा...."

बाबा की बात पर मुझे भी हँसी आई। लेकिन मैं उसे छिपा गया और बोला : " बाबा, अगर मैं आपकी माँ जी को अपनी तरफ से नियमित दवाएँ दूँ तो ठीक रहेगा ना। फिर आपको भीख भी नहीं मांगनी पड़ेगी। "

बुजुर्ग : " No doctor, आप भिखारियों के लिए काम करते हैं। माजी के लिए आप दवाएँ देंगे तो माजी भी तो भिखारी कहलाएंगी। मैं अभी समर्थ हूँ डॉक्टर, उनका बेटा हूँ मैं। मुझे कोई भिखारी कहे तो चलेगा, लेकिन उन्हें भिखारी कहलवाना मुझे मंजूर नहीं। "

" OK Doctor, अब मैं चलता हूँ। घर पहुँचकर अभी खाना भी बनाना है मुझे। "

मैंने निवेदन स्वरूप बाबा का हाथ अपने हाथ में लिया और बोला : " बाबा, भिखारियों का डॉक्टर समझकर नहीं बल्कि अपना बेटा समझकर मेरी दादी के लिए दवाएँ स्वीकार कर लीजिए। "

अपना हाथ छुड़ाकर बाबा बोले : " डॉक्टर, अब इस रिश्ते में मुझे मत बांधो, please, एक गया है, हमें छोड़कर...."

" आज मुझे स्वप्न दिखाकर, कल तुम भी मुझे छोड़ गए तो ? अब सहन करने की मेरी ताकत नहीं रही...."

ऐसा कहकर बाबा ने अपनी बैसाखी सम्हाली। और जाने लगे, और जाते हुए अपना एक हाथ मेरे सिर पर रखा और भर भराई, ममता मयी आवाज में बोले : "अपना ध्यान रखना मेरे बच्चे..."

शब्दों से तो उन्होंने मेरे द्वारा पेश किए गए रिश्ते को ठुकरा दिया था लेकिन मेरे सिर पर रखे उनके हाथ के गर्म स्पर्श ने मुझे बताया कि, मन से उन्होंने इस रिश्ते को स्वीकारा था।

उस पागल कहे जाने वाले मनुष्य के पीठ फेरते ही मेरे हाथ अपने आप प्रणाम की मुद्रा में उनके लिए जुड़ गए।

हमसे भी अधिक दुःखी, अधिक विपरीत परिस्थितियों में जीने वाले ऐसे भी लोग हैं।

हो सकता है इन्हें देख हमें हमारे दु:ख कम प्रतीत हों, और दुनिया को देखने का हमारा नजरिया बदले....

हमेशा अच्छा सोचें, हालात का सामना करे...।

वाट्स एप से साभार

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

कल कभी न आने वाली मनोदशा है


हम जब एक गहरी यात्रा से गुज़रते हैं तो यात्रा के ऐसे आदी हो जाते हैं कि यक़ीन ही नहीं होता कि यात्रा ख़तम हो गई है। इस मोड़ पर जब आगे के लक्ष्य तय किये जाने चाहिए हम अतीत में ही जीते और झुंझलाते रहते हैं कि जैसे अभी भी कुछ भी नहीं बदला। हिन्दू मनीषा ने तो यात्रा को भी जीवन और जगत का सबसे बड़ा भ्रम कहा है क्योंकि यात्रा भी कोई बाहरी अवधारणा नहीं है।

