शनिवार, 11 मार्च 2017

किसी का भी झूठ पकड़ सकते हैं आप, जानें कैसे


लोगों की आदतें उनके स्वभाव का एक बड़ा हिस्सा बन जाती हैं। तभी तो वे क्या बोलते हैं, समझते हैं और क्या करना चाहते हैं इसका अंदाजा लगा पाना कठिन हो जाता है। उनका अंदाज़ इतना प्रभावशाली बन जाता है कि उनके द्वारा बोला गया झूठ भी सच लगने लगता है।

लोगों का अंदाज़

जी हां, कुछ लोगों का व्यक्तित्व ही कुछ इस प्रकार का होता है कि वह झूठ को भी सच से बढ़कर प्रदर्शित कर सकते की क्षमता रखते हैं। इतनी सफाई से झूठ बोलते हैं कि उसके सामने आपको सच्ची बात भी झूठी लगने लगती है।

झूठ से बचें

लेकिन सच को नीचा दिखाते हुए बोला गया झूठ आपके लिए बेहद हानिकारक है। इससे जितना हो सके बचें, परन्तु मुद्दा तो यह है कि हम कैसे पहचानें कि सामने वाला व्यक्ति सच बोल रहा है या झूठ’?

झूठ का आत्मविश्वास

क्योंकि उसका बोलने का अंदाज़, उसका आत्मविश्वास और उसकी ओर से दी गईं दलीलें हमें इस असमंजस में डाल देती हैं कि किस बात पर विश्वास करें और किस पर नहीं।

कुछ आसान टिप्स

आपकी इसी दुविधा को हल करने के लिए इस आलेख  में कुछ ऐसे तरीके बताए जा रहे हैं जो आपको झूठ पकड़ने में मदद कर सकते हैं। यह टिप्स इतने कारगर हैं कि ये एक विशाल समुद्र में से भी पत्थर का छोटा सा टुकड़ा खोज पाने जितनी क्षमता से लैस हैं।

सच एवं झूठ में फर्क

दरअसल यह कोई जादू-टोना नहीं है बल्कि ऐसे टिप्स हैं जिन्हें आज़माने पर आप सच एवं झूठ में फर्क खोज सकते हैं। लेकिन इसके लिए जरूरी है आपकी एकाग्रता। आप जितना ध्यानबद्ध होकर सामने वाले व्यक्ति की समीक्षा करेंगे, उतना ही आप समझ पाएंगे कि उसके दिमाग में चल क्या रहा है।

दिलोदिमाग में चल रही बात

दूसरे शब्दों में यह मन एवं मस्तिष्क में चल रही बात को खींचकर ज़ुबान पर लाने की एक कोशिश है, जिसके सफल होने की संभावना काफी ज्यादा होती है। इन आसान टिप्स में आपको जिस व्यक्ति के सच या झूठ का टेस्ट करना है, उसकी हर हरकत का ध्यान रखना होगा।

पढ़ें बॉडी लैंग्वेज

सबसे पहले ध्यान दें उसकी बॉडी लैंग्वेज पर। किसी से बात करते समय जब भी आपको शक हो कि सामने वाला इंसान हो ना हो आपसे झूठ बोल रहा है तो उसकी बॉडी लैंग्वेज यानी कि उस समय वह किस तरह से व्यवहार कर रहा है, उस पर ध्यान दें।

चेहरे की चिंता

यदि बोलते समय वह बेहद आराम से बैठा है, उसके चेहरे पर कोई चिंता नहीं है तो इसका मतलब है वह झूठ नहीं बोल रहा। लेकिन इसके विपरीत यदि बात करते समय अचानक वह अपने हाथ-पांव हिलाने लगे, हाथों को जेब के भीतर डाल ले या फिर पांव को बैठे-बैठे हिलाने लगे तो इसका मतलब है कि कुछ गड़बड़ है।

हाथ-पांव की हलचल

उसकी ऐसी हरकत उसके भीतर चल रही चिंता को दर्शाती है। झूठ बोलते हुए भी उसके पकड़े जाने का भय उससे ऐसे फिजूल काम करवाता है। अमूमन ऐसी अवस्था में लोग झूठ बोलते समय हाथ-पांव खुजाते हैं या फिर सिर खुजाते हैं। तभी समझ जाएं कि वह इंसान आपसे कुछ छिपा रहा है।

आंखों की मूवमेंट

बॉडी लैंग्वेज में खास है आंखों द्वारा की जा रही हरकत। आंखें हमारे मन की खिड़की का काम करती हैं। जो मन में है वही आंखें उसी रूप में व्यक्त कर देती हैं। यदि बात करते समय कोई पूरे आत्मविश्वास से आंखों में आंखें मिलाकर बात कर रहा है तो उसके दिल में कोई दोष नहीं है।

आंखें चुराकर बात करना

लेकिन यदि वह आंखें चुरा रहा है या फिर बात करते समय उसकी आंखें आपकी बजाय कहीं दूसरी दिशा में हैं तब भी यह उसके द्वारा बोले जा रहे झूठ की निशानी है। कई बार बातों को छिपाने के लिए भी लोग बोलते हुए ज़मीन की ओर देखते हैं।

आवाज़ की थरथराहट को पहचानें

केवल आंखों की घबराहट ही नहीं, आवाज़ की थरथराहट भी बोले गए झूठ को बखूबी व्यक्त कर देती है। अचानक आवाज़ की टोन का बदल जाना, या फिर जानबूझकर कुछ छुपाते हुए जल्दी में बात करना। इतना ही नहीं, आवाज़ की हिचकिचाहट भी झूठ का पर्दाफाश कर देती है।

