सोमवार, 17 जनवरी 2011

एक तेंदुए का एनकाउंटर

  नीरज नैयर
आमतौर पर पुलिस अपराधियों का एनकांउटर करती है, लेकिन महाराष्ट्र में एक तेंदुए का एनकाउंटर किया गया। पुलिस के बहादुर जवानों ने तेंदुए पर इतनी पास से गोलियां बरसाईं कि उसे बचने का कोई मौका नहीं मिला। इस लाइव एनकाउंटर को देखने के लिए भारी तादाद में भीड़ मौजूद थी, और शायद यादातर लोग तेंदुए की मौत चाहते थे। तेंदुए का कसूर बस इतना था कि वो भूलवश रिहायशी इलाके में घुसकर घबराहट में इंसान को घायल कर बैठा। अपनी जान को खतरा देख जब इंसान दूसरे की जान लेने से नहीं चूकता तो फिर ये तो जानवर था। उससे इतनी समझ की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है कि वो हमला करने के बजाए चुपचाप निकल जाता। और अगर वो ऐसा करने की सोचता भी तो क्या करने दिया जाता। क्या इंसान उसे रिहाइशी इलाके में आने का दंड दिए बिना जाने देता? जंगली जानवरों को इंसानों की बस्ती में आने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है, कुछ एक ही किस्मत वाले होते हैं जो सुरक्षित जंगल तक पहुंच पाते हैं। हाल ही में गुवाहाटी में एक बीमार हाथी के बच्चे को इंसानों की क्रूर भीड़ ने महज इसलिए मार डाला कि वो गलती से खेत का रुख कर बैठा था। बेजुबान की इस छोटी सी गलती पर इंसान इतना हैवान बन बैठा कि लाठी-डंडों से मासूम को तब तक पीटा गया जब तक उसने दम नहीं तोड़ दिया। दरिंदगी के इस खेल को वन विभाग और पुलिस के अधिकारी तमाशबीन बने देखते रहे, किसी ने भी हाथी की चिंघाड़ के दर्द को समझने का प्रयास नहीं किया। अगर वन अमला और पुलिसवाले चाहते तो हाथी के बच्चे को बचाया जा सकता था, लेकिन शायद उन्हें भी वो मासूम बच्चा कुसूरवार नजर आ रहा था। ऐसे ही गत 13 जनवरी को भुवनेश्वर मेें ग्रामीणों ने एक तेंदुए को न सिर्फ मौत के घाट उतारा बल्कि शव के साथ जुलूस निकालकर अपनी वीरता का परिचय भी दिया। दरअसल मैदान में खेलने पहुंचे बच्चों ने वहां तेंदुए को देखा और इसकी जानकारी उन्होंने गांव वालों को दी, इसपर हैवानियत का चोला ओढ़े गांववालों ने तेंदुए को बेदर्दी से तड़पा तड़पाकर मार डाला। गांववाले वनविभाग को भी सूचना दे सकते थे, मगर उन्होंने बेजुबान की जान लेना यादा बेहतर समझा। मनुष्य को संवेदनशील कहा जाता है, लेकिन यह कैसी संवेदनशीलता है जिसमें बेजुबानों को बेदर्दी से मारा जा रहा है। कभी मुनाफे के लिए तो कभी अपना वर्चस्व कायम करने के लिए। तेंदुए या बाघ हम तक नहीं पहुंचें, हमने ही उनके घर उजाड़कर वहां रहना शुरू कर दिया है।

