गुरुवार, 18 नवंबर 2021

ये तो होना ही था...

कभी सोचा न था, न ही समझा और जाना व माना था कि एक दिन ऐसा आयेगा कि मनुष्य जानवरों की तरह बेमौत मारे जाएंगे और उनकी लाशों को प्लास्टिक के पैकेट में लपेट कर यदा-कदा फेंक दिए जाएंगे, कुत्तों, कौंओ, चीलों और गिद्धों को भी मानव मांस चखने को नहीं मिलेगा। वक्‍त अपना खेल और करतब मदारी की तरह दिखाता है। देखने वाले देखते रह जाते हैं सशंकित होकर कि जैसा हो रहा है, देख रहे है कि ही वैसा ही दिन उलट कर उनकी तरफ ही न लौट जाए।

चौसर सौर शतरंज के खिलाडी अच्छी तरह जानते हैं खेल का कोई भरोसा नही। पांडव सब कुछ हार गए थे लेकिन कया जरूरत थी खेल को आगे बढ़ाने के लिए। हालांकि मना कर रहे थे कि आगे नही खेलेंगे लेकिन शकुनि मामा के झांसे में आखिर आ ही गए और फंस गए उनकी चाल में | कोई पत्नी को दांव पर लगाता है क्‍या, ऐसा तो उस समय के इतिहास में नहीं हुआ था। और द्रोपदी तो कुलवधू थी। क्‍या शकुनि, कौरव सम्राट, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण जैसे महान हस्तियां उस समय वहां उपस्थित थी। जब द्रौपदी को दांव पर लगाया गया तब किसी की बुद्धि काम नही आई, गिरवी रख दी गई थी अकल को। खेल जो होना था, हुआ जरा सी बात ने महाभारत रच दिया। ऐसा ही होता है, अनहोनी हो जाती है, जिसकी कभी सपने में कल्पना नही की गई थी।

सत्य और शांति, धर्म का मूल तत्व है। जब ये दोनों तत्व विद्यमान होते हैं संसार में प्राणी सुखमय जीवन व्यतीत करते है। लेकिन कहते हैं समय कभी एक समान नही रहता। सत्य और शांति को कालांतर में ग्रहण घेर लेता है और असत्य और अशांति के भंवर जाल में जब वह फंस जाता है तब कलह और क्लेश बढ़ जाता है। संसार में हाहाकर मचने लगता है। धर्म, अधर्म का रूप ले लेता है। सज्जन दुर्जन बन जाते है और धार्मिक स्थल शैतानो का गढ़ बन जाता है।

सब कुछ ठीक-ठीक चल रहा था, कहीं किसी बात की आशंका नहीं थी, कि ऐसा भी हो जाएगा लेकिन अनहोनी को भला कौन रोक सकता है। एक दिन अचानक शूर्पनखा का प्रवेश हुआ और सब कुछ तमाम हो गया। सारी चतुराई धरी की धरी गई और उसको जो करना था किया, बर्बादी के सिवा हासिल आया कुछ भी नही। जब अशुभ ग्रहो का प्रवेश होता है और ग्रह गोचर अनिष्ट चाल चलते है तब अमरीका जैसे देश के भी होश ठिकाने आ जाते है । यदि ऐसा न होता तो अफगानिस्तान से उसको भागना नहीं पड़ता। तालिबानियो के सामने उसने घुटने टेक दिए। न धन काम आया और न शक्ति।

कुत्ते, कुत्ते ही होते है चाहे उसे कितने ही दुध पिलाओं, मांस खिलाओं, कार में बिठाकर तफरीह कराओं। उसका जो मौलिक और प्राकृतिक गुण होता है , उसे काई भी नष्ट नही कर सकता। हिंसक पशुएं कितने पालतू क्यो न हो जाए लेकिन वक्‍त आने पर अपनी असलियत गुण को वह दिखा ही देता है उसी तरह मनुष्यों में भी आजकल पाशविकता बढ़ रही है। जहां सत्य, शांति, और धर्म का हास होगा वहां शैतानों की संख्या निरंतर बढ़ती जाएगी। अब तो कुछ देशो ने शैतानो की पाठशालाएं भी खोल रखी है। इन शालाओ से पढ़कर निकले छात्र अराजकता, आतंक, लूटपाट, अपहरण, आगजनी, हत्या और कुकर्मो से अशांत है, उद्वेलित है। कब, कहां, किस समय, क्‍या हो जाएगा कहा नहीं जा सकता ?

