सोमवार, 14 अगस्त 2023

कलजुगी सूर्पनखा मन के छतरंगी चाल

 सुनो भाई उधो .....

 छोटे बच्चे जब भूख से छटपटाते हैं, तिलमिलाते हैं और रोते-गाते हैं तब मां-बहनें दौड़कर आती हैं उनके पास। पूछती है -भूख लगी है ? तब दूध पिलाती हैं, खाना खिलाती हैं तब बच्चे शांत हो जाते हैं, मंद-मंद मुस्कुराने लगते हैं धीरे से झपकी आने के बाद सो भी जाते हैं। लेकिन इन माताओं की कौन-सी ऐसी भूख है जो उनके सिर चढ़कर सताने व परेशान करने लगी है, शैतानों की तरह वे भरा-पूरा परिवार छोड़कर 'पर पुरुष प्यारा लगे के तर्ज पर पंछियों की भांति उड़-उड़कर उनके घोंसले में जाकर चोंच लड़ाने लगी है। उनके बांहों में समा जाने के लिए बेताब हो रही हैं। इधर पति महोदय गण 'दो हंसों का जोड़ा बिछुड़ गयो रे, गजब भयो राम जुलूम भयो रे गाना गा-गाकर पत्नियों की याद में आंसू बहा रहे हैं और 'सारी-सारी रातें तेरी याद सताए गाना गुन-गुनाकर करवटें बदल रहे हैं। अब इन पंछियों का भी भरोसा नहीं, मर्दों का विश्वास उठने लगा है। पंछियां भी गुनगुनाने लगी है- 'चल उड़ जा रहे पंछी के अब ये देश हुआ बेगाना। 

अभी-अभी टेलीविजन अउ इंटरनेट मं खबर आवत हे के जब ले सावन लगे हे पेड़ मं राहय तउन पंछी मन भर-भरले उड़ा-उड़ा के ये  देश ले वो देश, ये शहर ले ओ शहर, ये गांव ले ओ गांव जा-जा के खुसरत (घुसना) जात हे। पता चले हे के ओ पंछी मन ला एक ठन कोरोना जइसे दूसर किसम के भयंकर रोग लग गे हे। ओ मन छटपटावत हे, जी-मिचलावत हे। ओ पंछी कोनो दूसर नहीं हमरे बहिनी-बेटी, बहू, गोसइन अउ दाई-महतारी हे। सब अपन घर गोसइयां, बेटा-बेटी, दाई-ददा, सास-ससुर ल छोड़-छोड़ के भागत हें अउ दूसर मरद संग रंगरेली मनावत हे। सबके नाक-कान काटत हें अउ खुदे नकटी बनत जात हे। 

पांच लइका के महतारी सेठइन ओं दिन सोना, चांदी, रुपया-पइसा ल धरके एक झन टरक वाले संग बेंगलूर भाग गे। मुंबई के डॉक्टरीन कुली संग बिहाव कर लिस। दिल्ली, कलकत्ता, लखनऊ, पटना, भोपाल अउ रायपुर में कोनो जगह नइ बांचे हे जिहां दस-दस, बीस-बीस साल पति संग जीवन गुजारे बेटी, बहू, बहिनी, अउ गोसइन मन ला का अइसे चांटी चाबत हे, कीरा काटत हे के उढ़रिया भागे असन पर मरद के बांह पकड़त हे। जब तरिया के पानी मतलाहा  (गंदा) हो जथे, तब मछरी मन उफला जथे, उमिहा जथे, जेने-पाय तेने कोतो रेंगे ले धर लेथे उही हाल अब होगे हे एकर मन के। 

इही सब बात ल एक दिन समारू अपन कका ल बतावत कहिथे- समय के धार तलवार ले घला जादा घातक होथे कका, एके बार मं सामने वाला के घेंच (गला) भुइयां मं गिरत देरी नइ लगय, पानी नइ मांग सकय, वारा-न्यारा हो जथे। 

भगेला पूछथे- सुने तो हौं बेटा फेर अइसन मउका के अभेडा  मन नइ परै हौं न तेकर सेती ओकर रस-कस ल नइ पाय हौं।

समारू अपन कका भगेला ला कहिथे- ठउका काहत हस कका, 'अपन मरे बिगन सरग नइ दीखय। जइसे अंधियार मं डोरी ल सांप समझथन फेर ओहर सांप नहीं डोरी होथे, सांप के अभेडा मं कहूं कोनो परही तब ओकर तीर मं कोनो ठहर सकत हे का?

तोर बात ल समझ नइ सकत हौं बेटा, तैं जउन कथा सुनाय ले जाथस तेकर कुछु ओर-छोर ल बताबे  के बाते-बात मं बेंझा के रख देबे?

अब तोला का बतावौं भगेला कका, जउन कथा तोला बताये बर जाथौं न, ओहर न शिव पुराण मं हे, न पद्म पुराण मं हे अउ गरुड़ पुराण मं। काग भुसुंडी, भारद्वाज, तुलसीदास, वैशम्पायन मुनि अउ न भगवान किसन घला अरजुन ल नइ सुनाय हे तइसन कथा तोला आज सुनाय ले जाथौं। 

भगेला पूछथे- तब कस रे समारू, तैं जउन कथा सुनाय ले जाथस तउन कथा ल कोन पुराण मं पढ़, सुन डरे हस रे?

हांसत समारू ह कहिथे- अभी-अभी ताजा अउ नवा पुराण सीता प्रेस जोधपुर ले छप के आय हे। एक लाख प्रति छपे हे। सब शहर मन के बुक स्टाल मं धड़ाधड़ बिकत हे। उदूक ले मोरो हाथ लग गे, एक ले बढ़के एक सुंदर कथा हे। ओला पढ़बे न, तब तहूं ह काकी ल सुनाय बिगन नइ रहि सकबे। 

अनेक सुंदर कथा हे ओ पुराण मं? तब भगेला कका पूछथे- तब ओ पुराण के का नांव हे बेटा समारू?

