सोमवार, 31 अक्तूबर 2022

छठ पूजा का महत्व

1. यह पूर्णरूप से प्रकृति की पूजा है, जिस प्रकृति से हम सबका जीवन चलता है। 

 2. वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित पूरे संसार में ऊर्जा के स्रोत भगवान भाष्कर की आराधना की जाती है। 

 3. उगते सूरज की पूजा तो सब करते है, इस पर्व में डूबते सूरज की भी पूजा की जाती है। 

 4. यह पर्व किसी भी जाति व सम्प्रदाय के बंधन से मुक्त है। इसे हर कोई कर सकता है। 

 5. यह सामाजिक सहजीविता का अनुपम उदाहरण है। इसमें प्रयुक्त होने वाले कुछ वस्तु डोम यानि दलित के घर से भी आते है। 

 6. इसमें अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े , ऊंच-नीच किसी का भेद नहीं है। 

 7. छठी मैया की पूजा प्रकृति में उपलब्ध सामान्य वस्तु केला, नींबू, बैगन, मूली, गन्ना, फल, गुड़ व दूध से बनी वस्तुओं से होती है। कोई कीमती चढ़ावा नहीं। 

 8. स्वच्छता व पवित्रता का सबसे अधिक ध्यान रखा जाता है। 

 9. इसमें किसी पंडित - पुरोहित या किसी तंत्र-मंत्र की जरूरत नहीं है। 

 10. इसमें भक्त व भगवान के बीच सीधा संवाद है,- आत्मा से परमात्मा का सीधा सम्पर्क बिना किसी के मदद के। यह पवित्र मन से पूर्ण समर्पण का पर्व है। 11. इस पर्व को 70 साल तक उम्र के लोग करते है। करीब 3 दिन का निर्जला उपवास के बाद सुबह 4 बजे से भींगे बदन ठंडे पानी में ठंड के मौसम में करीब 2 घण्टे पानी में खड़े होकर भगवान सूर्यदेव व छठी मैया की आराधना करते है, लेकिन आज तक कहीं किसी के भी सर्दी-जुकाम तक होने की शिकायत नहीं मिली।  यह है छठी मैया व सूर्य देव के पूजा का महत्व। साक्षात प्रमाण है इनके शक्ति का। 

कौन हैं छठी मैया ?

लोगों में यह एक आम जिज्ञासा यह रही है कि भगवान सूर्य की उपासना के लोक महापर्व छठ में सूर्य के साथ जिन छठी मैया की अथाह शक्तियों के गीत गाए जाते हैं, वे कौन हैं। ज्यादातर लोग इन्हें शास्त्र की नहीं, लोक मानस की उपज मानते हैं। लेकिन हमारे पुराणों में यत्र-तत्र इन देवी के संकेत जरूर खोजे जा सकते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार सूर्य और षष्ठी अथवा छठी का संबंध भाई और बहन का है। षष्ठी एक मातृका शक्ति हैं जिनकी पहली पूजा स्वयं सूर्य ने की थी। 'मार्कण्डेय पुराण' के अनुसार प्रकृति ने अपनी अथाह शक्तियों को कई अंशों में विभाजित कर  रखा है। प्रकृति के छठे अंश को 'देवसेना' कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इनका एक नाम षष्ठी भी है। देवसेना या षष्ठी श्रेष्ठ मातृका और समस्त लोकों के बालक-बालिकाओं की रक्षिका  हैं। इनका एक नाम कात्यायनी भी  है जिनकी पूजा नवरात्रि की षष्ठी तिथि को होती रही है। पुराणों में निःसंतान राजा प्रियंवद द्वारा इन्हीं देवी षष्ठी का व्रत करने की कथा है। छठी षष्ठी का अपभ्रंश हो सकता है। आज भी छठव्रती छठी मैया से संतानों के लंबे जीवन, आरोग्य और सुख-समृद्धि का वरदान मांगते हैं। शिशु के जन्म के छह दिनों बाद इन्हीं षष्ठी या छठी देवी की पूजा का आयोजन होता है जिसे बोलचाल की भाषा में छठिहार कहते हैं। छठी मैया की एक आध्यात्मिक पृष्ठभूमि भी हो सकती है। अध्यात्म कहता है कि सूर्य के सात घोड़ों पर सवार की सात किरणों का मानव जीवन पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। सूर्य की छठी किरण को आरोग्य और भक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला माना गया है। संभव है कि सूर्य की इस छठी किरण का प्रवेश अध्यात्म से लोकजीवन में छठी मैया के रूप में हुआ हो।



सोमवार, 17 अक्तूबर 2022

मंगनी मं नइ मिलय मया..!