अभी अपने ही देश में देख लीजिए, सलमान खुर्शीद के नव प्रकाशित किताब को लेकर कोहराम मच गया। उनके नैनीताल स्थित घर पर तोड़फोड़ और आगजनी हो गई। कहा जा रहा है कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद के किताब “सनराइज ओवर आयोध्या : नेशनहुड इन ओवर टाइम्स” में हिंदुत्व की तुलना आतंकी समूहों बोकोहराम और आईएसआईएस से की गई है। इसके बाद से खुर्शीद निशाने पर हैं। कुमाऊं के डी आई जी के अनुसार कुछ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। किसी धर्म व सम्प्रदाय के खिलाफ इस तरह की टिप्पणी व आरोप अवांछनीय और निंदनीय है। क्‍या सोचकर ऐसा पत्थर फेंका गया है इसे वही जाने लेकिन खुर्शीद तो वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं एडवोकेट हैं। केंद्रीय मंत्री रहे हैं, उनसे ऐसी अपेक्षा नहीं थी। लेकिन होनी को कौन रोक सकता है? जब द्रौपदी को दाँव पर लगाने और चीरहरण जैसी घटना को बड़े-बड़े धुरंधर नही रोक सके, उनकी मति मार गई तब खुर्शीद जैसे खिलाड़ी का क्‍या कहिए, ऐसा तो होना ही था और हो गया। पासा फेंका गया है, खेल आगे देखिये क्‍या-क्या होता है ?

   – परमानंद वर्मा


शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

छत्तीसगढ़ के राऊत नाचा के दोहों में कटाक्ष





छत्तीसगढ़ की दिवाली में एक प्रमुख आकर्षण होता है राऊत-नाचा। यदुवंशियों द्वारा पारे जाने वाले दोहों और  गाये जाने वाले गीतों के साथ ताल मिलाते हुए आकर्षक परिधानों से सुसज्जित बजनियों की थाप से जब गांड़ा बाजा घिड़कता है तब शौर्य-श्रृंगार से सजे अहीरों के संग संग समूचा छत्तीसगढ़ थिरकने लगता है।सरस दोहों, गीतों और नृत्यों की त्रिवेणी में पूरा छत्तीसगढ़ डूबकी लगाता है,

तब लगता है कि ये मतवाली दिवाली छत्तीसगढ़ की है।
राऊत नाचा छत्तीसगढ़ के लोकगीत,लोकसंगीत व  लोकनृत्यों का सिरमौर है। ऐसी कोई लोकविधा नही जो इसमें न समाया हो। स्वागत सत्कार,रामकृष्ण भक्ति,देवधामी पूजा अर्चना,संत कबीर,तुलसीदास व रहीम के दोहे,प्रकृति-प्रेम,पशुधन महिमा,आल्हा-उदल गाथा,लोकगाथायें,सुआ पंड़की,ददरिया,करमा,समाजोपयोगी संदेश परक दोहों गीतों के अलावा हास-परिहास के साथ हास्य-व्यंग्य के दोहे भी नर्तकों द्वारा उच्चारित किया जाता है जिसे दोहा पारना कहते हैं।जैसे सुआ गीत का परिचय मुखड़ा तरी हरि नाहना मोर नाहा नरी नाहना रे सुआ होता है वैसे ही राऊत नाचा दोहों-गीतों का परिचय मुखड़ा होता है- अरे ररे ररे ररे भाई रे.....होता है।इसी के साथ ही नर्तक दोहों व गीतों का उच्चारण करते हैं।
सबसे पहले सगा-पहुनों और आगन्तुकों के स्वागत में गांव एवं ग्राम देवता की महिमा बखान करते हुए दोहे की ये बानगी देखिए-

भले गांव मोर तुमगांव भईया कि,बहुते उबजे बोहार हो।
ठाकूर देवता के पंईया लागंव कि,सबो सगा ल जोहार हो।

दिवाली में गौमाता और उसका चरवाहा यानी अहीरों के शोभायमान साज श्रृंगार व मदमस्त मनोभावों को अभिव्यक्त करता एक दोहा- 

रंग माते रंगरसिया भईया कि,छापर माते गाय हो।
अहीरा माते देवारी संगी कि,शोभा बरन नहि जाय हो।।

राऊत चरवाहों के दैनिक उपयोग व उनके साज श्रृंगार में लाठी विशेष मायने रखती है।उनकी लाठी बहूधा तेंदू पेड़ की होती है जो काफी मजबूत मानी जाती है।लाठी उसकी मान-मर्यादा,ताकत और स्वाभिमान का प्रतीक होती है-

तेंदूसार के लउठी भईया कि,सेर सेर घीव खाय।
इही लउठी के परसादे अहीरा,पेल के गाय चराय।।

भगवान कृष्ण के वंशज होने के नाते कृष्ण ही उनके आराध्य हैं।संकट के समय उन्हे पुकारते ही सभी बाधाओं से मुक्त हो जाने का अहसास देखिये-