एक कथा है- 

एक बार एक व्यक्ति तपस्या को बैठा। उसने भैरव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया। धूप, बारिश, ठंड पतझड़ बसंत आए गए पर तपस्या चलती रही। एकदिन भैरव आ गए और कहा 'उठो, मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। वर मांगों।'  व्यक्ति ने आंखें खोलीं। देखा कोई नहीं है। वह क्षुब्ध हुआ, पर फिर आंखें मूंद ली और पुनः तपस्या में लीन हो गया। ऐसा ही कई बार घटा। भैरव की आवाज़ आती, व्यक्ति आंखें खोलता और किसी को न पा फिर उदास हो आंखें मूंद लेता। उसकी क्षुब्धता बढ़ती रही, बेचैनी बढ़ती रही। वह अपनी स्थिति से निराश, अवसाद में जाता रहा लेकिन तपस्या बन्द न की। बहुत दिनों बाद एक बार फिर जब भैरव की आवाज़ आई तब उसने झल्लाकर कहा कि कौन है जो भैरव बनकर बार बार मेरी तपस्या भंग कर रहा है। तब आवाज़ आई- 'मैं भैरव ही हूँ।' व्यक्ति ने कहा 'तब आप दिखाई क्यों नहीं देते।'  भैरव ने कहा 'तुम पीछे देखो मैं खड़ा हूँ। तुम्हारी तपस्या से तुम्हारी आभा इतनी बढ़ गई है कि तुम मुझे देख नहीं पा रहे हो।' असल में भैरव कब के प्रसन्न हो गए थे लेकिन व्यक्ति तपस्या में इतना मग्न था कि समझ ही नहीं पा रहा था। 

हमारी भी यही दशा है. हम बरसों बरस जिस आग में जलकर अपने लिए तप करते हैं, वह अर्जित कर लेने के बाद भी अतीत में ही जीते रहते हैं। हम अतीत के दुखों में ही खुद को स्थित कर रोते हैं, कुढ़ते हैं, झल्लाते हैं जबकि भैरव प्रसन्न हो चुके होते हैं। अपने अपने भैरवों के लिए तपना जितना ज़रूरी है भैरवों के प्रसन्न हो जाने के बाद उन्हें चिन्हित कर जीवन लक्ष्य के लिए और और आगे बढ़ना भी उतना ही ज़रूरी है।  दु:ख में रहने को जीते-जीते, सुख के आने की ख़बर ही नहीं होती। सुख आ गया है, ठीक से आंखें खोलिए और पहचानिए। कृपणता जीवन की मृत्यु है, हिन्दू मनीषा ने आनंद को जीवन का लक्ष्य कहा है और आनन्द की प्राप्ति के लिए भीतर स्पेस और स्वीकार्यता की जितनी ज़रूरत है उतनी ही कृपण भावबोध से मुक्त होकर उदारता की भी। योरोप में लोंजाइनस इसी को उदात्तवाद कहते हैं।  जब तक मन कृपणता में, संकुचन में, क्षुब्धता में रहेगा वह वर्तमान को स्वीकार नहीं कर सकेगा। आपने देखा होगा कुछलोग कितना भी पा लें, फिर भी भिखारियों जैसा व्यवहार करते हैं कि अभी पाया ही क्या। ऐसे लोगों की असल दिक्क़त असन्तोष है, यह एक ऐसा असन्तोष है जो कभी तुष्ट नहीं होता। इसलिए होश में रहकर जीने को कहा गया है और जिस तरह कृपण व्यक्ति कभी भी आनंद को नहीं पा सकता ठीक वैसे ही अति महत्वाकांक्षी भी आनन्द प्राप्ति में कृपण का ही सहोदर होता है। हम सुख के, वस्तुओं के, अन्य के जितने आग्रही होंगे आनन्द उतना ही दूर होता जाएगा। सुख वस्तुओं में नहीं होता। अगर आप आज, यहीं खुश नहीं तो आप कभी, कहीं खुश नहीं हो सकते। इसलिए कल जब यह, यह और वह अर्जित हो जाएगा तब खुशी आ जाएगी सोचने की जगह उसे आज में, इस में, ऐसे ही में तलाशने की कोशिश करें।

आनन्द, वस्तुओं और वासनाओं में नहीं, गहराई, वर्तमान और उपलब्ध में है। किसी भैरव को अन्य में, कल में, दूर में न खोजें, वह आज में, आपमें और एकदम भीतर है। जबतक यह नहीं जानते तबतक भैरव प्रसन्न हो आवाज़ देते रहेंगे और आप उनके निकट होकर भी क्षुब्ध होते रहेंगे।

वाट्सएप से....

सोमवार, 8 मार्च 2021

मोदी है तभी मुमकिन हुआ!!!