प्रेम किसी से किया नहीं हो जाता है। यह वरदान है परमात्मा का, आशीर्वाद है, कृपा है। यह खूबसूरत  तौहफा व फूल हर किसी के सौभाग्य में नहीं लिखा होता। किसी-किसी को मिलता है। कोई-कोई तो जिंदगी भर तरसते और तड़पते रह जाते हैं प्यार को पाने के लिए। प्रेम भी अलग-अलग  तरह का होता है। किसी को संगीत, नृत्य, साहित्य, धन-वैभव, स्त्री, संपत्ति से प्यार होता है तो वहीं किसान को अपनी लहलहाते हुए फसल, मां को अपनी संतान,से होता है। पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका का भी आपस में प्यार होता है। मीराबाई का प्यार तो जगजाहिर है। इसके खातिर उसने अपना सब कुछ त्याग दिया l राजमहल, वैभव, सुख - सम्पदा को छोड़ प्रेम को वरण कर लिया l  कुछ इसी तरह के प्रेम प्रसंगों का ताना - बाना  बुना  गया है l इसी  पर आधारित है यह छत्तीसगढ़ी आलेख- 

'मंगनी मं नइ मिलय मया

परेम अमरित हे, सरग हे, सुख हे। ओ हे तब संसार हे, ओकर बिगन नरक हे समशान हे। मनखे ले, ले के पशु-पक्षी अउ जतका जीव-जन्तु हे, परेम ले ही उपजथे। शमा ला देखते साठ पतंगा अइसे  बइहा जथे, परेम मं ओकर पागल हो जथे के अपन जान तक  ल होम देथे, झपा जथे. जल मर के राख हो जथे, एला कहिथे परेम। 

अइसने पशु परेम मं आसक्त एक झन संगवारी के चार-पांच ठन गाय अउ भइस ल एक घौं ट्रक हा रौंद के मार डरिस। ओ पशु मन के शोक मं ओ संगवारी बीमार परगे, खटिया धर लिस, अउ एक दिन संसार ले चल बसिस। 

बेरला तहसील मं खर्रा नांव के गांव हे। उहां फूफा राहय, उहां एक घां जाना होइस। तब का देखथौं- ओहर जतका मवेशी रिहिसे तेकर संग गोठियावय, बात करय, अउ पूछय- कइसे राम जी हो, सब बने-बने हौ न? ओकर सेवा-जतन करय, पयरा-भूसा देवय, कोटना मं धोवन सिरा जाय राहय तब फुफू ऊपर खिसियावत काहय- रामजी मन पियास मर जाही, कोटना मं हउंला-दू-हउंला पानी डार दे करौ भाई। तुंहर दरी नइ सुधरय, तब मोला बता दे करौ। दू-तीन कांवर पानी तरिया ले लाके डार दे करिहौं। अउ कोनो मवेशी बीमार पर जाय तब डॉक्टर बला के ले आनय। ओहा काहय- ये रामजी हा कइसे आंखी-कान ला लोरमा दे हे डॉक्टर साहब, बने दवा-पानी देख के दे दे भई। अतेक परेम फूफा के मवेशी मन बर रीहिस हे। 

अइसने एक दिन का देखथौं, हमर पहाटिया घर दुधारू गाय अकस्मात मरगे। ओ परिवार बर मं रोना-धोना अइसे मच गे, जना-मना कोनो सदस्य के इंतकाल होगे। ओ दिन ओकर सोग मं चूल्हा नइ बरिस। लांघन-भूखन सुतगे सब। उदुप ले पहाटिया कइसे नइ आवत हे कइके पता लगाय खातिर जा परेंव, तब जउन बात सुनेव तेला जानके सोचेंव- एला कहिथे परेम। 

