मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

जीवन में दोस्त ज़रूरी है


 

मैं अपने पिता के साथ, सोफे पर कभी नहीं बैठा था I अपने विवाह के बाद तो मैं उनसे अलग ही रह रहा था।

अपने विवाह के बाद, बहुत साल पहले, एक गर्म उमस भरे दिन, मैं अपने घर उनके आगमन पर, उनके साथ सोफे पर बैठा, बर्फ जैसा ठंडा जूस सुड़क रहा रहा था I

जब मैं अपने पिता से, विवाह के बाद की व्यस्क जिंदगी, जिम्मेदारियों और उम्मीदों के बारे में अपने ख़यालात का इज़हार कर रहा था, तब वह अपने गिलास में पड़े बर्फ के टुकड़ों को स्ट्रा से इधर उधर नचाते हुए, बहुत गंभीर और शालीन खामोशी से मुझे सुनते जा रहे थे I       

अचानक उन्होंने कहा, "अपने दोस्तों को कभी मत भूलना !" उन्होंने सलाह दी, " तुम्हारे दोस्त उम्र के ढलने पर पर तुम्हारे लिए और भी महत्वपूर्ण और ज़रूरी हो जाएँगे I"

"बेशक अपने बच्चों, बच्चों के बच्चों और उन सभी के जान से भी ज़्यादा प्यारे परिवारों को रत्ती भर भी कम प्यार मत देना, मगर अपने पुराने, निस्वार्थ और सदा साथ निभानेवाले दोस्तों को हरगिज़ मत भुलाना I वक्त निकाल कर, उनके साथ समय ज़रूर बिताना I मौज मस्ती करना I उनके घर खाना खाने जाना और जब मौक़ा मिले उनको अपने घर बुलाना I कुछ ना हो सके तो फोन पर ही जब तब, हाल चाल पूछ लिया करना I"     

"क्या बेतुकी, विचित्र और अटपटी सलाह हैI" मैंने मन ही मन सोचा I

मैं नए नए विवाहित जीवन की खुमारी में था और बुढऊ मुझे यारी-दोस्ती के फलसफे समझा रहे थे I

मैंने सोचा, "क्या जूस में भी नशा होता है, जो ये बिन पिए बहकी बहकी बातें करने लगे? आखिर मैं अब बड़ा हो चुका हूँ, मेरी पत्नी और मेरा होने वाला परिवार मेरे लिए जीवन का मकसद और सब कुछ है I दोस्तों का क्या मैं अचार डालूँगा?"

लेकिन मैंने आगे चल कर, एक सीमा तक उनकी बात माननी जारी रखी I मैं अपने गिने-चुने दोस्तों के संपर्क में लगातार रहा I संयोगवश समय बीतने के साथ उनकी संख्या भी बढ़ती ही रही I

कुछ वक्त बाद मुझे



अहसास हुआ कि उस दिन मेरे पिता 'जूस के नशे' में नहीं उम्र के खरे तजुर्बे से मुझे समझा रहे थेI  उनको मालूम था कि उम्र के आख़िरी दौर तक ज़िन्दगी क्या और कैसे करवट बदलती हैI      

हकीकत में ज़िन्दगी के बड़े से बड़े तूफानों में दोस्त कभी मल्लाह बनकर, कभी नाव बन कर साथ निभाते हैं और कभी पतवार बन कर I कभी वह आपके साथ ही ज़िन्दगी की जंग में, कूद पड़ते हैं I

सच्चे दोस्तों का काम एक ही होता है- दोस्ती I उनका मजहब भी एक ही होता है- दोस्ती I उनका मकसद भी एक ही होता है- दोस्ती !   

ज़िन्दगी के पचास साल बीत जाने के बाद मुझे पता चलने लगा कि घड़ी की सुइंयाँ पूरा चक्कर लगा कर वहीं पहुँच गयीं थी, जहाँ से मैंने जिंदगी शुरू की थी I

विवाह होने से पहले मेरे पास सिर्फ दोस्त थेI विवाह के बाद बच्चे हुए I बच्चे बड़े हुएI उनकी जिम्मेदारियां निभाते निभाते मैं बूढा हो गयाI बच्चों के विवाह हो गएI उनके कारोबार चालू हो गए I अलग परिवार और घर बन गएI बेटियाँ अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गयीं I बेटे बेटियों के बच्चे कुछ समय तक दादा-दादी और नाना-नानी के खिलौने रहेI उसके बाद उनकी रुचियाँ मित्र मंडलियाँ और जिंदगी अलग पटरी पर चलने लगींI          

