सोमवार, 23 जनवरी 2012

शैतानी खेल की दुनिया


सुनील मिश्र
आजकल कुनकुनी दोपहर बड़ी सुहाती है। ज्यादातर दफ्तरों में दोपहर का आधा घंटा भोजनावकाश का रहता है। लोग उसका मौसम जरा पहले से काफी बाद तक मनाते हैं। बीच-बीच में भी जितनी बार किसी बहाने से कुर्सी से उठने का मौका मिल गया, तो बोनस ही हुआ। बहरहाल, ऐसी ही एक दोपहर अपने आॅफिस के पीछे जाकर कुछ देर के लिए खड़ा हुआ। सौ कदम की दूरी पर ही वहां एक नाला बरसों से बहता है। काला गंदा पानी ठहर-ठहर कर बहता है। कचरा, पन्नी, कभी-कभार मरे प्राणी भी बहते हैं उसमें। उसी नाले के ऊपर लोहे का अर्धचंद्राकार सेतु सरीखा बना हुआ है। वहीं काफी बगुले इक ट्ठा होते हैं। कुछ-कुछ खाते रहते हैं, मगर दस-पंद्रह की संख्या में उनका उड़-उड़ कर आता जमावड़ा देख कर अच्छा लगता है। उस दिन भी ऐसा ही था। मैंने देखा, जरा दूरी पर सात-आठ साल के दो बच्चे खड़े हैं। उनमें से एक गुलेल ताने एक आंख बंद किए किसी बगुले पर निशाना साध रहा था। मुझे लगा कि कुछ ही पल में आश्वस्त होते ही वह गुलेल में फंसाया कंकड़ किसी न किसी बगुले की तरफ मार ही देगा। अपनी ही जगह से मैंने जोर से डपटा तो दोनों निशाना छोड़ कर भाग गए।
उनको भागते देख कर मुझे हंसी आ गई और याद आ गया अपना बचपन। ऐसा ही कुछ करते हुए अपना बचपन भी बीता है। उस समय पास-पड़ोस और मुहल्ले के चाचा, बाबा इस कृत्य को शैतानी का खेल मानते थे। तब उनके इस फतवे पर बड़ी झुंझलाहट होती थी। गुलेल कोई बना-बनाया नहीं मिलता था। उसके लिए काफी जतन करना होता था। अंगूठे और उसके पड़ोस की उंगली की तरह लकड़ी को हम केटी कहा करते थे। उसकी तलाश बड़ी मुश्किल से पूरी होती थी और उसे किसी पेड़ की डाल में ढूंढ़ कर काटते थे। फिर पास से किसी साइकिल की दुकान से दस-पंद्रह पैसे में ट्यूब को फीतेनुमा कटवा कर लाते थे। कंकड़ फंसाने के लिए मोची से चमड़े का चौकोर टुकड़ा कटवाते थे। इन सबको लेकर भी फीतेनुमा ट्यूब के बीचोंबीच चमड़े का टुकड़ा फंसा कर दोनों छोरों को केटी के सिरों पर अलग-अलग बांध कर फिर चिड़िया, तोता, गिरगिट पर निशाना साध कर बड़ा मजा आता
था। कई बार हाथ में चोट भी लग जाती थी। हम सभी दोस्तों के पास गुलेल का जुगाड़ होता था। मस्ती-मजे में अपने किसी दोस्त के पुट्ठे पर छोटा-मोटा कंकड़ मार कर हंसते थे। जाहिर है, यह खेल शैतानी का खेल कहा जाता था। वक्त रहते यह सब छूट गया। बगुला मारने वाले छोकरों के हाथ गुलेल देख कर बचपन में जैसे जाकर लौट आए।
यों बचपन में जितने खेलों में अपनी महारथ याद आती है, उन सभी को करीब-करीब शैतानी का खेल ही करार दे दिया गया था। चालीस साल पहले पास-पड़ोस के रिश्ते बड़े मायने रखते थे। कोई न कोई चाचा या भैया डांट-फटकार और मारपीट के लिए पूरे मुहल्ले की ओर से अधिकृत होते थे। हममें से कोई भी इसका शिकार हो जाता था। उस समय हम कंचे खेलते थे, जो खालिस जीत-हार का खेल होता था। ‘डालडा’ के खाली डिब्बों में कंचों का संग्रह करते थे। यह खेल भी शैतानी का खेल माना जाता था। गिल्ली-डंडा अपना खुद बनाते थे और खेलते थे। यह भी शैतानी का खेल था, क्योंकि उससे किसी की भी आंख फूट जाने का खतरा होता था। गर्मियों के मौसम में बांस की