हिचकिचाहट

ऐसे में आपको इस आवाज़ को पहचानने की जरूरत है। फर्ज़ कीजिए, आप किसी से बात कर रहे हैं और अचानक अपने मन का कोई शक दूर करने के लिए आपने उनसे कोई सवाल कर लिया, तभी आगे से आपको चुप्पी मिलती है।

बातों को घुमाना

कुछ पल की शांति और फिर दोबारा उकसाने पर वह इंसान बातों को घुमाते हुए जब सामान्य गति से तेज़ अंदाज़ में बात करता है तो तुरंत भांप लें कि वह इंसान आपको झूठी पट्टी पढ़ा रहा है।  
तभी कहा जाता है कि किसी व्यक्ति के बोलने के अंदाज़ को समझ पाना ही अपने आप में एक कला के समान है। और यदि आप इसमें सफल हुए तो आपको कोई इंसान भी झूठी बात कहने की हिम्मत नहीं करेगा।  
परन्तु कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यह जरूरी नहीं कि तेजी से बोलने का संबंध झूठ से ही है। कई बार हड़बड़ाहट में भी इंसान गति बढ़ा लेता है। ऐसे में अपनी दुविधा को दूर करने के लिए आप एक और तरीका अपना सकते हैं।  
यदि नॉर्मल तरीके से बात करते हुए आपका दोस्त बहुत धीरे और सोच-सोचकर बात करने लगे तो तब भी यहां शक की संभावना बन जाती है।

यहां बढ़ती है शंका


दरअसल बात केवल गति की नहीं है, बात यह है कि आपसे वार्तालाप करते समय यदि अचानक कुछ पूछे जाने पर सामने वाले व्यक्ति की बोलने की स्पीड में बदलाव आए तो इसका कारण झूठ हो सकता है।

शनिवार, 26 नवंबर 2016

क्यों नहीं मिलती एक अपराधी और बलात्कारी को सजा?

राजीव दीक्षित
आपमें से अगर कोई वकील मित्र है तो उनको बात जरा जल्दी समझ में आएगी। हमारे देश में न्याय व्यवस्था का जो सबसे बड़ा कानून है, उसका नाम है IPC इंडियन पीनल कोड, एक दूसरा कानून है CPC सिविल प्रोसीजर कोड, एक तीसरा कानून है क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (अपराध दंड सहीता), ये 3 कानून है, जो भारतीय न्याय व्यवस्था के आधार बताए गए हैं या जिन्हें आधार माना जाता है आपको मालूम है ये तीनो कानून अंग्रेजो के ज़माने के बने हुए हैं। IPC को बनाने का काम तो खुद मैकाले ने किया था, IPC की ड्राफ्टिंग खुद मेकाले की बने हुई है जिसको इंडियन पीनल कोड यानि भारतीय दंड सहीता कहते है जिसके आधार पर दंड की व्यवस्था होती है,

 मेकाले ने अपने पिता को एक पत्र लिखा है उस पत्र में वो कहता है कि मैंने भारत में ऐसे न्याय के कानून का आधार रख दिया है जिसपर भारतवाशियों कभी को न्याय मिलेगा ही नहीं, जिसके आधार पर भारतवाशी न्याय पा ही नहीं सकते। हमेशा इनके ऊपर अन्याय होगा ये अच्छा ही होगा क्योकि गुलाम जिनको बनाया जाता है उनके ऊपर अन्याय ही किया जाता है उनको न्याय नहीं दिया जाता फिर जब राजीव दीक्षित जी और उनके साथियों ने ढूंढ़़ना शुरू किया तो पाया कि जो IPC नाम का कानून भारत में मैकाले ने 1860 में लागु किया यही कानून अंग्रेजो ने आयरलैंड में सबसे पहले लागु किया था आयरलैंड को अंग्रेजो ने गुलाम बनाकर रखा हुआ है हजार साल से। तो आयरलैंड को गुलाम बनाकर रखने के लिए अंग्रेजो ने कानून बनाया Irish Penal Code उसी कानून को भारत में कह दिया Indian Penal Code ।
आप जानते है जब आयरलैंड लिखते हैं तो A से नहीं लिखा जाता, I से लिखा जाता है Ireland तो आयरलैंड का I ले लिया और इंडिया का भी I है तो कानून वैसे का वैसा ही लगा दिया इस देश पर, जो आयरलैंड का कानून था आयरिश पीनल कोड वही इंडियन पीनल कोड है।
जब राजीव दीक्षित जी ने आयरलैंड के पीनल कोड को खरीदकर पढ़ा और इंडियन पीनल कोड को पढ़ा, दोनों को सामने रखा, तो राजीव दीक्षित जी को इतना गुस्सा आया कि इसमें तो कोमा और फुल स्टॉप तक नहीं बदला गया है वो भी वैसे का वैसे ही है। बस इतना ही किया मैकाले ने कि आयरिश पीनल कोड में जहाँ-जहाँ आयरिश है, वहां वहां इंडियन और इंडिया कर दिया बाकी की सब धाराए वैसी की वैसी हैं, सब अनुछेद वैसे के वैसे है तो आयरलैंड को गुलाम बनाकर रखना है, इसलिए आयरिश पीनल कोड बनाया और भारत को गुलाम बनाकर रखना है तो इंडियन पीनल कोड बना दिया।