राजनांदगांव शहर के बात हे। एक झन रतिहा ओकर घर मं नाग देवता निकलगे। परिवार के सबो झन सकपगाके, डर्रागे, का हो गे भगवान। पठेरा मं जा के ओहर बइठगे राहय। ककरो अक्कल काम नइ करत राहय। आखिर मं ओला लाठी पीट-पीट के मार डरिन। नागिन खोज-खोज के परेशान होगे के आखिर ओकर नाग देवता कहां गय। घुरवा तीर मार के फेंक दे राहय। तेकर ऊपर नागिन के नजर परगे। मारे गुस्सा के ओहर बिफरगे। अपन गोसइया नागदेव के मौत के बदला लेके ठानिस। एक दिन उही घर मं पहुंचगे जिहां के मन ओला मारके घुरवा मं फेंक दे रिहिन हे। फेर का हे, ओ परिवार के दू-तीन सदस्य ल ठिकाना लगा दिस। बिहनिया ओ घर मं रोवा-राई मचगे। अड़ोसी-परोसी जाके देखथे तब अकबका जथे, सुकुरदुम हो जथे। कहिथे- अइसे कइसे होगे? सब किहिन, जानगे- जा नागिन हा बदला ले लिस। पिंयार तो पियार होथे। कोनो ला ककरो पिंयार मं भांजी नइ मारना चाही। 

एला तो सब जानत अउ समझथौ, भंवरा फूल के कतेक आशिक अउ दीवाना होथे। अइसे मनखे मन घला होथे, फेर एमन मतलबी अउ सुवारथी होथे। मतलब सध जथे तहां ले तिरिया जथे, पहिचाने ले नइ धरय। तैं कोन, मैं कोने केहे ले धर लेथे। फेर भंवरा मन अइसन नइ होवय। सच्चा आशिक अउ पिंयार होथे फूल बर ओकर मन मं। 

कमल के फूल तरिया मं खिले रहिथे, जइसे बेरा चढ़थे कहां-कहां ले पहुंच जथे आशिक आवारा मन सही भंवरा मन। ओकर रूप, रंग आउ पराग के सुगन्ध मं मोहा जथे। सब ले जादा नशा फूल के सौरभ मं होथे। ओकर चुम्बन लेवत-लेवत, रसपान करत अपन सब होश ल गंवा बइठथे। चुम्बन के नशा होथे वइसने, जउन एकर जानकार होहू तउन ला समझत मं कोनो दुविधा नइ होही। गांजा कली के नशा एकर आघू मं फेल हे। 

हां तब होथे का, बइहाय भंवरा ल अतको चेत-सुरता नइ राहय के चलव अब संझा के बेरा होवत हे  चले जाय घर। छोड़े के नांव नइ लेवय, जइसे सुहागरात के दिन जोड़ी-जांवर ला होथे। नशा तो नशा हे, चाहे कई सनो नशा होवय, फूलो हा ओला नइ कहितिस जा ना अब अपन घर। समे ककरो बर रुकै नहीं। कमल के पंखुड़ी मन संझा होते साठ भंवरा ला अपन चपेट मं ले लेथे। धंधा जथे ओकर घेरा मं अउ फडफ़ड़ा के अपन परान तियाग देथे।

परमानंद वर्मा

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2022

कहां हे रावन, कोन हे रावन, घर-घर हे रावन

दसहरा तिहार विजय, खुशी अउ आनंद के तिहार हे, बुराई मं अच्छाई के विजय के तिहार हे। आज के दिन गांव ले लेके देस, परदेस तक मं घर-घर मं मनाय जाथे। बुराई के परतीक रावन के पुतला ल आगी के हवाले करे जाथे। देखते देखत ओ रावन जर के राख हो जथे। 

पहिली तो कहूं-कहूं रावन के पुतला बनावय, हमला सुरता आवत हे, जब नानकिन लइका रेहेन तब तीर-तखार कोनो गांव मं अइसन पुतला नइ बनावत रिहिन  हे, जइसन आज देखे ले मिलथे। अब तो गांव-गांव, गली-गली, शहर-शहर मं दू कोरी (बीस) ल कोन काहय पांच-पांच कोरी ऊंच के रावन के पुतला बनाय ले धर ले हें। कतको जघा मं तो पक्की सीमेंट के घला रावन के पुतला बनवा डारे हे। लगथे सब आज राम के कम, रावन के भक्त जादा जनम ले लेहे। एकर परमान हर गांव, हर गली अउ हर शहर मं देखे जा सकत हे। पुलिस थाना मं अइसन रावन भक्त अउ सूर्पनखा देखे जा सकत हे, बड़े-बड़े होटल, क्लब अउ माल मन में घला सूर्पनखा अउ रावन के औलाद मन गुलछर्रा उड़ावत हे। अब राम के नहीं, सचमुच मं ये दुनिया भर मं रावन के राज चलत हे। 

