शनिवार, 21 अप्रैल 2018

मानवता का अप्रतिम उदाहरण।

कल बाज़ार में फल खरीदने गया, तो देखा कि एक फल की रेहड़ी की छत से एक छोटा सा बोर्ड लटक रहा था, उस पर मोटे अक्षरों से लिखा हुआ था...
"घर मे कोई नहीं है, मेरी बूढ़ी माँ बीमार है, मुझे थोड़ी थोड़ी देर में उन्हें खाना, दवा और टॉयलट कराने के लिए घर जाना पड़ता है, अगर आपको जल्दी है तो अपनी मर्ज़ी से फल तौल लें, रेट साथ में लिखे हैं।
पैसे कोने पर गत्ते के नीचे रख दें, धन्यवाद!!"
अगर आपके पास पैसे नहीं हो तो मेरी तरफ से ले लेना, इजाज़त है..!!

मैंने इधर उधर देखा, पास पड़े तराजू में दो किलो सेब तोले दर्जन भर केले लिये, बैग में डाले, प्राइस लिस्ट से कीमत देखी, पैसे निकाल कर गत्ते को उठाया, वहाँ सौ-पचास और दस-दस के नोट पड़े थे, मैंने भी पैसे उसमें रख कर उसे ढंक दिया।

बैग उठाया और अपने फ्लैट पे आ गया, रात को खाना खाने के बाद मैं उधर से  निकला, तो देखा एक कमज़ोर सा आदमी, दाढ़ी आधी काली आधी सफेद, मैले से कुर्ते पजामे में रेहड़ी को धक्का लगा कर बस जाने ही वाला था, वो मुझे देखकर मुस्कुराया और बोला "साहब! फल तो खत्म हो गए।"

उसका नाम पूछा तो बोला: "सीताराम"
फिर हम सामने वाले ढाबे पर बैठ गए।
चाय आयी, वो कहने लगा, "पिछले तीन साल से मेरी माता बिस्तर पर हैं, कुछ पागल सी भी हो गईं है और अब तो फ़ालिज भी हो गया है, मेरी कोई संतान नहीं है, बीवी मर गयी है, सिर्फ मैं हूँ और मेरी माँ..!!
माँ की देखभाल करने वाला कोई नहीं है, इसलिए मुझे ही हर वक़्त माँ का ख्याल रखना पड़ता है"...

एक दिन मैंने माँ के पाँव दबाते हुए बड़ी नरमी से कहा, "..माँ!! तेरी सेवा करने को तो बड़ा जी चाहता है पर जेब खाली है और तू मुझे कमरे से बाहर निकलने नहीं देती, कहती है, तू जाता है तो जी घबराने लगता है, तू ही बता मै क्या करूँ?"
न ही मेरे पास कोई जमा पूंजी है।..

ये सुन कर माँ ने हाँफते-काँपते उठने की कोशिश की। मैंने तकिये की टेक लगवाई, उन्होंने झुर्रियों वाला चेहरा उठाया अपने कमज़ोर हाथों को ऊपर उठाया,
मन ही मन राम जी की स्तुति की फिर बोली..
"तू रेहड़ी वहीं छोड़ आया कर, हमारी किस्मत का हमें  जो कुछ भी है, इसी कमरे में बैठकर मिलेगा।"

मैंने कहा, "माँ क्या बात करती हो, वहाँ छोड़ आऊँगा तो कोई चोर उचक्का सब कुछ ले जायेगा, आजकल कौन लिहाज़ करता है? और बिना मालिक के कौन फल खरीदने आएगा?"

कहने लगीं.. "तू राम का नाम लेने के बाद बाद रेहड़ी को फलों से भरकर छोड़ कर आजा बस, ज्यादा बक-बक नहीं कर, शाम को खाली रेहड़ी ले आया कर, अगर तेरा रुपया गया तो मुझे बोलियो!"

ढाई साल हो गए हैं भाईसाहब सुबह रेहड़ी लगा आता हूँ ...शाम को ले जाता हूँ, लोग पैसे रख जाते हैं..
..फल ले जाते हैं, एक धेला भी ऊपर नीचे नहीं होता, बल्कि कुछ तो ज्यादा भी रख जाते हैं, कभी कोई माँ के लिए फूल रख जाता है, कभी कोई और चीज़!!

परसों एक बच्ची पुलाव बना कर रख गयी,
साथ में एक पर्ची भी थी "अम्मा के लिए!"