लग्गी बना कर घरों के पीछे से कैरी चुराने और नमक के साथ खाने की मस्ती भी शैतानी कहलाती थी। घर के पास बिजली घर से चुपचाप अल्यूमीनियम का तार चुराते थे। रोज दोपहर को सोन पापड़ी-गजक करारी वाला सिर पर थाली लेकर निकलता था। उससे आधी तौल सोन पापड़ी लेकर मिल-बांट कर खाते थे। याद है कि एक बार पच्चीस-पचास ग्राम के तार के चक्कर में आधा किलो वजन का बड़ा तार खींच लाए थे, जिस पर सोन पापड़ी वाले ने धमकाया था। हम बहुत डर गए थे और कई दिन उसके आने के समय पर घर के भीतर चले जाते थे।
आज वैसा बचपन भी नहीं है और न उस तरह की शैतानी के खेल और न ही वैसा हौसला। आपस की दोस्ती जिस तरह बचपन में तब निभाई जाती थी, आज उसका एक उदाहरण भी देखने को नहीं मिलता। गुलेल, गिल्ली-डंडा, कंचे, पतंग, गुलाम डंडी जैसे खेल भी समयातीत हो गए। अब खेल से खिलवाड़ जैसा डर बन गया है। इसीलिए खेल की अवधारणा बचपन और किशोरावस्था से एक तरह से गायब ही हो गई है।
सुनील मिश्र

सोमवार, 2 जनवरी 2012

किसने कह दिया कि समाज का विश्‍वास नहीं रहा मीडिया पर!


-मनोज कुमार
अरूण शौ री पत्रकार हैं या राजनेता, अब इसकी पहचान कर पाना बेहद कठिन सा
होता जा रहा है। वे पत्रकार की जुबान बोल रहे हैं या राजनेता की, यह कह
पाना भी संभव नहीं है। पिछले दिनों भोपाल में एक मीडिया सेमीनार में
उन्होंने जो कुछ कहा, उसमें एक पत्रकार तो कहीं था ही, नहीं बल्कि एक
राजनेता की भड़ास दिख रही थी। पता नहीं उन्हें क्या हो गया था, वे भी औरों
की तरह मीडिया को कटघरे में खड़ा कर गये। वे अपनी रौ में कह गये कि मीडिया
पर समाज विष्वास नहीं करता है। अरूण षौरी को कौन बताये कि जिस मीडिया पर
आप सवाल उठा रहे हैं, वह मीडिया भी आपसे ही शुरू होता है। अरूण षौरी षायद
यह भूल रहे हैं कि वे उसी समाज का हिस्सा हैं जहां उनकी बोफोर्स रिपोर्ट
की गूंज दो दषक से ज्यादा समय से हो रही है। वे एक राजनेता के रूप में
मीडिया की विष्वसनीयता पर सवाल उठा सकते हैं किन्तु एक पत्रकार के रूप्
में उन्हें यह कहना षोभा नहीं देता है। मीडिया को अविश्‍सनीय कहने का
मतलब है स्वयं को अविष्वनीय बताना और हमारा मानना है कि अरूण षौरी
अविष्वनीय नहीं हो सकते। पत्रकार अरूण षौरी कतई अविष्वसनीय नहीं हो सकते
हैं, राजनेता अरूण शौरी के बारे में कुछ कहना अनुचित होगा।
अरूण षौरी जिस कद के पत्रकार हैं, उन्हें बहाव का हिस्सा नहीं बनना
चाहिए। उन्हें ऐसा कुछ नहीं बोलना चाहिए जिससे अपनों को ठेस लगे लेकिन
दुर्भाग्य से उन्होंने ऐसा ही सब कहा। वे जिस केन्द्र के आयोजन में बोल
रहे थे, जो इस समय अनेक कारणों से चर्चा में है। इस मंच से ऐसे ही अमृत
वचन की अपेक्षा थी, सो वे उनके मानस को षांत कर गये। लगभग एक दषक से
मीडिया घोर आलोचना के केन्द्र में है। कुछ अपने कर्मों से तो कुछ दूसरों
के रहम पर। मीडिया पर, पत्रकारों पर सवाल उठाने के बजाय उन मीडिया घरानों
पर क्यों पत्थर नहीं उछाले जाते जो लोग अपने कारोबार को बचाने के लिये
मीडिया को कारोबार बना दिया है। जिन लोगों का पत्रकारिता का क,ख,ग नहीं
आता, वे लोग मीडिया हाउस बनाते हैं तो अरूण षौरी उन लोगों का विरोध क्यों
नहीं करते। पुरानों की बात छोड़ दें, नयी पीढ़ी को अरूण शौरी पत्रकारिता की
