गुरुवार, 27 जनवरी 2022

शब्दों का संसार

 

शब्द रचे जाते हैं,

शब्द गढ़े जाते हैं,

शब्द मढ़े जाते हैं,

शब्द लिखे जाते हैं,

शब्द पढ़े जाते हैं,

शब्द बोले जाते हैं,

शब्द

तौले जाते हैं,

शब्द टटोले जाते हैं,

शब्द खंगाले जाते हैं,

#अंततः

शब्द बनते हैं,

शब्द

संवरते हैं,

शब्द सुधरते हैं,

शब्द निखरते हैं,

शब्द हंसाते हैं,

शब्द मनाते हैं,

शब्द

रूलाते हैं,

शब्द मुस्कुराते हैं,

शब्द खिलखिलाते हैं,

शब्द गुदगुदाते हैं,

शब्द मुखर हो

जाते हैं,

शब्द प्रखर हो जाते हैं,

शब्द मधुर हो जाते हैं,

फिर भी-

शब्द चुभते हैं,

शब्द

बिकते हैं,

शब्द रूठते हैं,

शब्द घाव देते हैं,

शब्द ताव देते हैं,

शब्द लड़ते हैं,

शब्द

झगड़ते हैं,

शब्द बिगड़ते हैं,

शब्द बिखरते हैं

शब्द सिहरते हैं,

#किंतु-

शब्द मरते

नहीं,

शब्द थकते नहीं,

शब्द रुकते नहीं,

शब्द चूकते नहीं,

अतएव-

शब्दों से खेले

नहीं,

बिन सोचे बोले नहीं,

शब्दों को मान दें,

शब्दों को सम्मान दें,

शब्दों पर ध्यान

दें,

शब्दों को पहचान दें,

ऊँची लंबी उड़ान दे,

शब्दों को आत्मसात करें...

उनसे उनकी

बात करें,

शब्दों का अविष्कार करें...

गहन सार्थक विचार करें,

क्योंकि-

शब्द

अनमोल हैं...

ज़ुबाँ से निकले बोल हैं,

शब्दों में धार होती है,

शब्दों की महिमा अपार होती है

शब्दों का विशाल भंडार होता है,

और सच तो यह है कि-

शब्दों का अपना

एक संसार होता है

मंगलवार, 18 जनवरी 2022

छत्तीसगढ़ का लोकपर्व छेरछेरा


साधिकार भेंट लेने और उदारता से भेंट देकर आत्मसंतुष्ट होने का पर्व है - छेरछेरा

हमारे छत्तीसगढ़ राज्य में पौष पूर्णिमा तिथि पर छेरछेरा पर्व मनाया जाता है। यह खरीफ़ सीजन के समस्त कृषि कार्य सम्पन्न हो जाने की खुशी में मनाया जाने वाला कृषि लोकपर्व है। छेरछेरा का आशय खरीफ सीजन के समूचे कृषि कार्य का पूरे अंचल में सम्पन्न, अंतिम,आखिरी,चरम या पूर्ण हो जाना है।जब व्यक्तिगत एक कृषक की खरीफ सीजन फसल की मिंजाई का काम जिस दिन आखिरी होती है उसे छेवर कहते हैं। पूरे अंचल में पौष पूर्णिमा तक सभी कृषकों का कार्य सम्पन्न हो जाता तब इसे छेरछेरा कहते हैं।यानी इस सीजन के कृषि कार्यों की आखिरी यानी समापन होकर,कृषि कार्य से फुर्सत मिल जाती है।धन धान्य से कृषकों की कोठी भर जाती है।इसी खुशी में पूरा अंचल छेरछेरा त्यौहार मनाता है।इस मौके पर सभी का घर धन धान्य से परिपूर्ण हो जाता है।गरीब,कृषि मजदूर व्यक्ति के घर भी सम्पन्नता रहती है।हर कोई कुछ न कुछ भेंट देने में सक्षम रहता है। व्यक्तिगत या सामूहिक तौर पर लिंगभेद,आर्थिक बंधन,आयु,जाति,धर्म,पंथ व मजहब से परे बच्चे,युवा व बुजूर्ग हाथ में टोकरी या थैला लेकर घर घर जाकर जोश खरोस व जोर शोर से छेरछेरा शब्द उच्चारित करते हैं। इसे छेरछेरा कूटना कहते हैं।फिर जिससे जो बन पड़ता है वह वही उनकी टोकरी या थैले में डाल देता है।वैसे यह जिम्मा अधिकांशतःमाँ लक्ष्मी स्वरूपा महिलाएं ही पूरा करती हैं।  चूंकि धान छत्तीसगढ़ की प्रमुख खरीफ फसल है और यह अनाज प्रत्येक घर में उपलब्ध रहता है इसलिये धान भेंट करने की परंपरा अधिक प्रचलित है।इसमें याचना या दान का भाव निहित नही  है। वस्तुतःकृषि कार्य समाप्त हो जाने की खुशी में साधिकार भेंट लेने और उदारता से भेंट देकर आत्मसंतुष्ट होने का पर्व है।