अड़गड़ टूटगे बड़गड़ टूटगे,भूरी भंईस के छांद हो।
उँहा ले निकले गोकुल कन्हैया,भागे भूत मसान हो।।

जैसे बाजा वैसे नाचा।बाजा ठीक से बजता रहे तभी नर्तकों में स्फूर्ति बनी रहती है और नाचा का आकर्षण बरकरार रहता है।वाद्यों को टन्न रखने व  वादकों में ऊर्जा का संचार करते रहने के लिये उनका हौसला आफजाई करने का अनोखा ढंग इस दोहे में-

आमा खांधी के ढोल बनाये,बेंदरा खाल छवाय हो।
परे बठेना बजकरी के तब,उदल खाँव खाँव नरियाय हो।।

माता पिता का स्वयं की सुख-सुविधा में मगन रहना और बच्चों के प्रति उनकी गैरजिम्मेदाराना हरकतों व लापरवाही  पर कटाक्ष करता यह दोहा-

दार भात के सरपट सईया,मोंगरी मछरी के झोर हो।
दाई ददा सुत भुलाईन, लईका ला लेगे चोर हो।।

भाइयों के प्रति स्नेह,दुलार व अपनापन झलकता यह प्रसंग-

राम दुलरवा लछमन भईया,पण्डो दुलरवा भीम हो।
आल्हा दुलरवा उदला भईया कि, रन में फिरे अधीर हो।।

जीवनसंगिनी के रंग रूप के फेर में न पडें,जीवन के सुख दुख में उसकी भूमिका को महत्व दें। हास-परिहास व हास्य-व्यंग्य से सराबोर यह दोहा-

तींवरा भाजी पेट पिरौना,बेल फर मतौना हो।
कारी सुआरी मन मिलौना,गोरी बड़ बिटोना हो।।

पर्यावरण संरक्षण में पेंड़ पौधों का खास महत्व है। पेड़ पौधों को न काटें,उसके काटने पर बुरा परिणाम भोगना पड़ता है। प्रकृति संरक्षण का भाव प्रकट करती ये पंक्तियाँ-

बर काटे बईमान कहाये,पीपर काटे चण्डाल हो।
मऊरत आमा ल काटे,तेला नइ आवय मनुख अवतार हो।।

राऊत चरवाहा अपने मालिक के प्रति यद्यपि पूज्य भाव रखता है तथापि जब वह मालिक के घर के आँगन में नृत्य करने जाता है तो आखिर में उन्हे सःपरिवार दीर्घायु होने की मंगलकामना के साथ हास्य से भरपूर आशीष कुछ इस तरह देता है-

भात भात ल खाहू मालिक,दार ल घलो पीहू।
असीस लेलव हमर अहिरा के,टूकना तोपात ले जींहू।
          
                                      बन्धु राजेश्वर राव खरे
                                           लक्ष्मण कुंज
             .        शिव मंदिर के पास,अयोध्यानगर महासमुन्द
छत्तीसगढ़ 493445

गुरुवार, 9 सितंबर 2021

सूरदास का स्वप्न

कभी सूरदास ने एक स्वप्न देखा था कि रुक्मिणी और राधिका मिली हैं और एक दूजे पर न्योछावर हुई जा रही हैं।  सोचता हूँ, कैसा होगा वह क्षण जब दोनों ठकुरानियाँ मिली होंगी। दोनों ने प्रेम किया था। एक ने बालक कन्हैया से, दूसरे ने राजनीतिज्ञ कृष्ण से। एक को अपनी मनमोहक बातों के जाल में फँसा लेने वाला कन्हैया मिला था, और दूसरे को मिले थे सुदर्शन चक्र धारी, महायोद्धा कृष्ण। कृष्ण राधिका के बाल सखा थे, पर राधिका का दुर्भाग्य था कि उन्होंने कृष्ण को तात्कालिक विश्व की महाशक्ति बनते नहीं देखा। राधिका को न महाभारत के कुचक्र जाल को सुलझाते चतुर कृष्ण मिले, न पौंड्रक-शिशुपाल का वध करते बाहुबली कृष्ण मिले। 

रुक्मिणी कृष्ण की पत्नी थीं, पटरानी थीं, महारानी थीं, पर उन्होंने कृष्ण की वह लीला नहीं देखी जिसके लिए विश्व कृष्ण को स्मरण रखता है। उन्होंने न माखन चोर को देखा, न गौ-चरवाहे को। उनके हिस्से में न बाँसुरी आयी, न माखन। कितनी अद्भुत लीला है। राधिका के लिए कृष्ण कन्हैया था, रुक्मिणी के लिए कन्हैया कृष्ण थे। पत्नी होने के बाद भी रुक्मिणी को कृष्ण उतने नहीं मिले कि वे उन्हें "तुम" कह पातीं। आप से तुम तक की इस यात्रा को पूरा कर लेना ही प्रेम का चरम पा लेना है. रुक्मणि कभी यह यात्रा पूरी नहीं कर सकीं।

