बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

युवा पूछते हैं कौन हैं ये जयेंद्र सरस्वती?

व्हाट्स ऐप पर ब्रह्मलीन जयेंद्र सरस्वती की फोटो लगाई थी, अनेकों पढ़े लिखे युवाओं ने पूछा कि यह हैं कौन?
उधर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ जिसका जिंदा के चाम चाटने से मन न भरा चार दिन से मरे का चाम चाट रहा है।
खैर, शाम तक आदेश हुआ कि कांची कामकोटि और जयेंद्र सरस्वती पर कुछ लिखा जाए। यह लेख ईश प्रेरणा ही है। निश्चित ही अनियंत्रित हुश्न वाली सिने तारिका की बजाए उस महान मठानुशासन की परंपरा का स्मरण अधिक फलदायी होगा।
मठाम्नाय महानुशासन आचार्य शंकर परंपरा को ही कलियुग में जगद्गुरु घोषित करता है। अब हमारे जैसे भृंगी सदृश "शंकर स्वयं शंकरः" पर क्या तो लिखें और क्या कहें पर एक 'वाइल्ड गूज़ चेस' न करें तो आदेश भंग हो।
सनातन परम्परा में मोक्षदा सप्तपुरियों के नाम त्रिकाल संध्या में पुण्यस्मरण स्वरूप लिए जाते रहे हैं।
"काशी कांची चमायाख्यातवयोध्याद्वारवतयपि, मथुराऽवन्तिका चैताः सप्तपुर्योऽत्र मोक्षदाः';"
या
 'अयोध्या-मथुरामायाकाशीकांचीत्वन्तिका, पुरी द्वारावतीचैव सप्तैते मोक्षदायिकाः।'
कांची शक्तिपीठ भी है जहाँ देवी का कंकाल गिरा था और यहां विश्वप्रसिद्ध कैलाशनाथ मंदिर भी है। कांची के तीन हिस्से हैं शिवकांची, विष्णुकांची और जैनकांची।
अस्तु,कांची के आचार्य का उपनाम "ऐंद्र सरस्वती" से शोभित होता है। और शंकराचार्य स्वयं ही प्रतिदिन " साक्षात चंद्रमौलिश्वर"  की त्रिकाल पूजा करते हैं।