विंग कमांडर अभिनंदन का नाम तो आप निश्चय ही नहीं भूले होंगे....... शायद उनकी मूछें भी याद ही होंगी....लेकिन इसी भारतीय सेना के कुछ अन्य जांबाज़ पायलेट के नाम नीचे दिए गए हैं...... इनकी तश्वीरें देखना तो दूर हममें से कोई एकाध ही होगा, जिसने ये नाम सुन रखे होंगे...लेकिन इनका रिश्ता अभिनंदन से बड़ा ही गहरा है.... पढ़िए ये नाम....

विंग कमांडर हरसरण सिंह डंडोस, स्क्वाड्रन लीडर मोहिंदर कुमार जैन, स्क्वाड्रन लीडर जे. एम. मिस्त्री, स्क्वाड्रन लीडर जे. डी. कुमार, स्क्वाड्रन लीडर देव प्रसाद चटर्जी,  फ्लाइट लेफ्टिनेंट सुधीर गोस्वामी, फ्लाइट लेफ्टिनेंट वी. वी. तांबे, फ्लाइट लेफ्टिनेंट नागास्वामी शंकर,  फ्लाइट लेफ्टिनेंट राम एम. आडवाणी,  फ्लाइट लेफ्टिनेंट मनोहर पुरोहित, फ्लाइट लेफ्टिनेंट तन्मय सिंह डंडोस , फ्लाइट लेफ्टिनेंट बाबुल गुहा, फ्लाइट लेफ्टिनेंट सुरेश चंद्र संदल, फ्लाइट लेफ्टिनेंट हरविंदर सिंह, फ्लाइट लेफ्टिनेंट  एल एम सासून, फ्लाइट लेफ्टिनेंट के. पी. एस. नंदा, फ्लाइट लेफ्टिनेंट अशोक धवले, फ्लाइट लेफ्टिनेंट  श्रीकांत महाजन, फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुरदेव सिंह राय, फ्लाइट लेफ्टिनेंट रमेश कदम, फ्लाइट लेफ्टिनेंट प्रदीप वी आप्टे, फ्लाइंग ऑफिसर कृष्ण मलकानी, फ्लाइंग ऑफिसर  के पी मुरलीधरन, फ्लाइंग ऑफिसर  सुधीर त्यागी, फ्लाइंग ऑफिसर तेजिंदर सेठी

ये सभी नाम अनजाने लगे होंगे...... ये भी भारतीय वायुसेना के योद्धा थे, जो 1971 की जंग में पाकिस्तान में बंदी बना लिए गए..और फिर कभी वापस नहीं आए। इनकी चिट्ठियां घर वालों तक आईं, पर भारत सरकार ने कभी इनकी खोज खबर न ली 1972 में शिमला में एक कथित लौह महिला इंदिरा गांधी, जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ डॉक्टर डॉक्टर खेल 90 हज़ार पाकिस्तानियों को छोड़ने का समझौता तो कर आई, पर इन्हें भूल गई...ये विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान जितने खुशकिस्मत न थे के इनके लिए इनकी सरकार ने मिसाइलें नहीं तानी, न देश के लोगों ने इनकी खबर ली, न अखवारों ने फोटो छापे..... इन्हें मरने को, पाकिस्तानी जेलों में सड़ने को छोड़ दिया गया...... इनके वजूद को नकार दिया गया....

और ये पहली बार नहीं हुआ था। रेज़ांगला के वीर अहीरों को भी नेहरू ने भगोड़ा करार दिया था..शैतान सिंह भाटी को कायर मान लिया था..... अगर चीन ने इनकी जांबाजी को न स्वीकारा होता, एक लद्दाखी गडरिये को इनकी लाशें न मिलती, तो ये वीर अहीर न कहलाते, शैतान सिंह भाटी परम वीर चक्र का सम्मान न पाते.....

यही रवैया रहा गांधी-नेहरू कुनबे का देश के वीर सपूतों के प्रति...... और यही फ़र्क़ है मोदी के होने न होने का...

आप कल्पना भी नहीं कर सकते अगर मोदी की जगह उनका गूंगा पूर्ववर्ती होता अभिनंदन का नाम भी शायद इसी लिस्ट में लिखा होता......

वो मोदी है, देश के सम्मान की रक्षा को दृणप्रतिज्ञ और रक्षक योद्धाओं के लिए भी पूर्ण समर्पित.......

और यही वजह है के हम उसके भक्त हैं...