अपने घर में मैं और मेरी पत्नी ही रह गए I 

वक्त बीतता रहा I नौकरी का भी अंत गया I साथी-सहयोगी और प्रतिद्वंद्वी मुझे बहुत जल्दी भूल गएI

जिस मालिक से मैं पहले कभी छुट्टी मांगने जाता था, तो जो आदमी  मेरी मौजूदगी को कम्पनी के लिए  जीने-मरने का सवाल बताता था, वह मुझे यूं भूल गया जैसे मैं कभी वहाँ काम करता ही नहीं थाI

एक चीज़ कभी नहीं बदली, मेरे मुठ्ठी भर पुराने दोस्त I मेरी दोस्तियाँ ना तो कभी बूढ़ी हुईं, ना रिटायर I

आज भी जब मैं अपने दोस्तों के साथ होता हूँ, लगता है अभी तो मैं जवान हूँ और मुझे अभी बहुत से साल ज़िंदा रहना चाहिए I   

सच्चे दोस्त जिन्दगी की ज़रुरत हैं, कम ही सही कुछ दोस्तों का साथ हमेशा रखिये, साले कितने भी अटपटे, गैरजिम्मेदार, बेहूदे और कम अक्ल क्यों ना हों, ज़िन्दगी के बेहद खराब वक्त में उनसे बड़ा योद्धा और चिकित्सक मिलना नामुमकिन हैI 

अच्छा दोस्त दूर हो चाहे पास हो, आपके दिल में धडकता है I

सच्चे दोस्त उम्र भर साथ रखिये I जिम्मेदारियां निभाइए I

लेकिन हर कीमत पर यारियां बचाइये I उनको सलामत रखियेI

ये बचत उम्र भर आपके काम आएगी I🙏🙏

गुरुवार, 27 जनवरी 2022

शब्दों का संसार

 

शब्द रचे जाते हैं,

शब्द गढ़े जाते हैं,

शब्द मढ़े जाते हैं,

शब्द लिखे जाते हैं,

शब्द पढ़े जाते हैं,

शब्द बोले जाते हैं,

शब्द

तौले जाते हैं,

शब्द टटोले जाते हैं,

शब्द खंगाले जाते हैं,

#अंततः

शब्द बनते हैं,

शब्द

संवरते हैं,

शब्द सुधरते हैं,

शब्द निखरते हैं,

शब्द हंसाते हैं,

शब्द मनाते हैं,

शब्द

रूलाते हैं,

शब्द मुस्कुराते हैं,

शब्द खिलखिलाते हैं,

शब्द गुदगुदाते हैं,

शब्द मुखर हो

जाते हैं,

शब्द प्रखर हो जाते हैं,

शब्द मधुर हो जाते हैं,

फिर भी-

शब्द चुभते हैं,

शब्द

बिकते हैं,

शब्द रूठते हैं,

शब्द घाव देते हैं,

शब्द ताव देते हैं,

शब्द लड़ते हैं,

शब्द

झगड़ते हैं,

शब्द बिगड़ते हैं,

शब्द बिखरते हैं

शब्द सिहरते हैं,

#किंतु-

शब्द मरते

नहीं,

शब्द थकते नहीं,

शब्द रुकते नहीं,

शब्द चूकते नहीं,

अतएव-

शब्दों से खेले

नहीं,

बिन सोचे बोले नहीं,

शब्दों को मान दें,

शब्दों को सम्मान दें,

शब्दों पर ध्यान

दें,

शब्दों को पहचान दें,

ऊँची लंबी उड़ान दे,

शब्दों को आत्मसात करें...

उनसे उनकी

बात करें,

शब्दों का अविष्कार करें...

गहन सार्थक विचार करें,

क्योंकि-

शब्द

अनमोल हैं...