जिस कानून को गुलाम बनाने के लिए तैयार किया गया हो उस कानून के आधार पर न्याय कैसे मिलेगा बताइए जरा, अन्याय ही होने वाला है सबसे बड़ा अन्याय क्या होता है कि जब IPC के आधार पर जब कोई मुकदमा दर्ज होता है, इस देश में, तो सबसे पहले तो मुकदमा दर्ज होने में ही महीनो महीनो लग जाते है FIR करनी पड़ती है, उसके बाद पुलिस को साबित करना पड़ता है, सबूत जुटाने पड़ते है, अदालत में जाना पड़ता है इस पूरी प्रक्रिया में ही देर लगती है, क्योकि तरीका अंग्रेजो का यही है, फिर अगर वो मुकदमा दाखिल हो जाए तो सुनवाई शुरू होती है सुनवाई के लिए सबूत इकठे किए जाते हैं उन सबूतों के लिए अंग्रेजो के ज़माने का एक कानून है Indian Evidence Act. और वो सबूत जल्दी इकट्ठे हो नहीं पाते हैं, धीरे धीरे समय बढता जाता है और एक मुकदमे को 4 साल 5 साल 10 साल 15 साल 20 साल 25 साल 30 साल 35 साल समय निकल जाता है मुक़दमे को दाखिल करने वाला मर जाता है फिर उसके लड़के-लड़कियाँ उस मुक़दमे को लड़ते है वो जवान होकर बूढ़े हो जाते हैं तब भी मुकदमा चलता ही रहता है चलता ही रहता है उसमे कभी अंतिम फैसला नहीं आ पाता।

 हमारे देश का दुर्भाग्य है कि आजादी ने 63 वर्षो में हमारे देश की अदालतों में लगभग साढ़े 3 करोड़ (2009 के आकड़ो के अनुसार) मुक़दमे हैं जो दर्ज किए गए हैं अलग अलग प्रार्थियो के द्वारा लेकिन उनमे कोई फैसला नहीं आ पा रहा है, साढ़े 3 करोड़ मुक़दमे लम्भित पड़े हुए हैं पेंडिंग हैं। हमारे देश के न्याय व्यवस्था के अधिकारियो से जब पूछा जाता है कि इन साढ़े 3 करोड़ मुकदमो का फैसला कब आएगा तो वो मजाक करते हुए कहते हैं कि 300 -400 साल में फैसला आ जाएगा तो जब कोई उनसे पूछते हैं कि वो कैसे ? तो वो कहते हैं कि जिस गति से कानून व्यवस्था चल रही है इस गति से तो इन सभी मुकदमो का फैसला आने में 300- 400 साल तो लग ही जाएगे तो ना वादी (मुकदमा दर्ज करने वाला) जिन्दा रहेगा ना प्रतिवादी (जिसके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है) जिन्दा रहेगा, न्याय व्यवस्था को इससे कुछ लेना देना नहीं है कि वादी जिन्दा है या प्रतिवादी जिन्दा है उनको को लेना देना है अंग्रेजो के बनाए गए कानून के आधार पर फैसला देने से।

 अब राजीव दीक्षित जी बहुत गहरी बात आपके बीच रखते हैं और सारे राष्ट्र का ध्यान इस और आकर्षित करते हुए कहते हैं कि “कोई न्यायधीश अंग्रेजो के बनाए गए कानून के आधर पर अगर फैसला दे रहा हैं तो वो न्याय कैसे कर सकता है ये पूछिए? अपने दिल से पूछिए उस न्यायधीश से पूछिए ”
न्यायाधीशो से जब जब राजीव दीक्षित जी ने ये पूछा है कि “क्या आप न्याय देते हैं” तो वो कहते हैं कि ईमानदारी से हम न्याय नहीं दे पाते, हम को मुकदमो का फैसला करते हैं। फैसला देना अलग बात है न्याय देना बिलकुल अलग बात है।
अब आपको एक उदहारण से समझाते हैं फैसला क्या होता है और न्याय क्या होता है। मान लीजिए आपने एक गाय को एक डंडे से पिटा तो कानून के हिसाब से आपको जेल हो जाएगी, गाय को डंडे से पीटना भारत में अपराध है जुर्म है इसके लिए जेल हो जाती है लेकिन अगर उसी गाय को आपने गर्दन से काट दिया और उसके मास की बोटी-बोटी आपने बेच दी बाजार में, आपको कुछ नहीं होगा क्योकि कानून से वो न्याय सम्मत है अब गाय को डंडे से मारो तो जेल हो जाती है लेकिन गाय को गर्दन से काटकर उसकी बोटी-बोटी बेचो तो भारत सरकार करोड़ो रूपए की सब्सिडी देती है आपको।

