शनिवार, 26 नवंबर 2016

क्यों नहीं मिलती एक अपराधी और बलात्कारी को सजा?

राजीव दीक्षित
आपमें से अगर कोई वकील मित्र है तो उनको बात जरा जल्दी समझ में आएगी। हमारे देश में न्याय व्यवस्था का जो सबसे बड़ा कानून है, उसका नाम है IPC इंडियन पीनल कोड, एक दूसरा कानून है CPC सिविल प्रोसीजर कोड, एक तीसरा कानून है क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (अपराध दंड सहीता), ये 3 कानून है, जो भारतीय न्याय व्यवस्था के आधार बताए गए हैं या जिन्हें आधार माना जाता है आपको मालूम है ये तीनो कानून अंग्रेजो के ज़माने के बने हुए हैं। IPC को बनाने का काम तो खुद मैकाले ने किया था, IPC की ड्राफ्टिंग खुद मेकाले की बने हुई है जिसको इंडियन पीनल कोड यानि भारतीय दंड सहीता कहते है जिसके आधार पर दंड की व्यवस्था होती है,

 मेकाले ने अपने पिता को एक पत्र लिखा है उस पत्र में वो कहता है कि मैंने भारत में ऐसे न्याय के कानून का आधार रख दिया है जिसपर भारतवाशियों कभी को न्याय मिलेगा ही नहीं, जिसके आधार पर भारतवाशी न्याय पा ही नहीं सकते। हमेशा इनके ऊपर अन्याय होगा ये अच्छा ही होगा क्योकि गुलाम जिनको बनाया जाता है उनके ऊपर अन्याय ही किया जाता है उनको न्याय नहीं दिया जाता फिर जब राजीव दीक्षित जी और उनके साथियों ने ढूंढ़़ना शुरू किया तो पाया कि जो IPC नाम का कानून भारत में मैकाले ने 1860 में लागु किया यही कानून अंग्रेजो ने आयरलैंड में सबसे पहले लागु किया था आयरलैंड को अंग्रेजो ने गुलाम बनाकर रखा हुआ है हजार साल से। तो आयरलैंड को गुलाम बनाकर रखने के लिए अंग्रेजो ने कानून बनाया Irish Penal Code उसी कानून को भारत में कह दिया Indian Penal Code ।
आप जानते है जब आयरलैंड लिखते हैं तो A से नहीं लिखा जाता, I से लिखा जाता है Ireland तो आयरलैंड का I ले लिया और इंडिया का भी I है तो कानून वैसे का वैसा ही लगा दिया इस देश पर, जो आयरलैंड का कानून था आयरिश पीनल कोड वही इंडियन पीनल कोड है।
जब राजीव दीक्षित जी ने आयरलैंड के पीनल कोड को खरीदकर पढ़ा और इंडियन पीनल कोड को पढ़ा, दोनों को सामने रखा, तो राजीव दीक्षित जी को इतना गुस्सा आया कि इसमें तो कोमा और फुल स्टॉप तक नहीं बदला गया है वो भी वैसे का वैसे ही है। बस इतना ही किया मैकाले ने कि आयरिश पीनल कोड में जहाँ-जहाँ आयरिश है, वहां वहां इंडियन और इंडिया कर दिया बाकी की सब धाराए वैसी की वैसी हैं, सब अनुछेद वैसे के वैसे है तो आयरलैंड को गुलाम बनाकर रखना है, इसलिए आयरिश पीनल कोड बनाया और भारत को गुलाम बनाकर रखना है तो इंडियन पीनल कोड बना दिया।

जिस कानून को गुलाम बनाने के लिए तैयार किया गया हो उस कानून के आधार पर न्याय कैसे मिलेगा बताइए जरा, अन्याय ही होने वाला है सबसे बड़ा अन्याय क्या होता है कि जब IPC के आधार पर जब कोई मुकदमा दर्ज होता है, इस देश में, तो सबसे पहले तो मुकदमा दर्ज होने में ही महीनो महीनो लग जाते है FIR करनी पड़ती है, उसके बाद पुलिस को साबित करना पड़ता है, सबूत जुटाने पड़ते है, अदालत में जाना पड़ता है इस पूरी प्रक्रिया में ही देर लगती है, क्योकि तरीका अंग्रेजो का यही है, फिर अगर वो मुकदमा दाखिल हो जाए तो सुनवाई शुरू होती है सुनवाई के लिए सबूत इकठे किए जाते हैं उन सबूतों के लिए अंग्रेजो के ज़माने का एक कानून है Indian Evidence Act. और वो सबूत जल्दी इकट्ठे हो नहीं पाते हैं, धीरे धीरे समय बढता जाता है और एक मुकदमे को 4 साल 5 साल 10 साल 15 साल 20 साल 25 साल 30 साल 35 साल समय निकल जाता है मुक़दमे को दाखिल करने वाला मर जाता है फिर उसके लड़के-लड़कियाँ उस मुक़दमे को लड़ते है वो जवान होकर बूढ़े हो जाते हैं तब भी मुकदमा चलता ही रहता है चलता ही रहता है उसमे कभी अंतिम फैसला नहीं आ पाता।

 हमारे देश का दुर्भाग्य है कि आजादी ने 63 वर्षो में हमारे देश की अदालतों में लगभग साढ़े 3 करोड़ (2009 के आकड़ो के अनुसार) मुक़दमे हैं जो दर्ज किए गए हैं अलग अलग प्रार्थियो के द्वारा लेकिन उनमे कोई फैसला नहीं आ पा रहा है, साढ़े 3 करोड़ मुक़दमे लम्भित पड़े हुए हैं पेंडिंग हैं। हमारे देश के न्याय व्यवस्था के अधिकारियो से जब पूछा जाता है कि इन साढ़े 3 करोड़ मुकदमो का फैसला कब आएगा तो वो मजाक करते हुए कहते हैं कि 300 -400 साल में फैसला आ जाएगा तो जब कोई उनसे पूछते हैं कि वो कैसे ? तो वो कहते हैं कि जिस गति से कानून व्यवस्था चल रही है इस गति से तो इन सभी मुकदमो का फैसला आने में 300- 400 साल तो लग ही जाएगे तो ना वादी (मुकदमा दर्ज करने वाला) जिन्दा रहेगा ना प्रतिवादी (जिसके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है) जिन्दा रहेगा, न्याय व्यवस्था को इससे कुछ लेना देना नहीं है कि वादी जिन्दा है या प्रतिवादी जिन्दा है उनको को लेना देना है अंग्रेजो के बनाए गए कानून के आधार पर फैसला देने से।

 अब राजीव दीक्षित जी बहुत गहरी बात आपके बीच रखते हैं और सारे राष्ट्र का ध्यान इस और आकर्षित करते हुए कहते हैं कि “कोई न्यायधीश अंग्रेजो के बनाए गए कानून के आधर पर अगर फैसला दे रहा हैं तो वो न्याय कैसे कर सकता है ये पूछिए? अपने दिल से पूछिए उस न्यायधीश से पूछिए ”
न्यायाधीशो से जब जब राजीव दीक्षित जी ने ये पूछा है कि “क्या आप न्याय देते हैं” तो वो कहते हैं कि ईमानदारी से हम न्याय नहीं दे पाते, हम को मुकदमो का फैसला करते हैं। फैसला देना अलग बात है न्याय देना बिलकुल अलग बात है।
अब आपको एक उदहारण से समझाते हैं फैसला क्या होता है और न्याय क्या होता है। मान लीजिए आपने एक गाय को एक डंडे से पिटा तो कानून के हिसाब से आपको जेल हो जाएगी, गाय को डंडे से पीटना भारत में अपराध है जुर्म है इसके लिए जेल हो जाती है लेकिन अगर उसी गाय को आपने गर्दन से काट दिया और उसके मास की बोटी-बोटी आपने बेच दी बाजार में, आपको कुछ नहीं होगा क्योकि कानून से वो न्याय सम्मत है अब गाय को डंडे से मारो तो जेल हो जाती है लेकिन गाय को गर्दन से काटकर उसकी बोटी-बोटी बेचो तो भारत सरकार करोड़ो रूपए की सब्सिडी देती है आपको।