-ओकर नांव 'कलियुग पुराणÓ हे कका। समारू बताथे- काहत तो हौं न जइसे पहिली गुलशन नंदा के उपन्यास छपय तइसे ये 'कलियुग पुराणÓ बताथे, हाथों हाथ बिक गे। ओकर दूसर संस्करण छपे के तइयारी चलत हे। 

भगेला पूछथे- तब ये पुराण के कथा मन तो लगथे गजबे के सुंदर होही, तब एहा नोनी, बहू-बेटी अउ गोसइन मन के लइक हे के नहीं?

अरे काला कहिबे कका, उही मन तो जादा खरीदत हें, ओमन जादा कथा परेमी हे न। समारू कहिथे- देखस नहीं का शिव पुराण, भागवत पुराण, गरुड़ पुराण अउ जइसनों पुराण होवय तिहा उही माई लोगिन मन के संख्या जादा रहिथे, रहिथे के नहीं?

भगेला कहिथे- बात तो  सोलह आना सही बतावत हस बेटा 'फेर ले ना, ये कलियुग पुराण के एकाद ठन  कथा सुना न, घर जाहूं त तोर काकी ल घला सुनाहूं। अउ बनही ते एक ठन 'कलियुग पुराण मोरो बर बिसा के ले आनबे बेटा। 

समारू कलियुग पुराण सुनाय के पहिली गुरु वंदना करत ये दे इसलोक के उच्चारण करथे- 'गुरु ब्रम्हा, गुरु बिसनु, गुरु देवो महेश्वरा, गुरु: साक्षात पर ब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नम: ओकर बाद गनेश जी अउ सरसती देवी के वंदना करत उकरो मन के इसलोक के पाठ घला करथे। 

कका पूछथे- वाह बेटा, गजब के गियानी, धियानी लगथस रे, तैं हो न, अपन ददा ऊपर गेहस तइसे लगथे? समारू कहिथे- तुंहरे असन सियानहा मन के आशीर्वाद ल पाय हौं कका।

अब मेंहर जया किशोरी, पंडित प्रदीप मिश्रा अउ बागेश्वर धाम के धीरेन्द्रकृष्ण शास्त्री  के स्टाइल में तो नइ सुना सकौं कका, मोला ओ हाथ मटका-मटका के, मुसकुरा-गुरकुरा के नचकाहा, जोकर मन असन पल्लू ल मुंह मं ढाक के हे 'नइ आवय जइसे मुरारी बापू अउ सुधांशु सादा सरबदा कहिथे न तुलसी दास, काग भुसुंडी, भरद्वाज असन उही स्टाइल मं सुनावत हौं, बने धियान देके सुन

एक घौं के बात हे कका, वैशम्पायन मुनि राजा जन्मेजय ल कलियुग पुराण के कथा सुनावत बताय रिहिसे के कलिजुग कइसे, कोन डहर ले अउ काकर ऊपर पहिली आइस हे।

वैशम्पायन मुनि बताइस- राजा सबसे पहिली कलिजुग भारत देश मं तोर ददा (पिता- परीक्षित) के मुड़ी ऊपर आइस, एकरे बाद पूरा संसार मं ओहर पांव पसार डरिस। अब तो ओहर कालिया नाग बनके सब ल डसत हे। 

भगेला पूछथे- बेटा समारू, कालिया नाग तो जमुना नदी के रिहिसे, देश अउ संसार मं कइसे ओकर  आतंक बगरगे, बने फोर के के बता ना। 

सुन कका, अब असली कथा ला, सुन समारू भगेला ल बतावत कहिथे- अरे कका- कलियुग तो अब घर-घर मंं खुसरगे हे, बेटी-बहू, बहिनी- दाई-माई सबके मति ला भरमावत हे, छारियावत हे। 

कइसे तोर केहे के का मतलब हे, तैं कहना का चाहत हस? समारू अपन कका भगेला ल धीरज बंधावत कहिथे- सुन, इही कथा ल तो अब शुरूआत करे ले जाथौं।

ओहर बताथे- एला तो तैं जानत हस के नहीं, पहिली के राजा-महाराजा, नवाब, पूंजीपति, मालगुजार  मन कइसे दूसर के बहू, बेटी, मन ल भगा के लानय, गोसइन बना लै, रखैल राख ले, एक नहीं दस-दस...।

सही काहत हौं नहीं? भगेला जवाब देवत कहिथे- बात तो तोर सोलह आना सही हे बेटा। 

समारू बताथे- अब पासा पलटगे हे, जमाना बदलगे हे अउ तेजी से बदलत जात हे। 

एकर तोर करा कोनो परमान हे, के बस हवा मं सांय... सांय... तीर मारत हस? भगेला पूछथे।

समारू कहिथे- 'हाथ कंगन ल आरसी का, एक नई दू ठो परमान देवत हव कका 'अभी ओ दिन पाकिस्तान के सीमा हैदर नांव के एक झन मोटियारी, चार-चार लइका के महतारी तउन ल अपन देश अउ लइका मन ल छोड़ के सात समुंदर पार करके अपन परेमी करा आके बिहाव कर डरिस। मुसलिम औरत हिन्दू बनगे, मांग मं सिंदूर, हाथ मं चूड़ी अउ बने साड़ी, पोलका पहिन के राहत हे। बाद मं मीडिया वाले मन जानिन तब ओकर पीछू परगे हे।

कलियुग पुराण के दूसर अध्याय ले कथा सुनावत हौं, भारत के अंजू नांव के बाई अपन बिहाता ल छोड़के पाकिस्तान जाके नसरूल्लाह संग निकाह कर लिस। अउ सुन कका- ये तोरे शहर के बात सुनावत हौं- एक झन बंगाली बाई हा घला अइसने एक झन बेटा ला छोड़ के दूसर संग रेहे ले चल दीस। ओकर सास-ससुर अब बहुत परेशान हे। 

ये तो अड़बड़, गड़बड़ झाला हे बेटा, ए सब कइसे होवत हे। समारू बताथे- ये सब तो कलजुग पुराण मं लिखाय हे कका। ओ दिन एक गांव के बेटी, शादी-शुदा हे, जगदलपुर मं ओकर नौकरी लगे हे, उहां दूसर संग शादी कर लिस। जब ओकर दाई-ददा मन जाके देखिन तब घर मं शराब के बोतल, सिगरेट पीयत देखके सब दंग रहिगे। 