तभी तो लोग मनोरंजक शैली में कहते सुने जा सकते हैं यथा-

छेरछेरा,छेरछेरा माई कोठी के धान ला हेरहेरा।

 छेरिकछेरा छेर मड़ईकिन छेरछेरा।

अर्थात कृषि कार्य समाप्त हो गया।इस खुशी में माई कोठी अर्थात् मुख्य धान भंडारन स्थान से धान निकालकर हमें भेंट में दें।

यदि किसी से धान निकालने में थोड़ी भी देर हो जाती है तो छेरछेरा कूटने वालों के मुंह से बरबस ही निकल पड़ता है-

अरन बरन कोदो दरन,

जभे देबे तभे टरन।

चाहे कुछ भी हो। यहाँ तक कि हमें कोदो भी दलना पड़ जाये अर्थात कितनो भी प्रतीक्षा करनी पड़े जब आप भेंट देंगे तभी आपके द्वार से टलेंगे।पूरा छत्तीसगढ़ इस पर्व में खुशी से सराबोर रहता है। छत्तीसगढ़ी व्यंजन जैसे बरा,सोंहारी,गुलगुला भजिया प्रत्येक घर में बनता है। खाते खिलाते आनंद मग्न हो जाते हैं। लोकगीत संगीत वालों की छेरछेरा टोली इन खुशियों में पूनम के चार चांद लगा देती है।इस पर्व की महत्ता व मान बढ़ाते हुए जन भावनाओं के अनुरूप इस वर्ष से छत्तीसगढ़ सरकार ने छेरछेरा पर्व पर सार्वजनिक अवकाश की स्वीकृति दी है जो जन सरोकार के दृष्टिकोण काफी सराहनीय कदम है।

बन्धु राजेश्वर खरे

लक्ष्मण कुंज

शिव मंदिर के पास,अयोध्यानगर

महासमुंद,( छ. ग.)