भाई उपेन्द्र तिवारी


बुधवार, 3 मार्च 2021

कटी प्याज के नुकसान

मानो या ना मानो यह पूर्णतया सत्य है. देर से कटी प्याज का कभी उपयोग ना करें. प्याज हमेशा तुरंत काट कर खाएं. कटी रखी प्याज दस मिनिट में अपने आस पास के सारे कीटाणु अवशोषित कर लेती है. यह वेज्ञानिक तौर पर सिद्ध हो चुका है. जब भी किसी मौसमी बीमारी का प्रकोप फैले घर में सुबह शाम हर कमरें में प्याज काट कर रख दें. बाद में उसे फैंक दें. सुरक्षित बने रहेंगे.
सन 1919 में फ्लू से चार करोड़ लोग  मारे जा चुके थे, तब एक डॉक्टर कई किसानों से उनके घर इस प्रत्याशा में मिला कि वो कैसे इन किसानों को इस महामारी से लड़ने में सहायता कर सकता है. बहुत सारे किसान इस फ्लू से ग्रसित थे और उनमें से बहुत से मारे जा चुके थे. डॉक्टर जब इनमें से एक किसान के संपर्क में आया तो उसे ये जान कर बहुत आश्चर्य हुआ, कि सारे गाँव के फ्लू से ग्रसित होने के बावजूद ये किसान परिवार बिलकुल स्वस्थ्य था. तब डॉक्टर को ये जानने की इच्छा जागी कि ऐसा इस किसान के परिवार ने सारे गाँव से हटकर क्या किया कि वो इस भंयकर महामारी में भी स्वस्थ्य थे. तब किसान की पत्नी ने उन्हें बताया कि उसने अपने मकान के दोनों कमरों में एक प्लेट में  छिली हुई प्याज रख दी थी  तब डॉक्टर ने प्लेट में रखी इन प्याज को माइक्रोस्कोप से देखा तो उसे इस प्याज में  उस घातक फ्लू के बैक्टेरिया मिले जो संभवतया इन प्याज द्वारा अवशोषित  कर लिए गए थे और शायद यही कारण था कि इतनी बड़ी महामारी में ये परिवार  बिलकुल स्वस्थ्य था, क्योंकि फ्लू के वायरस इन प्याज द्वारा सोख लिए गए थे. जब मैंने अपने एक मित्र जो अमेरिका में रहते थे और मुझे हमेशा स्वास्थ्य संबधी मुद्दों पर  बेहद ज्ञानवर्धक जानकारी भेजते रहते हैं, तब उन्होंने प्याज के संबध में बेहद महत्वपूर्ण जानकारी/अनुभव मुझे भेजा. उनकी इस बेहद रोचक कहानी के लिए धन्यवाद.

जब मैं न्यूमोनिया से ग्रसित था और कहने की आवश्यकता नहीं थी कि मैं बहुत कमज़ोर महसूस कर रहा था तब मैंने एक लेख पढ़ा था जिसमें ये बताया गया था कि प्याज को बीच से काटकर रात में  न्यूमोनिया से ग्रस्त मरीज़ के कमरे में एक जार में रख दिया गया था और सुबह यह देख कर बेहद आश्चर्य हुआ कि प्याज सुबह कीटाणुओं की वज़ह से  बिलकुल काली हो गई थी तब मैंने भी अपने कमरे में वैसे ही किया और देखा अगले दिन प्याज बिलकुल काली होकर खराब हो चुकी थी और मैं काफी स्वस्थ्य महसूस कर रहा था.

कई बार हम पेट की बीमारी से दो चार होते है तब हम इस बात से अनजान रहते है कि इस बीमारी के लिए किसे दोषी ठहराया जाए. तब नि :संदेह प्याज को इस बीमारी के लिए दोषी ठहराया जा सकता है. प्याज बैक्टेरिया को अवशोषित कर लेती है यही कारण है कि अपने इस गुण के कारण प्याज हमें ठण्ड और फ्लू से बचाती है. अत: वे प्याज बिलकुल नहीं खाना चाहिए जो बहुत देर पहले काटी गई हो और प्लेट में रखी गई हों. ये जान लें कि  काट कर रखी गई प्याज बहुत विषाक्त होती हैं.