जउन जतके झूठ-लबारी, गलत काम, अनीति, अत्याचार, कुकरम, बेइमानी, भ्रष्टाचार करत हे ओकर मन के चांदी हे, रोज इहां दुरपति मन के चीरहरन, शीलहरन का-का नइ होवत हे। हत्या, लूट, आतंक के कारोबारी सब जघा बगरे हे। सतवादी गहूं मं कीरा असन रमजावत हे, मरत हे, सड़त-गलत हे। गांधी बबा के 'रघुपति राघव राजा राम के भजन के कोनो सुनइया नइहे। सब दारू, गांजा , भांग , हफीम अउ चरस पीके डिस्को डांस करके छोकरी मन असन जेती देखबे तेती रावन जिंदाबाद के नारा लगत हे। झूठ के बोलइया, सकलकर्मी मन दरबार के खिलाड़ी बन बइठे हे। 'अंधेर नगरी चउपट राजा कस खेल चलत हे। 

रावन कोनो अउ दूसर नोहय, मनखे के अंदर जउन बुराई, पांच विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह अउ अहंकार हे, उही हर रावन हे। एमन पहिली जेल मं रिहिन हे, याने एला संयम, नियम के हथकड़ी पहिरा के धांधे  रिहिन हे। अब इही कैदी मन बरोबर जेल के दीवार ला फांद के बाहिर निकलगे हे अउ भारी उत्पात मचावत हे, देस ला कोन काहय, संसार भर मं। हद करत हे रावन, धरउन नइ देवत हे, पकड़ावत नइहे। बड़े-बड़े रावन रोज पैदा होवत हे। कोनेा देस अइसे हे जिहां रावन के पैदावार नइ होवत हे। आज के तारीख मं ओमन ला आतंकवादी कहिथे। ओ तो अमरीका हे जउन ओसामा बिन लादेन, जवाहरी जइसन दुरदांत रावन मन ला ठिकाना लगइस हे। पाकिसान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, इजराइल अउ भारत जइसन देस मं घला नकली भेस मं रावन जनम ले ले हे। ओमन ला जानना, अउ पहिचानना कठिन हे। जानत, मानत सब हे फेर कोनो बोल नइ सकत हे, काबर 'समरथ को नहीं दोस गोसाई जब गोसाइयां हर रावन होगे हे तब गोसइन, परिवार, लइका अउ गांव के का हाल ल लेबे। 

धन हे ये दुरगा मइया के जउन अइसन राक्षस, रावन मन ल संहार करे खातिर जनम लेथे। इही पाके तो ओला महिसासुर मरदिनी कहिथे। आज अष्टमी हे, कल नवमी हो जही। परन दिन दसहरा। अब ओ मइया कोनो-कोन, कतेक महिसासुर, राक्षस अउ रावन के संघार करथे तउन पता चल जही। इही रावन के खातमा होय के सुरता मं खुशी के रूप मं देशभर मं दशहरा  तिहार मनाय जथे। 

अलग-अलग परदेस मं, गांव मं, शहर मं कई रूप मं ये तिहार ल मनाय जथे। हमर छत्तीसगढ़ मं बस्तर अइसे जघा हे जिहां नवरात शुरू होय के दिन ले दशहरा उत्सव मनाय बर धर लेथे। विश्व परसिध बस्तर दशहरा के एक अलग-अपन विधान हे, नियम हे। जानकारी मिले हे तेकर अनुसार नवरात के पहिली दिन ले लकड़ी के बनाय रथ ल छै दिन तक परिकरमा कराय जाथे। ये परम्परा चार सौ गियारह साल पहिली शुरू करे गे रिहिसे तउन आज तक चलत आवत हे। राजा बीरसिंह देव एला शुरू करवाय रिहिसे। ए रथ ला फूल रथ के हे जाथे। रथ मं आठ पहिया होथे, एला विजय रथ घला कहिथे, हर साल1एला बनाय ले परथे। 