विकास के नाम पर कट रहे जंगल
विकास के नाम पर घने जंगल छितरे किए जा रहे हैं, जानवरों का आशियाना हर रोज सिकुड़ता जा रहा है। भोजन-पानी की उपलब्धता लगातार सीमित होती जा रही है, बावजूद इसके अगर मूक जानवर भूले-भटके कभी रहवासीइलाकों में पहुंच जाए तो उसे मार डाला जाता है। संवेदनशीलता की ऐसी परिभाषा केवल मनुष्य ही गढ़ सकता है। ये कहां का इंसाफ है कि हम अत्याचार करते रहें और अत्याचार सहने वाला जब अपने बचाव में वार करे तो एकजुट होकर उसे मार डाला जाए। कुछ वक्त पहले यूपी में एक बाघ को आदमखोर बताकर मार गिराया गया, और चंद रोज पहले गुजरात के सूरत में एक तेंदुए की मौत का फरमान सुनाया गया है। तेंदुए को मारने के लिए हथियारों से लैस वनविभाग के कर्मचारी जंगलों को छान रहे हैं। हो सकता है कि यूपी के बाघ की तरह इस तेंदुए को भी मौत नसीब हो। ये भी हो सकता है कि इस तेंदुए की जगह किसी दूसरे को मार डाला जाए, सारे तेेंदुए लगभग एक जैसे दिखते हैं, उनके नाम-पते तो होते नहीं कि पहचाना जा सके। इस तेंदुए या उस बाघ ने जो कुछ भी किया वो अनापेक्षित था, उसने किसी प्रतिशोध में नहीं बल्कि हड़बड़ाहट और आत्मरक्षा में इंसान पर हमला बोला। जब खून करने वाले इंसान को आदमखोर घोषितकर उसकी मौत का फरमान जारी नहीं किया जाता तो फिर इन मूक जानवरों के साथ ऐसा क्यों किया जा रहा है। क्या इन्हें मनुष्य की माफिक जीने का हक नहीं। मनुष्य अपने खिलाफ हुए अत्याचार की आवाज उठा सकता है, लेकिन ये जानवर जाएं तो कहां जाएं। इनके लिए न तो कोई अदालत है, और न कोई सुनने वाला। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि एक तरफ हम इन जानवरों को बचाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाए जा रहे हैं और दूसरी तरफ अपने ही हाथों से इन्हें मौत के घाट उतार रहे हैं।

130 तेंदुओं की मौत
पिछले साल करीब 130 तेंदुए मारे गए, जबकि गैर सरकारी संगठन ये आंकड़ा 240 के ऊपर बता रहे हैं। इस दौरान तकरीबन 17 तेंदुए मनुष्य से टकराव की भेंट चढ़े, 19 सड़क हादसों में मारे गए और लगभग आठ को वन विभाग ने मार गिराया। बाकी संभवत: शिकारियों का शिकार बने। 2009 में करीब 160 तेंदुओं का शिकार किया गया, जबकि 2008 में यह संख्या 157 थी। 2007 की गणना के मुताबिक देश में महज 2300 तेंदुए ही बचे हैं, और बाघों की संख्या इससे काफी कम 1100 के आसपास है। लेकिन असल आंकड़ा निश्चित तौर पर इससे काफी कम होगा। पिछले कुछ वक्त से बाघ, तेंदुए की मौतों की संख्या में काफी तेजी देखी गई है, तेंदुए की बात करें तो लगभग हर रोज कहीं न कहीं से इसकी मौत की खबर सुनने को मिल जाती है। जिसमें मनुष्य से टकराव की घटनाएं यादा हैं (शिकार छोड़कर)।

बर्बरता का खेल
वैसे मूक जानवरों के साथ बर्बरता केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, दुनिया के बाकी हिस्सों में भी कमोबश ऐसा ही हो रहा है। इंडोनेशिया में इन दिनों जंगलों की कटाई चल रही है, जिसका असर यहां रहने वाले आरंगुटान प्रजाति के बंदरों पर सबसे यादा पड़ा है। इंसानों की हैवानियत का आलम ये है कि इन बंदरों को चुन-चुनकर या तो मारा जा रहा है या उन्हें जंजीरों में जकड़कर अपने मनोरंजन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। मनुष्य की यह निर्दयता जानवरों का अस्तित्व समाप्त कर रही है, अगर सबकुछ ऐसे ही चलता रहा तो आने वाले दिनों में न तो जंगल रहेंगे और न उसमें रहने वाले जानवर। फिर न कोई तेंदुआ रिहायशी इलाके का रुख करेगा, फिर न कोई बाघ आदमखोर घोषित किया जाएगा। अब ये हमें सोचना है कि हम कैसा कल चाहते हैं।



