गुरुवार, 22 सितंबर 2022

पितर पाख मं कउंवा मन के कांव... कांव...

दुर्ग, भिलाई, राजनांदगांव, रायपुर, धमतरी, जगदलपुर सहित छत्तीसगढ़ के अधिकांश जगहों पर कौवों की पितृपक्ष में चांदी है। भरपेट आहार मिल रहा है। अभी तक यह शिकायत नहीं मिली है कि कोई कौआ अपचन का शिकार हुआ हो। स्वर्गवासी माता-पिता को उनकी संतानें भोग स्वरूप खीर-पूड़ी, पराठा, बालूशाही,जलेबी और रसगुल्ले तक परोस रहे हैं। धन्य है ऐसे पितृ भक्तों को जो वे जीवित थे तब तक उन्हें तरसाते रहे उन्हें  वृद्धाश्रम  तक का रास्ता दिखा दिया |अब वही लोग जब स्वर्ग वासी हो गए तब पितृ सेवा के रूप में तर्पण , श्राद्ध का दिखावा कर रहे हैं |इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह छत्तीसगढ़ी आलेख- पितर पाख म कउवा  मन के कांव... कांव..|

जीवन भर दाई-ददा ल नइ मानिन,न मान-गउन, सम्मान करिन, जइसे तइसे करके ओ बपरा मन जीवन गुजारिन। आखरी समे आइन तब आंखी लड़ेर दिन, अइसे संसार से बिदा ले लिन। कतको झन तो अइसे कुभारज बेटा निकलगे हे जउन बूढ़त काल मं दाई-ददा ल हटकार के घर ले निकाल दिन अउ वृद्धाश्रम मं ढकेल दिन। छोटे मन ल कोन कहे बड़े-बड़े करोड़पति बेटा मन घला धकिया के निकाल दे हे अपन दाई-ददा मन ला। वाह रे कुभारज बेटा हो, बहुत जस के काम करै हौ, अउ करथौ। तुंहरो तो एक दिन समे आही, तहू मन घला डोकरी-डोकरा होहू, हाथ गोड़ नइ चलही, आंखी कान जवाब दे दिही, लउठी टेक-टेक के चलिहौ, अउ एक दिन टें कर दे हौ, तुंहरो संतान मन जइसे तुमन करै हौ, करथौ, वइसने करही तब तुमन ल कइसे लागही?

ये बात, ये करा एकर सेती उठत हे वइसने कपूत संतान मन आज सपूत बेटा असन जब पितर पाख (पितृ पक्ष) चलत हे तब अपन पुरखा मन के सुरता करत, श्राद्ध तरपन करत हे। जउन अइसन बेटा मन के करतूत ल जानथे तउन मन आपस मं गोठियावत-बतावत कहिथे- देखत हस गा मंडल वहिदे रामनाथ ल, कइसे एक दिन बाते-बात मं बात बढग़े तब अपन बाप ला डंडे-डंडा बजेड़े रिहिस, कलहर-कलहर के मरगे ओ सियनहा एक दिन। आज बड़ा सपूत बनथे, श्राद्ध तरपन करत हे, अब अोला गया (तीर्थ स्थान)  लेगहू  काहत हे। 

तब दूसर सियनहा कहिथे- अरे काला का कहिबे भइया, ये कलजुग हे कलजुग, ये बेटा मन संतान नोहय, चंडाल हे गा, चंडाल। मोरो बेटा एक दिन अइसन जहर उगले असन बहू के बात मं आके अइसे उल्टा-पुल्टा सुना दिस ते मैं कट खाके रहिगेंव। उलट के जवाब देवत नइ बनिस, देतेंव, तब  ओकरे सही मोरो हाल होय रहितिस। इही  पाके देख रे आंखी सुन रे कान, कस कले चुप रहिगेंव। 

दूनो सियान के गोठ-बात चलत राहय, अपन-अपन बेटा मन के चारी-चुगली करत राहय, ततके बेर कते कोती ले टहलत खेदू महाजन आगे। ओकर मन तीर बइठके तम्बाकू रगड़े ले धर लिस। बने रमंज लिस तहां ले ओ सियनहा मन ल बनाय खैनी ल देथे। मुंह में दबा लिस तहां ले फेर शुरू होगे उही कथा। खेदू कहिथे- एक ठन अलकरहा खबर हे गा|तब वोमन पूछथे-कोनो घटना, दुरघटना होगे हे कोनो मर-सर गे हे ते कोनो कोती बाढ़ आगे हे? 

अरे वइसन खबर नइहे गा? तब का खबर हे भई, बने फोर के बता तब न जानबो। तब खेदू बताथे- अरे खबर हे के एक झन करोड़पति, उद्योगपति हे तेकर बेटा हा ओला हाथ धर के घर ले बाहिर निकाल दिस। 

- अतेक बड़े मनखे ला काबर निकाल दिस, काबर अइसन करिस होही ओहर, कुछु जबर बात होही?

अरे कोनो जबर बात नइहे ददा हो मोर, अपन गोसइन के बात ला मान के अइसन करे हे। पहि ली तो बेटा-बहू मन अड़बड़ सेवा करत रिहिन हे ओकर। इही बीच बहू अइसे पासा फेंकिस ते ससुर के नांव मं जतका संपत्ति रिहिसे तउन ला अपन नांव करवा लिस । जब दार गलगे, संपत्ति के मालिकाना हक ओकर मन के नांव आगे तेकर बिहान भर शकुनि चाल चल दिस। ओ सियान हा माथा धर के रोये ले धर लिस। आखिर म जीयत भर वृद्धाश्रम मं रिहिस। एक दिन मरगे तहां ले किरिया करम करिस। अब पितर-पाख मं ओला तरपन करत हे। 

अउ सुनव मजेदार बात- अब तो तरपन के आड़ मं कउंवा मन ला नेवता देथे। कहां-कहां के कउंवा सकला जथे ओकर बारी मं, बियारा मं, जिहां कउंआ दिखथे तिहां ओमन ला सोहारी, बरा, रसगुल्ला, बालूसाही बांटथे। ये बेटा के अइसन करनी ला देख के सब हांसथे ्उ कहिथे- देखत हव गा ये हेरौठा, चंडाल बेटा ला जीयत रिहिसे तब घर ले अइसे हटकार के निकाल दिस गोसइन के बात मान के जइसे घर के कचरा ला घुरवा मं फेके जाथे। आज उही ददा जब सरगवासी होगे तब ओकर नांव ले के, ओकर सुरता मं कउंवा मन ला खीर-पुड़ी खवावत हे। धन हे अइसन कलजुगी बेटा मन ला। 

खेदू कहिथे- कोन कहिथे के कउंवा मन ला खवाय-पियाय मं परलोकवासी आत्मा मन ला शांति मिलथे, ओमन परसाद पाथे। कतको झन कहिथे- बाम्हन भोज कराय ले  घला पितर मन के आत्मा आथे। कतेक अंधविश्वास के शिकार होगे हे मनखे? अरे जउन शरीर ला तियाग के आत्मा एक घौ निकल गे , ओ तो दूसर जघा जन्म घला ले लेथे। ओहर बच्चा ले जवान घला हो जाय रहिथे तउन का उहां ले कोनो बाम्हन के तन मं आही, भोग खाय बर? ये चाल हे ठगी करे के षडयंत्र हे। धारमिक भावना के शोसन हे। अशिक्षा अउ अज्ञानता के शिकार मनखे मन ल एकर ले उबरे ले परही। कउंवा के भोग लगाय ले पितर ला का मोक्ष मिलही। राम-राम कइसे मछरी कस जाल मं फंसे हे मनखे, अउ शिकारी जीभर के लूटत हे अउ काहत हे जब तक मूरख दुनिया मं जिंदा हे शिकारी मालामाल रइही।