षुचिता का पाठ क्यों नहीं पढ़ाते। अरूण शौरी अब महज एक पत्रकार नहीं हैं
बल्कि अनुभव की एक पाठषाला हैं और पाठषाला ही जब सार्वजनिक मंच से अपनी
ही आलोचना करेगा तो समाज का विष्वास उठना आवश्‍यक है।
यह कम दुर्भाग्य की बात नहीं है कि अकेला पत्रकारिता एक ऐसा प्रोफेषन है
जहां उनके गुरू सार्वजनिक रूप से स्वयं की आलोचना करते हैं। इसे भी
सकरात्मक नजर से देखना चाहिए लेकिन बात केवल आलोचना तक ही रह जाती है।
सुधार की कोई कोषिष किसी भी स्तर पर नहीं हो रही है, यह इससे भी बड़ा
दुर्भाग्यजनक बात कहीं जानी चाहिए। मीडिया एवं मीडिया षिक्षण में आ रहे
लोगों के पास प्रषिक्षण की कमी है। जिस तरह मीडिया में काम करने वालों को
इस बात की समझ पैदा नहीं की जा रही है कि उनकी समाज के प्रति किस गंभीर
किस्म की जवाबदारी है, उसी तरह मीडिया षिक्षकों के पास भी प्रषिक्षण की
कमी है। मीडिया षिक्षकों के लिये अरूण षौरी सरीखे पत्रकार शिक्ष ण के काम
आ सकते हैं। सेमिनारों की संख्या में बढ़ोत्तरी करने के बजाय
षिक्षण-प्रषिक्षण में समय और साध्य लगाना उचित होगा। अच्छा होता कि मंच
से मीडिया की आलोचना करने के बजाय वे इसकी सुधार की बात करते। स्वयं कोई
पहल करने का संदेष दे जाते।
हम उम्मीद और केवल उम्मीद कर सकते हैं कि अरूण षौरी एवं उनके समकालीन
पत्रकार पत्रकारिता की नवीन पीढ़ी को यह पाठ बार बार नहीं पढ़ाएगी कि
मीडिया पर समाज का विष्वास उठ गया है बल्कि वह यह बताने की कोषिष करेगी
कि समय के साथ मीडिया का विस्तार हुआ है और यह विस्तार दिषाहीन है।
विस्तार को दिषा देने की जरूरत है। मंच पर खड़े होकर विलाप करने से मीडिया
का भला नहीं होने वाला है और न ही समाज का। मेरा अपना मानना तो है कि
समाज का विष्वास मीडिया पर और बढ़ा है और कदाचित इसी विष्वास के कारण
मीडिया की छोटी सी छोटी भूल को भी समाज चिन्हित करता है ताकि मीडिया सजग
और सबल बने। इस बात को सभी को समझना होगा। स्वयं अरूण षौरी जी को भी। और
उन लोगों को भी जिन्हें मंच और माईक मिलते ही मीडिया की आलोचना करने पर
टूट पड़ते हैं। मैं उन सब लोगों से आग्रह करूंगा कि वे लोगों के बीच जाएं
और बतायें कि एक सिंगल कॉलम की खबर लिखने में एक पत्रकार को कितनी मेहनत
करनी होती है। एक पत्रकार सुविधाभोगी नहीं है और नहीं हो सकता है यदि वह
ताउम्र मीडिया में है तो। इस बहाने राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी को
याद कर लीजिये। और पहले जाएं तो पराड़करजी का भी स्मरण करना उचित होगा।
मायाराम सुरजन भी इसी कड़ी में एक नाम हैं। नीरा राडिया प्रकरण में उछलने
वाले नाम पर आरोप तो दागे गये लेकिन वे आज किसी न किसी माध्यम में बैठे
हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि समाज ने उन्हें अस्वीकार नहीं किया है। ऐसे में
समाज का मीडिया पर से विश्‍वास उठ जाने की बात निराधार है। अरूण शौरी जी एक
राजनेता के रूप् में मीडिया अविश्‍वसनीयता की बात करते हैं तो ठीक है
लेकिन पत्रकार अरूण शौरी ऐसा कहते हैं तो उन्हें एक बार फिर सोचना होगा
कि सच क्या है।

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

एक पत्र सांताक्लॉस के नाम ...