वइसने बस्तर दशहरा के शुरूआत उहां के राजा पुरुषोत्तम देव के शासनकाल मं होइस हे। बताथे- महाराजा पुरुषोत्तम भगवान जगन्नाथ के भक्त रिहिसे। ओहर सोलह पहिया वाले रथ मं चार पहिया अलग जुड़वाइस तेला गोंचा रथ कहिथे, अइसन बारह पहिया वाला रथ ला दशहरा रथ के नांव दे गिस तउन ला दो सौ साल तक खींचे गिस। ए रथ मन के अलग इतिहास हे जउन दशहरा उत्सव के बखत खींचे जात रिहिसे। चार पहिया वाला फूल रथ अउ आठ पहिला वाला ला विजय रथ के नाव दे गिस। इही रथ मन जेमा देवी अउ राजा विराजमान रहिते, दो सौ साल ले खींचे जाय के परमान हे अउ आज ले चलत आवत हे। विश्व परसिध ये बस्तर दशहरा ल देखे खातिर अपन देश ल कोन काहय, विदेश के मन घला हर साल देखे ला आथे। बाकी जघा तो बनाय रावन के पुतला ला आगी के हवाले कर दे जाथे। राम-लछिमन बनाके रावन मैदान मं ले जाथे, ओमन परतीक स्वरूप बान चलाथे अउ रावन धरासायी हो जथे। इकरे सुरता मं राम लीला घला जघा-जघा करथे। दूसर दिन फेर रावन सड़क मं जाथे अउ शुरू हो जथे ओकर घमा-चौकड़ी, उत्पात अउ आतंक। जब तक अंतस मं घर जमाये बइठे बुराई (रावन) नइ मरिही, रावन जीयत रइही। अउ ओकर सेनापति, सिपाही मन के आतंक बने रइही।

-परमानंद वर्मा

मंगलवार, 4 अक्तूबर 2022

सजे हे सुन्दर मइया के दरबार

गांवों से लेकर कस्बों, शहरों तक में मां देवी दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती व काली की पूजा-अराधना में श्रद्धालु जुटे हैं। मंदिरों व घरों में भी आस्था व मनोकामना जोत जल रहे हैं। देश-विदेश के अनेक स्थानों से शक्तिपीठों में जोत जलवाए हैं। रतनपुर, रायपुर, जगदलपुर, धमतरी, राजनांदगांव, आरंग, खल्लारी, डोंगरगढ़, दंतेवाड़ा में भक्तों की अपार भीड़ उमड़ रही है। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है छत्तीसगढ़ी आलेख- 'सजे हे सुंदर मइया के दरबार|

 फिल्म निर्देशक स्व. सत्यजीत राय एक घौं अपन सद्गति फिलिम के शूटिंग करे खातिर छत्तीसगढ़ आय रिहिसे। पांच-आगर दू कोरी साल पहिली के बात आय। शूटिंग शुरू नइ करे रिहिसे, एकर पहिली एक-दू दरजन गांव भर के दौरा करे रिहिसे। इहां के संस्कृति, कला, बोली, भाखा, खान-पान, रहन-सहन पहिनावा, ओढ़ावा अउ का काम-बूता करथे एला जाने खातिर जब इहां के मनखे मन ला देखिस- कतेक सादा, सरल सुभाव, कोनो-कोनो जुर-मिल के खेत, खलिहान मं काम करत हें, तब कोनो-कोनो लीम चंवरा, नइते गुड़ी अउ दुकान के परछी मं बइठे ढेरा आंटत राहय, कोनो पयरा, पटवा के डोरी बरत राहय। 