 मै अगर गोशाला खोलना चाहूं तो इस देश की कानून व्यवस्था के अनुसार मुझे बैंक से कर्ज नहीं मिल सकता, लेकिन गाय को कत्ल करने के लिए कत्लखाना बनाना हो तो उसके लिए बैंक करोड़ो रूपए कर्ज देने को तैयार है मुझे। आप सोचिए मैं गौशाला बनाकर गाय का दूध बेचना चाहता हूँ, बैंक के पास जाता हूँ कि मुझे कर्ज दे दो। बैंक कहता है कि हमारी योजना में गाय को कर्ज देने की व्यवस्था नहीं है लेकिन उसी बैंक के पास मै जाता हूँ कि मुझे कत्लखाना खोलना है और मुझे कर्ज दे दो तो बैंक ख़ुशी से कर्ज देता है उस कर्जे पर ब्याज सबसे कम लिया जाता है और करोड़ों रूपए का कर्ज तो मुफ्त में दिया जाता है सब्सिडी के रूप में। आप बताओ कि अगर हम गाय का मास बेचने के लिए कतलखाना खोलू तो हमारे लिए कर्ज है सब्सिडी है गौशाला खोले गाय के पालन करने के लिए तो हमें ना तो सब्सिडी है ना बैंक की कोई मदद है ऐसी व्यवस्था में न्याय कहा हो सकता है।
और एक उदहारण से समझे अगर किसी बच्चे को जन्म लेने से पहले कोई मारे ना तो उसे गर्भपात कहके छोड़ देते हैं, लेकिन जन्म लेने के बाद मारे तो हत्या हो जाती है धारा 302 का मामला बनता है, बच्चे को गर्भ में मारे तो भी हत्या है जन्म लेने के बाद मारे तो भी हत्या है दोनों में सजा एक जैसी होनी चाहिए और वो फांसी ही होनी चाहिए, लेकिन जन्म से पहले मारो तो गर्भपात है और जन्म के बाद मारो तो हत्या है इसलिए इस देश के लाखों लालची डॉक्टर करोड़ो बेटियों को गर्भ में ही मार डालते है क्योकि गर्भ में मार देने से उन्हें फांसी नहीं होती है, गर्भ में बाहर मरेंगे तो उन्हें फांसी होने की संभावना है, एक करोड़ बेटियों को हर साल इस देश में गर्भ में ही मार दिया जाता है इसी कानून की मदद से। अब आप बताओ कि बेटी को गर्भ में मार दो तो गर्भपात और गर्भ में बहार मारो तो हत्या। अगर इन कानूनों के आधार पर कोई फैसला होगा तो क्या वो न्याय दे सकता है, फैसला हो सकता है न्याय नहीं दे सकता,
इसलिए राजीव दीक्षित जी इस देश के बड़े न्यायाधीशों को कहते हैं कि आप लोगो को अपना नाम बदलना चाहिए, कायदाधीश लिखना चाहिए, कानूनाधीश लिखना चाहिए आप न्यायाधीश तो हैं ही नहीं, क्योकि आप न्याय तो दे ही नहीं पा रहे है आप तो मुकदमो का फैसला कर रहे हैं, अगर अंग्रेजी में उनके शब्दों में कहे तो वो कहते हैं हम तो केस डीसाइड करते है, जजमेंट नहीं करते क्योकि न्याय देना बिलकुल अलग है मुक़दमे का फैसला देना बिलकुल अलग है। मुक़दमे का फैसला होता है कानून के आधार पर और न्याय होता है धर्म के आधार पर, सत्य के आधार पर। धर्म और सत्य से न्याय की स्थापना हो सकती है कानून से न्याय की स्थापना नहीं हुआ करती है। दुर्भाग्य से हमारे देश में धर्म और सत्य की सत्ता नहीं है कानून की सत्ता है लॉ एंड आर्डर की बात होती है धर्म और न्याय की बात नहीं होती तो ये अंग्रेज छोड़ के चले गए कानून व्यवस्था को और वही ढो रही है हम आजादी के 70 साल के बाद भी।
राजीव दीक्षित

शनिवार, 27 अगस्त 2016

मक्खियों में सोने-जागने के स्विच की खोज

मक्खियों को कैसे पता चलता है कि कब जागकर भिनभिनाना है और कब सो जाना है? अब ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के जेरो मीसेनबॉक और उनके साथी वैज्ञानिकों ने उस स्विच का पता लगा लिया है जो मक्खियों को सोने या जागकर सक्रिय होने का निर्देश देता है। मक्खियों और इंसानों की नींद के बीच कई समानताएं हैं। इसके चलते मक्खियां हमारी अपनी नींद को समझने के लिए एक अच्छा मॉडल जंतु है। इसी बात को ध्यान में रखकर ऑक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं ने मक्खियों की नींद का अध्ययन किया। इसके लिए उन्होंने ऑप्टोजेनेटिक्स नामक तकनीक का उपयोग किया। इस तकनीक में सबसे पहले जंतु में जेनेटिक फेरबदल के माध्यम से ऐसी व्यवस्था की जाती है कि उसकी तंत्रिका कोशिकाएं एक विशेष प्रकाश की रोशनी मिलते ही सक्रिय हो जाती है। ऐसी मक्खियां तैयार करने के बाद उन्होंने मक्खियों के मस्तिष्क में उन तंत्रिकाओं को उत्तेजित किया जो डोपामीन नामक एक रसायन बनाती हैं। इन तंत्रिका कोशिकाओं द्वारा बनाए गए डोपामीन ने नींद को बढ़ावा देने वाले हिस्से को निष्क्रिय कर दिया। यह हिस्सा पंखे के आकार की पृष्ठीय संरचना कहलाता है। मक्खियां तुरंत जाग उठीं।
लगभग इसी के साथ वाल्थम विश्वविद्यालय के फैंग गुओ और उनके साथियों ने एक अन्य प्रयोग किया। ऑप्टोजेनेटिक तकनीक का उपयोग करते हुए उन्होंने पाया कि यदि मक्खी की आंतरिक घड़ी का नियमन करने वाली तंत्रिका को उत्तेजित किया जाए तो मक्खियां सो जाती हैं। जब प्रकाश के माध्यम से इन तंत्रिकाओं को उत्तेजित किया जाता है तो वे ग्लूटामेट नामक एक रसायन बनाती हैं। ग्लूटामेट मस्तिष्क के मास्टर समेकर में जाकर सक्रियता को बढ़ावा देने वाली तंत्रिकाओं को निष्क्रिय कर देता है। परिणाम यह होता है कि मक्खी सो जाती है। हमारे मस्तिष्क में भी पंखे के आकार की पृष्ठीय संरचना और मास्टर पेसमेकर के समतुल्य हिस्से होते हैं। अभी यह नहीं पता है कि क्या डोपामीन और ग्लूटामेट जागने और सोने का संकेत देंगे या नहीं। मगर इतना तो पता है कि डोपामीन इंसानों को जगाकर रखता है। कोकेन जैसे रसायन डोपामीन के स्तर में वृद्धि करते हैं और हमें जगाने में मददगार होते हैं। इस तरह के स्विच की खोज महत्वपूर्ण है। अगला कदम यह पता करने का होगा कि डोपामीन और ग्लूटामेट सामान्यत: किस क्रियाविधि के ज़रिए असर डालते हैं। इसके आधार पर नींद संबंधी तकलीफों के उपचार के कुछ नए तरीके सामने आने की उम्मीद की जा सकती है। (स्रोत फीचर्स)

शनिवार, 20 अगस्त 2016

रांची का पहाड़ी बाबा का मंदिर


पहाड़ी बाबा का मंदिर इस लिहाज से अनोखा है कि यहां धर्मध्वजा के साथ-साथ हर स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रध्वज फहराने की परंपरा है। यह बहुत रोचक विषय तो है ही साथ ही लोगों की जिज्ञासा का केंद्र भी है।

स्वतंत्रता और पूजा

यह मंदिर भक्तिभाव के संग राष्ट्रप्रेम का भी संदेश देता है तथा इससे यह सवाल उठता है कि क्या हमारा वतन भगवान के समान पूज्यनीय है? जी हां! अगर स्वतंत्रता ही नहीं होगी तब हमारा पूजा करने का हक भी छिन सकता है।

कहां है ये मंदिर?

रांची रेलवे स्टेशन से लगभग सात किलोमीटर दूर करीब 26 एकड़ में फैला और 350 फुट की ऊंचाई पर स्थित पहाड़ी बाबा मंदिर देश का शायद इकलौता ऐसा मंदिर है जहां धर्मध्वजा की जगह राष्ट्रध्वज फहराया जाता है।

इकलौता मंदिर?

संभवतः यह भारत वर्ष में अपनी तरह का इकलौता मंदिर है जहां स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रीय झंडा फहराया जाता है।

धर्मध्वजाओं का महत्व

आमतौर पर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च अपनी धर्मध्वजाएं फहराते हैं लेकिन पहाड़ी बाबा मंदिर पर हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रीय ध्वज शान से लहराया जाता है।

धर्मध्वज से ऊपर का दर्जा?