डॉ महेश परिमलसांताक्लॉज केवल उपहार देने वाला एक देवदूत ही नही, बल्कि मासूमों को अपना प्यार लुटाने वाला एक ऐसा शख्स है, जिससे बच्चे कई अपेक्षाएँ पालते हैं. बच्चे तो आखिर बच्चे होते हैं, वे क्या समझें सांताक्लॉज के व्यक्तित्व को. वे तो उसे देवदूत मानते हैं और उनसे अपनी माँगें मनवाते हैं. सांताक्लाँज एक कल्पना है, इसकी जानकारी मासूमों को नहीं है. वे उसे एक सच्चाई मानते हैं. ऐसे में प्राकृतिक आपदाओं से पीडि़त कोई मासूम सांताक्लॉज से अपने स्वर्गीय माता-पिता को ही माँग ले, तो उसकी माँग भला किस तरह से पूरी हो सकती है. कुछ इसी तरह की माँग एक मासूम ने सांताक्लॉज से की है, प्रस्तुत है उस मासूम का पत्र...
प्यारे सांता,
लोग तुम्हें उपहार बाँटने वाले एक देवदूत के रूप में जानते हैं. पूरे विश्व के करोड़ों मासूमों को तुम्हारा इंतजार रहता है. कई मासूमों को तो तुम्हारा साल भर इंतजार रहता है. पहले मुझे तुम्हारा इंतजार नहीं रहता था, लेकिन इस बार मैं तुम्हारी राह देख रहा हूँ. मेरी विवशता कुछ दूसरी ही है. पहले मैं खास था, पर अब मैं आम हूँ. पहले मेरे पास सबकुछ था, पर आज मेरे पास मेरी ईमानदारी के सिवाय कुछ भी नहीं है. पर स्वर्गीय माता-पिता से विरासत में मिली ये ईमानदारी मैं अधिक समय तक सँभालकर नहीं रख पाऊँगा. मेरी ये ईमानदारी अब मेरा साथ नहीं दे रही है. इस ईमानदारी ने मुझे कई रात भूखे सोने के लिए विवश कर दिया है. लगता है बहुत जल्द ही मैं इस ईमानदारी कोअलविदा कह दूँगा.
हर साल इस धरती पर क्रिसमस की रात तुम आते हो. सूनी आँखों में आशाओं के दीप जलाते हो, उदास चेहरे पर मुस्कान खिलाते हो. मासूमों के देवदूत बनकर उनके लिए अपना प्यार लुटाते हो. तुम्हारी झोली में ढेरों उपहार होते हैं, जो उन मासूमों के इंद्रधनुषी सपनों को एक आकार देते हैं. यही कारण है कि हर बच्चा क्रिसमस की रात तुम्हारा बेसब्री से इंतजार करता है. इस इंतजार में पूरे साल भर के इंतजार का पल-पल का सफर होता है और विदा लेती बेला में फिर से एक लंबे इंतजार का अहसास होता है. इस अहसास के साथ जीते हुए करोड़ों मासूम सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी ही राह तकते हैं.
आज उन करोड़ों में एक नाम मेरा भी शामिल हो गया है. कल तक नहीं था मुझे तुम्हारा इंतजार. क्योंकि कल तक मेरे लिए तुम एक कोरी कल्पना ही थे. उस समय मेरे पास वह सब कुछ था, जो एक बच्चा चाहता है. माता-पिता ही नहीं, बल्कि बहुत से दोस्त, बहुत सारे खिलौनों का भी संसार था मेरे आसपास. तुम्हें केवल दोस्तों के बीच समय गुजारने और अपनी बुद्धिमानी दिखाने के लिए ही जानबूझकर याद किया जाता था. किंतु आज? आज तुम मेरे लिए एक फरिश्ते से कम नहीं हो. क्योंकि अब तुमसे मुझे कई अपेक्षाएँ हैं. मैं जानना चाहता हूँ कि तुम क्या-क्या दे सकते हो. अब मेरे पास केवल अच्छी यादों के सिवाय कुछ नहीं है.