कोनो खैनी खात खटिया गाथत हे तब चौसर, ताशपत्ती अउ लइका मन गिल्ली डंडा मं मगन राहय। सत्यजीत राय ये बात ला देखके बक्खागे के ओहर कोनो गांव अइसे नइ पइस जिहां तरिया, कुआं, माता देवालय, शिव, हनुमान के मंदिर अउ घर-घर मं तुलसी के चंवरा। संझाकन देखथे- सब घर मं दिन बुडि़स तहां दीया जलत राहय। संग मं ओकर संग रहिथे तउन संगवारी मन करा गोठियावत-बतावत कहिथे- इहां के मनखे मन मनखे हे ते देवता? मैं तो छत्तीसगढ़ के गांव मं आके भगवान के दरसन करथौं। ये छत्तीसगढ़ नोहय, साक्षात सरग हे सरग, अउ इहां मनखे नहीं साक्षात भगवान अउ देवता मन वास करथे। इहां के भूमि अउ मनखे मन ला परनाम करथौं, जरूर मैं इहां अउ आहूं, घेरी बेरी  आहूं। 

ये बात तो फिल्म निर्देशक स्व. सत्यजीत राय के रिहिसे। एक घौं के ओकर छत्तीसगढ़ प्रवास हिरदय ल पलट दिस। दया-मया उमडग़े ओकर मन मं। काबर अइसे होइस, का कारण हे के जउन मनखे के इहां चरन परथे, मोहा जथे। जरूर कोनो दैवीय शक्ति, मोहनी शक्ति हे छत्तीसगढ़ करा जउन सबो ला अपन बना के रख लेथे। ओ देवी अउ मोहनी शक्ति हे दया, मया, परेम, संतोष, सेवा, सत्कार। छत्तीसगढिय़ा भले गरीब हे, कोनो करोड़पति, अरबपति नई  हे, पर ओकर दिल कोनो राजा, महाराजा ले कम नइ हे। खाय ले बइठे रइही ओतके बेर कहूं मंगइया आगे तब पहिली ओला जेवन करा लिही तब पाछू अपन पेट पूजा करही। अइसन अतिथि सत्कार करइया ये छत्तीसगढ़ हे। इही गुन ला परदेसिहा मन टमड़ ले हे। अउ सिधवा जान के कहिथे- छत्तीसगढिय़ा सबले बढिय़ा। 

ये दैवी अउ मोहनी गुन सेती-मेती मं नइ मिले हे इहां के मनखे मन ला। एकर पीछे ओकर पुरखा मन के तियाग अउ तपस्या हे, जेकर फल आज ओमन ला मिलत हे। सब जिनिस हे इहां, कोनो जिनिस अइसे नइहे जेकर कमी अउ अभाव हे। सोना, चांदी, हीरा-मोती, लोहा, परबत, नदिया, पेड़, पशु-पक्षी, झरना, जलपरपात। अलग-अलग कला, संस्कृति, बोली-भाखा, पहिरावा-ओढ़ावा, तिहार-परब, सब देख ले मिल जाथे। हजारों-लाखों पर्यटक ये सब ला देखे ले आथे इहां देश-विदेश ले। 

अभी तो मंदिर देवालय मं जोत-जंवारा जलत हे। रतनपुर, दंतेवाड़ा, आरंग, महासमुंद, धमतरी, रायपुर, राजनांदगांव, खल्लारी के शक्तिपीठ मन मं मनोकामना के जोत जलत हे। अभी के ला शारदीय नवरात्रि केहे जाथे। मंदिर मन के पुजारी मन करा ले जउन जानकारी मिले हे तेकर मुताबिक दुबई, अमरीका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, कैलीफोर्निया के भक्त मन आस्था, मनोकामना के जोत जलवाय हे। एमा बड़े-बड़े नेता, मंत्री, सेठ, उद्योगपति अउ नौकरशाह मन के घला मनोकामना ज्योति जलत हे। अइसन हे हमर छत्तीसगढ़ के महिमा। संझा-बिहनिया देवी मंदिर मन मं मातारानी मन के सेवा होवत हे, सेउक मन ढोल मंजिरा बजावत सेवा गीत गावत हे, पुजारी मन आरती करत हे। 