ज़ुबाँ से निकले बोल हैं,

शब्दों में धार होती है,

शब्दों की महिमा अपार होती है

शब्दों का विशाल भंडार होता है,

और सच तो यह है कि-

शब्दों का अपना

एक संसार होता है

मंगलवार, 18 जनवरी 2022

छत्तीसगढ़ का लोकपर्व छेरछेरा


साधिकार भेंट लेने और उदारता से भेंट देकर आत्मसंतुष्ट होने का पर्व है - छेरछेरा

हमारे छत्तीसगढ़ राज्य में पौष पूर्णिमा तिथि पर छेरछेरा पर्व मनाया जाता है। यह खरीफ़ सीजन के समस्त कृषि कार्य सम्पन्न हो जाने की खुशी में मनाया जाने वाला कृषि लोकपर्व है। छेरछेरा का आशय खरीफ सीजन के समूचे कृषि कार्य का पूरे अंचल में सम्पन्न, अंतिम,आखिरी,चरम या पूर्ण हो जाना है।जब व्यक्तिगत एक कृषक की खरीफ सीजन फसल की मिंजाई का काम जिस दिन आखिरी होती है उसे छेवर कहते हैं। पूरे अंचल में पौष पूर्णिमा तक सभी कृषकों का कार्य सम्पन्न हो जाता तब इसे छेरछेरा कहते हैं।यानी इस सीजन के कृषि कार्यों की आखिरी यानी समापन होकर,कृषि कार्य से फुर्सत मिल जाती है।धन धान्य से कृषकों की कोठी भर जाती है।इसी खुशी में पूरा अंचल छेरछेरा त्यौहार मनाता है।इस मौके पर सभी का घर धन धान्य से परिपूर्ण हो जाता है।गरीब,कृषि मजदूर व्यक्ति के घर भी सम्पन्नता रहती है।हर कोई कुछ न कुछ भेंट देने में सक्षम रहता है। व्यक्तिगत या सामूहिक तौर पर लिंगभेद,आर्थिक बंधन,आयु,जाति,धर्म,पंथ व मजहब से परे बच्चे,युवा व बुजूर्ग हाथ में टोकरी या थैला लेकर घर घर जाकर जोश खरोस व जोर शोर से छेरछेरा शब्द उच्चारित करते हैं। इसे छेरछेरा कूटना कहते हैं।फिर जिससे जो बन पड़ता है वह वही उनकी टोकरी या थैले में डाल देता है।वैसे यह जिम्मा अधिकांशतःमाँ लक्ष्मी स्वरूपा महिलाएं ही पूरा करती हैं।  चूंकि धान छत्तीसगढ़ की प्रमुख खरीफ फसल है और यह अनाज प्रत्येक घर में उपलब्ध रहता है इसलिये धान भेंट करने की परंपरा अधिक प्रचलित है।इसमें याचना या दान का भाव निहित नही  है। वस्तुतःकृषि कार्य समाप्त हो जाने की खुशी में साधिकार भेंट लेने और उदारता से भेंट देकर आत्मसंतुष्ट होने का पर्व है।

तभी तो लोग मनोरंजक शैली में कहते सुने जा सकते हैं यथा-

छेरछेरा,छेरछेरा माई कोठी के धान ला हेरहेरा।

 छेरिकछेरा छेर मड़ईकिन छेरछेरा।

अर्थात कृषि कार्य समाप्त हो गया।इस खुशी में माई कोठी अर्थात् मुख्य धान भंडारन स्थान से धान निकालकर हमें भेंट में दें।

यदि किसी से धान निकालने में थोड़ी भी देर हो जाती है तो छेरछेरा कूटने वालों के मुंह से बरबस ही निकल पड़ता है-

अरन बरन कोदो दरन,

जभे देबे तभे टरन।

चाहे कुछ भी हो। यहाँ तक कि हमें कोदो भी दलना पड़ जाये अर्थात कितनो भी प्रतीक्षा करनी पड़े जब आप भेंट देंगे तभी आपके द्वार से टलेंगे।पूरा छत्तीसगढ़ इस पर्व में खुशी से सराबोर रहता है। छत्तीसगढ़ी व्यंजन जैसे बरा,सोंहारी,गुलगुला भजिया प्रत्येक घर में बनता है। खाते खिलाते आनंद मग्न हो जाते हैं। लोकगीत संगीत वालों की छेरछेरा टोली इन खुशियों में पूनम के चार चांद लगा देती है।इस पर्व की महत्ता व मान बढ़ाते हुए जन भावनाओं के अनुरूप इस वर्ष से छत्तीसगढ़ सरकार ने छेरछेरा पर्व पर सार्वजनिक अवकाश की स्वीकृति दी है जो जन सरोकार के दृष्टिकोण काफी सराहनीय कदम है।

बन्धु राजेश्वर खरे

लक्ष्मण कुंज

शिव मंदिर के पास,अयोध्यानगर

महासमुंद,( छ. ग.)