करीब पाँच महीने पहले ही मुम्‍बई में जो धमाका हुआ, उसमें मेरे मॉं की मौत हो गई। उनका कोई दोष नहीं था, वह तो एक आम आदमी की तरह खरीददारी करने गई थी। शायद मौत उनका रास्‍ता देख रही थी। इसके बाद तो लोग मुझ पर दया करने लगे, कोई कुछ दे जाता, कोई कुछ। इस दौरान मेरे पिता ने ही मुझे मॉं बनकर पालते रहे। मुझे समझदार बनाने की कोशिश करते रहे।
मैं समझदार हो भी जाता, यदि वे असमय ही मुझे छोड़ न गए होते। एक दिन रास्‍ते में उन्‍हें एक र्टक ने कुचल दिया। मेरी दुनिया भी उसी ट्रक के नीचे खत्‍म हो गई। आपदाऍं इस तरह से जीवन में आती ही रहती हैं। सच तो यह है कि इन आपदाओं से कई मासूम अपने ऊपर स्नेह की छाँव से वंचित हो जाते हैं. फिर चाहे वह कश्मीर का भूकंप हो या फिर सुनामी. हर तरह की आपदा मेरे जैसे कई मासूमों को अनाथ कर जाती है. इन आपदाओं ने मुझसे मेरा बचपन ही छीन लिया. मैं कहीं का नहीं रहा. पहले माँ मुझे पिता के हवाले कर ईश्वर के पास चली गई. मैं पिता की छाया में ही बढऩे लगा, पर दूसरे हादसे ने मुझसे मेरे पिता को ही छीन लिया, अब मैं क्या करुँ?
आज मैं बेसहारा होकर यहाँ-वहाँ भटक रहा हूँ. कभी भूखा ही सो जाता हूँ, तो कभी पानी पीकर अपनी भूख मिटाता हूँ. कभी किसी का कोई छोटा-मोटा काम करने से कुछ पैसे मिल जाते हैं, तो खुशी से झूम उठता हूँ. कभी किसी के सामने हाथ फैलाया नहीं, तो इसके लिए हिम्मत भी नहीं कर पाता हूँ. मैं जानता हूँ कि अगर यही हाल रहा तो एक दिन यही करना होगा. कब तक याद रख पाऊँगा, ईमानदारी का पाठ? पेट की भूख सब भूला देती है. मुझ मासूम को भी एक दिन भिखारी बना ही देगी. लेकिन मैं वैसा नहीं बनना चाहता. मैं तो पढऩा चाहता हूँ. खूब आगे बढऩा चाहता हूँ. अपने माता-पिता के सपनों को साकार करना चाहता हूँ. लेकिन कैसे क रूँ? मेरा तो कोई वर्तमान ही नहीं, तो भविष्य क्या होगा? मेरी आँखों में तो अब आँसू भी नहीं, हाँ सूखे आँसुओं के बाद की कोरी जलन है, जो मुझे भीतर तक आहत कर देती है. मैं पल-पल टूट रहा हूँ और ऐसे में क्रिसमस के अवसर पर तुम एक विश्वास बन कर आए हो.
सुना है कि हर साल बड़े-बड़े शहरों में कई लोग सांता क्लास के वेश में मासूमों के बीच आते हैं और अपनी झोली में से अनेक उपहार निकाल कर उन्हें देते हैं. उनके होठों पर मुस्कान खिलाते हैं. अब तो विदेशों में कई ऐसे टे्रनिंग सेंटर भी खुल गए हैं, जहाँ बुजुर्ग व्यक्ति सांता क्लॉस बनने की ट्रेनिंग लेते हैं, ताकि 24 दिसम्बर की रात वे प्यारे बच्चों के साथ एक यादगार क्षण बिता सकें. मुझे भी उस 24 दिसम्बर की रात का इंतजार है.
सुना है, तुम बच्चों को कई तरह के उपहार बाँटते हो, पर मुझे उपहार नहीं, खुशियाँ चाहिए. मुस्कान चाहिए. मेरे लिए उपहार मत लाना सांता क्लॉस, वह तो मुझे बहुत मिल जाएँगे. मुझे तो चाहिए मेरे माता-पिता, मेरे दोस्त, मेरा घर, मेरा परिवार. मुझे तो यहीं मिल जाएगी खुशियाँ. इन खुशियों मेें डूबकर ही मैं अपने उन सभी साथियों को याद कर लूँगा, जिनके दामन में खुशियाँ है ही नहीं. तुम्हें आना ही होगा सांता क्लॉस, मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ. अपनी झोली से मेरी झोली में थोड़ी सी खुशियाँ डालने तुम आओगे ना सांताक्लॉस?
तुम्हारे इंतजार में....