एक डॉक्टर अपना कार्ड छोड़ गए पीछे लिखा था,
'माँ की तबियत नाज़ुक हो तो मुझे कॉल कर लेना,
मैं आ जाऊँगा, कोई ख़जूर रख जाता है, रोजाना कुछ न कुछ मेरे हक के साथ मौजूद होता है।

न माँ हिलने देती है न मेरे राम कुछ कमी रहने देते हैं, माँ कहती है, तेरे फल मेरा राम अपने फरिश्तों से बिकवा देता है।

आखिर में, इतना ही कहूँगा की अपने मां -बाप की सेवा करो, और देखो दुनिया की कामयाबियाँ कैसे हमारे कदम चूमती हैं।...
💐💐🙏🙏
लेखक अज्ञात

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

ये लौकी भगवान ने क्यों बनाई ??

इसकी दो वजह हो सकती है ! पहली बात तो ये कि वो यह चाहते हों कि औरतो के पास कम से कम एक आध तो ऐसा मारक हथियार तो हो ही जिससे वो आदमियो को परास्त कर सके !औरत लौकी बनाये बिना रह नही सकती ! लौकी नाराजगी जताने का सबसे कारगर तरीका है औरतो का ! थाली मे लौकी देखते ही बेवकूफ से बेवकूफ आदमी ये समझ जाता है कि उससे कोई बडी चूक हो चुकी है !आदमी लौकी की वजह से ही दबता है अपनी बीबी से ! कायदे से रहता है ! आदमी को तमीज सिखाने का क्रैडिट यदि किसी को दिया जा सकता है तो वो लौकी ही है !

मेरी यह समझ मे यह बात कभी आयी नही कि लौकी से कैसे निपटें ! लौकी आती है थाली में तो थाली थरथराने लगती है ! रोटियाँ मायूस होकर किसी कोने मे सिमट जाती हैं ! जीभ लटपटा जाती है ! आप अचार, चटनी, पापड या दही के भरोसे हो जाते हैं ! हर कौर के बाद पानी का गिलास तलाशते हैं आप ! आपको लगने लगता है कि आपकी तबियत खराब है, आप ICU मे भर्ती हैं ! बंदा डिप्रेशन मे चला जाता है ! दुनिया वीरान वीरान सी महसूस होती है !  कुछ अच्छा होने की कोई उम्मीद बाकी नही रह जाती ! मन गिर जाता है ! लगता है अकेले पड गये हैं !  दरअसल लौकी, लौकी नही होती, वो आपकी बीबी की इज्जत का सवाल होती है ! आप पूरी हिम्मत करके लौकी का एक एक निवाला गले से नीचे उतारते है ! बीबी सामने बैठी होती है ! जानना चाहती है लौकी कैसी बनी ! आप बीबी का मन रखने के लिये झूठ बोलना चाहते हैं पर लौकी झूठ बोलने नही देती ! लौकी की खासियत है ये ! इसे खाते हुये आदमी हरीशचन्द्र हो जाता है !

 आप चाहते हुये भी लौकी की तारीफ नही कर पाते !

मेरा ख्याल से बंदे को शादी करने के पहले यह पता लगाने की कोशिश जरूर करनी चाहिये कि उसकी होने वाली बीबी लौकी से प्यार तो नही करती ! वैसे ऐसी लडकी मिल भी जाये तो इसकी कोई गारंटी नही कि शादी होने के बाद उसका झुकाव लौकी की तरफ नही हो जायेगा !  दुनिया मे ऐसी लडकी अब तक पैदा ही नही हुई है जो बीबी की पदवी हासिल कर लेने के बाद पति को सबक सिखाने के लिये लौकी का सहारा लेने से परहेज करे ! जब तक जहर इजाद नही हुआ था तब तक आदमी दुश्मनो को मारने के लिये लौकी का ही इस्तेमाल किया करता था ! लम्बे टाईम से टिके मेहमान को दरवाजा दिखाने के लिये लौकी से बेहतर और कोई तरीका नही ! थाली में हर दूसरे वक्त लगातार लौकी के दर्शन कर ढीट से ढीट मेहमान भी समझ जाता है कि अब चला चली का वक्त आ गया है !