नीरज नैयर

बुधवार, 5 जनवरी 2011

मामला रूपम पाठक का नहीं, नारी अस्मिता का है

डॉ. महेश परिमल
भला एक शिक्षित महिला को हथियार उठाने की क्या आवश्यकता आ पड़ी? वह शिक्षिका जो बच्चों को शिक्षित करती हैं, उनमें ज्ञान का प्रकाश फैलाती है, उसे क्या जरूरत आ पड़ी कि किसी विधायक को चाकू से इतने वार करे कि वह मर ही जाए। इसे ही यदि थोड़े अलग नजरिए से देखें, तो स्पष्ट होगा कि कहीं न कहीं यह मामला महिला उत्पीड़न से जुड़ा है।
इस मामले की मूल में वे घोषणाएँ हैं, जिसे विधायक ने उक्त  महिला के स्कूल में मुख्य अतिथि के रूप में की थी। निश्चित ही वे घोषणाएँ अन्य घोषणाओं की तरह पूरी नहीं हो पाई। उक्त शिक्षिका ने इसे व्यक्तिगत रूप से नहीं लिया। उसके पीछे एक सामूहिक उद्धार की भावना थी। आगे चलकर भले ही विघायक और शिक्षिका के संबंध मधुर बन गए हों, पर कालांतर में यही मधुर संबंध विधायक की हत्या का कारण बना। शिक्षिका पूरे तीन वर्ष तक उक्त विधायक की हवस का शिकार बनी। विधायक को अपने पद का गुरूर था, इसलिए मामला दबता रहा। उक्त विधायक पर एक और महिला ने भी यौन शोषण का आरोप लगाया था। शिक्षिका ने अपने पर हुए यौन शोषण की शिकायत पुलिस थानं में की थी, पर मामला विधायक का था, इसलिए कोई कार्रवाई नहीं हुई। कानून सबके लिए समान होता है, यह उक्ति इस मामले में काम नहीं आई। विधायक ने मामला दबा दिया, पर महिला के भीतर उपजे आक्रोश को दबा नहीं पाए। इसकी परिणति नृशंस हत्या से हुई।
उक्त शिक्षिका ने विधायक की हत्या नहीं की, बल्कि नारी अस्मिता को बचाए रखने का एक प्रयास किया है। शिक्षिका ने उस जनसमूह का प्रतिनिधित्व किया है, जो आज भी वोट देकर अपने अधिकार भूल जाता है। रूपम पाठक ने लाखों लोगों की संवेदनाओं को अपनी पीड़ा में पिरोकर एक ऐसा काम किया है, जिस मानव बहुत ही विवशता के साथ करता है। अपना काम करने के बाद शिक्षिका का यह कहना कि अब उसे फाँसी पर भी चढ़ा दिया जाए, तो कोई गम नहीं, यह सोचने को विवश करता है कि आखिर वह भीतर से कितनी आक्रामक थी। एक विधायक के व्यवहार के खिलाफ एक शिक्षिका द्वारा शस्त्र उठा लेना एक ऐसा संकेत है, जिसे आज की राजनीति को समझ लेना चाहिए। इसे गहन आक्रोश की परिणति ही कहा जाएगा कि एक नारी ने अपने सबला होने का परिचय दिया है।
इससे यह सबक तो लिया ही जाना चाहिए कि पीड़ितों का हाथ यदि किसी ने न पकड़ा, तो पीड़ित हथियार उठाने में संकोच नहीं करेंगे। ध्यान रहे कि नक्सलवाद का उदय इन्हीं कारणों से हुआ है। जो आज बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल को बुरी तरह से मथ रहा है। विधायक की इस हत्या को राजनीतिक चश्मे से न देखा जाए, बल्कि शोषितों, पीड़ितों को दी जा रही यातनाओं को सामने रखकर देखा जाए, तभी इस मामले की गंभीरता सामने आएगी। यदि इस मामले को राजनीतिक रंग दिया गया,तो संभव है, मामले की लीपापोती हो जाए और हमेशा की तरह उक्त शिक्षिका को आजीवन कारावास दे दिया जाए।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 15 नवंबर 2010