परमानंद वर्मा 

गाँधी चौक : एक हरा भरा खेत

इस सृष्टि में मनुष्य का अस्तित्व आशा और निराशा के दो चक्रों के मध्य घूमता रहता है। इनमें से एक तीसरा चक्र अभिलाषा का निकलता है। खुद को अभिव्यक्त करने की अभिलाषा से ही साहित्य का जन्म होता है। बाहरी वातावरण में घटित घटनाओं का प्रभाव हमारे भीतर पड़ता है। जब हम उन प्रभावों को कागज पर उड़ेल देते हैं, तब भीतर का भारीपन कुछ कम होता है ;और मन फिर निकल पड़ता है, बाहरी प्रभावों को आत्मसात करने; ताकि उन्हें पुनः उड़ेला जा सके। यहाँ घटनाएँ उतनी महत्वपूर्ण नहीं होतीं, और ना ही उनका खुद पर प्रभाव उतना महत्वपूर्ण माना जा सकता है। क्योंकि जब तक स्वानुभूति प्रसारित होकर परानुभूति में परिवर्तित नहीं हो जाती, घटनाओं का प्रभाव व्यक्तिगत ही होता है। इस व्यक्तिगत प्रभाव को सार्वजनिक करने के लिए अभिव्यक्ति अनिवार्य है, जिसकी खोज करते हुए मुक्तिबोध लिखते हैं -

"खोजता हूँ पठार...पहाड़... समुंदर,

जहाँ मिल सके मुझे

मेरी वह खोई हुई

परम अभिव्यक्ति अनिवार आत्मसंभवा।"1

 क्योंकि इस आतुर अभिव्यक्ति का एक सशक्त और सुंदर माध्यम साहित्य है; इसलिए बालकृष्ण भट्ट ने साहित्य को 'जनसमूह के हृदय का विकास' तथा आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'जनता की चित्तवृत्तियों का संचित प्रतिबिंब' कहा है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने निबंध 'साहित्यकारों का दायित्व' में साहित्य की महत्ता की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए लिखा है-

" हमें जीवन के हर क्षेत्र में अग्रसर होने के लिए साहित्य चाहिए- साहित्य जो मनुष्य मात्र की मंगलभावना से लिखा गया है और जीवन के प्रति एक सुप्रतिष्ठित दृष्टि पर आधारित हो।"2

       कल्पनाश्रित कथा तथा भोगे हुए यथार्थ में कोहरे और किरण जितना ही अंतर होता है,परंतु यदि यथार्थ की किरणों के इर्द-गिर्द कल्पना के कोहरे बिखेर दिए जाएँ,तो उन किरणों की धवलता अवश्य बढ़ जाएगी। डॉ. आनंद कश्यप ने प्रतियोगी परीक्षाओं को अपने पंद्रह वर्ष दिए। इतने वर्षों के यथार्थ अनुभव को कल्पना का ज़ामा पहनाकर, उन्होंने अपने उपन्यास 'गाँधी चौक' में प्रस्तुत किया है। यह  अश्विनी, नीलिमा तथा सूर्यकांत के इर्द-गिर्द घूमती सुखांत औपन्यासिक कथा है। गरीब, ग्रामीण किसान-पुत्र अश्विनी का पीएससी परीक्षा की तैयारी के लिए शहरी परिवेश में आकर संघर्ष करते हुए, कई असफलताओं के बाद सफलता प्राप्त करना, भीष्म जैसे कर्मनिष्ठ और जीवट पात्र का कई विफलताओं के बाद सफल होने के ठीक पहले धैर्य खोकर प्राण त्याग देना, मध्यम वर्गीय, खुद्दार परिवार की आत्म विश्वासी लड़की नीलिमा का डिप्टी कलेक्टर बनना, तथा अमीर और ओहदेदार पिता के इकलौते पुत्र सूर्यकांत की सोच में परिवर्तन तथा प्रतियोगी परीक्षा की तप्त भूमि में तप कर निखरने तक के सफर में साथ होना बड़ा दिलचस्प रहा। इस उपन्यास में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे परीक्षार्थियों की मन:स्थिति, संघर्ष, समर्पण तथा सफलता-विफलता की खट्टी-मीठी दास्तान को सरल किंतु असरदार शब्दों में प्रस्तुत किया गया है-

" सपने इंसानों के ऊबड़-खाबड़ मन की फसल है। गाँधी चौक भी एक हरा- भरा खेत है। एक ऐसा खेत जिसमें डिप्टी कलेक्टर , डी एस पी, आबकारी अधिकारी जैसी अनेक फसलों का उत्पादन होता है।यह चौक अमरत्व लेकर आया है। देशकाल, परिस्थितियां, परिदृश्य सब कुछ बदल गया है, लेकिन यह चौक नहीं बदला है।"3

        डॉ. आनंद कश्यप का उपन्यास 'गाँधी चौक' न केवल लोक सेवा आयोग परीक्षा की तैयारी के दौर से गुजर चुके और गुजर रहे, अनगिनत युवाओं के संघर्ष का खुला वृतांत है, बल्कि यह इक्कीसवीं सदी के भारत में भी बलभद्र जैसे जमीदारों के चंगुल में फंसे कई समयलाल,चंगू और भागीरथी जैसे खेतिहर मजदूरों की पिघलती दास्तान है, कार्यालय और गृहस्थ जीवन के दोहरे मापदंडों पर खरा उतरने के प्रयास में ख़ाक होती अनेक प्रज्ञाओं का आख्यान है,जिन्होंने सपने देखना कभी नहीं छोड़ा। अर्थ की सत्ता पर आधारित रिश्तों की संवेदनहीनता के घेरे में आकर, नौकरी के अभाव में, संघर्ष की सेज पर आत्महत्या करते अनेकानेक भीष्मों की मर्मभेदी कथा है।

             वैश्वीकरण की दुनिया में स्थानीय भाषा और संस्कृति तेजी से सिमटकर खत्म होने के कगार पर हैं। आज हम संसार के फैलाव को जान लेने की चाह में अपने आसपास की जीवन-पद्धति और संस्कारों को महसूसने का जहमत नहीं उठाना चाहते। परिणाम स्वरूप कई स्थानीय चलन और  प्रचलित- पूर्व प्रचलित शब्द हमसे छूटते चले जा रहे हैं। बल्कि यों कहें कि हम जानबूझकर उनका अस्तित्व मिटाते जा रहे हैं। इसलिए वास्तविक अशोक वृक्ष की गुमनामी से उदास होकर हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने कहा है-

" दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है। केवल उतना ही याद रखती है जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंककर आगे बढ़ जाती है।"4

 'गाँधी चौक' उपन्यास मूलतः हिंदी भाषा में लिखा गया है, परंतु बीच-बीच में छत्तीसगढ़ी बोली का प्रयोग उपन्यास में स्थानीयता का रंग भर देता है। छत्तीसगढ़ के खान-पान जैसे- बासी नून के साथ लालमिर्च-गोंदली, जिमी कांदा, खेड़हा, कोंचई, इड़हर साग, चरपनिया भाजी इत्यादि के स्वाद पाठकों की जिह्वा में रस भर देते हैं-

"बेटी महूं इहें खाहूं! इड़हर के साग हर अब्बड़ मिठाथे।"5

 साथ में सूरुज,पचरी, कथरी जैसे छत्तीसगढ़ी शब्दों का प्रयोग उपन्यास में आंचलिकता को स्थापित कर,इसकी विश्वसनीयता को पुख़्ता बनाते हैं। कई भाषाओं और बोलियों वाले भारतवर्ष में अक्सर रचनाकार की मातृभाषा उसकी साहित्यिक भाषा से भिन्न होती है। परंतु कभी-कभी साहित्यकार मातृभाषा का प्रयोग करके साहित्यिक भाषा को अधिक सुंदर,संप्रेषणीय एवं समृद्ध बनाते हैं। डॉ. कश्यप इसी श्रृंखला की एक कड़ी हैं।स्थानीय बोलियों से संपृक्त होकर साहित्यिक भाषा अधिक असरदार बनकर पाठकों का ध्यान, संबंधित संस्कृति की ओर आकर्षित करती है। क्योंकि स्थानीय बोलियाँ भी उसी साहित्यिक भाषा परिवार की अभिन्न अंग होती हैं। साहित्यकार वक्त के थपेड़ों को मात देकर अपनी भाषा के साथ सदैव जीवित रहता है। कवि दिविक रमेश के शब्दों में-