पर एक तारीफ तो करनी ही पडेगी इस लौकी की ! न्यायप्रिय होती है ये ! सब को एक सा दुख देती है ! स्वाभिमानी भी होती है ये ! अपने मूल स्वभाव और कर्तव्यो  से कभी नही डिगती ! लाख मसाले, तेल डाल दें आप इसमे ! ये पट्ठी टस से मस नही होती ! आप मर जायें सर पटक कर पर लौकी हमेशा लौकी ही बनी रहती है ! एक बात और जो मेरी समझ मे कभी नही आई कि  लौकी खाने से ही क्लोरेस्ट्राल क्यो कम होता है ! ये भी भगवान का मजाक ही है आदमी के साथ ! ये काम गुलाब जामुन और काजू कतली  को भी सौंप सकता था वो ! पर ऐसा किया नही उन्होने ! जानबूझ कर लौकी को ही सौंपी ये जिम्मेदारी...।


व्यंग्यकार अज्ञात

सुनो लड़कियो

सुनो लड़कियों,
जो कर सको तो इतना करना,
कि तुम्हारी अगली आने वाली नस्लों की हर बेटी को,
खिलौने के नाम पर बस किचन सेट ना मिले,
तुम उन्हें भी बंदूकों से खेलने देना।

जो कर सको तो इतना करना,
कि चाहे रोटी गोल बनाना ना सिखा सको उसको,
जूडो कराटे सिखा देना,
ताकि आँखों में आँखें डाल मुँह नोच सके वो,
वहशी हैवानों, दरिंदों का।

सुनो लड़कियों,
जब माँ बनो बरसों बाद,
तो याद करना वो सारे लम्हें,
जब माँ ने मुँह फेर लेने को कहा था,
जब दादी ने किसी से ना कहने को कहा था,
जब आँखों ही आँखों में दी घुड़की से सहमी थी तुम,
जब किसी अधेड़ ने बेशर्मी से हँसते हुए छुआ था,
उन अनगिनत लम्हों को बेबाकी से गिना देना तुम,
आने वाली नस्ल के हर ‘नर’ और बेटियों को,
ताकि बेटियाँ चुप ना रहना सीखें,
ताकि नर, बेटे बनना सीखें,
तुम इन लम्हों को यूँ ही ज़ाया मत होने देना।

और कर सको तो ये भी करना,
कि जब तुम्हारा लाडला चिराग,
थोड़ी सी चोट खाकर रोने लगे,
तो कोई ये ना कहे उसको,
‘लड़की है क्या? बात बात पर रो देता है’
सुनो तुम उसे रोना ज़रूर सिखा देना।

जो कर सको तो अपने लाडले के कॉलेज के पहले दिन ही,
समझाना उसे बिठा, बेझिझक और बेबाक
कि उसकी और उसके जैसे लाडलों की
माँओं, चाचियों और दीदियों ने क्या सहा है,
उनको किसने, कैसे, कब और कहाँ जबरदस्ती छुआ है,
तुम उसे इस नस्ल के मर्दों सा मत होने देना।

सुनो लड़कियों,
जो कर सको तो इतना करना,
कि टोक सको अपने प्रेमियों, पिताओं और भाइयों को हर गाली पर,
कि किसी से कपड़ों से उसकी तरफ़ बढ़ने से हिचकें तुम्हारे दोस्त,
कि अनसुना ना करो अपने बेटे के दोस्तों के मजाक,
कि आटा, सब्जियों और चावल की मात्रा तय करने तक ना रह जाये तुम्हारी भूमिका घर में,
जो कर सको तो इतना करना,
कि हमारी आने वाली नस्ल बेहतर बन सके,
कि आने वाली दुनिया इतनी घिनौनी ना हो,
कि बेटियों के लिए अभ्यारण्य ना बनाने पड़ें,
कि इंसानियत हर पल घुटती ना हो।
 
सुनो लड़कियों तुमसे गुजारिश है,
कि कर सको तो इस दुनिया को अपने लायक बना लेना

कवि-अज्ञात


बुधवार, 11 अप्रैल 2018

तब आप मरने लगते हैं...

नोबेल पुरस्कार विजेता ब्राजीली कवयित्री  मार्था मेरिडोस की कविता "You Start Dying Slowly" का हिन्दी अनुवाद..

1) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
- करते नहीं कोई यात्रा,
- पढ़ते नहीं कोई किताब,
- सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
- करते नहीं किसी की तारीफ़।

2) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप:
- मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,
- नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की।

3) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
- बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
- चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
- नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,
- नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग, या
- आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।

4) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
- नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को, और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को, वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें, और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को।

5) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
- नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को, जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
- अग़र आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,
- अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,
- अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को, अपने जीवन में कम से कम एक बार, किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की..।
तब आप धीरे-धीरे मरने  लगते हैं..!!