राधिका की यात्रा प्रारम्भ ही 'तुम' से हुई थीं। उन्होंने प्रारम्भ ही "चरम" से किया था। शायद तभी उन्हें कृष्ण नहीं मिले। कितना अजीब है न! कृष्ण जिसे नहीं मिले, युगों युगों से आजतक उसी के हैं, और जिसे मिले उसे मिले ही नहीं। तभी कहता हूँ, कृष्ण को पाने का प्रयास मत कीजिये। पाने का प्रयास कीजियेगा तो कभी नहीं मिलेंगे। बस प्रेम कर के छोड़ दीजिए, जीवन भर साथ निभाएंगे कृष्ण। कृष्ण इस सृष्टि के सबसे अच्छे मित्र हैं। राधिका हों या सुदामा, कृष्ण ने मित्रता निभाई तो ऐसी निभाई कि इतिहास बन गया।

राधा और रुक्मिणी जब मिली होंगी तो रुक्मिणी राधा के वस्त्रों में माखन की गंध ढूंढती होंगी, और राधा ने रुक्मिणी के आभूषणों में कृष्ण का वैभव तलाशा होगा। कौन जाने मिला भी या नहीं। सबकुछ कहाँ मिलता है मनुष्य को...  कुछ न कुछ तो छूटता ही रहता है। जितनी चीज़ें कृष्ण से छूटीं उतनी तो किसी से नहीं छूटीं। कृष्ण से उनकी माँ छूटी, पिता छूटे, फिर जो नंद-यशोदा मिले वे भी छूटे। संगी-साथी छूटे। राधा छूटीं। गोकुल छूटा, फिर मथुरा छूटी। कृष्ण से जीवन भर कुछ न कुछ छूटता ही रहा। कृष्ण जीवन भर त्याग करते रहे। 

हमारी आज की पीढ़ी जो कुछ भी छूटने पर टूटने लगती है, उसे कृष्ण को गुरु बना लेना चाहिए। जो कृष्ण को समझ लेगा वह कभी अवसाद में नहीं जाएगा। कृष्ण आनंद के देवता है। कुछ छूटने पर भी कैसे खुश रहा जा सकता है, यह कृष्ण से अच्छा कोई सिखा ही नहीं सकता।


रविवार, 5 सितंबर 2021

तो हो जाए एक एक समोसा... ।।

"समोसा" सुनते ही मुंह में पानी आ जाना स्वाभाविक है। यह तिकोना, मोटा और भूरा सा व्यंजन अपनी कद काठी के कारण अपनी बिरादरी में अलग ही नजर आता है। अपने रूप रंग में भले ही यह उन्नीस बैठता हो लेकिन स्वाद में पूरा बीस है और शायद यही कारण है कि तेल की कढ़ाई में घंटों उछलकूद करने वाला गरमागरम समोसा हर उम्र के लोगों की पहली पसंद है। शायद ही कोई अभागा हो, जिसे समोसा खाने का मौका न मिला हो क्योंकि यह तो हर छोटी-बड़ी पार्टी की शान है....लेकिन क्या आपको पता है कि आपके जन्मदिन की तरह आपके प्रिय समोसे का भी एक दिन है जिसे विश्व समोसा दिवस (World Samosa Day) जाता है।...शायद कम ही लोगों को यह पता होगा कि दुनिया भर में 5 सितम्बर को विश्व समोसा दिवस मनाया जाता है।