"वे तमाम शब्द

जिन्हें लिखा है मैंने, रचा है जिन्हें और बोला भी है बोलियों की तरह टटोल कर तो देखो उन्हें

साक्षी हैं वे

मेरे जीवित होने के।"6

   रंग समायोजन के माध्यम से बिंब निर्माण करना इस उपन्यास की प्रमुख विशेषता है। जब कथा नायक सूर्यकांत की प्रथम भेंट, नायिका नीलिमा से होती है,तब नीलिमा नीले परिधान में होती है। नीली आँखों, नीले वस्त्र के साथ नाम का समायोग देखकर सूरदास के राधा-कृष्ण की स्मृति हो आती है। जब राधा को नीले वस्त्र में देखकर कृष्ण ठगे के ठगे रह जाते हैं-

 "गए स्याम रवि तनया के तट, अंग लसति चंदन की खोरी,

औचक ही देखि तहं राधा, नैन विशाल भाल दिए रोरी ।

नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनि पीठि रूलती झकझोरी,

सूर स्याम देखत ही रीझे,

नैन- नैन मिली परी ठगोरी।"7

उपन्यास में समयलाल और चंगू मजदूर वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनके जीवन का संघर्ष दो वक्त की रोटी के लिए है। ऐसे में चंगू जैसे अनपढ़ व्यक्ति का शराब पीकर कृष्ण, राम, गौतम बुद्ध तथा जीवन और त्याग संबंधित दर्शन बघारना, पाठकों को कुछ असहज करता जरूर है-

" यदि राम अपने महलों से निकलकर जंगल नहीं जाते,लोगों से नहीं मिलते, तो राजा राम, भगवान राम कभी नहीं बनते। कान्हा भी माता यशोदा के हाथ के बने पकवान, उनके प्रेम के मोह का, गोपियों संग अठखेलियों  का त्याग करके मथुरा न जाते, तो वे कभी भी भगवान कृष्ण नहीं बनते। गौतम बुद्ध अपने राज महलों को नहीं त्यागते तो वह कभी भी भगवान बुद्ध नहीं बनते।×××× त्याग व्यक्ति को समाज में स्थापित करने में सहयोग करता है। आज यदि कोई सफल है तो उसके पीछे उसका त्याग है।"8

परंतु कभी-कभी पाठशाला के औपचारिक दौर के बिना भी जीवन का पाठ पढ़ चुके अपढ़ व्यक्तियों की विद्वता का डंका बजते देखा जाता है। 'मसि कागद छुयो नहीं, कलम गह्यो नहीं हाथ' कहने वाले कबीर की चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में लिखे दोहे आज भी इक्कीसवीं सदी में अपनी सार्थकता सिद्ध कर रहे हैं। 

     सामान्यतः शराबियों में लड़ाई- झगड़ा करके पारिवारिक कलह बढ़ाने की प्रवृत्ति देखी जाती है। परंतु बात-बात में पुत्र अश्वनी पर लात जमाने वाले समय लाल के साथ उल्टा होता है। शराब पीकर उसे अपराध बोध होता है, और वह सोए हुए पुत्र पर प्रेम लूटाता है-

"समयलाल को आज अश्वनी के प्रति प्रेम उमड़ रहा था। वह उसके सिरहाने जाकर बैठ गया और उसके सिर को सहलाने लगा। आज अपने बच्चे के पास बैठ कर उसे अलौकिक आनंद आ रहा था। कुछ देर बाद अश्वनी की आँखें खुल गईं लेकिन वह सोने का बहाना करता रहा। वह बाबूजी के मुँह से आने वाली गंध से समझ गया था कि वो पीकर आए हैं।" 9

 एक दो पैग लगाकर पढ़ने बैठे राजा का दिमाग दोगुनी गति से काम करने की बात भी हजम नहीं होती-

"जैसे ही राजा को मौका मिलता एक पैग लगा कर चुपचाप पढ़ने बैठ जाता था। पीने के बाद उसका दिमाग दुगुना काम करने लगता था। उस समय वह चाचा चौधरी को भी मात दे सकता था।"10

उपन्यास में घटित इस तरह की घटनाएँ शराब की महिमा का मंडन करती नजर आती हैं,परंतु प्रतियोगी परीक्षाओं में अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले भीष्म की मृत्यु का कारण शराब को बताकर उपन्यासकार ने शराब की महिमा का खंडन भी किया है-

"भीष्म को नकारात्मक विचारों ने उसी तरह घेर लिया था। जैसे चंदन के वृक्षों को सर्प लपेट लेते हैं। नशे की वजह से उनके नकारात्मक विचार बढ़ते ही जा रहे थे। निराशा पीड़ा और अवसाद जैसी भावनाएँ उन पर हावी हो रही थीं ।11

              'गाँधी चौक' उपन्यास के प्रमुख चरित्रों को तीन भागों में विभक्त कर उपन्यासकार की वर्णन- पद्धति को समझा जा सकता है।  पहला- बने हुए को और बनाना, जैसे सूर्यकांत। दूसरा- टूटे हुए को और तोड़ना, जैसे- भीष्म और तीसरा- परिश्रम से अभाव की खाई को पाटना, जैसे -अश्विनी और नीलिमा।

 उपन्यास का एक पात्र सूर्यकांत  सर्वसंपन्न पिता का इकलौता पुत्र है, जिसके जीवन में किसी भी चीज की कमी नहीं थी। उसकी बड़ी से बड़ी गलतियों पर पर्दा डाल दिया जाता है। वह दो बार यमराज को भी शिकस्त दे चुका है। लोक सेवा आयोग की परीक्षा में पहले वह पैसे के दम पर पद प्राप्त करता है, क्योंकि प्रारंभ में उसे विश्वास था कि पैसे के बल पर सबकुछ खरीदा जा सकता है।सूर्यकांत की इस सोच की नीलिमा विरोधी थी। नीलिमा को पाने की चाह में सूर्यकांत की सोच में बदलाव आया। नीलिमा उसके लिए प्रेरणा थी, जिसके कारण ही उसने विलासितापूर्ण जीवन का त्याग किया। बाद में वह मेहनत के दम पर पद हासिल कर लेता है। पिता हर कदम पर उसके साथ खड़े हैं। अंततः प्रेमिका पत्नी के रूप में मिल जाती है।उपन्यास के अंत में इसी पात्र को संपूर्णता प्राप्त होती है। कारण बने हुए को हर कोई बनाता है।

"शादी का मंडप वही रहता है। सजावटें वही रहती हैं। बस बदलता है तो दूल्हा। सूर्यकांत और नीलिमा का विवाह उसी मंडप में संपन्न हो जाता है।"12

    उपन्यास का दूसरा पात्र भीष्म, जिसने अपनी जवानी के कितने ही बसंत प्रतियोगी परीक्षाओं को समर्पित कर दिये। भीष्म का सफलता की गंगा में डुबकी लगाने का भागीरथ प्रयास बार-बार विफल होता रहा,और जब डुबकी लगाने का अवसर मिला तब तक उसका मृत शरीर अग्नि स्नान कर चुका था। वह जिन पुस्तकों पर माथा रखा करता था उन्हीं पुस्तकों पर पैर रखकर फाँसी के फंदे पर झूल गया। जिसका जीवन अंधेरे में गुज़रा , जिसे नौकरी की सबसे ज्यादा जरूरत थी; घरवालों के अमानवीय व्यवहार तथा गाँव वालों के असहनीय कटाक्ष ने आखिरकार उसके धैर्य की कड़ी को तोड़ दिया। कारण टूटे हुए को हर कोई तोड़ता है।