फिर इसी रूप में जिंदा होना चाहते हैं देवानंद

ज्वेल थीफ, हम दोनों, हरे राम हरे कृष्णा और सैकड़ों दूसरी फिल्मों के अलग अलग किरदारों में सामने आ चुके देव आनंद खुद को इसी रूप में दोबारा जिंदा करना चाहते हैं। छह दशक लंबे फिल्मी करियर ने भी काम की भूख खत्म नहीं की। बॉलीवुड में देवानंद को सदाबहार यूं ही नहीं कहा जाता। 87 साल की उम्र में भी उनकी ऊर्जा नौजवानों को परेशान करती है। दुनिया को बताने के लिए उनके पास ढेरों किस्से हैं। उ.हें पता है कि बहुत कुछ करना अब शायद मुमकिन न हो पाए इसलिए दोबारा ज.म लेना चाहते हैं देवानंद बन कर ही। एक इंटरव्यू में देव आनंद ने कहा, ‘मैं हमेशा जल्दबाजी में रहता हूं, क्योंकि वक्त बहुत तेजी से फिसलता जा रहा है और मैं उसके पीछे भाग रहा हूं। मेरे पास बताने को बहुत सी कहानियां हैं लेकिन वक्त नहीं। काश मैं एक बार फिर देव आनंद बन कर जन्म लेता और आप लोगों से 25 साल बाद एक युवा अभिनेता के रूप में मिलता।’ अपने खास अंदाज से लोगों के दिलों पर लंबे समय तक राज करने वाले देव 1961 में आई फिल्म ‘हम दोनों’ का रंगीन संस्कर.ा जारी करने जा रहे हैं। 3 दिसंबर को यह फिल्म सिनेमास्कोप के साथ दुनिया भर में रिलीज होगी। इसके तीन हफ्ते बाद देव आनंद की नई फिल्म ‘चार्जशीट’ रिलीज होगी। देव आनंद ने बताया, ‘सिनेमास्कोप, डिजिटल साउंड और रंगीन प्रिंट के साथ यह फिल्म बिल्कुल नए रूप में सामने आएगी। ऐसा नहीं लगेगा कि हम कोई पुरानी फिल्म देख रहे हैं। यह फिल्म मेरे लिए बेहद खास है क्योंकि मेरी जिंदगी का फलसफा साहिर लुधियानवी के रचे गीत, ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया..’ में ढल गया है।’ नई फिल्म चार्जशीट में देव आनंद ने भी भूमिका निभाई है। फिल्म में उनके अलावा नसीरुद्दीन शाह और जैकी श्रॉफ भी हैं। समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव अमर सिंह ने भी फिल्म में काम किया है। चार्जशीट एक क्राइम थ्रिलर है। देव आनंद ने बताया, ‘यह एक रहस्यमय ह.या की कहानी है जिसमें पुलिस महकमे में मौजूद भ्रष्टाचार को दिखाया गया है।’ हिंदी सिनेमा को ‘गाइड’ और ‘टैक्सी ड्राइवर’ जैसी बेहतरीन फिल्म देने वाला यह दि.गज फिल्मों की रीमेक बनाने के बारे में नहीं सोचता। उन्होंने कहा, ‘मेरे पास छह फिल्मों की स्क्रि.ट तैयार है, जब मैं आज भी सोचने के काबिल हूं तो फिर पुरानी चीजों के पीछे क्यों भागूं? मैं अपनी पुरानी कहानियों को दोहराना नहीं चाहता। हां उन फिल्मों के कुछ- कुछ हिस्से मिलाकर एक फिल्म जरूर बनाना चाहता हूं जिसका नाम होगा, ‘द ग्रोथ ऑफ देव आनंद एज एन एक्टर’। देव को भरोसा है कि उनकी दोनों फिल्मों को लोग पसंद करेंगे। उ.होंने कहा, ‘मैं सिर्फ बनाने के लिए फिल्म नहीं बना रहा, मैं उनसे बहुत .यादा जुड़ा हुआ हूं। मैं बूढ़ा हो रहा हूं लेकिन मैं ऐसा नहीं कहता, न ही खुद को बूढ़ा महसूस करता हूं।’ यह पूछने पर कि क्या ऐसा कुछ बच गया है जो वह अब भी करना चाहते हैं, देव आनंद ने कहा, ‘बहुत कुछ। ऐसे अरबों काम हैं जो मैंने नहीं किए और जि.हें मैं करना चाहता हूं। हर लम्हा नया है और आगे बढ़ रहा है। अगर आप भी उसके साथ आगे बढ़ रहे हैं तो आप महान हैं और हां मैं देवानंद हूं।’