रविवार, 19 दिसंबर 2021

चार दिन के जिनगानी

का होगे कउंवा मन आजकल कांव-कांव नइ करत हे, बिलई मन मियाउं-मियाउं नइ करत हे, कुकुर मन भुके बर भुलागे हे, कोलिहा मन हुंआ-हुंआ नइ करत हे, सुआ अउ पड़की-परेवना मन के घला बोलती बंद होगे हे। खबर तो ये घला मिलत हे के जंगल के शेर, भालू मन के दहड़ई घला सटकगे हे। गजराज मन घला चिंघाड़े ले छोड़ देहे, कइसे का होगे हे ते ओकरो मन के कांही आरो नइ मिलत हे? कुंआरी टूरी मन असन छेहेल्ला मारत, फुगड़ी रे फांय-फांय कस कूदत-फुदकत राहय तेनो हिरनी मन अइसे गत ला उतार देहें जइसे दस दिन के लांघन-पियास मरत हे। ये पशु-पक्षी मन ला अइसे का होगे हे ते कोनो चिटपोट नइ करत हे ? गोठियाय बताय ले छोड़ देहें। अउ तो अउ टेड़गी (बिच्छु) घला हा डंक मारे ले छोड़ देहे, अतके नहीं ढोड़िहा, पिटपिटी मन लरघियाय असन परे हे अउ घोड़ा करायत अउ डोमी सांप मन घला कोनो ला नइ डसत हे। अतेक माथा मारत हौं, जाने-समझे के कोशिश करथौं फेर मोर मगज मं थोरको कांही बात नइ बइठत हे। सोचत-सोचत मति हेरागे, पथरा परगे अक्कल ला फेर कांही पल्ला नइ परत हे? कोन अइसे का मंतर मार देहे ये जानवर मन ला, का जादू-टोना कर देहें ओला समझ नइ सकत हौं ? कुकुर मन मेर जाथौं तब मोला आवत देख के अइसे भाग जथे जइसे पुलिस ला देख के चोर मन भागथें। पहिली उही कुकुर मन देखयं तहां ले पूछी हलावत, मुड़ी मटकावत मोर करा आके पांव में लोटय, चांटय, चुमय फेर आज अइसे का होगे ते उलटा गंगा बोहाय ले धर लेहे? पिंजरा मं बइठे सुआ देखय तहां ले सीताराम..सीताराम.. काहय, मोर हाथ मं लाली मिरचा ला झटक के कोंटा मं जातिस तहां ले खा लेवय। बदमाश कउंआ अतेक सिधवा अउ मौनी बाबा बन जाही अइसन कभू सोचे नइ रेहेंव, कई घौं मोर हाथ ले रोटी ला झटक के चोरहा मन असन भाग जतिस अउ छानही मं बइठ के मोला टुहूं देखावत खातिस तेला आज का होगे हे, कांव-कांव नइ करत हे? ओकर बर आरुग रोटी लेके आय हौं लेवना डार के फेर वाह रे चंडाल थोरको कनमटक नइ मारत हे। नइ जानौं अइसे काबर होगे फेर कोनो न कोनो अइसे बात हे जेकर सेती ये सबो झन के बोलती बंद होगे हे। गुनी, ओझा, जोतिसी अउ पंडित मन करा जब जाके देखावत, सुनावत अउ बिचरावत हौं के का अइसे बात होगे जेकर से एमन चिंव-चांव नइ करत हें, मौन साध लेहें बैरागी मन बरोबर। कुछु जबर कारन हे का, अइसन तो कभू देखे-सुने ले नइ मिलत रिहिस हे ? शनि, राहू अउ केतू के कोनो भारी नजर तो नइ लग गेहे? कोनो बिनाश के समय तो नइ अवइया हे एकर मन उपर, दुख के पहाड़ तो नइ गिरइया हे? ओमन पंचांग ला उलट-पुलट के अतेक देखिन फेर कोनो अइसे बात ओकर मन के पकड़ में नइ अइस जइसे बइद मन बीमार मनखे के नाड़ी ला टमड़ते साठ रोग के लछन ला जान जथे अउ बीमारी ला बता देथें। उदास होगे हौं, का करौं कांही समझ नइ परत हे? एक दिन गऊ माता करा जाथौं तब देखथौं ओकर आंखी डाहर ले आंसू झरत रहिथे। गुनेंव पहिली रोटी खवाय ले जात रेहेंव तब ललक के अपन पांव ला सरकावत मोर कोती बढ़य। बछरु कभू ओकर आंखी ले ओझल हो जाय तब रंभावत सुने हौं। ओकर रंभई ला सुनके बछरु दउड़ के आ जाय। आज देखथौं, ओ बछरु नइ हे ओकर तीर मं न ये गाय रंभावत हे। कुछ समझ नइ परत हे। गऊ माता के ढरत आंसू ला देख के मोरो आंखी डबडबा जथे। सोचौं, जरूर ये माता उपर कोनो भारी बिपत आगे हे, संकट खपलागे हे। ओकर पीठ उपर अपन हाथ फेरथौं, आंसू ला पोंछथौं। अपन कान ला ओकर मुंह मेर दताथौं, तब ओहर बतइस, तौंन ला सुनके मोर जीव करलागे। किहिस-बेटा अब ये संसार हमर मन के लइक नइ रहिगे हे, जीना अबिरथा होवत हे। ये उही भारत देश हे जिहां भगवान कृष्ण गऊ चरावय, बंशी बजा-बजा के हमर मन के मनोरंजन करय, आज उही देश मं हमर मन के खुलेआम हत्या होवत हे, गऊ मांस बिकत हे। सब ले जादा गऊ मांस तो इही देश ले निरयात होवत हे तौंन शरम के बात हे। सब गऊ मांस खाय ले धर लेहें। जीयत मारत हे हमन ला। अइसन अधरमी देश मं तो अब एको पल जीये के मन नइ होवत हे। हमर मन के जीवन संकट मं हे| न हमर रक्षा देश के जनता कर सकत हे अउ न इहां के सरकार। उही पाके मौत ला सुरता करके रोवत हौं। 