रविवार, 19 दिसंबर 2021

चार दिन के जिनगानी

का होगे कउंवा मन आजकल कांव-कांव नइ करत हे, बिलई मन मियाउं-मियाउं नइ करत हे, कुकुर मन भुके बर भुलागे हे, कोलिहा मन हुंआ-हुंआ नइ करत हे, सुआ अउ पड़की-परेवना मन के घला बोलती बंद होगे हे। खबर तो ये घला मिलत हे के जंगल के शेर, भालू मन के दहड़ई घला सटकगे हे। गजराज मन घला चिंघाड़े ले छोड़ देहे, कइसे का होगे हे ते ओकरो मन के कांही आरो नइ मिलत हे? कुंआरी टूरी मन असन छेहेल्ला मारत, फुगड़ी रे फांय-फांय कस कूदत-फुदकत राहय तेनो हिरनी मन अइसे गत ला उतार देहें जइसे दस दिन के लांघन-पियास मरत हे। ये पशु-पक्षी मन ला अइसे का होगे हे ते कोनो चिटपोट नइ करत हे ? गोठियाय बताय ले छोड़ देहें। अउ तो अउ टेड़गी (बिच्छु) घला हा डंक मारे ले छोड़ देहे, अतके नहीं ढोड़िहा, पिटपिटी मन लरघियाय असन परे हे अउ घोड़ा करायत अउ डोमी सांप मन घला कोनो ला नइ डसत हे। अतेक माथा मारत हौं, जाने-समझे के कोशिश करथौं फेर मोर मगज मं थोरको कांही बात नइ बइठत हे। सोचत-सोचत मति हेरागे, पथरा परगे अक्कल ला फेर कांही पल्ला नइ परत हे? कोन अइसे का मंतर मार देहे ये जानवर मन ला, का जादू-टोना कर देहें ओला समझ नइ सकत हौं ? कुकुर मन मेर जाथौं तब मोला आवत देख के अइसे भाग जथे जइसे पुलिस ला देख के चोर मन भागथें। पहिली उही कुकुर मन देखयं तहां ले पूछी हलावत, मुड़ी मटकावत मोर करा आके पांव में लोटय, चांटय, चुमय फेर आज अइसे का होगे ते उलटा गंगा बोहाय ले धर लेहे? पिंजरा मं बइठे सुआ देखय तहां ले सीताराम..सीताराम.. काहय, मोर हाथ मं लाली मिरचा ला झटक के कोंटा मं जातिस तहां ले खा लेवय। बदमाश कउंआ अतेक सिधवा अउ मौनी बाबा बन जाही अइसन कभू सोचे नइ रेहेंव, कई घौं मोर हाथ ले रोटी ला झटक के चोरहा मन असन भाग जतिस अउ छानही मं बइठ के मोला टुहूं देखावत खातिस तेला आज का होगे हे, कांव-कांव नइ करत हे? ओकर बर आरुग रोटी लेके आय हौं लेवना डार के फेर वाह रे चंडाल थोरको कनमटक नइ मारत हे। नइ जानौं अइसे काबर होगे फेर कोनो न कोनो अइसे बात हे जेकर सेती ये सबो झन के बोलती बंद होगे हे। गुनी, ओझा, जोतिसी अउ पंडित मन करा जब जाके देखावत, सुनावत अउ बिचरावत हौं के का अइसे बात होगे जेकर से एमन चिंव-चांव नइ करत हें, मौन साध लेहें बैरागी मन बरोबर। कुछु जबर कारन हे का, अइसन तो कभू देखे-सुने ले नइ मिलत रिहिस हे ? शनि, राहू अउ केतू के कोनो भारी नजर तो नइ लग गेहे? कोनो बिनाश के समय तो नइ अवइया हे एकर मन उपर, दुख के पहाड़ तो नइ गिरइया हे? ओमन पंचांग ला उलट-पुलट के अतेक देखिन फेर कोनो अइसे बात ओकर मन के पकड़ में नइ अइस जइसे बइद मन बीमार मनखे के नाड़ी ला टमड़ते साठ रोग के लछन ला जान जथे अउ बीमारी ला बता देथें। उदास होगे हौं, का करौं कांही समझ नइ परत हे? एक दिन गऊ माता करा जाथौं तब देखथौं ओकर आंखी डाहर ले आंसू झरत रहिथे। गुनेंव पहिली रोटी खवाय ले जात रेहेंव तब ललक के अपन पांव ला सरकावत मोर कोती बढ़य। बछरु कभू ओकर आंखी ले ओझल हो जाय तब रंभावत सुने हौं। ओकर रंभई ला सुनके बछरु दउड़ के आ जाय। आज देखथौं, ओ बछरु नइ हे ओकर तीर मं न ये गाय रंभावत हे। कुछ समझ नइ परत हे। गऊ माता के ढरत आंसू ला देख के मोरो आंखी डबडबा जथे। सोचौं, जरूर ये माता उपर कोनो भारी बिपत आगे हे, संकट खपलागे हे। ओकर पीठ उपर अपन हाथ फेरथौं, आंसू ला पोंछथौं। अपन कान ला ओकर मुंह मेर दताथौं, तब ओहर बतइस, तौंन ला सुनके मोर जीव करलागे। किहिस-बेटा अब ये संसार हमर मन के लइक नइ रहिगे हे, जीना अबिरथा होवत हे। ये उही भारत देश हे जिहां भगवान कृष्ण गऊ चरावय, बंशी बजा-बजा के हमर मन के मनोरंजन करय, आज उही देश मं हमर मन के खुलेआम हत्या होवत हे, गऊ मांस बिकत हे। सब ले जादा गऊ मांस तो इही देश ले निरयात होवत हे तौंन शरम के बात हे। सब गऊ मांस खाय ले धर लेहें। जीयत मारत हे हमन ला। अइसन अधरमी देश मं तो अब एको पल जीये के मन नइ होवत हे। हमर मन के जीवन संकट मं हे| न हमर रक्षा देश के जनता कर सकत हे अउ न इहां के सरकार। उही पाके मौत ला सुरता करके रोवत हौं। 