इस मंदिर में राष्ट्रीय ध्वज को धर्मध्वज से ऊपर का दर्जा देने की यह परंपरा 14 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि से ही शुरू हो गई थी।

राष्ट्रगान के साथ तिरंगा

देश की आजादी के बाद से ही प्रत्येक साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को मंदिर में सुबह की मुख्य पूजा के बाद राष्ट्रगान के साथ तिरंगा फहराया जाता रहा है।

वतन सबसे पहले

लोग आदरपूर्वक और उत्साह के साथ इसमें शामिल होते हैं। हालांकि किसी और मंदिर में ऐसी अनोखी परंपरा नहीं अपनाई जाती है। तथापि यह साफ़-साफ़ दर्शाता है कि हमारा वतन पूजनीय है।

पहाड़ी बाबा मंदिर

यूं तो पहाड़ी बाबा मंदिर की मनोहारी छटा भी इसे महत्वपूर्ण और श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का कारण बनाती है। आश्चर्यजनक रूप से सिर्फ इन दो राष्ट्रीय पर्वों के अवसर पर भारी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं।

हम सब एक हैं

जिन्हें भक्तिभाव से बहुत लेना-देना नहीं होता वे भी यहां आने से नहीं कतराते। हर धर्म के लोग इस प्रथा में भागीदर बन कर इसे आगे ले जा रहे हैं।

वृक्ष और ध्वज

पर्यावरण प्रेमियों के लिए भी यह मंदिर महत्वपूर्ण है क्योंकि पूरी पहाड़ी पर मंदिर परिसर के ईर्द-गिर्द विभिन्न प्रकार के हजार से अधिक वृक्ष हैं।

428 सीढ़ियां

मुख्य मंदिर के द्वार तक पहुंचने के लिए आपको 428 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर प्रांगण से रांची शहर का खूबसूरत नजारा भी दिखता है।

अनुपम सौंदर्य

साथ ही यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त का अनुपम सौंदर्य भी देखा जा सकता है। इसको देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।

ब्रिटिश हुकूमत के समय फांसी

पहाड़ी बाबा मंदिर का पुराना नाम टिरीबुरू था जो आगे चलकर ब्रिटिश हुकूमत के समय फांसी टुंगरी में परिवर्तित हो गया।

इतिहास का प्रकोप

फांसी टुंगरी के नामकरण के पीछे आजादी का इतिहास छिपा है। अंग्रेजों ने जब छोटा नागपुर क्षेत्र पर अधिकार स्थापित कर लिया था तो रांची में उन्होंने अपना संचालन केंद्र खोला।

खुलेआम फांसी

जो लोग अंग्रेजी सरकार की नजरों में देशद्रोही, क्रांतिकारी या घातक होते थे, उन्हें राजधानी के शहीद चौक या फांसी टुंगरी पर खुलेआम फांसी दे दी जाती थी।

भक्तिभाव के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम

असल में मंदिर के साथ जुड़े ऐतिहासिक तथ्य लोगों में भक्तिभाव के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम के भाव को भी उद्वेलित करते हैं।

फांसी और स्वतंत्रता संग्राम

स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अनेक क्रांतिकारियों को अंग्रेज सरकार ने यहां फांसी पर चढ़ा दिया था।

शहादत का प्रतीक

ऐसे में यह शहीदों की शहादत का प्रतीक है। इनकी याद में राष्ट्रीय झंडा फहराकर उन्हें सम्मान प्रदान किया जाता है।

देश की आजादी

पहाड़ी बाबा मंदिर में एक शिलालेख लगा है जिस पर 14 अगस्त, 1947 को देश की आजादी संबंधी घोषणा भी अंकित है।

सपूतों का शहीद स्थल

पहाड़ी मंदिर के मुख्य पुजारियों में शामिल पंडित देवीदयाल मिश्र उर्फ देवी बाबा बताते हैं कि पहाड़ी मंदिर केवल आजादी के लिए लड़ने वाले सपूतों का शहीद स्थल भर नहीं है बल्कि इसका प्राचीन इतिहास भी महत्वपूर्ण है।

नागवंशियों का इतिहास

उनकी मानें तो छोटा नागपुर क्षेत्र के नागवंशियों का इतिहास भी यहीं से शुरू हुआ है। पहाड़ी पर जितने भी मंदिर हैं, उनमें नागराज का मंदिर सबसे प्राचीन है।

आदिवासी लोग और नागदेवता की पूजा

आदिवासी समुदाय प्रकृति पूजक रहा है। इस स्थल पर शुरू से ही आदिवासी लोग नागदेवता की पूजा करने आते रहे हैं।

पूजा और आदिवासियों की पुकार

आज भी प्रत्येक सोमवार को पाहन बाबा जो आदिवासियों के लिए पूजनीय होते हैं, मंदिर की प्रमुख पूजा संपन्न करने आते हैं।

प्रमुख धार्मिक केंद्र

सरकार अगर पहाड़ी मंदिर पर समुचित ध्यान दे तो यह न सिर्फ एक प्रमुख धार्मिक केंद्र के तौर पर विकसित होगा बल्कि राष्ट्रीय एकता की भी अनूठी मिसाल पेश करेगा।

रविवार, 7 अगस्त 2016

सुनहरा इतिहास

इतिहास स्वयं इस बात का साक्षी है कि भारत की भूमि बड़े-बड़े धुरंधरों की जन्म-कर्मभूमि रही है। आज भले ही कोई कुछ भी कह ले, लेकिन सच यही है कि विभिन्न क्षेत्रों में जो भी और जितनी भी उपलब्धियां हम देख रहे हैं उनकी नींव कहीं ना कहीं भारतीयों से ही जुड़ी है।
चाणक्य
यदि सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में अहम योगदान दिया है तो गणित की गणना के क्षेत्र में आर्यभट्ट का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने वैश्विक इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करवाया है। इन्हीं में से एक रहे आचार्य चाणक्य जिनका जन्म करीब 300 ईसा पूर्व हुआ था। आचार्य चाणक्य का संबंध पाटलिपुत्र से था, जिसे उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाया।
जीवन के आदर्श
चंद्रगुप्त को चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य बनाने वाले आचार्य चाणक्य एक महान शिक्षक, दार्शनिक और ज्ञाता थे। इन सबके अलावा आचार्य चाणक्य को नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र का जनक भी कहा जाता है क्योंकि उनके तर्कों के आगे कोई नहीं ठहरता था। आज भी बहुत से लोग आचार्य चाणक्य की नीतियों को अपना आदर्श मानकर उन्हीं पर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। आइए जानते हैं आचार्य चाणक्य ने जीवन के विषय में ऐसा क्या कहा जो लोगों के लिए आदर्श बन गया।
महानता
चाणक्य के अनुसार व्यक्ति का धर्म, उसका जन्म, उसकी पहचान नहीं बन सकता। व्यक्ति के कर्म ही उसे महान बनाते हैं।
ऋण
ऋण इंसान का सबसे बड़ा शत्रु होता है। अगर खुशहाल जीवन व्यतीत करना है तो व्यक्ति को ऋण की एक-एक पाई तक चुका देनी चाहिए।
वर्तमान की सोच
मनुष्य जाति को अपने भविष्य या अतीत के बारे में नहीं सोचना चाहिए। केवल वर्तमान के विषय में सोचकर अपने जीवन को सफल बनाया जा सकता है।
शिक्षा एक धरोहर
शिक्षा ही व्यक्ति को उत्कृष्ट बनाती है। सुंदरता और जवानी छोड़कर चली जाती है लेकिन शिक्षा एक मात्र ऐसी धरोहर है जो हमेशा साथ रहती है।
व्यवसाय के राज
व्यवसाय से जुड़े अपने राज किसी भी व्यक्ति के साथ बांटने नहीं चाहिए, भले ही वह आपसे कितना ही निकट क्यों ना हो। अगर आप ऐसा करते हैं तो आपका विनाश निश्चित है।
किताबों का ज्ञान
वास्तविक ज्ञान किताबों या संपत्ति में नहीं मिलता। अगर ऐसा होता तो लोग जरूरत पड़ने पर भी कभी इनका प्रयोग ना कर पाते।
नजदीकी
अगर कोई व्यक्ति आपका बहुत नजदीकी है, तो वह भले ही आपसे कितना ही दूर क्यों ना हो, हमेशा आपके दिल के पास रहता है। लेकिन एक बार कोई दिल से उतर जाए तो दूरी ना होने के बाद भी वह कभी नजदीकी नहीं बन सकता।
कुछ सवाल
जब भी किसी कार्य की शुरुआत करो तो कुछ सवाल पहले खुद से पूछो। क्या तुम वाकई ये कार्य करना चाहते हो? क्या वाकई तुम्हें सफलता मिलेगी? यह कार्य क्यों करना चाहते हो? अगर इन सब का जवाब आपको सकारात्मक मिलता है तभी उस कार्य की शुरुआत करनी चाहिए।
सबसे खुशहाल व्यक्ति
इस डर से कि आप सफल होंगे भी या नहीं, किसी कार्य को अधूरा मत छोड़ो। आचार्य चाणक्य के अनुसार अपने ध्येय को हासिल करने वाला व्यक्ति इस दुनिया का सबसे खुशहाल व्यक्ति होता है।
प्रशासन का मतलब
उपयुक्त प्रशासन वो है जहां सैन्य बल से ज्यादा खजाने पर ध्यान दिया जाता है। खजाना हो तो सैन्य क्षमता बढ़ाई जा सकती है लेकिन बिना खजाने के सैन्य क्षमता किसी काम की नहीं है।
हकदार
अपने धन को किसी ऐसे व्यक्ति को ही दें, जो वाकई उसकी कद्र करना जानता हो।
डर पर जीत
अपने डर से कभी भयभीत नहीं होना चाहिए। अगर आपको किसी बात का भय है तो उसका सामना कर उसे जड़ से समाप्त कर दीजिए।
ईमानदारी का नतीजा
सीधा खड़ा वृक्ष सबसे पहले कटता है। इसका अर्थ है कि बहुत ज्यादा ईमानदारी भी घातक सिद्ध हो सकती है, विनाश का कारण बन सकती है।
ईश्वर की खोज
भगवान को मंदिर में ढूंढ़ने से कोई फायदा नहीं है। जिस शरीर में पवित्र आत्मा रहती है उस शरीर में स्वयं भगवान वास करते हैं।
दूसरों की गलतियां
आपकी जिन्दगी इतनी बड़ी नहीं है कि गलती कर-कर के सीख लें। दूसरों की गलतियों को देखो, उन्हें समझो और उनसे सीख लो।
चाणक्य की नीतियां
आचार्य चाणक्य को काफी कठोर नीतिकार कहा जाता था। उनकी कठोर शिक्षा और परीक्षण ने एक सामान्य से बालक को सम्राट बना दिया था। चाणक्य की ये शिक्षाएं किसी के लिए भी संजीवनी का कार्य कर सकती हैं।