देखथौं, सब कोती ककरो जीवन अब इहां सुरक्षित नइहे। हाथी, भालू, शेर, चीता अउ बेंदरा मन घला एती तेती भटके ले धर ले हें। जंगल के जंगल सफाचट होवत जात हे तब उहां के रहवइया जीवधारी अउ परानी मन कहां जाही। उकरो मन के मरे बिहान हे। बड़े-बड़े राक्षस मन काल बन के उहां मंडरावत हे। मनखे मन अपन सुख के खातिर बड़े-बड़े उद्योग अउ कल-कारखाना लगाावत हे। सरकार हा ओमन ला पंदोली देवत हे। महाकाल बन के ये धरती मं उतरे शैतान मन ला देख-देख के नदिया, नरवा, तरिया, डोंगरी, पहाड़, रुख-राई ठाढ़ सुखावत हें, ओकर मन के जीव कांपे ले धर लेहे। कभू बारहों महीना नदी-नरवा मं बहइया पानी सागर मेर जाके पांव पखारय तेन मन सुखाय ले धर लेहें, पहाड़ अउ रुख राई मन तो बड़े-बड़े थ्रेसर मशीन मन देखते साठ कांपे ले धर लेथे। कब कोन मशीन आके ओकर छाती ला दंदोर दिही, फोकला ओदार दिही। कोन जानही ओकर मन के दुख ला, आंखी के आंसू ला? अपन मरावय तब काला बतावय तइसे कस हाल होगे हे ओकर मन के। सोचेंव, ये मनखे मन हा सब के बइरी तो नइ बनगे हे, काल बन के तो नइ आगे हे? जहर उगलत हे नाग बन के, डसत हे सबो झन ला, मुरकेटत हे सब के जीवन ला। काबर दुख देवत हे, का मिलही अइसन करे ले? का ये बात ला नइ जानत हे के जौंन जइसन करहीं तइसन पांही तौंन ला? तब काबर अइसन अजलइत करथें, काबर छानही मं चढ़ के होरा भुंजत हें? उत्तराखंड मं ओ साल का होइस, कइसे प्रकृति ओकर मन के बारा ला बजाय रिहिस हे? कोरोना हा का तमाशा खेल के नइ गिस तेला अतेक जल्दी भुला गेव? अइस कोनो ओकर मन के बाप बचाय बर ओमन ला? चेत जाव, जान जाव, कोनो ला सतावौ अउ दुख देवौ झन। चार दिन के जिनगी, जीयव अउ सब ला जीयन दौ। सब संग हांस गोठिया लौ, परेम के दू भाखा बोले मं काकर का बिगड़त हे? इही धरम हे, परेम बेवहार हे। जइसे करिहौ तइसे पाहौ, नइ मानिहौ तब जाहौ बाबाजी के ला धर के धारे धार।

परमानंद वर्मा

गुरुवार, 18 नवंबर 2021

ये तो होना ही था...

कभी सोचा न था, न ही समझा और जाना व माना था कि एक दिन ऐसा आयेगा कि मनुष्य जानवरों की तरह बेमौत मारे जाएंगे और उनकी लाशों को प्लास्टिक के पैकेट में लपेट कर यदा-कदा फेंक दिए जाएंगे, कुत्तों, कौंओ, चीलों और गिद्धों को भी मानव मांस चखने को नहीं मिलेगा। वक्‍त अपना खेल और करतब मदारी की तरह दिखाता है। देखने वाले देखते रह जाते हैं सशंकित होकर कि जैसा हो रहा है, देख रहे है कि ही वैसा ही दिन उलट कर उनकी तरफ ही न लौट जाए।

चौसर सौर शतरंज के खिलाडी अच्छी तरह जानते हैं खेल का कोई भरोसा नही। पांडव सब कुछ हार गए थे लेकिन कया जरूरत थी खेल को आगे बढ़ाने के लिए। हालांकि मना कर रहे थे कि आगे नही खेलेंगे लेकिन शकुनि मामा के झांसे में आखिर आ ही गए और फंस गए उनकी चाल में | कोई पत्नी को दांव पर लगाता है क्‍या, ऐसा तो उस समय के इतिहास में नहीं हुआ था। और द्रोपदी तो कुलवधू थी। क्‍या शकुनि, कौरव सम्राट, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण जैसे महान हस्तियां उस समय वहां उपस्थित थी। जब द्रौपदी को दांव पर लगाया गया तब किसी की बुद्धि काम नही आई, गिरवी रख दी गई थी अकल को। खेल जो होना था, हुआ जरा सी बात ने महाभारत रच दिया। ऐसा ही होता है, अनहोनी हो जाती है, जिसकी कभी सपने में कल्पना नही की गई थी।

सत्य और शांति, धर्म का मूल तत्व है। जब ये दोनों तत्व विद्यमान होते हैं संसार में प्राणी सुखमय जीवन व्यतीत करते है। लेकिन कहते हैं समय कभी एक समान नही रहता। सत्य और शांति को कालांतर में ग्रहण घेर लेता है और असत्य और अशांति के भंवर जाल में जब वह फंस जाता है तब कलह और क्लेश बढ़ जाता है। संसार में हाहाकर मचने लगता है। धर्म, अधर्म का रूप ले लेता है। सज्जन दुर्जन बन जाते है और धार्मिक स्थल शैतानो का गढ़ बन जाता है।