" रात भर सफर करने के बाद पार्थिव शरीर सवेरे सवेरे भीष्म के गाँव पहुँचा। गाँव में लोगों की भीड़ इकट्ठा थी। उनकी आँखें भी नम थीं। यह वही लोग थे जो जीते जी उन्हें ताना देते थे।"13

    इन दोनों पात्रों के मध्य का सर्वश्रेष्ठ भाव, पुरुष पात्र में अश्वनी तथा नारी पात्र में नीलिमा प्रस्तुत करते हुए दिखाई देते हैं। जिन्होंने आर्थिक थपेड़ों से जूझते हुए, मेहनत के बल पर अपने लक्ष्य को हासिल किया। यह उपन्यास सिविल सर्विस परीक्षा की श्रेष्ठता का बखान करते हुए यह संदेश देता है कि यदि इक्कीसवीं सदी में जमींदार बलभद्र जैसे रावण की लंका का दहन करना है तो अश्वनी के समान सिविल सर्विस परीक्षा की देवी को अपने कर्म की तपस्या से प्रसन्न करना होगा। परंतु बलभद्र की लंका दहन के बाद तहसीलदार अश्वनी का स्थानांतरण सुकमा (नक्सलाइट जिला) करवा दिया जाना तथा उसका स्थानांतरण रुकवाने में योगानंद जैसे, राजनीतिक दखल रखने वाले व्यक्ति का हाथ होना, इस बात की पैरवी भी करता है कि वर्तमान युग में देवी सरस्वती की कृपा के साथ-साथ देवी लक्ष्मी एवं देवी दुर्गा की छत्रछाया भी आवश्यक है। लिंगभेद के कारण पनपे आडंबरों का खुले शब्दों में विरोध डॉ. कश्यप ने किया है। पिता समयलाल की मृत्यु पर , अश्वनी के मुँह से, अपनी बहन माया के लिए यह कहलवाकर -

" वो भी तो उनकी ही पुत्री है।पिता की संपत्ति पर जब पुत्री का अधिकार हो सकता है तो उसके दाह- संस्कार पर क्यों नहीं।"14  उपन्यासकार ने स्त्री-पुरुष समानता का पक्ष लेते हुए स्त्रियों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति समाज की आँखों में पड़े पर्दे को भी हटाया है। 

            'गाँधी चौक' उपन्यास को 20 शीर्षकों में विभक्त किया गया है, परंतु उपन्यास में अनुक्रमणिका की अनुपस्थिति ने पाठक के समक्ष पसंदीदा शीर्षक तक पहुँचने में कठिनाई उपस्थित कर दी है। जिस प्रकार 'गोदान' उपन्यास में प्रेमचंद ने प्रोफ़ेसर मेहता को अपनी विचारधारा का उद्घोषक बनाया है ठीक उसी प्रकार डॉ. आनंद कश्यप ने उपन्यास 'गाँधी चौक' में कृषि वैज्ञानिक रामप्रसाद को अपने विचारों का प्रवक्ता बनाया है।

 'गाँधी चौक'  वर्तमान सहायक प्राध्यापक डॉ. आनंद कश्यप द्वारा लिखित उपन्यास नहीं है, बल्कि इसे कई विफलताओं का दंश झेल चुके, सहायक प्राध्यापक पद की प्राप्ति के लिए संघर्षरत, डॉ. आनंद कश्यप ने लिखा है। छत्तीसगढ़ में सहायक प्राध्यापक पद का विज्ञापन सालों बाद निकलता है। विज्ञापन के बाद परीक्षा देने से लेकर पद प्राप्त करने में वर्षों लग जाते हैं। सहायक प्राध्यापक परीक्षा 2014 के परीक्षाफल में डॉ.आनंद कश्यप और मेरी लगभग समान स्थिति थी। हम दोनों ही पुरुष व महिला वर्ग में, प्रतीक्षासूची में प्रथम स्थान पर रहकर असफल हो चुके थे। तब से लेकर 2020 तक अपने आपको आगामी परीक्षा की तैयारी में लगाए रखना किसी तपस्या से कम नहीं था। परीक्षार्थी, परिवार वालों के साथ रहकर भी अकेला होता है। वह दीपावली, दशहरा, होली आदि सभी त्यौहारों की खुशियाँ ,अपने पठन की मोटी-मोटी पुस्तकों में ढूंढ लेता है। जहाँ इस तपस्या में दुनियावी माया ने प्रवेश किया कि तपस्या ख़त्म और तपस्वी धराशायी। ऐसी विषम परिस्थितियों में, परीक्षा के ठीक पहले , इतने प्रभावी लेखन के लिए मैं डॉ.आनंद कश्यप को बधाई देती हूँ । उन्होंने, वर्षों जिए यथार्थ के मोतियों को कल्पना के धागे में पिरोकर, तैयारी कर रहे परीक्षार्थियों के भविष्य के गले में पहना दिया है। सफल उपन्यासकार डॉ. आनंद कश्यप को उनके आगामी लेखन के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ!  पुनः बधाई!

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संदर्भ ग्रंथ  :-

1.मुक्तिबोध, गजानन माधव, चाँद का मुँह टेढ़ा है,भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, इक्कीसवां संस्करण 2013, पृष्ठ 296

2. द्विवेदी, हजारी प्रसाद, अशोक के फूल, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद,  इकतीसवां संस्करण:2013,पृष्ठ-132

3.कश्यप, डॉ. आनंद, गाँधी चौक, हिंद युग्म ब्लू, नोएडा (उ.प्र.) पहला संस्करण:2021, पृष्ठ-9

4.सिंह, नामवर, हजारी प्रसाद द्विवेदी संकलित निबंध, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत ,नई दिल्ली, नौवीं आवृत्ति 202, पृष्ठ- 4

5.कश्यप, डॉ. आनंद, गाँधी चौक, हिंद युग्म ब्लू, नोएडा (उ.प्र.), पहला संस्करण:2021, पृष्ठ-21

6. वागर्थ, मासिक पत्रिका, वर्ष 28, अंक 315, फरवरी 2022, संपादक-शंभूनाथ, पृष्ठ-52

7.शुक्ल, रामचंद्र, भ्रमरगीत सार; लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2012 ,पृष्ठ 23

8. कश्यप, डॉ. आनंद,गाँधी चौक, हिंद युग्म ब्लू, नोएडा (उ.प्र.), पहला संस्करण:2021, पृष्ठ 17

9.वही,पृष्ठ- 18

10. वही,पृष्ठ-156

11. वही, पृष्ठ -150

12. वही, पृष्ठ-190

13. वही, पृष्ठ-153

14. वही, पृष्ठ- 172


   डॉ. चंद्रिका चौधरी

  सहायक प्राध्यापक हिन्दी

  स्व. राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह शासकीय महाविद्यालय सरायपाली, 

जिला- महासमुंद (छ.ग.)

मोबाइल नंबर- 8889923883

drchandrikachoudhary@gmail.com

रविवार, 18 सितंबर 2022

ऐ फूल

ऐ फूल! अहाऽ हाऽ हा ऽ हा..., तू कौन है रे? तू फूल  है या नूर या ज्योति है आखिर तू है कौन जो इतना आकर्षक है। कहीं तू मोहिनी बनकर तो नहीं खिला है किसी को लुभाने और लूटने के लिए? अद्भुत है तू, कितना सुंदर है, किसकी रचना है, किसने रचा है तुम्हें? कहीं ऐसा तो नही उस रचनाकार ने तुमको स्वयं अपने हाथों से गढ़ा है? नजर हट भी नहीं रही है तुमसे, और यह क्या तुम भी तो टकटकी लगाए देख रही है मुझे।  उस रचनाकार ने सुंदरता के साथ-साथ तुम्हें ऐसी आभा दी है, सौरभ दिया है जो कोई भी अनजाने में देख ले तो चुम्बक की तरह खींचा चला जाएगा। हर कोई तुम्हारी तरफ फिदा होकर तुम पर मर मिटने के लिए हांफता हुआ चला आएगा। 