QFORD [क्यूफोर्ड]

मंगलवार, 2 अगस्त 2016

Attributes of Self-Made Billionaires

It’s easy to think self-made billionaires just got lucky.

Maybe they were in the right place at the right time. Or maybe they stumbled across a discovery that made them a ton of money overnight.
But I’ve had the incredible fortune of being around and personally consulting to a number of self-made billionaires—even some as they ascended to billionaire-status—and I can tell you all of that is unequivocally false. Not even close.
Every self-made billionaire I’ve ever met or studied has something in common. It has nothing to do with luck or being in the right place at the right time. They all bring a unique set of attributes to each and every opportunity they come across. And when these attributes are developed and not suppressed, they transform into compelling strengths and abilities, but also severe (and sometimes very public) challenges.
You’ve seen them recently in the likes of Steve Jobs, Elon Musk, Richard Branson and Oprah Winfrey, and historically in Andrew Carnegie, Henry Ford and John D. Rockefeller. But here’s the interesting part… you might have seen these in yourself, too.
So do you have it in you to become one of those seemingly magical people who can see the future and make it come to pass, all while making a pile of money in the process? Find out as I take you through the positives (and negatives) of the 10 attributes found within every self-made billionaire:

1. High Sensitivity and Awareness

Beyond perceived eccentricities for things like timing, color, food, fragrance or texture, a self-made billionaire’s sensitivities can be heightened to the point of distraction, isolation or even debilitation. On the positive side, I’ve found they each have their own unique sensitivities and heightened awareness that can seem extrasensory: everything from design functionality and perfect pitch, obsessions over air and water quality, knowing—with certainty—when someone else is dealing with a crisis. However, what’s special about the self-made billionaire is how they find ways to leverage their sensitivities and awareness to increase performance.

2. Future Focused

The future-focused attribute often goes by another term: visionary. This label has become a badge of honor for entrepreneurs of every stripe, self-made billionaires included. Earlier in their lifetimes, however, they often got a different label: hopeless dreamer. The real differentiator between the two is how much protection and support they were able to surround themselves with, helping to make their dreams a reality.

3. High Processing Capacity

Self-made billionaires have unusually high processing capacities, being able to consume and retain information faster and in greater quantities than other people. This attribute drives them to seek out and collect large amounts of data, regardless of their physical or cognitive limitations, such as dyslexia. It can even make them seem like machines, automatons or obsessive individuals. They have simply found ways to process and analyze the information they collect in order to cast a clear vision, take action and make constructive decisions over time.

4. Persistent Adaptability

Though self-made billionaires maintain a persistent adaptability to take on new tasks, initiatives, businesses or even careers (think Bill Gates’ new focus on philanthropy or Donald Trump’s transition to politics), they are not chameleons. Most actually had difficulty adapting to certain situations, such as structured school or social environments, earlier in their lives. Yet they developed a persistent adaptability to new tasks and careers, and this attribute enabled them to achieve their vision or desired outcome.

5. Intense Focus on Results or a Single Outcome

We have all heard the stories: Steve Jobs’ dogmatic drive to perfect the Macintosh or Bill Gates’ near workaholic tendencies. There are many examples of self-made billionaires being viewed as super- or sub-human in order to make their mark on the world. Oftentimes, they pulled back and isolated themselves in order to get things done. Although this can make them appear obsessive, compulsive, combative or antisocial, the key is that these hyper-successful individuals directed this attribute toward very clear results or outcomes.

6. Bias for Improvement

As future-focused individuals, self-made billionaires see the world as it should be, not what it is today. They see what should be modified, improved or evolved. Given the choice between keeping things as they are or changing them for the better, they will almost always choose the latter. But the desire for improvement without an underlying structure can devolve into “improvement paralysis,” where products or ideas are endlessly refined without really moving forward. But the self-made billionaire maintains focus on their intended outcome to set proper priorities on the improvements that actually move them and their business forward.

7. Experimental or Experiential Learning

Yes, self-made billionaires learn through books, but they truly seek the application of their learning, the experiences and experiments; otherwise, they don’t feel momentum. As children, this attribute often made the traditional classroom and educational structures challenging. Experiences and experiments give these individuals confidence to push further, validate what they’ve learned and strengthen belief in their visions of the future.

8. Perceive Unique Connections

When the majority of people are united in one belief, it takes a certain type of person to offer contradictions or alternatives. Self-made billionaires have an enormous capacity to perceive unique connections in the world through their experiences, experiments, focus on the future and high sensitivities. They are able to see situations, problems, solutions and processes from different angles in order to leverage new resources or move in new directions. This can also be alienating and cause massive friction with their leadership teams.

9. Drive for Gained Advantage

This is a very visible attribute. The self-made billionaire constantly asks themselves, How do I get ahead? This consistently drives them to find an advantage or the means to get ahead. Sometimes this attribute can make individuals seem cutthroat, cold or heartless. However, the drive for gained advantage is a competitive attribute that has enabled the self-made billionaire to seek out new and unique solutions to shared challenges, and increase the contribution they can make to their teams.

10. Innate Motivation

Typically, the self-made billionaires I’ve met and worked with have no idea where their “fire” comes from. And although some view this attribute as mere ambition, intrinsic motivation isn’t the desire to climb corporate ladders or collect awards and recognition. This is an engine with no off switch, a constant drive to achieve goals and contribute to the world. Naturally, intrinsic motivation can also make these individuals restless, impatient and combative, especially around people who either lack the same kind of motivation or become obstacles to their momentum.
Looking at every self-made billionaire throughout history, you will find these 10 attributes. But while reading them, you might notice something interesting…. You can see some or all of them in yourself.
These attributes are not limited to the self-made billionaires, but found in an overlooked and misunderstood sub-population of our society, the Entrepreneurial Personality Type (EPT). What I’ve found in both working with these individuals and researching them, is that the only difference between them and other EPTs is their ability to recognize their unique attributes, and find the protection and support necessary to turn them into incredible strengths.