सब कुछ ठीक-ठीक चल रहा था, कहीं किसी बात की आशंका नहीं थी, कि ऐसा भी हो जाएगा लेकिन अनहोनी को भला कौन रोक सकता है। एक दिन अचानक शूर्पनखा का प्रवेश हुआ और सब कुछ तमाम हो गया। सारी चतुराई धरी की धरी गई और उसको जो करना था किया, बर्बादी के सिवा हासिल आया कुछ भी नही। जब अशुभ ग्रहो का प्रवेश होता है और ग्रह गोचर अनिष्ट चाल चलते है तब अमरीका जैसे देश के भी होश ठिकाने आ जाते है । यदि ऐसा न होता तो अफगानिस्तान से उसको भागना नहीं पड़ता। तालिबानियो के सामने उसने घुटने टेक दिए। न धन काम आया और न शक्ति।

कुत्ते, कुत्ते ही होते है चाहे उसे कितने ही दुध पिलाओं, मांस खिलाओं, कार में बिठाकर तफरीह कराओं। उसका जो मौलिक और प्राकृतिक गुण होता है , उसे काई भी नष्ट नही कर सकता। हिंसक पशुएं कितने पालतू क्यो न हो जाए लेकिन वक्‍त आने पर अपनी असलियत गुण को वह दिखा ही देता है उसी तरह मनुष्यों में भी आजकल पाशविकता बढ़ रही है। जहां सत्य, शांति, और धर्म का हास होगा वहां शैतानों की संख्या निरंतर बढ़ती जाएगी। अब तो कुछ देशो ने शैतानो की पाठशालाएं भी खोल रखी है। इन शालाओ से पढ़कर निकले छात्र अराजकता, आतंक, लूटपाट, अपहरण, आगजनी, हत्या और कुकर्मो से अशांत है, उद्वेलित है। कब, कहां, किस समय, क्‍या हो जाएगा कहा नहीं जा सकता ?

अभी अपने ही देश में देख लीजिए, सलमान खुर्शीद के नव प्रकाशित किताब को लेकर कोहराम मच गया। उनके नैनीताल स्थित घर पर तोड़फोड़ और आगजनी हो गई। कहा जा रहा है कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद के किताब “सनराइज ओवर आयोध्या : नेशनहुड इन ओवर टाइम्स” में हिंदुत्व की तुलना आतंकी समूहों बोकोहराम और आईएसआईएस से की गई है। इसके बाद से खुर्शीद निशाने पर हैं। कुमाऊं के डी आई जी के अनुसार कुछ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। किसी धर्म व सम्प्रदाय के खिलाफ इस तरह की टिप्पणी व आरोप अवांछनीय और निंदनीय है। क्‍या सोचकर ऐसा पत्थर फेंका गया है इसे वही जाने लेकिन खुर्शीद तो वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं एडवोकेट हैं। केंद्रीय मंत्री रहे हैं, उनसे ऐसी अपेक्षा नहीं थी। लेकिन होनी को कौन रोक सकता है? जब द्रौपदी को दाँव पर लगाने और चीरहरण जैसी घटना को बड़े-बड़े धुरंधर नही रोक सके, उनकी मति मार गई तब खुर्शीद जैसे खिलाड़ी का क्‍या कहिए, ऐसा तो होना ही था और हो गया। पासा फेंका गया है, खेल आगे देखिये क्‍या-क्या होता है ?

   – परमानंद वर्मा


शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

छत्तीसगढ़ के राऊत नाचा के दोहों में कटाक्ष





छत्तीसगढ़ की दिवाली में एक प्रमुख आकर्षण होता है राऊत-नाचा। यदुवंशियों द्वारा पारे जाने वाले दोहों और  गाये जाने वाले गीतों के साथ ताल मिलाते हुए आकर्षक परिधानों से सुसज्जित बजनियों की थाप से जब गांड़ा बाजा घिड़कता है तब शौर्य-श्रृंगार से सजे अहीरों के संग संग समूचा छत्तीसगढ़ थिरकने लगता है।सरस दोहों, गीतों और नृत्यों की त्रिवेणी में पूरा छत्तीसगढ़ डूबकी लगाता है,

तब लगता है कि ये मतवाली दिवाली छत्तीसगढ़ की है।
राऊत नाचा छत्तीसगढ़ के लोकगीत,लोकसंगीत व  लोकनृत्यों का सिरमौर है। ऐसी कोई लोकविधा नही जो इसमें न समाया हो। स्वागत सत्कार,रामकृष्ण भक्ति,देवधामी पूजा अर्चना,संत कबीर,तुलसीदास व रहीम के दोहे,प्रकृति-प्रेम,पशुधन महिमा,आल्हा-उदल गाथा,लोकगाथायें,सुआ पंड़की,ददरिया,करमा,समाजोपयोगी संदेश परक दोहों गीतों के अलावा हास-परिहास के साथ हास्य-व्यंग्य के दोहे भी नर्तकों द्वारा उच्चारित किया जाता है जिसे दोहा पारना कहते हैं।जैसे सुआ गीत का परिचय मुखड़ा तरी हरि नाहना मोर नाहा नरी नाहना रे सुआ होता है वैसे ही राऊत नाचा दोहों-गीतों का परिचय मुखड़ा होता है- अरे ररे ररे ररे भाई रे.....होता है।इसी के साथ ही नर्तक दोहों व गीतों का उच्चारण करते हैं।
सबसे पहले सगा-पहुनों और आगन्तुकों के स्वागत में गांव एवं ग्राम देवता की महिमा बखान करते हुए दोहे की ये बानगी देखिए-