मां देवी दुरगा के अराधना, सुरता मं ए एक ठन नानकिन सेवा गीत पेश हे- 

शारदा मोर शक्ति मां हो

कहवां मं लिये अवतार। 

कहवां मं रहिथे मोर 

अनमन-जनमन हो, 

शारदा मोर शक्ति मां हो।।

सिंह सवारी चढ़ी आवे भवानी मा

सिंह सवारी चढ़ी आवे हो मा

जो मय जनतेंव् मोर मइया आय हे,

मोर मइया आये हे, मोर दुरगा आय हे।

सुरहींन गइया के गोबर मंगाई के,

खूंट धरि अंगना लिपातेंव् हो माय, 

सुंदर चौक पुरातेंव् भवानी के

सोन के करसा मढातेन्व हो माय।

माता फूल गजरा गूँथव हो

मालिन के फूल देहरी,

हो फूल गजरा।

काहेन फूल के गजरा,

काहेन फूल के द्वार,

काहेन फूल के माथ टिकुलिया,

सोलहों सिनगार,

चम्पा फूल के गजरा,

चमेली फूल के हार,

जसवंत फूल के माथ टिकुलिया,

सोलहों सिनगार,

माताआ फूल गजरा।

परमानंद वर्मा 

शनिवार, 1 अक्तूबर 2022

काछनदेवी देइस बस्तर दशहरा उत्सव मनाय के अनुमति

जिसका तन, मन और हृदय साफ, सुंदर, पवित्र और निर्मल है वहीं ही सुख, शांति, प्रेम, आनंद और संतोष जैसी सूक्ष्म संपत्तियों का वास होता है। यही तो दैवीय शक्तिया, सूक्ष्म धन और लक्ष्मी है और यह  परिसंपत्तियां विश्व में कहीं और नहीं छत्तीसगढ़ में भरी पड़ी हैं। छत्तीसगढ़ में वह भी केवल बस्तर में देखने को मिल सकता है। सीधे-सादे, सरल, आचार-विचार और सद्व्यवहार बरबस ही सबका मन मोह लेता है। प्राकृतिक सुंदरता और आकर्षण वह तो स्थूल चीज है। त्यौहार, पर्व, उत्सव ही उनकी जिंदगी है। बस्तर उसका जीवंत गवाह है। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख- बस्तर दशहरा मनाय के अनुमति दिस कच्छनदेवी |

          ------------------

दुनिया मं कोन से अइसे मुलुक हे जिहां बारहों महीना, सरलग तीन सौ साठ दिन तिहार मनाय जाथे। अड़बड़ मुड़ ल खजुवायेंव, माथा ठोंकेव अउ कई किलो ठंडई तेल लगा-लगा के मालिस करेंव, करायेव, फेर मोर मगज मं कोनो मुलुक के चिरई ,सुरता बन के नइ बैइठिस कतको किताब,  पोथी पतरा अउ ग्रंथ के पन्ना उलट-पुलट डरेंव फेर कोनो जघा अइसे नइ मिलिस जिहां अइसन सरलग तिहार मनावत होही, परब मनावत हें। घूम-फिर के लहूट के आयेंव मैं अपन भारत देश, जिहां किसम-किसम के तिहार, परब, उत्सव मनावत रहिथे। सबले बड़े मनोरंजन के साधन हे ये तिहार, परब जेकर बर कोनो ल न माल जाय के लफड़ा हे अउ न कोनो टॉकीज। फोकट मं माई-पिल्ला गांवभर के, शहर के मन एक संग मना लेथे तिहार, अउ परब एकर ले जउन मनोरंजन, खुशी अउ आनंद मिलथे मन अउ तन ल तेकर कोनो गिनती नइ करे जा सकय। 

एक परकार ले हमर देश सुख, शांति, आनंद, परेम ले भरपूर हे, अकूत खजाना हे, अकूत सोना, चांदी, हीरा, पन्ना कस लबालब भरे हे। फेर राजनीतिक, धारमिक अउ आरथिक हलका ले चील कउंवा बने चीता, भालू, तेंदुआ मन ये खुशी, आनंद, परेम ला अपन सुवारथ खातिर बटोरे मं लगे हे, उकरे सेती सब बेवस्था छिन्न-भिन्न होगे हे। अपन मन खाथे गुदा-गुदा अउ फोकला-छिलका ल जनता मन बर अइसे फेंक देथे जइसे ओमन सब भिखारी हे। अपन मन बर महल, अटारी, कल-कारखाना सब तान लेथे, अउ जनता बर झोपड़ी देये बर घला ओकर मन के जीव कसकथे। 