शनिवार, 6 नवंबर 2010

दीप पर्व दीपावली पर आपको लख-लख वधाइयां

 
कई लोगों का मानना हो सकता है कि दीपावली के पर्व को धमाकेदार रहना ही चाहिए। पर आजकल भारी आतिशबाजी से प्रदूषण होने लगा है। और अब इन धमाकों से खुशियां या शुभकामनाएं नहीं मिल रही हैं। मेरे परिवार में दो लोगों को अस्थमा की समस्या है। वो कई दिनों तक अनिद्रा, श्वांस फूलने और उल्टी की टेन्डेंसी से परेशान रहते हैं। इन्हीं तरह के शिकायतों के आधार पर तंग आकर सर्वोच्च न्यायालय ने पटाखों पर रात दस बजे से सुबह छह बजे तक का प्रतिबंध लगाया है। दिल्ली में तो दिल्ली पर्यावरण विभाग को इस निर्देश का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है। आदमी ने तो अपनी सेहत को नापने के लिए कई तरह के यंत्र बना लिए हैं। मेरे छज्जे पर गमले में लगी तुलसी को क्या परेशानी हुई, हमारे पास जानने का इसके लिए कोई यंत्र है क्या? जरा से भी शोर से डर जाने वाली गौरैया के दो-तीन दिन तक चलने वाले अनवरत शोर और धमाकों में रात-दिन कैसे कटते होंगे, कभी सोचा है क्या?दरअसल हम अंदर से खोखले होते जा रहे हैं। खाली होते हमारे अंदर को भरने के लिए हम बाहर के शोर में उमंग, खुशी, ग्लैमर खोजते रहते हैं। अंदर को भरने के किए गये लाख जतन क्या हमें सही खुशी दे पाने में सक्षम हुए हैं। पर्व-त्योहारों को हम सिर्फ धूम-धड़ाका और पूजा-पाठ के कर्मकान्ड के रूप में समझने लगे हैं। जिस अंधकार को दूर करने के लिए ‘दीपक जलाने’ के कर्मकान्ड करते हैं। दीपक तो बचारे एक कोने में दुबक गये हैं। महंगी हजारों रुपये की इलेक्ट्रानिक लड़ियां जिस बिजली से रोशन हो रही हैं। क्या कभी सोचा है कि उसमें रोशनी भरने के लिए कितने लोगों की जिंदगी अंधेरे में डुबो दी जाती है। नर्मदा बांध के उजड़े, टिहरी के विस्थापित, भाखड़ा-नांगल के उजड़े आधी सदी से भटक रहे लोगों और उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश में बन रहे 500 से ज्यादा बांध हजारों-लाखों की जिंदगी को अंधेरे में धकेल देने के बाद ही आपको रोशनी देने में सक्षम हुए हैं। दीपावली पूजा- "तमसो मा ज्योतिर्गमय"- अंधकार से प्रकाश की ओर चलो; अज्ञान से ज्ञान, असत्य से सत्य की ओर तथा जन्म और मृत्यु के चक्र से अमरत्व की ओर चलो; का संदेश देती है। पूजा क्या है? जो हमें ईश्वर से प्राप्त है, उसके प्रति अहसास और कृतज्ञता व्यक्त करना। प्रकाश का देवता सूर्य, हमारे ऋतु-मौसम चक्र का सहभागी चन्द्रमा और लालन-पालनकर्ता पृथ्वी के प्रति समय-समय पर हम कृतज्ञता व्यक्त करते रहते हैं। इन समयों पर पर्व-उत्सव करते हैं, पूजा, अपनी कृतज्ञता और सम्मान दर्शाने का सब से स्वाभाविक तरीका है। वेद के सूत्रों में कहा गया है- 'पृथ्वी, जिसमें बसे हैं सागर-नदी और अन्य जल भंडार, जिसमें अन्न और धान्य के खेत हैं, जिसमें जीते हैं चराचर सभी, वही भूमि हमको दे अपने अपूर्व फल। पृथ्वी जो जाए हैं तुम्हारे- वे हों रोगमुक्त और शोकमुक्त'। अगर कर सकें तो सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी को प्रति कृतज्ञ होवें। अंदर के अंधकार को इलेक्ट्रानिक लड़ियों के प्रकाश से नहीं प्रेम और ज्ञान के प्रकाश से भरें। कबीर साहब की वाणी ‘एक नूर से सब जग उपज्या, कौन भले कौन मन्दे।’ हम सब प्रकाश से ही पैदा हुए हैं। आइंस्टीन ने भी यही कहा है कि द्रव्यमान-ऊर्जा के बीच एक समीकरण है। प्रकाश द्रव्यमान की रचना करता रहता है। हम भूल क्या कर रहे हैं? कबीर कहते हैं "रामहिं थोडा जाणिं करि, दुनिया आगै दीन। जीवां कौं राजा कहैं, माया के आधीन।।" प्रकाश को, प्रकृति को तुच्छ समझ कर इस संसार और इसकी माया को महत्व दे दिया है, तभी तो आदमी अपने को राजा तथा स्वामी समझने की भूल कर बैठा है जो कि वैभव से रहता है और माया के अधीन है।
किसी भी तरह की गुलामी से मुक्ति प्रकाश पर्व पर करने का एक बड़ा काम है। अपने पेड़, पशु-पक्षी और आस-पास के जीवन में प्रकाश कैसे आए, सोचेंगे। प्रेम और ज्ञान का प्रकाश जीवन में आए, इसके लिए मन और सोच के किस-किस अंधेरे की गंठरी फेंकनी है, यह प्रकाश पर्व का एक प्रोग्राम हो सकता है, देखना, निश्चय ही ज्यादा मजा, ज्यादा उमंग आएगा।
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सिराज केसर
TREE (ट्री), ब्लू-ग्रीन मीडिया
47 प्रताप नगर, इंडियन बैंक के पीछे
कीड्स होम के ऊपर, मयूर विहार फेज 1, दिल्ली - 91
मो- 9211530510