अउ सुन कका- जया किशोरी के कथा अउ गुलशन  नंदा के उपन्यास घला एकर आगू मं फीका हे। एक गांव के मस्टरीन, बने खाता-पीता घर के बेटी अउ बहू, कोनो चीज-बस, रुपया कौड़ी के कोनो कमी नइहे तेकर मसमोटी ल देख, चार बेटी-बेटा ला छोड़ के आन जात के पियार मं पागल होगे, तलाक ले लिस, अइसने कस दसो ठन मामला रोज सुने मं आवत हे। 

समारू बताथे- अइसन हाल अपने गांव, अपने देश भर मं नइ होवत हे पूरा संसार भर के होवत हे लगथे, बहिनी, बेटी, बहू, दाई-माई मन चरस, हेरोइन, धतूरा, नइते भांग खा-पी ले हे तइसे लगथे। 

समारू कहिथे- अरे कका, पढ़े-लिखे, नौकरी लगे, लिव इन रिलेशनशिप, टीवी सीरियल, मॉल, होटल, क्लब और फिलिम के कमाल हे। सब पुराण फेल हे ये कलियुग पुराण के आघू मं। 

भगेला कहिथे- अंधेर होवत हे बेटा, झन सुना अब अइसन कथा, मोर माथा चकरावत हे। 

सुन कका, एक ठन आखिरी कथा सुनके कलिजुग पुराण के पुरनाहुति करत हौं।

तब सुन- एक झन चीनी महिला हे, अपन ब्वायफ्रेंड ऊपर अतेक मोहागे होगे के जउन बैंक मं ओहर काम करत रिहिसे हे तिहां ले पांच करोड़ रुपिया चोरा लिस सिरिफ एकर सेती के ओकर ऊपर काला जादू करके ओला अपन वश में करके रखिहौं। ओ परेमी थोकन नखरा देखावत रिहिसे। तंत्र-मंत्र, गुरु बाबा सब करा ले आन लाइन सेवा लेवत रिहिसे। 

कका कहिथे- बस... बंद कर बेटा, ये पुराण ल सुनके तो मैं पागल हौं जाहौं। 

समारू कहिथे- तै का पूरा घर परिवार, समाज, देश अउ संसार पागल होवत हे कका, ये महारोग झपागे हे, ये तो कोरोना ले अउ बढ़के बड़े रोग आगे हे। ए रोग ह कइसे ठीक होही तेला सुप्रीम कोर्ट के जज मन जाने, डॉक्टर मन जानय। 

आखिर मं टिमोली (मजाक) लगावत समारू कहिथे- सुन कका, तोला ये नकटी-नकटा मन के ऊपर एक ठन गाना सुनावत हौं, मजेदार हे-

मैं बिलासपुरहिन अउ तैं रायगढ़िया। 

तोर मोर जोड़ी फभे हे कतेक बढ़िया।।

-परमानंद वर्मा


छत्तीसगढ़ी लघुव्यंग्य-'कार्यकर्ता'

कइसे बेटा ? अठुरिया होगे। तोला एक ठन नानचुन काम जोंगे रेहेंव,तेला तो करवाय नइ अस ,उल्टा उही दिन ले घर मं रोवत बइठे रथस। तोर ओथरे मुंह,ओरमे गाल ये सबला देखके तो मोला संसो धर लेहे। कुछु फोर के बतावस घला निहि ??? दाई हा अपन मया पलावत गुरतुर भाखा मं बेसरम फुल कस मुरझुराय टूरा ला कांस के पुरखौती  थरकुलिया मं लाल चाहा अमरत किहीस।मन के बात गड़रिया जाने कथें तइसने बात तो आय दाई। जेन दिन ले मोला काम जोंगे हस न,तेने दिन ले ये संसो संचरे हे। इही काम कोनो दूसर के होतिस तब मोर कुछ कमई हो जतिस। ये मोर दाई के काम आय। एमा मोला का मिलना हे। जरुवत परही तब सौ-पचास अपन जेब ले लगाय बर परही। दाई ला पईसा कइसे मागंव? दाई के  काम आय,कइसे करवांव ? बस इही सब बात मियार के घूना कस मोला खावत हे दाई ऽ... ऽ ..ऽ..!अरे बेटा ,अतकी नानकुन बात बर अतेक बड़ संसो करत हस ? थूंके थूंक मं बरा नइ चुरय,येला महुं जानथों।अपन अंछरा के छोर मं बंधाय अलमारी के कुंची ला अपन टूरा कोती फेंकत दाई हा किहीस-जतका लागही,लगा लेबे। फेर एक बात महुं जानना चाहत हौं बेटा....? एकर पहिली तो अइसे कभू नइ काहत रेहेस। ये बखत अइसे का बात होगे तेमा...?

अब मैं पार्टी कार्यकर्ता बनगे हौं दाई। हाँ....,पार्टी कार्यकर्ता । दिल्ली के चाँदनी चंऊक के चौपाटी मं नावा नावा बिसाय नेहरु जाकिट के तरी मं पहिरे बंगाली के आस्तिन ला बांहा कोती चघावत टूरा हा अपन बात ला लमावत केहे लागिस।हमन ला पार्टी लाईन मं रहिके काम करना,करवाना परथे। 

अपन पार्टी गमछा ला डेरी खांध ले माई खांध में डारत फेर केहे लागिस।अब तोर हमर महतारी-बेटा, सोदर,हित-पिरीत,दोस्त-यार सब सिरिफ़ लेन-देन के नता-गोता रहिगे दाई।

पार्टी कार्यकर्ता...? यहा का पार्टी  कार्यकर्ता होथे रे ....? ऊपर संस्सु मारत ओकर दाई हा ठाढ़ चितियागे। ओला चन्दर धरलीस। देखो देखो होगे। सकलाय लोगन के बीच ओ बेटा हा अपन दाई ला पांचो-अमरित पियावत अपन मरे दाई के बहाना दू पईसा कमाय के उदीम सोंचत राहय....! अउ लोगन ओकर दाई के काठी-पानी के जोखा मं लगे राहंय।राम नाम सत्त हे ....!!