देखथौं, सब कोती ककरो जीवन अब इहां सुरक्षित नइहे। हाथी, भालू, शेर, चीता अउ बेंदरा मन घला एती तेती भटके ले धर ले हें। जंगल के जंगल सफाचट होवत जात हे तब उहां के रहवइया जीवधारी अउ परानी मन कहां जाही। उकरो मन के मरे बिहान हे। बड़े-बड़े राक्षस मन काल बन के उहां मंडरावत हे। मनखे मन अपन सुख के खातिर बड़े-बड़े उद्योग अउ कल-कारखाना लगाावत हे। सरकार हा ओमन ला पंदोली देवत हे। महाकाल बन के ये धरती मं उतरे शैतान मन ला देख-देख के नदिया, नरवा, तरिया, डोंगरी, पहाड़, रुख-राई ठाढ़ सुखावत हें, ओकर मन के जीव कांपे ले धर लेहे। कभू बारहों महीना नदी-नरवा मं बहइया पानी सागर मेर जाके पांव पखारय तेन मन सुखाय ले धर लेहें, पहाड़ अउ रुख राई मन तो बड़े-बड़े थ्रेसर मशीन मन देखते साठ कांपे ले धर लेथे। कब कोन मशीन आके ओकर छाती ला दंदोर दिही, फोकला ओदार दिही। कोन जानही ओकर मन के दुख ला, आंखी के आंसू ला? अपन मरावय तब काला बतावय तइसे कस हाल होगे हे ओकर मन के। सोचेंव, ये मनखे मन हा सब के बइरी तो नइ बनगे हे, काल बन के तो नइ आगे हे? जहर उगलत हे नाग बन के, डसत हे सबो झन ला, मुरकेटत हे सब के जीवन ला। काबर दुख देवत हे, का मिलही अइसन करे ले? का ये बात ला नइ जानत हे के जौंन जइसन करहीं तइसन पांही तौंन ला? तब काबर अइसन अजलइत करथें, काबर छानही मं चढ़ के होरा भुंजत हें? उत्तराखंड मं ओ साल का होइस, कइसे प्रकृति ओकर मन के बारा ला बजाय रिहिस हे? कोरोना हा का तमाशा खेल के नइ गिस तेला अतेक जल्दी भुला गेव? अइस कोनो ओकर मन के बाप बचाय बर ओमन ला? चेत जाव, जान जाव, कोनो ला सतावौ अउ दुख देवौ झन। चार दिन के जिनगी, जीयव अउ सब ला जीयन दौ। सब संग हांस गोठिया लौ, परेम के दू भाखा बोले मं काकर का बिगड़त हे? इही धरम हे, परेम बेवहार हे। जइसे करिहौ तइसे पाहौ, नइ मानिहौ तब जाहौ बाबाजी के ला धर के धारे धार।