जनता के खुशी, आनंद, परेम ओकर परिवार हे, तिहार-परब हे, उही मं नाचत, गावत, कूदत अउ सेल्फी पीयत माते रहिथे। नइ चाही ओमन ल महल अटारी, कल-कारखाना, न कोन पद-परतिष्ठा, सबले बड़े संपत्ति, संतोष हे। दो रोटी के जुगाड़ हो जाय बस, ये पापी पेट ल का चाही? इही सुख हे, आनंद हे। परेम तो भगवान ओमन ल वरदान के रूप मं दे हे। फेर नीयतखोर मन इही मं डाका डार के जीना मुहाल कर दे हे। 

देखत हौं, कलम कइसे चलाकी चलत हे शकुनि बरोबर कोनो कोती के बात ला कोन कोती बहकाय के कच्चे बारा, पैय बारा कस चौसर के हाड़ा ला फेंकत हे। कलम के हाथ ल पकड़ेंव, कइसे बारहों महीना तिहार मनाय के बात उठाय रेहे अउ अब दुरजोधन, दुसासन के पक्ष ले असन चार सौ बीसी के चाल चलत हस  सीधा सही रस्दा मं आव संजय जइसे महाभारत के एक-एक बात धृतराष्ट्र ल बतावत गिस तइसने तैं जनता ला बता के ओ कोन देस हे जिहां बारहों महीना अउ तीन सौ साठ दिन तिहार, परब मनाय जाथे। 

जो चमकायेंव कलम (मीडिया) ल ते ओकर कान खड़ा होगे। सकपकागे अउ एती-ओती देख ले धर लिस। ककरो हाथ मं बिक के का तैं आमा ल अमली कहि देबे, कउंवा ल मिट्ठू (तोता) कहि देबे। होश गायब होगे, मोर ये बात ला सुनके। कभू-कभार शेर ला सवा शेर घला मिलथे। तब दांत ल निपोर देथे खिस्स ले बेंदरा बरोबर। 

माफी मांगत कलम (मीडिया) ह कहिथे- के बात अइसन हे... ओकर पूरा बात करे के पहिली ओला फेर दबकारेंव अउ कहेंव- माफी मोर से झन मांग, जनता करा मांग, जउन ल धोखा देवत अंधियारे मं रखके अपन सुवारथ साधथौ, सोचत होहू 'सइयां हे कोतवाल तब काकर ले का डरना?सत्ता ककरो बपौती नोहय, पांच साल मं कइसे काया पलट हो जथे तेला सब जानथौ। हां, त बता सही बात ल। 

जब घुड़की परिस ना, चाबुक ल हवा मं लहराय भर ले शेर, चीता जइसन खूंखार जंगली जानवर घला रस्दा मं आ जथे अउ फेर जइसे नचा ले ओला नाचे ले धर लेथे। वइसने कस हाल कलम (मीडिया) के घला होगे। ओहर बताथे- भइया, बारहों महीना मं तीन सौ साठ दिन जउन तिहार अउ परब मनाय जाथे ओ मुलुक हे भारत, भारत मं घला एक परदेस हे छत्तीसगढ़ नांव हे, ओ कहूं नहीं, उहू  छत्तीसगढ़ मं सरग ले बढ़ के सुख, शांति, परेम अउ संतोष मिलथे तउन जघा हे बस्तर। इहां मेनका, रंभा, नीलम परी मन संग इन्द्र जइसे देवता उतरके आथे अउ तिहार मनाथे। 

कलम सरलग बतावत कहिथे- अभी उहां बस्तर दशहरा मनाय के तइयारी शुरू होगे हे। ओ दिन उहां के राजा कमलचंद भंजदेव ला काछन अउ रैला देवी ह दशहरा परब मनाय खातिर अनुमति दिसे। अजब परम्परा हे, विधि विधान हे ये परब के। कलम बताइस अभी इतवार के काछनदेवी के पूजा होइस हे। आठ साल के नोनी (लड़की) नंदनी ऊपर काछनदेवी सवार होइस हे, बेल के कांटा के झूला बनाय रहिथे तेमा ओला सुताय  जाथे। जब ओ नोनी सुते रहिथे ततके बेर राज परिवार के सदस्य, दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी, प्रधान राज गुरु, मांझी मुखिया अउ कतको मनखे आथे। शोभायात्रा निकाले जाथे। इहां अइसन कतको अनगिनत तिहार अउ परब हे। एक दिन आरुग नइ जाय, कोनो तिहार, परब के अउ परब |

परमानंद वर्मा