-Alex Charfen

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

अनार मांसपेशियों को बेहतर बनाता है

जब हम अनार, स्ट्रॉबेरी या अखरोट खाते हैं तो हमारा शरीर एक रसायन बनाता है जिसका नाम युरोथिलिन-ए है। शोधकर्ताओं का मत है कि युरोथिलिन-ए मांसपेशियों को ज़्यादा काम करने में सक्षम बनाने का काम करता है। स्विट्ज़रलैण्ड के ईकोल पोलीटेक्निक के जोहान ऑवक्र्स और उनके साथी यह परखना चाहते थे कि क्या ये खाद्य पदार्थ उतने ही लाभदायक हैं, जितना कि दावा किया जाता है। उन्होंने अपने प्रयोगों के परिणाम नेचर मेडिसिन में प्रकाशित किए हैं। 
जब उन्होंने युरोथिलिन-ए की खुराक एक कृमि सेनोरेब्डाइटिस एलेगेंस (Caenorhabiditis elegans) ) को दी तो ये कृमि औसतन 45 प्रतिशत अधिक उम्र तक जीवित रहे। और जब यही रसायन बुज़ुर्ग चूहों को पिलाया गया तो वे 42 प्रतिशत अधिक दौड़ पाए। और सबसे बड़ी बात यह देखी गई कि इन चूहों में अतिरिक्त दौड़ पाने की यह क्षमता अधिक मांसपेशियां बनने की वजह से पैदा नहीं हुई थी। इसका मतलब है कि युरोथिलिन-ए मांसपेशियों की मात्रा को नहीं बढ़ाता बल्कि उनकी गुणवत्ता को बढ़ाता है। तो आखिर कैसे? जांच पड़ताल से पता चला कि युरोथिलिन-ए मांसपेशियों में से क्षतिग्रस्त माइटोकॉण्ड्रिया नामक उपांगों को निकाल बाहर करता है। गौरतलब है कि माइटेकॉण्ड्रिया हमारी कोशिकाओं के पॉवरहाउस होते हैं - इन्हीं में ग्लूकोज़ का ऑक्सीकरण होता है और ऊर्जा मुक्त होती है। जब क्षतिग्रस्त माइटोकॉण्ड्रिया को हटा दिया जाता है तो शेष बचे तंदुरुस्त माइटोकॉण्ड्रिया विभाजित होकर संख्या वृद्धि करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि इन कोशिकाओं को ज़्यादा ऊर्जा मिलती है और ये ज़्यादा काम कर पाती हैं।
टीम का लक्ष्य यह देखना है कि क्या युरोथिलिन-ए का इस्तेमाल इंसानों में कमज़ोर मांसपेशियों को दुरुस्त करने में किया जा सकता है। अब तक जितने उपचार थे उनमें कोशिश यह होती थी कि ज़्यादा से ज़्यादा मांसपेशियां बने ताकि कामकाज आसानी से चल सके। युरोथिलिन ऐसा रसायन है जो मांसपेशियों को ज़्यादा कार्यक्षम बनाता है। शोधकर्ताओं को लगता है कि जब यह कृमियों और चूहों में कारगर है तो अन्य स्तनधारियों में कारगर साबित होगा। यदि ऐसा होता है तो उम्र के साथ दुर्बल होती जा रही मांसपेशियों की मरम्मत हो सकेगी। क्या अनार खाने से बात बन जाएगी? शोधकर्ताओं की राय में अनार खाना अच्छा होगा मगर उन्होंने अपने प्रयोगों में युरोथिलिन-ए की जितनी खुराक का उपयोग किया है, उतनी खुराक पाने के लिए आपको चार गिलास भरकर रस रोज़ाना पीना पड़ेगा। (स्रोत फीचर्स)

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

4 Tips for Setting Powerful Goals

We all have two choices: We can make a living or we can design a life. Here’s how to do the latter.

-Jim Rohn
 

The most important benefit of setting goals isn’t achieving your goal; it’s what you do and the personyou become in order to achieve your goal that’s the real benefit.
Goal-setting is powerful because it provides focus. It shapes our dreams. It gives us the ability to hone in on the exact actions we need to perform to achieve everything we desire in life. Goals are great because they cause us to stretch and grow in ways that we never have before. In order to reach our goals, we must become better.
Life is designed in such a way that we look long-term and live short-term. We dream for the future and live in the present. Unfortunately, the present can produce many difficult obstacles. But setting goals provides long-term vision in our lives. We all need powerful, long-range goals to help us get past those short-term obstacles. Fortunately, the more powerful our goals are, the more we’ll be able to act on and guarantee that they will actually come to pass.
What are the key aspects to learn and remember when studying and writing our goals? Here’s a closer look at goal-setting and how you can make it forceful and practical:

1. Evaluate and reflect

The only way we can reasonably decide what we want in the future and how we’ll get there is to know where we are right now and what our current level of satisfaction is. So first, take some time to think through and write down your current situation; then ask this question on each key point: Is that OK?
The purpose of evaluation is two-fold. First, it gives you an objective way to look at your accomplishments and your pursuit of the vision you have for life. Secondly, it shows you where you are so you can determine where you need to go. Evaluation gives you a baseline to work from.
Take a couple of hours this week to evaluate and reflect. See where you are and write it down so that as the months progress and you continue a regular time of evaluation and reflection, you will see just how much ground you’re gaining—and that will be exciting!

2. Define your dreams and goals

One of the amazing things we have been given as humans is the unquenchable desire to have dreams of a better life and the ability to establish and set goals to live out those dreams. We can look deep within our hearts and dream of a better situation for ourselves and our families. We can dream of better financial, emotional, spiritual or physical lives. We have also been given the ability to not only dream, but pursue those dreams—and not just pursue them, but the cognitive ability to lay out a plan and strategies to achieve those dreams. Powerful!
What are your dreams and goals? This isn’t what you already have or what you have done, but what you want. Have you ever really sat down and thought through your life values and decided what you really want? Have you ever taken the time to truly reflect, to listen quietly to your heart, to see what dreams live within you? Your dreams are there. Everyone has them. They may live right on the surface, or they may be buried deep from years of others telling you they were foolish, but they are there.
Take time to be quiet. This is something that we don’t do enough of in this busy world of ours. We rush, rush, rush, and we’re constantly listening to noise all around us. The human heart was meant for times of quiet—to peer deep within. It is when we do this that our hearts are set free to soar and take flight on the wings of our own dreams. Schedule some quiet “dream time” this week. No other people. No cellphone. No computer. Just you, a pad, a pen and your thoughts.
Think about what really thrills you. When you are quiet, think about those things that really get your blood moving. What would you love to do, either for fun or for a living? What would you love to accomplish? What would you try if you were guaranteed to succeed? What big thoughts move your heart into a state of excitement and joy? When you answer these questions you will feel great and you will be in the “dream zone.” It is only when we get to this point that we experience what our dreams are.
Write down all of your dreams as you have them. Don’t think of any as too outlandish or foolish—remember—you’re dreaming! Let the thoughts fly and take careful record.
Now, prioritize those dreams. Which are most important? Which are most feasible? Which would you love to do the most? Put them in the order in which you will actually try to attain them. Remember, we are always moving toward action—not just dreaming.

3. Make your goals S. M. A. R. T.

The acronym S.M.A.R.T. means Specific, Measurable, Attainable, Realistic and Time-sensitive.

Specific:

Goals are no place to waffle. They are no place to be vague. Ambiguous goals produce ambiguous results. Incomplete goals produce incomplete futures.

Measurable:

Always set goals that are measurable. I would say “specifically measurable” to take into account our principle of being specific.

Attainable:

One of the detrimental things that many people do—with good intentions—is setting goals that are so high that they are unattainable.

Realistic:

The root word of realistic is “real.” A goal has to be something that we can reasonably make “real” or a “reality” in our lives. There are some goals that are simply not realistic. You have to be able to say, even if it is a tremendously stretching goal, that yes, indeed, it is entirely realistic—that you could make it. You may even have to say that it will take x, y and z to do it, but if those happen, then it can be done. This is in no way to say it shouldn’t be a big goal, but it must be realistic.

Time:

Every goal should have a time frame attached to it. One of the powerful aspects of a great goal is that it has an end—a time in which you are shooting to accomplish it. As time goes by, you work on it because you don’t want to get behind, and you work diligently because you want to meet the deadline. You may even have to break down a big goal into different parts of measurement and time frames—that is OK. Set smaller goals and work them out in their own time. A S.M.A.R.T. goal has a timeline.