परमानंद वर्मा

गुरुवार, 18 नवंबर 2021

ये तो होना ही था...

भी सोचा न था, न ही समझा और जाना व माना था कि एक दिन ऐसा आयेगा कि मनुष्य जानवरों की तरह बेमौत मारे जाएंगे और उनकी लाशों को प्लास्टिक के पैकेट में लपेट कर यदा-कदा फेंक दिए जाएंगे, कुत्तों, कौंओ, चीलों और गिद्धों को भी मानव मांस चखने को नहीं मिलेगा। वक्‍त अपना खेल और करतब मदारी की तरह दिखाता है। देखने वाले देखते रह जाते हैं सशंकित होकर कि जैसा हो रहा है, देख रहे है कि ही वैसा ही दिन उलट कर उनकी तरफ ही न लौट जाए।

चौसर सौर शतरंज के खिलाडी अच्छी तरह जानते हैं खेल का कोई भरोसा नही। पांडव सब कुछ हार गए थे लेकिन कया जरूरत थी खेल को आगे बढ़ाने के लिए। हालांकि मना कर रहे थे कि आगे नही खेलेंगे लेकिन शकुनि मामा के झांसे में आखिर आ ही गए और फंस गए उनकी चाल में | कोई पत्नी को दांव पर लगाता है क्‍या, ऐसा तो उस समय के इतिहास में नहीं हुआ था। और द्रोपदी तो कुलवधू थी। क्‍या शकुनि, कौरव सम्राट, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण जैसे महान हस्तियां उस समय वहां उपस्थित थी। जब द्रौपदी को दांव पर लगाया गया तब किसी की बुद्धि काम नही आई, गिरवी रख दी गई थी अकल को। खेल जो होना था, हुआ जरा सी बात ने महाभारत रच दिया। ऐसा ही होता है, अनहोनी हो जाती है, जिसकी कभी सपने में कल्पना नही की गई थी।

सत्य और शांति, धर्म का मूल तत्व है। जब ये दोनों तत्व विद्यमान होते हैं संसार में प्राणी सुखमय जीवन व्यतीत करते है। लेकिन कहते हैं समय कभी एक समान नही रहता। सत्य और शांति को कालांतर में ग्रहण घेर लेता है और असत्य और अशांति के भंवर जाल में जब वह फंस जाता है तब कलह और क्लेश बढ़ जाता है। संसार में हाहाकर मचने लगता है। धर्म, अधर्म का रूप ले लेता है। सज्जन दुर्जन बन जाते है और धार्मिक स्थल शैतानो का गढ़ बन जाता है।

सब कुछ ठीक-ठीक चल रहा था, कहीं किसी बात की आशंका नहीं थी, कि ऐसा भी हो जाएगा लेकिन अनहोनी को भला कौन रोक सकता है। एक दिन अचानक शूर्पनखा का प्रवेश हुआ और सब कुछ तमाम हो गया। सारी चतुराई धरी की धरी गई और उसको जो करना था किया, बर्बादी के सिवा हासिल आया कुछ भी नही। जब अशुभ ग्रहो का प्रवेश होता है और ग्रह गोचर अनिष्ट चाल चलते है तब अमरीका जैसे देश के भी होश ठिकाने आ जाते है । यदि ऐसा न होता तो अफगानिस्तान से उसको भागना नहीं पड़ता। तालिबानियो के सामने उसने घुटने टेक दिए। न धन काम आया और न शक्ति।