एक मासूम
डा. महेश परिमल

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

नैतिक मूल्यों के साथ-साथ बदलते पैमाने


  डॉ. महेश परिमल
फिल्मी दुनिया में आने के बाद भी धर्मेद्र ने काफी संघर्ष किया। पहली फिल्म करने के बाद उन्हें मात्र 51 रुपए मिले। धीरे-धीरे हालात बदले। सितारा बनते ही उन्होंने जुहू में एक बंगला लिया और पूछे जाने पर कि कितना बड़ा बंगला है, उन्होंने कहा यही कोई चालीस-पचास मंजियां (खटियाएं) आ जाएंगी। ये था उनका ठेठ गँवईपन, जिसमें पंजाब की माटी का सौंधापन कूट-कूटकर भरा है।  जीवन में इंसान अपने तरीके से मापदंड तय करता है। कई चीजें कुछ लोगों के लिए बड़ी सहज होती हैं। इसे वे उसी सहजता से बोल भी जाते हैं। हमारी प्रवृत्ति ही ऐसी है कि हम उसे पेचीदा बना देते हैं। उसे गुिफत करते रहते हैं। सहज और सरल को यथावत् रखा जाए, तो कई पेचीदे सवाल भी आसानी से सुलझ सकते हैं। अाी कुछ दिनों पहले ही छत्तीसगढ़ जाना हुआ। रास्ते में एक ग्रामीण से पूछा कि यहाँ से उदयपुर कितने किलोमीटर है। ग्रामीण ने बड़ी सहजता से उत्तर दिया- बस वाला 30 रुपए लेता है। एकदम आसान जवाब। उसने दूरी को न तो कोस से नापा, न ही किलोमीटर से। उसके पास न तो फर्लाग का पैमाना था, न ही गज का। ग्रामीण ने जो बताया, वह दोनों को समझ में आने वाला था। अब यह बात अलग है कि आप अपडेट नहीं हैं। यदि आप अपडेट हैं, तो आपको आसानी से पता चल जाना चाहिए कि बस वाले 30 रुपए में कितने किलोमीटर ले जाते हैं।  दूरी को रुपए से नापने का यह तरीका अपने आप में अनोखा है।
जिस तरह से प्यार को सीमाओं से नहीं बाँधा जाता, ठीक उसी तरह जब कोई कहे कि मैं उसे उतना ही प्यार करता हूँ, जितना हनुमान जी श्री राम से करते थे। यहाँ आकर सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं। इससे अधिक तो कोई किसी से प्यार कर ही नहीं सकता। हमारी आदत है कि हम इस प्यार को पेचीदगियों के साथ समझना शुरू कर देते हैं। सागर की अनंत गहराई, जमीं से सितारों की दूरी, जीवन की अंतिम साँसों तक आदि। ये सब सीमाएँ हैं। जीवन बहुत ही सरल और सहज है। इतना अधिक की उसे नापने के लिए हमारे पास कोई पैमाना नहीं है। भोथरे हो गए हैं हमारे पैमाने। हम केवल प्यार ही नहीं, बल्कि संवेदनाएँ और अनुभवों को भी मापने लगे हैं। एक कोशिश केवल एक कोशिश इंसानियत को मापने के लिए करो, तो समझ में आ जाएगा कि इसे मापने के लिए हमारा हर पैमाना काफी छोटा साबित होगा।
  डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

धार्मिक स्थलों में भगदड़ के पीछे है भक्तों की आतुरता


डॉ. महेश परिमल
हिंदू मंदिरों में होने वाली भगदड़ के लिए यदि कोई जवाबदार है, तो वह है भक्तों की आतुरता। कहा गया है कि भीड़ के पास ताकत होती है, पर विवेक नहीं होता। भीड़ कभी भी हिंसक हो सकती है। भीड़ कभी दूसरों का विचार नहीं करती। यही कारण है कि जब भी कहीं भीड़ होती है, उसे काबू करना बहुत मुश्किल होता है। भीड़ में जान गँवाने वाले भी कम नहीं होते। देश में हर साल ऐसा कोई न कोई हादसा होता ही है, जिसमें भीड़ के कारण लोग मौत के आगोश में समा जाते हैं। कुंभ मेले में भगदड़ के बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने कहा था कि धार्मिक आयोजनों में किसी वीआईपी को नहीं जाना चाहिए। इससे वहाँ की व्यवस्था गड़बड़ा जाती है।