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

रेलवे ड्राइवर बनना चाहते थे ओमपुरी

भारतीय सिनेमा जगत में अपने दमदार अभिनय और संवाद अदायगी से ओमपुरी ने लगभग तीन दशक से दर्शको को अपना दीवाना बनाया है लेकिन बहुत कम लोगो को पता होगा कि वह अभिनेता नही बल्कि रेलवे ड्राइवर बनना चाहते थे।  ओम पुरी का जन्म 18 अक्तूबर 1950 को हरियाणा के अंबाला में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। ओमपुरी का बचपन काफी कष्टों में बीता। परिवार की जरुरतों को पूरा करने के लिए उन्हें एक ढाबें में नौकरी तक करनी पड़ी थी। लेकिन कुछ दिनों बाद ढाबे के मालिक ने उन्हें चोरी का आरोप लगाकर हटा दिया। बचपन में ओमपुरी जिस मकान में रहते थे उससे पीछे एक रेलेवे यार्ड था। रात के समय ओमपुरी अक्सर ज्वर से भागकर रेलवे यार्ड में जाकर किसी ट्रेन में सोने चले जाते थे7 उन दिनों उन्हें ट्रेन से काफी लगाव था और वह सोंचा करते कि बड़े होने पर वह रेलवे ड्राइवर बनेगे।  कुछ समय के बाद ओमपुरी अपने ननिहाल पंजाब के पटियाला चले आए जहां उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की7  इस दौरान उनका रुझान अभिनय की ओर हो गया और वह नाटकों में हिस्सा लेने लगे। इसके बाद ओम पुरी ने खालसा कॉलेज में दाखिला ले लिया। इस दौरान ओमपुरी एक वकील के यहां बतौर मुंशी काम करने लगे। इस बीच एक बार नाटक में हिस्सा लेने के कारण वह वकील के यहां काम पर नहीं गए।  बाद में वकील ने नाराज होकर उन्हें नौकरी से हटा दिया। जब इस बात का पता कॉलेज के प्राचार्य को चला तो उन्होंने ओमपुरी को केमिस्ट्री लैब में सहायक की नौकरी दे दी। इस दौरान ओमपुरी कॉलेज में हो रहे नाटकों में हिस्सा लेते रहे। यहां उनकी मुलाकात हरपाल और नीना तिवाना से हुई, जिनके सहयोग से वह पंजाब कला मंच नामक नाटच्य संस्था से जुड़ गए।
 लगभग तीन वर्ष तक पंजाब कला मंच से जुड़े रहने के बाद ओमपुरी ने दिल्ली में राष्ट्रीय नाटच्य विद्यालय में दाखिला ले लिया। इसके बाद अभिनेता बनने का सपना लेकर उन्होंने पुणे फिल्म संस्थान में दाखिला ले लिया। वर्ष 1976 में पुणे फिल्म संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद ओमपुरी ने लगभग डेढ़ वर्ष तक एक स्टूडियो में अभिनय की शिक्षा भी दी। बाद में ओमपुरी ने अपने निजी थिएटर ग्रुप मजमा की स्थापना की।  ओमपुरी ने अपने सिने करियर की शुरुआत वर्ष 1976 में प्रदíशत फिल्म ,घासीराम कोतवाल से की। मराठी नाटक पर बनी इस फिल्म में ओमपुरी ने घासीराम का किरदार निभाया था। इसके बाद ओमपुरी ने गोधूलि ,भूमिका ,भूख ,शायद ,सांच को आंच नहीं जैसी कला फिल्मों में अभिनय किया, लेकिन इससे उन्हें कोई खास फायदा नही पहुंचा। वर्ष 1980 में प्रदíशत फिल्म आक्रोश ओम पुरी के सिने करियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई। गोविन्द निहलानी निर्देशित इस फिल्म में ओम पुरी ने एक ऐसे व्यक्ति का किरदार निभाया जिस पर पत्नी की हत्या का आरोप लगाया जाता है। फिल्म में अपने दमदार अभिनय के लिए ओमपुरी सर्वŸोष्ठ सहायक अभिनेता के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए।  