हमारे-आपके प्रिय समोसे का बस यह दुर्भाग्य है कि उसका दिन ‘शिक्षक दिवस’ के साथ पड़ता है और गुरुओं को समर्पित इस दिन की गरिमा-भव्यता और दिव्यता में समोसा समर्पित शिष्य की भाँति अपने दिन को कुर्बान कर देता है।...इसलिए भले ही वह शिक्षक दिवस की हर दावत में डायनिंग टेबल पर पूरी शान और गर्व से इठलाता हो लेकिन अपना दिन खुलकर नहीं माना पाता। शिक्षक दिवस और समोसे के बीच एक खास सम्बन्ध यह भी है हर व्यक्ति का और प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी का ‘समोसा गुरु’ जरुर होता है, जो यह बताता है कि ‘गुरु फलाने शहर में फलाने के समोसे बहुत गज़ब हैं’...और हर शहर-हर गली नुक्कड़ पर स्वादिष्ट समोसे का यह गुरुपन पलता-बढ़ता रहता है।
समोसा दिवस पर अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए जब हमने इस लज़ीज़-मोटे समोसे का इतिहास खंगालना शुरू किया तो गूगल गुरु ने बताया कि समोसा असल में फारसी शब्द 'सम्मोकसा' से बना है। माना जाता है कि समोसे की उत्पत्ति 10वीं शताब्दी से पहले मध्य पूर्व में कहीं हुई थी और यह 13वीं से 14वीं शताब्दी के बीच भारत में आया। ऐसा माना जाता है कि समोसा मध्य-पूर्व के व्यापारियों के साथ भारत आया और आते ही पूरा भारतीय हो गया। तभी तो आजकल हर शहर की गली,मोहल्ले और नुक्कड पर समोसा आसानी से मिल जाता है। वैसे इन दिनों एक थ्योरी यह भी चल रही है कि अरब देशों में गेहूँ तो होता नहीं है तो उनको समोसा बनाने के लिए मैदा कहाँ से मिलेगा इसलिए समोसा पूरी तरह भारतीय पैदाइश है। बहरहाल अब तो समय के साथ समोसा रंग-रूप,आकार-प्रकार,स्वाद और गुण भी बदलता जा रहा है। शहरों में नमकीन की दुकानों पर मिलने वाले छोटे सूखे समोसों से लेकर दिल्ली के पास नोएडा में मिलने वाले गरमा-गरम छोटे समोसों और दिल्ली के ही नूडल्स वाले समोसे तक इसने लम्बा सफ़र तय किया है। अब तो इसने धीरे से मिठाइयों के बीच भी घुसपैठ कर ली है और चाकलेट और खोया भरे मीठे समोसे के रूप में भी अपने स्वाद से आमोखास की जुबान पर चढ़ने लगा है। पूर्वी दिल्ली में तो करीब 25 प्रकार के समोसे मिलते हैं। यहां आलू के साथ पास्ता, नूडल्स, पिज्जा और चॉकलेट समोसे जैसे कई प्रकार के समोसे लोगों को खूब भा रहे हैं । समोसे की लोकप्रियता का ही प्रमाण है कि दशक भर पहले बिहार के साथ साथ हिंदी पट्टी में यह नारा खूब लोकप्रिय हुआ था... ‘ जब तक रहेगा समोसे में आलू-तब तक रहेगा बिहार में लालू’...और इसीतरह ‘मिस्टर और मिसेज खिलाड़ी’ फिल्म के एक गीत ‘जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहूँगा तेरा मैं शालू..’ ने भी समोसे की लोकप्रियता की आड़ में खूब कमाई की थी।....खैर इस फिल्म या लालूप्रसाद की लोकप्रियता तो समय के साथ कम होती गयी लेकिन हमारा समोसा आज भी पूरी आन-बान-शान के साथ स्वाद के पहले पायदान पर कायम है....तो चलिए हो जाए एक-एक समोसा.... ।।
संजीव शर्मा

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

शिक्षक, अध्यापक और गुरु में क्या अंतर है

आज शिक्षक दिवस के शुभ अवसर पर सभी शिक्षकों को बधाइयाँ मिल रही हैं। लेकिन एक सत्य ये भी है की हमारा समाज शिक्षक शब्द का अर्थ भी भूलता जा रहा है| हम अध्यापक और शिक्षक को एक ही समझने लगे हैं। एक अध्यापक शिक्षक हो सकता है, लेकिन ये जरूरी नहीं कि हर अध्यापक शिक्षक हो। इस बात को समझने के लिए आपको शिक्षक, अध्यापक और गुरु जैसे शब्दों का शाब्दिक अर्थ पता होना जरूरी है| हिंदी एक अनूठी भाषा है। हम कुछ शब्दों को पर्यायवाची समझते हैं, जबकि असलियत ये है की हिंदी के हर शब्द का अर्थ अलग है। कुछ शब्द एक जैसे प्रतीत होते हैंख् पर उनके असली अर्थ में कुछ बारीक फर्क जरूर होता है। शिक्षक और अध्यापक भी दो ऐसे ही शब्द हैं। जो लोग गुरु को शिक्षक समझने की भूल करते हैं, उन्हें तो अपनी शब्दावली को विकसित करने की जरूरत है।

शिक्षक: शिक्षक से हम शिक्षा प्राप्त करते हैं। शिक्षक वह व्यक्ति है, जो हमें जीवन में उपयोग में आने वाली चीज़ें सिखाता है। इसमें व्यावहारिक ज्ञान से लेकर हमारे त्योहारों और रीति-रिवाजों तक का ज्ञान शामिल होता है। इसलिए किसी भी व्यक्ति का सबसे पहला शिक्षक उसके माता-पिता, सगे-संबंधी होते हैं। शिक्षक हमें शिक्षा देने के बदले किसी आर्थिक लाभ की अपेक्षा नहीं रखते, बल्कि सम्मान की अपेक्षा रखते हैं।