4. Have accountability

When someone knows what your goals are, they hold you accountable by asking you to “give an account” of where you are in the process of achieving that goal. Accountability puts some teeth into the process. If a goal is set and only one person knows it, does it really have any power? Many times, no. A goal isn’t as powerful if you don’t have one or more people who can hold you accountable to it.
QFORD

बुधवार, 6 जुलाई 2016

पॉलिथीन से बनाया गया डीजल

वैज्ञानिकों ने पॉलीथीन को उपयोगी पदार्थों में बदलने का एक तरीका खोज निकाला है। हालांकि यह अभी प्रायोगिक दौर में ही है मगर इससे उम्मीद बंधी है कि जल्दी ही व्यापारिक स्तर पर पॉलीथीन से ईंधन बनाना संभव हो जाएगा। पॉलीथीन वह पदार्थ है जिसका उपयोग हम कई तरह से करते हैं - खास तौर से थैलियां। एक अनुमान के मुताबिक हम प्रति वर्ष 10 करोड़ टन पॉलीथीन की वस्तुएं बनाते हैं और इनमें से अधिकांश को फेंक देते हैं। फेंकी गई पॉलीथीन की वस्तुएं कचरा भराव स्थलों पर, नदी-नालों में, शहर की नालियों में और समुद्रों में पहुंच जाती हैं। ये बहुत धीरे-धीरे विघटित होती हैं। पॉलीथीन दरअसल एथीलीन नामक हाइड्रोकार्बन के अणुओं को जोड़-जोड़कर बनाया गया पॉलीमर है। 
एथीलीन को पॉलीथीन में बदलने के लिए दो उत्प्रेरकों के मिश्रण का उपयोग किया जाता है। एथीलीन के अणु में दो कार्बन होते हैं जो आपस में दोहरे बंधनों से जुड़े होते हैं। एक उत्प्रेरक इनमें से एक बंधन को तोड़ देता है। अब एथीलीन के हर अणु के पास दूसरे अणु से बंधन बनाने की गुंजाइश होती है। दूसरा उत्प्रेरक इस क्रिया में मदद करता है। जब ये बंधन बनते हैं तो धीरे-धीरे लंबी-लंबी कार्बन  की श्रृंखलाएं बन जाती हैं। यही पॉलीथीन है। पॉलीथीन के टिकाऊपन का राज़ यह है कि इसमें कार्बन परमाणुओं के बीच मात्र इकहरे बंधन होते हैं, जिन्हें तोड़ना मुश्किल होता है। 
इन्हीं उत्प्रेरकों का उपयोग करके इर्विन स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के ज़िबिन गुआन और शंघाई की चायनीज़ एकेडमी ऑफ साइन्सेज़ के ज़ेंग हुआंग ने पॉलीथीन से निपटने का तरीका विकसित किया है। उन्होंने इन उत्प्रेरकों के थोड़े परिवर्तित रूप का उपयोग किया। यह परिवर्तित रूप नॉर्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय के मॉरिस ब्रुकहार्ट ने विकसित किया है। इस उत्प्रेरक की विशेषता यह है कि यह कार्बन-कार्बन इकहरे बंधन को तोड़ देता है और उन्हें फिर से जोड़ता है। जब ये जुड़ते हैं तो बहुत लंबी-लंबी श्रृंखलाएं नहीं बनाते बल्कि छोटी-छोटी श्रृंखलाएं बनाते हैं - लगभग उतनी लंबी जैसी कि डीज़ल वगैरह में पाई जाती हैं। तो गुआन और हुआंग ने इस उत्प्रेरक का उपयोग पॉलीथीन पर करने का विचार किया। पॉलीथीन में तो लाखों कार्बन वाली श्रृंखलाएं होती हैं। 
उन्होंने कचरे में से पॉलीथीन की थैलियां इकट्ठी कीं और उनमें थोड़ा डीज़ल मिला दिया। अब इस मिश्रण को उक्त उत्प्रेरकों के साथ रखा गया तो 24 घंटे बाद जो उत्पाद मिला उसमें कार्बन की अपेक्षाकृत छोटी श्रृंखला वाले हाइड्रोकार्बन थे। साइन्स एडवांसेस नामक पत्रिका में अपने काम का विवरण देते हुए उन्होंने बताया है कि अभी यह प्रक्रिया बहुत धीमी है। ये उत्प्रेरक बहुत महंगे भी हैं। इसके अलावा, ये जल्दी ही खुद भी विघटित हो जाते हैं। इसलिए अभी यह प्रक्रिया व्यापारिक स्तर पर काम नहीं आएगी, मगर उन्हें उम्मीद है कि रास्ता मिल गया है और आगे काम करके वे इसे एक उपयोगी तकनीक में बदल देंगे। (स्रोत फीचर्स)

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

ये हैं मेरी मां......

मिस आयशा एक छोटे से शहर के  प्राथमिक स्कूल में  कक्षा 5 की  शिक्षिका थीं। उनकी एक आदत थी कि वह कक्षा शुरू करने से पहले हमेशा "आई लव यू ऑल" बोला करतीं। मगर वह जानती थीं कि वह सच नहीं कहती । वह कक्षा के सभी बच्चों से उतना प्यार नहीं करती थीं। कक्षा में एक ऐसा बच्चा था जो मिस आयशा को फूटी आँख  नहीं भाता। उसका नाम तारिक था। तारिक मैली कुचैली स्थिति में  स्कूल आ जाया करता है। उसके बाल खराब होते, जूतों के बन्ध खुले, शर्ट के कॉलर पर मैल के निशान। । । व्याख्यान के दौरान भी उसका ध्यान कहीं और होता।

मिस आयशा के डाँटने पर वह चौंककर उन्हें देखता,  तो लग जाता..मगर उसकी खाली-खाली नज़रों से उन्हें साफ पता लगता रहता.कि तारिक शारीरिक रूप से कक्षा में उपस्थित होने के बावजूद भी मानसिक रूप से गायब है।.धीरे  धीरे मिस आयशा को तारिक़ से नफरत-सी होने लगी। क्लास में घुसते ही तारिक मिस आयशा की आलोचना का निशाना बनने लगता। सब बुराई उदाहरण तारिक के नाम पर किये जाते. बच्चे उस पर खिलखिला कर हंसते.और मिस आयशा उसे  अपमानित  कर के  संतोष प्राप्त करतीं। तारिक ने हालांकि किसी बात का कभी कोई जवाब नहीं दिया था।