वर्ष 1983 में प्रदíशत फिल्म  अर्धसत्य ओमपुरी के सिने करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाती है। फिल्म में ओमपुरी ने एक पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका निभाई थी। फिल्म में अपने विद्रोही तेवर के कारण ओमपुरी दर्शकों के बीच काफी सराहे गए। फिल्म में अपने दमदार अभिनय के लिए वह सर्वŸोष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किए गए।  वर्ष 1983 में प्रदíशत फिल्म जाने भी दो यारों ओम पुरी के सिने करियर की अहम फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म के जरिए उन्होंने यह साबित कर दिया कि उनकी अभिनय क्षमता सिर्फ विद्रोही या गुस्सैल इंसान की भूमिकाओं तक सीमित नहीं है। हास्य से भरपूर इस फिल्म में ओमपुरी ने जबदस्त हास्य अभिनय से दर्शकों को रोमांचित कर दिया।
अस्सी के दशक के आखिरी वषरे में ओमपुरी ने व्यावसायिक सिनेमा की ओर भी अपना रुख कर लिया। इस दौरान उन्हें न्यू दिल्ली टाइम्स, मरते दम तक ,इलाका ,घायल ,नरसिम्हा जैसी फिल्मों में काम करने का अवसर मिला जिसकी सफलता ने ओम पुरी को व्यावसायिक सिनेमा में भी स्थापित कर दिया।  ¨हदी फिल्मों के अलावा ओमपुरी ने पंजाबी फिल्मों में भी अभिनय किया है। इनमें चान परदेसी, लांग दा लश्कारा, बागी और यारियां जैसी सुपरहिट फिल्में शामिल है। दर्शकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए नब्बे के दशक में ओमपुरी ने छोटे पर्दे की ओर भी रुख किया और, कक्काजी कहिन में अपने हास्य अभिनय से दर्शकों को दीवाना बना दिया।  ओमपुरी ने अपने करियर में कई हॉलीवुड फिल्मों में भी अभिनय किया है। इन फिल्मों में, ईस्ट इज ईस्ट, माई सन द फैनेटिक, द पैरोल ऑफिसर, सिटी ऑफ जॉय, वोल्फ, ,द घोस्ट एंड द डार्कनेस, चार्ली विल्सन वार जैसी फिल्में शामिल है।  ओमपुरी को अपने सिने करियर में कई सम्मान भी मिले। वर्ष 1982 में प्रदíशत आरोहन और वर्ष 1983 में फिल्म अर्धसत्य के लिए उन्हें सर्वŸोष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए 1990 में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया। वर्ष 2009 में ओमपुरी फिल्म फेयर के लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से भी सम्मानित किए गए।  ओमपुरी ने अपने चार दशक लंबे सिने करियर में लगभग 200 फिल्मों में अभिनय किया। उनके करियर की उल्लेखनीय फिल्मों में कुछ है- अल्बर्ट ¨पटो को गुस्सा क्यों आता है, स्पर्श, कलयुग, विजेता,  गांधी मंडी, डिस्को डांसर, गिद्ध, होली, पार्टी, मिर्च मसाला, कर्मयोद्धा, द्रोहकाल, कृष्णा, माचिस, घातक, गुप्त, आस्था, चाची 420, चाइना गेट पुकार,  हेराफेरी, कुरुक्षेत्न, पिता, देव, युवा, हंगामा, मालामाल वीकली,  ¨सह इज ¨कग,  बोलो राम आदि।