 मै अगर गोशाला खोलना चाहूं तो इस देश की कानून व्यवस्था के अनुसार मुझे बैंक से कर्ज नहीं मिल सकता, लेकिन गाय को कत्ल करने के लिए कत्लखाना बनाना हो तो उसके लिए बैंक करोड़ो रूपए कर्ज देने को तैयार है मुझे। आप सोचिए मैं गौशाला बनाकर गाय का दूध बेचना चाहता हूँ, बैंक के पास जाता हूँ कि मुझे कर्ज दे दो। बैंक कहता है कि हमारी योजना में गाय को कर्ज देने की व्यवस्था नहीं है लेकिन उसी बैंक के पास मै जाता हूँ कि मुझे कत्लखाना खोलना है और मुझे कर्ज दे दो तो बैंक ख़ुशी से कर्ज देता है उस कर्जे पर ब्याज सबसे कम लिया जाता है और करोड़ों रूपए का कर्ज तो मुफ्त में दिया जाता है सब्सिडी के रूप में। आप बताओ कि अगर हम गाय का मास बेचने के लिए कतलखाना खोलू तो हमारे लिए कर्ज है सब्सिडी है गौशाला खोले गाय के पालन करने के लिए तो हमें ना तो सब्सिडी है ना बैंक की कोई मदद है ऐसी व्यवस्था में न्याय कहा हो सकता है।
और एक उदहारण से समझे अगर किसी बच्चे को जन्म लेने से पहले कोई मारे ना तो उसे गर्भपात कहके छोड़ देते हैं, लेकिन जन्म लेने के बाद मारे तो हत्या हो जाती है धारा 302 का मामला बनता है, बच्चे को गर्भ में मारे तो भी हत्या है जन्म लेने के बाद मारे तो भी हत्या है दोनों में सजा एक जैसी होनी चाहिए और वो फांसी ही होनी चाहिए, लेकिन जन्म से पहले मारो तो गर्भपात है और जन्म के बाद मारो तो हत्या है इसलिए इस देश के लाखों लालची डॉक्टर करोड़ो बेटियों को गर्भ में ही मार डालते है क्योकि गर्भ में मार देने से उन्हें फांसी नहीं होती है, गर्भ में बाहर मरेंगे तो उन्हें फांसी होने की संभावना है, एक करोड़ बेटियों को हर साल इस देश में गर्भ में ही मार दिया जाता है इसी कानून की मदद से। अब आप बताओ कि बेटी को गर्भ में मार दो तो गर्भपात और गर्भ में बहार मारो तो हत्या। अगर इन कानूनों के आधार पर कोई फैसला होगा तो क्या वो न्याय दे सकता है, फैसला हो सकता है न्याय नहीं दे सकता,
इसलिए राजीव दीक्षित जी इस देश के बड़े न्यायाधीशों को कहते हैं कि आप लोगो को अपना नाम बदलना चाहिए, कायदाधीश लिखना चाहिए, कानूनाधीश लिखना चाहिए आप न्यायाधीश तो हैं ही नहीं, क्योकि आप न्याय तो दे ही नहीं पा रहे है आप तो मुकदमो का फैसला कर रहे हैं, अगर अंग्रेजी में उनके शब्दों में कहे तो वो कहते हैं हम तो केस डीसाइड करते है, जजमेंट नहीं करते क्योकि न्याय देना बिलकुल अलग है मुक़दमे का फैसला देना बिलकुल अलग है। मुक़दमे का फैसला होता है कानून के आधार पर और न्याय होता है धर्म के आधार पर, सत्य के आधार पर। धर्म और सत्य से न्याय की स्थापना हो सकती है कानून से न्याय की स्थापना नहीं हुआ करती है। दुर्भाग्य से हमारे देश में धर्म और सत्य की सत्ता नहीं है कानून की सत्ता है लॉ एंड आर्डर की बात होती है धर्म और न्याय की बात नहीं होती तो ये अंग्रेज छोड़ के चले गए कानून व्यवस्था को और वही ढो रही है हम आजादी के 70 साल के बाद भी।
राजीव दीक्षित

शनिवार, 27 अगस्त 2016

मक्खियों में सोने-जागने के स्विच की खोज

मक्खियों को कैसे पता चलता है कि कब जागकर भिनभिनाना है और कब सो जाना है? अब ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के जेरो मीसेनबॉक और उनके साथी वैज्ञानिकों ने उस स्विच का पता लगा लिया है जो मक्खियों को सोने या जागकर सक्रिय होने का निर्देश देता है। मक्खियों और इंसानों की नींद के बीच कई समानताएं हैं। इसके चलते मक्खियां हमारी अपनी नींद को समझने के लिए एक अच्छा मॉडल जंतु है। इसी बात को ध्यान में रखकर ऑक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं ने मक्खियों की नींद का अध्ययन किया। इसके लिए उन्होंने ऑप्टोजेनेटिक्स नामक तकनीक का उपयोग किया। इस तकनीक में सबसे पहले जंतु में जेनेटिक फेरबदल के माध्यम से ऐसी व्यवस्था की जाती है कि उसकी तंत्रिका कोशिकाएं एक विशेष प्रकाश की रोशनी मिलते ही सक्रिय हो जाती है। ऐसी मक्खियां तैयार करने के बाद उन्होंने मक्खियों के मस्तिष्क में उन तंत्रिकाओं को उत्तेजित किया जो डोपामीन नामक एक रसायन बनाती हैं। इन तंत्रिका कोशिकाओं द्वारा बनाए गए डोपामीन ने नींद को बढ़ावा देने वाले हिस्से को निष्क्रिय कर दिया। यह हिस्सा पंखे के आकार की पृष्ठीय संरचना कहलाता है। मक्खियां तुरंत जाग उठीं।
लगभग इसी के साथ वाल्थम विश्वविद्यालय के फैंग गुओ और उनके साथियों ने एक अन्य प्रयोग किया। ऑप्टोजेनेटिक तकनीक का उपयोग करते हुए उन्होंने पाया कि यदि मक्खी की आंतरिक घड़ी का नियमन करने वाली तंत्रिका को उत्तेजित किया जाए तो मक्खियां सो जाती हैं। जब प्रकाश के माध्यम से इन तंत्रिकाओं को उत्तेजित किया जाता है तो वे ग्लूटामेट नामक एक रसायन बनाती हैं। ग्लूटामेट मस्तिष्क के मास्टर समेकर में जाकर सक्रियता को बढ़ावा देने वाली तंत्रिकाओं को निष्क्रिय कर देता है। परिणाम यह होता है कि मक्खी सो जाती है। हमारे मस्तिष्क में भी पंखे के आकार की पृष्ठीय संरचना और मास्टर पेसमेकर के समतुल्य हिस्से होते हैं। अभी यह नहीं पता है कि क्या डोपामीन और ग्लूटामेट जागने और सोने का संकेत देंगे या नहीं। मगर इतना तो पता है कि डोपामीन इंसानों को जगाकर रखता है। कोकेन जैसे रसायन डोपामीन के स्तर में वृद्धि करते हैं और हमें जगाने में मददगार होते हैं। इस तरह के स्विच की खोज महत्वपूर्ण है। अगला कदम यह पता करने का होगा कि डोपामीन और ग्लूटामेट सामान्यत: किस क्रियाविधि के ज़रिए असर डालते हैं। इसके आधार पर नींद संबंधी तकलीफों के उपचार के कुछ नए तरीके सामने आने की उम्मीद की जा सकती है। (स्रोत फीचर्स)