मिस आयशा को वह एक बेजान पत्थर की तरह लगता,  जिसके अंदर भावना नाम की कोई चीज नहीं थी। प्रत्येक डांट, व्यंग्य और सजा के जवाब में वह बस अपनी  खाली नज़रों से उन्हें देखा करता और सिर झुका लेता । मिस आयशा को अब उससे  चिढ़ हो चुकी थी। पहला सेमेस्टर समाप्त हो गया और रिपोर्ट बनाने का चरण आया तो मिस आयशा ने तारिक की प्रगति रिपोर्ट में यह सब बुरी बातें लिख मारी । प्रगति रिपोर्ट माता पिता को दिखाने से पहले हेड मिस टरेस के पास जाया करती थी। उन्होंने जब तारिक की रिपोर्ट देखी तो मिस आयशा को बुला लिया। "मिस आयशा प्रगति रिपोर्ट में कुछ तो प्रगति भी लिखनी  चाहिए। आपने तो जो कुछ लिखा है इससे तारिक के पिता इससे बिल्कुल निराश हो जाएंगे।" "मैं माफी माँगती  हूँ, लेकिन तारिक एक बिल्कुल ही अशिष्ट और निकम्मा बच्चा है । मुझे नहीं लगता कि मैं उसकी प्रगति के बारे में कुछ लिख सकती हूँ। "मिस आयशा घृणित लहजे में बोलकर वहां से उठ आईं।
हेड मिसटरेस ने एक अजीब हरकत की। उन्होंने चपरासी के  हाथ मिस आयशा की डेस्क पर तारिक की पिछले वर्षों की प्रगति रिपोर्ट रखवा दी । अगले दिन मिस आयशा ने कक्षा में प्रवेश किया तो रिपोर्ट पर नजर पड़ी। पलटकर देखा तो पता लगा कि यह तारिक की रिपोर्ट हैं। "पिछली कक्षाओं में भी उसने निश्चय ही यही गुल खिलाए होंगे।" उन्होंने सोचा और कक्षा 3 की रिपोर्ट खोली। रिपोर्ट में टिप्पणी पढ़कर उनकी आश्चर्य की कोई सीमा न रही जब उन्होंने देखा कि रिपोर्ट उसकी तारीफों से भरी पड़ी है। "तारिक जैसा बुद्धिमान बच्चा मैंने आज तक नहीं देखा।" "बेहद संवेदनशील बच्चा है और अपने मित्रों और शिक्षक से बेहद लगाव रखता है।" "
अंतिम सेमेस्टर में भी तारिक ने प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया  है। "मिस आयशा ने अनिश्चित स्थिति में कक्षा 4 की रिपोर्ट खोली।" तारिक़ ने अपनी मां की बीमारी का बेहद प्रभाव पड़ा। .उसका  ध्यान पढ़ाई से हट रहा  है। "" तारिक की माँ को अंतिम चरण का  कैंसर हुआ है। । घर पर उसका और कोई ध्यान  रखने वाला नहीं है.जिसकी वहज से उसकी पढ़ाई पर पड़ा है। ""
तारिक की  माँ मर चुकी है और इसके साथ ही तारिक के जीवन की  रौनक  भी। । उसे बचाना होगा...इससे पहले कि  बहुत देर हो जाए। "मिस आयशा के दिमाग पर भयानक बोझ तारी हो गया। कांपते हाथों से उन्होंने प्रगति रिपोर्ट बंद की । आंसू उनकी आँखों से एक के बाद एक गिरने लगे.अगले दिन जब मिस आयशा कक्षा  में दाख़िल हुईं तो उसने अपनी आदत  के अनुसार अपना पारंपरिक वाक्यांश "आई लव यू ऑल" दोहराया। मगर वह जानती थीं कि वह आज भी झूठ बोल रही हैं। क्योंकि इसी क्लास में बैठे एक उलझे  बालों वाले बच्चे तारिक़ के लिए जो प्यार वह आज अपने दिल में महसूस कर रही थीं..वह कक्षा में बैठे और किसी भी बच्चे से हो ही नहीं सकता  था । पढ़ाई के दौरान उन्होंने रोजाना  दिनचर्या की तरह एक सवाल तारिक पर दागा और हमेशा की तरह तारिक ने सिर झुका लिया। जब कुछ देर तक मिस आयशा से कोई डांट फटकार और सहपाठी सहयोगियों से हँसी की आवाज उसके कानों में न पड़ी, तो उसने अचंभे में सिर उठाकर उनकी ओर देखा। अप्रत्याशित रूप से उनके माथे पर आज बल न थे, वह मुस्करा रही थीं। उन्होंने तारिक को अपने पास बुलाया और उसे सवाल का जवाब बताकर जबरन दोहराने के लिए कहा।
तारिक तीन चार बार के आग्रह के बाद अंतत:बोल ही पड़ा। इसके जवाब देते ही मिस आयशा ने न सिर्फ खुद खुश  होकर तालियाँ बजाईं बल्कि सभी से भी बजवायी.. फिर तो यह दिनचर्या बन गयी। मिस आयशा हर सवाल का जवाब  अपने आप बताती और फिर उसकी खूब सराहना तारीफ करतीं। प्रत्येक अच्छा उदाहरण तारिक के कारण दिया जाने लगा । धीरे-धीरे पुराना  तारिक सन्नाटे की कब्र फाड़ कर बाहर आ गया। अब मिस आयशा को सवाल के साथ जवाब बताने की जरूरत नहीं पड़ती। वह रोज बिला त्रुटि उत्तर देकर सभी को प्रभावित करता और नए- नए सवाल पूछ कर सबको हैरान भी। उसके बाल अब कुछ हद तक सुधरे  हुए होते, कपड़े भी काफी हद तक साफ होते, जिन्हें शायद वह खुद धोने लगा था। देखते ही देखते साल समाप्त हो गया और तारिक ने दूसरा स्थान हासिल कर लिया यानी दूसरी क्लास । विदाई समारोह में सभी बच्चे मिस आयशा के लिये सुंदर उपहार लेकर आए और मिस आयशा की  टेबल पर ढेर  लग गए । इन खूबसूरती से पैक हुए उपहार में एक पुराने अखबार में बद सलीके से पैक हुआ एक उपहार भी पड़ा था। बच्चे उसे देखकर हँस पड़े। किसी को जानने में देर न लगी कि उपहार के नाम पर ये तारिक लाया होगा। मिस आयशा ने उपहार के इस छोटे से पहाड़ में से लपक कर उसे निकाला। खोलकर देखा तो उसके अंदर  महिलाओं की इत्र की एक आधी इस्तेमाल की हुई शीशी और एक हाथ में पहनने वाला एक बड़ा-सा कड़ा था,  जिसके ज्यादातर मोती झड़ चुके थे। मिस आयशा ने चुपचाप इस इत्र को खुद पर छिड़का और हाथ में कंगन पहन लिया। बच्चे यह दृश्य देखकर हैरान रह गए। खुद तारिक भी। आखिर तारिक से रहा न गया और मिस आयशा के पास आकर खड़ा हो गया। । कुछ देर बाद उसने अटक अटक कर मिस आयशा को बताया कि "आज आप में से  मेरी माँ जैसी खुशबू आ रही है।"
समय पंख लगाकर उड़ने लगा। दिन सप्ताह, सप्ताह महीने और महीने साल में बदलते भला कहां देर लगती है? मगर हर साल के अंत में मिस आयशा को तारिक़ से एक पत्र नियमित रूप से प्राप्त होता, जिसमें लिखा होता कि "इस साल कई नए टीचर्स से मिला।। मगर आप जैसा कोई नहीं था।" फिर तारिक का  स्कूल समाप्त हो गया और पत्रों  का सिलसिला भी। कई साल आगे गुज़रे और मिस आयशा रिटायर हो गईं। एक दिन उन्हें अपनी मेल में तारिक का पत्र मिला जिसमें लिखा था:
"इस महीने के अंत में मेरी शादी है और आपकी अलावा शादी की बात मैं  नहीं सोच सकता। एक और बात .. मैं जीवन में बहुत सारे लोगों से मिल चुका हूं।। आप जैसा कोई नहीं है.........डॉक्टर तारिक

 साथ ही विमान का आने जाने का  टिकट भी लिफाफे में मौजूद था। मिस आयशा खुद को हरगिज़ न रोक सकती थीं। उन्होंने अपने पति से अनुमति ली और वह दूसरे शहर के लिए रवाना हो गईं। ऐन शादी के दिन जब वह शादी की जगह पहुंची तो थोड़ी लेट हो चुकी थीं। उन्हें लगा समारोह समाप्त हो चुका  होगा.. मगर यह देखकर उनके आश्चर्य की सीमा  न रही कि शहर के बड़े डॉ, बिजनेसमैन और यहाँ तक ​​कि वहां मौजूद निकाह पढाने वाले भी थक गये थे. कि आखिर कौन आना बाकी है...मगर तारिक समारोह में निकाह के  बजाय गेट की तरफ टकटकी लगाए उनके आने  का इंतजार कर  था। फिर सबने देखा कि जैसे ही यह  शिक्षिका आयशा ने गेट से प्रवेश किया तारिक उनकी ओर लपका और उनका हाथ पकड़ा, जिसमें उन्होंने अब तक वह सड़ा हुआ सा कंगन पहना हुआ था और उन्हें सीधा मंच पर ले गया। माइक हाथ में पकड़ कर उसने कुछ यूं बोला  "दोस्तो आप सभी हमेशा मुझसे  मेरी माँ के बारे में पूछा करते थे और मैं आप सबसे वादा किया करता था कि जल्द ही आप सबको उनसे मिलाऊँगा।।।........ये हैं मेरी माँ - ------------------------- "

मंगलवार, 21 जून 2016

शिक्षा-शिक्षकों को लेकर कुछ विचारणीय बिन्दु......

अधिकारी अफसर विद्यालयों का निरीक्षण कर रहे हैं और रोज अखबारों में आ रहा है कि फलाना स्कूल चेक हुआ और बच्चों से राजधानी पूछी, मुख्यमन्त्री का नाम पूछा और बच्चों को नहीं आया, इसी क्रम में एक खबर आयी कि एक शिक्षिका को black board पर  अंत्येष्टि शब्द गलत लिखते हुए देखा और उस अध्यापिका का नाम व फोटो अखबार में छाप दिया ।

अब विचारणीय प्रश्न यह है कि ऐसा करके समाज में, लोगों को, अभिभावकों को क्या सूचना और सन्देश दिया जा रहा है? यही कि सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को विषय का ज्ञान नहीं है? उनको हिन्दी, अंग्रेजी, गणित, आदि नहीं आती ?
बड़ा विरोधाभास है ........ एक तरफ सरकार कहती है कि सरकारी स्कूलों में नामांकन बढे, ज्यादा बच्चे जुड़े, कोर्ट में केस दाखिल किये जा रहे हैं किसरकारी स्कूल में अफसरों के बच्चे पढ़ाई करें और दूसरी तरफ शिक्षकों की गरिमा और मर्यादा तथा उअनके ज्ञान को धूमिल किया जा रहा है| ऐसी खबरें आने के बाद अभिभावकगण और समाज में ये सोच पनपेगी कि मास्टरों को कुछ नहीं आता, "मास्टर" यही शब्द अब संबोधन का ज़िंदा रह गया और गुरु जी जैसे लफ्ज गायब हैं ।