जब कभी भी फ़ूड पॉइसनिंग के केस अस्पताल में आते हैं तो सबसे पहले इस बात की जानकारी ली जाती कि मरीज़ ने अंतिम बार प्याज कब खाई थी. और वे प्याज कहाँ से आई थीं , (खासकर सलाद में )  प्याज बैक्टेरिया के लिए चुंबक की तरह काम करती हैं  खासकर कच्ची प्याज आप कभी भी थोड़ी सी भी कटी हुई प्याज को देर तक रखने की गलती न करे ये बेहद खतरनाक हैं.

यहाँ तक कि किसी बंद थैली में इसे रेफ्रिजरेटर में रखना भी सुरक्षित नहीं है. प्याज ज़रा सी काट देने पर ये बैक्टेरिया से ग्रसित हो सकती है और आपके लिए खतरनाक हो सकती है. यदि आप कटी हुई प्याज को सब्ज़ी बनाने के लिए उपयोग कर रहें हो, तब तो ये ठीक है, लेकिन यदि आप कटी हुई प्याज अपनी ब्रेड पर रख कर खा रहें है तो ये बेहद खतरनाक है. ऐसी स्थिति में आप मुसीबत को न्योता दे रहें हैं. याद रखे कटी हुई प्याज और कटे हुए आलू की नमी बैक्टेरिया को तेज़ी से  पनपने में बेहद सहायक होता है.कुत्तों को कभी भी प्याज नहीं खिलाना चाहिए, क्योंकि प्याज को उनका पेट का मेटाबोलिज़ कभी भी नहीं पचाता. कृपया ध्यान रखे कि प्याज को काट कर अगले दिन सब्ज़ी बनाने के लिए नहीं रखना चाहिए क्योंकि ये बहुत खतरनाक है यहाँ तक कि कटी हुई प्याज एक रात में बहुत विषाक्त हो जाती है क्योंकि ये टॉक्सिक बैक्टेरिया बनाती है जो पेट खराब करने के लिए पर्याप्त रहता है।  प्याज परमाणविक रेडिएशन को भी सोख लेता है, पोखरण में भी इसका इस्तेमाल हुआ था।

वाट्स एप से साभार...


बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

क्या वाकई डीजलपेट्रोल बहुत मंहगा हो गया है?

निम्न तथ्यों पर गौर करें....

यदि पिछले 25-30 सालों को याद करें तो मुझे याद है कि वाहन खरीदने से पहले और खरीदने के बाद कहीं जाने के लिये स्कूटर मोटरसाइकिल घर से निकालने से पहले लोग ईंधन के खर्च का हिसाब लगाते थे। और ये खर्च उनकी मासिक आय में से एक बड़ा हिस्सा होता था। इसलिये अक्सर प्लान को बदल देते थे।आज 624 CC की टाटा नैनो कोई नहीं खरीदना चाहता। 1500-1600 CC की ब्रेजा, क्रेटा व उससे भी ज्यादा बड़े इंजन की कारें सड़कों पर ऐसे दिखती हैं जैसे कभी मारुति 800 दिखा करती थीं। किसी को किफायती कारे नहीं चाहिये बल्कि ज्यादा पावर वाली बड़ी कारें चाहियें.... क्यों? 

क्या इसलिये कि पैट्रोल डीजल मंहगा हो रहा है?

80 CC की मोपेड की बजाय विगत वर्षों में 350 व 500 CC की बुलट की संख्या बेतहाशा बढ़ी है.... क्यों?

 क्या इसलिये कि पैट्रोल डीजल लगातार मंहगा हो रहा है?

यदि किसानों की भी बात करूं तो 24 हॉर्स पॉवर के आयशर व 25 हॉर्स पावर के HMT 2511 ट्रैक्टर ही कभी 90% किसान खरीदते थे। ये ट्रैक्टर 30-40 एकड़ तक की खेती को संभालने के लिये पर्याप्त होते थे। लेकिन आज ज्यादातर किसान 45 से 90 हॉर्स पावर तक के ट्रैक्टर खरीदते हैं। 2 एकड़ का मालिक किसान भी बिना बड़े ट्रैक्टर के खेती नहीं करता। हल बैल तो छोड़िए 24-25 हॉर्स पावर के ट्रैक्टर भी गांवों से खेतों से ऐसे गायब हो गए हैं जैसे सड़कों से मोपेड.... क्यों?