आस्तिन-बांही

बहाना- के नांव मं पढ़ें

बन्धु राजेश्वर राव खरे

'लक्ष्मण कुंज'

शिव मंदिर के पास,अयोध्यानगर

महासमुन्द (छ. ग.)

रविवार, 6 अगस्त 2023

बदलते समय की ऐतिहासिक कृति छत्तीसगढ़ी उपन्यास ’’करौंदा’’

-डुमन लाल ध्रुव 

बहुमुखी प्रतिभा के लेखक उपन्यासकार श्री परमानंद वर्मा ने ’’करौंदा’’ की महत्ता और प्रेरक भूमिका को खुले दिल से स्वीकार करते हुए उनके साहसिक योगदान को छत्तीसगढ़ी उपन्यास के रूप में प्रस्तुत की है। छत्तीसगढ़ी उपन्यास में करौंदा नारी चरित्र का ऐतिहासिक दृष्टिकोण है। उसका इंटरप्रेटेशन लेखक ने उसी तरह से किया है जैसे इतिहास और वर्तमान का। श्री परमानंद वर्मा जी का उद्देश्य हमेशा इतिहास से वर्तमान की ओर आना है। इसीलिए करौंदा का चरित्र समाज के लिए रेलीवेंट बने हुए हैं। लेखक ने करौंदा उपन्यास में जो सामाजिक द्वंद दिखाया है, उस समय के दबंग, गुंडा- बदमाश को सामने लाती है। उपन्यास को गहराई से देखें तो मिलेगा कि कितनी बड़ी संत्रास और द्वंद छुपा हुआ है। एक ओर समाज की विद्रूपता, समानता और शोषण की अभिव्यक्ति है और उन्हीं नीतियों के कारण करौंदा के मन में उपजे सामाजिक ठहराव का चित्रण है। स्थानीय गौंटिया द्वारा शोषण किये जाने व शराबबंदी से उत्पन्न होती है करौंदा की कहानी। वहीं दूसरी ओर बदलते समाज में रह रहे लोगों के जीवन की जटिलताएं उभरकर सामने आती हैं। उपन्यास में करौंदा शोषण के विरुद्ध संघर्ष करती रही हैं।

यहां श्री परमानंद वर्मा द्वारा लिखित छत्तीसगढ़ी उपन्यास करौंदा की लेखन-प्रक्रिया की निर्माणकारी स्थितियों को भी जान लेना बेहतर होगा। प्रारंभिक जीवन में मिले अप्रत्याशित आघातों ने उनकी मनोभूमि को आत्मसजग, कुछ अंतर्मुखी, कुछ जिज्ञासु बना दिया। परमानंद वर्मा जी छत्तीसगढ़ी के गंभीर लेखक होने के नाते उपन्यास लेखन में उनका मनीषी पक्ष बढ़ता गया और दृष्टि तात्विक  होती गई। क्योंकि करौंदा एक ऐसी पात्र है जो व्यक्ति और समाज का परिसंस्कार करने के लिए आगे आयी हैं।

करौंदा के तरेरे आंखी के सुरता ला भला पुरुषोत्तम कइसे भुला सकत हे। सजा कहौ चाहे दुख होय आखिर मं भुगते बर तो उही ल परथे। करौंदा हा अपन गोसइया ला बतावत कहिथे-परिवार मं सुख-शांति रखे बर एके लइका होना चाही।चाहे बेटी होय चाहे बेटा, फरक नइ मानना चाही, मोला बहुत नीक लागिस हे। सपरहिन दीदी ला पूछेंव तब उहू किहिस-हौ रे करौंदा, बेटी-बेटा मं कांही भेद नइ करना चाही। उही मन तो लछमी हे,धन हे घर के।जतका हो सकय,बन सकय पढ़ा-लिखा देना चाही।नइते हमर कमई- धमई अउ खेत- खार तो छुटय नइ बहिनी,इही तो हमन लिखा के आय हन भगवान करा ले। तब मेहनत करे ले काबर जीव ला चुराबो। बस कमाबो तब खाबो,पहिनबो अउ ओढ़बो। आंखी फूटय अनदेखना मन के।

करौंदा के अनुसार देखा जाए तो छत्तीसगढ़ की नारी संक्रमण की स्थिति से गुजर रही है। उसका एक पैर घर से बाहर है तो दूसरा अभी भी रसोई की चौखट के अंदर है। शिक्षण एवं उसके क्षितिज को विस्तार दिया, पर घर-परिवार की लक्ष्मण रेखा अब भी उसे घेरे हुए हैं ।परिवार और शिक्षा आज भी उसकी प्राथमिकता में है। प्रगतिशीलता की कितनी ही बातें कर लें आज भी बेटी- बेटा में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। समाज में सामंती सोच लिए बैठे पुरुष के कारण ही शुरू होती है औरत के संत्रास और शोषण की कहानी। कहने को हालात बदले हैं। पर क्या सचमुच बदले हैं? कई परिवारों में अभी भी स्त्रियां बेटी-बेटा की शिकार हैं। जो मानसिक यंत्रणा शारीरिक यंत्रणा से अधिक त्रासदी होती है।

तैं कइसे गोठियाथस मितान,ओ तो देवी हे देवी ? अइसे तो नइ हो सकय, मैं तोर बात ला पतियावौं नहीं? ओतेक बड़े घर के बेटी,अउ मंडल घर के बहू अइसन कुलछनीन हो नइ सकय? मैं जानत हौं ओला।ओकर असन रुप रंग,गुन-बेवहार कंडिल धर के खोजबे तभो नइ मिलय ये गांव में,तेकर ऊपर तैंहर अइसन बद्दी लगावत हस ? ’’मितान के बात ला सुनके पुरुषोत्तम दंग रहि जथे?’’