अध्यापक : अध्यापक वह होता है जो हमें अध्ययन करायए। इसका अर्थ यह है की अध्यापक हमें किताबी ज्ञान देता है| इस तरह का ज्ञान हमें कागज़ी प्रमाणपत्र अर्थात डिग्री लेने में मदद करते हैं। अध्यापक किसी ऐसे संसथान का अंग होते हैं जो हमें कागज़ी ज्ञान देने के बदले अध्यापक को वेतन प्रदान करता है। कुछ अध्यापक हमें शिक्षक की भूमिका निभाते हुए भी मिलते हैं, जो उन्हें बाकी अध्यापकों से अलग और बेहतर बनरता है|

गुरु : गुरु वह होता है जो हमें सबसे उच्च कोटि का ज्ञान दे। उच्च कोटि के ज्ञान का अर्थ आध्यात्मिक ज्ञान। ये ज्ञान हमें एक साधारण मनुष्य से कुछ अधिक बना देता है। ये वह ज्ञान है जो हमें किसी शिक्षक या अध्यापक से प्राप्त नहीं हो सकता। एक अध्यापक या शिक्षक हमें अपने जन्म या धन से मिल सकते हैं, किन्तु एक गुरु को आपका ढूँढना ब्बाँर अर्जित करना पड़ता। किसी गुरु का शिष्य बनने के लिए आपका अपनी पात्रता सिद्ध करनी पड़ती है। एक शिक्षक या अध्यापक जब आपको शिक्षा देता है हो उसके पीछे उसका कुछ स्वार्थ निहित होता है, लेकिन एक गुरु का ज्ञान निस्वार्थ होता है।

इन तीन के अलावा शुद्ध हिंदी में कुछ अन्य भी मिलते जुलते शब्द हैं, जो अक्सर प्रयोग में लाए जाते हैं, लेकिन किसी को उनका सही अर्थ नहीं पता।

आचार्य: आचार्य वह व्यक्ति होता है जो अपने द्वारा अर्जित ज्ञान को अपने आचरण / व्यवहार का अंग बना लेता है और फिर उस ज्ञान को अपने शिष्यों को देता है। आचार्य एक ऐसी स्तिथि है जो अध्यापक से कुछ अधिक है और गुरु से कुछ कम।

प्राचार्य : प्राचार्य आचार्य से श्रेष्ठ होता है। प्राचार्य ये सुनिश्चित करता है कि जिसको वह ज्ञान दे रहा है वो भी उस ज्ञान को अपने व्यवहार का अंग बना रहा है।

आज के दौर में जहाँ किताबी ज्ञान का बोल-बाला है, वहीं माता-पिता यह भूलते जा रहे हैं कि आपके बच्चे को विद्यालय में अध्यापक अवश्य मिल जाएंगे, किन्तु शिक्षक नहीं। आज के दौर में बच्चों को सर्वाधिक आवश्यकता एक अच्छे शिक्षक की होती है, जो बहुत कम माता-पिता या अध्यापक बन पाते हैं। एक अच्छे शिक्षक के अभाव में बच्चे पढ़ तो जरूर लेते हैं, किन्तु वो व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाते जो उन्हें एक उच्च कोटि का ज्ञानवान मनुष्य बनाए।

सोमवार, 19 जुलाई 2021

परिंदे की गुहार....


सुबह कुछ जल्दी ही जाग गई थी,

टक - टक की आवाज़ आ रही थी | 

दरवाज़ा  खोलकर देखा

कोई दिखा नहीं ! ...

आवाज़ की दिशा में देखा

खिड़की पर दिखा एक पक्षी

अपनी चोंच से खिड़की पर

उकेर रहा था नक्काशी ...

मैंने पूछा -

"भाई क्या बात है"

बोला " क्या किराये से मिलेगा

कोई पेड़ घोंसला बनाने के लिए ?

अकेला तो कहीं भी रह लेता,

परन्तु घर चाहिए चूज़ों के लिए

तुम्हारे ही भाइयों ने लूट लिया है,

हमारा जंगल पूरा ही काट दिया है | 

बेघर तो कर ही दिया है, 

दाने-पानी के लिए भी तरसा दिया  है | 

पुण्य कमाने के लिए रख देते हैं ,

छत पर थोड़ा दाना थोड़ा पानी,

पर रहने के लिए छत भी तो चाहिए

यह तो कोई सोचता भी नहीं 

पेट तो भरना ही है,

भीख ही सही ,थोड़ा खा-पी लेते हैं 

थोड़ा घर भी ले जाते हैं  

भले ही सर पर छत न हो

पेट में भूख तो है ना?