कवियत्री महादेवी वर्मा भी तो न जाने क्यों फिदा हो गई थी तुम पर। कौन कवि, साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार, युवक-युवतियां राजे-महाराजे, नवाब, शहंशाह, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री ऐसे हैं तुम्हारी रंग, रूप, आभा और सौरभ से  सम्मोहित न हो। किसी के गले का हार बनती हो, देवी-देवाताओं पर श्रृंगारी जाती हो। कौन ऐसी जगह है जहां तुम्हारी दस्तक नहीं है। लगता है जैसे राजकुमारी हो सबकी लाडली हो। तभी न सबकी चाहत बनी हुई हो। कोई भूलकर भी तुम्हें हाथ लगाने की हिम्मत नहीं कर सकता। 

जब सुबह-सुबह बाग-बगीचों में, बड़े-बड़े शहरों में, राजधानियों के गार्डन में खिलती हो तब ऐसा लगता है जैसे सुहागरात के दिन नवविवाहिता दुल्हन अपने प्रियतम को सब कुछ लुटाने के लिए सज-संवरकर बैठी रहती है, प्रतीक्षारत रहती है। सचमुच कौन नहीं मर जाए, इस सुंदरता पर, ऐ खुदा! हरिद्वार, दिल्ली के मुगल गार्डन, माउंट आबू स्थित मधुबन के गार्डनों में नाना प्रकार के रंग-बिरंगे गुलाब के फूल सहित और भी कई प्रकार के फूल देखे। देखने में अतीव सुंदर, मनमोहक और चित्ताकर्षक। ऐसे रूपों और खुशबुओं से कौन भंवरा ऐसा है जिसका मन बावरा न हो जाए और टूट पड़ता है उसके रूपों और सौरभों का पान करने। 

आज भी दुनिया कायल है, पागल और दीवाना है रूपों का। लेकिन ये फूल देखने की वस्तु है, जीभर कर देखिये, किसी को कोई मनाही नहीं, बेहतर होगा उसी की तरह उसके गुणों को धारण कर सुंदर और गुणवान बना जाए। कहा भी जाता है जो जैसे देखता है, सोचता है, मनन और चिंतन करता है, वह वैसा ही बन जाता है। सकारात्मक गुणों व सोच को ग्रहण करने वाले निश्चय ही फूल की तरह बन जाते हैं। 

फूलों को तोड़े नहीं, फेंके नहीं, यह उनकी बेइज्जती होगी। हंसते, खाते, खेलते किसी की जिंदगी को बर्बाद नहीं करना चाहिए। लेकिन आज शैतानों की कमी नहीं है। परमात्मा ने कितना सुंदर संसार रचा, पुष्प और अशोक वाटिका की तरह, आखिर किसके लिए? और आज इंसान क्या कर रहा है। जश्न-ए-आतंक मना रहे हैं। युद्ध के उन्माद में मस्त हैं। ऐसे में यह संसार रूपी उपवन बचेगा अथवा नष्ट हो जाएगा। शांतिप्रिय विश्व का हर व्यक्ति आज अशांत है, दुखी है, रो रहा है। एक तरफ वे लोग हैं जिनके पास रहने, खाने-पीने, पहनने आदि के लिए आवश्यक वस्तुएं नहीं है और दूसरी ओर युद्धोन्मादित देश विश्व का सत्यानाश करने पर आमादा है। है कोई ऐसा देवदूत, महान आत्मा जो वहशियानापन हरकत पर उतारू लोगों को रोके, उनको शांति का पैगाम दे। 

फूल की दुर्दशा पर तो एक कवियत्री महादेवी वर्मा भी रो पड़ी थी। संसार के लोगों को चितेरों को, जिस पर कभी वह अपना सर्वस्व लुटाया करती थी, उसी फूल को शैतानों और  बदमाशों ने तोड़कर उसका सब कुछ लुटकर उसे निस्तेज कर दिया है, सड़क पर फेंक दिया है। सबके पैरों की जूतों, चप्पलों की ठोकर खा रही हैं। कौन है आज उसका दुख-दर्द सुनने वाला, शायद कोई नहीं। वह अनाथ बच्चों की तरह असहाय होकर देख रही है, दया की भीख मांग रही है। अचानक मेरी नजर एक दिन उस पर पड़ जाती है उसे हाथों से उठाकर सीने से लगा लेता हूं। उसे सांत्वना दिलाते हुए कहता हूं- न रो गुलाब के ऐ फूल, संसार की यही नियति है। यहां हर कोई हंसते हुए आता है, और रोते हुए इसी ही तरह विदा ले लेता है। यही सच्चाई है, कभी खुशी-कभी गम।

-परमानंद वर्मा

शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

एक झन सत्ता सुंदरी,दस झन लगवार

देस अउ परदेस म आज राजा बने खातिर उथल पुथल माते हे |उहिच बात ला सोचत बिचारत खटिया म परे रेहेंव | कतका बेर नींद लगिस ,नइ जानव | फेर ओकर बाद का होथे, सुते - सुते एक ठन अलकरहा सपना देख परथव |  सत्ता सुंदरी संग मोर स्वयंबर होगे हे। उडऩ खटोला मं उड़के एक दिन हनीमून मनाय बर मनाली जाथौं। दूनो जोड़ी जांवर हांसत, गोठियावत अउ खिलखिलावत हन। गजब सुग्घर होटल मं ठहरे हन।  चारों कोती चकाचक दीखत हे ,अइसे लगत हे जइसे सरग के देवी-देवता हन। उहां देखत हन, एक ले बढ़के एक परी असन सुंदरी मन अपन गोसइया मन के हाथ धरे किंजरत हें, कोनो मेर ओधहा, झिमझाम जघा दीखत हे तेन मेर चुमा-चाटी घला लेवत हें। महूं अपन सुंदरी संग घूमत हौं, छेहल्ला मारत हौं। रात के जब हनीमून के पारी आथे तब गोई हा नहीं... नहीं... कइके जोर से किकियाथे, महूं हा जोर से चिल्ला परथौं। अतके बेर दाई आ जथे, अउ कहिथे- का बर्रावत हस रे गड़ौना। वतका मं नींद खुलगे अउ मोर सपना देखे के मजा चकनाचूर होगे। 

चुरमुरावत ले रहिगेंव। राजा बने के सपना टूटगे, सत्ता-सुंदरी हाथ लगे रिहिस कोनो काल के तौंनो हा बिछलगे बाम्बी मछरी कस। दरअसल सत्ता अउ सुंदरी के सपना सब ला होथे। मुंगेरीलाल के सपना असन सब देखथे। आदिकाल ले एकर नांव ले के झगरा लड़ई, छीना-झपटी, मार-काट घला होथे। बहुत छल, प्रपंच, षडयंत्र घला होथे, आजो करत हें। फेर सत्ता अउ सुंदरी उही ला मिलथे जेकर नसीब मं होथे। 

आज मोला जोधू-बोधू के ओ बात के सुरता आगे जेन ला कका हर बताइस के कइसे छत्तीसगढ़ मं वइसने कस सपना एक झन नेता देखत हे। फेर ये बीच मं बवंडर माते हे। ये कोनो कोती ले आंधी-तूफान आगे हे अउ अपन संग मं पानी-बादर ला घला धर के आए हे। अइसे काबर करथे, ओकर नीयत मं खोट रहिथे के एमा ककरो भलई होथे, कांही-ककरो समझ मं नइ परय। फेर आ ही जरूर। अरे आतिस, कोनो ओला रोकय, छेंकय नहीं, अक्केला आतिस ना, दुल्हा डउका सही फेर अपन संग मं लेठवा ला धर के काबर आथे  ये लेठवा मन हा बदमाश होथे, नीयतखोर होथे। टूरी-टानकी, बहू-बेटी मन ला ताकत झांकत रहिथे। 

अड़बड़ बड़बड़ावत हंस मितान का होगे, काकर बात करत हस? कहां के आंधी-तूफान, दुल्हन  डउका अउ लेठवा मन के बात करत हस? तोर बात ला सुनके तो मैं अकबकागे हौं, कांही समझ नइ परत हे? 