उपन्यास लेखक श्री परमानंद वर्मा की शैली, भाषा और अभिव्यक्ति की कौशल ऐसा है कि शुरू करने के बाद उपन्यास को अधूरी छोड़ पाना संभव नहीं होता। अनुभव की पूंजी और कल्पनाशीलता से वे ऐसा ताना बाना बुनते हैं कि हाथ में आ जाने के बाद सिरे को छोड़ पाना संभव नहीं होता। परमानंद जी के अनुसार कथानक से करौंदा का उद्देश्य और अभ्यांतरिक अर्थ स्पष्ट होता है। इस भाषा से लेखक के व्यक्तित्व का भी बोध होता है।

बहुत चतुर सुजान कस लगथस रे पुरुषोत्तम तैंहर, कोनो अनजान लइका मन कस कड़हार-कड़हार के पूछथस,का बात हे तेमा? हड़बड़ाय असन हो जथे तब ओहर कहिथे- ’’नहीं मालिक, नइ जानत हौं तेकर सेती पूछथौं। मनखे अतेक मर-मर के कमाथे तभो ले ओकर पेट नइ भरय,उन्ना के उन्ना रहिथे अउ जौंन नइ कमावय, बेईमानी करथे,परके गर ला रेतथे, ओमन मजा मारथे।अइसन काबर होथे। का ओकर मन के करम मं अइसन लिखाय रहिथे? ’’

श्री परमानंद वर्मा की उपन्यास करौंदा में समय और समाज बहुत कुछ कहती है। मध्यमवर्गीय जीवन की दारूण कथा, समय और समाज के नैतिक संकट बहुत कुछ प्रमाणिक रूप से दर्ज है। मध्यमवर्गीय समाज हमेशा ही नैतिक संकट से घिरा होता है, एक ओर आत्मा को धुंधलके में छोड़कर मान और सम्मान पाने की सीढ़ी है तो दूसरी ओर अभाव और उपेक्षा का अंतहीन संघर्ष जिसमें मालिक के बीच में पुरुषोत्तम को वेदना और यातना को सहना पड़ रहा है।

मैं जानथों मालिक ये देश मं,परदेश मं कलाकार मन के कतेक कदर हे तौंन ला? जइसे मजदूर के किसान के अउ जतका कमजोरहा बनिहार-मजदूर के सोसन होथे तइसने कलाकार, साहित्यकार मन तो घलो सोसन के शिकार होवत हे। बड़े-बड़े दलाल कलाकार मन के आड़ मं देश -विदेश मं नाम अउ पइसा कमावत हे। फेर कलाकार ला का मिलथे, फोकला। अपन बर एक ठन कुरिया घला नइ बना सकय। गरीबी मं जीथे अउ मर खप जथे। हम जानथन एक दिन हमरो उही गति होवइया हे।’’

श्री परमानंद वर्मा जी ने छत्तीसगढ़िया कलाकारों की त्रासद भरी जिंदगी को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है जहां अव्यवस्थित जीवन है। एक कलाकार ही हैं जो ताउम्र कलाकारी पेशे में जीवन जीने के साधन ढूंढते हैं। वैश्वीकरण का प्रभाव तो है ही आज हर कलाकार अपने परिवार के लिए बेहतर जीवन की लालसा को पाले हुए हैं। कलाकारों का काम सिर्फ कला दिखाना ही नहीं, कला से ज्यादा संघर्ष को मांजना पड़ता है। ’’करौंदा’’ उपन्यास में कलाकारों की सृजन यात्रा मन को बेहद प्रभावित करता है। गहरी समझ के साथ छत्तीसगढ़िया कलाकारों की बड़ी विशेषता को प्रदर्शित करता है।

करौंदा के बेवहार अउ बात ला सुनके गांव भर के मन ओकरे कोती होगे हे। गांव मं कुछु होही, बुढ़वा गउंटिया अउ सरपंच ला एक कोती छोड़ दिही, जौंने शरन देन तौंने हर तो नइ हमर अउ ये गांव के मालिक बन जाही ?

 लेखक श्री परमानंद वर्मा समाज के गरीब, पिछड़े, मजदूर और महिला वर्ग की चिंताओं और तकलीफों के चितेरे उपन्यासकार हैं। करौंदा का व्यवहार गांव और समाज के लिए प्रासंगिक है। गांव के बुढ़वा गउंटिया और सरपंच के अस्तित्व का संघर्ष गांव में ही देखने को मिलता है। यहां करौंदा अपने समय और परिवेश की भावों को व्यक्त करती है। समय को दुख को निकटता से देखते हैं और समाज के लिए नई बुनियाद का सूत्रपात करते हैं। वहीं करौंदा समाज में मानवीय मूल्यों का आदर्श चित्रण प्रस्तुत करती है।

करौंदा कहिथे- ’सरकार के चाल ला तो देख, कतेक गियानी मन कस जनता ला उपदेश देथे। शराब से सामाजिक बुराई फैलत हे ऐला रोके खातिर ओमन ला खुदे आगू आना चाही। ये तो वइसने कस बात होगे, कचरा गंदगी फैलावय कोनो दूसर अउ साफ सफाई करय जनता ? लगथे भगवान हर तो अक्कल उही मन ला दे है,  उही मन अपन दाई के दूध पिये हे।’

श्री परमानंद वर्मा के लेखन में विस्तार और व्यापकता दिखाई देती है। उनके लेखन का कैनवास विस्तृत है। एक ओर उनका लेखन सामाजिक सरोकारों को जोड़ती है साथ ही राजनीतिक पराभाव को भी प्रदर्शित करती है। ’’उही मन अपन दाई के दूध पिये हे’’ ये आवाज सिर्फ श्री परमानंद वर्मा की आवाज नहीं है। ये पूरी छत्तीसगढ़िया लोगों की आवाज है।

जेकर मन अउ हिरदय साफ हे तेकर कांही रोका-छेका नइहे ? जाके देख बाहिर मं माईलोगिन मन आज कहां ले कहां नइ पहंुच गे हे ? काला अंतरिक्ष कइबे, राजनीति, उद्योग, कला, संगीत, खेल, साहित्य, मं सब जगह ओमन बढ़-चढ़ के भाग लेवत हे अउ तुमन घर में गाय छेरी असन बांध के रखबो कइथौ। सियनहा मन समझावत कहिथे- ’अब ओ दिन नई रहिगे बाबू हो, अब बराबरी के दिन आ गे हे। तुमन मन के कुभाव ला मिटा दौ। ओ बपरी मन तो तुंहर संगवारी हे। मिल जुलके सुनता-सलाह काम करौ तब कोनो मेर बात नइ बिगड़य। असल में ओकर मन के बढ़ती ला तुमन देखे अउ सहे नइ सहत हौ। तेखर सेती छटपटावत हौं।