कभी -कभी सोचता हूँ 

आत्मघात कर लूँ | 

बिजली के तारों  पर बैठ जाऊँ ,

या पटक दूँ सर मोबाइल के ऊँचे टावर पर 

जैसे सरकार दे देती है कुछ

फाँसी  लगाने वाले किसान को

वैसे ही मिल जाएगा  कोई पेड़

मेरे चूज़ों के घोंसले के लिए "

सुनकर मैं सुन्न हो गया

इतना कुछ तो सोचा न था ?

जंगल काटकर घर उजाड़ दिया 

इन बेचारों का विचार नहीं किया ! 

मैंने हाथ जोड़कर उससे कहा

"  सबकी ओर से मैं माफी माँगता हूँ , आत्मघात का विचार त्याग दो, यह दिल से निवेदन है मेरा 

अभी तो इस गमले के पौधे पर

अपना वन रूम किचन  का घर बसा लो

थोड़ी अड़चन तो होगी परंतु अभी इसी से काम चला लो"

उसने कहा 

"बड़ा  उपकार होगा 

परंतु किराया क्या होगा ? 

और कैसे चुकाऊँगा "

मैंने कहा-

 "तीनों पहर मंगल कलरव सुनूँगा , और कुछ नही माँगूँगा "

वह बोला "मुझे तो आप मिल गए पर मेरे भाई बंधुओ का क्या?

उन्हें भी तो घर चाहिए ,कहाँ रहेंगे वे सब ?"

मैंने कहा "अरे ! अब लोग जाग रहे हैं,

बड़, पीपल, नीम, गूलर रोप रहे हैं

धीरे -धीरे बदलाव आ रहा है

किसी को आत्मघात करने की आवश्यकता अब नहीं  है"

सुनकर पक्षी उड़ गया,

घोंसले  का सामान लाने के लिए

और मैंने मोबाइल उठाया

आपको बताने के लिए


पक्षी की टक -टक से 

मेरे मन का द्वार खुल गया

आप भी एक पेड तो रोपेंगे !

आंगन में... या गमले में ही सही...

वाट्स एप्प से प्राप्त

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

शब्द बोलते हैं...

खाना और ख़ाना

दो मित्र रास्ते में मिले, दोनों ने परस्पर पूछा-किधर चले? एक ने कहा-ख़ाना खाने। दूसरे ने कहा-कारखाने। वे दोनों तो चले गए, पर तीसरा व्यक्ति जो उनकी बातें सुन रहा था, उसे बड़ा आश्चर्य हुआ, हँसी भी आई, वह सोचने लगा-भला, ये भी कोई बात हुई। कोई खाना खाए, यह तो समझ में आता है, पर कोई कार खाए! यह क्या संभव है? आइए उस व्यक्ति की उलझन दूर करने का प्रयास करें-

सबसे पहले शब्द लें-‘खाना’ और ‘खाना’। शब्द कोश के अनुसार सकर्मक क्रिया ‘खाना’ का आशय है, ठोस आहार को चबाकर निगलना, भक्षण करना, निगलना, हिंस्र पशुओं को मारकर भक्षण करना, चूसना, चबाना (पान, गड़ेरियाँ), चाट जाना (कीड़ों आदि का), खर्च करना, नष्ट करना, आदि। फ़ारसी शब्द ‘ख़ाना’ यानी गृह, घर, आलम, डिबिया, केस, अलमारी, संदूक आदि का ख़ाना, रजिस्टर का ख़ाना, कागज या कपड़े पर रेखाओं से बना, विभाग, कोष्ठक, फ़ारसी में इसकी वर्तनी ख़ानः है। अब यह निश्चित रूप से जान लें कि ‘खाना’ हिंदी का शब्द है और ‘ख़ाना’ फ़ारसी का मात्र एक (.) नुक्ते में दोनों शब्दों का अर्थ ही बदल दिया। ‘ख़ुदा’ और ‘जुदा’ की तरह।

अब चलें ‘कार’ की ओर, यह शब्द फ़ारसी का है, जिसका अर्थ है कार्य, काम, उद्यम, पेशा, कला, फ़न, विषय, मुआमला, ध्यान देने वाला तथ्य यह है कि इसे ‘कार’ ही लिखें, ‘क़ार’ नहीं, क्योंकि ‘क़ार’ का अर्थ बर्फ़, तुहिन, क़ीर, रील, तारकोल होता है। अब दोनों शब्दों को मिलाकर बने शब्द ‘कारख़ाना’ का अर्थ देख लिया जाए। ‘कारख़ाना’ का अर्थ हुआ वह स्थान जहाँ चीजें बनती हैं, शिल्पशाला, उद्योगशाला, कार्यालय यह शब्द भी फ़ारसी है।