 क्या इसलिये कि पैट्रोल डीजल मंहगा हो रहा है?

आपका 17-18 साल का लड़का जिम करने व ट्यूशन के लिये बाइक से जाता है और आप नहीं रोकते। पार्किंग की आफत के बावजूद एक दो km दूर बाजार या सब्जी मंडी तक जाने के लिये भी लोगों को कार चाहिए... क्यों❓

 क्या इसलिये कि पैट्रोल डीजल मंहगा हो गया है?

और बिना कारण के इतना डीजल पैट्रोल फूँकने का क्या प्रभाव पर्यावरण पर पड़ रहा है इससे भी कोई अनजान तो नहीं है।

उपरोक्त सब का कारण क्या ये है कि पैट्रोल डीजल मंहगा हो गया है?

 जी नहीं...उपरोक्त सब का कारण ये है कि लोगों की आय के मुकाबले में डीजल पैट्रोल का कोई मूल्य ही नहीं रह गया है। एक सत्य ये भी है कि इतना डीजल पैट्रोल फूंकना लोगों की जरूरत नहीं बल्कि लक्जरी बन गयी है।

पहले पतली सड़के हुआ करती थीं पर जाम नहीं लगते थे।

👉पर आज सड़कें पहले से संख्या व चौड़ाई में भी ज्यादा हैं पर सड़कों पर जाम रहता है.... क्यों?

 क्या इसलिये कि पैट्रोल डीजल मंहगा हो रहा है❓

हर घर के बाहर गली में खड़ी कारों की वजह से गली में चलना भी दूभर होता है। सोचिये यदि डीजल पैट्रोल आज 10 रुपये लीटर हो जाये तो जाम की स्थिति क्या होगी? क्या सड़कों पर हम चल भी पाएंगे?

मेरी नजर में ये वक्त की मांग है कि इस बढ़ी हुई आमदनी से सरकार को पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को बेहतर बनाने के प्रयास अवश्य करने चाहिएँ। ईंधन का खर्च बढ़ने से इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ भी लोगों का रुझान बढ़ेगा। उससे फायदा ये होगा कि अरब देशों की औकात और पर्यावरण प्रदूषण स्तर..... दोनों लिमिट में आ जाएंगे।

अरविन्द राय की पोस्ट __

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021



अ चानक

आ कर मुझसे

इ ठलाता हुआ पंछी बोला

ई श्वर ने मानव को तो

उ त्तम ज्ञान-दान से तौला

ऊ पर हो तुम सब जीवों में

ऋ ष्य तुल्य अनमोल

ए क अकेली जात अनोखी

ऐ सी क्या मजबूरी तुमको

ओ ट रहे होंठों की शोख़ी

औ र सताकर कमज़ोरों को

अं ग तुम्हारा खिल जाता है

अ: तुम्हें क्या मिल जाता है.?

क हा मैंने- कि कहो

ख ग आज सम्पूर्ण

ग र्व से कि- हर अभाव में भी

घ र तुम्हारा बड़े मजे से

च ल रहा है

छो टी सी- टहनी के सिरे की

ज गह में, बिना किसी

झ गड़े के, ना ही किसी

ट कराव के पूरा कुनबा पल रहा है

ठौ र यहीं है उसमें

डा ली-डाली, पत्ते-पत्ते

ढ लता सूरज

त रावट देता है

थ कावट सारी, पूरे

दि वस की-तारों की लड़ियों से

ध न-धान्य की लिखावट लेता है

ना दान-नियति से अनजान अरे

प्र गतिशील मानव

फ़ रेब के पुतलो

ब न बैठे हो समर्थ

भ ला याद कहाँ तुम्हें

म नुष्यता का अर्थ.?

य ह जो थी, प्रभु की

र चना अनुपम...

ला लच-लोभ के 

व शीभूत होकर

श र्म-धर्म सब तजकर

ष ड्यंत्रों के खेतों में

स दा पाप-बीजों को बोकर

हो कर स्वयं से दूर

क्ष णभंगुर सुख में अटक चुके हो

त्रा स को आमंत्रित करते

ज्ञा न-पथ से भटक चुके हो।