*इसी कविता के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ।

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

निरर्थक सौंदर्य

एक सभ्रांत प्रतीत होने वाली अतीव सुन्दरी ने विमान में प्रवेश किया और अपनी सीट की तलाश में नजरें घुमाईं। उसने देखा कि उसकी सीट एक ऐसे व्यक्ति के बगल में है जो जिसके दोनों ही हाथ नहीं है। महिला को उस अपाहिज व्यक्ति के पास बैठने में झिझक हुई ! उस 'सुंदर' महिला ने एयरहोस्टेस को कहा कि वह उसके लिए नियत सीट पर सुविधापूर्वक यात्रा नहीं कर पायेगी, क्योंकि साथ की सीट पर एक दोनों हाथ विहीन व्यक्ति बैठा हुआ है | उस सुन्दरी ने एयरहोस्टेस से सीट बदलने हेतु आग्रह किया |  असहज हुई एयरहोस्टेस ने पूछा, "मैम क्या मुझे कारण बता सकती है"?
'सुंदर' महिला ने जवाब दिया: "मैं ऐसे लोगों को पसंद नहीं करती। मैं ऐसे व्यक्ति के पास बैठकर यात्रा नहीं कर पाऊँगी "।  दिखने में सभ्रांत और विनम्र प्रतीत होने वाली महिला के यह उद्गार सुनकर एयर हॉस्टेज़ अचंभित हो गई । सुन्दरी ने एक बार फिर एयरहोस्टेस से जोर देकर कहा कि मैं उस सीट पर नहीं बैठ सकती और मुझे कोई दूसरी सीट दे दी जाए । एयरहोस्टेस ने खाली सीट की तलाश में चारों ओर नजर घुमाई, पर कोई भी सीट खाली नहीं दिखी । एयरहोस्टेस ने महिला से कहा कि "मैडम इस इकोनोमी क्लास में कोई सीट रिक्त नहीं है, किन्तु यात्रियों की सुविधा का ध्यान रखना हमारा दायित्व है, अतः मैं वायुयान के कप्तान से बात करती हूँ, कृपया तब तक थोडा धैर्य रखें "। ऐसा कहकर होस्टेस कप्तान से बात करने चली गई |
कुछ समय बाद उसने लौट कर महिला को बताया, "महोदया! आपको जो असुविधा हुई, उसके लिए बहुत खेद है, इस पूरे विमान में, केवल एक सीट खाली है और वह प्रथम श्रेणी में है। मैंने हमारी टीम से बात की और हमने एक असाधारण निर्णय लिया। एक यात्री को इकोनॉमी क्लास से प्रथम श्रेणी में भेजने का कार्य हमारी कंपनी के इतिहास में पहली बार हो रहा है ... "। 'सुंदर' महिला अत्यंत प्रसन्न हो गई, किन्तु इसके पहले कि वह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती और एक शब्द भी बोल पाती ... एयरहोस्टेस उस अपाहिज और दोनों हाथ विहीन व्यक्ति की ओर बढ़ गई और विनम्रता पूर्वक उनसे पूछा "सर, क्या आप प्रथम श्रेणी में जा सकेंगे ? क्योंकि हम नहीं चाहते कि आप एक अशिष्ट यात्री के साथ यात्रा करने की त्रासदी भुगतें । " यह सुनकर प्रत्येक यात्री ने ताली बजाकर इस निर्णय का स्वागत किया। वह अतीव सुन्दरी महिला तो अब शर्म से नजरें ही नहीं उठा पा रही थी।
तब उस अपाहिज व्यक्ति ने खड़े होकर कहा, "मैं एक भूतपूर्व सैनिक हूँ और मैंने एक ऑपरेशन के दौरान कश्मीर सीमा पर हुए बम विस्फोट में अपने दोनों हाथ खोये थे । सबसे पहले, जब मैंने इन देवी जी की चर्चा सुनी, तब मैं सोच रहा था: मैंने भी किन लोगों की सुरक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाली और अपने हाथ खोये ? लेकिन जब आप सभी की प्रतिक्रिया देखी, तो अब अपने आप पर गर्व महसूस हो रहा है कि मैंने अपने देश और देशवासियों की खातिर अपने दोनों हाथ खोये । "और इतना कह कर, वह प्रथम श्रेणी में चले गए।
'सुंदर' महिला पूरी तरह से शर्मिंदा होकर सर झुकाए सीट में गड़ गई। उस अतीव  सौंदर्य का भी कोई मूल्य नहीं अगर विचारों में उदारता न हो ...
लेखक- अज्ञात

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

औरत, तू उठा कल, कर हस्ताक्षर

औरत की बेफिक्र चाल,
धक्-सी लगती है किसी को,

औरत की हँसी,
बेपरवाह-सी लगती है किसी को,

औरत का नाचना,
बेशर्म होना-सा लगता है किसी को,

औरत का बेरोक-टोक, यहाँ -वहाँ, आना-जाना,
स्वछन्द -सा लगता है किसी को,

औरत का प्रेम करना,
निर्लज्ज होना-सा लगता है किसी को,

औरत का सवाल करना,
हुकूमत के खिलाफ-सा लगता है किसी को!!