कुत्ते, कुत्ते ही होते है चाहे उसे कितने ही दुध पिलाओं, मांस खिलाओं, कार में बिठाकर तफरीह कराओं। उसका जो मौलिक और प्राकृतिक गुण होता है , उसे काई भी नष्ट नही कर सकता। हिंसक पशुएं कितने पालतू क्यो न हो जाए लेकिन वक्‍त आने पर अपनी असलियत गुण को वह दिखा ही देता है उसी तरह मनुष्यों में भी आजकल पाशविकता बढ़ रही है। जहां सत्य, शांति, और धर्म का हास होगा वहां शैतानों की संख्या निरंतर बढ़ती जाएगी। अब तो कुछ देशो ने शैतानो की पाठशालाएं भी खोल रखी है। इन शालाओ से पढ़कर निकले छात्र अराजकता, आतंक, लूटपाट, अपहरण, आगजनी, हत्या और कुकर्मो से अशांत है, उद्वेलित है। कब, कहां, किस समय, क्‍या हो जाएगा कहा नहीं जा सकता ?

अभी अपने ही देश में देख लीजिए, सलमान खुर्शीद के नव प्रकाशित किताब को लेकर कोहराम मच गया। उनके नैनीताल स्थित घर पर तोड़फोड़ और आगजनी हो गई। कहा जा रहा है कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद के किताब “सनराइज ओवर आयोध्या : नेशनहुड इन ओवर टाइम्स” में हिंदुत्व की तुलना आतंकी समूहों बोकोहराम और आईएसआईएस से की गई है। इसके बाद से खुर्शीद निशाने पर हैं। कुमाऊं के डी आई जी के अनुसार कुछ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। किसी धर्म व सम्प्रदाय के खिलाफ इस तरह की टिप्पणी व आरोप अवांछनीय और निंदनीय है। क्‍या सोचकर ऐसा पत्थर फेंका गया है इसे वही जाने लेकिन खुर्शीद तो वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं एडवोकेट हैं। केंद्रीय मंत्री रहे हैं, उनसे ऐसी अपेक्षा नहीं थी। लेकिन होनी को कौन रोक सकता है? जब द्रौपदी को दाँव पर लगाने और चीरहरण जैसी घटना को बड़े-बड़े धुरंधर नही रोक सके, उनकी मति मार गई तब खुर्शीद जैसे खिलाड़ी का क्‍या कहिए, ऐसा तो होना ही था और हो गया। पासा फेंका गया है, खेल आगे देखिये क्‍या-क्या होता है ?

   – परमानंद वर्मा


शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

छत्तीसगढ़ के राऊत नाचा के दोहों में कटाक्ष





छत्तीसगढ़ की दिवाली में एक प्रमुख आकर्षण होता है राऊत-नाचा। यदुवंशियों द्वारा पारे जाने वाले दोहों और  गाये जाने वाले गीतों के साथ ताल मिलाते हुए आकर्षक परिधानों से सुसज्जित बजनियों की थाप से जब गांड़ा बाजा घिड़कता है तब शौर्य-श्रृंगार से सजे अहीरों के संग संग समूचा छत्तीसगढ़ थिरकने लगता है।सरस दोहों, गीतों और नृत्यों की त्रिवेणी में पूरा छत्तीसगढ़ डूबकी लगाता है,

तब लगता है कि ये मतवाली दिवाली छत्तीसगढ़ की है।
राऊत नाचा छत्तीसगढ़ के लोकगीत,लोकसंगीत व  लोकनृत्यों का सिरमौर है। ऐसी कोई लोकविधा नही जो इसमें न समाया हो। स्वागत सत्कार,रामकृष्ण भक्ति,देवधामी पूजा अर्चना,संत कबीर,तुलसीदास व रहीम के दोहे,प्रकृति-प्रेम,पशुधन महिमा,आल्हा-उदल गाथा,लोकगाथायें,सुआ पंड़की,ददरिया,करमा,समाजोपयोगी संदेश परक दोहों गीतों के अलावा हास-परिहास के साथ हास्य-व्यंग्य के दोहे भी नर्तकों द्वारा उच्चारित किया जाता है जिसे दोहा पारना कहते हैं।जैसे सुआ गीत का परिचय मुखड़ा तरी हरि नाहना मोर नाहा नरी नाहना रे सुआ होता है वैसे ही राऊत नाचा दोहों-गीतों का परिचय मुखड़ा होता है- अरे ररे ररे ररे भाई रे.....होता है।इसी के साथ ही नर्तक दोहों व गीतों का उच्चारण करते हैं।
सबसे पहले सगा-पहुनों और आगन्तुकों के स्वागत में गांव एवं ग्राम देवता की महिमा बखान करते हुए दोहे की ये बानगी देखिए-