भले गांव मोर तुमगांव भईया कि,बहुते उबजे बोहार हो।
ठाकूर देवता के पंईया लागंव कि,सबो सगा ल जोहार हो।

दिवाली में गौमाता और उसका चरवाहा यानी अहीरों के शोभायमान साज श्रृंगार व मदमस्त मनोभावों को अभिव्यक्त करता एक दोहा- 

रंग माते रंगरसिया भईया कि,छापर माते गाय हो।
अहीरा माते देवारी संगी कि,शोभा बरन नहि जाय हो।।

राऊत चरवाहों के दैनिक उपयोग व उनके साज श्रृंगार में लाठी विशेष मायने रखती है।उनकी लाठी बहूधा तेंदू पेड़ की होती है जो काफी मजबूत मानी जाती है।लाठी उसकी मान-मर्यादा,ताकत और स्वाभिमान का प्रतीक होती है-

तेंदूसार के लउठी भईया कि,सेर सेर घीव खाय।
इही लउठी के परसादे अहीरा,पेल के गाय चराय।।

भगवान कृष्ण के वंशज होने के नाते कृष्ण ही उनके आराध्य हैं।संकट के समय उन्हे पुकारते ही सभी बाधाओं से मुक्त हो जाने का अहसास देखिये-

अड़गड़ टूटगे बड़गड़ टूटगे,भूरी भंईस के छांद हो।
उँहा ले निकले गोकुल कन्हैया,भागे भूत मसान हो।।

जैसे बाजा वैसे नाचा।बाजा ठीक से बजता रहे तभी नर्तकों में स्फूर्ति बनी रहती है और नाचा का आकर्षण बरकरार रहता है।वाद्यों को टन्न रखने व  वादकों में ऊर्जा का संचार करते रहने के लिये उनका हौसला आफजाई करने का अनोखा ढंग इस दोहे में-

आमा खांधी के ढोल बनाये,बेंदरा खाल छवाय हो।
परे बठेना बजकरी के तब,उदल खाँव खाँव नरियाय हो।।

माता पिता का स्वयं की सुख-सुविधा में मगन रहना और बच्चों के प्रति उनकी गैरजिम्मेदाराना हरकतों व लापरवाही  पर कटाक्ष करता यह दोहा-

दार भात के सरपट सईया,मोंगरी मछरी के झोर हो।
दाई ददा सुत भुलाईन, लईका ला लेगे चोर हो।।

भाइयों के प्रति स्नेह,दुलार व अपनापन झलकता यह प्रसंग-

राम दुलरवा लछमन भईया,पण्डो दुलरवा भीम हो।
आल्हा दुलरवा उदला भईया कि, रन में फिरे अधीर हो।।

जीवनसंगिनी के रंग रूप के फेर में न पडें,जीवन के सुख दुख में उसकी भूमिका को महत्व दें। हास-परिहास व हास्य-व्यंग्य से सराबोर यह दोहा-

तींवरा भाजी पेट पिरौना,बेल फर मतौना हो।
कारी सुआरी मन मिलौना,गोरी बड़ बिटोना हो।।

पर्यावरण संरक्षण में पेंड़ पौधों का खास महत्व है। पेड़ पौधों को न काटें,उसके काटने पर बुरा परिणाम भोगना पड़ता है। प्रकृति संरक्षण का भाव प्रकट करती ये पंक्तियाँ-

बर काटे बईमान कहाये,पीपर काटे चण्डाल हो।
मऊरत आमा ल काटे,तेला नइ आवय मनुख अवतार हो।।

राऊत चरवाहा अपने मालिक के प्रति यद्यपि पूज्य भाव रखता है तथापि जब वह मालिक के घर के आँगन में नृत्य करने जाता है तो आखिर में उन्हे सःपरिवार दीर्घायु होने की मंगलकामना के साथ हास्य से भरपूर आशीष कुछ इस तरह देता है-

भात भात ल खाहू मालिक,दार ल घलो पीहू।
असीस लेलव हमर अहिरा के,टूकना तोपात ले जींहू।
          
                                      बन्धु राजेश्वर राव खरे
                                           लक्ष्मण कुंज
             .        शिव मंदिर के पास,अयोध्यानगर महासमुन्द
छत्तीसगढ़ 493445