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

अनेकता में एकता का प्रतीक, बस्तर का दशहरा

छत्तीसगढ़ के दण्डकारण्य के आदिवासी बाहुल्य बस्तर अंचल का 75 दिन चलने वाला बस्तर दशहरा मात्न एक पर्व और धाíमक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यहाँ रहने वाले विभिन्न वर्गो को एकता के सूत्र में बांधने वाला एक ऐसा अभियान है, जिसकी मिसाल विश्व के किसी भी राजवंश के इतिहास में देखने को नहीं मिलती है। बस्तर अंचल में जहां पर जाति व्यवस्था की जड़ंे बहुत गहरे तक जमीं हैं, जिससे कई जातियां आज भी परंपरागत रूढियों तथा छूआछूत तथा अंधविश्वासों से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाई है। बस्तर के चालुक्य वंश के नरेशो ने इस समाज की कुल देवी मां मणिकश्वरी देवी को मां दंतेश्वरी के रूप में प्रतिष्ठापित किया और इन्हें श्रद्धा भक्ति एवं माई के वाíषकोत्सव बस्तर दशहरा से जोड़कर जातीय समभाव की एक ऐसी आदर्श परंपरा के रूप में स्थापित किया। जो गत 598 वषरे से भाई चारे और एकता की धारा के रूप में अबाध गति से निरंतर प्रवाहित हो रही है।
बस्तर के चालुक्य नरेशो के 624 वषरे के इतिहास में कोई ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक उपलब्धि माई दंतेश्वरी के दंतेवाडा और जगदलपुर स्थित मंदिरों के अलावा कुछ भी नहीं है, लेकिन अपनी कुल देवी के वाíषकोत्सव को जिस तरह से सूझ-बूझ के साथ जन जन की आंतरिक श्रद्धा और सहभागिता की भावना से संयोजित किया वह अदभुत है।

चालुक्य वंश के नरेशों ने क्षेत्रीय एकता की भावना का तिरोहण आदिदेवी मां दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धा व भक्ति को इस रूप में किया कि जो मात्न राजा की भावना तक सीमित न रहकर जन जन की भावनाओं से जुड़ गया। इस वंश के नरेशों ने अपनी कुल देवी के वाíषक उत्सव में इस प्रकार के पूजा विधानों और अनुष्ठानों की व्यवस्था की, जिसमें बस्तर अंचल की समस्त जातियों के सम्मान की व्यवस्था है। प्रत्येक जाति और समाज के लोगों को इस वाíषकोत्सव में विभिन्न उत्तरदायित्वों को अधिकृत रूप से सौंपा गया है। जो संबंधित जाति के लिए जातीय गौरव सम्मान और प्रतिष्ठा का कारण बन गई है। बस्तर दशहरा मूल रूप से माई दंतेश्वरी आदि शक्ति की उपासना का वाíषकोत्सव है। उसका कोई भी सीधा संबंध राम कथा से नहीं है । इसलिए बस्तर दशहरा में रावण वध का कोई विधान नहीं है। बस्तरवासियों के लिए दशहरा शक्ति पूजा का माध्यम है। बस्तर दशहरा पर्व को संचालित करने और विशालकाय रथ की परिक्रमा के लिए समग्र व्यवस्था पूर्व नरेशों ने की थी। जिसके तहत रथ की लकडी ् निर्माण रस्सी बुनने रथ खींचने  सजावट भोजन ् स्वागत सत्कार बलि के बकरों की लाढी बाज गाजे परिक्रमा का संयोजन अनुष्ठान करने वाले जोगी आयोजन की अनुमति और काछनगादी व रैला पूजा किस क्षेत्न किन लोगों द्वारा की जाएगी कि व्यवस्था की गई है। लाखों लोगों की श्रध्दा से जुडे इस महापर्व की सुव्यवस्था भव्य स्वरूप और गरीमा पूर्ण संचालन के मूल में जातीय समभाव का ऐसा अद्भुत और आर्दश स्वरूप देखा जा सकता है जिसकी अन्य कोई मिसाल शायद ही अन्यत्र कहीं देखने को मिले। वषरे से इस जातीय समागम की जिस अनूठी परम्परा का सूत्रपात चालुक्य वंश के नरेशों ने बस्तर दशहरा के रूप में किया था, उसका संचालन आज भी प्रशासनिक स्तर पर उसकी सम्पूर्ण गरिमा भव्यता और आदर्श भावनाओं के साथ सतत रूप से किया जा रहा है। जिसकी अनुगूँज राष्ट की सीमा से परे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुनी जाने लगी है। इस महापर्व का अदभूत आकर्षण विदेशी सैलानियों, इतिहासकारों, पुरातात्विक विषेषज्ञों और समाजशाियों को बरबस बस्तर तक खींच लाता है। जो बस्तर दशहरा के महत्व को दर्शाने वाला ज्वंलत प्रतीक है।