छत्तीसगढ़ी उपन्यास करौंदा बहुत से सवालों के बीच हमें ला छोड़ता है। पहले तो वह कथा के सुथरे विन्यास की अपेक्षाओं को ध्वस्त करती है। करौंदा प्रेमचंद की कथा विन्यास की तरह प्राचीन कथा-कहन की जकड़नों से भरा हुआ है। कुछ मौलिक किस्म के प्रश्नों से घिरे जरूर है परंतु भाषाई विमर्श जरूर करते हैं। एक ओर विमर्शों का परिज्ञान होता है तो दूसरी ओर स्थूल रूप से संस्कृति और समानांतर सृजनधाराओं का परिचयात्मक स्वरूप स्पष्ट होने लगता है और कई अर्थों में यह प्रवृत्ति पारंपरिक तुलनात्मक विवेक की निर्माणधारा का आद्य रुप लगती है।

करौंदा कहिथे-’ले अभी तो बात ला छोड़व, ओ बदमाश मन के मैं परवाह नई करौं। जौंन दिन के बात तौंन दिन देखे जाही। अभी थाना के बात गोठियात रेहेव तेकर बर का करना हे तौंन ला बतावौ ?

जो व्यक्ति समाज को अच्छे-बुरे चश्मे से देखते हैं, यह भूल जाते हैं कि अच्छे और बुरे के अंतर्गत आने वाली चीजों को स्पष्ट रूप से प्रगतिशील और पतनशील रूपों के ढांचे में फिट नहीं किया जा सकता। हमें समाज के विभिन्न रूपों को परिवर्तन के उस निर्धारक तत्व को टोहना पड़ेगा जो ऐसी परिस्थितियों के जन्म के मूल कारक हैं। मसलन गुंडे और बदमाशों की खुलेपन की आमद का अर्थ केवल एकतरफा स्वतंत्रता ही नहीं है इसलिए अराजकता और स्वतंत्रता में अंतर करना ही पड़ेगा, कहना ही पड़ेगा कि अराजकता की हिमायत नहीं की जा सकती। प्रजातांत्रिक मूल्यों की दृष्टि से देखें तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता की चाह इतनी बलवती है कि वह कहीं भी अराजकता की सीमाओं पर खड़ी दिखाई देती है।

 नदी नरवा मं पूरा आय कस पानी जइसे उफनत, लहरावत दिखते तइसे कस सेठानी के मन उबुक-चुबुक होवत रिहिस। का होगे ओहर चार-पांच लइका के महतारी हे, बहू-बेटी वाली हे फेर रूप रंग उमर अभी ले अटल कुंवारी कस दिखथे। अइसन लंदर-फंदर के फांदा मं कभू नई फंसे रहिसे। फेर आज रामू के रूप ओकर पांव म अइसने कांटे गड़े कस गड़गे ते न आह कर सकत हे न उह....। निकाल हे तब जीवरा अइसे तड़पत हे जइसे कोनो घायल सिपाही के शरीर ले तलवार के घांव लगे मं होथे। कइसनो करके खाना बनाइस। ओखर सेठ एक बजे बाहर आथे अउ खाना खा के मुंह पोंछत फेर निकल जथे धंधा पानी मं।

उपन्यास लेखक श्री परमानंद वर्मा की जीवन दृष्टि मनुष्य जीवन की विभिन्न परिस्थितियों को परखती है। जीवन का गहरा अनुभव उपन्यास की विकास यात्रा को पूरी करते हैं।


’तोर मोर बोली हर लगे हे तन मं,

कोन जादू ला मारे फिरत हौं बन मं।’

जब ये ददरिया ला ओ शांति देवारिन गाइस तब जौंन रंगरेलिहा हा ओला सीटी पार के बलाय रिहिस हे तौंन तो सिरतोन मं जादू मारे कस ओकर रंग रूप ला देखके बइहागे। जब ओकर तीर मं आके ओहर ठुमक-ठुमके के सिनेमा के हिरोइन कस नाचे ले धरित तब ओला पोटार लिस। शांति ला पोटारना का होइस भीड़ ओकर ऊपर उम्हियागे। हुड़दंग मचगे। ओ रंगरेलिहा ला अइसे मरत ले मारिन ते ओकर जतका मस्ती रिहिस हे तौंन घुसड़गे। भीड़ चिल्लाये ले धर लिस। देखव-देखव..... मारव-मारव.... पीटव-पीटव...। नाचा करइया गांव के मुखिया मन शांति ला पंडाल मेर लाइन। नाचा रूकगे रिहिस हे। माइक ले काहत रिहिन हे शांत रहव... फेर भीड़ के हो-हल्ला मं कोन का काहत हे, कोन कहां जात हे, तेन ककरो समझ मं नइ आवत रिहिस हे।

उपन्यास करौंदा में छत्तीसगढ़ में कला और संस्कृति का दर्जा ऊंचा है। लेखक श्री परमानंद वर्मा ने ददरिया शैली का अविष्कार करके संवाद के सहारे कथा की बहुत सी अदृश्य परतों को उघाड़ कर आधुनिक विन्यास संबंधी नई शैली का प्रणयन किया है।

 संझाकुन के बस मं दूनो झन घूम-फिर के आथे। अउ उही घर म रहिथे जिहां के बेवस्था करे के बात केहे रहिथे। हफ्ता के बीते ले अपन घर जाथे तब गोसइन मुंह फुलाय, कैकई कस न हुकिस न भुकिस। लइका मन गोठियाइन-बतइन। संझाकन घूमत-फिरत फेर शांति मेर आगे। अब तो दूनो के मजा हे। गउंटनीन बनगे शांति। रात-दिन के नचई-कुदई ले बाचगे। कुसुम घला अब दीदी-भाटो करा आय-जाय ले धर लिस। सुनब मं आय हे के शांति के पुतरी असन एक झन बेटी घलो हो गे। शांति ओकर नाव हरनारायन ला पूछके शीतल रखे हे। कुसुम मुस्कावत कहिथे-अच्छा संुदर नांव हे दीदी।