इस परम्परा का प्रारंभ हुआ जब दिग्विजय के बाद आचार्य शंकर कांची पहुंचे और ताम्बरवर्नी घाटी के एक युवा को संन्यास की दीक्षा दी और उस युवक का संन्यास नाम दिया सर्वज्ञात्मन । साथ ही उन्हें सुरेश्वराचार्य के अनुशासन में रख मठ का उत्तराधिकारी घोषित किया।
पश्चात इसके, पंचमहाभूत मंदिरों में एक पृथ्वी तत्व प्रतीक एकाम्बर, वरदराज और कामाक्षी मंदिरों की स्थापना भी की तथा पूरे नगर के वास्तु में भी परिवर्तन कराया।
मद्रास विश्वविद्यालय से प्रकाशित अनंतानंदगिरीकृत शंकरचरितम् और रामभद्र दीक्षित रचित पतंजलि विजयम् की मानें तो योगलिंग और कामेश्वरी कामाक्षी आचार्य शंकर द्वारा समान पूजित रहे।ध्यान रहे, कूर्म पुराण ३०/३२-३५ डिण्डिम घोषणा करता है कि आचार्य शंकर साक्षात शंकर ही हैं।
"शिव रहस्य" के ४६वें श्लोक के अनुसार, आदि शंकर ने कैलाश से प्राप्त पांच स्फटिक महालिंगों में से एक मुक्ति लिंग को केदारनाथ में,वर लिंग को नीलकान्त क्षेत्र नेपाल में स्थापित किया जबकि बाकी तीन के साथ दक्षिण लौट गए। इन तीन में भोग लिंग को शारदा पीठ कर्नाटक में, मोक्ष लिंग को नटराज मंदिर चिदम्बरम में भिजवाया जबकि योग लिंग को अपनी पूजा के लिए कांची में रखा जहां राजसेन ने उनका अद्भुत स्वागत किया था।
ज्ञातव्य है कि सुरेश्वराचार्य मंडन मिश्र का ही संन्यास नाम है। महिष्मती निवासी मंडन मिश्र का आदिशंकर के साथ पूर्व मीमांसा और वेदान्त विषयक शास्त्रार्थ जगत्प्रसिद्ध है ही। इन्हीं सुरेश्वराचार्य ने शंकर के  बृहदारण्योपनिषद भाष्य पर "वाटिका" जैसी महान कृति और फिर "नैष्कर्म्य सिद्धि " जैसे महान दार्शनिक ग्रंथ का प्रतिपादन किया। दक्षिण मोक्षपुरी कांची में इनकी समाधि है। 'मंडन मिश्र अग्रहारम्' के नाम से अभी कुछ समय पहले तक एक मार्ग का नाम भी था।
इसी कांची में शंकर का ब्रह्मदेश और तमिल विद्वानों  के साथ रोमहर्षक शास्त्रार्थ हुआ जिसके गहन विषय थे 'देवभेद' और 'मूर्तिभेद'। अद्वैत के स्पष्ट आलोक में दूसरे विद्वान निरुत्तर निःशब्द हो गए।
कुछ वर्षों बाद श्री शंकर एक सात वर्षीय बालक की तरफ आकृष्ट हुए और बालक के माता पिता तक संदेश भिजवाया गया।
यही बालक सर्वज्ञात्मन आगे चलकर ' संक्षेप सारीरक' जैसी सूत्र भाष्यों की टीका और 'सर्वज्ञ विलास' जैसा ग्रंथ लिख सके।
कांची कामकोटि पीठ अनेक मूर्धन्य विद्वान एवं सिद्ध आचार्यों से सुशोभित होती रही है। श्री कृपाशंकर हों या कामाक्षी के प्रसाद से अद्भुत कवित्व और वक्तृत्व प्राप्त करने वाले श्री मूकशंकर।
जैन दर्शन को सिंधु नदी के उस पार पहुंचा देने वाले उज्जवल शंकरेंद्र सरस्वती मूलतः मराठा ब्राह्मण अच्युत केशव जिनकी कलापुरी समाधि की प्रेरणा से मूल हरसिद्धि पीठ का निश्चय हुआ, वह हों या  श्री अभिनव शंकर।
सशरीर योगविद्या से स्वयं को लिंग में परिवर्तित कर लेने वाले श्री सच्चिदानंदघनेंद्र सरस्वती हों या  श्री परमशिवेंद्र सरस्वती।
श्री बोधेंद्र सरस्वती हों या पीठ के विश्व प्रसिद्ध ६८वें आचार्य  पूज्यश्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती जिनके नाम लेने से ही तन्मै मनः शिव संकल्पमस्तु सिद्ध होता हो, वह हों।
सोलह वर्ष की अवस्था में ही ऋगवेद के शाकल्य संहिता का पूर्ण अध्ययन कर लेने वाले और उन्नीस वर्ष की अवस्था में ही शंकराचार्य चुने जाने वाले जयेंद्र सरस्वती आदि शंकर के बाद पहले शंकराचार्य हैं जिन्होंने मानसरोवर में लिंग स्थापना और पूजा की है।
आपने अपने गुरु चंद्रशेखरेन्द्र सरस्वती के नाम पर  विश्वविद्यालय की स्थापना की है। विश्वविद्यालय में एक बृहत पुस्तकालय है जहां दुर्लभतम् पाण्डुलिपियों को सहेज कर रखा गया है। शोधार्थियों के लिए पुस्तकों का विशाल भण्डार भी है।
यहाँ वेद, शास्त्र, धर्म,संस्कृति, सभ्यता, संगीत, कला, वास्तु-शास्त्र, शिल्पकला,आयुर्वेद, सिद्ध चिकित्सा, ज्योतिष, विज्ञान तकनीकी और अन्तरिक्ष विज्ञान सहित सभी विषयों पर साहित्य का संग्रह है जो अद्भुत है। साथ ही वेद की पढ़ाई करते इस पीठ में संस्कारों की जो गंगोत्री बहती है वो देखते ही बनती है।
इस परम्परा के सभी आचार्यों का शुक्ल पक्ष में ही ब्रह्मलीन होना एक अद्भुत संकेत है।
विस्तार भय और मूढ़मति की सीमा, भावाभाव... आज इतना ही
 शंकर परम्परा को दण्डवत प्रणाम!

मधुसूदन उपाध्याय
अवध प्रान्त
शुक्ल पक्ष फाल्गुन त्रयोदशी
संवत् २०७४

1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छी जागरूक प्रस्तुति
    शंकर परम्परा को दण्डवत प्रणाम!

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