शनिवार, 20 अगस्त 2016

रांची का पहाड़ी बाबा का मंदिर


पहाड़ी बाबा का मंदिर इस लिहाज से अनोखा है कि यहां धर्मध्वजा के साथ-साथ हर स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रध्वज फहराने की परंपरा है। यह बहुत रोचक विषय तो है ही साथ ही लोगों की जिज्ञासा का केंद्र भी है।

स्वतंत्रता और पूजा

यह मंदिर भक्तिभाव के संग राष्ट्रप्रेम का भी संदेश देता है तथा इससे यह सवाल उठता है कि क्या हमारा वतन भगवान के समान पूज्यनीय है? जी हां! अगर स्वतंत्रता ही नहीं होगी तब हमारा पूजा करने का हक भी छिन सकता है।

कहां है ये मंदिर?

रांची रेलवे स्टेशन से लगभग सात किलोमीटर दूर करीब 26 एकड़ में फैला और 350 फुट की ऊंचाई पर स्थित पहाड़ी बाबा मंदिर देश का शायद इकलौता ऐसा मंदिर है जहां धर्मध्वजा की जगह राष्ट्रध्वज फहराया जाता है।

इकलौता मंदिर?

संभवतः यह भारत वर्ष में अपनी तरह का इकलौता मंदिर है जहां स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रीय झंडा फहराया जाता है।

धर्मध्वजाओं का महत्व

आमतौर पर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च अपनी धर्मध्वजाएं फहराते हैं लेकिन पहाड़ी बाबा मंदिर पर हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रीय ध्वज शान से लहराया जाता है।

धर्मध्वज से ऊपर का दर्जा?

इस मंदिर में राष्ट्रीय ध्वज को धर्मध्वज से ऊपर का दर्जा देने की यह परंपरा 14 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि से ही शुरू हो गई थी।

राष्ट्रगान के साथ तिरंगा

देश की आजादी के बाद से ही प्रत्येक साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को मंदिर में सुबह की मुख्य पूजा के बाद राष्ट्रगान के साथ तिरंगा फहराया जाता रहा है।

वतन सबसे पहले

लोग आदरपूर्वक और उत्साह के साथ इसमें शामिल होते हैं। हालांकि किसी और मंदिर में ऐसी अनोखी परंपरा नहीं अपनाई जाती है। तथापि यह साफ़-साफ़ दर्शाता है कि हमारा वतन पूजनीय है।

पहाड़ी बाबा मंदिर

यूं तो पहाड़ी बाबा मंदिर की मनोहारी छटा भी इसे महत्वपूर्ण और श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का कारण बनाती है। आश्चर्यजनक रूप से सिर्फ इन दो राष्ट्रीय पर्वों के अवसर पर भारी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं।

हम सब एक हैं

जिन्हें भक्तिभाव से बहुत लेना-देना नहीं होता वे भी यहां आने से नहीं कतराते। हर धर्म के लोग इस प्रथा में भागीदर बन कर इसे आगे ले जा रहे हैं।

वृक्ष और ध्वज

पर्यावरण प्रेमियों के लिए भी यह मंदिर महत्वपूर्ण है क्योंकि पूरी पहाड़ी पर मंदिर परिसर के ईर्द-गिर्द विभिन्न प्रकार के हजार से अधिक वृक्ष हैं।

428 सीढ़ियां

मुख्य मंदिर के द्वार तक पहुंचने के लिए आपको 428 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर प्रांगण से रांची शहर का खूबसूरत नजारा भी दिखता है।

अनुपम सौंदर्य

साथ ही यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त का अनुपम सौंदर्य भी देखा जा सकता है। इसको देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।

ब्रिटिश हुकूमत के समय फांसी

पहाड़ी बाबा मंदिर का पुराना नाम टिरीबुरू था जो आगे चलकर ब्रिटिश हुकूमत के समय फांसी टुंगरी में परिवर्तित हो गया।

इतिहास का प्रकोप

फांसी टुंगरी के नामकरण के पीछे आजादी का इतिहास छिपा है। अंग्रेजों ने जब छोटा नागपुर क्षेत्र पर अधिकार स्थापित कर लिया था तो रांची में उन्होंने अपना संचालन केंद्र खोला।

खुलेआम फांसी

जो लोग अंग्रेजी सरकार की नजरों में देशद्रोही, क्रांतिकारी या घातक होते थे, उन्हें राजधानी के शहीद चौक या फांसी टुंगरी पर खुलेआम फांसी दे दी जाती थी।

भक्तिभाव के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम

असल में मंदिर के साथ जुड़े ऐतिहासिक तथ्य लोगों में भक्तिभाव के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम के भाव को भी उद्वेलित करते हैं।

फांसी और स्वतंत्रता संग्राम

स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अनेक क्रांतिकारियों को अंग्रेज सरकार ने यहां फांसी पर चढ़ा दिया था।

शहादत का प्रतीक

ऐसे में यह शहीदों की शहादत का प्रतीक है। इनकी याद में राष्ट्रीय झंडा फहराकर उन्हें सम्मान प्रदान किया जाता है।

देश की आजादी

पहाड़ी बाबा मंदिर में एक शिलालेख लगा है जिस पर 14 अगस्त, 1947 को देश की आजादी संबंधी घोषणा भी अंकित है।