औरत,
तू समझती है न यह जाल!!

〰➿➰➿〰

लेकिन...,

औरत...,

तू चल अपनी चाल,
कि,नदी भी बहने लगे,
तेरे साथ-साथ!

तू ठठाकर हँस,
कि, बच्चे भी खिलखिलाने लगें,
तेरे साथ-साथ!

तू नाच,
कि, पेड़ भी झूमने लगें,
तेरे साथ-साथ!

तू नाप,धरती का कोना-कोना,
कि, दुनिया का नक्शा उतर आए,
तेरी हथेली पर!

तू कर प्रेम,
कि,अब लोग प्रेम करना भूलते जा रहे हैं!

तू कर हर वो सवाल,
जो तेरी आत्मा से बाहर निकलने को,
धक्का मार रहा हो!

तू उठा कलम,
और कर हस्ताक्षर...
अपने चरित्र प्रमाण पत्र पर,

कि, तेरे चरित्र प्रमाण पत्र पर,
अब किसी और के हस्ताक्षर,
अच्छे नहीं लगते.!!

-अज्ञात

रविवार, 1 अप्रैल 2018

ऑफिस में नींद आना एक खतरनाक बीमारी

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​अजी नींद तो बहुत ही जरूरी चीज़ है, लेकिन यह ऑफिस के समय आ जाए तो मुसीबत बन जाती है। काम करते हुए आंखें बंद होने लगें, थकान महसूस होने लगे और अगर ऐसे मौके पर नींद लेने का मौका ना मिले, तो बस सिरदर्द शुरू हो जाता है। ऐसे में करें तो क्या करें...
अगर बॉस को पता चल गया कि हम काम छोड़कर नींद की नदी में गोते लगाने की तैयारी में हैं तो वह हमारी हमेशा के लिए काम से छुट्टी कर देंगे। ऐसी हालत अमूमन उन लोगों की होती है जो एक जगह पर बैठकर काम करते हैं। जो इधर-उधर घूमकर काम करने के आदी होते हैं, उनकी नींद चलने-फिरने से ही काफी हद तक गायब हो जाती है।
लेकिन घंटों कम्प्यूटर स्क्रीन के सामने बैठकर काम करने वालों के लिए तो नींद के साथ-साथ कम्प्यूटर की स्क्रीन भी एक बड़ी चुनौती बन जाती है। मैं किसी अन्य इंसान का क्यों, बल्कि स्वयं अपना ही उदाहरण दे सकती हूं। ऑफिस में घंटों लैपटॉप के सामने बैठने के बाद जब आंखें थक जाती हैं तो उन्हें खोल सकना भी एक कठिन टास्क बन जाता है।
और अगर साथ ही नींद भी आ रही हो तो शायद गर्मागर्म चाय भी उसे भगा नहीं सकती। ऐसे में तो मन करता है कि एक कोई ज़ोरदार धमाका हो जिससे दिमागी नसें खुल जाएं और यह नींद उड़ जाए। क्योंकि ऑफिस में आने के बाद आराम करने की अपेक्षा आप सपने में भी नहीं कर सकते, आपको कैसे भी करके काम को पूरा करना ही है।

जानें कुछ कारण

एक शोध के मुताबिक ऑफिस के दौरान भी नींद आने के कुछ विशेष कारण सामने आए हैं। पहला कारण उन लोगों से जुड़ा है जो रात के समय पूरी नींद लेने में असमर्थ रहते हैं। ऐसे में वे शायद ऑफिस आकर काम कर भी लेते हैं, लेकिन दिमाग नींद की ओर होने की वजह से वे खुली आंखों से भी बंद आंखों के समान काम करते चले जाते हैं और परिणाम यह होता है कि कोई भी काम ठीक तरीके से नहीं होता।
लेकिन जो नींद पूरी लेते हैं उनका क्या? सच में ऐसे कई लोग होते हैं जो रात में जरूरत के अनुसार आराम से 7 से 8 घंटे की नींद ले लेते हैं और सुबह फिर भी मुश्किल से उठते हैं। इतना ही नहीं, उठने के बाद नहाकर और फिर तैयार होकर ऑफिस आ तो जाते हैं, लेकिन नींद उन पर नशे की तरह चढ़ी रहती है।