जोधू-बोधू  नांव के दू झन मितान तरिया पार मं मुखारी करत अइसने गप-शप मारत रिहिन हे। जोधू के बात ला सुनके बोधू जब पूछिस- काकर बर बिहाव के बात गोठियावत हस मितान, का एसो गांव मं ककरो बिहाव होवइया हे? अच्छा हे, होना चाही, बने बारात जाय ले मिलथे, खाय-पीये अउ नाचे-कूदे बर घला मिलथे। 

तोला तो बस खवई-पीयई अउ नचई-कुदई भर चाही, फेर दुलहा ला का चाही, बने सुंदर गुनवती, रूपमति दुल्हन। अभी मउका मिले हे फेर  का करबे ओ चिरई हा धरउन  नइ देवत हे। पोंदमटकी चिरई असन पाछू कोती पूछी ला उघारथे फेर तोप देथे। जौंन दिन ले अइसन करत ओ चिरई ला देख डरे हे ओहर तब ले न बने ढंग ले सो सकत हे न खा-पी सकत हे। 

जोधू के ये बात ला सुनके बोधू के माथा चकरा जथे। का पहेली  बुझाथस मितान, बात का हे तेला बने फोर के बता न? तोर उलटा-पुलटा बात ह मोर मगज मं नइ बइठत हे। 

नइ बइठय मितान, जब ओ होवइया दुल्हा डउका हर अपन बिहाव के मुद्दा ला नइ सुलझा सकत हे, तब दूसर कोन सुलझा सकही? जोधू के ये बात ला सुनके फेर बोधू कहिथे- दुनिया मं कोन अइसन समस्या हे मितान जेकर समाधान नइ निकलत होही। अडिय़ल घोड़ा असन कहूं ओमन होही तब बात अलग हे। 

उहिच करा तो आके गाड़ी अटकते हे, जोधू हा कहिथे। 

बोधू कंझावत कहिथे- दुनिया भर के एती-तेती के बात करत हस फेर अभी तक ये बात ला नइ बतावत हस के ओ कोन हे जेकर बिहाव होवइया हे अउ ओ चिरई कोन हे, कहां के हे, तेला तैं जानत हस? 

- नइ जानतेंव तब तोर करा अतेक लम्बा-चौड़ा रामायन के कथा ला कइसे बाचतेंव जोधू। 

- जब सब कथा ला जानत हस तब संस्कृत के श्लोक बरोबर काबर अन्वय ला बतावत हस मोर ददा, ओकर अरथ ला बता ना। कइसे राम-लछिमन जनकपुरी मं गिस, उहां ले दूनो भाई पुष्प वाटिका घूमे बर निकलिन। उहां जाथे तहां ले खेल हो जथे। अइसने कस तोरो रामकथा होही तौंन ला बने साफ-साफ फोर के एक-एक ठन ला बता। कहां के ओ राजकुमार हे, कहां के राजकुमारी हे, कइसे स्वयंबर होही ते छत्तीसगढिय़ा परम्परा असन बाजा रूंजी धर के बरात जाबो, नाचबो, कूदबो। 

जोधू बताथे- तैं काहत हस तौंन बात सब ठीक हे बोधू, फेर ये बिहाव का गुलाझांझरी मं फंसगे हे।

-कइसे गुलाझांझरी मं फंसगे हे का लफड़ा हे, ओ चिरई ककरो संग फंसगे हे, पहिली ले ओकर सटर-पटर चलत हे?

बोधू के बात ला सुन के जोधू खिलखिला के हांस भरथे, अउ कहिथे- तहूं कहां-कहां के अउ अइसन बात सोचत रहिथस? 

सोचे ले परथे मितान, आज समे बहुत खराब हे, बेटी-बहू मन के आज कांही ठिकाना नइ हे? दुलहा ओकर घर मं बारात लेके पहुंचे हे। भांवर परे के बेरा पता चलिस ते ओ बेटी हा गांव के कोनो टूरा ला धर के भाग गे। चुरमुरावत ले रहिथे दुलहा, पगरइत अउ बरतिया। यहा हाल हे मितान, आज समे अब्बड़ खराब हे, बहुत फूंक-फूंक के चले ल परथे। 

सही काहत हस बोधू तैंहर, इही हाल तो हे ओ बाबू के. बहुत सोचत, गुनत अउ विचारत हे। करौं ते नइ करौं उधेड़बुन मं लगे हे। 

तोर असन मितान नइ देखेंव जोधू मैं आज तक। अतेक अकन बात होगे फेर तैं ये नइ बताय के ओ होवइया दुलहा डउका कोन हे ओ पोंदमटकी चिरई कोन हे? 

बोधू हा कउवाय असन देखिस तहां ले जोधू कहिथे- अरे ओ छत्तीसगढ़ के राजा साहेब के नांव ला नइ जानत हस का जौंन ओ दिन कहिस - बेटी के बिहाव मं 'टाइम लगथे भई। धीरज धरौं। जोग-लगिन, नेत-घात सबे चलत हे। अभी महाराज मन अगुन-सगुन सब देखत हे, कुंडली ला जांचत-परखत हे। सब ठीक हो जही तहां ले नेवता बांटत मं कतेक दिन लगथे?

वाह मितान, तब हमर राजा साहेब के बिहाव होवइया हे, बाबा साहेब के बिहाव। छत्तीसगढ़ के राजा के बिहाव, तब एमा अतेक देरी करे के बात रिहिसे। बहुत घुमा-फिरा के बात ला बताय मितान, इही ला सीधा-सीधा बता दे रहिते तब का हो जाय रहितिस। जइसे तोर राजा साहेब राजनीतिक, कूटनीतिक हे तइसे ओकर चेला घला तहूं चलता-पुर्जा हस। अइसन मन के खेल घला वइसने टेडग़ा होथे। 

बोधी आगू कहिथे- अब मोला ओ चिरई कोन हे, तेला बताय के जरूरत हे, नइहे। मैं जानगेंव ओ सुंदरी ओर चिरई कोन हे- छत्तीसगढ़ के राजकुमारी सत्ता। इंकरे ऊपर तोर राजा साहब के नीयत गड़े हे ना। राजा, महाराजा अउ  नवाब मन तो होबे करथे वइसने, एक झन मं ओकर मन नइ अघावय, अउ बने कोनो मेनका, रंभा, मोहनी अउ नीलम ओकर मन के आंखी मं दीखगे तहां ले फेर डोरा डालना शुरू कर देथे। दूनो मितान के गोठबात चलते रिहिस अतके बेर कोन कोती ले कुकुर मन आके झपागे, हांव-हांव करे ले धर लीन। बातचीत के तार इही मेर टूटगे। 

बोधू ला कंझाय असन देखिस तहां ले जोधू कहिथे- अरे काला का कहिबे मितान, देखथौं सुनथौं न चारो मुड़ा ला तब अकबकाय असन लागथे जेला देखबे तउने दुलहा डउका बने बर सधाय हे? का छत्तीसगढ़, का महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार अउ झारखंड, सब बरात निकाल के आजथे दोर-दोर ले बरतिया मन ला धर के। ए बरात हाई-फाई होथे मितान, फेर दुलहा डरपोकना होथे, ओ राजकुमारी याने सत्ता सुंदरी पाये खातिर कोनो दूसर देस के राजा मेर जाके शरन मांगथे। ओला डर रहिथे ओकर सत्ता सुंदरी ला कोनो हरन करके झन लेग जाय। बड़े-बड़े डकैत अउ सेना पुलिस ला ओकर पाछू लगा देथे। पहिली के बरात तो घला अइसने होवत रिहिसे। 

जोधू, अउ आगू बताथे- रुखमणि हरन के किस्सा तो तैं सुने होबे मितान, जोधू के बात ला सुनके बोधू अकबका जथे, माथा धरके बइठ जथे अउ कहिथे- सोझ-बाय सीधा-सीधा बता ना मितान, काकर बिहाव होवत हे, कहां जाना हे बरात?