श्री परमानंद वर्मा छत्तीसगढ़ी उपन्यास करौंदा में जीवन के अनेक अनछुए पहलुओं को एक नई दृष्टि से देखने और विकसित करने का प्रयास किया है। रिश्तों की संजीदगी मन को आकर्षित करती है।


गांव मं दीदी बैंक, रामायन मंडली अउ महिला मजदूर संगठन बनाके करौंदा तो ताकत बना लिस जइसना चुनाव लड़े बर नेता मन बनाथे। अब तो गांव के छोटे-बड़े सब ओकर आदर करथे,  कोनो अइसने मनखे नई होही जेन ओकर दुआरी मं आगे तेकर काम नइ बनत होगी। दे दे, देवा दे नइते रस्दा बता दे महामंत्र ओकर अइसे पंचाक्षरी ताकत हे के छिन मं लोगन के काम बन जाथे। रात बारह बजे ककरो घर मं बीमार परे हे, अस्तपाल ले जाना हे कोनो सकरी ला खटखटा दिस ओकर घर के मन तब कइसनों नींद मं रइही करौंदा उठ जथे। लुगरा बदलिस अउ ओकर मन संग चले बर तइयार हो जथे। पटवारी, आरआई, तहसीलदार, बुलाक आफिस, थाना जिहां का हौं चौबीसो घंटा तइयार। घर के काम ला सास संभाल लेथे तेकर सेती अउ जादा चिंता नइ राहय। जनपद अध्यक्ष, विधायक अउ थानादार सब जानथे, पहिचानथे तेकर सेती काम घला ओकर फटाफट हो जथे।

 छत्तीसगढ़ी उपन्यास करौंदा बदलते समय की ऐतिहासिक कृति है। हकीकत बयानी के आधार पर कही गई कहानी हमारे समाज के बदलते परिवेश की एक झलक को प्रस्तुत करती है। करौंदा समाज में समस्याओं का अंत करके समाधान की दिशा में उठाए जाने वाले पहलुओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। समाज में अच्छाई को साधने का प्रयास करती है। नई पीढ़ी के बदलते सोच की प्रति ध्वनि को मुखरित करती है। उपन्यासकार श्री परमानंद वर्मा ने करौंदा की प्रतिबद्धता को औपन्यासिक रुप से उजागर किया है।

करौंदा के सास ला जौंने बात के डर रिहिस आखिर उही होइस। ओ तो पहिली ले जान डारे रिहिस हे के ये बहू नोहय कोनो कंकालीन अउ चुड़ेलिन आय जौंन ला ओहर अपन बेटा बर बिहा के लानिस। का जानय बहू के आड़ मं कुलछनीन घर मं समा गे हे। बहू होतिस त बहू असन नइ रहितिस जइसन दूसर मन के रहिथे। चले हे बड़े-बड़े के नाक मारे ले अउ घर ला इंहा देखव तब माहकत परे हे।

इस उपन्यास में करौंदा की सास की भाषा हमेशा ही ग्रामीण भाषा का रूप लेती है।कंकालिन,चुड़ेलिन,कुलकछीन ठेठ ग्रामीण की भाषा के रूप में हमारे सामने आती है। इस भाषा के अनेक रूप व अर्थ हैं। श्री परमानंद वर्मा ने चमत्कारिक और कलात्मक भाषा के प्रयोग से पूरी औपन्यासिक शैली को अद्वितीय ढंग से विश्वसनीय और जीवंत बनाए रखते हैं ।


करौंदा बिहान भर नहा-धोके तइयार होके सबले पहिली महामाया मंदिर जाथे अउ उहां जीत के खुशी मं चढ़ावा चढ़ाथे। उहा ले निकल के अपन गोसइया पुरूषोत्तम संग अपन गांव के भइया भवानी परसाद जौंन ये शहर मं बड़े साहेब हे तेकर घर मिठाई धर के जाथे। घर मं जाके भइया-भउजी के पांव-परत रो डरथे। अउ कहिथे-तुमन मोर लाज बचा लेव। मैं तो उही करौंदा हौं, गांव के बनिहारिन तौंन ला आज कुरसी मं बइठार देव। तोर ये करजा ला मैं कइसे छुटहौं भइया ? 

’’तुमन मोर लाज बचा लेव’’ करौंदा की एक सहज समझदारी थी। महामाया माई के समक्ष अपनों के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता, सामाजिक परिवेश के कारण आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास को बनाए रखने में सोचने की शक्ति देता है। करौंदा लोगों की मर्म को भेदता है। उपन्यासकार श्री परमानंद वर्मा के लिए ’’करौंदा’’ जैसी छत्तीसगढ़ी उपन्यास लिखना बेहद जरूरी था क्योंकि करौंदा का इतिहास करौंदा को पहले से अधिक और विकसित करेगी।



डुमन लाल ध्रुव

मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

पिनकोड-493773

मो. नं.- 9424210208

कोनो ल चांटी चाबत हे तब मैं का करौं?

कुछ लोगों की आदत होती है, चुपचाप नहीं बैठ सकते। हर क्षेत्र में इस तरह के लोग होते हैं। आड़े-तिरछे काम, बात, व्यवहार, आचरण करते रहते हैं जो पीड़ादायक होते हैं, असहनीय और अशोभनीय होते हैं। समाज, परिवार और देश की संस्कृति, सभ्यता, भाषा, बोली और धर्म के विरुद्ध होते हैं। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख-। 

आजकल बइठे-ठाले लोगन मन ल बरपेली चांटी चाबत हे, तब बिछियावत ओकर झार ले सुसुवात हे, कोनो-कोनो ल कांटा गड़त हे तब ओमन करलावत हे, कोनो ल बात के तीर लगत हे, तब जहर खाये कस मरत हे, छटपटावत हें, का करन कइसे करन? सब अपन-अपन ले अपने आप मरत हे। अपने खुद के बुने जाला मं जइसे मकड़ी फंस जथे अउ उबरे के कोनो चारा या जुगाड़ नइ दीखय तहां ले फंस के मर जथे, तइसने कस आज हाल मनखे मन के होवत जात हे। कोनो थिरथार, चुपचाप रेहे नइ सकत हे। एक-दूसर ल कोचकत रहिथें, हुदरत रहिथे। सहत ले सहिथे अउ जहां मुड़ी ले ऊपर पानी चढ़े ले धरथे, अकबकाय असन लगथे तहां ले उबरे बर, परान बचाय बर तो हाथ-गोड़ मारे ले परथे। आज समाज के वइसने कस हालत होगे हे। इही सब बात ल गुनत उधो गुड़ी चवरा  कोती जात रहिथे, तब बीच रस्दा मं माधो के मुख्तियार मिलगे। ओहर पूचथे- या उधो, कहां जाथस जी?