काम में मन नहीं लगता

ऐसे में वे काम में मन नहीं लगा पाते। इसका एक कारण हो सकता है कि उनकी शारीरिक एवं मानसिक थकान की तुलना में जितनी नींद की उन्हें आवश्यकता है शायद वह उन्हें नहीं मिल रही। लेकिन दूसरा कारण उनमें शारीरिक रूप से कुछ कमियां होना हो सकता है। ऐसे में इन लोगों को जरूरत है तो एक डॉक्टर की।

व्यायाम है फायदेमंद

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​किन्तु यदि ऐसी कोई परेशानी नहीं है और फिर भी अपने आलसी स्वभाव के कारण आपको रोज़ ऑफिस में नींद आती है, तो कुछ टिप्स जरूर आजमाएं। विशेषज्ञों की राय में ऐसे में व्यक्ति को व्यायाम करने की जरूरत है। रोज़ाना कसरत करने से वह दिमागी नसों को जागरुक कर सकता है।
ऐसे लोगों को ऐरोबिक्स करनी चाहिए, जो ना केवल शरीर में स्फूर्ति लाती है बल्कि एक ऐसी ऊर्जा प्रदान करती है, जिससे हम हमेशा तरोताजा महसूस करते हैं। फिर ऐसे में बिना वजह नींद का आना असंभव सी बात है।
लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक बार-बार नींद आने का एक और कारण भी हो सकता है। यह है एक प्रकार की बीमारी, जिसे चिकित्सकीय दुनिया “हायपरसोम्निया” के नाम से जानती है। आम भाषा में हम इसे जरूरत से अधिक नींद आने की तकलीफ भी कह सकते हैं।

हायपरसोम्निया

हायपरसोम्निया से पीड़ित वे लोग होते हैं जो हर थोड़े समय के बाद नींद आने की शिकायत रखते हैं। जैसे कि सुबह उठने के बाद भी जब दोबारा बिस्तर पर जाने का मन करे। इसके अलावा कहीं भी बैठे-बैठे सो जाना, साथ ही भोजन करने या फिर अनचाहे समय पर नींद आना, जबकि उनकी रात की नींद जरूरत के अनुसार पूरी हुई थी।
फिर भी बार-बार नींद आने की यह परेशानी ही उस इंसान को हायपरसोम्निया से पीड़ित होना मानती है। ऐसे लोग यदि गलती से गहरी नींद में चले जाएं, तो कुछ भी हो जाए, लेकिन इन्हें उठा सकना एक मुश्किल कार्य हो जाता है। लेकिन इसका एक ही हल डॉक़्टरों को दिखाई देता है, और वो है ऐरोबिक्स करना।
इस बीमारी पर शोध कर रहे शोधकर्ताओं ने कुछ लोगों को एकत्रित करके उनके ब्लड सैम्पल लिए। यह वे लोग थे जो इस बीमारी से ग्रस्त हैं, लेकिन इससे निजात पाने के लिए ऐरोबिक्स कर रहे हैं। इस वर्ग के लोगों का जब डॉक्टरों ने ब्लड सैम्पल लिया तो उन्हें काफी आश्चर्यजनक तथ्य हासिल हुए।

एक कारण है डिप्रेशन

इस टेस्ट में डॉक्टरों ने देखा कि शोध का हिस्सा बनने वाले लोगों में से कम से कम 100 लोग ऐसे थे जो डिप्रेशन का शिकार थे। यह डिप्रेशन ही उनमें हायपरसोम्निया जैसी बीमारी को पैदा होने दे रहा है, जिसके कारण वे घंटों तक सोते रहते हैं और उठने के बाद भी दोबारा सोने की ख्वाहिश रखते हैं।
लेकिन यही लोग जब ऐरोबिक्स को अपना रहे हैं तो यह व्यायाम उनके दिमाग में पनपने वाले दो खास विकारों को खत्म कर रहा है। यानी कि डिप्रेशन जैसे हालात में ऐरोबिक्स काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। तो यदि सच में आप इतना सोने के आदी हो गए हैं तो डॉक्टर की सलाह के साथ ऐरोबिक्स भी जरूर आज़माएं।