तब तैं बरात जाबे ना मितान, तब सुन, पांच सितारा होटल मं तोला ठहरे ले परही, उहां खाना-पीना, नाचना, जुआ-चित्ती अउ का कइथे बार डांस के छोकरी मन संग घला लटर-पटर होय के घला कार्यक्रम रखे गे हे। 

तोला सोझ बाय बता ना हे तब बता नइते मैं जाथौं घर। जा तहीं हा ओ दुलहा के बरात अउ मस्तियाबे उहां। बोधू कउआगे राहय। 

जोधू बताथे कउआ झन मितान बने काहत हौं, ये जउन बिहाव होथे  या फेर होवइया हे तउन अइसन वइसन बिहाव नोहय। इहां सब मेंछा मं ताव देवत दुलहा बने बर एक पांव मं खड़े हे। छत्तीसगढ़ के राजा साहेब गाहे-बगाहे बूढ़तकाल मं घला सत्ता सुंदरी ला देख के ललचा जथे, ओला देख परिस कहूं तहां ले 'आ गले लग जा कइके गाना गाये ले धर लेथे। मध्यप्रदेश के सत्ता सुंदरी ला देखके शिवराज चौहान, कमलनाथ ले झटक लिस। उही सुंदरी हे जेकर संग पन्दरह साल ले गुजारे रिहिसे तभो लो ओकर मन नइ भरे रिहिसे। महाराष्ट्र में अनदेखना मन भाई-भाई मं फूट करा दिन। उद्धव ठाकरे सत्ता सुंदरी संग बने रास-विलास करत रिहिसे। एकनाथ शिंदे ला भड़का  दिन अउ उहू बइहा अपन भवजी ऊपर नीयत गड़ा दिस। अब ओ सत्ता सुंदरी शिंदे संग हनीमून मनावत हे। का हरियाणा, का बिहार का झारखंड लेबे। अभी शीबू सोरेन फडफ़ड़ावत हे। कोनो रूपवती सुंदरी ला गोसइन बनाके रखना  पाप होगे हे। तभे तो आजकल के बेटी-बहू अउ गोसइन मन ला बुरका पहिले के सलाह ओ समाज के मन देवत रहिथे। कोनो भला नइ काहय, नइ करयं। सब नीयतखोट होगे हे। अपहरन के घटना रोज होवत हे। यहा का हे अपहरन के बाद बलात्कार, फेर हत्या। लगथे मितान अब समाज में रेहे के लइक नइहे। 

हां, तब मैं काहत रेहेंव मितान, तैं बिल्कुल तइयार राह। बारात चलना हे ते चलना हे। कार ले के आहौं, चार्टर प्लेन अवइया हे, मोबाइल करिहौं। स्वामी विवेकानंद  एरोड्रम मं तोला सब बात ला बताहौं, समझे। जोधू के बात ला सुनके बोधू ओला मने मन गारी देथे- सारे लपरहा, चार्टर प्लेन मं बइठे के सपना देखत हे अउ महूं ला देखावत हे। एकोठन बात एकर पतियाय  के लइक नइहे, थूके-थूक मं  बरा चुरोय ले बने सीखे हे। भाड़ मं जाय ओ दुलहा, बारात अउ चार्टर प्लेन। बने राहय ददा, हमर घर के बासी अउ पताल के चटनी। अभी अभी खबर मिलिस हे के राजा साहेब के बिहाव "कैंसिल" होगे हे |

परमानन्द वर्मा 

.और आंखें दगा दे गई

कभी रोता नहीं हूं, रोना अच्छा भी नहीं लगता। जब किसी को रोते हुए देखता हूं तब दुख होता है, तरस आता है उस पर। कभी-कभी मन में क्रोध जैसा भाव भी उत्पन्न होने लगता है। सोचता हूं कितने मूर्ख लोग हैं जो सुखमय काया को रो कर मन को मलीन और गमगीन कर बैठते हैं, चेहरा रोने से मुरझा जाता है। कुंभला जाता है जैसे तेज गरमी पड़ते ही फूल मुरझा जाते हैं।  रोते क्यों है, क्या कारण है? प्रियजनों के बिछुडने, पर परिजनों व सगे-संबंधियों का देह त्याग होने पर ,अपने ही लोगों द्वारा ऐसी कड़वी अथवा अप्रिय वचन सुनकर जिससे कभी कोई अपेक्षा नहीं होती, बोल देने पर सहन नहीं कर पाना और इसकी सजा आंख को भुगतनी पड़ती है। और निकल पड़ता है धारा-प्रवाह आंसू। बरसों की कमाई में आग लग जाने पर। लम्बी फेहरिस्त है रोने के कारणों का।  रोना जीवन की एक क्रिया है, इसका निवर्हन भी सामाजिक प्राणी करते हैं। लेकिन क्या इस क्रिया को रोक नहीं सकते। संसार में कौन ऐसा प्राणी है जो नहीं रोता है। सदा हंसमुख और प्रसन्नचित रहना यही उत्तम जीवन है। दुख व सुख से पार रहता है। ऐसा तो केवल संत, ज्ञानी, योगी और महापुरुष हो सकते हैं। इन लोगों के पास ऐसी कौन सी संजीवनी बूटी होती है जो इन्हें "वीप प्रूफ" बना देती है वह बूटी आम नागरिकों के लिए क्यों सुलभ नहीं है। क्या वह बूटी भी 'वीआईपी कोटे के लिए ही सुरक्षित रखी जाती है?

लेकिन कहीं-कहीं यह बूटी कारगर साबित नहीं हुई है। उदाहरण के तौर पर एक आश्रम के संत, स्वामी को रोते हुए देखा। ज्ञानी, योगी, पुरुष थे लेकिन जब अपने भाई के निधन का समाचार सुना तो छलक पड़े आंखों से आंसू। राजा  जनक को ही ले लीजिए- आत्मज्ञानी पुरुष को, विदेहराज के नाम से जाने जाते थे लेकिन मिथिलापुरी में विवाह के बाद जानकी जी की विदाई हो रही थी तब आपा खो बैठे, उसका आत्मज्ञान धरा का धरा रह गया, वह भी रो पड़े। स्वयं श्रीरामचंद्र भी जब पंचवटी से जानकी जी का अपहरण हुआ तब उसकी क्या स्थिति थी। पेड़, पौधों, पशु-पक्षियों से बिलखते हुए पूछते रहे कि हे खग, मृग हे मधुकर श्रेणी- तुम देखी सीता मृगनयनी, यह उनकी दशा हो गई थी। कैकेयी ने ऐसी क्या बात छेड़ी कि  राजा दशरथ के सामने तो उनकी सिट्टी-पिट्टी बंद हो गई। पछाड़ खाकर गिर पड़े जमीन पर। बातें जितनी मीठी नहीं होती उससे ज्यादा कड़वी होती है। जिनके सिर पर पत्थर बरसता है, वे ही इस पीड़ा व दर्द को जानते हैं। तब ऐसे वीत रागी पुरुष, महापुरुष कौन हैं जो रोने-गाने, दुख-सुख से परे हैं। अर्जुन ने जब कुरुक्षेत्र में ज्ञान बघारा तब भगवान श्रीकृष्ण उससे मुस्कुराते हुए कहते हैं- वाह अर्जुन, तू तो बड़ा ज्ञानी निकला- प्रज्ञा वादांससि भाषते जैसी बातें कर रहे हो | जब ज्ञानी, ज्ञान की परीक्षा में अनुतीर्ण हो जाता है तब भक्ति के द्वार पर गिर पड़ता है। फिर रोते, बिलखते और गुनगुनाते हुए जिंदगी भर वह अपने इष्ट के सामने भजन गाने लगता है- प्रभु आया शरण तुम्हारे। अनुतीर्ण विद्यार्थी की कोई कीमत नहीं होती। उसे रोजगार और नौकरी भी नहीं मिलती ,भटकते रहता है दर-दर मजदूरों अथवा भिखारियों की तरह। उनकी नियति होती है। 