राम... राम... ददा, राम... राम..., अरे माधो करा जाथौं रे भई, थोकन काम हे। सियनहा अकन राहय मुख्तियार तउन ला राम रमउआ करे के बाद उधो, ओला बताथे। 

- कइसे कुछु काम हे गा, मुख्तियार उधो ल पूछथे ? 

- का, कामेच रइही, तब कोनो ककरो दुआरी मं जाही गा, अइसे बिन काम के नइ जा सकय? उधो

मुख्तियार ल अइसन लगिथे के उधो ओकर सवाल जउन करिस तेला रिस मानगे। ओहर कहिथे- अइसे बात नइहे उधो, तोर तो ओहर संगवारी हे, मितान हे गा अउ तैं तो ओकर भक्त घला हस। तैं तो कभू आ-जा सकथस। तोर बर तो सदा ओकर दरवाजा खुले हे। 

उधो कहिथे- जब सबो बात ल तैं जानत हस तब तिखारे के का जरूरत?

मुख्तियार चेथी ल खजुवावत अउ बात मं ओला अइसे लगथे के अरझगेंव, तब कोरमावत उधो ल कहिथे- अइसे बात नइहे, बात दरअसल ये हे के तोर चेहरा मं थोकन चिंता के लकीर देखत हौं तब पूछ परेंव।

अरे इही तो बात हे, इकरे समाधान करे खातिर तो माधो करा जात हौं। मुख्तियार ल उधो  ह जउन सोचत-विचारत आवत रिहिसे रस्दा भर तउन बात ल ओकर करा उछर (उगल) दिस। 

मुख्तियार कहिथे- ले चल, महूं जाथौं ओकरे करा। 

दूनो गोठियावत-बतावत माधो के दरबार मं हाजिर हो जथे। देखते साठ माधो ओला पूछथे- अरे उधो, तैं कहां  गे रेहे अतेक दिन ले, तोर अता-पता नइ चलत रिहिसे। 

अब तोला का बतावौं माधो, मैं तोरे असन ठेलहा तो नइहौं। मैं देश-दुनिया, ये गांव ले ओ गांव, ये शहर  ले ओ शहर, ये मंदिर ले ओ मसजिद, ये गियानी, ओ धियानी। सब जघा घूमत-फिरत रहिथौं। 

माधो पूछथे- तब सब जघा के हाल-चाल बने-बने हे न?

का बने-बने ल कहिथस माधो, मणिपुर बरत हे, जरत हे, पूरा सतियानास होगे हे परदेस हा, कानून बेवस्था सब छर्री-दर्री होगे हे, परदेश अउ केन्द्र सरकार दांत ल निपोर दे हे, पुलिस अउ सेना घला हथियार डार दे हे, कुकी अउ मैतेयी दू समुदाय के झगरा अतेक बाड़गे हे के कौरव-पांडव के लड़ई बरोबर महाभारत मचे हे। 

उधो के बात ल सुनके माधो के माथा चकरागे, का अतेक गदर मात गेहे मणिपुर मं? तब केन्द्र अउ राज्य सरकार का करत हे, योगी महराज जइसे बुलडोजर नइ चला देतिस? सब के होश ठिकाना आ जतिस?

उधो कहिथे- काला का कहिबे माधो- ओमन तो बने घर के घर के उझरइया हे, बने सरकार के तोड़फोड़ करके, गुना-भाग करके अपने पारटी के सरकार बनाय मं लगे हे। दूसर ल खात-पीयत नइ देख सकय तउन का अइसन समस्या ल देखही ?

अउ हां एक ठन बात हे मितान, बइठे-ठाले ए मन ल घलो कइसे चांटी चाबत रहिथे? उधो के बात ल सुनके माधो पूछथे- कइसे का बात होगे तेमा ?

अब तोला का बात ल बतावौं माधो- ओ दिन आसरम मं परवचन सुने ले जा परेंव। उहां दुवारी मं पोस्टर लगे हे तेमा लिखे हे के आसरम जउन परवचन सुने बर आवत हौ, तउन मन कपड़ा बने ढंग के पहिर के आय करौ। इशारा सीधा बेटी, बहू अउ गोसइन जवान बेटा मन ऊपर जादा रिहिसे। 

मोर कहना ये हे माधो के इही पहिनावा-ओढ़ावा के बात ल लेके कई घौं महिला मन हंगामा कर चुके हे, देश के कतको विद्यालय अउ स्कूल मं पढ़इया बेटी मन घला सड़क मं उतरगे हे। एक समुदाय विशेष मन तो धर्म के मुद्दा बनाके बवाल घला खड़ा कर दिन हे, अइसन गंभीर मुद्दा ऊपर हाथ नइ डारना चाही, नइते नागराज मन फुफकारबे करही, डसबे करही। 

देख उधो, तैं बतावत हस तउन सबो बात सही हे, माधो कहिथे- ये सब समस्या के समाधान शांति हे। बिन पानी छिड़के आगी बुतावय नहीं। ये देश के समस्या विकराल होगे हे। सब सुवारथी, लोभी, दंभी अउ अहंकारी होगे हे। पद प्रतिष्ठा अउ सत्ता कईसे मिलय इकरे सेती सब छटपटावत हे। कोनो ल चांटी चाबत हे, कोनो ल सांप डसत हे तब कोनो ल बात के तीर मारके अइसे घायल करत हे के ओहर पानी नइ मांग सकत हे। 

उधो पूछथे- तब अइसे मं कइसे होही माधो, का करे ले परही?

माधो कहिथे- कुछु करे ले नइ परय, बस चुपचाप देखते राह, आघू... आघू होवत हे का?

परमानंद वर्मा