सपूतों का शहीद स्थल

पहाड़ी मंदिर के मुख्य पुजारियों में शामिल पंडित देवीदयाल मिश्र उर्फ देवी बाबा बताते हैं कि पहाड़ी मंदिर केवल आजादी के लिए लड़ने वाले सपूतों का शहीद स्थल भर नहीं है बल्कि इसका प्राचीन इतिहास भी महत्वपूर्ण है।

नागवंशियों का इतिहास

उनकी मानें तो छोटा नागपुर क्षेत्र के नागवंशियों का इतिहास भी यहीं से शुरू हुआ है। पहाड़ी पर जितने भी मंदिर हैं, उनमें नागराज का मंदिर सबसे प्राचीन है।

आदिवासी लोग और नागदेवता की पूजा

आदिवासी समुदाय प्रकृति पूजक रहा है। इस स्थल पर शुरू से ही आदिवासी लोग नागदेवता की पूजा करने आते रहे हैं।

पूजा और आदिवासियों की पुकार

आज भी प्रत्येक सोमवार को पाहन बाबा जो आदिवासियों के लिए पूजनीय होते हैं, मंदिर की प्रमुख पूजा संपन्न करने आते हैं।

प्रमुख धार्मिक केंद्र

सरकार अगर पहाड़ी मंदिर पर समुचित ध्यान दे तो यह न सिर्फ एक प्रमुख धार्मिक केंद्र के तौर पर विकसित होगा बल्कि राष्ट्रीय एकता की भी अनूठी मिसाल पेश करेगा।

रविवार, 7 अगस्त 2016

सुनहरा इतिहास

इतिहास स्वयं इस बात का साक्षी है कि भारत की भूमि बड़े-बड़े धुरंधरों की जन्म-कर्मभूमि रही है। आज भले ही कोई कुछ भी कह ले, लेकिन सच यही है कि विभिन्न क्षेत्रों में जो भी और जितनी भी उपलब्धियां हम देख रहे हैं उनकी नींव कहीं ना कहीं भारतीयों से ही जुड़ी है।
चाणक्य
यदि सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में अहम योगदान दिया है तो गणित की गणना के क्षेत्र में आर्यभट्ट का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने वैश्विक इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करवाया है। इन्हीं में से एक रहे आचार्य चाणक्य जिनका जन्म करीब 300 ईसा पूर्व हुआ था। आचार्य चाणक्य का संबंध पाटलिपुत्र से था, जिसे उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाया।
जीवन के आदर्श
चंद्रगुप्त को चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य बनाने वाले आचार्य चाणक्य एक महान शिक्षक, दार्शनिक और ज्ञाता थे। इन सबके अलावा आचार्य चाणक्य को नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र का जनक भी कहा जाता है क्योंकि उनके तर्कों के आगे कोई नहीं ठहरता था। आज भी बहुत से लोग आचार्य चाणक्य की नीतियों को अपना आदर्श मानकर उन्हीं पर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। आइए जानते हैं आचार्य चाणक्य ने जीवन के विषय में ऐसा क्या कहा जो लोगों के लिए आदर्श बन गया।
महानता
चाणक्य के अनुसार व्यक्ति का धर्म, उसका जन्म, उसकी पहचान नहीं बन सकता। व्यक्ति के कर्म ही उसे महान बनाते हैं।
ऋण
ऋण इंसान का सबसे बड़ा शत्रु होता है। अगर खुशहाल जीवन व्यतीत करना है तो व्यक्ति को ऋण की एक-एक पाई तक चुका देनी चाहिए।
वर्तमान की सोच
मनुष्य जाति को अपने भविष्य या अतीत के बारे में नहीं सोचना चाहिए। केवल वर्तमान के विषय में सोचकर अपने जीवन को सफल बनाया जा सकता है।
शिक्षा एक धरोहर
शिक्षा ही व्यक्ति को उत्कृष्ट बनाती है। सुंदरता और जवानी छोड़कर चली जाती है लेकिन शिक्षा एक मात्र ऐसी धरोहर है जो हमेशा साथ रहती है।
व्यवसाय के राज
व्यवसाय से जुड़े अपने राज किसी भी व्यक्ति के साथ बांटने नहीं चाहिए, भले ही वह आपसे कितना ही निकट क्यों ना हो। अगर आप ऐसा करते हैं तो आपका विनाश निश्चित है।
किताबों का ज्ञान
वास्तविक ज्ञान किताबों या संपत्ति में नहीं मिलता। अगर ऐसा होता तो लोग जरूरत पड़ने पर भी कभी इनका प्रयोग ना कर पाते।
नजदीकी
अगर कोई व्यक्ति आपका बहुत नजदीकी है, तो वह भले ही आपसे कितना ही दूर क्यों ना हो, हमेशा आपके दिल के पास रहता है। लेकिन एक बार कोई दिल से उतर जाए तो दूरी ना होने के बाद भी वह कभी नजदीकी नहीं बन सकता।
कुछ सवाल
जब भी किसी कार्य की शुरुआत करो तो कुछ सवाल पहले खुद से पूछो। क्या तुम वाकई ये कार्य करना चाहते हो? क्या वाकई तुम्हें सफलता मिलेगी? यह कार्य क्यों करना चाहते हो? अगर इन सब का जवाब आपको सकारात्मक मिलता है तभी उस कार्य की शुरुआत करनी चाहिए।
सबसे खुशहाल व्यक्ति
इस डर से कि आप सफल होंगे भी या नहीं, किसी कार्य को अधूरा मत छोड़ो। आचार्य चाणक्य के अनुसार अपने ध्येय को हासिल करने वाला व्यक्ति इस दुनिया का सबसे खुशहाल व्यक्ति होता है।
प्रशासन का मतलब
उपयुक्त प्रशासन वो है जहां सैन्य बल से ज्यादा खजाने पर ध्यान दिया जाता है। खजाना हो तो सैन्य क्षमता बढ़ाई जा सकती है लेकिन बिना खजाने के सैन्य क्षमता किसी काम की नहीं है।
हकदार
अपने धन को किसी ऐसे व्यक्ति को ही दें, जो वाकई उसकी कद्र करना जानता हो।
डर पर जीत
अपने डर से कभी भयभीत नहीं होना चाहिए। अगर आपको किसी बात का भय है तो उसका सामना कर उसे जड़ से समाप्त कर दीजिए।
ईमानदारी का नतीजा
सीधा खड़ा वृक्ष सबसे पहले कटता है। इसका अर्थ है कि बहुत ज्यादा ईमानदारी भी घातक सिद्ध हो सकती है, विनाश का कारण बन सकती है।
ईश्वर की खोज
भगवान को मंदिर में ढूंढ़ने से कोई फायदा नहीं है। जिस शरीर में पवित्र आत्मा रहती है उस शरीर में स्वयं भगवान वास करते हैं।
दूसरों की गलतियां
आपकी जिन्दगी इतनी बड़ी नहीं है कि गलती कर-कर के सीख लें। दूसरों की गलतियों को देखो, उन्हें समझो और उनसे सीख लो।
चाणक्य की नीतियां
आचार्य चाणक्य को काफी कठोर नीतिकार कहा जाता था। उनकी कठोर शिक्षा और परीक्षण ने एक सामान्य से बालक को सम्राट बना दिया था। चाणक्य की ये शिक्षाएं किसी के लिए भी संजीवनी का कार्य कर सकती हैं।