गुरुवार, 9 सितंबर 2021

सूरदास का स्वप्न

कभी सूरदास ने एक स्वप्न देखा था कि रुक्मिणी और राधिका मिली हैं और एक दूजे पर न्योछावर हुई जा रही हैं।  सोचता हूँ, कैसा होगा वह क्षण जब दोनों ठकुरानियाँ मिली होंगी। दोनों ने प्रेम किया था। एक ने बालक कन्हैया से, दूसरे ने राजनीतिज्ञ कृष्ण से। एक को अपनी मनमोहक बातों के जाल में फँसा लेने वाला कन्हैया मिला था, और दूसरे को मिले थे सुदर्शन चक्र धारी, महायोद्धा कृष्ण। कृष्ण राधिका के बाल सखा थे, पर राधिका का दुर्भाग्य था कि उन्होंने कृष्ण को तात्कालिक विश्व की महाशक्ति बनते नहीं देखा। राधिका को न महाभारत के कुचक्र जाल को सुलझाते चतुर कृष्ण मिले, न पौंड्रक-शिशुपाल का वध करते बाहुबली कृष्ण मिले। 

रुक्मिणी कृष्ण की पत्नी थीं, पटरानी थीं, महारानी थीं, पर उन्होंने कृष्ण की वह लीला नहीं देखी जिसके लिए विश्व कृष्ण को स्मरण रखता है। उन्होंने न माखन चोर को देखा, न गौ-चरवाहे को। उनके हिस्से में न बाँसुरी आयी, न माखन। कितनी अद्भुत लीला है। राधिका के लिए कृष्ण कन्हैया था, रुक्मिणी के लिए कन्हैया कृष्ण थे। पत्नी होने के बाद भी रुक्मिणी को कृष्ण उतने नहीं मिले कि वे उन्हें "तुम" कह पातीं। आप से तुम तक की इस यात्रा को पूरा कर लेना ही प्रेम का चरम पा लेना है. रुक्मणि कभी यह यात्रा पूरी नहीं कर सकीं।

राधिका की यात्रा प्रारम्भ ही 'तुम' से हुई थीं। उन्होंने प्रारम्भ ही "चरम" से किया था। शायद तभी उन्हें कृष्ण नहीं मिले। कितना अजीब है न! कृष्ण जिसे नहीं मिले, युगों युगों से आजतक उसी के हैं, और जिसे मिले उसे मिले ही नहीं। तभी कहता हूँ, कृष्ण को पाने का प्रयास मत कीजिये। पाने का प्रयास कीजियेगा तो कभी नहीं मिलेंगे। बस प्रेम कर के छोड़ दीजिए, जीवन भर साथ निभाएंगे कृष्ण। कृष्ण इस सृष्टि के सबसे अच्छे मित्र हैं। राधिका हों या सुदामा, कृष्ण ने मित्रता निभाई तो ऐसी निभाई कि इतिहास बन गया।

राधा और रुक्मिणी जब मिली होंगी तो रुक्मिणी राधा के वस्त्रों में माखन की गंध ढूंढती होंगी, और राधा ने रुक्मिणी के आभूषणों में कृष्ण का वैभव तलाशा होगा। कौन जाने मिला भी या नहीं। सबकुछ कहाँ मिलता है मनुष्य को...  कुछ न कुछ तो छूटता ही रहता है। जितनी चीज़ें कृष्ण से छूटीं उतनी तो किसी से नहीं छूटीं। कृष्ण से उनकी माँ छूटी, पिता छूटे, फिर जो नंद-यशोदा मिले वे भी छूटे। संगी-साथी छूटे। राधा छूटीं। गोकुल छूटा, फिर मथुरा छूटी। कृष्ण से जीवन भर कुछ न कुछ छूटता ही रहा। कृष्ण जीवन भर त्याग करते रहे। 

हमारी आज की पीढ़ी जो कुछ भी छूटने पर टूटने लगती है, उसे कृष्ण को गुरु बना लेना चाहिए। जो कृष्ण को समझ लेगा वह कभी अवसाद में नहीं जाएगा। कृष्ण आनंद के देवता है। कुछ छूटने पर भी कैसे खुश रहा जा सकता है, यह कृष्ण से अच्छा कोई सिखा ही नहीं सकता।