एक सोचनीय तत्व ये है कि अफसर किस उद्देश्य स्कूलों का निरीक्षण करने जाते हैं? अपनी अफसरी दिखाने? अध्यापकों को नीचा दिखाने? उनको अपमानित करने? अपना रौब दिखाने? उनको फटकार लगाने? .....  ...... ?
निंदनीय है  .........  
नकारात्मक है ........ 
गलत है .......
होना तो यह चाहिए कि अफसरों को शिक्षकों और बच्चों को प्रेरित करना चाहिए, उनका morale up करना चाहिये, उनको boost करना चाहिए, एक जोश भरना चाहिए,कोई कमी दिखे भी तो शिक्षकों और बच्चों में सकारात्मक ऊर्जा भरनी चाहिए, अपमानित करने से तो शिक्षक निराश हो जाएगा ।
अच्छा , इन अफसरों के प्रश्न होते भी ऐसे हैं जो syllabus से बाहर के होते हैं, अफसरों का उद्देश्य सुधारवादी नहीं, आलोचनात्मक दृष्टिकोण लिये होता है कि शिक्षक की गलती नजर आये बस, और हम अपना रौब दिखाए, एक अफसर ने लेफ्टिनेंट शब्द पूछा था शिक्षक से, क्योंकि यह अब अप्रचलित शब्द है और लेफ्टिनेंट अंग्रेजी में lieutenant लिखा जाता है ।
हिन्दी में तो और भी कठिन शब्द हैं जो भ्रमित करते हैं  और किताबों में, अखबारों में गलत वर्तनी ही प्रचलित है जैसे उपरोक्त शब्द मिलता है सही शब्द उपर्युक्त की जगह, कितने लोग जानते हैं कि कैलाश शब्द गलत है और कैलास सही, दुरवस्था सही है दुरावस्था गलत, सुई नहीं सूई शब्द सही है, अध:पतन को अधोपतन लिखा जाता हैहिन्दी भाषा की सही वर्तनी पूरे भारत में ही गिने-चुने लोग सही लिख पायेगे, दो aunthentic (प्रमाणिक) किताबों में एक में दोपहर सही शब्द माना है और एक ने दुपहर, भगवान जाने स्थाई शब्द सही है या स्थायी? दवाई शब्द तो होता ही नहीं है सही शब्द या तो दवा है या दवाईयाँ, दुकानों पर लिखा मिष्ठान शब्द ही गलत है, क्योंकि सही शब्द मिष्टान्न है।
कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता और कोई भी शिक्षक सर्वज्ञ नहीं होता, चाहे कितना भी कोई स्वाध्याय कर लें, शादी न करे, घर से कम निकले, शादी विवाह मृत्यु त्योहार आदि में जाना बन्द करके कोई शिक्षक सारी जिन्दगी पढ़ाई करे फिर भी किसी न किसी प्रश्न पर वो अटक जाएगा, क्योंकि विषय और ज्ञान अनन्त है ।
सरकारी स्कूल का अध्यापक कोई भी हो, वो बुद्धिमान अवश्य होगा, उसका कारण साफ़ है, वो कई परीक्षाएं पास करके शिक्षक बनाता है, बी ए, ऍम ए, बीटीसी, जेबीटी,  pre बीएड, फिर बीएड, ऍम एड, tet, ctet, आदि के उपरांत teacher के लिये प्रतियोगी परीक्षा, सिर्फ क्रीम क्रीम प्रतियोगी ही अध्यापक बन पाते हैं ।

कुछ हद तक शिक्षक स्वाध्याय नहीं कर रहा, जिसकी जिम्मेदारी समाज और शिक्षा विभाग की  है, आम इन्सान को नहीं पता कि सरकारी teacher के कैरियर में 40% fild work है, 40% लिखा पढ़ी और सिर्फ 20% अध्ययन अध्यापन है, field work मतलब शिक्षक गाँव में या शहर में घूमता है, उसको स्कूल परिसर में बैठने  का वक्त नहीं, बाल गणना, जनगणना, pulse पोलियो, चुनाव, सर्वे, पोषाहार के लिये दाल सब्जी मिर्च मसाले लाना, अभी चूल्हे cylinder लाने के लिये मशक्कत की, और सबसे बड़ा कार्य b.l.o. गाँव में घूमते रहो, फिर आये दिन ट्रेनिग, नामांकन और वोटर कार्ड बनाने के लिये द्वार-द्वार घूमो, छात्रवृति वाले काम के लिये बच्चों और अभिभावकों से आय प्रमाण पत्र और जाति प्रमाण पत्र की माथापच्ची में पूरा जुलाई निकल जाता है , बोर्ड एग्जाम में तो सिर्फ  govt टीचर की ही ड्यूटी लगाती है तो मार्च में सरकारी स्कूल खाली हो जाते हैं, वृक्षारोपण अभियान  में पेड़ लेने भागो, निशुल्क पाठ्य पुस्तक लेने भागोनिशुल्क गणवेश भी तो वितरित करना है उसका भी इन्तजाम करना है, राशन कार्ड और आधार कार्ड की ड्यूटी, बैंक का काम, बच्चों की पढ़ाई गयी भाड़ में , रोजाना नई नई सूचनाये विभाग मागता है और तरह तरह की u.c., किसी स्कूल में कमरा office निर्माण कार्य आ गया तो समझो 6 महीने गए, कभी पोषाहार की डाक जाती है to कभी छात्रवृति की, कभी dise बुकलेट भरो, तो कभी अनीमिया गोलियों की डाक, स्कूल आकर कोई आम इन्सान देखे तो पता चलेगा कि सरकारी स्कूल डाकखाना है।
शिक्षक स्वाध्याय कैसे करे? क्या करे? इस अजीबोगरीब माहोल में , और पढ़ाई चाहिए भी किसको? हर कोई पास भर होना चाहता है, डिग्री चाहता है, ज्ञान किसको चाहिए? एक तरफ गुणवत्ता सुधारने के लिये ncert books लगा दी गयी और जिनका standard ऐसा कि विज्ञान की किताब पढ़ाने के लिये lab की जरूरत है क्योंकि सारे प्रयोग हैं, सरकारी स्कूल में chalk duster black बोर्ड की व्यवस्था होती नहीं सही से, बाकी lab की  बात ..... ? कक्षा कमरे हैं सही लेकिन एक में कबाड़ पडा है, एक में चावल गेहूं और एक में पोषाहार पकाने के लिये लकड़ी भरी है, और एक में ऑफिस अलमारी, एक तरफ ncert books का आदर्शवाद और वहीं बोर्ड result सुधारने के लिये ...........

शिक्षा विभाग भी जादू का खेल है, कभी क्या तो कभी क्या? कभी एकीकरण, कभी समानीकरण, कभी स्टाफिंग pattern, शिक्षक को खुद नहीं पता कि उसका पत्ता कब कट जाएगा?
शिक्षक भी इन्सान है, मीडिया भी बस आदर्शवाद का ढकोसला करता है, अंतेष्टि गलत लिखा शिक्षिका ने तो उसका फोटो खींच लिया, किसी बच्चे ने चाहे खुद ही खुद को चोटिल कर  दिया हो लेकिन बड़े बड़े अक्षरों में खबर छपेगी  
"शिक्षक ने  पीटा"
"शिक्षक की करतूत "
कोई भी शिक्षक स्कूल में बैठकर time pass नहीं करता, बच्चों को उनके मां बाप भी गलत काम पर पिटाई करते हैं, शिक्षक राक्षस नहीं है, अगर कोई एक शिक्षक गलती करता है तो पूरा शिक्षक समुदाय की गलती सिद्ध नहीं हो जाती, पढ़ाई कोई घुट्टी नहीं है कि बच्चे का मुँह खोला और दो बूँद डाल दी, अनुशासन के लिये भय भी जरूरी होता हैमीडिया को बहुत शौक है सच छापने का तो किसी स्कूल में कुछ दिन काटकर आये, देखे शिक्षक की दोहरी तिहरी जिम्मेदारी और माहौल ,
विश्व का सारा ज्ञान और विकास शिक्षा और शिक्षक के कारण ही वजूद में आया है, सरकारी शिक्षक बहुत ही निरीह और आम इन्सान है, वो अपना 100% देना चाहता है, ये जरूर है कि वो दबावों में है, शिक्षण बस एक नौकरी भर नहीं है। अफसर मीडिया और समाज तीनों शिक्षक के प्रति अनुदार हैं, और शिक्षक की गलत छवि पेश कर रहे हैं।
शिक्षा व्यवस्था के सन्दर्भ में आज से पचास वर्ष पहले श्रीलाल शुक्ल जी ने एक कड़वी मगर सच बात राग दरवारी में लिखी थी, जो आज भी प्रासंगिक है "सरकारी शिक्षा रास्ते में पड़ी हुई एक कुतिया है, जिसको कोई भी ठोकर मारकर चला जाता है। जो भी मंत्री, अधिकारी आते हैं बजाय इसके कि वह शिक्षा व्यवस्था को ठीक करें, शिक्षकों को जिम्मेदार मानकर बात शुरू करता है। हर आदमी सरकारी शिक्षा के खिलाफ वक्तव्य देकर चला जाता है, मगर उसके लिए कुछ नहीं करता।"