गायत्री परिवार के स्थापक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य एक उच्च कोटि के विद्वान और समाज सुधारक थे। हरिद्वार में गायत्री परिवार ने जिस आध्यात्मिक चेतना केंद्र की स्थापना की है, उसका संचालन उत्तम रूप से किया जाता है। वैदिक धर्म के सिद्धांतों और उसके पीछे विज्ञान के संबंध में इस केंद्र द्वारा लगातार शोध किए जा रहे हैं। विश्व में फैले हुए गायत्री परिवार के केंद्र इस सात्विक विचारों का प्रचार निष्ठापूर्वक कर रहे हैं। ऐसे महापुरुष की जन्म शताब्दि के आयोजन में लोग जमा हों और उसमें धक्कामुक्की हो, जिसमें बीस लोगों की मौत हो जाए, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। हरिद्वार में हुई इस दुर्घटना की प्रारंभिक जाँच रिपोर्ट में पता चला है कि यह दुर्घटना आयोजकों की लापरवाही के बजाए भक्तों की आतुरता ही अधिक जवाबदार है।
हमारे देश में कहीं भी धार्मिक महात्सव हो, तो हजारों नहीं लाखों की संख्या में भक्त उमड़ पड़ते हैं। यदि आयोजक सचेत न हों, तो भगदड़ की पूरी संभावना होती है। इसमें भीड़ का मनोविज्ञान काम करता है। इसमें लोग अपना विवेक खो बैठते हैं। दूसरों का खयाल ही नहीं रखते। इस वर्ष जनवरी माह में दक्षिण भारत के शबरीमाला मंदिर में भी भगदड़ हुई थी। इसमें सौ से अधिक लोग मारे गए थे। इतने ही घायल हुए थे। इस दुर्घटना में मारे गए लोग कर्नाटक, तमिलनाड़ु, केरल और आंध्रप्रदेश के थे। केरल सरकार ने मृतकों के लिए 5 लाख रुपए देने की घोषणा भी की थी। इसकी जाँच भी हुई थी, पर उसका क्या हुआ, किसी को नहीं पता। वैसे भी जाँच रिपोर्ट पर किसी प्रकार के अमल की परंपरा हमारे देश में है ही नहीं।
हिमाचल प्रदेश में स्थित नैना देवी की शक्तिपीठ में सन 2008 के श्रावण महीने में हुई भगदड़ में 162 लोगों की मौत हो गई थी। एक टेकरी पर स्थित शक्तिपीठ के दर्शन के लिए करीब 50 हजार भक्त जमा हुए थे। उस समय तेज बारिश हो रहीे थी। बारिश की रक्षा के लिए तैयार किया गया एक शेड अचानक टूट गया। लोगों ने यह समझ लिया कि शिलाप्रपात हुआ है। इससे लोगों में घबराहट फैल गई। लोग इधर-उधर भागने लगे। इस भगदड़ में 162 लोग मारे गए। भगदड़ के उस माहौल में पुलिस द्वारा तैयार की गई रेलिंग से बाहर जाने की कोशिशें होने लगी। पुलिस ने भक्तों को रोकने की काफी कोशिशें की, पर जिन्होंने रेलिंग तोड़ी, वे सभी गहरी खाई में गिरने लगे। इसी मंदिर में 1978 में भी भगदड़ मची थी। जिसमें 64 लोग मारे गए थे। इस घटना से मंदिर प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया था। जहाँ भीड़ जमा होती है, वहाँ अव्यवस्था तो होती ही है। पर जो अफवाह फैलती है, उसे रोक पाना मुश्किल होता है। 2008 के सितम्बर माह में जोधपुर में चामुंडा देवी मंदिर में मची भगदड़ में 249 लोग मारे गए थे और 400 लोग घायल हुए थे। नवरात्रि के पहले दिन जोधपुर केप्रसिद्ध मेहरामगढ़ किले में 24 हजार भक्तों की भीड़ उमड़ी थी। इस मंदिर में जाने की जगह बहुत ही सँकरी है, भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बेरीकेड्स भी नहीं लगाए गए थे। इतने में एक धमाका हुआ, लोगों ने समझा, यह बम विस्फोट की आवाज है। लोगों में डर बैठ गया, वे भागने लगे। इससे सैकड़ों लोग कुचले गए। इस मंदिर प्रशासन का दोष अधिक नजर आता है। मंदिर से भक्तों के निकलने के सारे दरवाजे सील कर दिए गए थे। लोगों के जान बचाकर भागने की जगह नहीं मिली, इसलिए कुचले गए। महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित मांढर देवी के मंदिर में 2004 में भगदड़ मची थी। इसमें करीब 300 भक्तों की मौत हो गई थी। यह मंदिर एक टेकरी पर स्थित है। यहाँ पहुँचने के लिए सीढ़ी काफी सँकरी है। इस मंदिर में काली माता के दर्शन के लिए 25 जनवरी को करीब तीन लाख भक्त जमा हुए थे। भक्त जिस रास्ते से जा रहे थे, वहाँ नारियल के पानी के कारण फिसलन हो गई थी। इतने में करीब की एक दुकान में आग लग गई और गैस सिलेंडर फट गया। इस आवाज के कारण लोगों में घबराहट फैली और अनेक लोगोंे की मौत खाई में गिरने से हो गई।
सन 2010 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में कृपालु महाराज के आश्रम में भगदड़ मचने से 63 भक्तों की मौत हो गई थी। करीब सौ लोग घायल हो गए थे। कृपालु महाराज की पत्नी की पहली पुण्यतिथि को आश्रम द्वारा वस्त्र और बरतन दान किए जाने थे। इस दान को पाने के लिए करीब दस हजार लोग जमा हुए थे। वहाँ ऐसी अफवाह फैली कि आश्रम में एक बिजली के तार से करंट लगने से किसी भक्त की मौत हो गई है। घबराए लोगों ने दरवाजे की तरफ दौड़ लगाई, इस दरवाजे का निर्माण कार्य पूरा भी नहीं हुआ था। लोगों के हुजूम के कारण दरवाजा टूट गया। अनेक लोग उसके नीचे कुचल गए। इसमें जो 63 लोग मारे गए थे, उसमें से 37 तो बच्चे और 25 महिलाएँ थीं। ये सभी मुफ्त में मिलने वाली चीजों के लालच में आए थे।
हरिद्वार में इसके पहले कई भगदड़ मची है। 1995 में आयोजित कुंभ मेले में धक्का-मुक्की  से 39 लोगों की मौत हुई थी। 1954 में इलाहाबाद में आयोजित कुंभ मेले में जो भगदड़ मची, उसमें 800 लोग मारे गए थे। 200 लोग लापता हो गए। ये सभी गंगा नदी में डूब गए, ऐसी संभावना व्यक्त की गई। आजादी के बाद यह पहला कुंभ मेला था। इसमें करीब 40 लाख लोग जमा हुए थे। उस समय गंगा नदी का बहाव बदला गया था। इसलिए मेले की जगह में कमी आ गई थी। इस दौरान जब नागा बाबा शाही स्नान के लिए जा रहे थे, तब उनके दर्शनार्थ लोगों की भीड़ उमड़ी। इस मेले में कई नेता भी शामिल हुए थे। पुलिस उनकी सुरक्षा व्यवस्था में लग गई, इसलिए मेले की व्यवस्था में खामी रह गई। दुर्घटना के बाद पंडित नेहरु ने यह टिप्पणी की थी कि नेताओं को कुंभ मेले में जाने का मोह त्यागना होगा। जब दुर्घटना की जाँच द्वारा तैयार की गई समिति द्वारा की गई। इसकी जाँच रिपोर्ट से मेले की व्यवस्था में सुधार किया गया।
इन भगदड़ों में यही बात नजर आई कि जब कहीं हजारों-लाखों लोग जमा होते हैं, तो वहाँ पर मोब साइकोलॉजी काम करती है। विवेक काम नहीं करता। अनुशासन किसी काम का नहीं रह जाता। इंसान अपने होश-हवाश खो बैठता है। दूसरों की चिंता बिलकुल ही नहीं करता। भीड़ निर्भय हो जाती है। प्रतापगढ़ में कृपालु महाराज के आश्रम में गरीब जिस तरह से भगदड़ के शिकार हुए, उसके पीछे का भाव लालच और भय था। हरिद्वार में जो कुछ हुआ, उसके पीछे स्वार्थ और आतुरता थी। दुनिया के धार्मिक स्थल परोपकार करने का आदेश देते हैं और दूसरों की ¨चंता करना सिखाते हैं। किंतु इंसान भीड़ का हिस्सा बनते ही सब कुछ भूल जाता है। धार्मिक स्थलों पर आकर यदि लोग अपने साथ-साथ दूसरों की भी चिंता करने लगे, तो ऐसी दुर्घटनाओं पर कुछ हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। भीड़ को काबू करना मुश्किल है। पर कोई एक आवाज तो ऐसी होनी चाहिए, जिसे सुनकर लोग होश में आ जाएँ। भीड़ को नियंत्रित नहीं किया जा सकता, पर उसे बेकाबू करने के लिए एक छोटी सी अफवाह ही काफी