रविवार, 5 सितंबर 2021

तो हो जाए एक एक समोसा... ।।

"समोसा" सुनते ही मुंह में पानी आ जाना स्वाभाविक है। यह तिकोना, मोटा और भूरा सा व्यंजन अपनी कद काठी के कारण अपनी बिरादरी में अलग ही नजर आता है। अपने रूप रंग में भले ही यह उन्नीस बैठता हो लेकिन स्वाद में पूरा बीस है और शायद यही कारण है कि तेल की कढ़ाई में घंटों उछलकूद करने वाला गरमागरम समोसा हर उम्र के लोगों की पहली पसंद है। शायद ही कोई अभागा हो, जिसे समोसा खाने का मौका न मिला हो क्योंकि यह तो हर छोटी-बड़ी पार्टी की शान है....लेकिन क्या आपको पता है कि आपके जन्मदिन की तरह आपके प्रिय समोसे का भी एक दिन है जिसे विश्व समोसा दिवस (World Samosa Day) जाता है।...शायद कम ही लोगों को यह पता होगा कि दुनिया भर में 5 सितम्बर को विश्व समोसा दिवस मनाया जाता है।

हमारे-आपके प्रिय समोसे का बस यह दुर्भाग्य है कि उसका दिन ‘शिक्षक दिवस’ के साथ पड़ता है और गुरुओं को समर्पित इस दिन की गरिमा-भव्यता और दिव्यता में समोसा समर्पित शिष्य की भाँति अपने दिन को कुर्बान कर देता है।...इसलिए भले ही वह शिक्षक दिवस की हर दावत में डायनिंग टेबल पर पूरी शान और गर्व से इठलाता हो लेकिन अपना दिन खुलकर नहीं माना पाता। शिक्षक दिवस और समोसे के बीच एक खास सम्बन्ध यह भी है हर व्यक्ति का और प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी का ‘समोसा गुरु’ जरुर होता है, जो यह बताता है कि ‘गुरु फलाने शहर में फलाने के समोसे बहुत गज़ब हैं’...और हर शहर-हर गली नुक्कड़ पर स्वादिष्ट समोसे का यह गुरुपन पलता-बढ़ता रहता है।
समोसा दिवस पर अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए जब हमने इस लज़ीज़-मोटे समोसे का इतिहास खंगालना शुरू किया तो गूगल गुरु ने बताया कि समोसा असल में फारसी शब्द 'सम्मोकसा' से बना है। माना जाता है कि समोसे की उत्पत्ति 10वीं शताब्दी से पहले मध्य पूर्व में कहीं हुई थी और यह 13वीं से 14वीं शताब्दी के बीच भारत में आया। ऐसा माना जाता है कि समोसा मध्य-पूर्व के व्यापारियों के साथ भारत आया और आते ही पूरा भारतीय हो गया। तभी तो आजकल हर शहर की गली,मोहल्ले और नुक्कड पर समोसा आसानी से मिल जाता है। वैसे इन दिनों एक थ्योरी यह भी चल रही है कि अरब देशों में गेहूँ तो होता नहीं है तो उनको समोसा बनाने के लिए मैदा कहाँ से मिलेगा इसलिए समोसा पूरी तरह भारतीय पैदाइश है। बहरहाल अब तो समय के साथ समोसा रंग-रूप,आकार-प्रकार,स्वाद और गुण भी बदलता जा रहा है। शहरों में नमकीन की दुकानों पर मिलने वाले छोटे सूखे समोसों से लेकर दिल्ली के पास नोएडा में मिलने वाले गरमा-गरम छोटे समोसों और दिल्ली के ही नूडल्स वाले समोसे तक इसने लम्बा सफ़र तय किया है। अब तो इसने धीरे से मिठाइयों के बीच भी घुसपैठ कर ली है और चाकलेट और खोया भरे मीठे समोसे के रूप में भी अपने स्वाद से आमोखास की जुबान पर चढ़ने लगा है। पूर्वी दिल्ली में तो करीब 25 प्रकार के समोसे मिलते हैं। यहां आलू के साथ पास्ता, नूडल्स, पिज्जा और चॉकलेट समोसे जैसे कई प्रकार के समोसे लोगों को खूब भा रहे हैं । समोसे की लोकप्रियता का ही प्रमाण है कि दशक भर पहले बिहार के साथ साथ हिंदी पट्टी में यह नारा खूब लोकप्रिय हुआ था... ‘ जब तक रहेगा समोसे में आलू-तब तक रहेगा बिहार में लालू’...और इसीतरह ‘मिस्टर और मिसेज खिलाड़ी’ फिल्म के एक गीत ‘जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहूँगा तेरा मैं शालू..’ ने भी समोसे की लोकप्रियता की आड़ में खूब कमाई की थी।....खैर इस फिल्म या लालूप्रसाद की लोकप्रियता तो समय के साथ कम होती गयी लेकिन हमारा समोसा आज भी पूरी आन-बान-शान के साथ स्वाद के पहले पायदान पर कायम है....तो चलिए हो जाए एक-एक समोसा.... ।।
संजीव शर्मा