QFORD [क्यूफोर्ड]

मंगलवार, 2 अगस्त 2016

Attributes of Self-Made Billionaires

It’s easy to think self-made billionaires just got lucky.

Maybe they were in the right place at the right time. Or maybe they stumbled across a discovery that made them a ton of money overnight.
But I’ve had the incredible fortune of being around and personally consulting to a number of self-made billionaires—even some as they ascended to billionaire-status—and I can tell you all of that is unequivocally false. Not even close.
Every self-made billionaire I’ve ever met or studied has something in common. It has nothing to do with luck or being in the right place at the right time. They all bring a unique set of attributes to each and every opportunity they come across. And when these attributes are developed and not suppressed, they transform into compelling strengths and abilities, but also severe (and sometimes very public) challenges.
You’ve seen them recently in the likes of Steve Jobs, Elon Musk, Richard Branson and Oprah Winfrey, and historically in Andrew Carnegie, Henry Ford and John D. Rockefeller. But here’s the interesting part… you might have seen these in yourself, too.
So do you have it in you to become one of those seemingly magical people who can see the future and make it come to pass, all while making a pile of money in the process? Find out as I take you through the positives (and negatives) of the 10 attributes found within every self-made billionaire:

1. High Sensitivity and Awareness

Beyond perceived eccentricities for things like timing, color, food, fragrance or texture, a self-made billionaire’s sensitivities can be heightened to the point of distraction, isolation or even debilitation. On the positive side, I’ve found they each have their own unique sensitivities and heightened awareness that can seem extrasensory: everything from design functionality and perfect pitch, obsessions over air and water quality, knowing—with certainty—when someone else is dealing with a crisis. However, what’s special about the self-made billionaire is how they find ways to leverage their sensitivities and awareness to increase performance.

2. Future Focused

The future-focused attribute often goes by another term: visionary. This label has become a badge of honor for entrepreneurs of every stripe, self-made billionaires included. Earlier in their lifetimes, however, they often got a different label: hopeless dreamer. The real differentiator between the two is how much protection and support they were able to surround themselves with, helping to make their dreams a reality.

3. High Processing Capacity

Self-made billionaires have unusually high processing capacities, being able to consume and retain information faster and in greater quantities than other people. This attribute drives them to seek out and collect large amounts of data, regardless of their physical or cognitive limitations, such as dyslexia. It can even make them seem like machines, automatons or obsessive individuals. They have simply found ways to process and analyze the information they collect in order to cast a clear vision, take action and make constructive decisions over time.

4. Persistent Adaptability

Though self-made billionaires maintain a persistent adaptability to take on new tasks, initiatives, businesses or even careers (think Bill Gates’ new focus on philanthropy or Donald Trump’s transition to politics), they are not chameleons. Most actually had difficulty adapting to certain situations, such as structured school or social environments, earlier in their lives. Yet they developed a persistent adaptability to new tasks and careers, and this attribute enabled them to achieve their vision or desired outcome.

5. Intense Focus on Results or a Single Outcome

We have all heard the stories: Steve Jobs’ dogmatic drive to perfect the Macintosh or Bill Gates’ near workaholic tendencies. There are many examples of self-made billionaires being viewed as super- or sub-human in order to make their mark on the world. Oftentimes, they pulled back and isolated themselves in order to get things done. Although this can make them appear obsessive, compulsive, combative or antisocial, the key is that these hyper-successful individuals directed this attribute toward very clear results or outcomes.

6. Bias for Improvement

As future-focused individuals, self-made billionaires see the world as it should be, not what it is today. They see what should be modified, improved or evolved. Given the choice between keeping things as they are or changing them for the better, they will almost always choose the latter. But the desire for improvement without an underlying structure can devolve into “improvement paralysis,” where products or ideas are endlessly refined without really moving forward. But the self-made billionaire maintains focus on their intended outcome to set proper priorities on the improvements that actually move them and their business forward.