शब्‍दों के उलझन में पड़ा तीसरा व्यक्ति हिंदी, उर्दू, फ़ारसी की थोड़ी समझ भी रखता होता, तो शायद उसकी उलझन तुरंत दूर हो जाती, पर केवल हिंदी के जानकार लोगों के लिए यह उलझन बनी रह सकती है। ‘कारख़ाना’ और ‘खाना-खाना’ में मूलभूत अंतर है कि खाना में नुक्ता नहीं है और ‘ख़ाना’ में है। ‘खाना’ का आशय हम ‘भोजन’ से लेते हैं। भोजन को ग्रहण करने की क्रिया ‘खाना’ कहलाती है, इसीलिए शब्द बना ‘खाना-खाना’ इसमें पहले वाला ‘खाना’ भोजन है और दूसरे वाला ‘खाना’ क्रिया है।

अब तो आप समझ गए होंगे कि रास्ते में दोनों मित्र का विपरीत दिशा में जाकर ‘खाना-खाने’ और ‘कारखाने’ का आशय क्या था? 



बातें घर-द्वार की

आज बातें होंगी घर-द्वार की। ‘घर-द्वार’ इन दो शब्दों में ‘द्वार’ का आशय तो ‘दहलीज’ है, पर ‘घर’ विस्तृत अर्थो में है। ‘घर’ शब्द ‘गृह’ से बना है। इसका अर्थ हिंदी में पूरे मकान से या उस भवन से, जिसमें निवास करते हैं, लिया जाता है। बंगला भाषा में ‘घर’ का आशय होता है ‘बाड़ी’। ‘पिसी बाड़ी’ यानी मौसी का घर। ‘बाड़ी’ ‘बारी’ का दूसरा रूप है। ‘बासा’ बंगाल में और ‘डेरा’ बिहार में रहने का स्थान बताने के लिए कहा जाता है। रहने की इमारत के लिए नहीं। कहीं से आकर किसी जगह में ठहर जाने, रह जाने को ‘डेरा’ डालना कहते हैं। नगर निगम का अमला जब अवैध रूप से बसाई गई झुग्गी बस्तियों में पहुँचता है, तब चेतावनी स्वरूप लोगों से ‘डेरा-डंडा’ उठा लेने की अपील करता है।

इसी ‘डेरा-डंडा’ को थोड़ा दार्शनिक अर्थ में सोचें तो ‘रमना’ शब्द सामने आता है। संस्कृत के ‘रमण’ से आया है यह शब्द। ‘रमण’ का आशय है ‘खेल’ या ‘खेल करना’। जिस स्थान पर बैठकर या ठहरकर मन को विनोद मिलता हो वह स्थान होगा ‘रमण करने लायक’ यानी ‘रमणीय’ रमन कराने वाला रमणीक। इसे रम्य भी कहते हैं। ‘सुरम्य’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘रम्य’ से हुई है। जब कोई कहे ‘मेरा मन यहाँ ‘रम’ रहा है’, तो इसका आशय यह हुआ यहाँ मुझे अच्छा लग रहा है। जब कोई कहता है कि आप कहाँ रमते हैं? तब यही समझा जाता है कि ठहरने का स्थान पूछ रहा है, उपरोक्त प्रश्न केवल साधुओं या सिद्ध लोगों के साथ ही किया जाता है। ‘ग्रह’ शब्द ‘गृह’ से एकदम अलग है, इसमें कोई समानता नहीं है।

‘मकान’, ‘गृह’, ‘घर’, ‘बसेरा’, ‘घरोंदा’, ‘गरीबख़ाना’, ‘दौलतख़ाना’, ये सभी निवास स्थान का संकेत देते हैं, पर हमने कभी ध्यान दिया कि हम जहाँ रहते हैं, उस घर के कितने हिस्से हैं? कौन-सा हिस्सा कहाँ खत्म होता है और कहाँ से शुरू होता है। उस घर मंे जहाँ हम ‘रमते’ हैं, उस स्थान को अब घ्यान से देखें और निम्नांकित हिस्सों को समझने का प्रयास करें- चौपाल, चौतरा, चबूतरा, छज्जा, बरामदा, दर, दरीचा, मुंडेर, छत, सहन, आँगन, ज़ीना, कुर्सी, ताक़, आला, महराब, खंभा, कोठरी, परछत्‍ती, अटारी, दहलीज, चौखट, ड्योढी, देहरी, कमान, हौज, चहबच्चा, दुछत्‍ती , बैठक, धंँुआरा, हाता, चहारदीवारी, फर्श, नींव, बुनियाद, चौकी, भोखा, मोहरी, नाली, तहख़ाना, किवाड़, सीढ़ी, खंड, माला, मंजिल, रोशनदान, तल्ला, मियानी, बरोठा, झरोखा, ओसारा, बंगला, कोठी, कोठा, तांड और खिड़की।

घर के इन हिस्सों को आपने जिस क्षण पहचान लिया सचमुच उस वक्त अपना घर ‘घर’ लगेगा।