भले गांव मोर तुमगांव भईया कि,बहुते उबजे बोहार हो।
ठाकूर देवता के पंईया लागंव कि,सबो सगा ल जोहार हो।

दिवाली में गौमाता और उसका चरवाहा यानी अहीरों के शोभायमान साज श्रृंगार व मदमस्त मनोभावों को अभिव्यक्त करता एक दोहा- 

रंग माते रंगरसिया भईया कि,छापर माते गाय हो।
अहीरा माते देवारी संगी कि,शोभा बरन नहि जाय हो।।

राऊत चरवाहों के दैनिक उपयोग व उनके साज श्रृंगार में लाठी विशेष मायने रखती है।उनकी लाठी बहूधा तेंदू पेड़ की होती है जो काफी मजबूत मानी जाती है।लाठी उसकी मान-मर्यादा,ताकत और स्वाभिमान का प्रतीक होती है-

तेंदूसार के लउठी भईया कि,सेर सेर घीव खाय।
इही लउठी के परसादे अहीरा,पेल के गाय चराय।।

भगवान कृष्ण के वंशज होने के नाते कृष्ण ही उनके आराध्य हैं।संकट के समय उन्हे पुकारते ही सभी बाधाओं से मुक्त हो जाने का अहसास देखिये-

अड़गड़ टूटगे बड़गड़ टूटगे,भूरी भंईस के छांद हो।
उँहा ले निकले गोकुल कन्हैया,भागे भूत मसान हो।।

जैसे बाजा वैसे नाचा।बाजा ठीक से बजता रहे तभी नर्तकों में स्फूर्ति बनी रहती है और नाचा का आकर्षण बरकरार रहता है।वाद्यों को टन्न रखने व  वादकों में ऊर्जा का संचार करते रहने के लिये उनका हौसला आफजाई करने का अनोखा ढंग इस दोहे में-

आमा खांधी के ढोल बनाये,बेंदरा खाल छवाय हो।
परे बठेना बजकरी के तब,उदल खाँव खाँव नरियाय हो।।

माता पिता का स्वयं की सुख-सुविधा में मगन रहना और बच्चों के प्रति उनकी गैरजिम्मेदाराना हरकतों व लापरवाही  पर कटाक्ष करता यह दोहा-

दार भात के सरपट सईया,मोंगरी मछरी के झोर हो।
दाई ददा सुत भुलाईन, लईका ला लेगे चोर हो।।

भाइयों के प्रति स्नेह,दुलार व अपनापन झलकता यह प्रसंग-

राम दुलरवा लछमन भईया,पण्डो दुलरवा भीम हो।
आल्हा दुलरवा उदला भईया कि, रन में फिरे अधीर हो।।

जीवनसंगिनी के रंग रूप के फेर में न पडें,जीवन के सुख दुख में उसकी भूमिका को महत्व दें। हास-परिहास व हास्य-व्यंग्य से सराबोर यह दोहा-

तींवरा भाजी पेट पिरौना,बेल फर मतौना हो।
कारी सुआरी मन मिलौना,गोरी बड़ बिटोना हो।।

पर्यावरण संरक्षण में पेंड़ पौधों का खास महत्व है। पेड़ पौधों को न काटें,उसके काटने पर बुरा परिणाम भोगना पड़ता है। प्रकृति संरक्षण का भाव प्रकट करती ये पंक्तियाँ-

बर काटे बईमान कहाये,पीपर काटे चण्डाल हो।
मऊरत आमा ल काटे,तेला नइ आवय मनुख अवतार हो।।

राऊत चरवाहा अपने मालिक के प्रति यद्यपि पूज्य भाव रखता है तथापि जब वह मालिक के घर के आँगन में नृत्य करने जाता है तो आखिर में उन्हे सःपरिवार दीर्घायु होने की मंगलकामना के साथ हास्य से भरपूर आशीष कुछ इस तरह देता है-

भात भात ल खाहू मालिक,दार ल घलो पीहू।
असीस लेलव हमर अहिरा के,टूकना तोपात ले जींहू।
          
                                      बन्धु राजेश्वर राव खरे
                                           लक्ष्मण कुंज
             .        शिव मंदिर के पास,अयोध्यानगर महासमुन्द
छत्तीसगढ़ 493445