रोना मुझे भी बिल्कुल पसंद नहीं। उसने झुकाने की कोशिश की, आत्मसमर्पण करने के लिए विवश किया, प्रताडि़त किया, तरह-तरह के हथकंडे अपनाए लेकिन जब असफल रहा तब एक दिन बाप को मुझसे छीन लिया। वह मेरी परीक्षा की घड़ी थी, हृदय में हलचल हुई। मन थर्राने लगा। सोचा क्या करूं, क्या न करूं। इसी बीच आँख ने मुझे धोखा दे दिया। मेरी जीवन भर की कमाई में बट्टा लगा दिया। इसका पश्चाताप है मुझे |

परमानंद वर्मा 

गुरुवार, 1 सितंबर 2022

जिहां गुड़ तिहां चांटी

मीठा केवल गुड़ और शक्कर ही नहीं होता, मीठेपन का गुण व्यक्ति, पशु और पक्षियों में भी होता है। सादा-सरल, उच्च विचार, रहन-सहन, भोलापन, निष्कपटता, छलहीन आचरण और व्यवहार मनुष्य के व्यक्तित्व में वह निखार ला देता है जिससे प्रभावित हुए बिना कोई नहीं रह सकता। अनायास उसकी ओर आकर्षित हो खींचे चले आते हैं। छत्तीसगढ़ की माटी इन्हीं खनिज सम्पदाओं से लबालब भरा हुआ है। सुख, शांति, प्रेम और सद्भाव रूपी खजानों को यहां के वासी दोनों हाथों से दानवीर, कर्ण और प्रवीरचंद भंजदेव की तरह लुटाते हैं। दानवीर मोरध्वज को यहां की माटी ने जन्म दिया था इसे सब जानते हैं। सब कुछ मिलता है यहां, किसी चीज की कमी नहीं, अभाव नहीं जिसके लिए दूसरों का मुंह ताकना पड़े। इसी संदर्भ में यहां प्रस्तुत है छत्तीसगढ़ी आलेख- 'जिहां गुड़ तिहां चांटी '|

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छत्तीसगढ़ मं जउन मन आगे, बसगे, रहिके खपत हें, पचत हे, तउन सबो झन केहे लगे हें- मैं छत्तीसगढिय़ां हौं। झोरफा के झोरफा, दर-दर ले बरतिया मन असन, बतरकिरी मन असन झपाय परत हें। अइसन काबर होवत हे? सब छत्तीसगढिय़ा मॉडल के कमाल हे ते कोनो अउ दूसर कारन हे? कारन ला जाने अउ समझे ले परही, बिन जाने, बिन समझे कोन अपन मुंह ला ओखली में दिही!

हां..., कारन हे भई, जबरदस्त कारन हे। अउ ओ कारन हे सुख अउ शांति। इहां कोनो परकार के कल-कल नइहे, झगरा-लड़ई नइहे, अशांति नइहे, जइसन आन जघा मं हें। दूसर परदेश मं जा तो ले- रात-दिन झगरा लड़ई, मारपीट, चोरी, डकैती, बदमासी अउ दुनियाभर के अतियाचार। उहां सुतंत्र कोनो रेहे नइ सकय। चले फिरे, घुमे-टहले नइ सकय। चीज-बस, घर-दुआर, पूंजी-पसरा, बहू-बेटी के ककरो ठिकाना नहीं, के कब का हो जही? दू दिन, चार दिन बर घर छोड़ के कहूं बाहिर नइजा सकस, तलासत रहिथे के घर मालिक मन हे के नहीं। जइसे ओकर मन के कान मं बात पहुंचथे के फलाना घर के मालिक कहूं बाहिर गेहे, बर-बिहाव, मरनी-हरनी, घूमे-फिरे ले तब जान ले दूसर दिन ओकर मन के घर मं चोरी-डकैती, सेंधमारी, नहिते कोनो बहू-बेटी के इज्जत ऊपर आंच आ जाय रहिथे। 

जिहां गुड़ रहिथे तिहां चांटी के रेला लग जथे। कोन जनी ओकर मन के नाक मं का अइसे सक्ति रहिथे कोनो मोहनी दे बरोबर बरपेली खींचे चले आथे। हां, सचमुच मं मनमोहनी हे छत्तीसगढ़। एकर दूसर नांव मणिपुर, मेघालय, हिमाचल, कश्मीर, उत्तराखंड जइसे मनमोहनी परदेस रख देना चाही। छत्तीसगढ़ के जनप्रतिनिधि मन ला एकर ऊपर विचार करना चाही, प्रबुद्ध वर्ग मन ला घला सोचना चाही। करे जा सकत हे, हो सकत हे, बस थोकन कोशिश करे भर के जरूरत हे। जब शहर मन के नाम बदले जा सकत हे तब परदेस के नांव बदलब मं कोनो परकार के अड़चन नइ आना चाही, हो सकत हे ये अपन-अपन विचार हे भई, कोनो ला बरपेली करे के या फेर जोजियाय के जरूरत नइहे। 

हां तब बात गुड़ अउ चांटी के शुरू होय रिहिसे। जउन गुरहा चीला खाये हें तउन मन ओकर सुवाद ला जान सकत हे। छत्तीसगढिय़ा मन तो खवई-पियई म बाजे हे। गजब मिठास अउ गुरतुर भरे हे छत्तीसगढ़ मं। सब जिनिस के मिठास हे। इहां का जिनिस नइहे, सब कुछ हे, सब भरपूर हे। खनिज सम्पदा, पेड़-पौधा, नदिया-नरवा, पहाड़, जंगल, बड़े-बड़े सरोवर ये सब तो इहंचेे हे। एकर छोड़े जउन बड़े जनिक सम्पदा धन, मणि, मानिक,हीरा -पन्ना सोना-चांदी, जवाहरात यहू कुछु नइहे इकरो ले जउन बड़े सम्पदा हे ओ हे धरम, तिहार, परब, उत्सव, खुसी, आनंद अउ परेम जउन इहां के माटी मं कन-कन मं जन-जन के मन मं बसे ओ अद्भुत हे। भगवान रामचंद्र ला जउन अपन कोख ले जनम दे हे तइसन महतारी के ये जन्मभूमि हे। अइसन जघा तब कइसन पावन अउ सुंदर नइ हो सकत हे। सप्तरिसी मन के तपोभूमि हे इही छत्तीसगढ़। साक्षात प्रयागराज हे राजिम, जिहां राजीव लोचन भगवान विराजे हे। ये धरती, ये छत्तीसगढ़, इहां के माटी चंदन बरोबर हे, मस्तक मं लगाय के लइक हे। 

अइसन जघा ला कोटि-कोटि परनाम हे। महानदी, सोंढूर अउ पइरी नदी के पानी छत्तीसगढ़ के पांव पखारत कल-कल करत बहत हे। सुख, शांति, परेम, आनंद अउ धरमभूमि हे छत्तीसगढ़। सर्वधर्म, समभाव, सद्भाव के त्रिवेणी मं असनान करे खातिर ओ सब इहां खींचे चले आवत हे। इही जादू हे, मनमोहनी हे, गुड़ के चासनी हे। जइसे चासनी मं अचान चकरित माखी के पांख धोखा मं फंसगे तब फेर ओहर फंसगे, निकल नइ सकय, बांच नइ सकय। वइसने छत्तीसगढ़ महतारी के मया हा उही मनमोहनी हे,ओकर गोदी मं बइठे, दूनों बांह मं पोटार लिस तब फिर ये दुलार, मया अउ ममता मं सब बंध जथे। छोड़ाय नइ छूटय। धन हे छत्तीसगढ़ महतारी अउ धन हे तोर मया। तोन मन मं ककरो बर भेदभाव नइहे। तोर हिरदय सब बर वइसने खुले हे जइसे संत तुकड़ो जी भजन गावय- ''सबके लिए खुला है मंदिर ये हमारा"। छत्तीसगढ़ कोनो परदेस नहीं मंदिर हे, तीरथधाम हे, पायलागी करथौं अइसन भुइयां ला... |

-परमानंद वर्मा