7. Experimental or Experiential Learning

Yes, self-made billionaires learn through books, but they truly seek the application of their learning, the experiences and experiments; otherwise, they don’t feel momentum. As children, this attribute often made the traditional classroom and educational structures challenging. Experiences and experiments give these individuals confidence to push further, validate what they’ve learned and strengthen belief in their visions of the future.

8. Perceive Unique Connections

When the majority of people are united in one belief, it takes a certain type of person to offer contradictions or alternatives. Self-made billionaires have an enormous capacity to perceive unique connections in the world through their experiences, experiments, focus on the future and high sensitivities. They are able to see situations, problems, solutions and processes from different angles in order to leverage new resources or move in new directions. This can also be alienating and cause massive friction with their leadership teams.

9. Drive for Gained Advantage

This is a very visible attribute. The self-made billionaire constantly asks themselves, How do I get ahead? This consistently drives them to find an advantage or the means to get ahead. Sometimes this attribute can make individuals seem cutthroat, cold or heartless. However, the drive for gained advantage is a competitive attribute that has enabled the self-made billionaire to seek out new and unique solutions to shared challenges, and increase the contribution they can make to their teams.

10. Innate Motivation

Typically, the self-made billionaires I’ve met and worked with have no idea where their “fire” comes from. And although some view this attribute as mere ambition, intrinsic motivation isn’t the desire to climb corporate ladders or collect awards and recognition. This is an engine with no off switch, a constant drive to achieve goals and contribute to the world. Naturally, intrinsic motivation can also make these individuals restless, impatient and combative, especially around people who either lack the same kind of motivation or become obstacles to their momentum.
Looking at every self-made billionaire throughout history, you will find these 10 attributes. But while reading them, you might notice something interesting…. You can see some or all of them in yourself.
These attributes are not limited to the self-made billionaires, but found in an overlooked and misunderstood sub-population of our society, the Entrepreneurial Personality Type (EPT). What I’ve found in both working with these individuals and researching them, is that the only difference between them and other EPTs is their ability to recognize their unique attributes, and find the protection and support necessary to turn them into incredible strengths.

-Alex Charfen

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

अनार मांसपेशियों को बेहतर बनाता है

जब हम अनार, स्ट्रॉबेरी या अखरोट खाते हैं तो हमारा शरीर एक रसायन बनाता है जिसका नाम युरोथिलिन-ए है। शोधकर्ताओं का मत है कि युरोथिलिन-ए मांसपेशियों को ज़्यादा काम करने में सक्षम बनाने का काम करता है। स्विट्ज़रलैण्ड के ईकोल पोलीटेक्निक के जोहान ऑवक्र्स और उनके साथी यह परखना चाहते थे कि क्या ये खाद्य पदार्थ उतने ही लाभदायक हैं, जितना कि दावा किया जाता है। उन्होंने अपने प्रयोगों के परिणाम नेचर मेडिसिन में प्रकाशित किए हैं। 
जब उन्होंने युरोथिलिन-ए की खुराक एक कृमि सेनोरेब्डाइटिस एलेगेंस (Caenorhabiditis elegans) ) को दी तो ये कृमि औसतन 45 प्रतिशत अधिक उम्र तक जीवित रहे। और जब यही रसायन बुज़ुर्ग चूहों को पिलाया गया तो वे 42 प्रतिशत अधिक दौड़ पाए। और सबसे बड़ी बात यह देखी गई कि इन चूहों में अतिरिक्त दौड़ पाने की यह क्षमता अधिक मांसपेशियां बनने की वजह से पैदा नहीं हुई थी। इसका मतलब है कि युरोथिलिन-ए मांसपेशियों की मात्रा को नहीं बढ़ाता बल्कि उनकी गुणवत्ता को बढ़ाता है। तो आखिर कैसे? जांच पड़ताल से पता चला कि युरोथिलिन-ए मांसपेशियों में से क्षतिग्रस्त माइटोकॉण्ड्रिया नामक उपांगों को निकाल बाहर करता है। गौरतलब है कि माइटेकॉण्ड्रिया हमारी कोशिकाओं के पॉवरहाउस होते हैं - इन्हीं में ग्लूकोज़ का ऑक्सीकरण होता है और ऊर्जा मुक्त होती है। जब क्षतिग्रस्त माइटोकॉण्ड्रिया को हटा दिया जाता है तो शेष बचे तंदुरुस्त माइटोकॉण्ड्रिया विभाजित होकर संख्या वृद्धि करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि इन कोशिकाओं को ज़्यादा ऊर्जा मिलती है और ये ज़्यादा काम कर पाती हैं।
टीम का लक्ष्य यह देखना है कि क्या युरोथिलिन-ए का इस्तेमाल इंसानों में कमज़ोर मांसपेशियों को दुरुस्त करने में किया जा सकता है। अब तक जितने उपचार थे उनमें कोशिश यह होती थी कि ज़्यादा से ज़्यादा मांसपेशियां बने ताकि कामकाज आसानी से चल सके। युरोथिलिन ऐसा रसायन है जो मांसपेशियों को ज़्यादा कार्यक्षम बनाता है। शोधकर्ताओं को लगता है कि जब यह कृमियों और चूहों में कारगर है तो अन्य स्तनधारियों में कारगर साबित होगा। यदि ऐसा होता है तो उम्र के साथ दुर्बल होती जा रही मांसपेशियों की मरम्मत हो सकेगी। क्या अनार खाने से बात बन जाएगी? शोधकर्ताओं की राय में अनार खाना अच्छा होगा मगर उन्होंने अपने प्रयोगों में युरोथिलिन-ए की जितनी खुराक का उपयोग किया है, उतनी खुराक पाने के लिए आपको चार गिलास भरकर रस रोज़ाना पीना पड़ेगा। (स्रोत फीचर्स)